Wednesday, June 10, 2026

गोवा घूमिए भी, यहां के मंदिर भी देखि

 

 गोवा का नाम सुनते ही सबसे पहले जेहन में नीले समंदर की लहरें, दूर तक फैले रेतीले समुद्र तट, पुर्तगाली वास्तुकला की झलक और देर रात तक चलने वाली पार्टियां उभर आती हैं। लेकिन इस आधुनिक और चकाचौंध से भरे राज्य के भीतर एक ऐसा शांत, आध्यात्मिक और प्राचीन संसार भी सांस लेता है, जिसकी चर्चा अक्सर उतनी नहीं होती, जितनी होनी चाहिए। गोवा केवल मौज-मस्ती का केंद्र नहीं है, बल्कि यह महान संतों, प्राचीन ऋषियों और अनगिनत राजवंशों की आध्यात्मिक भूमि भी रहा है। यहां के कोने-कोने में बसे प्राचीन मंदिर इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि तमाम विदेशी आक्रमणों, मजहबी अत्याचारों और औपनिवेशिक बदलावों के थपेड़े खाने के बावजूद इस राज्य ने अपनी सनातनी जड़ों को न केवल सुरक्षित रखा, बल्कि उन्हें और अधिक मजबूती से सींचा है। एक बात और इन भव्य मंदिरों  भीड़ न के बराबर है। सब कुछ शांत। न शोर । न शराबा। अधिकतर  मंदिरों में सात्विक भोजन की कैंटीन भी  है तो रहने के लिए प्रायः कक्ष भी हैं।

 आप गोवा घूमने आ रहे हैं, तो यहां के शानदार मंदिरों का दर्शन किए बिना आपकी यात्रा अधूरी मानी जाएगी।  चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी के बीच जब गोवा पर पुर्तगालियों का शासन स्थापित हुआ, तो उन्होंने व्यापक स्तर पर हिंदू धार्मिक स्थलों को नष्ट करने और बलात धर्म परिवर्तन कराने का अभियान चलाया। उस भयावह दौर में गोवा के मूल निवासी सारस्वत ब्राह्मणों और अन्य सनातनी समुदायों ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर अपने आराध्य देवी-देवताओं के विग्रहों (मूर्तियों) को पुर्तगाली नियंत्रण वाले क्षेत्रों (जैसे बारदेज, तिसवाड़ी और साल्सेट) से चुपचाप निकाला। वे इन मूर्तियों को लेकर नदियों को पार कर उन क्षेत्रों में चले गए जो उस समय मुस्लिम आदिलशाही या स्थानीय राजाओं के अधीन थे, जैसे कि पौंडा (अंतूज़ महाल)। यही कारण है कि आज गोवा के सबसे प्रसिद्ध और भव्य मंदिर आपको तटीय इलाकों के बजाय पोंडा के घने जंगलों, पहाड़ियों और प्राकृतिक वादियों के बीच स्थित मिलते हैं। पोंडा पणजी  से मात्र 28 किलोमीटर दूर है।

गोवा के मंदिरों की वास्तुकला पूरी दुनिया में अनूठी है, क्योंकि इसमें पारंपरिक हिंदू मंदिर निर्माण कला के साथ-साथ मुस्लिम (बीजापुरी) और पुर्तगाली स्थापत्य कला का एक अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है। यहां के मंदिरों की सबसे बड़ी विशेषता उनके परिसर में बने विशाल 'दीपस्तंभ' होते हैं, जो कई मंजिला ऊंचे होते हैं और त्योहारों के दिनों में जब इनमें सैकड़ों दीये जलाए जाते हैं, तो पूरा परिसर आलौकिक रोशनी से नहा उठता है। इसके अलावा, यहां के मंदिरों की गुंबददार छतें, लकड़ी पर की गई बारीक नक्काशी और पानी के सुंदर तालाब (टैंक) पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

