Wednesday, April 1, 2026

नक्सलवाद के खात्में के बाद भी सरकार को बहुत कुछ करना होगा

 



अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

काफी पहले   केंद्र सरकार  ने  घोषणा की थी कि मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद समाप्त हो जाएगा। मार्च 2026 की  अवधि से  एक दिन    पहले ही गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में बड़ी घोषणा की । नक्सलवाद पर चर्चा के दौरान गृह मंत्री ने  कहा कि  देश में नक्सलवाद अब लगभग समाप्त हो चुका है।  आदिवासी इलाकों में असली न्याय पहुंचा है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि 2014 के बाद केंद्र सरकार की सख्त नीति, सुरक्षा अभियान और विकास योजनाओं के कारण संभव हुआ है। उन्होंने कहा कि सरकार  नक्सल प्रभावित क्षेत्र में तेजी से विकास करा  रही है। शिक्षा के लिए स्कूल और उपचार के लिए  वहां अस्पताल खुल रहे हैं। अमित शाह ने कहा कि नक्सलवाद की जड़ें खत्म हो रही हैं और आदिवासियों की आवाज अब संसद तक पहुंची है। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसने समस्या को बढ़ने दिया। मोदी सरकार के फैसलों से हालात बदले हैं। उन्होंने कहा कि नक्सल विचारधारा आदिवासियों को गुमराह करती है और अब देश नक्सलवाद मुक्त बनने की ओर बढ़ रहा है।

उन्होंने साफ कहा कि सरकार ने नक्सलियों से बातचीत नहीं, बल्कि उन्हें खत्म कर विकास को आगे बढ़ाने का रास्ता चुना। उन्होंने कहा कि जो हथियार उठाएगा, उसे कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने दावा किया कि नक्सलियों का पूरा केंद्रीय नेतृत्व, पोलित ब्यूरो और कमेटी अब खत्म हो चुकी है। काफी मारे गए,  बहुतों  ने सरेंडर किया । कुछ अभी फरार हैं।

शाह ने कहा कि देश अब नक्सलमुक्त होने की स्थिति में पहुंच चुका है। उन्होंने बताया कि कई बड़े ऑपरेशन जैसे बुढ़ा, थंडरस्टॉर्म और ब्लैक फॉरेस्ट चलाए गए।  इनमें भारी मात्रा में हथियार, आईईडी फैक्ट्री और अनाज बरामद हुआ। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़, तेलंगाना और ओडिशा के बड़े इलाके अब नक्सल प्रभाव से बाहर आ चुके हैं। सुरक्षा बलों और स्थानीय पुलिस की भूमिका को उन्होंने अहम बताया।

केंद्रीय  गृहमंत्री ने  बताया  कि  आजादी के समय देश संसाधनों की कमी और विकास की चुनौतियों से जूझ रहा था। कई दूर-दराज के इलाकों तक सरकार की पहुंच नहीं थी, सड़कों और सुविधाओं का अभाव था। ऐसे हालात में कुछ संगठनों ने इन कमजोरियों का फायदा उठाया। जहां राज्य की पकड़ कम थी, उन्हीं इलाकों को रेड कॉरिडोर बनाया गया। भोले-भाले आदिवासियों को भेदभाव और शोषण के नाम पर भड़काया गया और उनके हाथों में हथियार थमा दिए गए। हकीकत यह है कि इन क्षेत्रों में योजनाबद्ध भेदभाव नहीं, बल्कि विकास की कमी थी, जिसका इस्तेमाल कर हिंसा को बढ़ावा दिया गया।

शाह ने बताया कि केंद्र सरकार ने ऑल एजेंसी अप्रोच अपनाई। इसमें सीएपीएफ, राज्य पुलिस और खुफिया एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाया गया। फंडिंग और स्पोर्ट सिस्टम पर प्रहार किया गया। सरेंडर नीति लागू की गई। इसमें आत्मसमर्पण करने वालों को आर्थिक मदद और पुनर्वास दिया गया। उन्होंने कहा कि सरकार ने हर गांव तक अपनी पहुंच बनाई, इससे नक्सलवाद कमजोर हुआ।


उन्होंने  दावा किया   कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विकास हुआ। हजारों किलोमीटर सड़कें बनीं, मोबाइल टावर लगाए गए, बैंक, एटीएम और डाकघर खोले गए। शिक्षा के लिए एकलव्य स्कूल, आईटीआई और कौशल केंद्र बनाए गए। उन्होंने कहा कि विकास ही नक्सलवाद खत्म करने का सबसे बड़ा कारण बना।

शाह ने कहा कि नक्सलवाद गरीबी से नहीं, बल्कि विचारधारा से पैदा हुआ। उन्होंने कहा कि यह विचारधारा लोकतंत्र में विश्वास नहीं करती और बंदूक के जरिए सत्ता चाहती है। उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासियों को बरगलाकर उनके हाथ में हथियार दिए गए और विकास को रोका गया।


गृह मंत्री ने कहा कि सरकार आगे भी सख्ती और विकास दोनों पर काम जारी रखेगी। उन्होंने आदिवासी समाज को भरोसा दिलाया कि उनकी सुरक्षा और विकास सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि अब देश बंदूक से नहीं, संविधान से चलेगा और यही असली जीत है।

गृह मंत्री के अनुसार, जिस "रेड कॉरिडोर" का विस्तार कभी पशुपति से तिरुपति तक माना जाता था, वह अब सिमटकर केवल कुछ जिलों तक रह गया है। 2014 में जहाँ 126 जिले वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित थे, वहीं 2025-26 तक यह संख्या घटकर मात्र एक अंक में रह गई है। छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग, जो कभी नक्सलियों का अभेद्य किला माना जाता था। अब वह सुरक्षा बलों के नियंत्रण में है और वहां विकास की किरणें पहुँच रही हैं।

सरकार के इन दावों की पुष्टि जमीनी आंकड़ों से भी होती है। पिछले कुछ वर्षों में नक्सली हिंसा की घटनाओं में 70  प्रतिशत  से अधिक की कमी आई है। सुरक्षा बलों की शहादत के आंकड़ों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। "ऑपरेशन कगार" और "ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट" जैसे लक्षित अभियानों के माध्यम से सुरक्षा बलों ने नक्सली नेतृत्व की कमर तोड़ दी है। 2025 के दौरान ही 300 से अधिक नक्सली मारे गए । इनमें कई शीर्ष कमांडर शामिल थे। इसके साथ ही, हजारों की संख्या में कैडरों ने आत्मसमर्पण किया है,। यह समर्पण इस बात का प्रतीक है कि अब इस विचारधारा का आकर्षण खत्म हो रहा है।  इतना सब होने के बावजूद , इन सफलताओं के बावजूद नक्सलवाद की चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। सबसे बड़ी चुनौती भौगोलिक विषमता है। छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ जैसे घने वन क्षेत्र आज भी सुरक्षा बलों के लिए कठिन परीक्षा बने हुए हैं। नक्सलियों ने अपने पैर पीछे जरूर खींचे हैं, लेकिन वे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। वे अक्सर घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों का लाभ उठाकर छापामार हमले करने की ताक में रहते हैं। इसके अलावा, "अर्बन नक्सलिज्म" या वैचारिक उग्रवाद एक नई चुनौती बनकर उभरा है। शहरों में बैठे कुछ बौद्धिक समूह नक्सलियों को वैचारिक और रसद सहायता प्रदान करते हैं। इससे इस समस्या की जड़ें गहरी बनी रहती हैं। जब तक इन वैचारिक और वित्तीय नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त नहीं किया जाता, तब तक उग्रवाद के पुनर्जीवित होने का खतरा बना रहेगा।

एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती स्थानीय आदिवासियों के बीच विश्वास की बहाली है। दशकों से विकास की मुख्यधारा से कटे होने के कारण, कई क्षेत्रों में ग्रामीण अब भी सुरक्षा बलों को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। नक्सली अक्सर इस अविश्वास का फायदा उठाते हैं और ग्रामीणों को ढाल के रूप में उपयोग करते हैं। सुरक्षा बलों और स्थानीय जनता के बीच के इस "गवर्नेंस वैक्यूम" को भरना एक लंबी प्रक्रिया है। केवल सड़कों या मोबाइल टावरों का निर्माण पर्याप्त नहीं है; लोगों को यह महसूस कराना होगा कि सरकार उनकी संस्कृति और अधिकारों की रक्षक है। इसके साथ ही, पड़ोसी राज्यों के बीच समन्वय की कमी भी कई बार बाधा बनती है, क्योंकि नक्सली एक राज्य में दबाव बढ़ने पर दूसरे राज्य की सीमा में शरण ले लेते हैं।

विकास के मोर्चे पर, सरकार को "नियत नेल्लानार" (आपका अच्छा गांव) जैसी योजनाओं को और विस्तार देना चाहिए, जो अंतिम छोर तक बुनियादी सुविधाएं पहुँचाने पर केंद्रित हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण सबसे प्रभावी हथियार है। जब आदिवासियों के बच्चों के पास स्कूल होंगे और उनके युवाओं के पास रोजगार के अवसर होंगे, तो नक्सलियों की भर्ती प्रक्रिया स्वतः ही बंद हो जाएगी। कौशल विकास केंद्रों के माध्यम से स्थानीय युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना नक्सली विचारधारा के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है। साथ ही, वन अधिकारों (फोरेस्ट राइट  एक्ट) का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा  ताकि  आदिवासियों को अपनी जमीन पर मालिकाना हक का अहसास हो और वे उग्रवाद के बहकावे में न आएं।

मान्यता है कि , नक्सलवाद का पूर्ण उन्मूलन केवल बंदूकों के दम पर संभव नहीं है। वास्तव में ऐसा भी  नही हैं। कभी श्रीलंका में लिट्टे   बहुत मजबूत संगठन था।   उसके  लड़ाके बेमिसाल थे। श्रीलंका के साथ भारतवर्ष को भी  वह प्रभावित कर रहा था। इस पर भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी (1991), श्रीलंकाई राष्ट्रपति प्रेमदासा रनसिंघे (1993) सहित कई लोगों  की हत्या का आरोप है। श्रीलंका सरकार  से  इस संगठन को खत्म करने का  निर्णय  लिया। एक झटके में 2009 में लिट्टे  पूरी तरह खत्म हो  गया। न श्रीलंका   सरकार ने उसके लड़ाकों को फुसलाया।  न समर्पण के लिए कहा। बंदूक के बल पर लिट्टे को खत्म कर दिया। 

 भारत  सरकार   तो नक्सलवाद को खत्म करने के लिए इन्हें समझाने  और आत्म समर्पण  के लिए  प्रेरित कर रही है। सरकार को अपनी आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति को और अधिक उदार और प्रभावी बनाना चाहिए, ताकि भटक चुके युवा बिना किसी डर के मुख्यधारा में लौट सकें। 

 इस सबके लिए तकनीकी और खुफिया तंत्र को भी मजबूत करना होगा। आधुनिक तकनीक का उपयोग करके नक्सली गतिविधियों पर नजर रखना और उन्हें समय रहते रोकना संभव है। इसके अलावा, राज्यों और केंद्र के बीच बेहतर समन्वय भी आवश्यक है, क्योंकि नक्सलवाद कई राज्यों में फैला हुआ है। इससे निपटने के लिए संयुक्त प्रयासों की जरूरत होती है। मजबूत इच्छा शक्ति की भी  आवश्यक्ता  है।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं

Monday, March 23, 2026

धार्मिक स्थलों को क्यों नही मिलती बंदरों से मुक्ति

 

धार्मिक स्थलों को क्यों नही मिलती बंदरों से मुक्ति

अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

धार्मिक स्थलों को बंदरों से क्यों नही मिलती मुक्ति। सबसे बड़ा  यक्ष  प्रश्न  यह है कि इन स्थानों पर आने वाले श्रृद्धालु  कब तक इनके आंतक झेलते  रहेंगे? कब तक इनका  शिकार होते  रहेंगे?

 हाल में राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु अपने कार्यकाल में 19 मार्च को वृंदावन आईं। वे दूसरी बार यहां आईं है। इससे पहले इसी पद पर रहते हुए प्रणब मुखर्जी व रामनाथ कोविंद भी अपने कार्यकाल में दो बार वृंदावन आए थे। लेकिन, राष्ट्रपति मुर्मु  वृंदावन के तीन दिवसीय प्रवास पर आने वाली पहली राष्ट्रपति हैं। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्रप्रसाद, ज्ञानी जैल सिंह एक बार वृंदावन आए। उपराष्ट्रपति पद पर रहते हुए डॉक्टर शंकरदयाल शर्मा, आर वेंकटरामन, डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी वृंदावन अपनी धार्मिक यात्रा पर आ चुके हैं।

निवर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी दो बार वृंदावन आए। आश्रय सदन में वृद्ध विधवा माताओं से मुलाकात करने आए थे। राष्ट्रपति पद पर रहते प्रणब मुखर्जी पहली बार 16 नवंबर 2014 को अक्षयपात्र में चंद्रोदय मंदिर के भूमि पूजन में आए तो दूसरी बार 18 नवंबर 2015 को चैतन्य महाप्रभु के वृंदावन आगमनोत्सव के पांच सौ वे वर्ष पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम में आए थे। राष्ट्रपति पद पर रहते ज्ञानी जैल सिंह 1987 में वृंदावन आए और रंगजी मंदिर में दर्शन करने पहुंचे थे 1957 में देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्रप्रसाद वृंदावन आए। उप राष्ट्रपति पद पर रहते 1985 में आर वेंकटरामन, 1993 में डॉ. शंकरदयाल शर्मा, 1959 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन वृंदावन आ चुके हैं। राष्ट्रपति या  कोई  वीवीआईपी जब भी  वृंदावन आता है। प्रत्येक बार उनकी सुरक्षा तो  होती ही है। सबसे बड़ा काम होता है वीवीआईपी को यहां के झपटमार बदंर से बचाना। ये  बंदर झपटामार कर श्रद्धालु का चश्मा  उतारते  और किसी ंची जगह पेड़ या दीवार पर जाकर बैठ जाते हैं। ये चश्मा तभी लौटाते हैं जब उन्हें खाने के लिए फ्रुटी, केला  या दूसरे खाने के सामान दिए जाएं। वीवीआईपी दौरे को  देखते हुए  प्रशासन लंगूरों के जगह− जगह कट आउट लगवाता है।  माना  जाता है कि लंगूर से बंदर डरतें हैं।उन्हें डराने के लिए ऐसा  किया जाता है। कुछ जगह लंगूर भी  लाकर बांध  दिए जाते  हैं। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु की सुरक्षा से लेकर रूट पर व्यवस्थाओं को दुरस्त करने के लिए जिला प्रशासन ने रात दिन एक कर दिया। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु के दौरे को देखते एक प्रशासन ने लंगूरों के जगह− जगह कट आउट लगवाए।

