Sunday, July 25, 2021

आस्तिक ऋषि का मठ

आस्तिक ऋषि के मठ पर मेरी स्टोरी

नाग पंचमी पर विशेष

जिले में है नाग प्रजाति का विनाश रोकने वाले आस्तिक ऋषि का मठ

मान्यता है कि इन अस्तिक ऋषि ने राजा जन्मेजय के नाग यज्ञ को रूकवाया था

बहुत ही कम लोग जानते हैं कि बिजनौर में आस‌्त‌िक ऋषि का मठ है।

फोटो

अशोक मधुप

बिजनौर। बहुत कम लोग जानते हैं कि महाभारत काल में राजा जन्मेजय का नाग यज्ञ रूकवाने वाले आस्तिक ऋषि का मठ बिजनौर जनपद में है। यह मठ बिजनौर से लगभग चार पांच किलोमीटर दूर नीलावाला गांव के जंगल में स्थ‌ित है। पुराने लोग इस मठ के बारे में जानते हैं। नई पीढ़ी को इस बार में कोई रूचि नहीं है।

बिजनौर से पांच किलोमीटर दूर गांव आलमपुर उर्फ नीलावाला है। इसके जंगल में आस्तिक मठ है। इतिहास के जानकारों का कहना है कि वर्तमान स्थल पुराना तो नहीं है। हो सकता है कि गंगा के बहाव क्षेत्र में होने के कारण अवशेष खत्म हो गए हों। 25 साल से आस्तिक मठ के पुजारी मुन्ना भगत यहां आने वालों को बताते थे कि जन्मेजय के यज्ञ को रुकवाने वाले आस्तिक ऋषि की यहां समाधि है।

मुन्ना भगत की मृत्य़ के बाद तीन चार साल से अब इस मठ की देखरेख गंभीर भगत कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यहां आसपास काफी सांप होते हैं। मठ पर मौजूद गांव के बलजीत सिंह बताते हैं कि मठ के पास के पीपल के नीचे काफी बड़े तीन सांप दिखाई देते रहते हैं। गंभीर भगत कहते हैं कि मठ की बहुत मान्यता है। रविवार और सोमवार को काफी श्रद‍्धालु यहां आते आकर पूजा करते हैं।

हैं।

नीलावाला के निवासी शिक्षक हंरवत सिंह का कहना है कि आस्तिक मठ की बहुत मान्यता है। किंतु सरकारी स्तर पर इसके लिए कोई कार्य नहीं हुआ। जनपद महाभारत सर्किट में आता है किंतु महाभारत कालीन इस स्थल की हालत पहले जैसी ही है।

कथा

महा भारत की कथाओं में आता है कि राजा परीक्षित एक बार शिकार के लिए निकले थे और जल की खोज में वे शमीक ऋषि के आश्रम में पहुंच गए। उन्होंने तपस्या में लीन ऋषि से पानी मांगा। तपस्यारत ऋषि के ध्यान न देने पर उन्होंने पास में पड़ा मृत सांप बाण की नोक से उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया। तपस्या में लीन ऋषि को तो इस घटना का पता नहीं चला, किंतु उनके पुत्र श्रृंगि ऋषि ने घटना का पता लगते ही परीक्षित को श्राप दिया कि सातवें दिन उन्हें तक्षक सर्प डसेगा।तक्षक के डसने से राजा परीक्षित की मृत्यु हो गई। इससे गुस्साए उनके बेटे राजा जन्मेजय ने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्प प्रजाति के विनाश का निर्णय लिया।उन्होंने सर्प यज्ञ कराया। मंत्रों के प्रभाव से सर्प यज्ञ कुंड में आकर भस्म होने लगे।

जाति का विनाश होते देख सारे नाग भाग कर अपने नाग ऋषि आस्तिक के पास आए। उन्होंने उनसे नाग प्रजाति का विनाश रोकने का प्रयास करने का आह्वान किया। उनके अनुरोध पर आस्तिक ऋष‌ि यज्ञ स्थल पर गए।अपनी बातों से इन्होंने राजा जन्मेजय का प्रभावित कर लिया। जन्मेजय को समझाया कि एक व्यक्ति की गलती का दंड पूरी प्रजाति को देना ठीक नहीं। नाग प्रजाति का नाश होने से प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाएगा ।उनके समझाने पर यह यज्ञ नाग यज्ञ रोक दिया गया। यज्ञ रुकने के दिन पंचमी थी। तभी से ये पंचमी नागपंचमी के रूप में मनाई जाती है।

अशोक मधुप



 

Monday, July 5, 2021

सुल्ताना डाकू

 सुल्ताना डाकू


जो भारत का रॉबिन हुड बन गया।सुल्ताना के जीवन की पड़ताल करती मेरी स्टोरी आज के जनवाणी में।सम्पादक यशपाल सर और जनवाणी परिवार का दिल से आभार।


यूपी में बिजनौर की  है पुख्ता बुनियाद ,

उसी जिले में एक है शहर नजीबाबाद ,

शहर नजीबाबाद वही का है मशहूर फ़साना ,

दिल दिलेर मानिंद शेर एक था सुल्ताना।


 सुल्ताना डाकू उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश ,बिहार सहित समूचे उत्तर भारत में एक ऐसा किरदार जो नाटकों नौटंकी के रूप में आज भी जीवित है ।सुल्ताना डाकू  एक ऐसा नाम जिसे डाकू होने के बावजूद बहुत आदर के साथ लिया जाता है ।सुल्ताना डाकू एक ऐसा नायक जो लूटमार करने के बावजूद अपनी बेहतरीन छवि से जननायक बन गया ।


सुल्ताना डाकू का जन्म मुरादाबाद शहर से सटे हरथला गांव में हुआ था ।वह भान्तु जाति का था जो खुद को महाराणा प्रताप का वंशज मानती थी। सुल्ताना की जाति को अंग्रेज आक्रामक मानते थे, इसलिए अंग्रेजों ने नवादा गांव में शिविर में भातु जाति के लोगों को रखा ।वहीं सुल्ताना की परवरिश हुई। इसके बाद सुल्ताना का परिवार नजीबाबाद आकर बस गया। बताया जाता है कि सुल्ताना मात्र 17 साल की उम्र में डाकू बन गया। उसने अपना 300 सदस्यों का एक गिरोह तैयार किया। सुल्ताना के गिरोह में शामिल डाकुओं के पास आधुनिक हथियार थे। सुल्ताना बेहद अनुशासित था और गिरोह में किसी भी प्रकार की अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं करता था। सुल्ताना पर आधारित नौटंकी के अनुसार  सुल्ताना का एक साथी शेर सिंह गद्दार हो गया था जिसे सुल्ताना ने मौत के घाट उतार दिया था । सुल्ताना के बारे में किवदंती है कि वह अमीरों को लूटता था और उस धन को गरीबों में बांट देता था। प्रसिद्ध  शिकारी जिम कार्बेट ने अपनी किताब माई इंडिया के भाग 'सुल्ताना: इंडियाज रोबिन हुड' में बताया है कि सुल्ताना ने कभी भी किसी गरीब आदमी को नहीं लूटा और वह दुकानदारों को पूरे दाम देकर सामान खरीदता था ।सुल्ताना के निशाने पर अंग्रेजों का खजाना रहता था ।वह भारत का रॉबिनहुड बन गया था।सुल्ताना मानता था कि अंग्रेजों द्वारा इकट्ठा किया गया खजाना गरीब हिंदुस्तानियों की खून पसीने की कमाई का है जिसे अंग्रेज जबरदस्ती छीन लेते हैं । जिम कार्बेट के अनुसार सुल्ताना का क्षेत्र नजीबाबाद से लेकर कुमाऊं ,नैनीताल , कालाढूंगी रामनगर और काशीपुर तक था। उस समय देहरादून से नैनीताल के  राज निवास के लिए जो रास्ता जाता था वह नजीबाबाद के जंगलों से होकर गुजरता था। अंग्रेजों का खजाना भी इसी रास्ते से जाता था ।सुल्ताना इसी रास्ते पर घात लगाकर हमला करता और अंग्रेजों का खजाना लूट लेता था ।सुल्ताना ने कई बार रेलगाड़ी से जाने वाला खजाना भी लूटा।सुल्ताना अंग्रेजों की आंख की किरकिरी बन गया था । जिस तेजी से सरकार सुल्ताना को तलाश रही थी , उतनी तेजी से उसकी लोकप्रियता भी निरंतर बढ़ रही थी। सुल्ताना ने हल्द्वानी के खड़क सिंह कुमडिया के घर पर डकैती डाली ।इस डकैती में खड़क सिंह और एक अन्य व्यक्ति मारा गया ।खड़क सिंह का मित्र तुला सिंह सुल्ताना का दुश्मन बन गया ।


बताया जाता है कि सुल्ताना डाका डालने से पहले डकैती वाले घर पर इश्तहार चस्पा कर देता था । बिजनौर जिले के आसपास की पुलिस भी सुल्ताना से खौफ खाती थी। बिजनौर जिले के नांगल थाने के जालपुर गांव में सुल्ताना ने 22 मई 1922 को डकैती डाली, जिसमें 17248 रुपए की लूट की। सुल्ताना द्वारा की गई थी यह डकैती शिब्बा सिंह के घर पर डाली गई थी ।नांगल थाने में फारसी भाषा में उस मामले की रिपोर्ट और जांच के दस्तावेज आज भी मौजूद हैं। यह मुकदमा अपराध रजिस्टर में 25/1922 धारा 397 के अंतर्गत दर्ज है ।


जब पुलिस सुल्ताना डाकू को नहीं पकड़ पाई तब टिहरी रियासत के राजा के कहने पर फ्रेडी यंग नाम के एक जांबाज अफसर को सुल्ताना डाकू को पकड़ने के लिए विशेष तौर पर बुलाया गया। यंग ने अपने साथ प्रसिद्ध शिकारी जिम कार्बेट को शामिल किया ।इसके अतिरिक्त तुला सिंह ने भी फ्रेडी यंग का सहयोग किया ।यंग  ने 300 सिपाही और 50 घुड़सवारों को लेकर नैनीताल से नजीबाबाद के जंगलों में 14 बार छापेमारी की। जिम कार्बेट लिखते हैं कि एक बार सुल्ताना डाकू ने उनकी तथा एक बार फिर फ्रेडी यंग की जान भी बख्शी थी ।सुल्ताना ने फ्रेडी यंग  को तरबूज भी भेंट किया था।

 14 दिसंबर 1923 को नजीबाबाद के जंगलों में सुल्ताना को 15 साथियों सहित गिरफ्तार कर लिया गया ।सुल्ताना के साथ उसके साथी पीतांबर ,नरसिंह, बलदेव और भूरे भी पकड़े गए। नैनीताल अदालत में सुल्ताना डाकू पर केस चलाया गया। यह केस नैनीताल गन केस के नाम से जाना जाता है। 7 जुलाई 1924 को आगरा की जेल में सुल्ताना डाकू को उसके 15 साथियों सहित फांसी की  दे दी गई।आगरा जेल में अपने व्यवहार से सुल्ताना ने जेल के कर्मचारियों का दिल जीत लिया था। सुल्ताना के पनाहगार रहे  40 लोगों को काला पानी की सजा सुनाई गई। भारतीय सिविल सेवा में अधिकारी रहे लेखक फिलिप मेशन की किताब 'द मैन हु रुल्ड इंडिया' में इस बात का जिक्र है कि सुल्ताना डाकू को फ्रेडी यंग द्वारा ही पकड़ा गया है ।यंग ने  सुल्ताना की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलवाने का काफी प्रयास किया लेकिन अंग्रेजी हुकूमत इस बात पर सहमत नहीं थी। फ्रेडी यंग ने सुल्ताना की पत्नी और पुत्र के भोपाल के पास रहने की व्यवस्था की और उसके बाद सुल्ताना के लड़के को उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा तथा सुल्ताना के बेटे को अपना नाम भी दिया ।आज भी नजीबाबाद में नवाब नजीबुदौला का बनवाया हुआ वह किला मौजूद है जिस किले में पर सुल्ताना ने कब्जा कर लिया था और आज यह किला सुल्ताना डाकू के किले के नाम से  जाना जाता है ।हल्द्वानी में शीश महल के निकट एक सुल्तान नगरी है जिसका नाम सुल्ताना का ठिकाना होने के कारण पड़ा। गड़प्पू  के पास एक सुल्ताना का कुआं भी है जहां वह पानी पीता था ।7 जुलाई 1924 को अंग्रेजों ने भले ही सुल्ताना को फांसी दे दी लेकिन वह एक किवदंती बन गया और आज भी पूरे उत्तर भारत में उसके नाटक और नौटंकी खेली जाती हैं ।1956 में निर्देशक मोहन शर्मा ने सुल्ताना डाकू पर एक फिल्म सुल्ताना डाकू बनाई थी जिसमें जयराज ने सुल्ताना डाकू का किरदार निभाया था। 1972 में मोहम्मद हुसैन ने दारा सिंह, हेलन और अजीत को लेकर सुल्ताना डाकू के नाम से फिल्म बनाई थी। सुल्ताना डाकू पर नथा राम शर्मा की किताब सुल्ताना डाकू है जिसकी नौटंकी पूरे उत्तर भारत में खेली जाती है। इसके अतिरिक्त लखनऊ के अकील पेंटर ने 'शेर ए बिजनौर 'सुल्ताना डाकू 'के नाम से एक किताब लिखी ।

2009 में सुजीत सराफ ने कन्फेशन ऑफ सुल्ताना डाकू के नाम से एक किताब लिखी ।यह किताब सुल्ताना डाकू की पुलिस के सामने स्वीकारोक्ति के आधार पर लिखी गई है।सुल्ताना डाकू की कहानियां और फिल्मों में काफी अंतर है ।सुल्ताना को मरे 96 साल हो गए लेकिन अपनी कहानियों के कारण जनमानस के बीच भारत केरोबिन हुड के रूप में आज भी मौजूद है।

लेखक - विवेक गुप्ता

5 जुलाई जनवाणी मेरठ

Friday, July 2, 2021

अब्दुर्रहमान बिजनौरी

 क्या आप जानते हैं?

