Friday, June 19, 2026

विमान अपहर्ता को ही नहीं नकली दवा कारोबारियों क ो भी फांसी दो

 विश्व स्वास्थ्य दिवस सात अप्रेल  के लिए



हाल ही में कैबिनेट ने विमान अपहरणकर्ताओं के लिए फांसी की सजा  का प्रावधान किया है। विमान अपहरण बहुत बड़ी घटना होती है किंतु होती यदा यदा ही है। 1971 से अब तक कुल आठ विमान अपहरण  हुए हैं। 

विमान अपहरण की अंतिम घटना 1999-2000 में हुई। इंडियन एयर लांइस के विमान को काठमांडू से अपहरण करके कंं धार ले जाया गया था। इस विमान के यात्रियों को मुक्त कराने के लिए  तीन कश्मीरी  आंतकवादी छोडऩे पड़े थे। एक यात्री आंतकवादियों के हाथ मारा गया था। दस साल बीत गए इसके बाद कोई विमान अपहरण की घटना नहीं हुर्ई।  अब तक हुई आठ विमान दुर्घटनाओं में एक विमान अपहर्ताओं ने जलाया और एक यात्री की हत्या की।  

 सभी इस बात के पक्षघर है कि विमान अपहर्ताओं को फंासी की सजा  दी जाए किंतु उससे बड़ी जरूरत है नकली दवा के व्यापार करने वालों का फांसी की सजा देने की। विमान अपहरण में तो या कदा ही हम फंसते हैं नकली दवा का मकडज़ाल तो हमे रोज लील रहा है। हमारे जीवन को दुरूह और पीड़ादायक बनाने में लगा है।

2001 के आंकड़ों के अनुसार दुनिया में चल रहे नकली दवा के कारोबार में भारत में सबसे ज्यादा नकली दवा का कारोबार होता हैे। यहां 35 प्रतिशत दवाई नकली बिकती है। यहंा मिलने वाली हर पांचवी दवा नकली है।  चिकित्सकों की माने तो आज बाजार में 50 प्रतिशत के आसपास नकली दवा बिक रही है। एक अनुमान के अनुसार नकली दवा का व्यवसाय  प्रतिवर्ष 1000 करोड़ रूपये का माना जा रहा   है। 

अभी आए आंकड़ों के अनुसार परीक्षण में  उत्तर प्रदेश की 27 कंपनियों की दवांए नकली निकली। यह कंपनियां एक या दो कमरों में ही चल रही है। कई  जगह पर उनके ही मैडिकल स्टोर है। 2009 और 2010 में राज्य विश£ेषक लैब लखनऊ में हुई 127  नमूनों की जंाच में 24 दवाएं नकली और 103 निम्र स्तरीय पांई गईं। प्रदेश में की गई कार्रवाई में   44 फार्मेसियों के लाइसैंस कैंसिल किए गए। 45 के लाइसैंस सस्पैंड हुए। 65 कंपनी और होलसैलर को वार्निग दी गई। यह भी पता लगा किं ड्र्रग कंट्रोल एक्ट के अंतर्गत सरकारी अस्पतालों के लिए  खरीदी गई दवा भी नकली है।  


नकली ओर अधो मानक मिलने वाली दवाओं में एंटीबायोटिक, पेन कीलर ,बुखार उतारने वाली पेरासीटामोल और कफ सीरप आदि शामिल है। चिकित्सकों की माने तो  वह दवा नकली बन रहीं हैं जो ज्यादा बिकती है।

बिजनौर के एक चिकित्सक को एक ऐसा नकली इंजैक्शन मिला जो हार्ट  अटैक होने पर मरीज को लगाया जाता है। 

बिजनौर के ही मंडावर कस्बे में पिछले दिनों नकली दवा की बड़ी खेप पकड़ी गई। चंादपुर में नकली दवा बनाने की एक कंपनी पकड़ी ही जा चुकी हैं । एक्सपार डेट की दवा बेचे  जाने की घटनांए तो रोज प्रकाश में आती रहती हैं।ं ऐसी दवाए भी बड़ी तादाद में है जिन्हे फ्रिज में या धूप से दूर रखने के आदेश है, किंतु उनका पालन नही होता और ये दवाएं गुणवत्ता हीन हो जाती है। 

नकली दवा से होने वाली मौतों के आंकड़े तो नही मिलते किंतु दर्द से कराह रहे व्यक्ति  को  नकली दवा मिलने पर दर्द  कम न होने पर उसकी हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है। एंटाबायोटिक दवाइयां  इंफैकशन को कम  करने के लिए दी जाती है।  कई बार इंफैकशन बहुत ही गंभीर होने और जीवन मृत्यु से जूझ रहे मरीज को  नकली एंटीबायोटिक लगने पर उसकी मौत होना स्वाभाविक है।   चिकित्सक नहीं समझ पाता कि सही दवा देने पर भी मरीज की मौत क्यों हुई। उधर मरीज के परिवार जन हाथ पर हाथ रखकर रह जाते हैं।   उपचार में जरूरत अनुरूप धन खर्च करने  पर भी वे  अपने प्रिय के प्राण नही बचा पाते। 

प्रश्र यह है कि विमान अपहरण के मामले में हम फंासी का प्राविधान करते है। वह विमान अपहरण जो यदा कदा ही होते हैं। दवाई मरीज को उसकी बीमारी से लडऩे ,उसे जल्दी स्वस्थ करने ,रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने को   तथा बीमारी की पीड़ा कम करने को दी जाती है।  ये दवा ही नकली हो तो क्या हो। नकली दवा के कारोबारी आम आदमी की जिंदगी को और दूभर बनाने में लगे हैं। वे कम पैसा लगाकर जल्दी मालामाल होने के चक्कर में आम जन के जीवन को कष्ट में डाल रहे हैं। इनके लिए हम फंासी की सजा का पा्र्रविधान क्यों नही करते । प्रदेश मे नकली दवा बनाने पर 44 कंपनियो के लाइसैंस निलंबित हुए। 45 के संस्पैड हुए। प्रश्र यह है कि इनके विरूद्ध अपराधिक मामले कक्यो ंनही दर्ज  होते। रासुका मे निरूद्ध करने की कार्रवाई क्यो ंनही की जाती।