गोवा का सबसे लोकप्रिय और भव्य मंदिर 'श्री मंगेशी मंदिर' है, जो फोंडा तालुका के प्रियोल गांव में स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव के एक रूप 'मंगेश' को समर्पित है, जिन्हें स्थानीय लोग मंगिरीश भी कहते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव ने माता पार्वती को डराने के लिए एक भयानक बाघ का रूप धारण किया था। भयभीत होकर माता पार्वती ने शिव जी को पुकारते हुए कहा था 'त्राहि माम् गिरीश' (हे पर्वतों के स्वामी, मेरी रक्षा करें)। इसी वाक्य के अपभ्रंश से 'मंगिरीश' और बाद में 'मंगेश' नाम पड़ा। यह मंदिर मूल रूप से जुआरी नदी के तट पर कुशस्थली (वर्तमान कोरटालिम) में स्थित था, लेकिन वर्ष 1560 में पुर्तगालियों के डर से भक्त इस शिवलिंग को गुप्त रूप से प्रियोल ले आए। इस मंदिर की महत्ता इतनी अधिक है कि यह हजारों सारस्वत ब्राह्मण परिवारों के कुलदेवता हैं और संगीत सम्राज्ञी लता मंगेशकर का परिवार भी इसी गांव और मंदिर से ताल्लुक रखता है। राजधानी पणजी से मंगेशी मंदिर की दूरी लगभग 21 किलोमीटर है।

मंगेशी मंदिर के बिल्कुल करीब, फोंडा के ही कवले गांव में स्थित है 'श्री शांतादुर्गा मंदिर', जो गोवा के सबसे पूजनीय स्थलों में से एक है। यह मंदिर देवी दुर्गा के एक शांत और सौम्य रूप को समर्पित है इन्हें स्थानीय भाषा में 'सांतेरी' कहा जाता है। मान्यता है कि जब भगवान शिव और भगवान विष्णु के बीच एक भयंकर और विनाशकारी युद्ध छिड़ गया था, तब ब्रह्मा जी के अनुरोध पर जगदम्बा ने बीच में आकर दोनों को शांत कराया था इसके बाद उन्हें 'शांतादुर्गा' नाम मिला। गर्भगृह में माता की मूर्ति के दोनों तरफ शिव और विष्णु की मूर्तियां स्थापित हैं, जो इस पौराणिक घटना को दर्शाती हैं। इस मंदिर का इतिहास भी स्थानांतरण से जुड़ा है मूल रूप से यह साल्सेट के कलोसिम में था, जिसे पुर्तगालियों ने नष्ट कर दिया । इसके बाद 18वीं शताब्दी में मराठा राजा शाहू महाराज के मंत्री रामचंद्र पंत ने इस भव्य मंदिर का पुनर्निर्माण कवले में करवाया। इस मंदिर की वास्तुकला में पुर्तगाली शैली की खिड़कियां और रोमन शैली के रंगीन कांच देखे जा सकते हैं। पणजी से इस मंदिर की दूरी करीब 30 किलोमीटर है।यदि आप भारत के इतिहास और सबसे प्राचीन वास्तुकला के दीवाने हैं, तो आपको 'ताम्बडी सुरला महादेव मंदिर' जरूर जाना चाहिए। यह गोवा का एकमात्र ऐसा मंदिर है जो पुर्तगालियों और उससे पहले के मुस्लिम आक्रमणकारियों से पूरी तरह सुरक्षित रहा, क्योंकि यह पश्चिमी घाट के घने और दुर्गम जंगलों के बीच छिपा हुआ था। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में यादव राजा रामचंद्र के मंत्री हेमाद्री द्वारा बारीक काले बेसाल्ट पत्थरों से कराया गया था। यह मंदिर पूरी तरह से कदम-यादव शैली (जैन वास्तुकला से प्रभावित) में बना है। इसके गर्भगृह में एक प्राकृतिक शिवलिंग स्थापित है और मंदिर के खंभों पर हाथियों, लताओं और देवी-देवताओं की अत्यंत सुंदर नक्काशी की गई है। सावन के महीने और महाशिवरात्रि पर यहां की छटा देखते ही बनती है मंदिर के पास बहने वाली सुरला नदी की कलकल आवाज इस जगह की आध्यात्मिकता को कई गुना बढ़ा देती है। पणजी से यह मंदिर लगभग 65 किलोमीटर दूर भगवान महावीर वन्यजीव अभयारण्य के अंदर स्थित है। घने जंगलों के बीच से गुजरने वाला यह रास्ता खुद में एक अद्भुत रोमांच है।

