अशोक मधुप
देश की आधी आबादी यानी महिलाओं को 33 फीसदी राजनीतिक आरक्षण देने वाला
ऐतिहासिक बिल लोकसभा में भले ही गिर गया हो किंतु भाजपा को जो लाभ मिलना था, वह मिल या।
इस बिल के माध्यम से वह यह संदेश देने में कामयाब रही कि हम तो महिलाओं को
संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण देना चाहते है, कितु विपक्ष नही चाहता।
विपक्ष भी इस बिल के गिरने को अपनी विजय मानता है। इस बिल के गिरने से भाजपा को लाभ मिले या
विपक्ष को किंतु सबसे बड़ा लाभ देश को हुआ
है। इस बिल के पास होने से बढ़ने वाली लोकसभा और विधान सभा सीट के
सांसदों के वेतन और भत्तों का खर्च बच गया। नए सांसदों और विधायकों की पेंशन की राशि का बोझ अब देश को नही उठाना
पड़ेगा।
मोदी सरकार ने लोकसभा और विधानसभाओं में वर्तमान सीटों की संख्या
एकमुश्त बढ़ाकर डेढ़ गुना करने का जो प्रस्ताव इस बिल में किया था, उसका लाभ कुल मिलाकर 2250 सीटों का
होता। लोकसभा में वर्तमान 545 सीटों के हिसाब से
की महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण के हिसाब से 205 सीटें बढ़तीं, जबकि सभी 28 राज्यों और दो केन्द्र शासित प्रदेशों
की विधानसभाओं में 2045 सीटों का इजाफा होता। यानी 70 करोड़ महिलाओं में से मात्र 2250 महिलाएं चुनकर
विधानमंडलों में पहुंचतीं। इसमें राज्यसभा और विधानपरिषदों की सीटें शामिल नहीं हैं, क्योंकि उनकी संख्या बाद में तय होगी।
तर्क दिया जा सकता है कि इस आरक्षण को महिलाओं की संख्या की बजाए उनके
राजनीतिक-सामाजिक सशक्तिकरण,
लैंगिक समता और राजनीतिक नैतिकता की पवित्र मंशा के आईने में देखा
जाना चाहिए। सही है। लेकिन अगर बिल पास हो जाता। सासंदों और विधायकों के क्षेत्र और सीट बढ़ जाती तो वढ़े सासदों , विधायकों के वेतन,
भत्ते, सुविधाओं और पेंशन का बोझ तो देश पर ही पड़ता।
12 साल के कार्यकाल में यह पहला अवसर था, जब मोदी सरकार की संसद में विधायी हार हुई। संसदीय इतिहास में 1990 में पंचायत
सशक्तिकरण संशोधन बिल के राज्यसभा में गिरने के बाद यह पहला बिल है, जो लोकसभा में ही ढ़ह गया। वैसे मोदी सरकार चाहती तो यह अत्यंत
महत्वपूर्ण बिल अपने दूसरे कार्यकाल में ला सकती थी, जब एनडीए के अपने 353 सांसद थे और कोई भी
संशाधन बिल आसानी से पारित हो सकता था। लेकिन उसने तब ऐसा नहीं किया।
भारतीय राजव्यवस्था में पिछले कुछ वर्षों से वित्तीय प्रबंधन और
संसाधनों के आवंटन को लेकर एक व्यापक बहस छिड़ी हुई है। एक तरफ सरकार राजकोषीय
घाटे को कम करने और अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के नाम पर पुरानी पेंशन योजनाओं
और सैन्य भर्ती की पारंपरिक प्रक्रियाओं में आमूलचूल परिवर्तन कर रही है, वहीं दूसरी ओर लोकतांत्रिक
प्रतिनिधित्व के विस्तार के नाम पर विधायी निकायों के आकार को बढ़ाने की योजनाएं
भी चर्चा के केंद्र में हैं। इन निर्णयों का भारतीय अर्थव्यवस्था और आम नागरिक के
जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सरकार के इन कदमों के पीछे तर्क दिया जाता है कि
आधुनिक समय की चुनौतियों से निपटने के लिए संसाधनों का कुशल उपयोग अनिवार्य है, लेकिन जब बात सांसदों और
जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं की आती है, तो जनता के बीच विरोधाभास की स्थिति
उत्पन्न हो जाती है।
पेंशन के मुद्दे पर
सरकारी कर्मचारियों में व्यापक असंतोष देखा जा रहा है। केंद्र सरकार ने वित्तीय
बोझ को कम करने के लिए लंबे समय से पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) के स्थान पर नई पेंशन योजना (एनपीएस) को प्राथमिकता दी है। हालिया वर्षों