लेखक को  चित्रकूट में हनुमान गढ़ी  जाने का अवसर मिला। वहां रास्ते में बंदर और लंगूर मिलते और आपके कपड़े और बैग पकड़कर रोक लेते हैं। वे आपके  बैग और जेब से खाने का सामान प्रसाद  आदि निकालकर ही आपको आगे जाने देते हैं। शुक्रताल में तो  हनुमान धाम में बंदरों को भगाने के  लिए लंगूर  बांधा हुआ था।   बंदर उसके अभयस्त हो गए थे। उन्हें पता था  कि रस्सी में बंधे लंगूर की पंहुच कहां तक हैं। बदंर आते   और लंगूर की पंहुच की दूरी से अगल रहकर लौट जाते।

 प्रश्न है कि वीवीआइपी के आने पर ही  क्यों  बंदरों को रोकने की व्यवस्था होती है। देश के आम आदमी को भी  वीवीआईपी क्यों नही समझा जाता। उसकी सुरक्षा की  जिम्मेदारी भी तो  सरकार की है। उसके लिए क्यों नही ऐसी व्यवस्थाएं होती।  बंदर हम हिंदुओं की श्रद्धा है। हम उसे पवित्र  मानते हैं। पूजनीय मानते  है।  इतना होने पर भी  उसके भोजन की व्यवस्था क्यों नही करते। अयोध्या में बड़ी तादाद में बंदर है। हनुमान गढ़ी पर मैंने बंदरों को फूलों  की माला  तोड़कर  उसमें  भोजन के अंश तलाशते  देखा है। इसी शहर में डस्टविन से भोजन खोजते बंदर मुझे मिलें हैं। हमारी समाज सेवी संस्थाए क्यों नही इनके भोजन की जरूरत पूरी करती। बंदरों की संख्या  लगातार बढ़ रही है। बढती बंदरों की जनसंख्या को भोजन चाहिए। भोजन ने मिलने वह निरीह प्राणी अपना  पेट भरने के लिए कुछ तो करेगा।

 बंदरों के आतंक के कारण  कई शहरों  में तो महिलाओं और बच्चों का छतों पर जाना  कठिन हो गया है। शहरों की नही अब तो जंगल में भी इनकी बढ़ती आबादी किसानों के लिए संकट बन चुकी है। भोजन के अभाव में बंदर खेतों की फसल तोड़कर खा रहे हैं। गेंहू की बाली खा जाते है। बोए गए गन्ने के बीज जमीन से निकाल कर वे अपनी उदरपूर्ति  कर रहे हैं। किसान फसल की रक्षा को लेकर परेशान हैं।अब तो किसानों ने  खेतों की रक्षा के लिए नौकर रखने शुरू कर दिए हैं।

आज बंदरों का  आंतक धार्मिक स्थलों के साथ अन्य स्थानों पर भी  बढ़ता जा रहा है।  शहरी आबादी के साथ  किसान भी परेशान है। आज जरूरी हो गया है कि  सरकार द्वारा बंदरों की आबादी कम करने के  लिए अभियान चलाया जाए। बंदरों के ग्रुप  लीडर की नसंबदी कराकर उनकी आबादी नियंत्रित की जाए।    जनता के शोर मचाने पर बंदरों  का पकड़कर  जंगलों में छोड़ा जाना कोई स्थायी निदान नही है। ये जंगल और वनों से लौटकर फिर आबादी की ओर आ जाते हैं। बढ़ती बंदरों की आबादी को भोजन चाहिए। भोजन न मिलने पर उन्हें भी  पेट भरना है। जैसे आदमी अपनी भोजन की जरूरत पूरी करने के लिए दूसरे साधन ढ़ूंढ़ता है। वैसे ही आज बंदर कर रहे हैं। तीर्थ स्थलों पर चश्मा छीन रहे हैं तो कुछ जगह श्रद्धालुओं को  पकड़कर उनके बैग से भोजन ले रहे हैं। गांव और शहरों में भोजन के लिए कपड़े  उठाकर ले जाना आम बात है। ये उठाए गए कपड़े तब छोड़ते हैं, जब उन्हें खाने की सामग्री मिल जाए।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं)