आज जरूरत इस बात की है कि हम नकली दवा के कारोबार में लगे व्यक्तियों के लिए ऐसी सजा का प्राविधान करे कि आदमी नकली दवा का कारोबार करते डरे। सउदी अरब अमीरात में शराब का व्यापार प्रतिबंधित है। इस व्यापार मे ंएक पाकिस्तानी की मौत के बाद वहां 17 भारतीयों को न्यायालय फांसी की सजा देता है। नकली दवा का व्यापार रोकने काहमे कुछ इसी तरह के प्राविधान करने होंगे। इन मामलों में ऐसी व्यवस्था करनी होगी की ,ज्यादा से ज्यादा छह माह में अपराधियों के केस का निस्तारण हों  जांए। केस के लंबे चलने से अपराधियों के हौसले बढ़ते   हैं।

नकली दवा के कारोबार के नुकसान के लिए हम जनचेतना पैदा करने का भी काम नही कर रहे। यदि हम नकली दवा के काराबारियों को यह बता देें कि हो सकता है कि इसे खाने वाला आपका कोई प्रिय जन या आप ख्ुाद हो सकतें हंैं, तो शायद वह इससे परहेज करे। अब तक तो वह सही सोच रहा है कि इन दवाइयों से उसे तो केाई नुकसान हो नही रहा है।

हाल में मिलावट करने वालों के प्रति न्यायपालिका कुछ कठोर हुई है, बिजनौर कें एक मामले मे वह आरोपियों केा अजीवन कारावास की सजा  सुना चुकी है। पर नकली दवा के प्रकरण में तो यह सजा बहुत कम है।

विश्व स्वास्थ्य दिवस पर हमे संकल्प लेना चाहिए कि  हमारा जीवन लील रही नकली दवा के कारोबार को बंद कराने के लिए हम तब तक  आवाज उठाते रहेेंगे , जब तक की सरकार  इस पर रोक लगाने के लिए कठोर कानून नही बनाती। इस व्यपार में लगे व्यक्तियों को फंासी की सजा नहीं देती।    

अशोक मधुप

04/03/2010









सोने के २० हजारी होने का सच

 




देश में कमोडिटी बाजार के  जानकार बड़े  जोर शोर से कुछ समय से दावे करने में लगे है कि सोने का मूल्य बढक़र  २० हजार तक पंहुच सकता है । यह मूल्य हाल में १९ हजार से ऊपर तक जा भी चुका है। हमारा कहना है कि सोने को २० हजारी होने से  रोकिए , आधी दुनिया अर्थात महिला जगत के सपनों को टूटने से बचाइए। उसका तो  एक बड़ा  सपना सोने के ज्यादा से ज्यादा जेवर खरीद करना ही होता है।       


कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाए,यह खाए बौराए जग ,यह पाए बौराए, वाली कहावत पुरानी पड़ गई  आज तो सोने को संग्रह करना की बात सोचना भी  एक सपना  होता जा रहा है। आधी दुनिया के जेवर पहनने की चाह एक मृग मरीचिका बनती जा रही है। हर युवती और महिला का बड़ा सपना  होता है, उसके पास ज्यादा से ज्यादा सोने के जेवर हों। सोने के जेवर महिलाओं के पहनने और सजने के लिए आदि काल से प्रयोग होते रहे हैं। प्रत्येक मां बाप की भी चाह होती है कि उसकी बेटी जब ससुराल जाए तो वह खूब सारे सोने के जेवरों से लदी हो, उसके पास जितने ज्यादा सोने के जेवर होंगे, उसे उतना ही ज्यादा सम्मान ससुराल में मिलेगा। उधर लडक़े के माता पिता भी लडक़ी के परिवार वालों  और  रिश्तेदारोंं पर रोब डालने के लिए वधु को ज्यादा से ज्यादा सोने के जेवर देना चाहतें हैं।

प्राचीन काल में बैंक आदि नहीं होते थे। हर परिवार अपने भविष्य के लिए आपदा के समय काम आने के लिए कुछ ऐसी चीजे  संग्रह करना चाहता था, जो जरूरत के समय प्रत्येक स्थान पर स्वीकार्य हो। मुद्रा का प्रचलन न होने के  कारण सोने में विनिमेश सबसे सरल और सुलभ  समझा गया। महिलाओं की  चाह सजने संवरने की होती है, उनकी चाह जेवर पहनने की रही तो हर पुरूष अपनी पत्नी को सजाकर-सवारं कर प्रसन्न रखना चाहता था। इसी कारण सोने के जेवर सबसे ज्यादा पसंद किए गए। सोने के जेवर संग्रह का एक लाभ  भी था कि चाहें कही भी रहा जाए सब जगह सोने की मांग बनी रहती थी। पहले प्राणी छोटे छोटे समूह में रहता था, भोजन एवं अन्य जरूरतों के लिए वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर आते जाते रहते थे। सोना और उसके जेवर एक ऐसी वस्तु थी कि जरूरत पर उसे कहीं भी बेच कर परिवार का भरण पोषण किया जा सकता था, बीमारी में इलाज कराया जा सकता था।  पशु खरीदे जा सकते थे। घर बनाया या खरीदा जा सकता था।

इतनी उपयोगी वस्तु को संग्रह करने की प्रत्येक व्यकित की आदि काल से लालसा बन गई।  यह  हर समय नजर के सामने रहे इसलिए इसे शरीर पर धारण करने का चलन हुआ और जेवर बने। अब तो घड़ी की चैन  तक सोने की बनती हैं।     