दुनिया जिसे  #अब्दुर्रहमान #बिजनौरी के नाम से जानती है। वे #स्योहारा के थे। 


मेरी किताब "मेरे देश की धरती" से 

स्योहारा के रत्न 4 

अब्दुर्रहमान बिजनौरी 

के बारे में जाने--


वो अब्दुर्रहमान  बिजनौरी है, हमारा है, सिबारा है।

उर्दू अदब के आसमान पर चमकता जो सितारा है।

प्रोफेसर ज्ञान चंद जैन का ये शेर उर्दू अदब में अब्दुर्रहमान बिजनौरी के योगदान का मुखर प्रमाण है। ग़ालिब के दीवान की समालोचना के कारण अदब की दुनिया में ऊंचा मक़ान बनाने वाले डा. अब्दुर्रहमान बिजनौरी भी स्योहारा (तब सिबारा) के थे। उन्होंने पूरी दुनिया को ग़ालिब से परिचित ही नहीं कराया वरन उन्होंने ग़ालिब की शायरी को अपनी समालोचना से उस मर्तबे तक पहुंचाया जहां आज उनकी गिनती महान शायरों में होती है। यह कहना गलत न होगा कि बिजनौरी की समालोचना से पहले ग़ालिब जैसा अजीम शायर शोहरत की बुलंदियों से दूर एक आम शायर की तरह ही थे। उनके द्वारा पांच भागों में लिखा गया "मोहसिन ए कलाम ए ग़ालिब" उर्दू समालोचना साहित्य की बहुमूल्य समावेश है, जो अपने साथ नए दृष्टिकोण और नई विचारधारा लाया है। बिजनौरी ने ग़ालिब के दामन पर लगे उन तमाम एतराज को हटा दिया। जो दूसरे आलोचकों ने बेबुनियाद उनके सर पर मंढ रखे थे। बिजनौरी की समालोचना ही के कारण ग़ालिब पश्चिमी शायरों के मुकाबले ऊंचे दिखाई देने लगे। उन्होंने अपनी किताब 'मुहासिने कलाम ग़ालिब' के पहले पेज के दूसरे पैरा में लिखा कि ' हिंदुस्तान की अवतरित किताबें दो हैं, एक मुकद्दस वेद और दूसरी दीवाने ग़ालिब। बिजनौरी का ये कथन विस्तृत अध्ययन और ग़ालिब की बुलन्दियों में चार चांद लगाने वाला है। 

डा. अब्दुर्रहमान बिजनौरी के पत्रों और उनके घटनाक्रम पर दो और किताबें भी प्रकाशित हुईं थीं। 'बाकयाते बिजनौरी' और 'यादगार बिजनौरी'। इन किताबों में इनकी कुछ नज्में भी हैं। उनके द्वारा भेजे गए पत्रों में अपने छोटों और बड़ों के परम्परागत शिष्टाचार का अद्भुत नमूना है। उन्होंने रवीन्द्रनाथ टैगोर की गीतांजलि को सर्व प्रथम उर्दू में प्रकाशित किया था। 

बिजनौरी की गिनती अपने समय के अरबी, फारसी, जर्मनी, अंग्रेजी, उर्दू के वरिष्ठ साहित्यकारों और शायरों में होती थी। उन्होंने जर्मन भाषा में क़ुरआने मजीद का तर्जुमा भी किया। उनके वालिद का नाम नुरुलइस्लाम था। जिन्हें खान बहादुर की पदवी मिली थी। वे स्योहारा के मुहल्ला काज़ियान के सम्मानित परिवार से सम्बंधित थे। बिजनौरी की वालेदा नाम आमना खातून और भाई का नाम हबीबुर्रहमान था। वे सन 1882 में पैदा हुए थे। प्रारम्भिक शिक्षा सिबारा में मुंसी रहीमुद्दीन द्वारा दी गयी। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवसिर्टी से डिग्री हासिल की। उसके बाद विलायत चले गए।  वहां बैरिस्टरी का इम्तहान पास किया। बाद में जर्मन की बर्लिन यूनिवर्सिटी से अरबी फारसी में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। मजहबी जुनून चढ़ा तो अपने जर्मन में रहते हुए जर्मनी भाषा में 'शआयर ए मौहम्मदी' किताब लिखी। सैर सपाटे के लिये बाल्कान के युद्ध के समय में क़ुस्तुन्तुनिया गए। वतन वापस आने के बाद दो वर्ष तक मुरादाबाद में बैरिस्टरी की। उसके बाद रियासत भोपाल में नबाब हमीदुल्ला खां के यहां शिक्षा प्रोत्साहन की जिम्मेदारी का वहन किया।  बिजनौरी पर तुर्की के प्रवास के दौरान जासूसी का इल्जाम लगा और लगभग छह माह वहां की जेल में भी रहे। बिजनौरी हिंदुस्तान की आजादी की लड़ाई में गांधी जी के विचारों से सहमत थे। आप की मृत्यु मात्र मात्र 37 वर्ष की उम्र में 1919 में भोपाल में हो गयी। बिजनौरी की मृत्यु से उर्दू साहित्य ने महान साहित्यकार खो दिया। 

चर्चित उर्दू साहित्यकार डा. तक़ी आबिदी का कहते हैं कि बिजनौरी की समालेाचना का कोई जवाब नहीं। गुलशने दीवाने गालिब का पहला दरवाजा खोलने वाला पहला शख्स बिजनौरी ही हैं। साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष तथा उर्दू के प्रख्यात समालोचक प्रो. गोपीचंद नारंग ने कहा है कि बिजनौरी में एक-एक शब्द में हिंदुस्तान और उसके मजहबों की मोहब्बत से भरे हैं।  उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध जुमला है कि हिंदुस्तान की दो पवित्र किताबें है, पहली-वेद ए मुक़द्दस और दूसरी दीवाने ग़ालिब। ऐसी बात भारत जैसे सांस्कृतिक बहुलता वाले उदार देश में ही स्वीकार्य हो सकता है। उन्होंने बिजनौरी को इंसानियत के सच्चे पुजारी बताते हुए कहा कि बिजनौरी जैसी शख्सियत कोई दूसरी नहीं हो सकती। 

प्रसिद्ध शायर मासूम रज़ा का कहते हैं कि मिर्ज़ा ग़ालिब के प्रख्यात समालोचक अब्दुर्रहमान बिजनौरी थे। ग़ालिब के संबंध में उनका एक वाक्य काफ़ी मशहूर हुआ, "भारत में दो ही महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं, वेद मुकद्दस (पावन) और दूसरा दीवाने ग़ालिब." पता नहीं अब्दुर्रहमान बिजनौरी को वेदों की संख्या का ज्ञान था या नहीं लेकिन एक पुस्तक की चार ग्रंथों से तुलना तर्क संगत नहीं लगती। फिर भी यह वाक्य बिजनौर के एक क़लमकार की कलम से निकला था और पूरे उर्दू-संसार में मशहूर हुआ।

तन्जो मिजाह के इंटरनेशनल ख्याति प्राप्त शायर हिलाल स्योहारवी कहते थे कि डा. अब्दुर्रहमान बिजनौरी ने मिर्ज़ा ग़ालिब के कलाम के कई अनछुए पहलू के नए अंदाज से दुनिया को परिचित कराया है।

डॉ वीरेंद्र सेवहारा की फेसबुक वॉल से

Monday, June 21, 2021

कनाड़ा में बसे झालू के देवेंद्र गुप्ता का संस्मरण

  उस समय , मैं ७ वर्ष का रहा हूँगा , मुझे मोतीझारा ( typhoid ) हो गया ! १९४०-५० में मोतीझरे का कोई इलाज नहीं था, केवल घर में रह क्र परहेज़ करिये तथा विश्राम करिये ! कई महीने लग जाते थे स्वस्थ होने में ! अधिक लोग तो मर ही जाते थे ! में भी दो तीन महीने से बीमार था! हल्का बुखार रहता था, भूक नहीं लगती थी ! घरवाले, बहका फुसलाकर दूध पीला देते थे , मुनक्का खिला देते थे! दाल रोटी तो खाने का कोई मतलब ही नही था! इन दो तीन महीनो में , वज़न बहुत कम हो गया था, कमज़ोरी बहुत आ गइ थी ! चलने फिरने का तो प्रश्न ही नहीं उठता , बोलना भी बहुत मुश्किल था ! जून का महीना होगा , सांयकाल में घर के चौक में मुझे लिटा देते थे ! बेहाल सा में इधर उधर देखता रहता ! एक दिन शाम को बहुत पसीना आ गया , कमज़ोरी और बढ़ गइ , बेहोशी सी आ गइ ! नब्ज़ बहुत ही धीमी हो गई थी ! घर के सभी लोग घबरा गए थे , पिताजी भी , डॉक्टर होते हुवे भी, निराश हो गए थे! सभी घबराये हुए थे कि अब बचना मुश्किल है ! जाने पहचाने , गाओं के हकीम थे, श्री राम कृष्ण लाल जी ( अशोक मधुप के बाबा जी) ; उनको बुलाया गया , वह अपने साथ, कुत्छ औषधी लेकर आये थे ! तुरंत ही कुत्छ समय के पश्च्चात , होश आ गया ! आँखे खुलीं ! सभी को , जान में में जान आयी! अभी भी, कभी सोचता हूँ तो वह दिन याद आ जाता है ! मुझ पर तो कम , परन्तु घर वालों पर किया गुजरी होंगी ?

https://davendrak.wordpress.com/category/biography/ 

से साभार

Sunday, June 20, 2021

झालू के देवेंद्र गुप्ता के ब्लाग से ब्लाग अंग्रेजी में है। इसे गुगल से ट्रांसलेट किया है

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Family Deity ( ग्रह देवता )/ कुल देवता

 
 
 
 
 
 
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हिंदू के रूप में, हमारे पास पूजा करने के लिए बहुत सारे देवी/देवता हैं; हम त्योहार के दिनों में, विशेष अवसरों पर उनकी पूजा करते हैं; इनमें से अधिकांश देवताओं को हमारे शास्त्रों में सूचीबद्ध किया गया है, लेकिन व्यक्तियों के रूप में, या एक परिवार के रूप में, हमारे अपने परिवारिक / परिवार देवता (ग्रह देवता) हो सकते हैं; देवता एक वस्तु, एक पेड़, जानवर या कुछ भी हो सकता है जिसमें कुछ कारणों से या पारिवारिक परंपरा से हमारी कुछ आस्था या विश्वास है। हमारे पास हमारे परिवार के देवता हैं जिन्हें भूरे सिंह देवता के नाम से जाना जाता है, यह सुनिश्चित नहीं है कि उन्हें किसने या कब से अपनाया?

deity or god is a supernatural being considered divine or sacred. The Oxford Dictionary of English defines deity as “a god or goddess (in a polytheistic religion)”, or anything revered as divine. परालौकिक  शक्ति का पात्र  होता है देवता, इसी लिए पूजनीय होता है ! to read more on the topic ; https://hi.wiktionary.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%BE

हमारा परिवार देवता रेहरुवा गाँव के पास स्थित है, स्थान का नक्शा यहाँ दिया गया है; https://www.google.com/maps/place/बिजनौर,+उत्तर+प्रदेश+246701,+India/@29.302821,78.1507627,14z/data=!4m5!3m4!1s0x390bee6a893390f9:0x9bbd471db27ea08f!8m2!3d29.37d29! 4d78.1350904?hl=hi-GB

दिशा; झालू से: झालू-चौकपुरी-क्रॉस छोय्या नदी-गंगदासपुर-सिकंदरपुर; हमारा देवता स्थान गंगदासपुर और सिकंदरपुर के बीच और रेहरुवा गाँव के उत्तर में है।

2; झालू-खारी-कृषि-सिकंदरपुर (सिकंदरपुर के रास्ते में);

3; From Bijnor: Bijnor-VidurKuti-Ganj-Sikenderpur-Agri (Gangdaspur)

वस्तुत: यह क्षेत्र हमारी जमींदारी में था और उन दिनों यह अतारांकित सड़क/लेख पर था लेकिन अब गंज से कृषि-खारी मिलन बिजनौर से नेहटौर रोड तक एक टार रोड है;); निकटतम गांव रेहरुवा था; मेरे दादाजी ने एक कुआं बनाया, (आस-पास पानी का कोई स्रोत नहीं था) एक छोटा विश्राम गृह और भूरे सिंह देवता के स्थान के पास दो पीपल के पेड़ लगाए; संयोग से, यह पहली जून, 1936 को सुबह हुआ था और आशीर्वाद से, मेरा जन्म लगभग उसी समय हुआ था। (विवरण कुएं की बगल की दीवार पर रखे पत्थर पर लिखे शिलालेख पर दिया गया है) मेरे दादा-दादी और माता-पिता मेरे दुनिया में आने पर, मेरी पीढ़ी में प्रथम होने के नाते बेहद खुश थे। इस स्थान पर भूरे सिंह मुठ पहले से ही स्थापित था। आस-पास के गांवों के लोगों का मानना ​​है कि यहां कुछ ग्रे सांप रहते थे (यहां रहते हैं) जिन्होंने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया बल्कि उनका मानना ​​था कि वे लोगों, उनकी सुरक्षा और समृद्धि के रक्षक थे; मेरे दादा और परिवार हमेशा भूरे सिंह को शुभचिंतक और रक्षक मानते थे।

हम विभिन्न अवसरों पर अपने देवता के पास कई बार जा चुके हैं; लेकिन अक्टूबर 2008 में, मैं अपने परिवार, सुषमा (मेरी पत्नी), समीर (बेटा), रितु (बहू) के साथ गया; सर्वेश और सात्विक ( पोते); यह हमारे लिए बहुत खुशी और संतुष्टि की बात थी। नीचे, मैंने अपनी यात्रा की कुछ तस्वीरें दी हैं।

हमारे परिवार के और हम सभी महत्वपूर्ण अवसरों पर पूजा करने के लिए अपने परिवार के देवता के पास जाते रहे जैसे, बच्चे का जन्म, परिवार में कोई शादी आदि। 

ध्यान दें; यह क्षेत्र अब पानी से भर गया है इसलिए हर तरफ हरियाली/खेत, क्षेत्र में समृद्धि को दर्शाता है; अच्छी सड़कों का जाल; भूरे सिंह देवता के मठ के पास स्थानीय लोगों ने एक शिव मंदिर का निर्माण किया है; कुआं अब छोड़ दिया गया है, हालांकि इसके इतिहास के लिए अच्छी तरह से संरक्षित है; पीपल के पेड़ बहुत लंबे और स्वस्थ हो गए हैं; किसी ने परिसर के एक कोने में एक छोटा स्कूल शुरू किया है; अधिक विकास की जरूरत है;

After visiting and worshipping Bhure Singh Devta, we visited Jhalu and our ancestral house; we took Rt# 2; Agri-Khari ( on the way saw JHARKHANDI Shiv Temple) – JHALU.

