Wednesday, May 20, 2026

सुप्रीम आदेश से आवारा कुत्तों से मुक्ति की उम्मीद बढ़ी

 


अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कार्ट द्वारा अपने पुराने आदेश को  बरकरार रखने से अब लगता है कि देश को आवारा कुत्तों के आंतक से मुक्ति मिल  जाएगी। लोगों को रैबीज की जान लेवा बीमारी से छुटकारा मिल सकेगा। न्यायालय ने नेशनल हाईवे अथार्टी  को भी कहा कि यह मार्ग  पर इस तरह बाड़  और अवरोध  बनाए कि आवारा पशु सड़क पर न जा सके।  न्यायालय के नेशनल हाईवे अथार्टी को दिए आदेश से  आशा बनी है कि आवारा पशुओं के टकराने  से होने वाली दुर्घटनाएं  कम होंगी।  

 आवारा कुत्तों से जुड़े मामले में फैसला सुनाते हुए मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट पुराने अपने पुराने आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने 11 अगस्त के पिछले आदेशों में बदलाव करने का निर्देश देने की मांग करने वाली  सभी  याचिकाओं को खारिज कर दिया । पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा, सभी राज्य हर शहर में एनिमल सेंटर बनाएं। जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा, कुत्तों के काटने की घटना लगातार जारी है और यह दिखाया है कि संबंधित अथॉरिटी की लापरवाही दिखती है। अदालत ने कहा, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों का यह दायित्व है कि लोगों के जीवन की रक्षा करें। राइट टू लाइफ की रक्षा करना राज्य और यूटी की जिम्मेदारी है। सर्वोच्च अदालत ने कहा, 'गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार सभी का अधिकार है। इसकी के तहत पब्लिक प्लेस में एक्सेस का अधिकार उनका है। बिना डर लोग कहीं जा सकें, ये उनका अधिकार है।' पीठ ने कहा, बच्चे और बुजुर्ग पर अटैक हो रहा है। कुत्तों द्वारा इंटरनेशनल ट्रैवलर को निशाना बनाया गया है। पीठ ने राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश जारी करते हुए कहा, सभी राज्य व केंद्र शासित प्रदेश एनिमल बर्थ कंट्रोल लागू करें। राज्य तमाम सुविधाओं वाले यूटी एबीसी सेंटर हर जिले में स्थापित करें। कोर्ट ने कहा, वहां स्टेरलाइजेशन और वेक्सिनेशन प्रोग्राम वहां हो पाए।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने याचिकाकर्ताओं, प्रतिवादियों, पीड़ितों, कुत्तों के पक्ष में शामिल लोग, पशु कल्याण बोर्ड और भारत सरकार की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
पीठ ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एएनएचएआई) की ओर से पेश हुए अधिवक्ता की दलीलें भ सुनी । इसमें सात नवंबर, 2025 के उस निर्देश के अनुपालन का जिक्र था। अदालत ने प्राधिकरण को राष्ट्रीय राजमार्गों से आवारा पशुओं को हटाने और सड़कों के किनारे बाड़ लगाने के निर्देश दिये थे। न्यायालय ने भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (एडब्ल्यूबीआई) को पशु आश्रय स्थलों या पशु जन्म नियंत्रण सुविधाओं के लिए अनुमति मांगने वाले गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ)के आवेदनों पर कार्रवाई करने का निर्देश दिया।पीठ ने एडब्ल्यूबीआई का पक्ष रख रहे अधिवक्ता से कहा, 'या तो आप आवेदन स्वीकार करें या अस्वीकार करें, लेकिन इसे शीघ्रता से करें।' शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी अधिवक्ता की इस दलील पर की कि सात नवंबर के आदेश के बाद, विभिन्न संगठनों से ऐसे आवेदनों में अचानक वृद्धि हुई है।
न्यायालय ने 13 जनवरी को कहा था कि वह राज्यों से कुत्ते के काटने की घटनाओं के लिए भारी हर्जाना देने को कहेगी और ऐसे मामलों के लिए कुत्तों को खाना खिलाने वालों को जवाबदेह ठहराएगी। अदालत ने पिछले पांच वर्षों से आवारा पशुओं से संबंधित मानदंडों के लागू न होने पर भी चिंता जताई। अदालत ने कई मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा, "कुत्तों के काटने का ख़तरा अब हवाई अड्डों और रिहायशी इलाक़ों समेत महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थानों तक फैल चुका है।"अदालत ने कहा कि यह समस्या "बेहद व्यापक" रूप ले चुकी है और "ऐसी घटनाओं का लगातार दोहराया जाना" निर्देशों के पालन में कमी को दर्शाता है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जो अधिकारी इन आदेशों को लागू करने में विफल रहेंगे, उनके ख़िलाफ़ अवमानना और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। फै़सला सुनाते हुए अदालत ने कहा, "गरिमा के साथ जीने के अधिकार में यह अधिकार भी शामिल है कि व्यक्ति कुत्तों के हमलों के डर के बिना स्वतंत्र रूप से जीवन जी सके। राज्य मूक दर्शन  बनकर नही रह सकता। अदालत भी उन कठोर ज़मीनी हक़ीक़तों से आँखें नहीं मूँद सकती, जहाँ बच्चे, विदेशी यात्री और बुज़ुर्ग कुत्तों के काटने की घटनाओं का शिकार हुए हैं. संविधान ऐसे समाज की कल्पना नहीं करता, जहाँ बच्चों और बुज़ुर्गों का जीवन केवल शारीरिक ताक़त या क़िस्मत के भरोसे हो।