सोने के मंहगा होने से हर मां बाप का वह सपना चकना चूर हो रहा है कि उसकी बेटी ससुराल जाए तो सबसे ज्यादा सजसंवर कर और और पूरी तरह सोने और उससे मंहगे गहनों से लदकर । प्रत्येक युवती का चाह होती है, कि उसके पास सबसे ज्यादा जेवर हो। १९ हजार रूपये के आसपास सोने का मूल्य पंहुचने से आज महिला विशेषकर युवतियों के सोने के ज्यादा से ज्यादा जेवर पहनने के सपने  मृग मरीचिका बनते जा रहे हैं। शादी के समय मां बाप जेवर बनवा तो रहे है किंतु ओवर बजट होकर । चार सैट देने की चाह वाला परिवार किसी तरह मन मारकर एक सैट देकर ही काम चला रहा है। उधर सराफा बाजर भी सूने है। मात्र मजबूरी की ही खरीद फरोख्त हो रही है।

सोने के बढ़ते दाम देश की आधी दुनिया के सपनों पर हमला है। किंतु किसी का इस और ध्यान नहीं। आज देश की राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल  एक महिला हैं।केंद्र की सरकार की धुरी सोनिया गांधी भी महिला है किंतु ये दोनों एक  एंसे वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं, जहां धन की कमी कभी आड़े नहीं आती। उन्हें शायद यह भी पता न हो कि भारतीय महिला का सपना क्या है, आधी दुनिया की एक बड़ी अभिलाषा क्या है। 


अशोक मधुप

09/04/2010







टप्पल की टाउनशिप कैैंसिल होने से हारा तो किसान ही है

 आंदोलन भले ही जीता हो पर 



अलीगढ़ के टप्पल में चल रहा किसानों का आंदोलन प्रदेश सरकार द्वारा वहां की टाउनशिप खत्म करने की घोषणा के साथ खत्म होता। इस आंदोलन में  शामिल होने वाले नेता टाउनशिप को वापस लेने की घोषणा को किसान आंदोलन की जीत भले ही बता रहे हों, कुछ भी दावे कर रहे हों किंतु इस टाउनशिप के वापस होने से अंततः हारा किसान ही है। यहां यदि कोई  जीता है तो कुछ राजनेता और उनकी राजनीति।किसानों को  लाभ तभी था,जब यहां टाउनशिप कायम रहती और उसमें जाने वाली जमीन का उसे भरपूर मुआवजा मिलता। किसानों के यहंा आंदोलन चलाने का उद्देश्य भी  यही था कि टाउनशिप बने और उन्हें बढ़िया मुआवजा मिले।टाउनशिप कैंसिल होने से यहंा के किसानों केा ही  सबसे जयादा नुकसान हुआ है, क्यांेकि उसकी जमीन के अब न इतने अच्छे  रेट मिलेंगे, नही उनके गंाव का विकास होगा। दूसरा

 उद्योगपति भी अब यहां कल कारखाना लगाते टाउनशिप बनाते हिचकेगा।     

टाउनशिप खत्म होने की घोषणा पर टप्पल के किसान दो भागों में बंट गए हैं। एक वह जो नही चाहते कि यहां टाउनशिप बने; दूसरे वे किसान जो  मांग कर रहे है कि टाउनशिप वापस हो। उनका कहना  है कि इस टाउनशिप के कैंसिल होने से सबसे ज्यादा टप्पल के किसानों का नुकसान हुआ है। यहां टाउनशिप बनती तो सबसे ज्यादा लाभ टप्पल को ही मिलता। ऐसा यहां ही नहीं हुआ, पश्चिमी बंगाल के सिंगनूर में भी उस समय हुआ था, जब रतन आटा ने अपना नैनो  बनाने का कानखाना    सिंगनूर से हटाकर कहीं  दूसरी जगह ले जाने की घोषणा की थी। सिंगनूर के किसान पहले अंादेालन करते रहे । वे कहते रहे कि वे नैनों के प्रस्तावित कारखाने को अपनी जमीन नही देंगे, किंतु कारखाना के प्रोजेक्ट निरस्त होने पर उन्हें धक्का लगा। उन्होंने इसे सिंगनूर में ही बनाने के लिए  प्रदर्शन किए। किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी।सिंगनूर हो या टप्पल,या दादरी किसानों का लाभ इसमें हैं कि यहां उद्योग लगे , टाउनशिप बने। किसान चाहते भी यहंीं हैं। आंदोलन के माध्यम से वह सरकार या उद्योग लगाने वाली कंपनी पर ज्यादा मुआवजे, जमीन देने वाले परिवार के एक सदस्य को लगने वाले  उद्योग में नौकरी की डिमांड आदि करते है। आंदोलन के माध्यम से सरकार  या 

उद्योग लगाने वाली कंपनी पर  दवाब देकर काफी मांगों को मनवा लेते भी हैं। यही होना भी चाहिए। उद्योगपति का प्रोजेक्ट स्थगित करने  पर उसका ज्यादा कुछ नही बिगड़ता। रतन टाटा  सिंगनूर से प्राजेक्ट वापस लेने की  घोषणा बाद में करते हैं, गुजरात के मुख्यम़त्री का पहले आफर आ जाता है कि उनके राज्य में आकर उद्योग लगा लें।     