में महंगाई भत्ते (डीए) और महंगाई राहत (डीआर) में वृद्धि तो की गई है, जैसे कि 2026 के शुरुआती आंकड़ों के
अनुसार इसे 60 प्रतिशत तक पहुँचाया गया फिर भी यह वृद्धि कर्मचारियों की उन मांगों को शांत करने में विफल रही है।
वे तो सेवानिवृत्ति के बाद एक सुनिश्चित
आय की गारंटी चाहते हैं। सरकार का तर्क है कि पेंशन पर होने वाला खर्च भविष्य में
विकास कार्यों के लिए उपलब्ध बजट को कम कर सकता है, इसलिए निवेश-आधारित पेंशन प्रणाली
अधिक व्यावहारिक है। हालांकि,
सरकारी कर्मचारी इसे अपनी सामाजिक सुरक्षा में कटौती के रूप में
देखते हैं, जिससे उनके भविष्य की स्थिरता पर सवालिया निशान लग जाते हैं। अर्थशास्त्री
दावा करते हैं कि यदि पुरानी पेंशन दी गई तो कुछ राज्य आर्थिक रूप से
दिवालिया हो जाएगें,किंतु सासदों और
विधायकों की संख्या उनके वेतन भत्तों और पेंशन से देश के सामने आने वाली आर्थिक चुनौतियों की और ध्यान नही दिया
जाता। यह कहीं गणना नही होती कि इससे देश
पर कितना बोझ पड़ेगा।
सैनिकों की भर्ती
के लिए लाई गई अग्निपथ योजना इसी वित्तीय पुनर्गठन की दिशा में एक बड़ा कदम मानी
जाती है। अग्निवीर योजना के तहत युवाओं को चार साल के लिए सेना में भर्ती किया
जाता है, जिसके बाद केवल 25 प्रतिशत को ही स्थायी सेवा में रखा जाता है। शेष
75 प्रतिशत युवाओं को एकमुश्त सेवा निधि पैकेज देकर सेवामुक्त कर दिया जाता है, और उन्हें आजीवन पेंशन या अन्य
चिकित्सा सुविधाएं नहीं दी जातीं। सरकार का उद्देश्य रक्षा बजट के एक बड़े हिस्से
को, जो वर्तमान में वेतन और पेंशन में चला जाता है, आधुनिक हथियारों और तकनीक की खरीद में
लगाना है। लेकिन इस योजना ने सुरक्षा विशेषज्ञों और युवाओं के बीच चिंता पैदा कर
दी है। आलोचकों का कहना है कि पेंशन के अभाव में सैनिकों का मनोबल प्रभावित हो
सकता है और चार साल बाद बेरोजगार होने का डर युवाओं को इस गौरवशाली पेशे से दूर कर
सकता है।
एक तरफ जहां देश
की सुरक्षा और प्रशासनिक सेवा में लगे लोगों के लाभों को सीमित किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर 131वें संविधान संशोधन
विधेयक के माध्यम से लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त किया गया
है। वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों को बढ़ाकर लगभग 815 से 850 तक करने का
प्रस्ताव है।इसी के साथ नए परीसीमन से विधायकों की भी 2045 सीट बढ़ने की व्यवस्था
है। यह वृद्धि परिसीमन की प्रक्रिया के तहत की जा रही है, जिसका उद्देश्य बढ़ती जनसंख्या के
अनुपात में प्रतिनिधित्व को संतुलित करना है। हालांकि यह कदम लोकतांत्रिक
दृष्टिकोण से तर्कसंगत लग सकता है, पर इसके आर्थिक निहितार्थ अत्यधिक गंभीर हैं।
सांसदों की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि का अर्थ है उनके वेतन, भत्तों, आवास, सुरक्षा और कार्यालय खर्चों में भी
उसी अनुपात में बढ़ोतरी होना।
यदि हम वर्तमान
वित्तीय आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो एक सांसद का वेतन और विभिन्न भत्ते
मिलाकर प्रतिमाह एक बड़ी राशि बनती है। वर्ष 2025-26 के संशोधित आंकड़ों के अनुसार, एक सांसद का मूल वेतन लगभग 1.24 लाख
रुपये है। इसके अतिरिक्त, उन्हें निर्वाचन क्षेत्र भत्ता (लगभग 70,000 रुपये), कार्यालय भत्ता (लगभग 60,000 रुपये)
और संसद सत्र के दौरान प्रतिदिन का दैनिक भत्ता (2,500 रुपये) मिलता है। यदि इन
सबको जोड़ दिया जाए, तो एक सांसद पर सीधे तौर पर प्रतिमाह लगभग 2.7 लाख से 3 लाख रुपये