इससे पहले नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की एक बेंच ने अपने एक आदेश में सभी राज्य सरकारों से कहा था कि वो आवारा कुत्तों और मवेशियों को हाईवे, सड़कों और एक्सप्रेस-वे से हटा दें। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था, "इसका सख़्ती से पालन करना ज़रूरी है वरना अधिकारियों को व्यक्तिगत तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा" कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह भी निर्देश दिए थे कि अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान, सार्वजनिक खेल परिसर, रेलवे स्टेशन  जैसे  सरकारी और निजी संस्थानों की पहचान कर उन्हें इस तरह घेर दें कि आवारा कुत्ते अंदर न आ सकें। कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारियों को ऐसे परिसरों से मौजूद आवारा कुत्तों को हटाकर उनकी नसबंदी करानी होगी. इसके बाद उन्हें डॉग शेल्टर में भेजना होगा। कुछ वकीलों ने आदेश पर चिंता जताई थी और कोर्ट से इसे संशोधित करने के लिए सुनवाई की मांग की. हालाँकि बेंच से इसे ख़ारिज कर दिया।

·        सुप्रीम कोर्ट  की चिंता वास्तव में उचित है, क्योंकि ंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च  के अनुसार, भारत में रेबीज के कारण हर साल लगभग 5,700 लोगों की जान जाती है | विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया भर में रेबीज से होने वाली कुल मौतों का लगभग 36 प्रतिशत  हिस्सा अकेले भारत से आता है।  नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (एनसीडीसी) और इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम  (आईडीएसपी) की रिपोर्ट में हर साल कुत्ते के काटने के मामलों में भारी वृद्धि देखी जा रही है | पिछले वर्ष के दौरान भारत में कुत्ते के काटने के 37 लाख (37,15,713) से अधिक मामले दर्ज किए गए । रेबीज एक लगभग 100 प्रतिशत  घातक बीमारी है यानी लक्षण (सिंटम्स) दीखने के बाद इसे ठीक करना लगभग असंभव है | भारत में आवारा कुत्तों की समस्या एक गंभीर मुद्दा बन चुकी है। भारत में साल 2024 में कुत्ते के काटने की 37,15,713 घटना रिपोर्ट की गई।  राजधानी दिल्ली की बात की जाए तो यहां साल 2025 में केवल जनवरी के महीने में 3,196 (प्रतिदिन लगभग 103)  कुत्ते के काटने के मामले सामने आए। 2024 में 25,210 (प्रतिदिन लगभग 69), 2023 में 17,874 (प्रतिदिन लगभग 49), 2022 में 6,691 (प्रतिदिन लगभग 18) ये वो मामले हैं जो रिपोर्ट किए गए हैं।

 कुत्ते के काटने पर दवा की चार डोज देने का प्रावधान है।   पहली डोज शून्य से एक दिन के बीच,दूसरी शून्य ये तीन दिन, तीसरी शून्य से सात दिन और और चौथी शून्य से 28 दिन के बीच दी जाती है। देखने में आया है कि सरकारी अस्पतालों में एक या दो डोज देकर ही काम निपटा दिया  जाता है। खुद इस पत्रकार के बेटे को कुत्ते के काटने पर जिला अस्पताल में  दो डोज देकर इतिश्री कर दी गई।  बाद में दो डोज बाजार से खरीदकर लगवाईं गई। अब इस तरह की चिकित्सीय  लापरवाही से कुत्ते के काटने के शिकार को रेबीज नही होगा। न्यायालय ने आदेश तो दे दिया किंतु इस आदेश के पालन को भी  सुनिश्चित करना जरूरी होगा, क्योंकि सरकारी अमला इस कान से सुनकर  दूसरे कान से निकालने का अभ्यस्त  हो   चुका है।    

 

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं)

 

Tuesday, May 12, 2026

एक्सप्रेस−वे पर अभी चलना भी सिखाना होगा

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में गंगा एक्सप्रेस− वे और दिल्ली− देहरादून एक्सप्रेस− वे का उद्घाटन किया। ये एक्यप्रेस−वे भारत के विकास के नए द्वार हैं। भारत की धरती पर आज कंक्रीट और कोलतार के जो आधुनिक गलियारे बिछ रहे हैं, वे केवल सड़क मात्र नहीं हैं, बल्कि एक महत्वाकांक्षी राष्ट्र की धमनियां हैं। एक्सप्रेस-वे का निर्माण इक्कीसवीं सदी के भारत की वह पहचान है जो समय और दूरी को बौना साबित कर रही है। लेकिन इस भौतिक प्रगति के समानांतर एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि हम जितनी तेजी से रफ्तार के बुनियादी ढांचे तैयार कर रहे हैं, उतनी ही तेजी से हम सड़क अनुशासन के मोर्चे पर पिछड़ते जा रहे हैं। एक्सप्रेस-वे बनाना तो इंजीनियरिंग का कमाल है, लेकिन उन पर सुरक्षित तरीके से चलना सिखाना एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौती है। यदि हम केवल पत्थर और डामर बिछाते रहे और नागरिक बोध को विकसित करना भूल गए, तो ये शानदार मार्ग विकास के पथ नहीं, बल्कि काल के गाल बन जाएंगे।