गोवा का एक और बेहद अनोखा मंदिर है 'श्री महालसा नारायणी मंदिर', जो पोंडा के मारडोल गांव में स्थित है। पूरे भारत में यह उन चुनिंदा मंदिरों में से एक है जहां भगवान विष्णु के स्त्री अवतार 'मोहिनी' की पूजा मुख्य देवी के रूप में की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब अमृत के लिए देवताओं और असुरों में विवाद हुआ, तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर असुरों को छला था और देवताओं को अमृतपान कराया था। यहां देवी महालसा की चार भुजाओं वाली मूर्ति है, जिनके पैरों के नीचे एक असुर दबा हुआ है। इस मंदिर के प्रांगण में गोवा का सबसे ऊंचा और सुंदर पीतल का दीपस्तंभ है इसमें 21 मंजिलें हैं और 150 से अधिक दीये एक साथ जलाए जा सकते हैं। इस मंदिर का इतिहास भी संघर्षपूर्ण रहा है, इसे नेरुल (बारदेज) से मारडोल स्थानांतरित किया गया था।

 उत्तरी गोवा के डिचोली (बिचोलिम) तालुका के नार्वे गांव में स्थित 'श्री सप्तकोटेश्वर मंदिर' का ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व बहुत गहरा है। भगवान शिव के अवतार सप्तकोटेश्वर कदम्ब राजवंश के मुख्य आराध्य देव थे। 14वीं शताब्दी में बहमनी सुल्तानों ने इस मंदिर को तहस-नहस कर दिया था इसे बाद में विजयनगर साम्राज्य के राजा हरिहरराय ने दोबारा बनवाया। लेकिन 1560 में पुर्तगालियों ने फिर से इस मंदिर को तोड़कर यहां एक चर्च खड़ा कर दिया। इसके बाद, मराठा साम्राज्य के छत्रपति शिवाजी महाराज ने वर्ष 1668 में इस क्षेत्र को पुर्तगालियों से मुक्त कराया । अपने आदेश पर सप्तकोटेश्वर मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर के प्रवेश द्वार पर शिवाजी महाराज के काल का एक शिलालेख आज भी मौजूद है।

पणजी शहर के भीतर ही एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित 'मारुति मंदिर' भी बेहद दर्शनीय है। अल्टिन्हो पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर भगवान हनुमान को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण पुर्तगाली शासन के अंतिम दिनों में बड़ी कठिनाइयों के बाद छिपकर किया गया था, क्योंकि उस समय सार्वजनिक रूप से हिंदू मंदिरों के निर्माण पर प्रतिबंध था। रात के समय जब इस मंदिर को आधुनिक लाइटों से सजाया जाता है, तो यह पणजी शहर के निचले हिस्सों से भी साफ चमकता हुआ दिखाई देता है। यहां से मांडवी नदी और पणजी शहर का विहंगम नजारा दिखता है।

 माशेल में स्थित 'देवकी कृष्ण मंदिर' पूरे भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान कृष्ण की पूजा उनकी माता देवकी के साथ की जाती है इसमें माता देवकी की गोद में बाल कृष्ण बैठे हुए हैं। वहीं सत्तरी तालुका के वालपोई में स्थित 'ब्रह्मा मंदिर' भारत के उन विरले मंदिरों में शामिल है जहां सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा की आदमकद मूर्ति स्थापित है। गोवा के ये सभी मंदिर सिर्फ पत्थरों और गारे की इमारतें नहीं हैं, बल्कि ये सदियों के दमन के खिलाफ सनातन आस्था की विजय के जीवंत स्मारक हैं।

 गोवा की अपनी अगली यात्रा की योजना बनाते समय  समंदर के किनारों की मौज-मस्ती, पब और क्रूज के साथ-साथ दो दिन इन ऐतिहासिक और आध्यात्मिक मंदिरों के लिए भी जरूर सुरक्षित रखें। इन मंदिरों की शांत परिक्रमा, ऊंचे दीपस्तंभों की भव्यता, प्राचीन तालाबों का शीतल जल और गर्भगृह से आती चंदन व कपूर की खुशबू आपके मन को एक ऐसी असीम शांति देगी जो आपको गोवा के किसी भी आधुनिक रिसॉर्ट में नहीं मिल सकती।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं)