Thursday, December 25, 2025

एक्सप्रेस वे पर लोगों को चलना सिखाना होगा

 एक्सप्रेस वे पर लोगों को चलना सिखाना होगा

अशोक मधुप
वरिष्ठ पत्रकार
विकास की रफ़्तार तभी सुखद है जब वह सुरक्षित हो। भारत सरकार ने पिछले 10 वर्षों में जो बुनियादी ढांचा खड़ा किया है, विशेषकर सड़क तंत्र में जो क्रांतिकारी परिवर्तन आए हैं, वे अभूतपूर्व हैं। जहाँ पहले दो शहरों के बीच का सफर घंटों और दिनों में तय होता था, आज वह समय काफी कम हो गया है। लेकिन इस भौतिक प्रगति के बीच एक गंभीर प्रश्न खड़ा होता है। क्या हम इन आधुनिक सड़कों पर चलने के लिए मानसिक और तकनीकी रूप से तैयार हैं? अब समय आ गया है कि हम ईंट और डामर की सड़कों से आगे बढ़कर 'मानव व्यवहार' में सुधार पर निवेश करें। याद रखिए, एक्सप्रेसवे केवल मंजिल तक जल्दी पहुँचने के लिए नहीं हैं, बल्कि सुरक्षित पहुँचने के लिए हैं। यदि हम गति के साथ गरिमा और अनुशासन नहीं अपना सकते, तो ये चमचमाती सड़कें हमारे लिए वरदान के बजाय अभिशाप सिद्ध होंगी। अब जरूरत है कि"हाईवे और एक्सप्रेसवे बनाने से पहले लोगों को उन पर चलना सिखाना चाहिए"—यह केवल एक सुझाव नहीं, बल्कि समय की मांग है। केवल कंक्रीट के जाल बिछाने से राष्ट्र का कल्याण नहीं होगा, बल्कि उन सड़कों पर सुरक्षित सफर सुनिश्चित करना भी सरकार और नागरिक दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी है।
भारत में सड़क निर्माण की गति पिछले दस वर्षों (2014-2024) में सांख्यिकीय और भौगोलिक दोनों दृष्टि से ऐतिहासिक रही है। 2014 के आसपास देश में राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लंबाई लगभग 91,287 किलोमीटर थी, जो 2024 तक बढ़कर 1,46,000 किलोमीटर से अधिक हो गई है। 2014-15 में सड़क निर्माण की दर लगभग 12 किलोमीटर प्रतिदिन थी, जो वर्तमान में बढ़कर औसतन 28 से 37 किलोमीटर प्रतिदिन तक पहुँच चुकी है।
भारत ने 'भारतमाला परियोजना' के तहत विश्व स्तरीय एक्सप्रेसवे का जाल बिछाया है। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे यमुना एक्सप्रेसवे और समृद्धि महामार्ग जैसे गलियारे भारत की नई पहचान बन चुके हैं। अटल टनल और चेनाब ब्रिज जैसे इंजीनियरिंग के चमत्कार इसी दशक की देन हैं, जिन्होंने दुर्गम क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ा है।
इतना सब हुआ। सड़कों की चौड़ाई तो बढ़ी है, लेकिन सुरक्षा के मोर्चे पर हम अब भी संघर्ष कर रहे हैं। पिछले पांच वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि हमारी लापरवाही की कीमत बहुत भारी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2019 में हुई 4,49,002 दुर्घटनाओं 1,51,113मौत हुईं। 2020 में हुई 3,66,138 दुर्घटनाओं में 1,31,714 व्यक्ति मरे। 2021 में हुए 4,12,432 एक्सीडेंट में 1,53,972 व्यक्ति मौत के मुंह में समा गए। 2022 में हुई 4,61,312 दुर्घटनाओं मे 1,68,491 जान गईं। 2023 हुई 4,80,000+ (अनुमानित) में 1,70,000 व्यक्ति मौत के शिकार हुए। ये आंकड़े बताते हैं कि दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। घायलों की संख्या तो मरने वालों से काफी ज्यादा होनी चाहिए। अभी यमुना एक्सप्रेसवे पर हुए हादसे में 19 लोग मरे। 100 से ज्यादा घायल हुए।
आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि लगभग 70 प्रतिशत से अधिक दुर्घटनाएं 'ओवरस्पीडिंग' यानी अत्यधिक गति के कारण होती हैं। एक्सप्रेसवे पर दुर्घटनाओं की गंभीरता सामान्य सड़कों से कहीं अधिक होती है क्योंकि यहाँ वाहनों की गति बहुत तेज़ होती है। एक्सप्रेसवे सामान्य सड़कें नहीं हैं। यहाँ ड्राइविंग के अपने नियम हैं, जिन्हें भारतीय चालकों को सीखना होगा। इन पर चलते समय लेन का अनुशासन का पालन करना होगा । भारत में सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग भारी वाहन सबसे दाईं ओर चलाते हैं, जबकि वह लेन केवल ओवरटेकिंग के लिए होती है। तेज़ रफ़्तार वाली सड़कों पर गलत लेन में वाहन चलाना आत्महत्या के समान है।
एक्सप्रेसवे पर केवल अधिकतम गति ही नहीं, बल्कि न्यूनतम गति का पालन भी जरूरी है। धीमी गति से चल रहे वाहन तेज़ रफ्तार वाहनों के लिए अवरोध बन जाते हैं, जिससे टक्कर की संभावना बढ़ जाती है। एक्सप्रेसवे की सीमेंट वाली सड़कों पर टायर बहुत जल्दी गर्म होते हैं। यदि टायर पुराने या घिसे हुए हैं, तो वे फट सकते हैं। लोगों को यह सिखाना जरूरी है कि लंबी यात्रा से पहले अपने वाहनों की तकनीकी जांच कैसे करें। एक्सप्रेसवे पर चढ़ने और उतरने के लिए बने रास्तों (रैम्प) का सही उपयोग करना अधिकांश लोगों को नहीं आता। अचानक मुख्य मार्ग पर वाहन मोड़ देना घातक होता है।
वाहनों की संख्या और लाइसेंस धारकों के बीच का यह अंतर यह दर्शाता है कि हमारी सड़कों पर 'अकुशल' चालकों की फौज मौजूद है। एक्सप्रेसवे जैसी तेज़ रफ़्तार वाली सड़कों पर यह स्थिति और भी घातक हो जाती है। एक आदर्श स्थिति में, सड़क पर चल रहे हर वाहन के अनुरूप कम से कम एक वैध लाइसेंस होना चाहिए। हालांकि, भारत में स्थिति काफी चिंताजनक है। राष्ट्रीय रजिस्टर के अनुसार, देश में कुल ड्राइविंग लाइसेंसों की संख्या लगभग 21 से 23 करोड़ के बीच है। यदि हम 35 करोड़ पंजीकृत वाहनों की तुलना 23 करोड़ लाइसेंसों से करें, तो स्पष्ट होता है कि वाहनों और चालकों के बीच 12 करोड़ का भारी अंतर है।
विभिन्न क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों (RTO) और पुलिस द्वारा चलाए गए जांच अभियानों के अनुसार, बिना लाइसेंस वाहन चलाने वालों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। एक अनुमान के अनुसार, देश में लगभग 25से 30 प्रतिशत लोग बिना किसी वैध ड्राइविंग लाइसेंस के सड़कों पर वाहन चला रहे हैं। सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि हादसों में जान गंवाने वाले या दोषी पाए जाने वाले चालकों में से लगभग 65 प्रतिशत युवाओं के पास वैध लाइसेंस नहीं होता। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में यह प्रतिशत और भी अधिक है, जहाँ लगभग 40 प्रतिशत दोपहिया चालक बिना लाइसेंस के गाड़ी दौड़ा रहे हैं।
एक पुरानी रिपोर्ट (सेव लाइफ फाउंडेशन) यह भी बताती है कि जिनके पास लाइसेंस है, उनमें से भी 10 में से छह लोगों ने बिना किसी व्यावहारिक ड्राइविंग टेस्ट के इसे प्राप्त किया है, जो सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ा खतरा है।
इसलिए बिना ड्राइविंग लाइसेंस पकड़े जाने पर केवल जुर्माना नहीं, बल्कि वाहन को लंबे समय के लिए ज़ब्त करना होगा। नाबालिगों द्वारा गाड़ी चलाने पर अभिभावकों को जेल की सजा का प्रावधान में कड़ाई जरूरी है। डिजिटल तकनीक का उपयोग कर हर मोड़ पर बिना लाइसेंस वाले पर कार्रवाई अमल में लानी होगी।
इन एक्सप्रेसवे पर चलना सिखाने के लिए सिर्फ शिक्षा पर्याप्त नहीं है; अनुशासन के लिए कानून का भय भी आवश्यक है। गलत वाहन चलाने वालों, शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों और उल्टी दिशा (रॉन्ग साइड) में चलने वालों पर इतनी सख्ती होनी चाहिए कि वे दोबारा नियम तोड़ने की हिम्मत न करें। बार-बार नियम तोड़ने वालों का ड्राइविंग लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द कर दिया जाना चाहिए। हर कुछ किलोमीटर पर कैमरे और रडार होने चाहिए जो नियम तोड़ते ही चालान सीधे चालक के पते पर भेजें। नियम पन मानने वालों पर जुर्माना केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि दंडात्मक होना चाहिए ताकि वह व्यक्ति की आर्थिक स्थिति पर प्रभाव डाले।
यमुना एक्सप्रेसवे पर हुई दुर्घटना के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने इस एक्सप्रेसवे पर प्रत्येक किलोमीटर पर कैमरे लगाने का निर्णय लिया है। यह तो पूरे देश के महत्वपूर्ण मार्ग पर करना होगा, तभी दुर्घटनाएं रूकेंगी।
सड़क सुरक्षा को केवल पुलिस का विषय न मानकर इसे शिक्षा का हिस्सा बनाना होगा। विद्यालयों में बच्चों को बचपन से ही सड़क के संकेतों, लेन अनुशासन और जीवन के मूल्य के बारे में सिखाया जाना चाहिए। जब तक सुरक्षा की भावना हमारे संस्कार में नहीं आएगी, तब तक आधुनिक सड़कें केवल मृत्यु के गलियारे बनी रहेंगी।
अशोक मधुप
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Sunday, December 21, 2025