​सड़क हादसों के आंकड़े आज किसी महामारी से कम डरावने नहीं हैं। सरकारी आंकड़ों और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 1.5 लाख से अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाते हैं। इसका अर्थ यह है कि हर घंटे लगभग 17 से 20 मौतें सड़कों पर हो रही हैं। एक्सप्रेस-वे पर होने वाली दुर्घटनाओं की प्रकृति और भी भयावह है क्योंकि यहाँ वाहनों की गति सामान्य सड़कों से कहीं अधिक होती है। तीव्र गति पर होने वाली एक छोटी सी चूक भी जानलेवा साबित होती है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, एक्सप्रेस-वे पर होने वाली 70 प्रतिशत से अधिक दुर्घटनाओं का कारण 'ओवरस्पीडिंग' यानी निर्धारित सीमा से अधिक गति से वाहन चलाना है। इसके अलावा, गलत दिशा में वाहन चलाना और अचानक लेन बदलना ऐसे कारण हैं जिन्होंने इन आधुनिक मार्गों को असुरक्षित बना दिया है। एक्सप्रेसवे पर केवल अधिकतम गति ही नहीं, बल्कि न्यूनतम गति का पालन भी जरूरी है। धीमी गति से चल रहे वाहन तेज़ रफ्तार वाहनों के लिए अवरोध बन जाते हैं, जिससे टक्कर की संभावना बढ़ जाती है। ​एक्सप्रेस-वे पर चलने की संस्कृति विकसित करने के लिए सबसे पहले 'लेन अनुशासन' को समझना अनिवार्य है। हमारे देश में एक आम धारणा है कि सड़क का हर कोना हमारा है, लेकिन एक्सप्रेस-वे इस मानसिकता की अनुमति नहीं देता। यहाँ सबसे बाईं ओर की लेन भारी वाहनों और धीमी गति के लिए होती है, जबकि सबसे दाहिनी लेन केवल 'ओवरटेकिंग' के लिए आरक्षित होती है। अक्सर देखा जाता है कि लोग दाहिनी लेन को ही अपनी स्थायी जगह मान लेते हैं, जिससे पीछे से आने वाले तेज रफ्तार वाहनों को रास्ता नहीं मिलता और वे मजबूरन गलत दिशा से ओवरटेक करने की कोशिश करते हैं। यह स्थिति सीधे तौर पर मौत को आमंत्रण देने जैसी है। लोगों को यह सिखाना होगा कि ओवरटेक करने के बाद वापस अपनी निर्धारित लेन में आना तकनीकी जरूरत ही नहीं, बल्कि जीवन बचाने की शर्त है।

​हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सड़क सुरक्षा और दुर्घटनाओं को लेकर अत्यंत गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि तेज गति से वाहन चलाना केवल यातायात नियमों का उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह दूसरों के जीवन के अधिकार का हनन भी है। सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न फैसलों में जोर दिया है कि सड़कों की डिजाइनिंग में खामियों को दूर करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है नियमों का सख्ती से पालन कराना। न्यायालय ने राज्य सरकारों और सड़क प्राधिकरणों को निर्देश दिया है कि एक्सप्रेस-वे पर 'ब्लैक स्पॉट्स' (जहां बार-बार दुर्घटनाएं होती हैं) की पहचान की जाए और उन्हें तुरंत सुधारा जाए। कोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि अब प्रशासन केवल चालान काटकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता, उसे सुरक्षित सफर सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेह होना पड़ेगा।

​सुरक्षित ड्राइविंग का एक और महत्वपूर्ण पहलू 'टायर और वाहन की स्थिति' है। एक्सप्रेस-वे पर लंबी दूरी तक तेज गति से वाहन चलाने पर टायरों के भीतर की हवा गर्म होकर फैलती है। यदि टायर पुराने हैं या उनमें हवा का दबाव सही नहीं है, तो उनके फटने की संभावना बढ़ जाती है। बहुत कम लोग जानते हैं कि एक्सप्रेस-वे पर चलने से पहले टायरों की जांच करना उतना ही जरूरी है जितना पेट्रोल भरवाना। इसके साथ ही 'हाइवे हिप्नोसिस' जैसी स्थिति से भी लोगों को आगाह करना आवश्यक है। लंबी, सीधी और बिना किसी बाधा वाली सड़क पर लगातार गाड़ी चलाते समय ड्राइवर का मस्तिष्क एक प्रकार की अर्ध-निद्रा या शून्यता की स्थिति में चला जाता है। इससे बचने के लिए हर दो-तीन घंटे में छोटा विश्राम लेना और वाहन से बाहर निकलकर शरीर को गति देना अनिवार्य है।