दरअस्त प्रत्येक प्रदेश की तरह, क्षेत्र की तरक्की के लिए आवश्यक है कि वहां ज्यादा से ज्यादा उद्योग लगें, उद्योगों से विस्तार के साथ ही क्षेत्र के विकास के बड़े रास्ते खुलतें हैं। पिछले दिनों मुझे बजाज चीनी मिल के बिलाई प्लांट में  एक कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला। मै  इसी क्षे़त्र का रहने  वाला हूं। मै यह  देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि कार्यकम्र मेें लगा लाउउस्पीकर दस किलो मीटर दूर बसे कस्बे झालू के एक दुकानदार का है  और खाना बनाने वाले कारीगर भी झालू के हैं, फोटोग्राफर दूसरे छह किलोमीटर दूर के  नगर हल्दौर  के हैं। उद्योग जहां लगता है, वहा के रहने वालों को जमाीन के मुआवजे और नौकरी आदि के माध्यम से प्रत्यक्ष लाभ मिलता है। उद्योग लगाने वाले  लेबर  भी वही की लेतें हैं, क्योंकि उन्हे वह सस्ती पड़ती हैं।

 इसके अलावा सामान लाने ले जाने के लिए वाहन लोकल लिए जाते हैं। उद्योग के  कर्मचारी खरीदारी के लिए स्थानीय बाजार पर ही निर्भर रहते हैं। दूध, फल, सब्जी अनाज सब स्थानीय बाजार से ही खरीदा जाता है।उद्योेग लगते हैं तो वाहनों के आने जाने के लिए सड़के भी बनती है,। उद्योग में कार्यरत स्टाफ के बच्चों के लिए स्कूल-कालेज भी ख्ुालतें है।, एक तरह से क्षेत्र का चहंुमुखी विकास होता है। उद्योग के कैंसिल होन से क्षे़त्र का विकास 50-60 साल पीछे चला जाता है। 

आंदोलन जब प्रारंभ होता है तो उसके चलाने वालों का सोच दूसरा होता है किंतु जैसे जैेस वह गति पकड़ता है, वैसे ही वैसे उसमें अन्य व्यक्ति भी आकर जुड़ते जाते हैं और एक तरह से आंदोलन अतिवादियों के हाथों में चला जाता है। इनका कार्य अपनी राजनीति चमकाना भर होता है, आंदोलनकारियों की लाभ हानि से नहीं।कुछ नेता आकर यहां अपनी राजनीति करने लगते हैं;। टिप्पल के आंदोलन में भी ऐसा ही हुआ। आंदेालन श्ुारू हुआ। तब नेतृत्व वहां के किसानों  के  हाथ में था और बढ़ा तो सभी राजनैतिक दल इस आंदांेलन की आग में  अपनी रोटी सेकने कूद पड़े। कांगे्रस से राहुल गंाधी आंदोलन मे कूदे तो भाजपा के राजनाथ ंिसह ने अंादोलन स्थल पर ही जाकर डेरा डाल लिया।राजोद के अजित सिंह और भाकियू के महेंद्र सिंह टिकैत पहले ही इस आंदोलन में शामिल हो चुके थे। सपा ने भी अंादोलन को समर्थन दिया। हालत तो यहां तक पंहुची कि रालोद की संसंद घेरने की घोषणा का स्वयं बसपा ने भी समर्थन कर दिया।

इस आंदेालन से सब दल एक मंच पर दिखाई  दिए,प्रश्न यह है कि केंद्र में बैठी कांग्रेस और प्रदेश की बसपा सरकार जब किसानों की मांगों केा सही मान रहीं थी, तो मांगों को पूरा क्यो ंनही किया गया; किसान नोयडा के बराबर मुआवजे की मांग कर रहे थे, ये दल चाहते तो किसानों को नोयडा से भी दस-बीस- सौ गुुना जयादा मुआवजा दे सकते थे,क्योंकि करना तो उन्हें ही था। सच्चाई यह है कि ये दल हो या अन्या किसी केा किसानों के हित की ंिचता नहीं थी, उनका कार्य इस आंदोलन के माध्यम से  राजनीति करना था, और वह उसे करने मे कामयाब रहे।       

  ंकिसानों को यह समझना होगा कि कल कारखाने, बिजलीघर , हवाई  अड्डे जमीन पर ही बनते है, आकाश में नहीं । जमीन पर कारखाने बिजलीघर हवाई अड्डे  बनेंगे ता उनके लिए जमीन भी  अधिगृहित होंगी, इसके लिए वे अच्छे मुआवजे आदि की बात करें और अन्य सुविधा चाहे, किंतु ऐसा न करे कि बात टूटे और उद्योग लगाने वालो को दूसरी जगह ंउद्योग लगाने को बाध्य होना पडे़। ंिसंगनूर से नैनो कारखाना हटा तो गुजरात में चला गया। व्यापारी को उद्योग लगाना हैं वह एक जगह नही दूसरी जगह लगा लेगा किंतु जिस प्रस्तावित जगह से उद्योग जाएगा ,उसके विकास का रास्ता तो अवरूद्ध होगा ही।   


अशोक मधुप 

09/05/2010

  ं  

अच्छे दिन आ गए, चोर हुए ईमानदार

 


देश में अच्छे दिन वास्तव में आ गए। मोदी सरकार का कार्यकाल शुरू होने के बाद कोई न सुधरा हो पर चोर जरूर सुधर गए। परिवर्तन की बयाबिहार से आ रही है। यहां के नेता पशुओं का चारा तक खाने के लिए मशहूर रहे हैं। यहां के नेता तो अभी नहीं सुधरे पर लगाता है कि चोर सुधर गए। वे सच बोलन लगे । सांसद गिरी राज के पटना आवास से चोरी हुई। उन्होंने रिपोर्ट पचास हजार रुपये मात्र की चोरी की लिखाई। पुलिस ने चोरों को गिरफ्तार किया । सांसद 50 हजार की चोरी की बात कर रहे थे। पुलिस को चोरों से दो करोड़ के आसपास रुपया और माल मिला। किसी व्यापारी का या अन्य का मौका होता तो पुलिस उतनी ही रकम दिखाती, जितनी चोरी की बताई गई है ।रिपोर्ट में ?लिखाई गई  है। बाकी सब आपस में बंदरबाट कर लेती। भाजपा सांसद का मामला था। सो उसने पूरी बरामद रकम दिखा दी। अब सांसद जी कह रहे हैं कि मेरी रकम तो 38 हजार ही थी। बाकी रकम उनके रिश्तेदार की थी। भाई यह बात तो चोरी की रिपोर्ट के समय भी कही जा सकती थी। बताया जा सकता था कि चोरी दो करोड़ रुपये के आसपास की है।