 

 

मचछर और चाय का प्याला व्यंग

 

मच्छर र चाय का  प्याला

अशोक मधुप


 मच्छर। जी वो मच्छर हो था।सवेरे −सवेरे आया।फालतू में मूड़ ख़राब कर गया।मैंने उसे बुलाया तो था नहीं। खुद आया। मेरे कान पर नहीं गुनगुनाया।आने का कोई संकेत भी नहीं बताया।आकर मेरी चाय में गिर गया।पता नही नही चला, कब ये हो गया।सिप करने के लिये जब कप होंटो के पास गया,तब महाशय की उपस्थिति का अहसास हुआ।सवेरे में  उठकर मैं अपने और पत्नी के लिए रोज दो कप चाय बनाता हूँ। कुछ कड़क।बड़े कप में।पटियाला पेग के बराबर।पत्नी  सो रहीं थीं।उनका कप प्लेट से ढककर रख दिया।अपना कप हाथ में लेकर चाय सिप करने के लिए,कप के होठों के पास पहुंचते  अहसास हुआ कि आत्महत्या के इरादे से प्याले में मच्छर महाशय कूद गए।।मैंने उन्हें जल्दी से निकलने की बहुत कोशिश की।बचाने चाहे उसके प्राण।दिखानी चाही मानवता।पर प्रयास और कोशिश बेकार गई।गर्म चाय में डालने से उंगली र जल गई।बहुत झल्लाहट हो रही है।इसे डूबने कर लिए मेरा चाय का भरा कप ही मिला।कोई रास्ते में  नदी −तालाब नहीं मिला। कहीं  और डूब मरता । मेरी मेहनत से बनाई  चाय तो खराब न करता। सवेरे ही क्यों डूबा।  क्या जल्दी थी। दिन निकलने का  तो इंतजार करना था। इतनी जल्दी थी तो कहीं और जाकर मरना था।
जल्दी में मैने उसे चाय से निकाल कर फेंक दिया। कई   बार चाय पीने का इरादा किया। किंतु मन ने स्वीकार नहीं किया। आखिर मजबूर हो नाली में बहा दिया। जल्दी में यह भी तो नही देख पाया । वह नर था या मादा। विवाहित था या क्वारा।  धर्म  क्या था।  हिंदू , मुस्लिम , सिख इसाई, बौद्घ ,पारसी  या कोई  और। इसमें भी सवर्ण था, या पिछड़ा।अनुसूच‌ित जाति से तो नहीं था।  कुर्मी था या पासी। कौन था।  यादव तो नहीं था।यह भी पता नहीं चला कि वह अपनी ही जाति के लोगों का खून चूंसता था। या दूसरी  जाति के व्य‌क्त‌ियों का। सवर्ण था तो क्या सर्वहारा का खून चूंसता था। ऐसा तो  नही चुन− चुन कर पिछड़ों या दलितों को अपना शिकार बनाता रहा हो।
दलित था  तो क्या सवर्ण से नफरत करता था।  दलित के मुकाबले  ऊंची जाती वालों को  गहरा घाव कर खून चूंसता। अपनी जाती  को छोड़ देता। पर वह तो मच्छर रहा होगा।  साम्यवादी। उसे जाति धर्म से क्या? बस पेट भरने से मतलब। जो मिला । उसी का ही खून चूंस लिया।
एक नुकसान हो गया। मैं जल्दी में ज्यादा जानकारी भी नहीं कर पाया।  उसकी जान बचाने के चक्कर में यह भी नहीं देख सका कि वह टायलेट का मच्छर था या बाथ रूम का। बाथरूम का था तो आम  आदमी के या किसी रईस के बाथरूम का। सूंघ कर देखना चाहिए था। सुगंध  से पता चलता। उसमें बढ‌‌िया  सुगंध आ रही होती तो पता चलता कि किसी बड़े व्यक्ति के बाथरूम में चला बढ़ा है।  वैसे बड़े व्यक्ति के यहां तो मच्छर का होना ही मुश्किल है। यह तो गरीबों के घर या सार्वजनिक टायलेट में शान से पलतें और बढ़तें हैं।