 

 

भूली बिसरी बचपन की यादें :

 
 
 
 
 
 
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उस समय , मैं ७ वर्ष का रहा हूँगा , मुझे मोतीझारा ( typhoid ) हो गया ! १९४०-५० में मोतीझरे का कोई इलाज नहीं था, केवल घर में रह क्र परहेज़ करिये तथा विश्राम करिये ! कई महीने लग जाते थे स्वस्थ होने में ! अधिक लोग तो मर ही जाते थे ! में भी दो तीन महीने से बीमार था! हल्का बुखार रहता था, भूक नहीं लगती थी ! घरवाले, बहका फुसलाकर दूध पीला देते थे , मुनक्का खिला देते थे! दाल रोटी तो खाने का कोई मतलब ही नही था! इन दो तीन महीनो में , वज़न बहुत कम हो गया था, कमज़ोरी बहुत आ गइ थी ! चलने फिरने का तो प्रश्न ही नहीं उठता , बोलना भी बहुत मुश्किल था ! जून का महीना होगा , सांयकाल में घर के चौक में मुझे लिटा देते थे ! बेहाल सा में इधर उधर देखता रहता ! एक दिन शाम को बहुत पसीना आ गया , कमज़ोरी और बढ़ गइ , बेहोशी सी आ गइ ! नब्ज़ बहुत ही धीमी हो गई थी ! घर के सभी लोग घबरा गए थे , पिताजी भी , डॉक्टर होते हुवे भी, निराश हो गए थे! सभी घबराये हुए थे कि अब बचना मुश्किल है ! जाने पहचाने , गाओं के हकीम थे, श्री राम कृष्ण लाल जी ( अशोक मधुप के बाबा जी) ; उनको बुलाया गया , वह अपने साथ, कुत्छ औषधी लेकर आये थे ! तुरंत ही कुत्छ समय के पश्च्चात , होश आ गया ! आँखे खुलीं ! सभी को , जान में में जान आयी! अभी भी, कभी सोचता हूँ तो वह दिन याद आ जाता है ! मुझ पर तो कम , परन्तु घर वालों पर किया गुजरी होंगी ?

उन दिनों, घर पर बहुत सीमित स्वास्थ्य सुविधाएं और अन्य सुविधाएं जैसे शौचालय, स्नानघर इत्यादि थीं। मुझे लगता है कि मैं बस उन सीमाओं से बची हूं।

 

Gudri ka mela; Haldaur (गुदड़ी का वार्षिक मेला)

 
 
 
 
 
 
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गुदड़ी का वार्षिक मेला , हमारे गाओं के पास वाले गाओं में सावन के महीने में लगता था ! अब से ७० वर्ष पहले , झालु से हल्दौर जाने का कोई और साधन नहीं था , या तो पेद ल  जाओ या बैलगाड़ी से ! बस या रेलगाड़ी की सुविधायें नही थी ! हम लोग बारिश में भीगते झालु से अन्य लोगों के साथ , लहभग प्रत्येक वर्ष ही मेला दहकने जाते थे ! हल्दौर का यह मेला , हल्दौर के चौहान राजा ने शुरू किया था और वह ही हर साल इसका प्रभंध करते थे ! उनके भविये महल के सामने एक बहुत बड़ा तालाब था, जिसके चारों ओ र लकड़ी की सुंदर जंगला लगा था ! उसी तालाब के चरों ओर मेला लगता था ! मेले में , स्वांग, मौत का कुंवा, जादूगरों के करतब , घूमने वाले झूले , उस समय  के हिसाब से बहुत बहुत आकर्षण की वस्तुवें होती थीं ! खाने पीने की दुकानें, खेल खिलौनों की दुकाने ! शाम को जब, तालाब के चरों और रोशनी क्र दी जाती थी, तो विशेष आकर्षण हो जाता था ! हम बच्चों के लिए बहुत आनंद का होता था यह मेला ! मेले के आख़री दिन , राजा जी का खूब सजा हुवा  बेडा , रात्रि में तालाब में घूमता था ! उनकी हाथी पर सवारी निकलती थी !

बचपन की एक घटना याद आती है! एक वर्ष  मैं , अपने परिवार के मित्र श्री बसंत राम जी के साथ मेला देखने, हल्दौर गया! वोह , अपने   साड्डू  के घर पर रुके थे ! वर्षा हो रही थी, शाम भी हो गए थी, इस लिए अब रात्री को वहीं रुकना था! उनका घर अच्छा बड़ा घर था ! शाम को खाना लगाया जाया तो में यह कह क्र खाना खाने से मना क्र दिया  कि  अम्मा ने कहा है कि किसी के घर खाना नहीं खाते हैं ! सभी बहुत हांसे भी और मुझे खाने के लये मानते भी रहे ! बड़ी मुश्किल से मैंने उनके यहां खाना खाया ! बाद में, चाचा , बसंत राम जी मुझे चिढ़ाते भी रहे कि घर चल कर , तुम्हारी अम्मा को बताएँगे कि तुमने , हल्दौर में  खाना खाया था ! आज , वह सोच कर मुझे भी उस बचपन की बात पर हंसी आती है ! मेले की झलकियां भी अपनी यादें दिला जाती हैं! 

दृष्टि विकलांग लोगों को प्रकृति का उपहार; VH . के साथ मेरा व्यक्तिगत अनुभव

 
 
 
 
 
 
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भगवान विकलांग लोगों को उनके विकलांग होने के कारण होने वाली स्थिति से निपटने के लिए विशेष भावना या शक्ति प्रदान करते हैं। भगवान उन्हें उनके कुछ कार्यों को करने में असमर्थता की भरपाई के लिए विशेष उपहार देते हैं।

उनकी दृश्य भावना को ज्यादातर अतिरिक्त स्वर और स्पर्श इंद्रियों द्वारा मुआवजा दिया जाता है।

 

 

 

वीएच संगीतकार2   .वीएच संगीतकार

यहाँ, मैं अपने बचपन के अनुभव की दो कहानियाँ सुनाना चाहूँगा:

  1. महेंद्र जी जन्म से अंधे थे लेकिन हमारे इलाके में हारमोनियम पर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के रूप में उपहार में दिए गए थे। वह किसी भी महत्वपूर्ण कार्यक्रम में वहां मौजूद थे जहां संगीत बजाया जाना है। इसके अलावा, वह चीजों और लोगों को छूने या उनकी आवाज सुनकर पहचानने के लिए अतिरिक्त संवेदनशील था। वह अपने परिवार के साथ हल्दौर (बिजनौर) में रहता था और राम लीला के दिनों में साल में केवल एक बार हमारे शहर, झालू में मुश्किल से कुछ दिन आता था। मैं अपनी आवाज बदलने की कोशिश करूंगा और उसे पहचानने के लिए कहूंगा। मेरे हाथों को छूने और ध्यान से सुनने के बाद, वह मुझे सटीकता से पहचान लेगा। शहर की ज्यादातर गलियां याद होंगी, जहां से वह गुजरा है।
  2. हमारी एक महिला थी- हमारे पड़ोस में हमारे पारिवारिक मित्र की गृहिणी। वह जन्म से अंधी भी थी। उसके कई बच्चे थे, उन्हें अच्छी तरह से पाला, घर को हर तरह से बहुत अच्छी तरह से बनाए रखा; सही मात्रा में मसालों के साथ खाना बनाना आदि। उसकी रोटी एकदम गोल/गोलाकार हुआ करती थी। घर पर उसकी गतिविधियों को देखकर, हमें विश्वास नहीं हो रहा था कि वह एक नेत्रहीन व्यक्ति है। चीजों और लोगों को पहचानने में, वह महेंद्र जी से भी बेहतर थी, हमेशा खुश और मुस्कुराते हुए।

जीवन, शिक्षा, व्यावसायिक साहित्य और संगीत आदि के सभी क्षेत्रों में हमारे पास बहुत से नेत्रहीन व्यक्तित्व हैं। दुनिया के कुछ सबसे लोकप्रिय संगीतकारों की सूची यहां दी गई है; दस सबसे लोकप्रिय नेत्रहीन संगीतकार; https://www.everydaysight.com/blind-musicians/

भारत के कुछ लोकप्रिय नेत्रहीन संगीतकार;

एम.चंद्रशेखरन

बालूजी श्रीवास्तव;

भारत में कुछ लोकप्रिय नेत्रहीन गायक:

रवींद्र जैन, प्रेरणा अग्रवाल, वैकोम विजयलक्ष्मी, रिया विश्वास और दिवाकर शर्मा और सूरदास जी (मूल रूप से एक कवि और उनकी कविताओं के गायक / कृष्ण की स्तुति में भजन);

(भारत के कुछ अन्य सफल नेत्रहीन लोग; श्रीकांत बोला- बोलेंट इंडस्ट्रीज; वेद मेहता- लेखक, प्रणव लाल, फोटोग्राफर, बिनोद बिहारी मुखर्जी और चिंतामणि हस्बनीस- ये दोनों चित्रकार)

 

जाट मरा जब जानिये जब तेहरी तीजा होए ; एक रोचक प्रसंग

 
 
 
 
 
 
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झालू के पास एक गाँव है, त्रिलोकपुर ! वाहं , मेरे एक शुभ चिंतक रहते थे जो मेरे बचपन से ही मेरे साथी थे , मेरी देख रेख भी करते थे ! मुझसे , उन्हें बहुत लगाओ था ! यदा कदा , मुझ से मिलने आते रहते थे ! जाट परिवार से थे ! अकेले थे, उनका विवाह नहीं हुवा था , या उन्होंने , किसि कारण वश किया नहीं था! सभी लोग उन्हें ऋषि कहते थे ! जब भी उनको पता चलता कि मैं , छुट्टी में घर आया हूँ , गाँव से मुझसे मिलने झालू आ जाते , दूध, फल, मेरे पसंद की सब्जी आदि भी लेकर आते ! मेरी कुशलता के पश्चात गप शप मारते ! मैं, वाराणसी से , BHU से Bsc. के पश्चात घर पर ही रह रहा था! एक दिन मैंने , गाँव में बोला जाने वाली यह प्रसिद्ध कहावत ” जाट मरा जब जानिये जब तेहरी तीजा होए ” का अर्थ, ऋषी जी से पूछ लिया ! ऋषि जी, तपाक से उठे और बोले, ” ना, ना, जाट का कोई भरोसा नहीं , वोह तो तेहरी तीजे के बाद भी उठ कर आ सकता है ! ” कुत्छ विराम, तथा हंसी, मजाक के बाद, उन्होंने यह कहानी सुना दी !

रात्रि में, लोमड़ी, गीदड़ , आदि जानवरों को खेतों से बचाने, भगाने के लिए , किसान लोग, खेत में एक मचान बना लेते थे ! वहां बैठकर , रात्री में वोह लोग जानवरों को भगा कर, अपने खेतों की निगरानी तथा रक्षा करते थे ! एक रात को, एक जाट, ऐसे ही , मचान पर बैठ कर अपने खेत की देख भाल कर रहा था ! कुत्छ रात गुजरी होगी , कि उधर से एक साधू महाराज आगये और उन्होंने किसान से रात को उसी के साथ रुक कर विश्राम करने की इच्छा प्रगत की ! रात्री का समय देखते हुए उसने उनको वहां रुक कर विश्राम करने के प्रस्ताव को उचित समझा ! साधू जी , थके हुए थे, कुत्छ ही देर के बाद गहरी निद्रा में सो गए ! किसान, अपनी दैनिक कार्येक्रम के अनुसार जगता रहा ! अकस्मात , उसकी चीलम की चिंगारी से मचान में आग लग गए ! मचान पुरी तरेह से जल गयी , और सारे पिर्यासों के बाद भी, वोह साधू बाबा को नहीं बचा पाया, बाबा, वहीं जल कर भस्म हो गए ! बड़ी दुविधा में पड़ा चोधरी सोच सोच कर परेशान था कि अब किया करना चाहिए ! सुभाह होते, होते, गाँव के सब लोग आ जाएँगे , ब्रह्म हत्या का दोष लगेगा ! उधर पुलिस उसको हत्या के मामले में जेल में बंद कर देगी ! उसने उचित समझा कि वोह वहां से भाग जाये ! गाँव वाले आएंगे , भस्म हुए शरीर को देखेंगे , तो सोच लेंगे कि रात को खेत की रखवाली करने वाला किसान जल कर मर गया है ! वोह वहां से भाग गया और दूर कहीं छुप कर रहेने लगा ! उधर , गाँव वाले आये, देखा कि मचान जली हुई है तथा जले हुए शरीर को पहचान नहीं सकते ! अत , गाँव वाले वापिस चले गए , घर वालों ने उसका अंतिम संस्कार कर दिया ! तेहरी, तीजा, सब हो गया !

समय गुजरता गया , गाँव वाले इस घटना को भूल गए, घर वाले, जाट को भूल गए! जाट, कुत्छ समय के पश्चात , अपने घर वालों से मिलने के लिए बेचैन होने लगा ! वह एक रात को अँधेरे में छुपता, छुपाते , अपने घर आया ! घर वालों को पुकारा, उन्होंने जब उसको देखा तो ” भूत, भूत ” चिल्लाने लगे ! वह वहां से भाग गया, कई बार कोशिश करते करते, एक दिन वह , घर वालों को समझाने में सफल हो गया कि असली मामला किया था ! कुत्छ दिन वह घर आता रहा , जाता रहा, फिर साहस के उसने गाँव वालों को भी असली घटना के बारे में बता दिया और उन्हें भी यकीन दिला दिया कि वह जीवित है ! उसके बाद से वह गाँव में, अपने परिवार के साथ पहले की भांती रहने लगा

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ऋषि जी ने यह कहानी सुनकर फिर कहा, समझ आया कि जाट मरने के बाद भी जरूरी नही कि मर ही जाये !