भारतीय संगीत के अनमोल रत्न: वसंत देसाई

 भारतीय संगीत के अनमोल रत्न: वसंत देसाई


​भारतीय चित्रपट संगीत के स्वर्ण युग में कई ऐसे दिग्गज हुए जिन्होंने अपनी स्वर लहरियों से जन-मानस को मंत्रमुग्ध कर दिया। इन्हीं में से एक ऐसा नाम है जिसने शास्त्रीय संगीत की मर्यादा और सुगम संगीत की सरलता के बीच एक सेतु का निर्माण किया—वसंत देसाई। वे केवल एक संगीतकार ही नहीं, बल्कि एक निष्ठावान साधक थे, जिनके संगीत में शुद्धता, सात्विकता और राष्ट्रीयता की स्पष्ट झलक मिलती थी।


​जन्म और प्रारंभिक जीवन


​वसंत देसाई का जन्म ९ जून, १९१२ को महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले के कुदाल नामक स्थान पर हुआ था। उनका बचपन कोंकण की प्राकृतिक सुंदरता के बीच बीता, जिसका प्रभाव उनके संगीत में भी सदैव दिखाई दिया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय स्तर पर हुई, किंतु बचपन से ही उनका रुझान कला और संगीत की ओर था। वे केवल सुरों के ही प्रेमी नहीं थे, बल्कि अभिनय में भी उनकी गहरी रुचि थी। यही कारण था कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक अभिनेता के रूप में की थी।


​प्रभात फिल्म कंपनी और कलात्मक यात्रा


​वसंत देसाई के व्यक्तित्व को निखारने में 'प्रभात फिल्म कंपनी' का बहुत बड़ा योगदान रहा। वे कोल्हापुर चले आए और प्रसिद्ध फिल्म निर्माता वी. शांताराम के सानिध्य में कार्य करना प्रारंभ किया। प्रारंभ में उन्होंने फिल्मों में छोटे-मोटे अभिनय किए और कोरस (सामूहिक गायन) में हिस्सा लिया। महान संगीतज्ञ मास्टर कृष्णराव और उस्ताद अमीर खान जैसे दिग्गजों के संपर्क में आने से उनकी संगीत प्रतिभा को एक नई दिशा मिली। उन्होंने संगीत की बारीकियों को बहुत गहराई से सीखा और धीरे-धीरे पार्श्व संगीत और स्वतंत्र संगीत निर्देशन की ओर कदम बढ़ाया।


​संगीत शैली और विशेषताएँ


​वसंत देसाई का संगीत अपनी सादगी और गहराई के लिए जाना जाता है। उन्होंने कभी भी संगीत में शोर-शराबे या अनावश्यक वाद्ययंत्रों का प्रयोग नहीं किया। उनका मानना था कि संगीत की आत्मा उसके शब्दों और रागों की शुद्धता में होती है। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय रागों का प्रयोग फिल्मी गानों में इतनी कुशलता से किया कि वे आम आदमी की जुबान पर चढ़ गए।

​उनकी संगीत रचनाओं में भक्ति रस, देशभक्ति और प्रकृति के प्रति प्रेम स्पष्ट रूप से झलकता है। उन्होंने लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत का जो सम्मिश्रण प्रस्तुत किया, वह आज भी संगीत के विद्यार्थियों के लिए एक शोध का विषय है।


​अमर कृतियाँ और मील के पत्थर


​वसंत देसाई ने कई ऐतिहासिक फिल्मों में कालजयी संगीत दिया। फिल्म 'झनक झनक पायल बाजे' में उनका संगीत नृत्य और शास्त्रीयता का अद्भुत संगम था। इसी प्रकार, फिल्म 'दो आँखें बारह हाथ' का गीत "ऐ मालिक तेरे बंदे हम" आज भी भारतीय विद्यालयों और संस्थानों में प्रार्थना के रूप में गाया जाता है। यह गीत उनके संगीत की आध्यात्मिक शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण है।

​उनकी अन्य महत्वपूर्ण फिल्मों में 'शकुंतला', 'गूँज उठी शहनाई', 'आशीर्वाद' और 'गुड्डी' शामिल हैं। फिल्म 'गुड्डी' का गीत "हमको मन की शक्ति देना" आज भी नैतिकता और संकल्प की अनौपचारिक प्रार्थना बन चुका है। 'गूँज उठी शहनाई' में उन्होंने उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई का जिस प्रकार उपयोग किया, उसने फिल्म संगीत को एक नई ऊँचाई प्रदान की।


​राष्ट्रभक्ति और सामाजिक योगदान


​वसंत देसाई केवल फिल्मों तक ही सीमित नहीं रहे। उनके भीतर राष्ट्रभक्ति कूट-कूट कर भरी थी। उन्होंने सामूहिक गान (कोरस) की परंपरा को बहुत बढ़ावा दिया। उनका मानना था कि सामूहिक गायन से एकता और अनुशासन की भावना जागृत होती है। उन्होंने हज़ारों बच्चों को एक साथ देशभक्ति के गीत गाने के लिए प्रशिक्षित किया। उन्होंने महाराष्ट्र राज्य के सांस्कृतिक विभाग में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और लोक कलाओं के संरक्षण हेतु निरंतर कार्य किया।


​सादगीपूर्ण व्यक्तित्व और सम्मान


​वसंत देसाई अपने व्यक्तिगत जीवन में भी अत्यंत सरल और सौम्य स्वभाव के धनी थे। वे प्रचार-प्रसार से दूर रहकर अपनी साधना में लीन रहते थे। संगीत जगत में उन्हें जो सम्मान मिला, वह उनके कठिन परिश्रम और कला के प्रति अटूट निष्ठा का प्रतिफल था। उन्हें अपने जीवनकाल में कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, किंतु उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार श्रोताओं का वह अटूट प्रेम था जो उनकी रचनाओं को आज भी जीवित रखे हुए है।


​जीवन का दुखद अंत


​भारतीय संगीत का यह दैदीप्यमान नक्षत्र २२ दिसंबर, १९७५ को एक अत्यंत दुखद दुर्घटना में सदा के लिए अस्त हो गया। एक लिफ्ट दुर्घटना में उनकी असामयिक मृत्यु हो गई। उनके निधन से भारतीय संगीत जगत में जो रिक्तता उत्पन्न हुई, उसे कभी भरा नहीं जा सका। भले ही वे आज हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, किंतु उनकी स्वर लहरियाँ और उनके द्वारा रचित अमर प्रार्थनाएँ आने वाली पीढ़ियों को सदैव शांति और शक्ति प्रदान करती रहेंगी।

​वसंत देसाई का जीवन हमें यह सिखाता है कि कला का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और समाज का कल्याण होना चाहिए। उनका संगीत आज भी भारतीय संस्कृति की सुगंध बिखेर रहा है।

Saturday, December 20, 2025

भारतीय शास्त्रीय नृत्यांगना यामिनी कृष्णमूर्ति : जीवन, साधना और योगदान

 प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय नृत्यांगना यामिनी कृष्णमूर्ति : जीवन, साधना और योगदान

भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली महान नृत्यांगनाओं में यामिनी कृष्णमूर्ति का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने नृत्य को केवल कला का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे साधना, अनुशासन और आध्यात्मिक अनुभूति का स्वरूप प्रदान किया। उनकी नृत्य शैली में शुद्धता, सौंदर्य और भावाभिव्यक्ति का ऐसा अद्भुत संगम दिखाई देता है, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। वे भारतीय सांस्कृतिक विरासत की सशक्त प्रतिनिधि रहीं।