​शिक्षा और जागरूकता के स्तर पर हमें स्कूलों से ही शुरुआत करनी होगी। सड़क सुरक्षा को केवल एक पाठ्यपुस्तक का अध्याय नहीं, बल्कि जीवन कौशल के रूप में सिखाया जाना चाहिए। जब तक एक चालक यह महसूस नहीं करेगा कि उसके पीछे वाली सीट पर बैठा परिवार या सामने से आ रहा अजनबी भी किसी के घर का चिराग है, तब तक कोई भी तकनीक हादसों को नहीं रोक सकती। तकनीक की बात करें तो 'इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम' (ITMS) का विस्तार करना होगा। हर कुछ किलोमीटर पर स्पीड कैमरे और रडार होने चाहिए जो नियम तोड़ने वालों को तत्काल संदेश भेजें। लेकिन दंड से अधिक महत्वपूर्ण 'बोध' है। लोगों को यह समझाना होगा कि 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार रोमांच तो दे सकती है, लेकिन वह गलती सुधारने का मौका नहीं देती।

​एक्सप्रेस-वे पर एक और बड़ी समस्या आवारा पशुओं और पैदल चलने वालों की है। यद्यपि एक्सप्रेस-वे को पूरी तरह 'एक्सेस कंट्रोल्ड' बनाया जाता है, लेकिन अक्सर बाड़ या फेंसिंग को काटकर लोग और पशु अंदर आ जाते हैं। यहाँ प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि वह निरंतर गश्त और मजबूत फेंसिंग सुनिश्चित करे। साथ ही, आस-पास के गांवों के लोगों को यह समझाना होगा कि इन सड़कों पर पैदल चलना या जानवर चराना आत्मघाती कदम है। सड़क सुरक्षा केवल ड्राइवर की नहीं, बल्कि समाज के हर उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है जो उस बुनियादी ढांचे का हिस्सा है।

एक्सप्रेस-वे हमारे विकसित होते भारत के गौरव हैं। गंगा एक्सप्रेस− वे और दिल्ली− देहरादून एक्सप्रेस−वे,दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे हो या पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, ये हमारी प्रगति के सूचक हैं। लेकिन इस प्रगति को पूर्ण तभी माना जाएगा जब इन पर चलने वाला हर व्यक्ति सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंचे। हमें अपनी ड्राइविंग की आदतों में बदलाव लाना होगा। सीट बेल्ट बांधना, मोबाइल का प्रयोग न करना, शराब पीकर गाड़ी न चलाना और लेन का पालन करनाये बहुत छोटी बातें लग सकती हैं, लेकिन ये ही जीवन और मृत्यु के बीच की पतली लकीर हैं। सड़क पर आपकी सुरक्षा आपके हाथ में है, और आपकी समझदारी में ही पूरे समाज का हित है।  आधुनिक भारत की इन तेज रफ्तार सड़कों को सुरक्षित सफर की मिसाल बनाना भी सरकार के साथ प्रत्येक वाहन चालक की जिम्मेदारी है।

एक बात और सफर आसान करने के लिए  हम दो शहरों के बीच एकसप्रेस−वे  बना  रहे हैं किंतु शहरों के अंदर बढ़ते ट्रैफिक और लगते जाम पर हम ध्यान नही दे रहे।  लाल बत्ती को समाप्त करने के उपाए तेजी से  खोजने होंगे। शहर में भी  लेन व्यवस्था  सख्ती से लागू करनी होगी। गलत ढंग से वाहन चलाने वालों के  विरूद्ध कठोर निर्णय लेने होंगे। यातायात में सुधार के लिए बहुत कुछ  करना  होगा।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार  हैं)

Wednesday, May 6, 2026

भाजपा के लिए बडी चुनौती होगी टीएमसी नेटवर्क को तोड़ना


अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार  

भाजपा ने पश्चिम बंगाल में  पूर्ण बहुमत से भी कहीं ज्यादा सीट पाकर सत्ता तो कब्जा ली ,भारी बहुमत भी  हासिल कर लिया ,किंतु उसे यहां टीएमसी की बड़ी चुनौती का लगातार सामना  करना  होगा।टीएमटी उसके सामने लगातार चुनौती खड़ी करती रहेगी।  पश्चिम बंगाल की राजनीति वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण अध्याय है। यह केवल सत्ता के हस्तांतरण का मामला नहीं है, बल्कि एक गहरी जड़ें जमा चुके राजनीतिक तंत्र को उखाड़कर नया तंत्र स्थापित करने की प्रक्रिया है। बूथ लेबिल तक अपना  नेटवर्क बनाना  है। जड़ तक पंहुचे भ्रष्टाचार को खत्म कर  यहां विकास के रास्ते खोलना एक बड़ी चुनौती होगी। भर्ती घोटालों के लिए बदनाम बंगाल को गंगा  सागर के जल से पवित्र करना  होगा। इस  सबके  लिए उसे कड़ी मेहनत करनी होगी। 