का खर्च आता है। इसमें उनके लिए उपलब्ध मुफ्त बिजली (50,000 यूनिट), पानी (4,000 किलोलीटर), 34 मुफ्त हवाई यात्राएं, रेल यात्राएं और दिल्ली में मिलने
वाले महंगे बंगलों का रखरखाव शामिल नहीं है। यदि लोकसभा सीटों की संख्या 543 से
बढ़कर 816 हो जाती है, तो केवल इन सीधे खर्चों के कारण देश पर प्रतिमाह करोड़ों रुपये का
अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।विधायकों की सीट बढ़ने से होने वाला आर्थिक बोझ इसमें शामिल नही किया गया।
इस अतिरिक्त
वित्तीय बोझ का अनुमान लगाने के लिए यदि हम 273 नए सांसदों (816 - 543) को आधार
मानें, तो केवल उनके वेतन और नियमित भत्तों पर ही प्रतिमाह लगभग 7.5 करोड़
से 8 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च होगा। वार्षिक आधार पर यह आंकड़ा 90 करोड़ से
100 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है। लेकिन यह तो केवल हिमशैल का सिरा है। प्रत्येक
नए सांसद के लिए लुटियंस दिल्ली जैसे महंगे इलाकों में आवास की व्यवस्था करना, उनके कार्यालयों का निर्माण और उनके
साथ तैनात होने वाले सुरक्षा कर्मियों व सहायक कर्मचारियों का वेतन इस खर्च को कई
गुना बढ़ा देगा। इसके अलावा,
सांसदों को मिलने वाली आजीवन पेंशन का खर्च भी भविष्य के बजटों पर
एक स्थायी बोझ बन जाएगा।
विवाद का मुख्य
बिंदु यही है कि जब देश के सैनिकों और आम कर्मचारियों के लिए 'राजकोषीय अनुशासन' और 'पेंशन सुधार' की बात की जाती है, तो वही मापदंड जनप्रतिनिधियों पर लागू
क्यों नहीं होते? अग्निवीर योजना के माध्यम से करोड़ों रुपये बचाने की कोशिश करने
वाली सरकार जब सांसदों की फौज बढ़ाने की तैयारी करती है, तो आम नागरिक के मन में यह सवाल उठना
स्वाभाविक है कि क्या देश की प्राथमिकताएं सही दिशा में हैं। एक तरफ एक जवान है जो
अपनी जवानी के चार साल देश को देता है और बिना पेंशन के घर लौट आता है, और दूसरी तरफ एक सांसद है जो केवल
पांच साल के कार्यकाल के बाद आजीवन पेंशन और सुविधाओं का हकदार बन जाता है। एक बात
और जहां कर्मचारी को पेंशन का हकदार बनने के लिए 20 से 25 साल की सेवा
अनिवार्य है, वहां सांसद या विधायक के लिए ऐसा नही है। एक
दिन के लिए सांसद या विधायक बनने पर उन्हें पूरी पेंशन मिलती है। सांसद या
विधायक जितनी बार चुना जाता है, उसकी उ पेंशन में बढ़े कार्यकाल के हिसाब से वृद्धि
मिलती है।कोई व्यक्ति यदि चार बार
सांसद और तीन बार विधायक बने तो उसे सांसद काल की चार और विधायक काल की
तीन वृद्धि पेंशन में जुड़कर मिलती है।
वर्तमान पंजाब सरकार ने एक आदेश करने विधायक के लिए सिर्फ एक पेंशन की व्यवस्था रखी है। ऐसा पूरे देश में
क्यों नही हो सकता। सांसद और विधायकों के साथ भी ऐसा ही किया जाना चाहिए।
भारत जैसे विकासशील देश में जहां
शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के लिए संसाधनों की भारी कमी है, वहां विधायी विस्तार के खर्चों को
बहुत सावधानी से तौलने की आवश्यकता है। लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे इस तरह से लागू किया जाना
चाहिए कि यह आम जनता के त्याग और सैनिकों के समर्पण के साथ न्याय करे। यदि सरकार
को वास्तव में राजकोषीय घाटे की चिंता है, तो उसे सांसदों के वेतन-भत्तों में भी
कटौती करने और 'एक राष्ट्र, एक पेंशन' जैसी व्यवस्था पर विचार करना चाहिए, ताकि देश का पैसा सांसदों की
सुख-सुविधाओं के बजाय उन लोगों पर खर्च हो जो वास्तव में देश की नींव को मजबूत
करते हैं।
अशोक मधुप
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)