अब ऐसा ही मामला लालू यादव के साले साधु यादव का रहा। उनके आवास से भी चोरी हुई। चोरी में कितना रुपया और माल गया । वह चोरी के 36 दिन बाद तक भी वे नही बता सके। किंतु चोर जरूर सत्यवादी निकले। उन्होंने कबूला कि उन्होंने चोरी में 80 लाख रुपये ही नहीं चुराए।करोडों के जेवरात बरामद किए।अब नेता जी कह रहे है कि ये माल उनके एक रिश्तेदार का है।


राजनीति भी क्या चीज है। नेेता किसी भी दल का हो , उसके यहां से चोरी जाने वाला माल रिश्तेदार का ही होता है। रिश्तेदार है कि नेता जी घर को ज्यादा सुरक्षित समझ अपना माल नेता जी को सौप देते हैं। उनके घर रख देतें हैं।ये नेता जी की ईमानदारी की बात है कि वे देखना पसंद नही करतें कि रिश्तेदार क्या माल रख गए है ।कितना कीमती माल उनके घर में छोड़ गए हैं।


दिल्ली पुलिस को बिहार पुलिस से सीख लेकर मंत्री जी के चोरी गए दोनों कटहल को खोजने में तेजी दिखनी चाहिए। हो सकता है कि मंत्री जी को पता न हो और उनसे रिश्तेदार कटहल के कवर में छिपाकर अपने करोडों के हीरे जवाहरात उनके यहां पेड़ पर टांग गए हो। हो सकता है कि मंत्री जी को इन बिहार के नेताओं की तरह पता न हो कि क्या गया है?

सरकार को एक काम और करना चाहिए कि बिहार पुलिस के अधिकारी बुलाकर उनसे उत्तर प्रदेश के मंत्री के भैंस चोरी प्रकरण की जांच गंभीरता करानी चाहिए। हो सकता है कि मंत्री जी की भैंस चोरी न गई हों। उनके रिश्तेदार जो माल रख गए हों , उसे वे मंत्री जो को भैंस बता गए हों। जबकि गया कुछ और ही हो।


अशोक मधुप


22/07/2014





छोटे शहरों को बचाइए हुजूर



सरकार हो  या न्यायपालिका ,नेता हो या राजनेता सबका ध्यान महानगरों  में सुविधा उपलब्ध कराने या उनका विकास कराने पर ज्यादा है। सारी योजनांए शहरों के लिए बन रही हैं।  न्याय पालिका का भी ध्यान उधर ही है। यह वहां शुद्ध जल की उपलब्धता और यातायात को सुचारू बनाने के लिए आदेश पारित कर रही है। तो बड़े शहरों के बढ़ते प्रदूषण को रोकने पर भी उसकी नजर है।ं इसके लिए भी नए नए आदेश  निर्देश दिए जा रहे है। कितुं छोटे शहरों की ओर किसी का ध्यान नही, जहां भारत की अधिकांश आबादी रहती है। देश की आत्मा बसती है।  

   शहरों को बचाने की मुहीम में हम छोटे शहरों को बिसरा बैठे हैं ओर हो सकता है कि जब तक देख के रहनुमाओं की नजर यहां पड़े तब तक हम बहुत  कुछ खो चुके हों। 

देहात अर्थात छोटे शहर एक सवा लाख तक की आबादी के नगर कभी शुद्ध पानी और शुद्ध हवा के लिए प्रसिद्ध थे। पानी तो नगर पालिकाओं की पेयजल आपूर्ति के कारण कभी का खराब हो गया। पेयजल के नमूने चाहें जिलाधिकारी आवास से लिए जाए या कहीं और किसी महत्वपूर्ण स्थानोंं से,वहां के पानी में भी क्लोरीन की मात्रा नहीं मिलती। काफी भवनों और अस्पतालों के गंदे पानी को  बोर करके जमीन में डाला जा रहा है। इससे जलस्त्रोत के प्रदूषित होने का खतरा बढ़ रहा है। मजबूरन शुद्ध पेयजल के लिए इन छोटे शहरों मे भी अब वाटर प्योरिफायर का चलन चल निकला है। अब तक यहां की  आक्सीजन किसी तरह से शुद्ध थी, सो अब उसे भी लगता है किसी की नजर लग गई है।

छोटे शहरों के रहनुमाओं की ख्ुादगर्जी के कारण यहां के कूड़ा  डालने के स्थान खत्म हो गया। भौतिकवादिता में कूड़ा घटा नहीं बढ़ता  जा रहा है। समस्या यह पैदा हो रही है कि यह जाए कहां। कूड़े की जमीन पर भवन बनाते समय यहां के रहनुमाओं ने यह ध्यान नहीं दिया कि कचरे को डाला कहां जाएगा। पालिकाओं केा कूड़ा साफ कराना है,  तो वह गली मुहल्ले से तो  उठ  रहा है, किंतु जा रहा है शहर के लावारिस स्थानों पर। मुहल्लों और बस्तियों में पड़े खाली प्लाट कूड़ाघर बन गए है। पूरे मुहल्ले का कूड़ा इन लावारिस स्थानों पर लाकर डाल दिया जाता है। कहीं जगह न मिलने पर इन्हें सड़कों के किनारे डाला जा रहा है। पालिकाओं के अध्यक्षों ने नगरों  के सभी संपर्र्क मार्गो पर   बड़े बड़े प्रवेश  द्वारा बनवाए है। इन पर उनकी ओर से लिखाया गया है कि  नगर में  आने पर आपका स्वागत है। आप और हम सोचतें कि शायद स्वागत ऐसी ही होगा  जैसे कर्ई बार फ्लाइट से उतर  एयरपोर्ट से निकलकर बाहर आते समय कुछ होटल वाले एक फूल और अपने  होटल का कार्ड पकड़ा देतें हैं।