हर प्रसाद जी: बाबा जी, दादी जी (BOBO)

 
 
 
 
 
 
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अपने एक अन्य ब्लॉग में, मैंने अपने परिवार का इतिहास सभी तथ्यों को देते हुए लिखा है, जो मैं अपने बड़ों से जान सकता था:; https://www.blogger.com/u/1/blogger.g?blogID=7434278182063497637#editor/target=post;postID=3162980977026679503;onPublishedMenu=allposts;onClosedMenu=allposts;postNum=2;src=postname

उस ब्लॉग में, मैंने संक्षेप में अपने एक दादा के छोटे भाई - सबसे छोटे भाई के बारे में निम्नलिखित लिखा:

श्री हर प्रसाद वैश्य, दादा के भाई के सबसे छोटे, मुजफ्फरनगर में अपनी पत्नी के रूप में रहते थे, दादरी की दादी जी (बोबो के नाम से प्रसिद्ध) अपने माता-पिता की इकलौती संतान थीं और उन्हें मुजफ्फरनगर में संपत्ति विरासत में मिली थी। बाबा जी पढ़े-लिखे थे, हाई स्कूल, अच्छी अंग्रेजी बोलते थे (कैसे और कहाँ पढ़े थे????); वह एक सिविल ठेकेदार था; दादी जी और बाबाजी दोनों ही उत्कृष्ट व्यक्ति थे और बहुत ही मिलनसार, स्नेही और देखभाल करने वाले लोग थे। वे परिवार के सभी अवसरों/समारोहों के दौरान हर जगह काफी दिखाई देते थे।वेतीन बेटियाँ थीं = इंदिरा जी, कमला जी और रामला जी; इंदिरा बुवा जी का विवाह बिजनौर में श्री (मास्टर) राम निवास जी के पुत्र श्री जय प्रकाश अग्रवाल से हुआ था, जो बाद में जबलपुर में बस गए। रामला जी और कमला जी भी बाबाजी की मृत्यु के बाद मुजफ्फरनगर में बस गए। वह महान व्यक्ति थे और हमें अभी तक अपने परिवार में उनकी शैली के व्यक्ति को देखना बाकी है। उनके साथ मेरे अपने अनुभव की कई यादें हैं। मैं उन्हें कहीं और लिखूंगा। उनके बारे में कुछ लिखने का समय आ गया है:

वे दोनों सभी मानकों के साथ उत्कृष्ट व्यक्ति थे। वे न केवल हमारे परिवार में बल्कि अपने सभी रिश्तेदारों और दोस्तों में सबसे अधिक दिखाई देने वाले व्यक्ति थे। ये वे व्यक्ति थे जो स्वयं जिम्मेदारी लेंगे;

1. दादी जी हमारे सभी सामाजिक समारोहों में सबसे पहले पहुंचेंगी, चाहे वह विवाह समारोह हो, या नामकरण समारोह। वह जिम्मेदारी लेगी कि सभी मेहमानों को सभी अवसरों पर ठीक से परोसा जाता है- नाश्ता, दोपहर का भोजन, रात का खाना, बच्चों के लिए दूध, उनका आराम और हर चीज, किसी भी कमी के लिए मुख्य मेजबान को दोष देने के लिए कोई शरीर नहीं और वे उसके अधीन नहीं थे आदेश और नियंत्रण; उसकी आवाज हर जगह सुनाई देती थी। वह इन मामलों को अच्छी तरह से प्रबंधित करने में सक्षम और सक्षम थी; और वह परिवार के सभी सदस्यों के बीच संबंध स्थापित करने में बहुत मजबूत कड़ी और समन्वयक थी।

2. मेरे छोटे भाई संतोष को एम.एस.सी. में प्रवेश लेने में समस्या हो रही थी। (रसायन विज्ञान) बीएससी में भूविज्ञान, भूगोल और रसायन विज्ञान के संयोजन के साथ। क्योंकि आगरा विश्वविद्यालय ने एमएससी के लिए इस संयोजन को मान्यता नहीं दी। प्रवेश। जब मैं देहरादून और अन्य जगहों पर कुछ भी करने में असफल रहा, तो मैंने दादी जी को इस बारे में लापरवाही से बताया क्योंकि मुझे पता था कि मुजफ्फर नगर में उनका बहुत प्रभाव है। उसने तुरंत जिम्मेदारी स्वीकार की और कॉलेज प्रबंधन से जुड़े प्रासंगिक लोगों से संपर्क किया। प्रबंधन ने प्राचार्य को उन्हें रास्ते से हटाने और विश्वविद्यालय के लिए स्वीकार्य प्राथमिकता बनाने के लिए मजबूर किया। एमएससी के दौरान संतोष एक साल तक उसके साथ आराम से रहा। पिछले वर्ष के लिए देहरादून जाने से पहले। प्रशंसनीय, संतोष आज अपने एमएससी के साथ क्या कर रहा है। रसायन विज्ञान में डिग्री, यह उनके प्रयासों के कारण है..

3, मुझे एक और घटना याद है जब मैंने डीएवी कॉलेज, देहरादून में इंटरमीडिएट के प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया था। उन्होंने अपनी पहल से देहरादून में मुझसे मुलाकात की और मेरे अध्ययन कार्यक्रम के विवरण के बारे में पूछा; मेरे (जीव विज्ञान समूह; रसायन विज्ञान, प्राणीशास्त्र और वनस्पति विज्ञान) के संयोजन के लिए पेशेवरों और विपक्षों पर विस्तार से चर्चा की; प्रधानाचार्य के पास गया और मुझसे या मेरे माता-पिता से पूछे बिना इसे रसायन विज्ञान, भौतिकी और गणित में बदलने के लिए कहा। उन्होंने अपने अधिकार का इस्तेमाल किया। इन दिनों अपने बच्चों के लिए भी कौन ऐसा कदम उठा सकता है? वह एक अच्छे सलाहकार और काउंसलर थे। यह उस तरह की जिम्मेदारी और अधिकार था, जिसे लोग तब लेते थे। संबंध बहुत ही अनौपचारिक और सौहार्दपूर्ण थे; मुझे याद है, मैं मुजफ्फरनगर में बिना किसी झिझक के उनके साथ जाया करता था। या निषेध। पूरा परिवार बहुत स्नेही और देखभाल करने वाला था।

4. मेरा एम.एससी. बीएचयू में शिक्षा आंशिक रूप से बाबाजी द्वारा बहुत ही अनौपचारिक और स्वेच्छा से वित्तपोषित की गई थी। उन्होंने मदद की पेशकश की थी न कि हमने उनसे ऐसा करने का अनुरोध किया था। बेशक, मैंने बहुत कृतज्ञतापूर्वक कोशिश की कि जब मुझे ओएनजीसी में मेरी नौकरी मिली, तो उन्होंने भुगतान की गई पूरी राशि वापस कर दी।

5. वैवाहिक सगाई के अवसर पर दादी जी मेरे परिवार में शामिल होने नहीं आ सकीं। उसने रामला बुवा जी को परिवार के साथ अलीगढ़ भेजने के लिए भेजा;

वे दोनों हमारे परिवार के सभी सदस्यों द्वारा सबसे सम्मानित व्यक्ति थे।

https://www.blogger.com/u/1/blogger.g?blogID=7434278182063497637#editor/target=post;postID=1765613033428390233;onPublishedMenu=allposts;onClosedMenu=allposts;postNum=0;src=postname

शेर मार पंजू; हमारे सबसे पुराने ज्ञात पूर्वज; हमारे परिवार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

 
 
 
 
 
 
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हमारे परिवार के बारे में एक छोटी सी पृष्ठभूमि जैसा कि मैं अपने दादा-दादी और अन्य बड़ों से जानता था; यह एक छोटे से ग्रामीण पृष्ठभूमि, छोटे शहर, झालू, (बिजनौर, यूपी) से आता है। हमारे पूर्वज यहां लंबे समय तक रहते थे, लेकिन सबसे पुरानी कहानी ज्ञात है कि वे जमींदार थे और उनके प्रतिद्वंद्वी, पठान-एक मुस्लिम समुदाय के पास भी खेती की जमीन थी। रक्षाबंधन दिवस के एक अवसर पर, उन पठानों ने हमारे सभी पुरुष पूर्वजों को मार डाला और फिर उस समय की प्रथा के अनुसार, महिलाओं ने सत्ती की (उन दिनों सती प्रथा थी कि पति की मृत्यु के बाद, विधवा आत्मदाह करती थी)। कस्बे में आज भी हमारा वह पुराना सत्ती हाउस है। दरअसल, हमारे ग्रह देवता भी वहीं रहते हैंपहले के दिनों में, हम वहाँ जाते थे और अपने गृह देवता को विवाह, नामकरण और यज्ञोपवीत आदि जैसे महत्वपूर्ण समारोहों के लिए घर लाते थे। झालू से दूर अपने माता-पिता के साथ रहने वाली केवल एक गर्भवती महिला बची थी। बाद में, उसने एक बच्चे को जन्म दिया, जो वयस्क होने पर, उसकी जड़ों का पता लगाने के लिए गंभीरता से सोचा। वास्तव में, उस नरसंहार के प्रतिशोध की गहरी भावना उसके पूर्वजों को हुई। इस बात को ध्यान में और दृढ़ संकल्प के साथ, अपनी मां और अन्य माता-पिता के रिश्तेदारों के विरोध के साथ, वह झालू चले गए। वह खारी के पास हमारे बगीचे (जहां हमारे पास एक कुआं और आश्रय के लिए एक छोटा कमरा था) में आया, उसका सामना एक शेर से हुआ। रूहेलखंड के शासक (नवाब) ने शेर का शिकार शिकार के लिए किया था। उसके पास शेर का सामना करने के अलावा कोई चारा नहीं था। उसने अपनी पगड़ी निकाली और शेर के मुंह में डाल दी और इस तरह शेर का दम घुटने लगा और वह मर गया। शेर का पीछा करते हुए नवाब, शेर को पकड़े हुए युवक को मृत पाया। उन्होंने उनके साहस की सराहना की और उनकी बहादुरी के लिए उन्हें "शेर मार पंजू" (जिसका अर्थ है वह व्यक्ति जिसने अपने पंजा-हाथों से शेर को मार डाला) की उपाधि से सम्मानित किया। वह इतना प्रसन्न हुआ कि उसने आगे उसका कल्याण आदि माँगने पर उसे उसके पूर्वजों की भूमि वापस दे दी और पठान को शहर से दूर उनके पुनर्वास के लिए स्थापित एक नए शहर- नवादा कलां (नया गाँव / बस्ती) में जाने के लिए कहा और चेतावनी दी उन्हें किसी भी बदला लेने या युवा व्यक्ति पर अत्याचार करने के लिए पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। उसके बाद, वह अपने पूर्वजों के शहर, झालू में अपनी सारी संपत्ति और उसे वापस दे दी गई भूमि के साथ बस गया। मुझे उनका असली नाम शेर मार पंजू नहीं मिला। वह हमारे गर्ग परिवार के सबसे हालिया ऐतिहासिक पूर्वज हैं जो अब काफी बड़े और व्यापक रूप से फैले हुए हैं, (मोटे तौर पर महलवाल, कोठीवाला और हम के रूप में जाना जाता है),

मेरा अपना परिवार: शेर मार पंजू और हमारे पूर्वजों- श्री बनवारी दास के बीच कोई विवरण उपलब्ध नहीं है; बनवारी दास दो भाई थे: शायद, वह सबसे छोटा था  बड़े भाई के दो बेटे थे। एक बेटा जल्दी मर गया और एक विधवा छोड़ गया, दूसरे बेटे के दो बेटे और दो बेटियां थीं; श्री बाबू राम (बिना परिवार के) और सीता राम जो बाद में अपने पैतृक परिवार के साथ नजीबाबाद में बस गए। एक बेटी, राम कटोरी का विवाह श्री बाबू राम जी (चांदपुर से) से हुआ था, जो अंततः देहरादून में बस गए। उस परिवार के साथ हमारे बहुत अच्छे संबंध थे (भाई साहब, श्री राम गोपाल जी अद्भुत व्यक्ति थे, हमारे वास्तविक लोगों से भी अधिक देखभाल करने वाले और प्यार करने वाले थे; उनकी पत्नी भी उतनी ही महान व्यक्ति थीं; हमने हमेशा उनके जुड़ाव और रिश्ते का आनंद लिया)। वे लंबे समय तक 5, सीमेंट रोड, बाद में काली मंदिर में रहेएन्क्लेव। राम काली, एक और बेटी विधवा थी और अपने भाइयों बाबू राम जी और सीता राम जी के साथ रहती थी।

Shri Banwari Das had five sons and one daughter; Shri Ram Swarup Mal, Shri Bihari Lal Gupta, Shri Chhangi Mal, Shri Jagan Nath ji and Har Prashad Vaish, and daughter smt. Katoria Devi.

कटोरिया देवी की शादी नेहटौर में हुई थी; जिनके दो बेटे थे, श्री मुसद्दी लाल जी और मैं केवल श्री दामोदर दास जी (मुंडेर के नाम से जाने जाते थे) को जानते थे, जो अपनी बहन पार्वती देवी के साथ रहते थे, जिनकी शादी चांदपुर में …… (तहसीलदार) से हुई थी। दादी जी अक्सर हमारे साथ झालू में रहने आती थीं। वह एक अच्छी और सीधी-सादी इंसान थी और मुझे वह बहुत अच्छी तरह याद है क्योंकि वह बाजरे की रोटी बहुत अच्छी बनाती थी। पार्वती बुवा जी के दो पुत्र थे-डॉ. रामेश्वर प्रसाद मित्तल (चांदपुर में मेरे स्थानीय अभिभावक; बहुत लोकप्रिय, सफल और शायद, एकमात्र डॉक्टर - एक चिकित्सा पेशेवर - उन दिनों चांदपुर में; वह आगरा मेडिकल कॉलेज में मेरे पिता के सहपाठी भी थे); डॉ राम निवास जो एक डेंटिस्ट थे और बिजनौर में बस गए थे। बुवाजी की बेटी विद्या देवी का विवाह झालू में हमारे कोठीवाला के परिवार में हुआ था; उनके दो बेटे थे, सुशील कुमार और कृष्ण कुमार; (पिता की अकाल मृत्यु के बाद वे चांदपुर में डॉ. रामेश्वर प्रसाद मित्तल के साथ रहते थे)। ठीक है, दादी जी के उस परिवार से चांदपुर छोड़ने के बाद मेरा संपर्क टूट गया;

श्री हर प्रसाद वैश्य, अपने भाइयों में सबसे छोटे, मुजफ्फरनगर में अपनी पत्नी के रूप में रहते थे, दादरी की दादी जी अपने माता-पिता की इकलौती संतान थीं और उन्हें मुजफ्फरनगर में संपत्ति विरासत में मिली थी। बाबा जी पढ़े-लिखे थे, हाई स्कूल, अच्छी अंग्रेजी बोलते थे (कैसे और कहाँ पढ़े थे????); वह एक सिविल ठेकेदार था; दादी जी और बाबाजी दोनों ही उत्कृष्ट व्यक्ति थे और बहुत ही मिलनसार, स्नेही और लोगों की मदद करने वाले थे। वे परिवार के सभी अवसरों पर हर जगह काफी दिखाई देते थे  उनकी तीन बेटियाँ थीं = इंदिरा जी, कमला जी और रामला जी; इंदिरा बुवा जी का विवाह बिजनौर में श्री (मास्टर) राम निवास जी के पुत्र श्री जय प्रकाश अग्रवाल से हुआ था, जो बाद में जबलपुर में बस गए।जी और कमला जी भी बाबाजी की मृत्यु के बाद मुजफ्फरनगर में बस गए। वह महान व्यक्ति थे और हमें अभी तक अपने परिवार में उनकी शैली के व्यक्ति को देखना बाकी है। उनके साथ मेरे अपने अनुभव की कई यादें हैं। मैं उन्हें कहीं और लिखूंगा।