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पिछले 15 साल  से  बंगाल की नसों में इस कदर समाई हुई है कि उसे केवल चुनावी जीत से बेदखल नहीं किया जा सकता। भाजपा के लिए असली चुनौती शपथ ग्रहण के बाद शुरू होगी, क्योंकि बंगाल में सत्ता का अर्थ केवल सचिवालय (नबन्ना) पर कब्जा करना नहीं है, बल्कि 'पाड़ा' (मोहल्ले) और 'बूथ' पर अपना नियंत्रण स्थापित करना है।

बंगाल की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता इसका कैडर-आधारित ढांचा है। पहले यह केडर बेस ढांचा पहले वामपंथियों के पास था।   इसे  ममता बनर्जी ने एक लंबे और हिंसक संघर्ष के बाद अपने पाले में किया। आज टीएमसी का संगठन केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा तंत्र बन चुका है। ग्रामीण इलाकों में एक साधारण ग्रामीण के लिए टीएमसी का स्थानीय नेता ही कानून है, वही रोजगार दिलाने वाला है । वही सामाजिक विवादों का निपटारा करने वाला 'दादा' है। भाजपा के लिए सबसे पहली और बड़ी बाधा इसी 'बूथ-स्तर' के संगठन को तोड़ना है। भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में बंगाल में अपना आधार तो बढ़ाया है, लेकिन उसका ढांचा अभी भी कई जगहों पर 'ऊपर से नीचे'  की ओर है। टीएमसी की जगह लेने के लिए भाजपा को ऐसे कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी करनी होगी जो केवल चुनाव के समय सक्रिय न हों, बल्कि साल के 365 दिन जनता के सुख-दुख में साथ खड़े रहें।

टीएमसी की दादागिरी और गुंडागर्दी बंगाल की राजनीतिक संस्कृति का एक दुखद हिस्सा बन चुकी है। यहाँ 'मसल पावर' और 'मनी पावर' का ऐसा गठजोड़ है जो विपक्षी कार्यकर्ताओं को पनपने नहीं देता। भाजपा यदि सरकार बना भी लेती है, तो उसे एक ऐसी पुलिस व्यवस्था और प्रशासन को पुनर्जीवित करना होगा जो दशकों से राजनीतिक इशारों पर नाचने का आदी हो चुका है। टीएमसी के कार्यकर्ता जो स्थानीय स्तर पर ठेकेदारी, सिंडिकेट और वसूली के तंत्र से जुड़े हैं, वे आसानी से अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे। भाजपा को यहाँ 'कानून के राज'  को बहाल करने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे। साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि वह स्वयं उसी हिंसा के चक्र में न फंस जाए। जनता को यह विश्वास दिलाना होगा कि भाजपा की सरकार में किसी भी व्यक्ति को अपनी राजनीतिक विचारधारा के कारण जान का जोखिम नहीं उठाना पड़ेगा।

विश्वास बहाली की इस प्रक्रिया में 'अस्मिता' और 'विकास' का संतुलन सबसे महत्वपूर्ण है। टीएमसी ने हमेशा भाजपा को 'बाहरी' (बोहिरागोतो) दल के रूप में चित्रित किया है। इस नैरेटिव को काटने के लिए भाजपा को बंगाली संस्कृति, भाषा और परंपराओं के प्रति अपनी निष्ठा को और अधिक प्रखरता से साबित करना होगा। केवल जय श्री राम के नारे से बंगाल नहीं जीता जा सकता। यहाँ के लोगों के मन में महाप्रभु चैतन्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद और रबींद्रनाथ टैगोर के प्रति जो अगाध श्रद्धा है। सुभाष चंद्र बोस उनके आदर्श हैं।  इन सब को उन्हें  अपने राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनाना होगा। जब तक बंगाल का सामान्य नागरिक यह महसूस नहीं करेगा कि भाजपा उसकी संस्कृति की संरक्षक है, तब तक पूर्ण विश्वास हासिल करना असंभव है।

घुंसपेठियों के लिए महफूज पश्चिमी बंगाल से बाहरी देशों के अवैध प्रवासियों को रोकना भी एक चुनौती होगी।  हालांकि चुनाव आयोग की सख्ती  और बंगाल में केंद्रीय बलों की तैनाती से इस अवैध घुसपैंठियों के हौसले काफी कमजोर हैं।इन्हें पूरी तरह तोड़ना  होगा ।अच्छा यह है  कि कभी  सत्ताकाकेंद्र बिदूं  रही माकपा अब पूरी तरह हाशिंए पर चली गई  वरन कभी  उसकी पश्चिमी बंगाल में वही हालत थी तो वहां आज टीएमसी की हैं।

आर्थिक मोर्चे पर बंगाल आज एक बड़े संकट से गुजर रहा है। उद्योगों का पलायन और युवाओं का रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर रुख करना एक कड़वी सच्चाई है। भाजपा को 'सोनार बांग्ला' के सपने को हकीकत में बदलने के लिए एक स्पष्ट रोडमैप देना होगा। सिंडिकेट राज को खत्म करना केवल पुलिसिया कार्रवाई से संभव नहीं है, इसके लिए वैकल्पिक रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे। यदि भाजपा बंगाल में बड़े निवेश लाने में सफल रहती है और आईटी से लेकर विनिर्माण क्षेत्र तक में नौकरियां पैदा करती है, तो टीएमसी का कैडर जो आज केवल मजबूरी या लालच में सत्ता से चिपका है, वह धीरे-धीरे बिखरने लगेगा।