एक बात अच्छी रही कि मर गया। अगर किसी मलेरिया, डेंगू के मरीज को काटकर आया होता । तब मुझे जरूर बीमार करता।किसी कोरोना के मरीज को छूकर  आया होता तो मुझे जरूर अस्पताल भिजवाता।अच्छा हुआ। चाय में डूब गया। उसके साथ उसमें जमा वैकटीरिया भी मर गए। अगर न मरता तो जाने कितनों को काटकर बीमार करता। देखकर लगा था कि काफी बड़ा था। शायद नौ जवान। लंबी टांगे । बड़े पंख। यह भी पता नहीं चला कि रात में किसके खून का आंनन्द लिया। किसी ‌महिला के खून का आनन्द लिया या युवती को किस ‌क‌िया। किसी युवक का खून चूंसा या बूढे का शिकार किया।


अशोक मधुप

 

 

चित्रलेखा

 

भगवती चरण वर्मा

जन्म 30 अगस्त 1903 मृत्यु पांच अक्तूबर 1981

 

 

भगवती चरण वर्मा का उपन्यास चित्रलेखा आज  पढ़कर समाप्त किया। दो  दिन से पढ़ रहा था। मनन कर रहा था। उपन्यास बहुत पसंद आया।

जवानी के दौर में भी कभी पढ़ा था पर उसकी ज्यादा स्मृति नहीं । कुछ −कुछ घटनाएं याद थी। घटनाक्रम नजर में था। जवानी में उपन्यास और साहित्य पढ़ने का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन था। मेरे किशोर्य कॉल और युवावस्था में न टीवी था न रेडियो। यदि था तो कुछ संपन्न परिवारों तक। पढ़ाई में ज्यादा रुचि न थी, खेल में रुचि न थी, तो क्या करते बस उपन्यास ,कविता कहानी जो मिलता उसी को पढ़ता। मेरी पीढ़ी जिसकी  रुचि स्कूल शिक्षा में  कम थी, खेल पसंद ना था, वह उपन्यास पढ़ती। मेरा भी शुरुआत से यही शगल रहा।

उस समय उपन्यास के प्रिय लेखक थे , गुलशन नंदा ,प्यारेलाल ,ओम प्रकाश शर्मा , इबने सफी, गुरू दत,आचार्य चतुरसेन,वेद प्रकाश कंबोज आदि आदि। मैं एक दिन में कई −कई उपन्यास पढ़ लेता।

उस दौर में मैंने राहुल सांस्कृतायन का  बोल्गा से गंगा उपन्यास पढ़ा। तो गुनाहों के देवता  का भी पठन किया। रूसी लेखक की गोर्की का प्रसिद्ध उपन्यास मां पढा, तो भगवती चरण वर्मा का चित्रलेखा। साकेत ,कामायनी, आसूं, प्रिय− प्रवास जाने क्या −क्या पढ़ा।

झालू में खाली समय में घरके पास छतरी वाले कुएं  पर सर्वेश की साइकिल की मरम्मत की दुकान थी।उसे भी उपन्यास पढ़ने को शौक था।वहकाम में लगा रहता । मैं  उनके थले पर बैठा उपन्यास पढ़ता रहता। बीए की पढ़ाई के दौरान पिता जैन फार्म बिजनौर में मुनीम हो गए। वर्धमान काँलेज के पास क्वार्टर मिल गया।जैन फार्म और वर्धमान काँलेज एक ही परिवार का था। गर्मियों के अवकाश में नाश्ताकर दस बजे के आसपास में काँलेज की लाइब्रेरी में चला जाता। वहां फर्श बहुत साफ होता था। कोई भी कविता ,कहानी , साहित्य की किताब लेकर फर्श पर लेटकर पढता रहता।पुस्तकालय में पंखे चलते रहते थे।गर्मियों में फर्श ठंडा होता। आराम से दो बजे तक पढ़ता , उसके बाद  खाना खाने आ जाता। खाना खाकर फिर लाइब्रेरी पहुंच जाता।   

 बहुत कुछ पढ़ा, जो भी स्मृति पटल से लुप्त हो गया है। स्लेट पर लिखा पुराना पड़ने पर धुंधला गया है। सा ही चित्रलेखा के साथ हुआ ।

गुरु रत्नाकर अपने दो शिष्यों को पाप क्याहै,का ज्ञान कराने के लिए दो व्यक्तियों के पास भेजते हैं। महा व्यसनी बीजगुप्त के पास श्वेतांक को भेजते हैं । महा तपस्वी  कुमार गिरी के पास विशाल देव को भेजते हैं। दोनों को एक-एक वर्ष उनके संसर्ग में रहना है। जानना है कि पाप क्या है?

