Tuesday, October 6, 2026

भाषा कोई भी हो , दवा सस्ती मिले,सही मिले


अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

 उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने प्रदेश के चिकित्सकों से आग्रह किया है कि वे मरीजों के परामर्श-पर्चे पर दवाओं के नाम हिंदी अथवा देवनागरी लिपि में भी लिखें, ताकि मरीज आसानी से समझ सकें कि उन्हें कौन-सी दवा दी गई है। अपने पत्र के माध्यम से उन्होंने कहा कि मरीजों की सुविधा और उनके विश्वास को ध्यान में रखते हुए हिंदी में लिखी दवाओं को प्राथमिकता  दी जाए। ब्रजेश पाठक ने कहा कि लोकतंत्र लोकभाषा और जनभाषा के माध्यम से ही अधिक मजबूत होता है। चिकित्सक यदि मरीजों से उनकी मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा जैसे भोजपुरी, अवधी, ब्रजभाषा आदि में संवाद करेंगे, तो मरीज अपनी समस्या और चिकित्सकीय सलाह को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। इससे चिकित्सक और मरीज के बीच विश्वास भी और मजबूत होगा। उपमुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी विदेशों में भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिंदी के माध्यम से संवाद कर देश की भाषाई पहचान को मजबूत कर रहे हैं। उन्होंने चिकित्सकों से आह्वान किया कि वे मरीजों की सुविधा के लिए चिकित्सा संवाद को अधिक से अधिक सरल और स्थानीय भाषा में बनाएं। राष्ट्रनायकों की अभिलाषा, चले देश में देशज भाषा के भाव के साथ उप मुख्यमंत्री पाठक ने चिकित्सकों से इस पहल को जनसेवा का हिस्सा बनाने का आग्रह किया। उनका आदेश बहुत अच्छा है, किंतु इस आदेश से ज्यादा जरूरी है कि मरीजों को  गुणवत्ता वाली दवा सस्ती मिलें। उपचार सस्ता हो।  हिंदी में लिखने से ज्यादा जरूरी और महत्वपूर्ण है कि दवाएं सस्ती और गुणवत्ता पूर्ण  हों।  

आज बीमार की सबसे  बडी समस्या  मंहगी दवा है। महंगी होने पर भी कोई  गारंटी नही कि वह असली ही होगी।  हाल में कुत्ते के काटे पर लगने वाला रेबीज का टीके   की नकली खेप पकड़ी गई। हार्ट और कैंसर की दवाएं भी नकली पकड़ी  जाती  रही हैं। कुत्ते के काटने से रेबीज नामक बीमारी होने का  खतरा रहता है। इस बीमारी का पूरी दुनिया में कोई इलाज नहीं। हार्ट और कैंसर की नकली दवा तो मरीज के सीधे मौत के मुंह में धकेल रही हैं। एक बात और आज बाजार में लोकल कंपनी की मंहगी दवा भरी हैं। मैडिकल स्टोर वाह− वाही  लूटने के लिए खरीदार को दस प्रतिशत  से 20 प्रतिशत तक कमीशन देते हैं किंतु दवा तो  ज्यादा कमीशन के चक्कर में लोकल कंपनी की बेच रहे हैं। ब्रांडेड दवाएं तो   एक तरह से मार्केट से लगभग गायब होती जा रही हैं। मेरे घुटने के बदलने के दौरान में मुझे 886 रूपये की छह एंटी बायोटिक गोली अस्पताल के मैडिकल स्टोर से दी गईं,  जबकि सिपला की इसी दवा की दस गोली 113 रूपये की हैं।  दो साल पहले मेरी बाई पास सर्जरी हुई।  आपरेशन के दौरान तीन टाकें पक गए। इनके लिए सुबह –शाम एंटीबायोटिक इंजेक्शन लगते । अस्पताल से ये एक इंजेक्शन 1550 रूपये का मिलता।  होलसेल मार्केंट में इस  इंजेक्शन की कीमत तीन सौ रूपये थी1 अस्पताल में बाहर से खरीदा इंजेक्शन नही लगता था। इसीलिए हमें 1550 का इंजेक्शन खरीदना पड़ता। हालत यह है कि अब अस्पताल अपनी मर्जी से दवा  पर कीमत डलवाते  हैं। मरीज फंस गया चाहिए, फिर तो उसे लुटना ही लुटना  है।  ये ही हाल बीमारी के टैस्ट का है। मंत्री महोदय  दवा और रोगों के टैस्ट सस्ते कराने पर काम करना  होगा। सभी टैस्ट के समान रेट हों। अस्पताल या  नंर्सिम होम चलाने की अनुमति के साथ  अस्पताल से अनुबंध  किया जाए कि वह जनऔषधि की दवा बेचेंगे या ब्रांडेड कंपनी की।  इसके अतिरिक्त किसी लोकल कंपनी की दवा किसी कीमत पर नही बेची जाएगी।  

टैस्ट और दवा के नाम पर्चे पर हिंदी में लिखने की जगह जरूरी है कि मरीज को गुणवत्ता पूर्ण और सस्ती दवा मिलें। दवा की आनलाइन बिक्री शुरू हुई है, किंतु उस पर भी अधोमानक और नकली दवा मिलने की शिकायत आ रही हैं।

कैंसर की दवाओं और अन्य औषधियों की कीमतों में भारी मुनाफावसूली को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि दवाओं की एमआरपी (न्यूनतम खुदरा मूल्य), खुदरा मूल्य (रिटेल प्राइस)  पर अधिकतम 16 प्रतिशत तक सीमित होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। इसमें दवाओं की कीमतों का नियमन करने, जेनरिक दवाओं के इस्तेमाल और मेडिकल उपकरणों को ड्रग्स मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीओ) कानून, 2023 को लेकर चिंता जताई गई है।


जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कीमतों को रिटेल प्राइस के 16 प्रतिशत तक ही सीमित करने का सुझाव दिया। जस्टिस मेहता ने कहा कि कैंसर की एक दवा का खुदरा मूल्य तीन हजार रुपये है, लेकिन उसी दवा की एमआरपी 27 हजार रुपये है। उन्होंने कहा कि यह बहुत बड़ा अंतर है। सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं पर मुनाफाखोरी को लेकर गहरी चिंता जाहिर की। 

सुप्रीम कोर्ट ने डीपीसीओ के तहत जरूरी और गैर जरूरी दवाओं को लेकर भी सवाल उठाए। याचिका में कहा गया कि कॉरपोरेट अस्पताल अक्सर सरकारी योजनाओं के तहत इलाज कराने वाले मरीजों को इन-हाउस फार्मेसी से दवाएं खरीदने के लिए कहते हैं और ऊंची कीमत पर दवाएं खरीदने का बोझ अक्सर गरीब परिवारों पर पड़ता है, जो उन्हें अपनी जेब से चुकाना होता है।

केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस मुद्दे पर संतुलित रास्ता निकाला जाएगा। तुषार मेहता ने कहा कि मैं ये नहीं कह रहा कि याचिकाकर्ता सही या गलत हैं, लेकिन बीच का रास्ता निकालना होगा। जहां तक मेरी जानकारी है कि फार्मा कंपनियों को इससे फायदा नहीं हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट अब 12 अक्तूबर को इस मामले पर सुनवाई करेगा। 

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की दवाओं पर भारी मुनाफाखोरी को दिनदहाड़े डकैती करार दिया था। पीठ ने कहा था 'यह बिल्कुल चौंकाने वाली बात है कि जरूरी कैंसर की दवा का एमआरपी 27,000 रुपये है, जबकि रिटेलर को यह 2,700 रुपये में दी जा रही है। रिटेलर को दी जाने वाली कीमत से एमआरपी 10 गुना है।' कोर्ट ने कहा कि अगर यह जबरन वसूली नहीं है तो और क्या है?

एक बात और आप प्रदेश सरकार के अपने अस्पताल देखिए।  लखनऊ  स्तर से खरीदकर अस्पतालों को भेजी जाने वाली दवा स्थानीय कंपनियों की होती हैं। ये कंपनी कमीशन देती हैं तो एक्सपायर डेट के नजदीक वाली दवाई भेजती हैं। खरीदने  वाले अधिकारी अस्पताल  को आदेश करते हैं कि इन्हें जल्दी  बांटकर खत्म करिए। इसे रोकिए। सरकार के अस्पताल में मल्टी नेशनल कंपनी या सरकारी जन औषधि निर्मित  दवा के वितरण की व्यवस्था कराइये।  एक बात और प्राइवेट अस्पतालों में भर्ती  मरीज से कमरे का  प्रतिदिन का तो ऊंचा रेट लिया  ही जाता  है। स्टाफ  और डाक्टर की प्रत्येक विजिट का  अलग से वसूला  जाता है।   आज जरूरत  है कि उपचार के नाम पर होने वाली इस डकैती को रोका  जाए।


  −अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

Monday, September 21, 2026

सभी तो प्रधानमंत्री के सहपाठी नही हो सकते

 

अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार  

पीएम नरेंद्र मोदी से एक मुलाकात के बाद उनके स्कूल फ्रेंड असगर अली वोरा की वर्षों पुरानी समस्या खत्म हो गई। मीरा भायंदर की जमीन पर अपने हक के लिए वह कई साल से अफसरों और विभागों के चक्कर काट रहे थे। असगर अली वोरा ने एक सप्ताह पहले पीएम मोदी से मुलाकात की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि भायंदर में उनकी जमीन पर बीजेपी विधायक नरेंद्र मेहता की कंस्ट्रक्शन कंपनी ने कब्जा कर लिया है। मुलाकात के सात दिनों के भीतर उनकी प्रॉब्लम खत्म हो गई। मंगलवार को बीजेपी विधायक ने बताया कि वह विवादित जमीन का कब्जा छोड़ रहे हैं और उस प्लॉट के लिए मिली कंस्ट्रक्शन की मंजूरी भी सरेंडर कर रहे हैं। नरेंद्र मेहता ने असगर अली वोरा के खिलाफ़ पहले की गई अपनी शिकायत वापस ले ली । 81 साल के असगर अली वोरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचपन के मित्र हैं। उन्होंने वोरा ने गुजरात के वडनगर के बी एन स्कूल में मोदी के साथ पढ़ाई की थी। उन्होंने आठ सितंबर को प्रधानमंत्री से मुलाकात की और अपनी जमीन पर कब्जे के बारे में बताया था। उन्होंने इस विवाद में पीएम मोदी से दख्ल देने की अपील की। वोरा ने बताया कि उन्होंने 1989 में भायंदर ईस्ट के नवघर में लगभग 2810 स्क्वायर मीटर जमीन खरीदी थी। 2011 में इस प्लॉट पर स्वयं बिल्डर्स और मेहता की सेवन इलेवन कंस्ट्रक्शन्स ने कब्जा कर लिया। वोरा ने कहा कि वह लगभग 15 सालों से अलग-अलग सरकारी अधिकारियों के पास यह मामला उठा रहे थे, किसी ने नहीं सुनी।

वोरा और प्रधानमंत्री  मोदी के बचपन के स्कूलमेट हैं। वे प्रधानमंत्री मोदी तक पहुंच गए। प्रधानमंत्री के साथ  उनका  फोटो  और खबर आने के बाद भाजपा विधायक समझ गए और पीछे हट गए। देश के प्रत्येक आदमी की पहुंच तो प्रधानमत्री तक नही। प्रत्येक व्यक्ति तो प्रधानमंत्री का मित्र और सहपाठी नही। वह अपनी समस्या को लेकर कहां जाए।