भाजपा के लिए एक और बड़ी चुनौती राज्य के जनसांख्यिकीय समीकरण हैं। बंगाल की राजनीति में ध्रुवीकरण एक सच्चाई है, लेकिन एक स्थिर सरकार चलाने के लिए उसे समाज के सभी वर्गों का विश्वास जीतना होगा। टीएमसी का आधार केवल गुंडागर्दी नहीं, बल्कि उनकी विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं भी हैं, जैसे 'लक्ष्मी भंडार' या 'कन्याश्री'। इन योजनाओं ने महिलाओं के एक बड़े वर्ग को ममता बनर्जी के साथ जोड़ा है। भाजपा को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह न केवल इन योजनाओं का बेहतर विकल्प दे, बल्कि प्रशासन में पारदर्शिता लाकर भ्रष्टाचार को पूरी तरह समाप्त करे।

 पश्चिम बंगाल में भाजपा की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह टीएमसी के 'भय के तंत्र' को 'भरोसे के तंत्र' में कितनी जल्दी बदल पाती है। संगठन बनाना ईंट-पत्थर जोड़ने जैसा नहीं है, बल्कि यह लोगों के दिलों में जगह बनाने जैसा है। टीएमसी के घर पर कब्जा करने का मतलब उनके कार्यालयों पर झंडा फहराना नहीं है, बल्कि उस आम बंगाली के मन से डर निकालना है जो आज अपनी राय जाहिर करने से कतराता है। भाजपा को एक ऐसी समावेशी राजनीति का परिचय देना होगा जहाँ विकास का लाभ कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, बिना किसी कट-मनी या राजनीतिक भेदभाव के। यदि भाजपा इस परीक्षा में सफल होती है, तभी वह बंगाल में एक स्थायी और सार्थक परिवर्तन ला पाएगी, अन्यथा सत्ता का परिवर्तन केवल चेहरों का बदलाव बनकर रह जाएगा, व्यवस्था का नहीं। बंगाल की मिट्टी को शांति और प्रगति की प्यास है, और जो दल इस प्यास को बुझाएगा, वही सही मायने में बंगाल का भाग्य विधाता बनेगा।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं)

Wednesday, April 22, 2026

परिसीमन बिल गिरने से देश को तो लाभ मिला

 

 

अशोक मधुप

 

देश की आधी आबादी यानी महिलाओं को 33 फीसदी राजनीतिक आरक्षण देने वाला ऐतिहासिक बिल लोकसभा में भले ही गिर गया हो किंतु भाजपा को जो लाभ मिलना था,  वह मिल या।  इस बिल के माध्यम से वह यह संदेश देने में कामयाब रही कि हम तो महिलाओं को संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण देना  चाहते  है, कितु विपक्ष  नही चाहता।  विपक्ष  भी  इस बिल के गिरने को  अपनी विजय मानता है।  इस बिल के गिरने से भाजपा को लाभ मिले या विपक्ष को किंतु सबसे बड़ा  लाभ देश को हुआ है। इस बिल के पास होने से बढ़ने वाली लोकसभा और विधान सभा  सीट के    सांसदों के वेतन और भत्तों का  खर्च बच गया। नए सांसदों और विधायकों  की पेंशन की राशि का बोझ अब देश को नही उठाना पड़ेगा।

मोदी सरकार ने लोकसभा और विधानसभाओं में वर्तमान सीटों की संख्या एकमुश्त बढ़ाकर  डेढ़ गुना करने का जो प्रस्ताव इस बिल में किया था, उसका लाभ कुल मिलाकर 2250 सीटों का होता।  लोकसभा में वर्तमान 545 सीटों के हिसाब से की महिलाओं के 33  प्रतिशत आरक्षण के हिसाब से 205 सीटें बढ़तीं, जबकि सभी 28 राज्यों और दो केन्द्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में 2045 सीटों का इजाफा होता। यानी 70 करोड़ महिलाओं में से मात्र 2250 महिलाएं चुनकर विधानमंडलों में पहुंचतीं। इसमें राज्यसभा और विधानपरिषदों की सीटें शामिल नहीं हैं, क्योंकि उनकी संख्या बाद में तय होगी। तर्क दिया जा सकता है कि इस आरक्षण को महिलाओं की संख्या की बजाए उनके राजनीतिक-सामाजिक सशक्तिकरण, लैंगिक समता और राजनीतिक नैतिकता की पवित्र मंशा के आईने में देखा जाना चाहिए। सही है। लेकिन अगर बिल पास हो जाता। सासंदों और  विधायकों के क्षेत्र और सीट बढ़  जाती तो वढ़े सासदों , विधायकों के वेतन, भत्ते, सुविधाओं और पेंशन का बोझ तो देश पर ही पड़ता।