यामिनी कृष्णमूर्ति का जन्म बीस दिसंबर उन्नीस सौ चालीस को तमिलनाडु के चिदंबरम नगर में हुआ। उनका परिवार विद्वान और सांस्कृतिक वातावरण से जुड़ा हुआ था। बचपन से ही उन्हें कला, संगीत और नृत्य के प्रति आकर्षण था। परिवार ने उनकी रुचि को पहचाना और उन्हें शास्त्रीय नृत्य की विधिवत शिक्षा दिलाने का निर्णय लिया। यही निर्णय उनके जीवन की दिशा तय करने वाला सिद्ध हुआ।

उन्होंने बहुत कम आयु में नृत्य की शिक्षा आरंभ कर दी थी। उन्हें भारत के प्रसिद्ध गुरुओं से प्रशिक्षण प्राप्त हुआ। उन्होंने भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी जैसे शास्त्रीय नृत्य रूपों में गहन साधना की। कठोर अभ्यास, अनुशासन और गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण उनके प्रशिक्षण की विशेषता रही। वे घंटों अभ्यास करती थीं और नृत्य की सूक्ष्म से सूक्ष्म बारीकियों को आत्मसात करती थीं।

यामिनी कृष्णमूर्ति ने जब मंच पर पहली बार प्रस्तुति दी, तभी यह स्पष्ट हो गया था कि वे साधारण नृत्यांगना नहीं हैं। उनकी देह की भंगिमाएं, नेत्रों की भाषा, मुद्राओं की शुद्धता और भावों की गहराई दर्शकों को गहराई से प्रभावित करती थी। उनके नृत्य में सौंदर्य के साथ-साथ गंभीरता और आध्यात्मिक भाव भी स्पष्ट रूप से झलकता था।

उन्होंने भरतनाट्यम नृत्य शैली को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनकी प्रस्तुति में शास्त्रीय मर्यादा का पूर्ण पालन होता था, साथ ही उसमें नवीनता और सजीवता भी दिखाई देती थी। उन्होंने कुचिपुड़ी नृत्य को भी विशेष पहचान दिलाई। इन दोनों नृत्य शैलियों में उनकी समान दक्षता उन्हें अन्य कलाकारों से अलग बनाती है।

यामिनी कृष्णमूर्ति ने भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी भारतीय शास्त्रीय नृत्य का व्यापक प्रचार किया। उन्होंने अनेक देशों में मंच प्रस्तुतियां दीं और भारतीय संस्कृति की गरिमा को विश्व के सामने प्रस्तुत किया। उनकी नृत्य प्रस्तुतियों ने विदेशी दर्शकों को भारतीय दर्शन, परंपरा और सौंदर्यबोध से परिचित कराया। वे सांस्कृतिक दूत के रूप में भारत का गौरव बनीं।

उनके योगदान के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया गया। ये सम्मान न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों का प्रतीक हैं, बल्कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य की प्रतिष्ठा को भी दर्शाते हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें कई सांस्कृतिक संस्थानों और सभाओं द्वारा भी सम्मान प्रदान किया गया।

यामिनी कृष्णमूर्ति केवल एक महान नृत्यांगना ही नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ गुरु भी थीं। उन्होंने अपने ज्ञान और अनुभव को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए नृत्य प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना की। उनके शिष्य आज देश और विदेश में भारतीय शास्त्रीय नृत्य का प्रचार कर रहे हैं। गुरु और शिष्य परंपरा को उन्होंने पूरी निष्ठा और आदर के साथ निभाया।

निजी जीवन में यामिनी कृष्णमूर्ति अत्यंत अनुशासित और सरल स्वभाव की थीं। उनका जीवन कला और साधना को समर्पित था। वे मानती थीं कि नृत्य केवल मंच प्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्मा की अभिव्यक्ति है। इसी विचारधारा ने उन्हें जीवनभर प्रेरित किया। उन्होंने कभी भी कला से समझौता नहीं किया और शुद्धता को सर्वोच्च स्थान दिया।

अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक वे नृत्य और कला से सक्रिय रूप से जुड़ी रहीं। वे विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों, संगोष्ठियों और कार्यशालाओं में भाग लेती थीं और युवाओं को मार्गदर्शन देती थीं। उनका व्यक्तित्व प्रेरणास्रोत था और उनकी उपस्थिति मात्र से ही वातावरण में गरिमा का संचार हो जाता था।

यामिनी कृष्णमूर्ति का निधन तीस अगस्त दो हजार चौबीस को हुआ। उनके निधन से भारतीय कला जगत को अपूरणीय क्षति पहुंची। हालांकि वे शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं रहीं, लेकिन उनकी कला, शिक्षाएं और योगदान सदैव जीवित रहेंगे। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अमर स्रोत हैं।

समग्र रूप से यामिनी कृष्णमूर्ति भारतीय शास्त्रीय नृत्य की एक उज्ज्वल ज्योति थीं। उनका जीवन परिचय समर्पण, साधना और सांस्कृतिक गौरव की कहानी है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्ची कला समय और सीमाओं से परे होती है। भारतीय नृत्य परंपरा में उनका स्थान सदैव सर्वोच्च रहेगा और उनका नाम श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता रहेगा।



भारतीय सिनेमा की प्रसिद्ध अभिनेत्री नलिनी जयवंत : जीवन और कृतित्व

 भारतीय सिनेमा की प्रसिद्ध अभिनेत्री नलिनी जयवंत : जीवन और कृतित्व

भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम युग में जिन अभिनेत्रियों ने अपनी सशक्त अभिनय प्रतिभा, गरिमामय व्यक्तित्व और सजीव अभिव्यक्ति से दर्शकों के मन पर अमिट छाप छोड़ी, उनमें नलिनी जयवंत का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपने अभिनय से न केवल नायिका की पारंपरिक छवि को सुदृढ़ किया, बल्कि संवेदनशील और सशक्त स्त्री पात्रों को भी नई पहचान दी। उनका जीवन संघर्ष, साधना और सिनेमा के प्रति समर्पण का अनुपम उदाहरण है।

नलिनी जयवंत का जन्म चौदह फरवरी उन्नीस सौ छब्बीस को मुंबई में हुआ। उनका परिवार शिक्षित और सांस्कृतिक मूल्यों से परिपूर्ण था। बचपन से ही उनमें कला के प्रति विशेष रुचि दिखाई देती थी। संगीत, नृत्य और अभिनय की ओर उनका झुकाव स्वाभाविक था। परिवार ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई में ही हुई, जहां उन्होंने अध्ययन के साथ-साथ रंगमंच और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी की।

फिल्मी दुनिया में उनका प्रवेश किशोरावस्था में ही हो गया था। आरंभिक दौर में उन्हें छोटे और सहायक भूमिकाएं मिलीं, किंतु उनकी सहज अभिनय शैली और प्रभावशाली उपस्थिति ने शीघ्र ही फिल्म निर्माताओं का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने जिस भी भूमिका को निभाया, उसमें स्वाभाविकता और गहराई स्पष्ट दिखाई देती थी। धीरे-धीरे वे मुख्य नायिका के रूप में स्थापित होने लगीं।