श्री जगन नाथ: अपने पांच भाइयों में दूसरे सबसे छोटे भाई थे। मैंने उसे कभी नहीं देखा, वह बहुत कम उम्र में मर गया और उसके परिवार का बहुत दुखद अंत हुआ।वहबहुत सक्रिय व्यक्ति नहीं था, कमाई का कोई साधन नहीं था। परिवार ने उन्हें परिवार की ओर से सामाजिक दायित्वों में भाग लेने की जिम्मेदारी दी। वह बहुत सक्षम या सक्षम व्यक्ति नहीं था, शायद सभी मामलों में अपने सभी भाइयों में सबसे गरीब। उनका विवाह ग्राम ताजपुर में हुआ था और दादी जी को ताजपूर्णी कहा जाता था। उनके दो बेटे थे, कृष्ण कुमार और ओम प्रकाश (आमतौर पर ओएमआई के रूप में जाना जाता है); उनके सभी चाचाओं, विशेषकर बाबा बिहारी लाज जी ने उन्हें शिक्षित करने की कोशिश की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। उन्होंने अपने जीवन में कुछ भी नहीं किया सिवाय चारों ओर घूमने और अपनी संपत्ति और परिवार के सदस्यों के समर्थन से कम आय पर रहने के अलावा (यह बहुत मजबूती से बंधे सामूहिक और एकजुट परिवार हुआ करता था, अब उस तरह के सहयोग की कल्पना करना असंभव है और परिवार में एक दूसरे के लिए भावनाएं); वे वास्तव में गरीबी और बहुत दयनीय परिस्थितियों में रहते थे; उनके पास बहुत कम बुद्धि, सामान्य ज्ञान या समझ थी। उनका भाग्य और प्रारभ वास्तव में बहुत खराब था। दादी जी दो बहनें थीं, एक की शादी बिजनौर के एक बहुत अमीर परिवार में हुई थी। श्री अजीत प्रसाद, उनके पति बिजनौर में उस समय के सबसे शीर्ष वकील थे, जबकि दूसरी बहन की शादी यहाँ झालू में बहुत खराब परिस्थितियों में हुई थी। उसने, शायद अपने जीवन का सबसे बुरा भाग्य, अपने जीवन में कभी भी कुछ अच्छा नहीं देखा, बहुत दयनीय था। अपनी छोटी उम्र में, उसने अपने पति को खो दिया, जो भी वह दो बेटों की देखभाल करने की जिम्मेदारी के साथ था, जिन्होंने उसे जीवन भर परेशान किया क्योंकि वे उसे परेशान करने और उसके जीवन को और अधिक बनाने के लिए एक विशिष्ट उद्देश्य के साथ पैदा हुए थे। उनके पति बिजनौर में उस समय के सबसे बड़े वकील थे जबकि दूसरी बहन की शादी यहां झालू में बेहद खराब हालात में हुई थी। उसने, शायद अपने जीवन का सबसे बुरा भाग्य, अपने जीवन में कभी भी कुछ अच्छा नहीं देखा, बहुत दयनीय था। अपनी छोटी उम्र में, उसने अपने पति को खो दिया, जो दो बेटों की देखभाल करने की जिम्मेदारी के साथ था, जिन्होंने उसे जीवन भर परेशान किया क्योंकि वे उसे परेशान करने और उसके जीवन को और अधिक बनाने के लिए एक विशिष्ट उद्देश्य के साथ पैदा हुए थे। उनके पति बिजनौर में उस समय के सबसे बड़े वकील थे जबकि दूसरी बहन की शादी यहां झालू में बेहद खराब हालात में हुई थी। उसने, शायद अपने जीवन का सबसे बुरा भाग्य, अपने जीवन में कभी भी कुछ अच्छा नहीं देखा, बहुत दयनीय था। अपनी छोटी उम्र में, उसने अपने पति को खो दिया, जो भी वह दो बेटों की देखभाल करने की जिम्मेदारी के साथ था, जिन्होंने उसे जीवन भर परेशान किया क्योंकि वे उसे परेशान करने और उसके जीवन को और अधिक बनाने के लिए एक विशिष्ट उद्देश्य के साथ पैदा हुए थे।दयनीय। दादी परिवार के दूसरे घर में रहती थीं, हालांकि हमारे घर में किसी न किसी चीज के लिए दैनिक आधार पर आया करते थे। वह कभी भी समस्याओं / परेशानियों से मुक्त नहीं होती थी। वह अपने स्वभाव से बहुत अच्छी, बहुत प्यारी और स्नेही व्यक्ति थी। मैं उसके लिए विशेष सम्मान और उसके प्रति बहुत सहानुभूति रखता था। मेरे दिल में हमेशा एक इच्छा रहती थी कि क्या मैं उसकी किसी भी तरह से मदद कर सकता हूँ। मैं हमेशा उसके पास जाता था और उसका कल्याण माँगता था। उसके बेटे उसके पास छोटी से छोटी चीज़ निकालने के लिए उसे पीटते थे और उसे हमारे पास आने के लिए कहते थे और पैसे मांगो आदि। मेरे अपने परिवार ने हर समय उसकी हर संभव मदद की  उसके जीवन का अंतिम भाग वास्तव में दयनीय है और यहाँ ध्यान देने योग्य है।बाबा, हर प्रसाद जी, एक बार मुजफ्फरनगर से आए और दादी जी को डांटा कि वह अकेली है जिसने अपने बेटों को अनुचित आश्रय और समर्थन दिया और उन्हें बिगाड़ दिया। उसे उसके साथ मुजफ्फरनगर में रहने दें और उन्हें उनके भाग्य पर छोड़ दें। इस तरह वे अपना सबक सीखेंगे और उस पर निर्भर न रहने के लिए कुछ करेंगे। वह उसके साथ मुजफ्फरनगर चली गई। इसने कुछ हद तक काम किया क्योंकि दोनों ने यहां कुछ काम करना शुरू कर दिया और कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा। तरबूज के खेत में चौकीदार के रूप में काम कर रहे कृष्ण कुमार को एलओओ (मई के महीने में बहुत गर्म हवा, निर्जलीकरण और कई अन्य बीमारियों का कारण) द्वारा पकड़ा गया था और अंततः गंभीर हैजा से एक समाप्ति स्थिति का सामना करना पड़ा और बहुत कम समय में उनकी मृत्यु हो गई एक अचानक। शहर में खराब परिवहन और दवा की सुविधा, समय पर जिला अस्पताल बिजनौर ले जाया जाता तो शायद उसे बचाया जा सकता था। दुर्भाग्यपूर्ण और असहाय स्थिति। (शायद, वह अकेले नहीं थे, उन दिनों शहर में न जाने कितने लोग बिना उचित या पर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं के मर जाते थे)। दादी जी को मुजफ्फरनगर से वापस बुलाया गया था, किसलिए, अपने बड़े बेटे का शोक मनाने के लिए। वह बहुत हैरान और दुखी थी और इस घटना से टूट गई थी। वह परिवार में हर किसी के साथ बहुत दुखी, क्रोधित, निराश और निराश थी। सिर्फ अपने बड़े बेटे का शोक मनाने के लिए। वह बहुत हैरान और दुखी थी और इस घटना से टूट गई थी। वह परिवार में हर किसी के साथ बहुत दुखी, क्रोधित, निराश और निराश थी। सिर्फ अपने बड़े बेटे का शोक मनाने के लिए। वह बहुत हैरान और दुखी थी और इस घटना से टूट गई थी। वह परिवार में हर किसी के साथ बहुत दुखी, क्रोधित, निराश और निराश थी।

मेरे दादाजी ने स्थिति का आकलन करते हुए और इसे बदलने के लिए, एक लड़की के साथ छोटी की शादी की व्यवस्था की, हमारे परिवार ने व्यवस्था की (बल्कि 5000/- रुपये का भुगतान करके खरीदा, जो उन दिनों अमीर लोगों के लिए बहुत आम बात थी) गढ़वाल में पहाड़ी गांव। आनंदी चाची हमारे परिवार की सबसे खूबसूरत लड़कियों में से एक थीं। वह काफी छोटी थी और निश्चित रूप से ओम प्रकाश चाचा के साथ उसका कोई मेल नहीं था, जिन्होंने बाद में कभी उसकी परवाह नहीं की, बल्कि उसे अपनी पत्नी के रूप में कभी नहीं माना, उसके साथ कोई प्यार, आकर्षण या जुड़ाव नहीं था। केवल पत्नी को ही नहीं, किसी भी रिश्ते को कोई महत्व देने में उनकी असमर्थता थी। हालाँकि, इसने दादी जी को उनकी दुखी स्थिति में कुछ सांत्वना दी। वह उसकी देखभाल में व्यस्त हो गई। खर्च का भार प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से मेरे दादा पर आ गया।

समय बीतता गया और दादी को एक पोता मिला, बहुत सुन्दर। वह पिछले सभी कष्टों को भूल गई और बच्चे में व्यस्त हो गई। वह बहुत खुश थी, संतुष्ट थी और इस बदली हुई स्थिति से जूझ रही थी। मैं अक्सर दादी जी से मिलने जाता था क्योंकि मुझे उनसे बहुत सहानुभूति थी और वह भी मुझसे बहुत स्नेह करती थीं। मैं जब भी उससे मिलने जाती वो बहुत खुश होती थी। एक बार, उसने मुझसे कहा कि मुझे इस लड़के की देखभाल करनी चाहिए और उसे विकसित करना चाहिए। मैंने उससे ऐसा करने का वादा किया था और उसे मुझ पर भरोसा था। मैंने यह भी तय किया कि मैं लड़के को पालने की पूरी कोशिश करूंगा। कुछ वर्षों के बाद, जब लड़का लगभग पाँच वर्ष का था, उसे चेचक का बहुत गंभीर दौरा पड़ा और उसकी जटिलताओं के साथ उसकी मृत्यु हो गई (फिर से घर और कस्बे में खराब चिकित्सा देखभाल और सुविधाओं का मामला)। दादी बिखर गई थीं और मुझे लगता है कि जीवन की विपत्तियों और दुखों से पूरी तरह से थक चुकी हूं; कम उम्र में अपने पति के नुकसान को सहन किया; अपने वयस्क और पूर्ण विकसित बेटे की मृत्यु को सहन किया और अब पोते की आखिरी उम्मीद भी खत्म हो गई है। चाची जी पहाड़ियों में अपने घर वापस चली गईं और दादी जी सभी दुखों और अकेलेपन को सहन करने के लिए अकेली रह गईं। इसके तुरंत बाद वह मर गई। उसके बेटे ओमी की मौत के बाद किसी ने उसकी परवाह नहीं की। वह इधर-उधर भटकता रहा और न्यूनतम संसाधनों के साथ शायद कुछ साल जीवित रहा और रहस्यमय परिस्थितियों में उसकी मृत्यु हो गई। सरकार ने किया सारा अंतिम संस्कार। अपने जीवन के अंतिम वर्षों के दौरान, उन्होंने अपने अस्तित्व के लिए जो भी संपत्ति (एक छोटा सा घर, कुछ दुकानें आदि) बेच दी थी। इसके तुरंत बाद वह मर गई। उसके बेटे ओमी की मौत के बाद किसी ने उसकी परवाह नहीं की। वह इधर-उधर भटकता रहा और न्यूनतम संसाधनों के साथ शायद कुछ वर्ष जीवित रहा और रहस्यमय परिस्थितियों में उसकी मृत्यु हो गई। सरकार ने किया सारा अंतिम संस्कार। अपने जीवन के अंतिम वर्षों के दौरान, उन्होंने अपने अस्तित्व के लिए जो भी संपत्ति (एक छोटा सा घर, कुछ दुकानें आदि) बेच दी थी। इसके तुरंत बाद वह मर गई। उसके बेटे ओमी की मौत के बाद किसी ने उसकी परवाह नहीं की। वह इधर-उधर भटकता रहा और न्यूनतम संसाधनों के साथ शायद कुछ साल जीवित रहा और रहस्यमय परिस्थितियों में उसकी मृत्यु हो गई। सरकार ने किया सारा अंतिम संस्कार। अपने जीवन के अंतिम वर्षों के दौरान, उन्होंने अपने अस्तित्व के लिए जो भी संपत्ति (एक छोटा सा घर, कुछ दुकानें आदि) बेच दी थी।

यह परिवार और संपत्ति का अंत है। मुझे समझ में नहीं आता कि भगवान ने दादी जी और उस परिवार को इतनी सजा क्यों दी कि उन्होंने अपने जीवन में हर समय मुसीबतों, दुखों और दुखों के अलावा कुछ भी अच्छा नहीं देखा। बहुत दुखद अंत। मुझे उनके इस दुनिया में आने का मकसद और उनका वजूद समझ नहीं आ रहा है।

श्री छंगी मल:

मेरे दादाजी का तीसरा भाई शहर में एक व्यापारी के रूप में रहता था; शांत और शांत व्यक्ति; त्योहारों पर कभी-कभार ही दो भाइयों को एक-दूसरे से बात करते हुए कभी नहीं देखा। ऐसा इसलिए नहीं है कि उनके बीच कोई मतभेद था बल्कि परंपरा की तरह या उन दिनों जो कुछ भी था। उनके चार बेटे थे, राजा राम, रामेश्वर प्रसाद, जगदीश प्रसाद और ईश्वर चंद्र और एक बेटी सुमेरनी देवी। राजा राम जी कानपुर में कपास मिल में काम करते थे, परिवार से नहीं जुड़े थे। मैंने उसे देखा, शायद एक या दो बार ही। उन्होंने एक आदिवासी लड़की से शादी की, उनकी एक बेटी और एक बेटा था। बेटा, आदेश कुमार झांसी में बस गए, मैं उनसे केवल एक बार मिला, लेकिन मेरी बहन, राजो उनसे मिली, जबकि उनके पति झांसी में तैनात थे। दादी जी और बाबा जी की मृत्यु के बाद परिवार के सभी सदस्यों से संपर्क टूट गया। रामेश्वर प्रसाद ने एमईएस के साथ स्टोर कीपर के रूप में काम किया और आगरा में अपने परिवार के साथ बस गए। उनकी पांच बेटियां थीं। लंबे समय के बाद जब मैं देहरादून में ओएनजीसी के साथ काम कर रहा था, मुझे पहला और आखिरी पत्र उनके द्वारा देहरादून में एक परिवार के साथ वैवाहिक गठबंधन वार्ता के बारे में मिला। उसके बाद कोई खबर नहीं। यह एक अच्छा परिवार था। चाचा जी जब झालू में अपने पिता के साथ काम कर रहे थे तो मैं अक्सर चाची जी के पास जाता था। वह बहुत अच्छी और प्यारी इंसान थीं। जगदीश प्रसाद ने लखनऊ में शिक्षा प्राप्त की और एमएसडब्ल्यू प्राप्त किया और यूपी सरकार के साथ समाज कल्याण अधिकारी के रूप में काम किया। मुझे उनकी शादी की पार्टी में कांधला जाना याद है। पिछले ६० वर्षों या अब (२०१०) से उसका और उसके परिवार से संपर्क टूट गया है; ईश्वर चंद्र, सबसे छोटा, हालांकि मुझसे उम्र में बड़ा था, लेकिन हमारे प्ले ग्रुप में बहुत अधिक था। मैं ताश के खेल में उसका साथी हुआ करता था और हमें हराना मुश्किल हुआ करता था क्योंकि हम एक दूसरे के पत्ते जानते थे। मैं उन्हें अक्सर याद करता हूं और चाहता हूं कि मुझे उनसे कुछ समय मिलना चाहिए। मेरे पास उसकी बहुत प्यारी यादें हैं। मेरा उससे भी लंबे समय से संपर्क टूट गया था। मैंने अपने छोटे भाई गुल्टू से उसके बारे में सुना जब वह भिलाई में काम कर रहा था कि वह बिलासपुर में एक बहुत अच्छी स्थिति में चार्टर्ड एकाउंटेंट के रूप में काम कर रहा था। बुवा जी, सुमेरनी की शादी आंवला (जिला शाहजानपुर) में हुई थी, आखिरी बार 1974 में मिले थे। उसके परिवार के बारे में कोई जानकारी नहीं है। गुल्टू जब भिलाई में काम कर रहे थे तो बिलासपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट के रूप में बहुत अच्छी स्थिति में काम कर रहे थे। बुवा जी, सुमेरनी की शादी आंवला (जिला शाहजानपुर) में हुई थी, आखिरी बार 1974 में मिले थे। उसके परिवार के बारे में कोई जानकारी नहीं है। गुल्टू जब भिलाई में काम कर रहे थे तो बिलासपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट के रूप में बहुत अच्छी स्थिति में काम कर रहे थे। बुवा जी, सुमेरनी की शादी आंवला (जिला शाहजानपुर) में हुई थी, आखिरी बार 1974 में मिले थे। उसके परिवार के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

हम सब बहुत करीबी परिवार की तरह रहते थे, लेकिन अब सब इस दुनिया के जंगल में खो गए हैं।

आज तक हमारे परिवार से कोई भी शरीर झालू में नहीं रहता है और हममें से किसी के पास वहां कुछ भी नहीं बचा है, हमारा घर, जमीन या जो कुछ भी- केवल यादें- सताती यादें। इस बुढ़ापे में, मैं अक्सर, लगभग हर दिन, सपने में अपने गृहनगर जाता हूं या सोने से पहले भी, इतने सारे लोगों और बहुत सी चीजों को याद करता हूं। क्यों? क्यों?