12 साल के कार्यकाल में यह पहला अवसर था, जब मोदी सरकार  की संसद में विधायी हार हुई। संसदीय इतिहास में 1990 में पंचायत सशक्तिकरण संशोधन बिल के राज्यसभा में गिरने के बाद यह पहला बिल है, जो लोकसभा में ही ढ़ह  गया। वैसे मोदी सरकार चाहती तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण बिल अपने दूसरे कार्यकाल में ला सकती थी, जब एनडीए के अपने 353 सांसद थे और कोई भी संशाधन बिल आसानी से पारित हो सकता था। लेकिन उसने तब ऐसा नहीं किया। 
भारतीय राजव्यवस्था में पिछले कुछ वर्षों से वित्तीय प्रबंधन और संसाधनों के आवंटन को लेकर एक व्यापक बहस छिड़ी हुई है। एक तरफ सरकार राजकोषीय घाटे को कम करने और अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के नाम पर पुरानी पेंशन योजनाओं और सैन्य भर्ती की पारंपरिक प्रक्रियाओं में आमूलचूल परिवर्तन कर रही है, वहीं दूसरी ओर लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के विस्तार के नाम पर विधायी निकायों के आकार को बढ़ाने की योजनाएं भी चर्चा के केंद्र में हैं। इन निर्णयों का भारतीय अर्थव्यवस्था और आम नागरिक के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सरकार के इन कदमों के पीछे तर्क दिया जाता है कि आधुनिक समय की चुनौतियों से निपटने के लिए संसाधनों का कुशल उपयोग अनिवार्य है, लेकिन जब बात सांसदों और जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं की आती है, तो जनता के बीच विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

पेंशन के मुद्दे पर सरकारी कर्मचारियों में व्यापक असंतोष देखा जा रहा है। केंद्र सरकार ने वित्तीय बोझ को कम करने के लिए लंबे समय से पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) के स्थान पर नई पेंशन योजना (एनपीएस) को प्राथमिकता दी है। हालिया वर्षों में महंगाई भत्ते (डीए) और महंगाई राहत (डीआर) में वृद्धि तो की गई है, जैसे कि 2026 के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार इसे 60 प्रतिशत तक पहुँचाया गया फिर भी यह वृद्धि कर्मचारियों की उन मांगों को शांत करने में विफल रही है। वे तो  सेवानिवृत्ति के बाद एक सुनिश्चित आय की गारंटी चाहते हैं। सरकार का तर्क है कि पेंशन पर होने वाला खर्च भविष्य में विकास कार्यों के लिए उपलब्ध बजट को कम कर सकता है, इसलिए निवेश-आधारित पेंशन प्रणाली अधिक व्यावहारिक है। हालांकि, सरकारी कर्मचारी इसे अपनी सामाजिक सुरक्षा में कटौती के रूप में देखते हैं, जिससे उनके भविष्य की स्थिरता पर सवालिया निशान लग जाते हैं। अर्थशास्त्री दावा करते हैं कि यदि पुरानी पेंशन दी गई तो कुछ राज्य आर्थिक रूप से दिवालिया  हो जाएगें,किंतु सासदों और विधायकों की संख्या  उनके  वेतन भत्तों और पेंशन से देश के सामने आने  वाली आर्थिक चुनौतियों की और ध्यान नही दिया जाता। यह कहीं गणना  नही होती कि इससे देश पर कितना बोझ  पड़ेगा।

​सैनिकों की भर्ती के लिए लाई गई अग्निपथ योजना इसी वित्तीय पुनर्गठन की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जाती है। अग्निवीर योजना के तहत युवाओं को चार साल के लिए सेना में भर्ती किया जाता है, जिसके बाद केवल 25 प्रतिशत को ही स्थायी सेवा में रखा जाता है। शेष 75 प्रतिशत युवाओं को एकमुश्त सेवा निधि पैकेज देकर सेवामुक्त कर दिया जाता है, और उन्हें आजीवन पेंशन या अन्य चिकित्सा सुविधाएं नहीं दी जातीं। सरकार का उद्देश्य रक्षा बजट के एक बड़े हिस्से को, जो वर्तमान में वेतन और पेंशन में चला जाता है, आधुनिक हथियारों और तकनीक की खरीद में लगाना है। लेकिन इस योजना ने सुरक्षा विशेषज्ञों और युवाओं के बीच चिंता पैदा कर दी है। आलोचकों का कहना है कि पेंशन के अभाव में सैनिकों का मनोबल प्रभावित हो सकता है और चार साल बाद बेरोजगार होने का डर युवाओं को इस गौरवशाली पेशे से दूर कर सकता है।

​एक तरफ जहां देश की सुरक्षा और प्रशासनिक सेवा में लगे लोगों के लाभों को सीमित किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर 131वें संविधान संशोधन विधेयक के माध्यम से लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त किया गया है। वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों को बढ़ाकर लगभग 815 से 850 तक करने का प्रस्ताव है।इसी के साथ नए परीसीमन से विधायकों की भी 2045 सीट बढ़ने की व्यवस्था है। यह वृद्धि परिसीमन की प्रक्रिया के तहत की जा रही है, जिसका उद्देश्य बढ़ती जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व को संतुलित करना है। हालांकि यह कदम लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से तर्कसंगत लग सकता है, पर  इसके आर्थिक निहितार्थ अत्यधिक गंभीर हैं। सांसदों की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि का अर्थ है उनके वेतन, भत्तों, आवास, सुरक्षा और कार्यालय खर्चों में भी उसी अनुपात में बढ़ोतरी होना।