 इन स्वागत द्वारों पर आकर इस तरह का कुछ नहीं मिलता। इनमें  प्रवेश से काफी पहले से ही सड़क किनारे पड़े कूड़े कचरे के ढ़ेर और उनसे निकलती बदबू हमारा स्वागत करती है। इन नगरों मेंं प्रवेश के   बहुुत पहले से  कूड़े की गंध हमे बैचेन कर देती है नाक बंद करने के लिए।  यहां आकर सब  नाक पर  कपड़ा  रखने के लिए मजबूर हो जाते हैं । काफी तो बदबू से  परेशान हो अपने  वाहनों  के शीशें बंद कर लेते हैं। और ऐसे स्वागत करने वालों को मोटी गाली दिए बिना नही रहते।

मै लगभग एक लाख की आबादी वाले छोटे शहर मेंं रहता  हॅंू। अब से कुछ साल पहले तक नगर के सभी रास्तों पर सबेरे  के समय घूमने वाले मिल जाते थे। वे मस्ती से घूमते प्रकृति की शुद्ध वायु का आनंद लेते थे किंतु अब ऐसा नहीं होता। एक ऐसा रास्ता भी अब   नहीं मिलता  जिसपर  घूमने निकला जाए और कूड़ें के ढेर न दिखाई दें, उनकी बदबू न आए।  सब रास्तों पर सड़ते कूड़े की गंध नाक पर कपड़ा रखने को मजबूर कर देती है। कई बार यहां क ूड़ा डालने पर सफाई कर्मियों से झगड़े भी होते है किंतु वे भी क्या करे। अपने इलाके की सफाई की जिम्मेदारी उनकी है। कूड़ा नहीं उठांएगे तो इलाके वाले उल्टा सीधा कहेंगे। पालिकाधिकारियों की डाट और झेलनी होगी। ऐसे में  कूड़ा उन्हें कहीं तो ले जाकर डालना ही है। कहीं नहीं डाल पाते तो शहर के आसपास के खाली स्थान तालाब तक में यह कूड़ा डाल देते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश है कि पट चुके तालाब खोले जांए किंतु यहा कूड़ा निस्तारण के तालाब की भूमि को प्रयोग किया जा रहा हैँ। इससे भी ज्यादा सुलभ है शहर के बाहर सड़कों के किनारे की जगह। जहां मौका मिला, कूड़ा डालिए और चलते बनिए कोई पूछने वाला नही है।       मेरे जैसे छोटे शहर की वायु अब से कुछ साल पहले तक बहुत ही शुद्ध होती थी किंतु अब वह लगातार प्रदूषित होती जा रही है। देश ऐसे छोटे शहरों से भरा पड़ा है। उसकी बड़ी आबादी यहंी रहती है। अब महानगरों का प्रदूषण यहां भी घर करता जा रहा है। मेरी ङ्क्षचता इन्हीं छोटे शहरों को लेकर है। अभी से इन्हें बचाने की कवायद करने की जरूरत हैे।  महानगरों के लिए  बड़े बड़े बजट आ रहे है। सरकार और सत्ताधारियों का ध्यान उन्हीं नगरों की और है। छोटे शहरों की और नहीं।

हमें छोटेे शहरों के कूड़े कचरे के निस्तारण और उसके लिए  अभी से योजना बनानी होंगी। बड़े  शहरों के कूड़े से हम कहीं खाद बना रहे हैं तों कहीं बिजली। कहंीं वह कालोनियों के भराव के लिए प्रयोग हो रहा है। प्रदेश सरकार का कुछ समय पहले आदेश आया था कि छोटे तीन चार शहरों के बीच कोई जगह लेकर वहां कूड़ा डंप किया जाए किंंतु इस पर आज तक काम नहीं हुआ। दूसरे पालिकाओं के कूड़े के वाहनों को इन डंप तक ले जाने में तेल ज्यादा लगेगा। अभी ही छोटे शहरों की पालिकाएं आर्थिक समस्या से जूझ रही हैं।  जो भी हो हमे इन छोटे शहरों को बचाने ,उनकी प्राण वायु को शुद्ध रखने के  लिए जल्दी ही कुछ करना होगा। देश मे बहुत सारी एजीओ काम कर रही है। काश वे अपना कार्य क्षेत्र छोटे नगरों तक बना पातीं।  


अशोक मधुप

21/07/2010



आतंकवाद रोकने को प्राईवेट सिक्यूरिटी मजबूत कीजिए

 



26/11 के हमलों से नहीं लिया हमने सबक

मुंबई के 26 नंवबर हमले के मुख्य आरोपी अजमल अमीर कसाब इस प्रकरण के लिए दोषी करार दे दिया गया।  न्यायालय ने इसके लिए फांसी की सजा सुनाई हैं।