 उत्तर प्रदेश के शामली जिले के चौसाना गांव के रहने वाले और पूर्व शिक्षक मास्टर विजय सिंह  गांव की लगभग चार हजार  बीघा सार्वजनिक कृषि भूमि को भू-माफियाओं के चंगुल से मुक्त कराने और उसे भूमिहीनों या सार्वजनिक उपयोग में लाने की मांग को लेकर तीस से ज्यादा साल से आंदोलनरत है। जांच में  उनकी शिकायत मिलने पर भी अभी तक भूमि से कब्जे नही हटे। मास्टर विजय सिंह  ने 26 फरवरी 1996 को मुजफ्फरनगर जिलाधिकारी कार्यालय के सामने यह धरना शुरू किया था। इसके बाद यह धरना मुजफ्फरनगर के शिव चौक व कलेक्ट्रेट परिसर में निरंतर जारी है। इस लड़ाई के लिए उन्होंने अपनी सरकारी शिक्षक की नौकरी तक छोड़ दी और गांधीवादी रास्ते पर चलते हुए पिछले तीन दशकों से लगातार धरना दे रहे हैं। उनके इस अड़ियल और लंबे संघर्ष को 'लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स', 'इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स', 'एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स' और विश्व स्तर की कई अन्य रिकॉर्ड संस्थाओं द्वारा मान्यता दी गई है। प्रशासनिक जांचों में उनके आरोप सही पाए जाने और कई सरकारें व मुख्यमंत्री बदलने के बावजूद ज़मीन पर ठोस कार्रवाई और न्याय मिलने का इंतज़ार आज भी बना हुआ है, और उनका यह अनवरत सत्याग्रह जारी है। यही नही  नदियों के कछार की जमीन तो भूमाफियाओं के कब्जे में रहती है।  गरीब किसान अधिकारियों के दरबार में शिकायत करता थक जाता है, किंतु कहीं कोई  सुनवाई नही होती। फिल्म पानसिंह तोमर भी ऐसी ही एक घटना पर बनी है। फौजी को कब्जा  हुई  जमीन पर सब जगह शिकायत  करने पर भी न्याय नही मिलता। मजबूरी में एक दिन यह बंदूक उठाकर चंबल के  कछार में उतर जाता है। ऐसे ही एक उत्पीड़न के शिकार बीएसएफ के एक हवलदार लगभग बीस साल पहले मुझे मिले। उत्तेजित थे । बोले− जी करता है कि बंदूक लेकर एक दिन सारे दुश्मनों को मार दूं। उन्हें समझाया ।  उनकी शिकायत  छापी ।  अधिकरियों से कहा। किंतु थाने वाले उसका मजाक उड़ाते ।  कहते कैसा फौजी है। अपनी जमीन पर ही कब्जा  नही ले पा रहा। चलता रहा। कब्जा फिर भी नही मिला। अब नौकरी छोड़  कार्ट – कचहरी के चक्कर काट रहे हैं । बिजनौर जिले की ग्राम शाहलीपुर जमान की दीपू  शर्मा तो रोज  अपनी जमीन  पर माफियाओं के कब्जे की वीडियों फेसबुक पोस्ट कर अधिकारियों से अपील करती रहती है, किंतु कोई सुनवाई नही हो रही। 

महाराष्ट्र के नासिक जिले स्थित निफाड़ कस्बे से एक हैरान करने वाला मामला सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा हैं। क्षेत्र में बढ़ रहे आवारा कुत्तों के आतंक और काटने की घटनाओं से स्थानीय नागरिक काफी समय से परेशान थे। बार-बार शिकायत देने के बाद भी जब प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो शिवसेना (यूबीटी) की युवा सेना के कार्यकर्ताओं ने विरोध जताने का यह अजीबोगरीब रास्ता चुना। कार्यकर्ता बोरियों में चार से पांच आवारा कुत्तों के पिल्लों को भरकर सीधे निफाड़ नगर पंचायत के मुख्याधिकारी के दफ्तर में ले गए और उनकी टेबल पर छोड़ दिया। टेबल पर कुत्तों के घूमने और अधिकारियों के सामने हुए इस ड्रामे के दौरान प्रशासन पर तंज कसते हुए अधिकारी को नोटों का हार पहनाने की भी कोशिश की गई।

  सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर ) और विभिन्न न्यायिक अध्ययनों के अनुसार, भारत की अदालतों में लंबित कुल दीवानी (सिविल ) मुकदमों में से लगभग 60 से 66  प्रतिशत  मामले केवल जमीन और संपत्ति विवादों से जुड़े हैं।  देश की निचली और उच्च अदालतों में जमीन व संपत्ति से जुड़े पांच करोड़  से अधिक मुकदमे लंबित हैं। इनमें एक बड़ा हिस्सा अवैध कब्जे, जाली दस्तावेजों  और भू-माफिया द्वारा हड़पी गई जमीनों का है।

ये आंकड़े  बताते है कि सभी पीडित तो  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सहपाठी नही हो सकते।  अंग्रेजों के समय की बनी व्यवस्था में पुलिस और  प्रशासनिक अधिकारियों को जनता पर नियंत्रण के लिए बनाया था। उनका तानाशाही  व्यवहार आज भी   नही बदला। अधिकारियों को हम जन सेवक नही बना पाए। इसलिए परेशान जनता  कोर्ट और कचहरी के चक्कर लगा रही है।    

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

Friday, September 18, 2026

कमाल, एक छोटे से गांव में एम डी डाक्टर



चिकित्सा जगत में बड़ा नाम है डा आर पी त्यागी

अशोक मधुप

बिजनौर,प्रत्येक छोटा मोटा डाक्टर शहर में जाकर निंसग होम बना कर धन कमाने में लग जाता है किंतु जनपद में एक चिकित्सक ऐसें भी हैं,जो एम डी होने ke बाद भी एक छोटे से गांव में चिकित्सा सुविधा देने में लगे हैँ और वह भी तब से जब एमडी खोजे भी नही मिलते थे।

जनपद े चिकित्सा जगत में डा राम प्रसाद त्यागी जाना माना नाम है। उनकी सरलता े सब प्रशंसक है। दूर दूर तक हृदय रोग विशेषज्ञ े रूप में उनकी ख्याति है। ग्राम रतनगढ़ े रहने वाले डा त्यागी ने 1985 में एम डी किया। 86 में दिल्ली े दीनदयाल होस्पिटल हरिनगर में सीनियर रेसिडेंट हुए। यहीं कार्य करने े दौरान शनिवार की शाम को अपने पैत्रक गांव रतनगढ़ आ जाते और अपने गांव में रविवार को मरीज देखते। धीरे धीरे गांव े प्यार ने जोर मारा और अपने गांव में आकर पे्रिक्टस शुरू कर दी। 86 में इस गांव की आबादी दो हजार े आसपास रही होगी।

आज डा त्यागी का दूर दूर तक बड़ा नाम है । सबेरे वे मरीज देखना शुरू करते हैं और देर शाम तक उनका कार्य जारी रहता है। आसपास के ही नहीं दूर-दूर े मरीज भी उने पास उपचार को आते हैं। इसीजी और एक्सरे की सुविधा उने पास है। गंभीर मरीजों े रूकने का भी प्रबंध है। वे बताते हैं कि उन्होंने सन 86 में जब गांव में मरीज देखना शुारू किया था तो पांच रूपया फीस लेते थे। वे कहते हैं कि एक लड़का एक दिन आकर बोला सर मै मैडिकल स्टोर खोल लू ंऔर उन्होंने हां कर दी। बिजनौर े पास े एक युवक ने कहा कि वे रक्त आदि े नमूने टैस्ट े लिए बिजनौर ले जाने का काम करना चाहतें हैं। डाक्टर त्यागी कहते हैं कि मैने उनसे कहा कि वह टैस्ट बहुत कम और बेहद जरूरी ही लिखते हैँ, किंतु वह नहीं माना और उसने यह काम करना शुरू कर दिया।

वे कहते है कि आदमी आदमी की सोच है। इंसान तो यहां गांव में भी रहते हैँ। इनको भी अच्छे उपचार की जरूरत है। उन्होंने चिकित्सा कार्य े शुरूआत े दिन में देखा और महसूस किया कि सब डाक्टर शहर की ओर भाग रहे हैँ उन्होंने सोचा ऐसे में देहात में कौन चिकित्सा सुविधा देगा। औेर फिर यहां काम शुारू कर दिया।

उनका मानना है कि शहर से ज्यादा गांव को योग्य चिकित्सकों की जरूरत हैं। वे कहते है कि आज रूरल चिकित्सक बनाये जाने की बात हो रही है। उन्हें साढे़ तीन साल में डिगरी देकर देहात में तैनात किया जाएगा। डा त्यागी का मानना है कि देहात हो या शहर सब जगह योग्य व्यिक्त चाहिए। देहात में दोयम दर्ज े आदमी नहीं रहते। उन्हें भी बढिया उपचार की जरूरत है।

युवा पीढ़ी को संदेश पर वे कहते हैं कि आदमी को अपने व्यवसाय और समाज े प्रति इर्मानदार होकर काम करना चाहिए। बाकी सब ईश्वर पर छोड़ दिया जाए तो कभी परेशानी नहीं होगी। यह बात चिकित्सा जगह में नही सभी क्षेत्र में लागू होता है। ह़दय रोग े बचाव े लिए बह सबको सलाह देते हैं ज्यादा से ज्यादा हरी सब्जी और सामर्थ े अनुसार ज्यादा से ज्यादा ताजे फल खाओ।



बिजनौर, डा राम प्रकाश त्यागी रतनगढ़ के जमींदार परिवार से है। इने दो बेटी और एक बेटा है। दोनों बेटी बीडीएस कर रही है और लड़का एमबीबीएस कर रहा है। उनका इरादा बेटे को भी देहात में ही अपने साथ प्रेक्टिस कराने का इरादा है।

अशोक मधुप

भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत है ब्रिक्स का साझा प्रस्ताव

  

 

 


अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

 बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण और विकासशील देशों की एकजुटता के इतिहास में एक अत्यंत मील का पत्थर सिद्ध हुआ है। इस सम्मेलन ने न केवल ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) के आर्थिक एवं राजनीतिक महत्व को रेखांकित किया, बल्कि यह स्पष्ट संदेश भी दिया कि वैश्विक शासन व्यवस्था में अब 'ग्लोबल साउथ' की आवाज को लंबे समय तक अनसुना नहीं किया जा सकता। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित पश्चिमी प्रभुत्व वाली वित्तीय और कूटनीतिक प्रणालियों, विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं की एकाधिकारवादी नीतियों के उत्तर में दिल्ली सम्मेलन एक सशक्त प्रतिमान बनकर उभरा। भारत की मेजबानी में आयोजित ब्रिक्स (बीरिक्स) शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच मतभेदों के बावजूद भारत ने एक साझा 'सर्वसम्मति' बनाने में सफलता हासिल की।  यह भारत की बड़ी  कूटनीतिक सफलता है कि तमाम भू-राजनीतिक  मतभेदों के बावजूद भारत सभी सदस्य देशों को 45 से अधिक पेजों वाले सर्वसम्मति 'नई दिल्ली घोषणापत्र' पर सहमत करने में सफल रहा। इसमें आतंकवाद के सभी रूपों की कड़े शब्दों में निंदा की गई और आतंकवाद के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' तथा उसकी फंडिंग रोकने का साझा संकल्प लिया गया। इससे पहले के सम्मेलन में संयुक्त घोषणा पत्र  जारी कराना एक कठिन काम था।

ब्रिक्स के सदस्य देशों के अपने-अपने रणनीतिक हित, क्षेत्रीय प्राथमिकताएं और विदेश नीति संबंधी विचार  हैं। पश्चिम एशिया के मसले       पर यह विविधता और भी  साफ दिखाई देती है।  ईरान स्वयं संघर्ष में एक प्रमुख पक्ष है। उसके सऊदी अरब और यूएई के साथ सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर मतभेद हैं।  साझा बयान में न तो अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों का और न ही इसके बाद ईरान द्वारा फारस की खाड़ी के अपने पड़ोसी देशों पर किए गए हमलों का सीधे तौर पर जिक्र किया गया।  इसमें युद्ध के दौरान 'अधिकतम संयम' बरतने की अपील की गई। इस साझा बयान में भारत ने यह दिखाया   कि कठिन भू-राजनीतिक परिस्थितियों में असहमतियों को अलग रखकर भी संवाद के रास्ते खुले रखे जा सकते हैं। ये साझा घोषणापत्र युद्ध खत्म नहीं करा फिर भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सहमति की दिशा में उठा हर कदम महत्व रखता है।

प्रस्ताव में  सदस्य देशों के बीच व्यापार में आने वाली शीर्ष 10 बड़ी रुकावटों को चिन्हित कर हटाने का लक्ष्य  रखा गया। हर साल 100 नए अंतरराष्ट्रीय स्टार्टअप्स का एक-दूसरे के बाजारों में विस्तार और कंपनियों के बीच 1,000 नई साझेदारियाँ बनाने की योजना और  शहरीकरण की चुनौतियों से निपटने और जलवायु-अनुकूल इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर सहमति बनी। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता घटाने, स्थानीय मुद्राओं में सीमा-पार भुगतान को बढ़ावा देने तथा 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' के विस्तार पर प्रगति हुई। इस सम्मेलन में भारत के सफल 'डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर' (यूपीआई, आधार मॉडल आदि) को ब्रिक्स देशों के साथ साझा करने पर मुहर लगी। इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को सुरक्षित, पारदर्शी और ग्लोबल साउथ के हितों के अनुकूल बनाने के लिए साझा मानक तय करने पर बल दिया गया।

सम्मेलन के इतर भारत की  बड़ी उपलब्धि है वैश्विक नेताओं के साथ महत्वपूर्ण बातचीत । लंबे समय से चल रहे सीमा तनाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच सीधी बातचीत हुई। इसमें मतभेदों को विवाद में न बदलने और सीमा पर शांति बनाए रखने पर सहमति बनी। मोदी-शी जिनपिंग की मुलाकात से पहले बड़ा कदम  छह  साल बाद भारत-चीन के बीच सीधी फ्लाइट शुरू करना है। भारत-रूस के बीच  ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने के लक्ष्य पर सहमति जताई गई।

सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों में तत्काल सुधार की मांग को मजबूती से दोहराया गया, ताकि विकासशील देशों को वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रिया में उचित प्रतिनिधित्व मिल सके। भारत ने इस सम्मेलन के जरिए यह साबित किया कि वह वैश्विक गुटबाजी से दूर रहकर एक संतुलित और निष्पक्ष "आर्थिक और कूटनीतिक पुल" के रूप में काम करने की क्षमता रखता है।

दिल्ली शिखर सम्मेलन  ने यह साबित किया कि ब्रिक्स अब केवल एक विचार-विमर्श का मंच या बयानों तक सीमित रहने वाला समूह नहीं रहा, बल्कि यह संस्थागत ढांचा तैयार करने में सक्षम एक ठोस आर्थिक ब्लॉक बन चुका है। इसके अतिरिक्त, देशों के वित्तीय संकट से निपटने के लिए आकस्मिक रिजर्व व्यवस्था पर चर्चा ने सदस्य राष्ट्रों को वैश्विक बाजार के उतार-चढ़ाव से एक सुरक्षा कवच प्रदान करने का प्रयास किया।

व्यापारिक दृष्टिकोण से दिल्ली सम्मेलन में एक अत्यंत दूरदर्शी निर्णय यह लिया गया कि सदस्य देश आपस में अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देंगे। अंतर-ब्रिक्स व्यापार में अमेरिकी डॉलर और यूरो पर निर्भरता कम करने के इस प्रयास का मुख्य उद्देश्य क्रेडिट सुविधाओं को आसान बनाना और विनिमय दरों के जोखिमों को कम करना था। पश्चिमी वित्तीय आधिपत्य और प्रतिबंधों की राजनीति के आलोक में यह पहल वैश्विक अर्थव्यवस्था के विकेंद्रीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम मानी गई। इसके साथ ही, व्यापार मंत्रियों के स्तर पर हुए समझौतों ने यह सुनिश्चित किया कि सदस्य देशों के बीच माल, सेवाओं और निवेश का प्रवाह सुचारू रूप से हो सके।

यदि दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन का विश्लेषण किया जाए, तो इसके बहुआयामी सकारात्मक परिणामों के साथ-साथ कई ऐसे अंतर्विरोध और सीमाएं भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं जो इस संगठन की दक्षता को चुनौती देती हैं। सबसे बड़ा अंतर्विरोध ब्रिक्स के दो सबसे बड़े सदस्यों—भारत और चीन—के बीच मौजूद रणनीतिक और सीमा संबंधी अविश्वास है। दिल्ली सम्मेलन के मंच पर जहां दोनों देशों के नेतृत्व ने आर्थिक सहयोग पर सकारात्मक प्रतिबद्धता दिखाई, वहीं परदे के पीछे सीमा विवाद, क्षेत्रीय आधिपत्य की होड़ और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन का आक्रामक रुख एक अनसुलझी चुनौती बना रहा।

शासन प्रणालियों और विचारधाराओं का अंतर भी इस सम्मेलन की एक बड़ी सीमा के रूप में रेखांकित हुआ। भारत और ब्राजील जहां जीवंत लोकतांत्रिक देश हैं, वहीं चीन और रूस में एकदलीय अथवा सत्तावादी शासन संरचनाएं हैं। इस वैचारिक भिन्नता के कारण अंतरराष्ट्रीय कानूनों, मानवाधिकारों और वैश्विक नीतियों पर ब्रिक्स का एक एकीकृत दृष्टिकोण बना पाना बेहद जटिल हो जाता है। पश्चिमी देश किसी भू-राजनीतिक संकट पर प्रतिबंध लगाते हैं, तो रूस और चीन का रुख स्पष्ट रूप से पश्चिम-विरोधी होता है, जबकि भारत और ब्राजील एक 'गैर-पश्चिमी' लेकिन 'पश्चिम-विरोधी नहीं' का संतुलन पसंद करते हैं। दिल्ली सम्मेलन में भारत की कूटनीति की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उसने इस सम्मेलन को किसी सीधे पश्चिम-विरोधी मोर्चे में तब्दील होने से रोका और इसे विकास केंद्रित बनाए रखा।

जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा जैसे वैश्विक मुद्दों पर भी दिल्ली सम्मेलन में व्यापक मंथन हुआ। सम्मेलन ने यह स्पष्ट किया कि जलवायु परिवर्तन के ऐतिहासिक उत्तरदायित्व के लिए विकसित देशों को धन और तकनीक हस्तांतरण की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। इसके साथ ही, स्वास्थ्य क्षेत्र में अनुसंधान और महामारी जैसी आपदाओं से निपटने के लिए साझा तंत्र बनाने पर भी सहमति व्यक्त की गई।

दिल्ली सम्मेलन ने भारत के वैश्विक कद को बढ़ाने में अभूतपूर्व योगदान दिया। भारत ने खुद को एक ऐसे जिम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी के रूप में प्रस्तुत किया जो एक तरफ पश्चिमी गुटों के साथ मजबूत संबंध रख सकता है, तो दूसरी तरफ रूस, चीन और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ मिलकर नए वैश्विक समीकरण भी गढ़ सकता है। भारत की यह 'बहु-संलग्नता' नीति दिल्ली सम्मेलन में पूरी तरह सफल दिखाई दी, जहां उसने पश्चिमी शक्तियों को नाराज किए बिना विकासशील देशों का सशक्त नेतृत्व किया।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं) 

 

 

Wednesday, August 12, 2026

बोफोर्स कांडः एक झूठ के शापित होने का सच


अशोक मधुप  

वरिष्ठ  पत्रकार

एक झूठ के बल पर खड़ा हुआ  बोफोर्स   कांड सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद अब फाइलों में बंद हो गया। केस चालिस साल चला। इस पर 250 करोड़ रूपये व्यय  हुए। इतना सब होने और चालिस साल की जीतोड़ कवायद के   बाद भी बोफार्स खरीद में रिश्वत लेने की सच्चाई सामने नही आई। केस तो खत्म हो गया किंतु यह तै नही हो पाया  कि इस प्रकरण में रिश्वत ली गई या नहीं । कोर्ट के केस खारिज करने के बाद भी  रिशवत लेने का आरोप आज भी अपनी जगह खड़ा है।इस कांड का पूर्व  प्रधानमंत्री  राजीव गांधी एवं  अन्य   आरोपियों के माथे पर लगा बेइमानी का दाग कभी खत्म  नही हो पाएगा? क्या उनके परिवार माथे पर लगे इस कलंक से मुक्त हो पाएंगे? क्या उनके परिवार के सम्मान की हुई क्षति की कभी पूर्ति  हो सकेगी? पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के बार −बार बोले जाने वाले बोफोर्स खारीद में रिश्वत ने जनता के मन में  तक जमाये झूठ के कारण  राजीव गांधी से  जनता दूर हो गई और उन्हें अपनी सरकार तक गंवानी पड़ी ।   

सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुजा ब्रदर्स को बरी करने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के 2005 के फैसले के खिलाफ दायर अंतिम अपील को भी खारिज कर दिया है। इसके साथ ही भारत के सबसे चर्चित और लंबे समय तक चलने वाले भ्रष्टाचार के मामलों में से एक बोफोर्स कांड का कानूनी अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया है।


मामले में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विनोद के. चंद्रन की बेंच ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता  की स्थगन की मांग को ठुकराते हुए मामले की आखिरी याचिका को खारिज कर दिया। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने भी इस मामले में अपील की थी। इस  अपील को भी सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ही देरी के आधार पर खारिज कर दिया था। 1986 में हुए इस रक्षा सौदे का विवाद लगभग 40 साल तक अदालतों और भारतीय राजनीति के केंद्र में रहा और अंत में समाप्त हो गया।

 पूरा मामला 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के बीच हुए 1,437 करोड़ रुपये के उस समझौते से जुड़ा है। इसके तहत भारतीय सेना के लिए 400 हॉवित्जर तोपें खरीदी जानी थीं। साल 1987 में स्वीडिश रेडियो ने यह सनसनीखेज खुलासा किया कि इस सौदे को हासिल करने के लिए भारतीय राजनेताओं और रक्षा अधिकारियों को अवैध कमीशन दिए गए थे। इस खुलासे ने भारतीय राजनीति में तहलका मचा दिया था। 

कांग्रेस छोड़ने के बाद, विश्वनाथ प्रताप (वीपी) सिंह ने खुद को एक 'ईमानदार नेता' (मिस्टर क्लीन) के रूप में स्थापित किया। उन्होंने राष्ट्रीय मोर्चा (जनता दल) का गठन किया। 1989 के लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान वीपी सिंह अपनी रैलियों में बेहद आक्रामक रहे। वह अक्सर मंचों से अपनी जेब से एक सफेद पर्ची निकालकर लहराते थे।  उनका दावा था कि उस पर्ची पर बोफोर्स घोटाले के पुख्ता सबूत, दलाली की रकम पाने वालों के नाम और राजीव गांधी के कथित स्विस बैंक खातों के नंबर लिखे हैं। कथित स्विस बैंक खातों के नंबर लिखे हैं। इस आक्रामक अभियान ने जनता के बीच राजीव गांधी सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश पैदा किया। बोफोर्स घोटाले को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाकर वीपी सिंह ने विपक्ष को एकजुट किया।  इस आक्रामक अभियान ने जनता के बीच राजीव गांधी सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश पैदा किया। उनकी बेइंतहा छवी खराब की। राजीव गांधी सरकार पर गंभीर सवाल उठे और 1989 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार का इसे एक बड़ा कारण माना गया। प्रधानमंत्री बनते ही वीपी सिंह ने बोफोर्स कंपनी पर भारत के साथ भविष्य के किसी भी रक्षा सौदे के लिए प्रतिबंध लगा दिया। उन्होंने मामले की जांच के लिए अधिकारियों की एक विशेष टीम भी गठित की। 

भारी वादों और दावों के बावजूद, झूठ के बल पर बनी वीपी सिंह की सरकार  केवल 11 महीने चली।  सकार बनने के बाद वीपी  सिंह 11 महीने की आपनी सरकार के कार्यकाल में कोई भी सबेत नही दे सके। स्विस बैंक का खाता भी नही बता पाए।  ये सरकार राजीव गांधी के खिलाफ सीधे तौर पर कोई ठोस कानूनी सबूत पेश नहीं कर सकी। आलोचकों का कहना है कि चुनावी रैलियों में जिस पर्ची का दावा किया गया था, उसका सच कभी पूरी तरह सामने नहीं आ सका।

स्विस रेडियो  की एक घोषणा और वीवी सिंह द्वारा बार−बार रिश्वत  खाने के लगाए आरोप  ने इस महत्वपूर्ण  शस्त्र सौदे को नुकसान पंहुचाया। इस पर प्रतिबंध लगाया। यही बोफोर्स तोप कारगिल युद्ध में सबसे मारक शस्त्र बनी। अगर ये सौदा  रद्द न होता  तो देश की सेना  और ज्यादा मजबूत होतीं। एक बात और इस तरह के आरोप  लगाने के बाद अधिकारी और ज्यादा सचेत हो जाते हैं। वे देश और सेना  के लिए महत्वपूर्ण और अतिआवश्यक उपकरण भी लेते बचते हैं। 

इन कांड की सीबीआई ने  जांच की । सीबीआई ने जनवरी 1990 में एफआईआर दर्ज की। अक्तूबर 2000 में दायर की गई सप्लीमेंट्री चार्जशीट में हिंदुजा बंधुओं (श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश हिंदुजा) का नाम भी शामिल किया गया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने 31 मई 2005 को अपने फैसले में हिंदुजा ब्रदर्स और स्वीडिश फर्म एबी बोफोर्स के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया था। साथ ही, हाईकोर्ट ने सीबीआई की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए यह भी टिप्पणी की थी कि इस जांच पर सरकारी खजाने के करीब 250 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस मामले के लंबे खिंचने पर हैरानी जताई। जब याचिकाकर्ता के वकील ने कुछ मृत प्रतिवादियों के नाम हटाने के लिए चार हफ्ते का समय मांगा, तो जस्टिस पारदीवाला ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा, 'हिंदुजा ब्रदर्स और सीबीआई को लेकर यह सब क्या चल रहा है? सभी कार्यवाही रद्द हो चुकी हैं, यह क्या है? कितने साल बीत चुके हैं?' वहीं, वकील द्वारा यह याद दिलाने पर कि यह सौदा 1986 में हुआ था, बेंच ने स्पष्ट कर दिया कि अब इस मामले में और देरी या सुनवाई की कोई गुंजाइश नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम निर्णय के साथ ही बोफोर्स पे-ऑफ केस से जुड़ी सभी कानूनी लड़ाइयां अब आधिकारिक रूप से समाप्त हो गई हैं।

इस विवाद के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार को भारी राजनीतिक नुकसान हुआ। वर्ष 1989 के आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार का इसे एक प्रमुख कारण माना गया। इस मामले में ओत्तावियो क्वात्रोची और हिंदुजा बंधुओं जैसे नाम लंबे समय तक कानूनी और राजनीतिक बहसों का केंद्र रहे। लगभग चार दशकों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद, न्यायालय ने इस मामले से जुड़ी आखिरी याचिकाओं को खारिज कर दिया। स्विस  सरकार द्वारा कराई जांच भी  आरोप सिद्ध  नही कर सकी।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अब ये केस सदा−सदा के लिए बंद हो गया। एक आरोप की जांच पर सीबबीआई ने 250 करोड़ के आसपास व्यय किए। न्यायालय का लंबा समय बरबाद किया। न्यायालय भी केस का सच नही बता पाया। 40 साल चले केस में भी  यह तै नही हुआ कि बोफार्स खरीद में रिश्वत ली गई या नही। इस  सबके बाबजूद आरोप तो आज भी  वैसा ही खड़ा  है, जैसा पहले था।  40 साल में यह आरोप  अखबार और फाइलों के लाखों पन्नों  पर  छप गया। जनता में मन में यह धारणा इतनी पक्की हो गई, कि ये कभी खत्म नही  होगी। आने वाली पीढ़ियों तक इसे नही भूल पाएंगी। क्या आरोपी परिवारों के  भंग हुए सम्मान की भरपाई हो पाएगी।  यदि आरोप न आता तो हो सकता था कि राजीव गांधी की सरकार और चलती। बोफार्स कांड  बंद हो गया किंतु  राजीव गांधी और उनके तथा अन्यों के परिवार के माथे पर एक बार− बार बोले  जाने वाले झूठ के बल पर लगा  रिश्वतखोरी का कलंक कभी  खत्म हो पाएगा? कभी नहीं। हिटलर ने कहा था कि एक झूठ का बार− बार बोलिए,  वह सच बन जाएगा। ऐसा ही इस बोफोर्स कांड में हुआ। बोफार्स की खरीद में  रिश्वतखोरी का आरोप इतनी बार लगा कि यह हिटलर का सच बन गया।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

Saturday, June 20, 2026

क्यों नही होता राष्ट्रपति का निर्विरोध चुनाव

 

08/07/2022

अशोक मधुप

 

देश के सांसद और विधायक 18 जुलाई को देश के 15वें राष्ट्रपति पद के लिए प्रत्याशी का  चुनाव करेंगे। देश के सांसद और विधायक 18 जुलाई को राष्ट्रपति चुनाव में मतदान करेंगे। वोटों की गिनती 21 जुलाई को होगी । नया राष्ट्रपति 25 जुलाई तक राष्ट्रपति भवन में होगा।सत्ता पक्ष के प्रत्याशी के सामने विपक्ष का उम्मीदवार होने के कारण मतदान होगा।राष्ट्र के सबसे बड़े पद के लिए निर्विरोध चुनाव कराने की कोशिश क्यों नही होतीॽक्यों  केंद्र की सत्ताधारी पार्टी राष्ट्रपति के निर्विरोध चयन का प्रयास नही करतीॽ

भारत में राषट्रपति पद के लिए पांच साल में चुनाव होंता  है। डा राजेंद्र प्रसाद ही अकेले ऐसे व्यक्ति रहे, जिन्हें दो बार राष्ट्रपति रहने का सौभाग्य मिला। प्रतिभा  पाटिल को देश की पहली महिला राष्ट्रपति चुने जाने का गौरव प्राप्त है।

 भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में राष्ट्रपति के उम्मीदवार के लिए संगठन के सहयोगी दलों के साथ व्यापक विचार विमर्श किया। उसके बाद  पूर्व राज्यपाल  द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का  उम्मीदवार बनाना  तै हुआ।

पश्चिम  बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी प्रयास में रही कि  चुनाव में  विपक्ष का एक उम्मीदवार हो। कई नाम आए। जिनके नाम आए,  उनके द्वारा मना करने के बाद यशवंत  सिन्हा विपक्ष के उम्मीदवार बनने को तैयार हो गए। उनकी सहमति पर गठबंधन में शामिल दलों ने  उनकी उम्मीदवारी पर मुहर लगा दी।  

हालाकि इस गठबंधन में शामिल एक −दो दल से भी भाजपानीत गठबंधन के प्रत्याशी को वोट देने की घोषणा की। बसपा  सुप्रिमो मायावती ने भी भाजपा गठबंधन प्रत्याशी को समर्थन की घोषणा की। वह विपक्ष द्वारा बनाए गठबंधन में भी शामिल नहीं रहीं। 

इससे  पहले शरद पवार और नीतीश कुमार ने खुद को विपक्ष के राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवारों की सूची से बाहर कर लिया था।

इस चुनाव की खास बात यह है कि यदि विपक्ष एक जुट हो जाए तो केंद्र के सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन का प्रत्याशी विजयी नही हो सकता,किंतु अपने – अपने स्वार्थ  और हित के कारण यह एकजुट नही है।

 भाजपा रही हो या केंद्र की कांग्रेस की मजबूत सरकार कभी ये प्रयास नही हुआ कि चुनाव सर्वसम्मत हो।इस चुनाव के विपक्ष को भी  विश्वास में लिया जाए।इसी का परिणाम यह है कि आज तक राष्ट्रपति का निर्वाचन सर्व सम्मत  नही हुआ।नीलम संजीव रेड्डी निर्विरोध राष्ट्रपति बने पर तकनीकि कारणों से।  उनके सामने खड़े  सभी प्रत्याशियो के नामांकन चुनाव अधिकारी द्वा निरस्त कर दिए गए थे।इसके बाद वह निर्विरोध चुने गए।

आज भी केंद्र की सरकार और विपक्ष में अच्छे संबध नहीं। फिर भी प्रयास तो  होना ही चाहिए था।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं अपने स्तर से प्रयास करते तो ज्यादा बेहतर रहता। हालाकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार महत्वपूर्ण मुद्दों पर विपक्ष के साथ मीटिंग की।चीन से तनातनी का मामला हो या कोरोना  महामारी से बचाव का, इसमें राहुल गांधी और पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी का रवैया  सहयोगात्मक नहीं रहा।विपक्ष के कई नेताओं ने प्रधानमंत्री पर गैर जिम्मेदाराना टिप्पणी की। वे ये भी भूल गए कि प्रधानमंत्री किसी पार्टी का नही देश का होता है।प्रधानमंत्री को सबको सम्मान देना  चाहिए।

होना यह चाहिए कि प्रतिस्पर्धा ओर विरोध  तब तक होना चाहिए तब तक चुनाव होता है। चुनाव के बाद चुन कर आई सरकार का विपक्ष को सरकार के कार्यकाल पांच साल पूरे होने तक सहयोग करना  चाहिए। उसकी जनविरोधी नीति की आलोचना होनी चाहिए।स्वस्थ आलोचना होनी चाहिए, जबकि अब विरोध के लिए केंद्र और प्रदेश की चुनी  सरकार  का विरोध हो रहा है।

सही मायने में एक तरह से विरोध  सरकार का नही मतदाता का है, जिसने सरकार  बनाई। अपमान भी सरकार बनाने  वाले मतदाता का है। चौधारी अजित सिंह मंच से ही कहा करते थे, राजनीति में न कोई किसी का स्थायी दुशमन होता है, न ही दोस्त।  समय के साथ गठबंधन होते और टूटते रहतें हैं।  इसलिए नाराजगी भी ऐसी ही होनी चाहिए।बुजुर्ग कहते आएं है कि दुश्मनी ऐसी करो कि कभी

आमने− सामने बैठना पड़े तो अपने पहले कहे पर शर्मींदगी न उठानी पड़े।  ये बात आज के राजनैतिक नही समझते। जनता की भी याद्दाश्त कमजोर है। बह नेताओं की कही बाते, अपनमानजनक टिप्पणी को याद नही रखती।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

 

आदरणीय संपादक जी,

18 जुलाई को होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनाव पर लेख प्रेषित है।

सादर

अशोक मधुप