श्री बिहारी लाल गुप्ता; वह मेरे अपने दादा के बगल में था। मुझे कभी नहीं पता था कि वह एक कार्यकारी अभियंता, सिंचाई विभाग, यूपी सरकार के रूप में अपनी शिक्षा कैसे प्राप्त कर सकता है। जब मैं सेवानिवृत्त हुआ, अपने परिवार और वंश आदि के बारे में सोचता रहा। मैंने सोचा कि झालू में केवल एक छोटा प्राथमिक विद्यालय है, वह उन दिनों बिना किसी मार्गदर्शन और परामर्श आदि के अपनी शिक्षा कैसे प्राप्त कर सकता था। किसी पढ़े-लिखे परिवार की पृष्ठभूमि से नहीं आते। मैंने अपने चाचा, श्री वेद प्रकाश से पूछा, जो हमारे परिवार में सबसे बड़े व्यक्ति थे (२००४) उनके बारे में। उन्होंने तब न केवल अपने बारे में बल्कि परिवार के अन्य सभी लोगों के बारे में बताया कि वे कैसे शिक्षित हुए। श्री बिहारी लाल गुप्ता खटीमा के पास प्रसिद्ध शारदा नहर का निर्माण कार्यपालक अभियंता (उन दिनों एक बहुत ही प्रतिष्ठित पद क्योंकि बहुत कम भारतीयों को ऐसे पद मिलते थे) के रूप में सेवानिवृत्त हुए। अपने सभी समृद्ध संसाधनों के साथ, वह दिल्ली में बस गए, १० सब्जी मंडी, दिल्ली ६; यह एक बड़ा घर है, केवल एक बार दौरा किया, अब इसके बारे में कोई स्मृति नहीं है। लुधियाना की उनकी पहली पत्नी से उनकी एक बेटी थी, प्रसादी देवी गुप्ता, दिल्ली के 10 दरिया गंज में रहती थीं। मैं उनसे केवल एक बार मिला था जब वह 1961 में मेरी शादी में शामिल होने के लिए झालू आई थीं। दूसरी पत्नी से 5 बेटे और पांच बेटियां; डॉ धर्मेंद्र गुप्ता, दया इंदर गुप्ता, डॉ राजेंद्र गुप्ता और महेंद्र गुप्ता; एक बेटी की शादी कानपुर में हुई (उसके पति बीएनएसडी कॉलेज के प्रिंसिपल हुआ करते थे, जो उन दिनों सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले इंटरमीडिएट कॉलेज में से एक था); देहरादून में एक की शादी हुई, बहुत जल्दी मर गई; मैं उसके बेटे से मिला, आनंद जो 1960 के दशक में चुग की कंपनी के साथ काम करते थे; एक बार उनके घर आए थे, जब फोफाजी, जो अफ्रीका में कहीं रहते थे, देहरादून आए, एक ने इटावा में शादी की; मैं उनसे पहली और आखिरी बार 1961 में मिलने गया था। सुषमा के चचेरे भाई की शादी में शामिल होने के लिए वहां गया था। सबसे छोटे (ज्ञान बुवाजी) का विवाह श्री होरी लाल जी के साथ बिजनौर में हुआ था। चूंकि वह झालू के बहुत करीब थी, वह और हम अक्सर एक-दूसरे से मिलने जाते थे, खासकर शादी आदि जैसे विशेष अवसरों पर। वह बहुत जीवंत और स्नेही व्यक्ति थी। बाबाजी अक्सर हमारे पास आते थे और मुझे याद है कि वह हमारे दूसरे घर में पहली मंजिल में रहते थे, उन्होंने विशेष रूप से दो दरवाजों और छह खिड़कियों के साथ डिजाइन और निर्माण किया था। वह मेरे लिए ढेर सारे तोहफे लाता था। वह मुझसे बहुत प्यार करता था। एक बार उनके घर आए थे, जब फोफाजी, जो अफ्रीका में कहीं रहते थे, देहरादून आए, एक ने इटावा में शादी की; मैं उनसे पहली और आखिरी बार 1961 में मिलने गया था। सुषमा के चचेरे भाई की शादी में शामिल होने के लिए वहां गया था। सबसे छोटे (ज्ञान बुवाजी) का विवाह श्री होरी लाल जी के साथ बिजनौर में हुआ था। चूंकि वह झालू के बहुत करीब थी, वह और हम अक्सर एक-दूसरे से मिलने जाते थे, खासकर शादी आदि जैसे विशेष अवसरों पर। वह बहुत जीवंत और स्नेही व्यक्ति थी। बाबाजी अक्सर हमारे पास आते थे और मुझे याद है कि वह हमारे दूसरे घर में पहली मंजिल में रहते थे, उन्होंने विशेष रूप से दो दरवाजों और छह खिड़कियों के साथ डिजाइन और निर्माण किया था। वह मेरे लिए ढेर सारे तोहफे लाता था। वह मुझसे बहुत प्यार करता था। एक बार उनके घर आए थे, जब फोफाजी, जो अफ्रीका में कहीं रहते थे, देहरादून आए, एक ने इटावा में शादी की; मैं उनसे पहली और आखिरी बार 1961 में मिलने गया था। सुषमा के चचेरे भाई की शादी में शामिल होने के लिए वहां गया था। सबसे छोटे (ज्ञान बुवाजी) का विवाह श्री होरी लाल जी के साथ बिजनौर में हुआ था। चूंकि वह झालू के बहुत करीब थी, वह और हम अक्सर एक-दूसरे से मिलने जाते थे, खासकर शादी आदि जैसे विशेष अवसरों पर। वह बहुत जीवंत और स्नेही व्यक्ति थी। बाबाजी अक्सर हमारे पास आते थे और मुझे याद है कि वह हमारे दूसरे घर में पहली मंजिल में रहते थे, उन्होंने विशेष रूप से दो दरवाजों और छह खिड़कियों के साथ डिजाइन और निर्माण किया था। वह मेरे लिए ढेर सारे तोहफे लाता था। वह मुझसे बहुत प्यार करता था। सुषमा के चचेरे भाई की शादी में शामिल होने के लिए वहां गया था। सबसे छोटे (ज्ञान बुवाजी) का विवाह श्री होरी लाल जी के साथ बिजनौर में हुआ था। चूंकि वह झालू के बहुत करीब थी, वह और हम अक्सर एक-दूसरे से मिलने जाते थे, खासकर शादी आदि जैसे विशेष अवसरों पर। वह बहुत जीवंत और स्नेही व्यक्ति थी। बाबाजी अक्सर हमारे पास आते थे और मुझे याद है कि वह हमारे दूसरे घर में पहली मंजिल में रहते थे, उन्होंने विशेष रूप से दो दरवाजों और छह खिड़कियों के साथ डिजाइन और निर्माण किया था। वह मेरे लिए ढेर सारे तोहफे लाता था। वह मुझसे बहुत प्यार करता था। सुषमा के चचेरे भाई की शादी में शामिल होने के लिए वहां गया था। सबसे छोटे (ज्ञान बुवाजी) का विवाह बिजनौर में श्री होरी लाल जी के साथ हुआ था। चूंकि वह झालू के बहुत करीब थी, वह और हम अक्सर एक-दूसरे से मिलने जाते थे, खासकर शादी आदि जैसे विशेष अवसरों पर। वह बहुत जीवंत और स्नेही व्यक्ति थी। बाबाजी अक्सर हमारे पास आते थे और मुझे याद है कि वह हमारे दूसरे घर में पहली मंजिल में रहते थे, उन्होंने विशेष रूप से दो दरवाजों और छह खिड़कियों के साथ डिजाइन और निर्माण किया था। वह मेरे लिए ढेर सारे तोहफे लाता था। वह मुझसे बहुत प्यार करता था। बाबाजी अक्सर हमारे पास आते थे और मुझे याद है कि वह हमारे दूसरे घर में पहली मंजिल में रहते थे, उन्होंने विशेष रूप से दो दरवाजों और छह खिड़कियों के साथ डिजाइन और निर्माण किया था। वह मेरे लिए ढेर सारे तोहफे लाता था। वह मुझसे बहुत प्यार करता था। बाबाजी अक्सर हमारे पास आते थे और मुझे याद है कि वह हमारे दूसरे घर में पहली मंजिल में रहते थे, उन्होंने विशेष रूप से दो दरवाजों और छह खिड़कियों के साथ डिजाइन और निर्माण किया था। वह मेरे लिए ढेर सारे तोहफे लाता था। वह मुझसे बहुत प्यार करता था।

डॉ. धर्मेंद्र गुप्ता, मैं केवल एक बार मिला था जब वह मेरठ जिला अस्पताल में तैनात थे; एक बार मिले, डॉ. राजेंद्र (श्री गिरवर चरण लाल, जिला न्यायाधीश, बिजनौर की बेटी मदालसा से विवाहित, 1961; विदुर कुटी के जीर्णोद्धार की परियोजना को बड़े पैमाने पर विकसित किया गया) बुलंदशहर से अलीगढ़ में मेरी शादी में शामिल होने के लिए आए, जहां वे तैनात थे जिला अस्पताल में। वे एक नेत्र रोग विशेषज्ञ थे। अब बरेली में अपने बेटे के साथ रह रहे हैं, उनका अपना क्लिनिक है।महेंद्र चाचा जी के बारे में कुछ नहीं पता।

बिजनौर में रहने वाले ज्ञान बुवाजी से हमारा अच्छा संपर्क था; परसंडी बुवाजी १० दरिया गंज, दिल्ली में रहते थे, मेरी शादी में शामिल होने आए थे; वेद बुवाजी, मैं उनसे पहली बार मिला था और आखिरी बार, केवल एक बार; वे इटावा में रहते थे जिन्होंने मुझे और सुषमा को दोपहर के भोजन के लिए आमंत्रित किया था जब हम इटावा गए थे।

खैर, बाद में हमने उनके परिवार से संपर्क खो दिया और उनके बारे में ज्यादा नहीं जानते।

श्री राम स्वरुप मल, मेरे अपने दादाजी शहर में भगत जी के नाम से लोकप्रिय थे। वे बहुत ही सरल, अनुशासित और धार्मिक व्यक्ति, दयालु और उदार व्यक्ति थे। वह वैदिक शास्त्रों के बारे में ज्यादा नहीं जानता था लेकिन शायद अनजाने में भी वह उनका पालन कर रहा था। वह पढ़े-लिखे नहीं थे, पढ़े-लिखे भी नहीं थे। शायद ही कभी शहर से बाहर गए हों, बाहरी दुनिया के बारे में कुछ नहीं जानते थे; उसकी जरूरतें और इच्छाएं न्यूनतम थीं; वह बहुत स्वस्थ व्यक्ति थे, मैंने उन्हें कभी बीमार नहीं देखा और उनके निजी मामलों के लिए कोई मदद मांगते हुए नहीं देखा। वह जमींदार थे, विभिन्न स्थानों पर छोटी-छोटी कृषि भूमि का प्रबंधन करते थे और कुछ छोटे व्यवसाय करके भी अच्छा पैसा कमाते थे; उनका विवाह बिजनौर में हुआ था, लेकिन बिजनौर में उनके नाम पर कोई शरीर या कोई संपत्ति आदि मौजूद नहीं है; मेरी दादी का एक भाई और एक बहन थी (किरतपुर में विवाहित, एक बेटा था, श्री मंगू लाल जी जिनका छोटा सा अच्छा परिवार था; चाचा मंगू लाल जी रहस्यमय परिस्थितियों में गायब हो गए, कभी वापस नहीं लौटे और उनका परिवार बिखर गया; दादी जी, उनकी माँ, मेरी दादी, बहन हमारे साथ रहने आई और मौसी अपने बच्चों के साथ चांदपुर में अपने माता-पिता के पास चली गईं)। मेरी दादी के भाई का एक बेटा और एक बेटी थी; बेटी का विवाह मंडावर में श्री महाशय रघुबीर सरन जी से हुआ था (उनके दो बेटे थे, राम अवतार जी और प्रेम अवतार)। हम कभी-कभी विभिन्न अवसरों पर उनसे मिलने जाते थे, बहुत स्नेही परिवार, अब उनसे लंबे समय से संपर्क टूट गया, शायद पचास साल या उससे भी ज्यादा); मेरी दादी, भतीजे श्री कृष्ण लाल का एक बेटा था, ऋषि, बहुत ही सुंदर व्यक्तित्व की मृत्यु बहुत कम उम्र में हुई थी, मस्तिष्क के कैंसर से एक बहुत ही दुखद मौत (इस प्रकार उनके परिवार का अंतिम व्यक्ति परिवार की रेखा को समाप्त करने के लिए चला गया था); दो बेटियां, एक ने हसनपुर में शादी की और दूसरे ने रुड़की में शादी की (दुर्भाग्य से, मैं उनसे कभी नहीं मिला); दादी, भतीजे, ताऊ जी समय-समय पर हमारे साथ झालू में रहने के लिए आते थे, स्पष्ट कारणों से एक अच्छे लेकिन दुखी व्यक्ति- सब कुछ खोकर, उनकी बहुत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति थी);