नलिनी जयवंत का अभिनय सौंदर्य केवल बाहरी आकर्षण तक सीमित नहीं था। उनकी आंखों की अभिव्यक्ति, संवाद अदायगी और भावनात्मक संतुलन उन्हें अन्य अभिनेत्रियों से अलग पहचान देता था। वे दुख, प्रेम, संघर्ष और आत्मसम्मान जैसे भावों को अत्यंत सजीव ढंग से प्रस्तुत करती थीं। यही कारण था कि दर्शक उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ जाते थे।

उनके फिल्मी जीवन की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में सामाजिक और पारिवारिक कथानक वाली रचनाएं शामिल रहीं। उन्होंने कई ऐसे पात्र निभाए जो उस समय की सामाजिक परिस्थितियों, स्त्री की पीड़ा और उसके आत्मसम्मान को उजागर करते थे। उनकी भूमिकाओं में एक गरिमा और गंभीरता रहती थी, जो दर्शकों को सोचने पर विवश कर देती थी। वे केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं थीं, बल्कि समाज का आईना भी प्रस्तुत करती थीं।

नलिनी जयवंत ने अपने अभिनय करियर में अनेक प्रसिद्ध कलाकारों के साथ काम किया। उनके सह कलाकारों के साथ उनकी जोड़ी को दर्शकों ने खूब सराहा। पर्दे पर उनकी उपस्थिति संतुलित और प्रभावशाली रहती थी। वे कभी भी अपने अभिनय को अतिरंजित नहीं करती थीं, बल्कि सहजता के साथ पात्र में ढल जाती थीं। यही विशेषता उन्हें एक सशक्त अभिनेत्री के रूप में स्थापित करती है।

उनके अभिनय की सराहना आलोचकों द्वारा भी की गई। उन्हें कई बार प्रशंसा और सम्मान प्राप्त हुए। उनकी फिल्मों को न केवल व्यावसायिक सफलता मिली, बल्कि कलात्मक दृष्टि से भी उन्हें महत्वपूर्ण माना गया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सिनेमा में सफलता के लिए केवल बाहरी सौंदर्य नहीं, बल्कि गहन अभिनय क्षमता और अनुशासन भी आवश्यक है।

निजी जीवन में नलिनी जयवंत अत्यंत सादगीपूर्ण और आत्मसम्मान से परिपूर्ण महिला थीं। उन्होंने फिल्मी चकाचौंध से दूर रहकर एक संतुलित जीवन जीना पसंद किया। अभिनय के साथ-साथ वे साहित्य और संगीत में भी रुचि रखती थीं। उनका जीवन अनुशासन और आत्मनियंत्रण का उदाहरण था। उन्होंने कभी भी अनावश्यक विवादों या प्रचार से स्वयं को नहीं जोड़ा।

अपने करियर के उत्कर्ष काल में भी उन्होंने सीमित फिल्मों में काम किया। वे केवल वही भूमिकाएं स्वीकार करती थीं जिनमें उन्हें सार्थकता दिखाई देती थी। इस चयनशीलता के कारण उनका फिल्मी जीवन अपेक्षाकृत संक्षिप्त रहा, किंतु अत्यंत प्रभावशाली रहा। उनकी प्रत्येक भूमिका दर्शकों के मन में स्थायी स्मृति बनकर रह गई।

समय के साथ उन्होंने सिनेमा से दूरी बना ली और शांत जीवन को अपनाया। यह निर्णय उनके आत्मसम्मान और स्वाभाविक प्रवृत्ति को दर्शाता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि कलाकार का मूल्य उसके कार्य से होता है, न कि निरंतर परदे पर बने रहने से। उनके द्वारा निभाए गए पात्र आज भी सिनेमा प्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

नलिनी जयवंत का निधन बीस दिसंबर उन्नीस सौ छानवे को हुआ। उनके निधन से भारतीय सिनेमा ने एक संवेदनशील और सशक्त अभिनेत्री को खो दिया। हालांकि वे आज हमारे बीच नहीं हैं, परंतु उनका अभिनय, उनकी फिल्में और उनकी गरिमामय छवि आज भी जीवित है। वे उन अभिनेत्रियों में शामिल हैं जिन्होंने सिनेमा को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।

समग्र रूप से देखा जाए तो नलिनी जयवंत भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं। उनका जीवन परिचय संघर्ष, साधना और आत्मसम्मान की कहानी है। उन्होंने अपने अभिनय से यह प्रमाणित किया कि सच्ची कला समय की सीमाओं से परे होती है। आज भी जब उनके अभिनय को स्मरण किया जाता है, तो उनके व्यक्तित्व की गरिमा और कला की ऊंचाई स्पष्ट रूप से अनुभव की जा सकती ।

चौदह बरस की हीरोइन
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हिन्दी सिनेमा के शुरुआती दौर के निर्माता-निदेशकों में से एक थे- चमनलाल देसाई। वीरेन्द्र देसाई इन्हीं चमनलाल देसाई के पुत्र थे। उनकी एक कंपनी थी 'नेशनल स्टूडियोज़'। एक दिन दोनों पिता-पुत्र फ़िल्म देखने सिनेमाघर पहुँचे। शो के दौरान दोनों की नज़र एक लड़की पर पड़ी, जो तमाम भीड़ में भी अपनी दमक बिखेर रही थी। यह नलिनी जयवंत थीं, जिनकी आयु उस समय बमुश्किल 13-14 बरस की ही थी। दोनों पिता-पुत्र की जोड़ी ने दिल ही दिल में इस लड़की को अपनी अगली फ़िल्म की हीरोइन चुन लिया और ख़्यालों में खो गए। फ़िल्म कब ख़त्म हो गई और कब वह लड़की अपने परिवार के साथ ग़ायब हो गई, इसकी ख़बर तक दोनों को न हुई।
एक दिन वीरेन्द्र देसाई अभिनेत्री शोभना समर्थ से मिलने उनके घर पहुँचे तो देखा कि नलिनी वहाँ मौजूद थीं। नलिनी को देखते ही उनकी आँखों में चमक आ गई और बाछें खिल गईं। असल में शोभना समर्थ, जिन्हें बाद में अभिनेत्री नूतन और तनूजा की माँ और काजोल की नानी के रूप में अधिक जाना गया, नलिनी जयवंत के मामा की बेटी थीं। इस बार वीरेन्द्र देसाई ने बिना देर किए नलिनी के सामने फ़िल्म का प्रस्ताव रख दिया। नलिनी के लिए तो यह मन माँगी मुराद पूरी होने जैसा था। डर था तो सिर्फ पिता का, जो फ़िल्मों के सख्त विरोधी थे। लेकिन वीरेन्द्र देसाई ने उन्हें मना लिया। इस मानने के पीछे एक बड़ा कारण था पैसा। उस समय जयवंत परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ ठीक नहीं थी। रहने के लिए भी उन्हें अपने एक रिश्तेदार के छोटे-से मकान में आश्रय मिला हुआ था। इस प्रकार नलिनी जयवंत की पहली फ़िल्म थी 'राधिका', जो 1941 में प्रदर्शित हुई। वीरेन्द्र देसाई के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म के अन्य कलाकार थे- हरीश, ज्योति, कन्हैयालाल, भुड़ो आडवानी आदि। फ़िल्म में संगीत अशोक घोष का था। इस फ़िल्म के दस में से सात गीतों में नलिनी जयवंत की आवाज़ थी।
बीस दिसम्बर 2010 को इस बॉलीवुड फिल्म अभिनेत्री की चेम्बूर, मुम्बई में मृत्यु हुई।
रजनीकांत शुक्ला