एक वर्ष बाद वे दोनों गुरु रत्नाककर के पास लौटते हैं। श्वेतांक महव्यसनी बीजगुप्त को देवता और त्याग की प्रतिमूर्ति बताता है। कुमार गिरी को पशु कहता है। कहता है कि कुमार गिरी अपने लिए जीता है। संसार में उसका जीवन व्यर्थ है । वे अपने जीवन के नियमों के प्रतिकूल  चल रहा है। अपने सुख के लिए उसने संसार की बाधाओं से मुंह मोड़ लिया है। कुमार गिरी पापी है।

विशाल देव के पास रहा दूसरा शिष्य कुमार गिरी की प्रशंसा करता है। कहता है कि योगी कुमार गिरी अजित हैं। उन्होंने ममत्व   को वशीभूत कर लिया है। वे संसार से बहुत ऊपर उठ चुकी है। उसकी राय में बीजगुप्त वासना का दास है । उसका जीवन संसार के भोग विलास में है। वह पापी है। वह पापमय संसार  का वह मुख्य मार्गी  है।

रत्नागिरी निष्कर्ष निकालते हैं । वे कहते हैं तुम दोंनों विभिन्न परिस्थिति में रहे । इसलिए  दोनों की पाप की धारणाएं भी भिन्न-भिन्न है। संसार में पाप कुछ भी नहीं है । केवल मनुष्य की दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है। प्रत्येक व्यक्ति एक विशेष प्रकार की मन प्रवृत्ति लेकर पैदा होता है। प्रत्येक व्यक्ति इस संसार के रंगमंच पर अभिनय करने के लिए आता है। अपनी मन प्रवृत्ति से प्रेरित होकर अपने पाठ को दोहराता है। यही मनुष्य का जीवन है। वह अपने स्वभाव के अनुकूल कार्य करता है। स्वभाव प्रकृति है। मनुष्य  अपना स्वामी नहीं है। वह प्रकृति का दास है। बिवश है। वह करता नहीं है। वह केवल साधन है। फिर पुण्य और पाप कैसा? हमें ममत्व प्रधान है। प्रत्येक मनुष्य सुख चाहता है। केवल व्यक्ति के सुख के केंद्र भिन्न है। कुछ सुख को मदिरा में देखते  हैं। कुछ उसको व्यभिचार में देखते हैं। कुछ त्याग में देखते हैं।पर सुख सब चाहते हैं। कोई व्यक्ति संसार में वह काम नहीं करेगा, जिससे उसे दुख मिले। यही मनुषय की मनप्रवृत्ति है । यही उसके   दृष्टिकोण से विषमता है।

रत्नागिरी कहते हैं कि संसार में इसीलिए पाप की परिभाषा नहीं हो सकती। हम न पाप करते हैं, न पूण्य करते हैं,  हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है।

अशोक मधुप

Wednesday, May 20, 2026

सुप्रीम आदेश से आवारा कुत्तों से मुक्ति की उम्मीद बढ़ी

 


अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कार्ट द्वारा अपने पुराने आदेश को  बरकरार रखने से अब लगता है कि देश को आवारा कुत्तों के आंतक से मुक्ति मिल  जाएगी। लोगों को रैबीज की जान लेवा बीमारी से छुटकारा मिल सकेगा। न्यायालय ने नेशनल हाईवे अथार्टी  को भी कहा कि यह मार्ग  पर इस तरह बाड़  और अवरोध  बनाए कि आवारा पशु सड़क पर न जा सके।  न्यायालय के नेशनल हाईवे अथार्टी को दिए आदेश से  आशा बनी है कि आवारा पशुओं के टकराने  से होने वाली दुर्घटनाएं  कम होंगी।  