​यदि हम वर्तमान वित्तीय आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो एक सांसद का वेतन और विभिन्न भत्ते मिलाकर प्रतिमाह एक बड़ी राशि बनती है। वर्ष 2025-26 के संशोधित आंकड़ों के अनुसार, एक सांसद का मूल वेतन लगभग 1.24 लाख रुपये है। इसके अतिरिक्त, उन्हें निर्वाचन क्षेत्र भत्ता (लगभग 70,000 रुपये), कार्यालय भत्ता (लगभग 60,000 रुपये) और संसद सत्र के दौरान प्रतिदिन का दैनिक भत्ता (2,500 रुपये) मिलता है। यदि इन सबको जोड़ दिया जाए, तो एक सांसद पर सीधे तौर पर प्रतिमाह लगभग 2.7 लाख से 3 लाख रुपये का खर्च आता है। इसमें उनके लिए उपलब्ध मुफ्त बिजली (50,000 यूनिट), पानी (4,000 किलोलीटर), 34 मुफ्त हवाई यात्राएं, रेल यात्राएं और दिल्ली में मिलने वाले महंगे बंगलों का रखरखाव शामिल नहीं है। यदि लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 816 हो जाती है, तो केवल इन सीधे खर्चों के कारण देश पर प्रतिमाह करोड़ों रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।विधायकों की सीट बढ़ने से होने वाला  आर्थिक बोझ इसमें शामिल नही किया गया।

​इस अतिरिक्त वित्तीय बोझ का अनुमान लगाने के लिए यदि हम 273 नए सांसदों (816 - 543) को आधार मानें, तो केवल उनके वेतन और नियमित भत्तों पर ही प्रतिमाह लगभग 7.5 करोड़ से 8 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च होगा। वार्षिक आधार पर यह आंकड़ा 90 करोड़ से 100 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है। लेकिन यह तो केवल हिमशैल का सिरा है। प्रत्येक नए सांसद के लिए लुटियंस दिल्ली जैसे महंगे इलाकों में आवास की व्यवस्था करना, उनके कार्यालयों का निर्माण और उनके साथ तैनात होने वाले सुरक्षा कर्मियों व सहायक कर्मचारियों का वेतन इस खर्च को कई गुना बढ़ा देगा। इसके अलावा, सांसदों को मिलने वाली आजीवन पेंशन का खर्च भी भविष्य के बजटों पर एक स्थायी बोझ बन जाएगा।

​विवाद का मुख्य बिंदु यही है कि जब देश के सैनिकों और आम कर्मचारियों के लिए 'राजकोषीय अनुशासन' और 'पेंशन सुधार' की बात की जाती है, तो वही मापदंड जनप्रतिनिधियों पर लागू क्यों नहीं होते? अग्निवीर योजना के माध्यम से करोड़ों रुपये बचाने की कोशिश करने वाली सरकार जब सांसदों की फौज बढ़ाने की तैयारी करती है, तो आम नागरिक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या देश की प्राथमिकताएं सही दिशा में हैं। एक तरफ एक जवान है जो अपनी जवानी के चार साल देश को देता है और बिना पेंशन के घर लौट आता है, और दूसरी तरफ एक सांसद है जो केवल पांच साल के कार्यकाल के बाद आजीवन पेंशन और सुविधाओं का हकदार बन जाता है। एक बात और जहां कर्मचारी को पेंशन का हकदार बनने के लिए 20 से 25 साल की सेवा अनिवार्य  है,  वहां सांसद या विधायक के लिए ऐसा नही है। एक दिन के लिए सांसद या विधायक  बनने  पर उन्हें पूरी पेंशन मिलती है। सांसद या विधायक जितनी बार चुना जाता है,  उसकी   उ पेंशन में बढ़े कार्यकाल के हिसाब से वृद्धि मिलती है।कोई व्यक्ति  यदि चार बार सांसद  और तीन बार विधायक  बने तो उसे सांसद काल की चार और विधायक काल की तीन वृद्धि पेंशन में जुड़कर  मिलती है। वर्तमान   पंजाब सरकार ने  एक आदेश करने विधायक के लिए सिर्फ  एक पेंशन की व्यवस्था रखी है। ऐसा पूरे देश में क्यों नही हो सकता। सांसद और विधायकों के साथ भी ऐसा ही किया जाना चाहिए।    

भारत जैसे विकासशील देश में जहां शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के लिए संसाधनों की भारी कमी है, वहां विधायी विस्तार के खर्चों को बहुत सावधानी से तौलने की आवश्यकता है। लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे इस तरह से लागू किया जाना चाहिए कि यह आम जनता के त्याग और सैनिकों के समर्पण के साथ न्याय करे। यदि सरकार को वास्तव में राजकोषीय घाटे की चिंता है, तो उसे सांसदों के वेतन-भत्तों में भी कटौती करने और 'एक राष्ट्र, एक पेंशन' जैसी व्यवस्था पर विचार करना चाहिए, ताकि देश का पैसा सांसदों की सुख-सुविधाओं के बजाय उन लोगों पर खर्च हो जो वास्तव में देश की नींव को मजबूत करते हैं।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)