Wednesday, December 17, 2025

वीआईपी दर्शन पर सुप्रिम आदेश, निर्णय केंद्र करे

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अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मंदिरों में 'वीआईपी दर्शन' सुविधा को चुनौती देने वाली याचिका भले ही खारिज कर दी, किंतु इस याचिका पर कोर्ट द्वारा कही गई बातों की गूंज दूर तक जाएगी। यह  गूंज केंद्र सरकार को  विवश करेगी कि वह मंदिरों में हाने वाले वीवीआईपी  दर्शन पर  रोक लगाने वाला निर्णय लें ।  कार्ट की ये गूंज  आने वाले समय  में मंदिरों के वीवीआईपी दर्शन कर रोक लगाने का रास्ता प्रशस्त करेगी।

मुख्य न्यायाधीश  संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि यह एक नीतिगत मामला है इस पर केंद्र सरकार को विचार करना होगा। बेंच ने यह भी कहा कि वीआईपी के लिए ऐसा विशेष व्यवहार मनमाना है। यह याचिका मंदिरों की तरफ से वसूले जाने वाले वीआईपी दर्शन शुल्क को समाप्त करने की मांग कर रही थी। मुख्य न्यायाधीश  ने कहा कि बेंच इस मुद्दे से सहमत है, लेकिन अनुच्छेद 32 के तहत निर्देश जारी नहीं कर सकती। उन्होंने कहा, 'हालांकि हमारी राय है कि मंदिरों में प्रवेश के संबंध में कोई विशेष व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन हमें नहीं लगता कि यह अनुच्छेद 32 के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने का उपयुक्त मामला है।' यह आदेश में दर्ज किया गया लेकिन मामला सरकार के विचार के लिए छोड़ दिया गया।मुख्य न्यायधीश खन्ना ने कहा कि यह मामला कानून-व्यवस्था का प्रतीत होता है और याचिका इस पहलू पर होनी चाहिए थी। बेंच ने कहा, 'हम स्पष्ट करते हैं कि याचिका खारिज होने से संबंधित अधिकारियों को जरूरत के हिसाब से कार्रवाई करने से नहीं रोका जाएगा।

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, 'आज 12 ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ इस प्रैक्टिस को फॉलो करते हैं। ये मनमाना और भेदभाव वाला है। यहां तक कि गृह मंत्रालय ने भी आंध्र प्रदेश से इसकी समीक्षा करने को कहा है। चूंकि, भारत में 60 प्रतिशत पर्यटन धार्मिक है, इसलिए ये भगदड़ की प्रमुख वजह भी है।' सुप्रीम कोर्ट में ये याचिका विजय किशोर गोस्वामी ने डाली थी। उन्होंने मंदिरों में अतिरिक्त शुल्क लेकर 'वीआईपी दर्शन' के चलन को आर्टिकल 14 के तहत समानता के अधिकार और आर्टिकल 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया। उन्होंने दलील दी कि जो लोग इस तरह का शुल्क अदा करने में असमर्थ हैं, ये उनके खिलाफ भेदभाव है। याचिका में जोर देकर कहा गया था कि कई मंदिर 400 से 500 रुपये में लोगों के लिए विशेष दर्शन की व्यवस्था करते हैं। इससे आम श्रद्धालु और खासकर महिलाएं, स्पेशली एबल्ड लोग और सीनियर सिटिजंस को दर्शन में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यह मामला देश भर के मंदिरों में आम लोगों और वीआईपी के बीच भेदभाव के मुद्दे को उठाता है। वीआईपी दर्शन की सुविधा से आम लोगों को लंबी कतारों में इंतजार करना पड़ता है, जबकि वीआईपी आसानी से दर्शन कर लेते हैं।

ये एकजगह नही है,श्रृद्धालू को इस समस्या से सभी  जगह रूबरू होना पड़ता है।  जगह –जगह मंदिरों में इस समस्या का सामना करना पड़ा है। लगभग  40 साल पहले हम कोलकत्ता  गए। कालिका जी मंदिर में हम श्रृद्धालुओं की लाइन में लगे थे कि  हमारे एक साथी ने देखा  और हमें इशारा कर अपने पास बुला लिया। यहां पुजारी पांच रूपया प्रति व्यक्ति लेकर सीधे दर्शन करा  रहे थे। अभी  वेट द्वारिका जाना   हुआ। हम परिवार के छह सदस्य थे। एक पंडित जी ने हमसे पांच सौ रूपये लिए।अलग लाइन से हमें आराम से दर्शन कराए। भीड़− भाड़ भी बची।वैसे दर्शन में दो से तीन घंटे लगते  पांच सौ रूपये में आधा घंटा में दर्शन कर मंदिर से बाहर आ गए। करीब दस साल पहले हम गुजरात में अम्बा जी गए थे। दर्शन की लाइन में  लगे थे कि कर्मचारियों ने यह कह कर हमके रोक दिया कि दर्शन का समय समाप्त हो गया, जबकि कुछ अन्य को लगातार प्रदेश  दिया जा रहा। किसी तरह  हम अन्यों  वाली पंक्ति में शामिल हुए। तब दर्शन हुए। दर्शन भी  बड़े  आराम से हुए। काफी समय हम मंदिर में रूके , जबकि ऐसा  पहले संभव नही था। इस तरह का भेदभाव हमें कई जगह देखने को  मिला। उज्जैन में तो  आप  पंडित को पांच  सौ के आसपास रूपये दीजिए।वह मंदिर के गर्भ गृह में ले जाकर पूजन अर्चन कराते हैं। जो ये रकम नही देते वे गर्भगृह के बाहर ही दूर से दर्शन कर तृप्त  हो जाते हैं।ओंकारेश्वर में तो पंडित जी पूजा भी आराम से और श्रद्धालुओं की पंक्ति से अलग लेकर कराते हैं। मथुरा  जी के बांके बिहारी मंदिर में सुपरिम आदेश   से  यह व्यवस्था रूकी है, अन्यथा लगभग सभी मंदिरों की हालत ऐसी ही है।      

सुपरिम कोर्ट ने याचिका तो खारिज कर दी, किंतु इस  वीआईपी दर्शन पर रोक वाली गेंद केंद्र सरकार के पाले में यह कह कर डाल दी । बेंच ने कहाकि बेंच इस मुद्दे से सहमत है, लेकिन अनुच्छेद 32 के तहत निर्देश जारी नहीं कर सकती। मुख्य न्यायाधीश  संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि यह एक नीतिगत मामला है इस पर केंद्र सरकार को विचार करना होगा। बेंच ने यह भी कहा कि वीआईपी के लिए ऐसा विशेष व्यवहार मनमाना है।

सुपरिम कोर्ट का  यह  निर्देश  अब केंद्र सरकार को विवश करेगा कि मंदिरों में आम आदमी के साथ हो रहे भेदभाव को रोके और बांके बिहारी मंदिर की तरह पैसा लेकर कराए जा रहे वीआईपी दर्शन  की व्यवस्था  खत्म  करे। व्यवस्था  अयोध्या  जी के श्रीराम मंदिर जैसी हो, जहां श्रद्धालू बिना भेदभाव आराम से 25−30 मिनट में दर्शन कर बाहर आ सके।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)