 आवारा कुत्तों से जुड़े मामले में फैसला सुनाते हुए मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट पुराने अपने पुराने आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने 11 अगस्त के पिछले आदेशों में बदलाव करने का निर्देश देने की मांग करने वाली  सभी  याचिकाओं को खारिज कर दिया । पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा, सभी राज्य हर शहर में एनिमल सेंटर बनाएं। जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा, कुत्तों के काटने की घटना लगातार जारी है और यह दिखाया है कि संबंधित अथॉरिटी की लापरवाही दिखती है। अदालत ने कहा, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों का यह दायित्व है कि लोगों के जीवन की रक्षा करें। राइट टू लाइफ की रक्षा करना राज्य और यूटी की जिम्मेदारी है। सर्वोच्च अदालत ने कहा, 'गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार सभी का अधिकार है। इसकी के तहत पब्लिक प्लेस में एक्सेस का अधिकार उनका है। बिना डर लोग कहीं जा सकें, ये उनका अधिकार है।' पीठ ने कहा, बच्चे और बुजुर्ग पर अटैक हो रहा है। कुत्तों द्वारा इंटरनेशनल ट्रैवलर को निशाना बनाया गया है। पीठ ने राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश जारी करते हुए कहा, सभी राज्य व केंद्र शासित प्रदेश एनिमल बर्थ कंट्रोल लागू करें। राज्य तमाम सुविधाओं वाले यूटी एबीसी सेंटर हर जिले में स्थापित करें। कोर्ट ने कहा, वहां स्टेरलाइजेशन और वेक्सिनेशन प्रोग्राम वहां हो पाए।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने याचिकाकर्ताओं, प्रतिवादियों, पीड़ितों, कुत्तों के पक्ष में शामिल लोग, पशु कल्याण बोर्ड और भारत सरकार की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
पीठ ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एएनएचएआई) की ओर से पेश हुए अधिवक्ता की दलीलें भ सुनी । इसमें सात नवंबर, 2025 के उस निर्देश के अनुपालन का जिक्र था। अदालत ने प्राधिकरण को राष्ट्रीय राजमार्गों से आवारा पशुओं को हटाने और सड़कों के किनारे बाड़ लगाने के निर्देश दिये थे। न्यायालय ने भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (एडब्ल्यूबीआई) को पशु आश्रय स्थलों या पशु जन्म नियंत्रण सुविधाओं के लिए अनुमति मांगने वाले गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ)के आवेदनों पर कार्रवाई करने का निर्देश दिया।पीठ ने एडब्ल्यूबीआई का पक्ष रख रहे अधिवक्ता से कहा, 'या तो आप आवेदन स्वीकार करें या अस्वीकार करें, लेकिन इसे शीघ्रता से करें।' शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी अधिवक्ता की इस दलील पर की कि सात नवंबर के आदेश के बाद, विभिन्न संगठनों से ऐसे आवेदनों में अचानक वृद्धि हुई है।
न्यायालय ने 13 जनवरी को कहा था कि वह राज्यों से कुत्ते के काटने की घटनाओं के लिए भारी हर्जाना देने को कहेगी और ऐसे मामलों के लिए कुत्तों को खाना खिलाने वालों को जवाबदेह ठहराएगी। अदालत ने पिछले पांच वर्षों से आवारा पशुओं से संबंधित मानदंडों के लागू न होने पर भी चिंता जताई। अदालत ने कई मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा, "कुत्तों के काटने का ख़तरा अब हवाई अड्डों और रिहायशी इलाक़ों समेत महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थानों तक फैल चुका है।"अदालत ने कहा कि यह समस्या "बेहद व्यापक" रूप ले चुकी है और "ऐसी घटनाओं का लगातार दोहराया जाना" निर्देशों के पालन में कमी को दर्शाता है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जो अधिकारी इन आदेशों को लागू करने में विफल रहेंगे, उनके ख़िलाफ़ अवमानना और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। फै़सला सुनाते हुए अदालत ने कहा, "गरिमा के साथ जीने के अधिकार में यह अधिकार भी शामिल है कि व्यक्ति कुत्तों के हमलों के डर के बिना स्वतंत्र रूप से जीवन जी सके। राज्य मूक दर्शन  बनकर नही रह सकता। अदालत भी उन कठोर ज़मीनी हक़ीक़तों से आँखें नहीं मूँद सकती, जहाँ बच्चे, विदेशी यात्री और बुज़ुर्ग कुत्तों के काटने की घटनाओं का शिकार हुए हैं. संविधान ऐसे समाज की कल्पना नहीं करता, जहाँ बच्चों और बुज़ुर्गों का जीवन केवल शारीरिक ताक़त या क़िस्मत के भरोसे हो।