26 नंवबर 2008 को दस आंतकवादियों ने आंतक फैलाने के लिए मुंबई पर धावा बोला था।ताज ,ओबराय,नरीमन होटल में टिके यात्री और मंुबइ सैंटल रेलवे स्टेषन  और कामा अस्पताल को इंन्होने निषाना बनाया। इन्होंने एके 47 जैसे आधुनिक हथियारों से होटल और प्लेट फार्म के यात्रियों पर फायरिंग ही नही की अपितु बम भी फेंके। इन पर काबू पाने मे सुरक्षा बल औंर कमांडो को 60 घंटें से ज्यादा लगे।ं  इस हमले में 167 व्यक्ति मारे गए और 293 घायल हुए। पूरी दुनिया में गूंजने वाले इस हादसे को बीते हमे डेढ साल से ज्यादा हो गया किंतु हमने इससे कोई सीख नही ली। इस घटना में मारे गए परिवारों और घायलों की पीड़ा पर मरहम लगाने के लिए कार्य नहीं किये गए ।हम इस तरह के हादसे रोकने के लिए व्यापक तैयारी कर उन्हें यह आष्वस्त कर सकते थे कि भविष्य में हम ऐसा न होने देंगे। आतकवादियों की गोली अब किसी भारतीय को नही छू पाएगी।हम पूरी दुनिया और अपने नागरिकों को यह संदेष देने में नाकामयाब रहे कि हम अपनी अस्मिता और सीमाओं की ओर किसी दुष्मन को नजर उठाने नही देंगे। नागरिको के जीवन से खिलवाड़ करने वालों का किसी कीमत पर माफ नही किया जाएगा। ं

 इस हमला होेने के डेढ़ साल से ज्यादा बीत जाने के बाद भी हमने ऐसी कोई तैयारी नही की भविष्य में ऐसे हमले न हो। इनसे बचने या ऐसा अवसर आ जाने पर की जाने वाली कार्रवाई  और ली जाने वाली सतर्कता के प्रति अपने सुरक्षा बल और जनता को प्रषिक्षित करने का काम नही किया।

 आतंकवाद का निषाना कोई विषेष स्थान नहीं होता। वह कभी अक्षरधाम मंदिर को अपना निषाना बनाता है, तो कभी ंसंसद में आकर संासद और मंत्रियो को मारने का प्रयास करता हैं। अयोध्या  में रामभूमि में घंुसकर वह  देष की अस्मिता को चुनौती देता है तो उत्तर प्रदेष के रामपुर के सीआरपीएफ कैंप के घंुसंकर हमारे सुरक्षा बलो को भी निषाना बनाए  बिना रही रहता। कभी दिल्ली बंगलौरू, हैदराबाद आदि के भीड़ भरे बाजार उसका निश्षाना  बनते रहे  हैं। तो समझौता एक्सप्रेस के या़ित्रयों  को भी षिकार बनाया जाता है। अंातकवाद कब, कहा मुंह फैलाकर आकर खड़ा हो जाए नही कहा जा सकता। अंातकवादी कहीं भी आकर लोगांे को अपना षिकार बना सकतें है। मॉल, सिनंेमाघर भी उसके निषाने पर आते रहे हैं। मंुबई में अस्पताल के घायलों और उनके तीमारदारों को भी मारा गया। आंतकवाद का काम समाज में आतंक फैलाना है,दुनिया की घटनांए गवाह है कि आंतकवादियों ने स्कूूली बच्चों और सृकूलों तक में घंुसकर वारदात की है।

भारत जैसे बड़े देष में सब जगह सुरक्षा बल तैनात करना संभव नही। हर दरवाजे पर जवान तैनात नहीं किया जा सकता। हमारे महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए हमारे पास केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल है। इससे 1,04,462 जंवान देष के, परमाणु और बिजली संय़त्र,अंतरिक्ष,टकसाल, रिफाइनरी आदि 269 महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा कर  रहे  हैं।   ं         

माल,होटल,प्राइवेट फैक्ट्री,दूरभाष केंद्र ,अस्पताल , बडे़ ओ़द्योगिक कोप्लैस ,आवासीय कालोनी ं आदि की सुरक्षा तो आजकल उद्योग प्रंबधन प्राइवेट सिक्योरिटी से ही कराता है। ताज होटल हो या होटल ओवराय प्रायः सभी में सुरक्षा के लिए प्राइवेट सिक्यूरिटी ही लगी है।ं अस्पतालों आदि की सुरक्षा भी प्राइवेट सिक्यूरिटी के पास है। इसके  कर्मचारी सिर्फ छोटेे से बेत नुमा डंडे के सहारे हमारी सुरक्षा कर रहे है।


देश्ष की जानी मानी सिक्यूरिटी कंपनी ओम सिक्यूरिटी के एमडी ओम कुमार बताते है कि आज देेष भर में प्राइवेट सिक्यूरिटी के तैनात कर्मचारियों की संख्या 50 लाख से ज्यादा है। इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।प्राइवेट सिक्यूरिटी में आज प्रतिवर्ष दस लाख नए अवसर पैदा हो रहे हैं। 

आंतकवादी जहां एके 47 जैसे आधुनिक ष्षस्त्र लेकर हमला करने आ रहे हैं, वही प्राइवेट सिक्यूरिटी कंपनी के तैैनात  कर्मचारियों में  90 से 95 खाली हाथ ही होते  हैं। प्राइवेट सिक्यूरिटी में  पाच सें दस प्रतिषत के पास ही ष्षस्त्र हैं। ष्षस़्त्र वाले सुरक्षा कर्मचारियों में से 90 से 95 प्रतिषत के पास इकनाली या दूनाली बंदूके हैं,   बाकी कुछेक के पास 315 बोर की राइफल। इन राइफल को हर बार फायर करने के लिए लोड़ करना पड़ता है।एके 47 और एके 56 जैसे आधुनिक हथियार के सामने एक सिक्योरिटी कोई मायने नहीं रखती । सब जगह जवान लगाए नहीं जा सकते, ऐसे में हमे प्राइवेट सिकयूरिटी पर ही निर्भरता बढ़ानी  पड़ रही है।   

आज जहंा प्राइवेट सिक्यूरिटी पर विष्वास बढ़ रहा है, वहीं जरूरी यह होता जा रहा है कि इसं प्राइवेट बल को मजबूत ही नहीं किया जाए अपितु आधुनिक ष्षस्त्रों के साथ आंतकवादी हमलों से निपटने का प्रषिक्षण भी  दिलाया जाए। हाल में उत्तर प्रदेष सरकार ने  प्रदेष में कार्यरत 300 प्राइवेट सिकयूरिटी कंपनी के सवा लाख से ज्यादा स्टाफ को आंतकवाद से निपटने के लिए आधुनिक प्रषिक्षण देने का निर्णय लिया है। ओम कुमार कहते हैं कि सरकार  को देष की प्राइवेट सिक्यूरिटी केा आंतकवाद से निपटने का प्रषिक्षण देना ही पर्याप्त नही र्है, उसे अत्याधुनिक ष्षस्त्रों से भी लैस करना होगा।   

वे कहते है कि ष्षस़़्त्रों के लाइसैंस जिलाधिकारी देते है। उनकी रूचि इस कार्य में नही होती। यह कार्य रक्षा मं़त्रालय में कोई प्रकोष्ठ बनाकर सुकयोरिटी कंपनियों के स्टाफ यां कंपनी को प्राथमिकता के आधार पर  दिया जाना चाहिए। आज भी बैंक या बडे़ प्रतिष्ठानो ष्षस्त्रों के ं लाइसैंस दिए जाते हैं,उनमे तैनात कर्मचारियों का नहीं।वर्तमान हालात मे एके 47 जैसे ष्षस्त्रों के लांइसैस प्राइवेट सिक्यूरिटी कंपनी को देने होंगें। यह सुरक्षा देने वाला बहुुत बड़ा बल है, मंबई जैसी 26 नवबर की घटनांए रोकने के लिए इस प्राइवेट सिक्यूरिटी  बल को  आंतकवादी हमलों से निपटने के लिए सक्षम बनाना होगा।  


अशोक मधुप

26/07/2010



बाघ को बचाने को वनों की घास को भी बचाना होगा

 बाघ को बचाने को वनों की घास को भी बचाना होगा 

पूरी दुनिया में भारतीय बाघों को बचाने की कवायद हो रही है। सबका ध्य्ाान बाघ की और है,किसी का ध्य्ाान वन की घास की और नहीं हैै। आज भारत के वनों में सबसे ज्य्ाादा खतरा वहंा की घास और पौधों को है, यदि वे न रहे तो बाघ भी नहीं रहेगा। 

प्रकृति एक चक्र में बंधी है। सब एक दूसरे से जुड़े हैं। शाकाहारी और मंासाहारी प्राणी अलग है, किंतु उनमें एक केे बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं । बाघ, चीते, गुलदार, लकड़श्ग्गे सब मंासाहारी प््रााणी है। हिरन, नील गाय,खरगोश, लोमड़ी, आदि शाकाहारी प््रााणी हैं। दोनों अलग अलग है किंतु दोनों केे बिना एक दूसरे का अस्तित्व नहीं है। वन के शाकाहारी प््रााणी घास ,पेड़ ,

पौधों को खाकर जीवित रहते हैंे। मंासाहारी पशु शेर आदि का भोजन ये शाकाहारी वन्य्ा प््रााणी नील गाय, हिरन आदि हैं। यदि वन में शाकाहारी प््रााणी न हो तो मंासाहारी प््रााणियों का जिंदा रहना असंश्व है। मंासाहारी प््रााणी मंास ही खंाएगे घास पेड़ पौध्ेा नहीं। 

आज सबसे ज्य्ाादा खतरा शाकाहारी प््रााणी नीलगाय हिरन आदि के भोजन घास को है। वनों में उग आई अमेरिकन प्र्रजाति की झाड़ी लैंटिना कैमेरा इस घास को तेजी से खत्म करती जा रही है । यह पिछले कुछ साल में वनों में बड़ी तेजी से साथ बढ़ी है। आज हालत यह है कि यह झाड़ी वन की 25 से 30प्रतिशत घंास को खत्म कर चुकी है और अन्य्ा घास पेड़ पौधों को अपनी चपेट में लेती जा रही है। इस झाड़ी की हालत यह है कि यह जहंा उग आती है इसे आसपास के पेड़ पौधे और घास पूरी तरह खत्म हो जातेे हैं। सूखा गर्मी भी इसका कुछ नही बिगाड़ पाती। गर्मी में यह पूरी तरह सूख जाती है किंतु जरा सा पानी मिलते ही यह फिर हरी श्री हो जाती है। बीस साल बाद भी यह हरी हो सकती है। वन 

अधिकारी इस झाड़ी के बढ़ाव को लेकर चिंतित हैं, उनकी समझ में इसका कोई उपाय नहीं आ रहा। यह झाड़ी बेंत की तरह होती है। कुछ जगह इसे पौधों से बेंत के फर्नीचर की भंाति फर्नीचर बनाया गया किंतु इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। रक्त बीज की तरह इसका पौधा दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है। 

बफर जोन , सफारी जोन से तो घास निकाली जा सकती है किंतु कोर जोन में तो बाहरी व्य्ाक्ति का प्रवेेश पूरी तरह प्रतिबंधित है। यहंा किसी चीज से बिलकुल छेड़छाड़ नही हो सकती। ऐसे में लेंटिना को रोकना संश्व नहीं है। आज वन्य्ा प््रााणियों के शहर की और आने वन क्षेत्र में रहने वालों पर हमले करने की घटनाओं के पीछे का मन्तव्य्ा यही है कि उन्हें सरलता से भोजन नहीं मिल रहा। उन्हें अब पेट श्रने के लिए आबादी की और आना पड़ रहा है। 

लेंटिना का आंतक अभी से प्रभाव दिखाने लगा है। आगे इससे और हालात खराब ही होंगे। ऐसे में बाघ संरक्षण की उसे बचाने े चिंतन और कवायद के बीच हमें वन के शाकाहारी प््रााणियों का भोजन घास को बचाने के उपाय और लैंटिना को खतृम करने पर भी ध्य्ाान देना होगा। 

 

अशोक मधुप 


04/01/2011