मेरे दादाजी हालांकि दुनिया में बहुत रहते हैं लेकिन कम से कम लगाव, रुचियों और चिंताओं के साथ लेकिन बहुत जिम्मेदार और कर्तव्य से बंधे हैं; सबसे विवादित व्यक्ति। उनके तीन बेटे थे, बृज भूषण सरन गुप्ता, श्री कन्हैया लाल गर्ग और वेद प्रकाश गर्ग और एक बेटी, चमेली देवी। मैं अपने सभी भाइयों और चचेरे भाइयों में सबसे भाग्यशाली व्यक्ति हूं, जिन्हें मेरे दादाजी का प्यार और स्नेह है। वास्तव में, मुझे अपने सभी रिश्तेदारों और शहर के लोगों से सबसे ज्यादा प्यार मिला। मेरे दादाजी का जीवन भर बिना किसी बीमारी के, 85 वर्ष की आयु में, 1 जुलाई, 1953 को दिल का दौरा पड़ने से कुछ ही मिनटों में मृत्यु हो गई। यह मेरे लिए बहुत बड़ा सदमा था क्योंकि मैंने उस व्यक्ति को खो दिया जो मुझे सबसे ज्यादा प्यार करता था और मेरी देखभाल करता था। उन्होंने मुझे व्यावहारिक जीवन और हमारे धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठानों के महत्व की बहुत सी बातें बताईं, हालांकि उनके परिवार के सदस्यों के साथ उनकी बातचीत कम से कम थी। मैंने उसे अपनी बहन या बेटी से बात करते हुए कभी नहीं देखा लेकिन बस लापरवाही से।

उन्होंने रेधवा, गंडासपुर और सिकंदरपुर गाँव के पास एक पानी का कुआँ और एक छोटा सा आश्रय बनाया; दो पीपल के पेड़ लगाए; संयोग से, यह १ जून १९३६ था, जिस दिन मेरा जन्म हुआ था। उन दिनों, उस क्षेत्र में यात्रा करने वाले या काम करने वाले लोगों के लिए यह एक बड़ी मदद थी क्योंकि पास में कोई जल स्रोत या शेड नहीं था। हमारे परिवार देवता (ग्रह देवता) का छोटा मंच है। हम उनकी पूजा करते हैं (सफेद सांपों की एक जोड़ी, जिसे स्थानीय रूप से भूरे सिंह देवता के रूप में जाना जाता है) विशेष अवसरों पर जैसे परिवार में किसी की शादी; परिवार में पैदा हुआ बेटा आदि। ऐसा माना जाता है कि वे हमारे परिवार की देखभाल करते हैं। हम उन्हें पूरा सम्मान देते हैं। 2008 में, जब मैंने उस जगह का दौरा किया, तो मैंने पाया कि उस जगह का भूगोल और स्थलाकृति पूरी तरह से बदल गई है; यह अब चारों ओर बहुत सारे जल स्रोतों के साथ हरा-भरा है।

मेरे दादा और दादी हर साल रक्षा बंधन के अवसर पर गंगा स्नान के लिए गंज जाया करते थे। मैं हमेशा उनके साथ रहा और यात्रा का आनंद लिया; यहाँ दो घटनाओं का उल्लेख है:

(१) एक बार, मैं देख रहा था कि युवा लड़के और लोग गंगा में गोता लगा रहे थे जो इस महीने और इस समय बहुत अशांत और बाढ़ की स्थिति में बहती थी। मैंने सोचा कि अगर वे गोताखोरी और तैराकी कर सकते हैं, तो मैं ऐसा क्यों नहीं कर सकता। प्रभु का ही निर्देश था कि अंतिम क्षण में मैं डर गया और वह घातक गोता नहीं लगाया, नहीं तो गंगा की उन ऊँची धाराओं में मैं चला ही जाता;

(२) मुझे अपने बाबा जी के साथ गंज से लगभग २ मील दक्षिण में निजामतपुरा/इस्लामाबाद में ब्रह्मचारी जी के एक आश्रम में जाना याद है। कई चमत्कारों और रहस्यमय घटनाओं के लिए स्थानीय लोगों द्वारा इस स्थान को अजीब और आध्यात्मिक रूप से मान्यता प्राप्त है। निःसंदेह ब्रह्मचारी जी के पास बिना किसी स्वार्थ और लोभ के वास्तव में जरूरतमंद लोगों की मदद करने की महान दिव्य शक्तियां थीं। (२००८; जब मैं गंज गया था और जिस स्थान पर गंगा जी बहती थी, वहाँ वर्षा ऋतु में बाढ़ के समय भी गंगा के प्रवाह का कोई संकेत नहीं था। दूर की जगह के लिए यह सब सूखा था। कोई कुछ देख सकता था) गंगा जी के बीच में लंबी दूरी पर एक प्रकार का बगीचा और खेती। इस विनाशकारी परिवर्तन को देखकर बहुत धक्का लगा। केवल पुराने घाट, मंदिर गंगा के किनारे पर पड़े थे और शायद उनके आगे विनाश की प्रतीक्षा कर रहे थे। भविष्य।

My Uncle: Shri Ved Prakash Garg 😦 3rd. April,1917 )

उनके सबसे छोटे भाई और बहन ने रुड़की विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की और एमईएस- मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज में शामिल हो गए; नजीबाबाद के लाला हन्नू मल की बेटी सावित्री देवी से शादी की। उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने एक बेटी, संतोष को गोद लिया, जो मेरी मौसी की एक बहन की बेटी थी। दरअसल, मेरे चाचा ने मुझे गोद लेने की पूरी कोशिश की लेकिन मेरी मां कभी इसके लिए राजी नहीं हुईं। मैं कुछ समय के लिए मेरठ, लखनऊ और देहरादून में चाचा के साथ रहा क्योंकि वह मुझे आकर्षित करना चाहते थे लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। 1976 में सेवानिवृत्त होने के बाद, वह जीवन भर देहरादून में रहे। मैंने मिस्टर पोद्दार के राजपुर रोड पर उस अच्छे घर की व्यवस्था की, जिन्होंने अपना घर मेरे चाचा को बेच दिया और कलकत्ता के लिए रवाना हो गए। इस संदर्भ में मुझे एक छोटी सी कहानी का उल्लेख करना चाहिए। जब मैं नाइजीरिया में अपनी नई नौकरी में शामिल होने जा रहा था, मेरे चाचा थोड़ा दुखी थे और उन्होंने कहा कि वह देहरादून में बस गए ताकि मैं उनकी मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार और अंतिम अधिकार कर सकूं। मैंने उसे उत्तर दिया "चाचा, यह शायद ही मायने रखता है कि मृत्यु के बाद किसी का क्या होता है, कोई अपने शरीर के माध्यम से नाली में या गंगा में ले जा सकता है, हालांकि, जीवित रहते हुए देखभाल और प्यार करना चाहिए। "वास्तव में, उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों, चचेरे भाइयों, भाइयों और बहन आदि के लिए कुछ भी नहीं किया, राम कृष्ण मिशन के प्रभाव में, उन्होंने अस्पताल में रोगियों को फल और दवा आदि के साथ सेवा की। मैंने निश्चित रूप से लिखा था। मेरी मौसी की मृत्यु के बाद अपने जीवन के अंतिम पाँच वर्षों के दौरान उसे कुछ पत्र मिले क्योंकि वह उस बड़े घर में अकेला रह रहा था; कि वह अपने पैसे और संपत्ति को एक ट्रस्ट के माध्यम से दान करें, संभवतः शिक्षा या स्वास्थ्य जैसे समाज के अच्छे कारण के लिए चाची के नाम पर ट्रस्ट का नामकरण; उसके चचेरे भाई अच्छे हैं, उसे उसके पैसे की जरूरत नहीं है; संतोष, उसके बच्चे या उसके ससुराल के अन्य रिश्तेदार भी अच्छे हैं, उसके पैसे की जरूरत नहीं है। लेकिन दुर्भाग्य से, जिन कारणों से उन्हें सबसे अच्छी तरह पता था, उन्होंने ऐसा नहीं किया और संतोष और उसके बच्चों के लिए सब कुछ छोड़ दिया। वे इस अनर्जित, अयोग्य धन और संपत्ति का कभी भी आनंद नहीं ले सकते। दुर्भाग्य से, उन्होंने रमेश के लिए कुछ भी नहीं छोड़ा, जिन्होंने लगभग एक चौथाई सदी तक बहुत ईमानदारी से उनकी सेवा की; अपने साले के लिए भी कुछ नहीं, ऋषि जो अपनी व्यक्तिगत देखभाल कर रहे थे (ऋषि, खुद भी करने के लिए अच्छा है, एमईएस से सेवानिवृत्त हुए और अच्छी तरह से देहरादून में बस गए, उन्हें अपने पैसे या किसी भी चीज की आवश्यकता नहीं थी); दिसंबर 2008 में निधन हो गया। उसके चचेरे भाई अच्छे हैं, उसे उसके पैसे की जरूरत नहीं है; संतोष, उसके बच्चे या उसके ससुराल के अन्य रिश्तेदार भी अच्छे हैं, उसके पैसे की जरूरत नहीं है। लेकिन दुर्भाग्य से, जिन कारणों से उन्हें सबसे अच्छी तरह पता था, उन्होंने ऐसा नहीं किया और संतोष और उसके बच्चों के लिए सब कुछ छोड़ दिया। वे इस अनर्जित, अयोग्य धन और संपत्ति का कभी भी आनंद नहीं ले सकते। दुर्भाग्य से, उन्होंने रमेश के लिए कुछ भी नहीं छोड़ा, जिन्होंने लगभग एक चौथाई सदी तक बहुत ईमानदारी से उनकी सेवा की; अपने साले के लिए भी कुछ नहीं, ऋषि जो अपनी व्यक्तिगत देखभाल कर रहे थे (ऋषि, खुद भी करने के लिए अच्छा है, एमईएस से सेवानिवृत्त हुए और अच्छी तरह से देहरादून में बस गए, उन्हें अपने पैसे या किसी भी चीज की आवश्यकता नहीं थी); दिसंबर 2008 में निधन हो गया। उसके चचेरे भाई अच्छे हैं, उसे उसके पैसे की जरूरत नहीं है; संतोष, उसके बच्चे या उसके ससुराल के अन्य रिश्तेदार भी अच्छे हैं, उसके पैसे की जरूरत नहीं है। लेकिन दुर्भाग्य से, जिन कारणों से उन्हें सबसे अच्छी तरह पता था, उन्होंने ऐसा नहीं किया और संतोष और उसके बच्चों के लिए सब कुछ छोड़ दिया। वे इस अनर्जित, अयोग्य धन और संपत्ति का कभी भी आनंद नहीं ले सकते। दुर्भाग्य से, उन्होंने रमेश के लिए कुछ भी नहीं छोड़ा, जिन्होंने लगभग एक चौथाई सदी तक बहुत ईमानदारी से उनकी सेवा की; अपने साले के लिए भी कुछ नहीं, ऋषि जो अपनी व्यक्तिगत देखभाल कर रहे थे (ऋषि, खुद भी करने के लिए अच्छा है, एमईएस से सेवानिवृत्त हुए और अच्छी तरह से देहरादून में बस गए, उन्हें अपने पैसे या किसी भी चीज की आवश्यकता नहीं थी); दिसंबर 2008 में निधन हो गया। लेकिन दुर्भाग्य से, जिन कारणों से उन्हें सबसे अच्छी तरह पता था, उन्होंने ऐसा नहीं किया और संतोष और उसके बच्चों के लिए सब कुछ छोड़ दिया। वे इस अनर्जित, अयोग्य धन और संपत्ति का कभी भी आनंद नहीं ले सकते। दुर्भाग्य से, उन्होंने रमेश के लिए कुछ भी नहीं छोड़ा, जिन्होंने लगभग एक चौथाई सदी तक बहुत ईमानदारी से उनकी सेवा की; अपने साले के लिए भी कुछ नहीं, ऋषि जो अपनी व्यक्तिगत देखभाल कर रहे थे (ऋषि, खुद भी करने के लिए अच्छा है, एमईएस से सेवानिवृत्त हुए और अच्छी तरह से देहरादून में बस गए, उन्हें अपने पैसे या किसी भी चीज की आवश्यकता नहीं थी); दिसंबर 2008 में निधन हो गया। लेकिन दुर्भाग्य से, जिन कारणों से उन्हें सबसे अच्छी तरह पता था, उन्होंने ऐसा नहीं किया और संतोष और उसके बच्चों के लिए सब कुछ छोड़ दिया। वे इस अनर्जित, अयोग्य धन और संपत्ति का कभी भी आनंद नहीं ले सकते। दुर्भाग्य से, उन्होंने रमेश के लिए कुछ भी नहीं छोड़ा, जिन्होंने लगभग एक चौथाई सदी तक बहुत ईमानदारी से उनकी सेवा की; अपने साले के लिए भी कुछ नहीं, ऋषि जो अपनी व्यक्तिगत देखभाल कर रहे थे (ऋषि, खुद भी करने के लिए अच्छा है, एमईएस से सेवानिवृत्त हुए और अच्छी तरह से देहरादून में बस गए, उन्हें अपने पैसे या किसी भी चीज की आवश्यकता नहीं थी); दिसंबर 2008 में निधन हो गया। ऋषि जो अपनी व्यक्तिगत देखभाल कर रहे थे (ऋषि, स्वयं भी स्वस्थ हैं, एमईएस से सेवानिवृत्त हुए और अच्छी तरह से देहरादून में बस गए, उन्हें अपने पैसे या किसी चीज की आवश्यकता नहीं थी); दिसंबर 2008 में निधन हो गया। ऋषि जो अपनी व्यक्तिगत देखभाल कर रहे थे (ऋषि, स्वयं भी स्वस्थ हैं, एमईएस से सेवानिवृत्त हुए और अच्छी तरह से देहरादून में बस गए, उन्हें अपने पैसे या किसी चीज की आवश्यकता नहीं थी); दिसंबर 2008 में निधन हो गया।

My uncle, Shri Kanhaiya Lal Garg: ( 3rd August, 1913 )

बहुत बुद्धिमान व्यक्ति, डीएवी कॉलेज, कानपुर के विज्ञान स्नातक, राज्य सिविल सेवा में शामिल हुए। वह अपने कैडर के उत्तराधिकार में ऊपर जा सकता था लेकिन अपने लालच और अल्पकालिक लाभों के लिए। वे मूल रूप से एक साहित्यकार थे, लेकिन अन्य सांसारिक मामलों में अपनी प्रतिभा खो दी। उन्होंने बहुत ही रोचक कविताएँ लिखी हैं। उनकी स्मृति उत्कृष्ट थी, अधिकांश रामायण को याद किया और इस अवसर पर बहुत प्रासंगिक दोहे/चोपाई आदि का पाठ करेंगे; उसने अपने सबसे बड़े और बहुत सुन्दर पुत्र विनोद को खो दिया और वह बिखर गया। उनके दो बेटे, दिनेश कुमार गर्ग और राकेश कुमार गर्ग, चार बेटियां, शारदा, आशा, बिमला और मधु; वे सभी अपने परिवारों के साथ अच्छी तरह से बस गए, गरीब राकेश को छोड़कर, जिन्होंने जीवन भर संघर्ष किया, दो बार शादी की, फिर भी अकेले रहते थे। दिनेश यूपी बिजली बोर्ड से कार्यकारी अभियंता के रूप में सेवानिवृत्त हुए और देहरादून में बस गए। उसके दो बेटे हैं।

(नदी के तट पर एक आश्रम का दौरा किया);

मेरे पिता: श्री बृज भूषण सरन गुप्ता:

मेरे पिता, उनके भाइयों और बहन में सबसे बड़े, एक पेशेवर मेडिकल डॉक्टर थे- आगरा मेडिकल स्कूल के छात्र थे, जो उस समय यूपी के दो स्कूलों में से एक था; दूसरा लखनऊ में। एक बहुत ही सरल, सामाजिक और जिम्मेदार व्यक्ति। हमारे शहर में उनकी समर्पित सामुदायिक सेवाओं के लिए याद किया जाएगा। वह न केवल हमारे शहर में बल्कि आसपास के कई गांवों में बहुत लोकप्रिय डॉक्टर थे; उस इलाके में एकमात्र पेशेवर चिकित्सक जो AZ चिकित्सा सेवाएं प्रदान करता है। वह कभी लालची व्यक्ति नहीं थे, केवल सेवा उन्मुख थे; वह एक अमीर व्यक्ति हो सकता था लेकिन वह एक गरीब व्यक्ति के रूप में केवल कुछ कर्ज के साथ मर गया। कभी-कभी उसके पास पैसे नहीं होते थे, दिन-ब-दिन जीने के लिए इधर-उधर से उधार लिया था

मेरा भाई: लक्ष्मी नारायण गुप्ता ( )

मेरे भाई संतोष कुमार गुप्ता (१ मार्च १९४६)

मेरे भाई वीरेंद्र कुमार गुप्ता ( )

मेरे भाई कृष्ण मोहल लाल गर्ग (16 दिसंबर, 1955)

मेरी बहन लक्ष्मी देवी मेहता

मेरी बहन राज बंसल

डरावना क्षण: छोया नदी में बाढ़

 
 
 
 
 
 
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इससे पहले की एक कहानी पिछले ब्लॉग में दी गई है: https://davendrak.wordpress.com/wp-admin/post.php?post=1162&action=edit

तथा ; https://www.blogger.com/u/1/blogger.g?blogID=7434278182063497637#editor/target=post;postID=1372591972643791120;onPublishedMenu=allposts;onClosedMenu=allposts;postNum=2;src=postname

बचपन की कुत्छ और पुरानी यादों में से यह घटना भी श्रावणी के अवसर पर गंगा स्नान तथा पूजा करने की है ! प्रितीयेक वर्ष की भांति , एक और किसि वर्ष , हम ( बाबाजी, दादी जी और मैं ) , दारानगर गंज गए थे ! पूजा पाठ , स्नान आदि से निपट के पश्चात , लगभग एक बजे भोजन किया था ! हर साल की भांति , दादी जी , आलू , पूरी , अचार के साथ स्वदिस्थ भोजन लाती थीं ! घर वापिस आने की तय्यारी कर रहे थे कि वर्षा प्रारम्भ हो गयी ! वर्षा का वेग बढ़ता ही गया ! प्रितिक्षा करते रहे कि वर्षा कम हो तो घर वापिस चलें ! वर्षा तो कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी , वोह तो बढती ही जा रही थी! विचार किया, बाबा जी ने कहा कि शाम होने से पहले पहले निकल लेना उचित होगा ! येहां कोइ रहने का प्रबंध नहीं है अतह वर्षा में भीगते हुए ही हम लोग घर के लिए वापिस चल दिए ! गंज से, सिकन्दरपुर, रेहरुँवा ,गंदासपुर , होते हुए , चोव्न्क्पुरी होते हुए घर जाना होता है ! येही बेलगाडी का उस समय , सब से उचित मार्ग था ! गंदासपुर से आधा मील दूर गए थे कि छोएया नदी आ गयी ! भरी वर्षा के कारण , नदी तो पूरे उफान पर थी ! गढ़ गधगढ़ात के साथ, छोएये में अतियाधिक पानी , अतियाधिक गती से बहता जा रहा था ! कुत्छ देर प्रितिक्षा की ! शाम तो ढलती जा रही थी, रात्री का अन्धेरा आता जा रहा था! यही नदी जब प्रातः में आये थे तो सुखी पड़ी थी !

छोएया नदी बरसाती नदी है , जो यदि वर्षा ना हो तो लग भग खाली /सुखी ही रहती है! अधिक वर्षा के कारण, विशेषकर, यदि , गढ़वाल ( हिमालया के पहाड़ का भाग) में अधिक वर्षा हो जाये तो फिर छोएये में पानी आ जाता है! वहीं से छोएये का उद्गम है , और बिजनोर जिले में, उत्तर से दक्षिण की ओंर बहते हुए यह रसूल भंवर अह्त्म्ली के पास गंगा जी में मिल जाता है ! छोर्ये पर बड़े बड़े मार्गों पर तो छोटे पुल हैं परन्तु , छोटे छोटे रास्तों में कोई पुल या पुलिया नहीं है ! साधारण दिनों में सभी ऐसे ही नदी से हो कर चले जाते हैं!

अब तो रात लग भग हो ही चुकी थी, छोएया को पार करना असम्भव था ! सुखन सिंह, हमारी गाडी वाला तो छोयेया पार करने के लिए ही कहता रहा , परन्तु , बाबा जी ने निर्नियेय लिया कि वापिस चला जाये और गंदासपुर में रात्री में विश्राम किया जाये ! गंदासपुर आ गये , हमारे किसान भाई भी बहुत खुश थे कि उन्हें , भगत जी ( बाबा जी को उनके किसान , भ्क्त्जी ही कह कर स्म्भोतित करते थे! ), की सेवा का अवसर मिलेगा !

सब ने मिल कर हमारे खाने, पीने , रात्री में सोने आदि का अपनी और से स्र्वौत्त्म प्रभंध किया ! मुझे तो वहां

बहुत अछा लगा ! वर्षा तो रात भर होती ही रही ! गंदासपुर तथा उस रेहेनेवाले स्थान का वर्णन करूं तो एक और कहानी बन जायेगी ! वहां का वातावरण , भीनी भीनी खुशबू , पशुओं की आवाजें , आदि, आदि ! घर कच्चे थे परन्तु बड़े बड़े और साफ़ सुथरे थे !

यदि हम लोगों ने नदी पार का प्रियस किया होता तो समभ्त , यह ब्लॉग लिखने का अवसर न मिलता, छोएया , हम को , गंगाजी में विलीन कर देता ! यह सोच कर तथा उस घटना को सोच कर भी , आज भी भय भीत हो जाता हूँ! भगवान, स्वम् , उचित मार्ग दिखा कर हमारी रक्षा करते हैं !

Scary moments; SHRAVANI POOJA AT DARA NAGAR GANJ

 
 
 
 
 
 
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हमारे परिवार की परम्परा के अनुसार, हम लोग रक्षा बंधन का पर्व नहीं मानते हैं ! प्र्तियेक वर्ष , बाबाजी, श्रावणी की पूजा के लिए दारानगर गंज जाते थे ! बेलगाडी से, मैं, दादीजी और बाबा जी शीघ्र सवेरे ही गंज की यात्रा पर निकल जाते थे ! वहां जाकर गंगास्नान करते , फिर बाबा जी, अन्य लोगों के साथ पूजा , हवन आदि करते थे! काफी लोग, विभिन, विभिन, स्थानों से श्रावणी पूजन के लिए यहाँ आते थे ! सभी लोग, गांगजी में खड़े होकर अपने अपने यज्ञोपवीत बदलते थे !

सावन का महीना , गंगाजी तो अपने पूरे उफान पर होती हैं ! अत्येअधिक जल तथा गति के साथ बहती हैं ! दुसरा छोर भी दिखाई नहीं देता है ! चारों ओंर जल ही जल दिखाई पड़ता है ! गंगाजी के किनारे अछे पक्के घाट बने हुए हैं ! सुरक्षा के लिए घाटों में कुत्छ सीढ़ियों के बाद , एक मजबूत ज़ंजीर भी डाल कर रखते हैं ! घाटों के दोनों और पक्के पुखते होते हैं , जिस से घाट पर जल का प्रवाह कुत्छ कम हो जाता है और उन्ही पुख्तों में जंजीर भी बाँध देते हैं!

कुत्छ स्थानीय युवक गंगाजी में स्नान करने आते हैं, इस बार भी, काफी युवक आये थे ! यह युवक , उन पुख्तों से कूद कूद कर गंगा जी में तैर कर कुत्छ दूर जाते, फिर पास ही से वापिस आ कर , कूदना, तैरना, निकलना करते ही रहते थे ! बड़ा अछा लगता था, इच्छा होती की मैं भी ऐसा करूं, जब यह कर सकते हैं तो मैं कियों नहीं कर सकता ?

मैं छोटा ही रहा होंगा लग भग १० वर्ष का ! कई बार पुखते पर गया , मन करता कि मैं भी कूद कर यही आनंद लूं जो यह युवक ले रहे हैं! किसी अन्तेह कर्ण की प्रेरणा से बस नहीं कूदा ! बच गया, कंही, कूद गया होता तो, पास में भंवर भी, था, मुझे तो तैरना भी नहीं आता था ! अभी भी तैरना नहीं आता! अब कभी सोचता हूँ , कल्पना करता हूँ उस समय की इस घटना की तो, बस भगवान में विश्वास और बढ़ जाता है कि उनकी प्रेरणा से मैं नहीं कूदा ! God takes care of every one especially the children who are ignorant of certain actions and their results.

पछतावा: पश्चाताप

 
 
 
 
 
 
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कभी कभी , कल्पना तथा विचारों में खो जाता हूँ ! पुराना समय स्मरण हो जाता है !

कल सोच रहा था कि १९६१ से १९७३ तक, १२ वर्षों में ,मैं ONGC में, उस समय के अनुसार उचित पद पर उचित वेतन पर कार्य करता था! इस बीच में,मैं देहरादून, मद्रास, करैकाल, बरोदा, जोधपुर आदि कई स्थानों पर रह कर कार्य करता था! कभी विचार नहीं आया कि माता पित्ता को भी वोह सब स्थान कियों नहीं घुमा दिए ! कभी भी, कहीं से , कुत्छ भी नहीं लाया उनके लिए! एक पाजामा, एक, कमीज या कोइ अन्य वस्तु – कुत्छ भी नहीं लाया, कुत्छ भी नहीं दिया, कुत्छ भी नहीं किया उनके लिए ! पिता जी के लिए केवल , उनके अंतिम समय में ( कियोंके उनके पास वोह भी नहीं थे ) दो बनयान, अस्पताल में, ले कर आया ! दुर्भाग्य है , सब कुत्छ होते हुवे भी कुत्छ नहीं कर पाया! आज, बहुत खेद होता है!

इस खेद का का कुत्छ उपचार , निदान हो सकता है??

स्म्भाव्ते नहीं, सब कार्य अपने समय से होते हैं!

सीमित साधन, धन और आवास आदि होने का कोई बहाना आसानी से दे सकता है, लेकिन जब दैनिक जीवन में अन्य चीजों का प्रबंधन किया जाता है, तो इसे भी क्यों नहीं समायोजित किया जा सकता है। यह उस विशेष समय या अवधि में दृष्टिकोण, भावनात्मक बुद्धिमत्ता की बात है। उस दिशा में सोचना हमारे बस की बात नहीं है।

मैं इस तरह की स्थिति के मुख्य कारणों के बारे में सोच सकता हूं:

25-50 वर्ष की आयु के दौरान- ग्रहास्त आश्रम के रूप में जाना जाता है, व्यक्ति स्वयं के विकास में व्यस्त और केंद्रित होते हैं; कैरियर विकास ; एक आरामदायक जीवन को बनाए रखने और जीने के लिए जीवन में सबसे महत्वपूर्ण; परिवार का विकास; ईश्वर द्वारा अपनी रचना की रक्षा के लिए तैयार की गई एक प्राकृतिक प्रक्रिया- सामाजिक, धार्मिक और अन्य सभी दृष्टिकोणों से सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी और कर्तव्य। बच्चों के कल्याण और विकास की देखभाल करनी चाहिए ताकि वे स्वतंत्र रूप से जीवन में खड़े होने के लिए अपने ब्रह्मचर्य आश्रम में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकें। आत्म-विकास की इस प्रक्रिया में व्यक्ति इतने अधिक शामिल होते हैं कि वे परिवार या समाज के लिए अन्य दायित्वों के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं। हालांकि, इस अवधि के दौरान (50-75 वर्ष की आयु से) समाज के लिए बहुत कुछ नहीं करना चाहिए। इन दायित्वों को पूरा करने के लिए हमारे पास वन प्रसाद आश्रम है) लेकिन माता-पिता को थोड़ा सोचना चाहिए, खासकर अगर उन्हें हमारे समर्थन और मदद की जरूरत है। उन्होंने हमारे लिए वह सब किया है जो हम अपने बच्चों के लिए करते रहे हैं या करना चाहते हैं; हमारे माता-पिता ने हमसे कुछ उम्मीद की होगी जैसे हम अपने बच्चों से करते हैं।

वास्तव में, हमें अपने जीवन के प्रत्येक चरण में समय-समय पर विश्लेषण और मूल्यांकन/मूल्यांकन करना चाहिए कि हम अपने आसपास के समाज के व्यक्तियों - परिवार के सदस्यों, दोस्तों और अन्य लोगों के लिए क्या चाहते हैं। हमारे कुछ दायित्वों को पूरा किया जाना बाकी है।

मैंने अपने कुछ पछतावे पहले के ब्लॉग में भी लिखे हैं; https://www.blogger.com/u/1/blogger.g?blogID=7434278182063497637#editor/target=post;postID=7011055118277005336;onPublishedMenu=allposts;onClosedMenu=allposts;postNum=6;src=postname