इससे पहले नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की एक बेंच ने अपने एक आदेश में सभी राज्य सरकारों से कहा था कि वो आवारा कुत्तों और मवेशियों को हाईवे, सड़कों और एक्सप्रेस-वे से हटा दें। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था, "इसका सख़्ती से पालन करना ज़रूरी है वरना अधिकारियों को व्यक्तिगत तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा" कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह भी निर्देश दिए थे कि अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान, सार्वजनिक खेल परिसर, रेलवे स्टेशन  जैसे  सरकारी और निजी संस्थानों की पहचान कर उन्हें इस तरह घेर दें कि आवारा कुत्ते अंदर न आ सकें। कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारियों को ऐसे परिसरों से मौजूद आवारा कुत्तों को हटाकर उनकी नसबंदी करानी होगी. इसके बाद उन्हें डॉग शेल्टर में भेजना होगा। कुछ वकीलों ने आदेश पर चिंता जताई थी और कोर्ट से इसे संशोधित करने के लिए सुनवाई की मांग की. हालाँकि बेंच से इसे ख़ारिज कर दिया।

·        सुप्रीम कोर्ट  की चिंता वास्तव में उचित है, क्योंकि ंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च  के अनुसार, भारत में रेबीज के कारण हर साल लगभग 5,700 लोगों की जान जाती है | विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया भर में रेबीज से होने वाली कुल मौतों का लगभग 36 प्रतिशत  हिस्सा अकेले भारत से आता है।  नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (एनसीडीसी) और इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम  (आईडीएसपी) की रिपोर्ट में हर साल कुत्ते के काटने के मामलों में भारी वृद्धि देखी जा रही है | पिछले वर्ष के दौरान भारत में कुत्ते के काटने के 37 लाख (37,15,713) से अधिक मामले दर्ज किए गए । रेबीज एक लगभग 100 प्रतिशत  घातक बीमारी है यानी लक्षण (सिंटम्स) दीखने के बाद इसे ठीक करना लगभग असंभव है | भारत में आवारा कुत्तों की समस्या एक गंभीर मुद्दा बन चुकी है। भारत में साल 2024 में कुत्ते के काटने की 37,15,713 घटना रिपोर्ट की गई।  राजधानी दिल्ली की बात की जाए तो यहां साल 2025 में केवल जनवरी के महीने में 3,196 (प्रतिदिन लगभग 103)  कुत्ते के काटने के मामले सामने आए। 2024 में 25,210 (प्रतिदिन लगभग 69), 2023 में 17,874 (प्रतिदिन लगभग 49), 2022 में 6,691 (प्रतिदिन लगभग 18) ये वो मामले हैं जो रिपोर्ट किए गए हैं।

 कुत्ते के काटने पर दवा की चार डोज देने का प्रावधान है।   पहली डोज शून्य से एक दिन के बीच,दूसरी शून्य ये तीन दिन, तीसरी शून्य से सात दिन और और चौथी शून्य से 28 दिन के बीच दी जाती है। देखने में आया है कि सरकारी अस्पतालों में एक या दो डोज देकर ही काम निपटा दिया  जाता है। खुद इस पत्रकार के बेटे को कुत्ते के काटने पर जिला अस्पताल में  दो डोज देकर इतिश्री कर दी गई।  बाद में दो डोज बाजार से खरीदकर लगवाईं गई। अब इस तरह की चिकित्सीय  लापरवाही से कुत्ते के काटने के शिकार को रेबीज नही होगा। न्यायालय ने आदेश तो दे दिया किंतु इस आदेश के पालन को भी  सुनिश्चित करना जरूरी होगा, क्योंकि सरकारी अमला इस कान से सुनकर  दूसरे कान से निकालने का अभ्यस्त  हो   चुका है।    

 

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं)