Monday, August 23, 2021

नजीबाबाद के चौधरी अमन सिंह की जमीन में बना गुरूकुल विश्वविद्यालय

विश्वविद्यालय केम्पस में मुंशी अमन सिंह के
नाम पर
                   पर बना अमनचौक





     मुंशी अमन सिंह के नाम पर 
     बना अमन गेट









नजीबाबाद के चौधरी अमन सिंह की जमीन में बना गुरूकुल विश्वविद्यालय गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार देश का जाना मना विश्वविद्यालय है। उसकी स्थापना 1902 में स्वामी श्रद्धानंद जी हरिद्वार से उत्तर में कांगड़ी गांव में तबके बिजनौर जनपद में की। आज इसका केम्पस हरिद्वार से चार किलोमीटर दूर दक्षिण में है।इसके तीन संभाग है। मुख्य केम्पस हरिद्वार( केवल पुरुषों के लिए है )। 2,कन्या गुरुकुल महाविद्यालय हरिद्वार/ केवल कन्याओं के लिए है -कन्या गुरुकुल महाविद्यालय देहरादून- केवल कन्याओं के लिए आज इसमें हजारों छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं इसका अपना बहुत बड़ा संकाय है किंतु यह भी नहीं जानते किसके लिए बिजनौर जनपद के नजीबाबाद के रहने वाले चौधरी अमन सिंह ने अपना 1200 बीघा जमीन का कागड़ी गांव और अपने पास एकत्र सम्पूर्ण राशि ₹11000 इसकी स्थापना के समय इस विद्यालय को दान की थी। मुंशी अमन सिंह की जगह हरिद्वार से सटे पहाड़ियों में स्थित कांगड़ी गांव में है । ऐसी ही जगह पहाड़ियों में महात्मा मुंशीराम का अपना गुरुकुल बनाने का सपना था। कांगडी उस समय बिजनौरं जनपद में होती थी। अब हरिद्वार जिला बनने के बाद यह हरिद्वार में चला गया। 19वीं शताब्दी में भारत में दो प्रकार की शिक्षापद्धतियाँ प्रचलित थीं। पहली पद्धति ब्रिटिश सरकार द्वारा अपने शासन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विकसित की गई सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों की प्रणाली थी और दूसरी संस्कृत, व्याकरण, दर्शन आदि भारतीय वाङ्मय की विभिन्न विद्याओं को प्राचीन परंपरागत विधि से अध्ययन करने की पाठशाला पद्धति। अत: सरकारी शिक्षा पद्धति में भारतीय वाङ्मय की घोर उपेक्षा करते हुए अंग्रेजी तथा पाश्चात्य साहित्य और ज्ञान विज्ञान के अध्ययन पर बल दिया गया। इस शिक्षा पद्धति का प्रधान उद्देश्य मेकाले के शब्दों में 'भारतीयों का एक ऐसा समूह पैदा करना था, जो रंग तथा रक्त की दृष्टि से तो भारतीय हो, परंतु रुचि, मति और अचार-विचार की दृष्टि से अंग्रेज हो'। इसलिए यह शिक्षापद्धति भारत के राष्ट्रीय और धार्मिक आदर्शों के प्रतिकूल थी। दूसरी शिक्षा प्रणाली, पंडितमंडली में प्रचलित पाठशाला पद्धति थी। इसमें यद्यपि भारतीय वाङ्मय का अध्ययन कराया जाता था, तथापि उसमें नवीन तथा वर्तमान समय के लिए आवश्यक ज्ञान विज्ञान की घोर उपेक्षा थी। उस समय देश की बड़ी आवश्यकता पौरस्त्य एवं पाश्चात्य ज्ञान विज्ञान का समन्वयय करते हुए दोनों शिक्षा पद्धतियों के उत्कृष्ठ तत्वों के सामंजस्य द्वारा एक राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली का विकास करना था। इस महत्वपूर्ण कार्य का संपन्न करने में गुरुकुल काँगड़ी ने बड़ा सहयोग दिया। गुरुकुल के संस्थापक महात्मा मुंशीराम पिछली शताब्दी के भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण में असाधारण महत्व रखने वाले आर्यसमाज के प्रवर्तक महर्षि दयानंद (1824-1883 ई.) के सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'सत्यार्थ प्रकाश' में प्रतिपादित शिक्षा संबंधी विचारों से बड़े प्रभावित हुए। उन्होंने 1897 में अपने पत्र 'सद्धर्म प्रचारक' द्वारा गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के पुनरुद्वार का प्रबल आन्दोलन आरम्भ किया। 30 अक्टूबर 1898 को उन्होंने इसकी विस्तृत योजना रखी। नवंबर, 1898 ई. में पंजाब के आर्य समाजों के केंद्रीय संगठन आर्य प्रतिनिधि सभा ने गुरुकुल खोलने का प्रस्ताव स्वीकार किया । महात्मा मुंशीराम ने यह प्रतिज्ञा की कि वे इस कार्य के लिए, जब तक 30,000 रुपया एकत्र नहीं कर लेंगे, तब तक अपने घर में पैर नहीं रखेंगे। तत्कालीन परिस्थितियों में इस दुस्साध्य कार्य को अपने अनवरत उद्योग और अविचल निष्ठा से उन्होंने आठ मास में पूरा कर लिया। 16 मई 1900 को पंजाब के गुजराँवाला स्थान पर एक वैदिक पाठशाला के साथ गुरुकुल की स्थापना कर दी गई। किन्तु महात्मा मुंशीराम को यह स्थान उपयुक्त प्रतीत नहीं हुआ। वे शुक्ल यजुर्वेद के एक मंत्र (26.15) उपह्वरे गिरीणां संगमे च नदीनां धिया विप्रो अजायत के अनुसार नदी और पर्वत के निकट कोई स्थान चाहते थे। इसी समय नजीबाबाद के धर्मनिष्ठ रईस मुंशी अमनसिंह जी ने इस कार्य के लिए महात्मा मुंशीराम जी को 1,200 बीघे का अपना कांगड़ी ग्राम दान दिया। हिमालय की उपत्यका में गंगा के तट पर सघन रमणीक वनों से घिरी कांगड़ी की भूमि गुरुकुल के लिए आदर्श थी। अत: यहाँ घने जंगल साफ कर कुछ छप्पर बनाए गए और होली के दिन सोमवार, 4 मार्च 1902 को गुरुकुल गुजराँवाला से कांगड़ी लाया गया। गुरुकुल का आरम्भ 34 विद्यार्थियों के साथ कुछ फूस की झोपड़ियों में किया गया। पंजाब की आर्य जनता के उदार दान और सहयोग से इसका विकास तीव्र गति से होने लगा। 1907 ई. में इसका महाविद्यालय विभाग आरंभ हुआ। 1912 ई. में गुरुकुल कांगड़ी से शिक्षा समाप्त कर निकलने वाले स्नातकों का पहला दीक्षान्त समारोह हुआ। सन १९१६ में गुरुकुल काँगड़ी फार्मेसी की स्थापना हुई। आरम्भ से ही सरकार के प्रभाव से सर्वथा स्वतंत्र होने के कारण ब्रिटिश सरकार गुरुकुल कांगड़ी को चिरकाल तक राजद्रोही संस्था समझती रही। 1917 ई. में वायसराय लार्ड चेम्ज़फ़ोर्ड के गुरुकुल आगमन के बाद इस संदेह का निवारण हुआ। 1921 ई. में आर्य प्रतिनिधि सभा ने इसका विस्तार करने के लिए वेद, आयुर्वेद, कृषि और साधारण (आर्ट्‌स) महाविद्यालय बनाने का निश्चय किया। 1923 ई. में महाविद्यालय की शिक्षा और परीक्षा विषयक व्यवस्था के लिए एक शिक्षापटल बनाया गया।… 24 सितंबर 1924 ई. को गुरुकुल पर भीषण दैवी विपत्ति आई। गंगा की असाधारण बाढ़ ने गंगातट पर बनी इमारतों को भयंकर क्षति पहुँचाई। भविष्य में बाढ़ के प्रकोप से सुरक्षा के लिए एक मई 1930 ई. को गुरुकुल गंगा के पूर्वी तट से हटाकर पश्चिमी तट पर गंगा की नहर पर हरिद्वार के समीप वर्तमान स्थान में लाया गया। 1935 ई. में इसका प्रबन्ध करने के लिए आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाब के अंतर्गत एक पृथक विद्यासभा का संगठन हुआ। अमन सिंह को सम्मान देने के लिए विश्व विद्यालय केम्पस में इनके नाम से अमन चौक बना हुआ है। विश्व विद्यालय का प्रवेश द्वार भी इनके नाम पर है।उसका नाम अमन द्वार है।अशोक मधुप

Sunday, August 22, 2021

अलीगढ़ का शराब कांड व्यवस्था जन्य है

अलीगढ़ का शराब कांड व्यवस्था जन्य है अशोक मधुप अलीगढ़ में जहरीली शराब पीने से मरने वालों की संख्या 80 से ज्यादा हो गर्इ।एक साल में उत्तर प्रदेश में विषाक्त शराब पीने से 150 के आसपास मौत हुर्इं हैं। ये एक बड़ी संख्या है। 2008 से 2020 तक के 12 साल में नकली और मिलावटी शराब पीने से 452 व्यक्ति मरे हैं।ये सरकारी आंकड़े हैं। मौत तो इससे काफी ज्यादा बतार्इ जा रही हैं। अलीगढ़ में शराब से हुर्इ मौत अलग हैं।ये घटना बिल्कुल अलग है।ये गांव में देहात में बन और बिक रही शराब से मौत होने की घटना नहीं है।यह मौत उस शराब से हुर्इ है, जो सरकारी ठेकों से बेची जा रही है।अब तक शराब से मौत सस्ती के चक्कर में गांव की बनी कच्ची शराब से होती थीं।ठेकों की शराब मंहगी होती हैं। सरकार को इससे काफी टैक्स मिलता है।सरकार के देख रेख में ये ठेके चलते हैं। गरीब नसेड़ी −सस्ती के चक्कर में गांव की बनी शराब खरीद कर प्रयोग करता है। गांव− देहात में शराब बनाने वालों को इनके बनाने की जानकारी ज्यादा नहीं होती। न उनके पास शराब की तेजी नापने के उपकरण होते हैं। इसीलिए उसके कर्इ बार परिणाम गलत आते हैं। ये ही मौत का कारण बनते हैं किंतु इस बार की घटना इससे अलग है। मरने वालों ने इस बार शराब सरकारी ठेके से खरीदी। उन ठेकों से जिनकी गुणावत्ता और सही माल की आपूर्ति के लिए पूरा प्रशासनिक अमला है। पुलिस और प्रशासन की तो संयुक्त जिम्मेदारी है ही। दो सौ ग्राम का 42 डिगरी का (पव्वा ) शराब की बोलत फैक्ट्री से नौ −सवा नौ रुपये के आसपास चलती है। ये ठेकेदार को 66.70 रुपये की मिलती है। इस प्रकार ये पव्वा कहलाने वाली दो सौ ग्राम शराब पर सरकार 56 रुपये के आसपास टैक्स लेती है। 13 रुपये के आसपास लाइसैंसी अपना खर्च लेकर ग्राहक को 80 रुपये के आसपास बेचते हैं। 56 रुपये के टैक्स के बाद सरकार का लाइसैंस शुल्क आदि भी होता है। दस रुपये की शराब पर लाइसैंस शुल्क और टैक्स लगभग 58− 60 के आसपास पड़ता है। दस रुपये की शराब 80 रुपये में खरीदने वाला ग्राहक समझता है कि उसे सही शराब मिल रही है। ऐसे में ठेके से जहरीली शराब मिल रही है तो प्रदेश की मशीनरी जिम्मेदार है। प्रदेश की व्यवस्था दोषी है। इसकी जिम्मेदारी इन सबकी है।ठेकों से बिकने वाली शराब की गुणावत्ता के लिए प्रदेश में अलग से पूरा आबकारी विभाग है। इस विभाग के अधिकारी जिम्मेदार हैं।आबकारी विभाग के वे सिपाही जिम्मेदार हैं जो वर्षों से एक ही जगह जमे हैं। इन विभागीय अधिकारियों −कर्मचारियों पर मरने वालों की हत्या के मुकदमें चलने चाहिए। सरकार ठेकों से बिकने वाली शराब से मोटा टैक्स लेती है। प्रति बोतल टैक्स निर्धारित है। इसलिए उसकी भी जिम्मेदारी बनती है। मरने वाले के परिवार को मुआवजा दे। जहरीली शराब पीने से मौत होती रहती हैं। मौत होने पर शोर मचता है। कुछ अधिकारियों पर कार्रवार्इ का चाबुक चलता है। कुछ दिन बाद सब ठीक हो जाता है। अधिकारी बहाल हो जाते हैं। कुछ दिन बाद फिर नया कांड हो जाता है।ये अलग तरह की घटना है। इसमें हुर्इ मौत व्यवस्था जन्य हैं।इन्हें क्षमा नहीं किया जा सकता। अलीगढ़ में तैनात आबकरी विभाग का अमला इन मौत के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है। इन पर हत्या के मुकदमें दर्ज होने चाहिए। साथ ही मृतकों के परिवार को दिया जाने वाला मुआवजा इनके वेतन से वसूला जाना चाहिए। इस प्रकरण में इतनी कठोर कार्रवार्इ होनी चाहिए कि आगे से कोर्इ ऐसा करने का दुस्साहस न कर सके। अशोक मधुप

Tuesday, August 17, 2021

चिकित्सक सिर्फ चिकित्सा कार्य ही करेंगे

अशोक मधुप उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। निर्णय है कि अब सरकारी चिकित्सक सिर्फ चिकित्सा कार्य ही करेंगे।उनसे प्रशासनिक कार्य नहीं लिया जाएगा। प्रशासनिक कार्य के लिए अब एमबीए युवा रखे जाएंगे। यह एक बड़ा निर्णय है। इसके दूरगामी परिणाम होंगे। आज यह चिकित्सा मे लागू किया जा रहा है। आगे कृषि, शिक्षा और तकनीकि सेवाओं में भी लागू होगा। इस व्यवस्था की लंबे समय से मांग चल रही थी। चिकित्सकों की कमी से जूझ रही उत्तर प्रदेश की स्वास्थय सेवा को इस निर्णय से बड़ी राहत मिलेगा। प्रशासनिक कार्य में मुक्ति पाकर चिकित्सक अब सिर्फ अपना कार्य ही करेंगे।अब तक व्यवस्था यह है कि सीनियर चिकित्सक प्रशासनिक कार्य देखता है। वह ही अस्पताल की व्यवस्था देखता है, वह ही सीएमएस और डिप्टीसीएमओ, सीएमओ,डिप्टी डाइरेक्टर, डाइरेक्टर आदि बनता है। वह ही प्रशासनिक कार्य करता है। चिकित्सा कार्य की जगह अब उसका कार्य मींटिग करना,व्यवस्था देखना, शिकायत सुनना और उनकी जांच करने तक रह जाता है। शासन के आदेश का पालन , मांगी गई जानकारी पत्रों के जवाब में ही पूरा दिन लग जाता है। इस आदेश से अब ऐसा नहीं होगा। ये अपना चिकित्सा कार्य करेंगे। प्रशासनिक कार्य के लिए अब एमबीए तैनात किए जांएगे।सीनियर चिकित्सक प्रशासनिक कार्य संभालने के बाद अपना चिकित्सा कार्य लगभग छोड़ देते हैं। वेचिकित्सा कार्य करना चाहतें हैं किंतु प्रशासनिक कार्य में मरीजों को देखने के लिए समय ही नहीं निकाल पाते।प्रशासनिक पद पर आने तक उनका काफी लंबा अनुभव हो जाता है। जरूरत ये ही कि वह अपना पुराना कार्य ही करें। इससे वे नए के मुकाबले मरीज को ज्यादा लाभ दे सकतें हैं। पर ऐसा होता नहीं। प्रशासनिक कार्य कोई भी कर सकता है । इसके लिए अलग से स्टाफ होना चाहिए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस निर्णय से दो लाभ होगें। प्रशासनिक कार्य में अब तक प्रदेश भर में लगभग सात सौ से एक हजार के आसपास सीनियर चिकित्सक लगे होंगे। एक झटके में हमें इतने योग्य चिकित्सक मिल जाएंगे। इनकी जगह एमबीए रखे जाएंगे।इस प्रकार प्रदेश के एक हजार के आसपास एमबीए युवाओं को रोजगार मिल जाएगा। बहुत समय से मांग की जा रही है कि बिजली,सिंचाई, कृषि और शिक्षा, तकनीकि शिक्षा आदि में विशेषज्ञों की कमी देखते हुए तकनीकि स्टाफ से प्रशासनिक कार्य न लिया जाए।इसके लिए अलग से स्टाफ रखा जाए। बिजली विभाग के वरिष्ठ इंजीनियर , सिचांई विभाग का तकनीकि स्टाफ , इंजीनियर अपना काम करे। प्रशासनिक कार्य के मुकाबले वह अनुभवी होने के कारण अपना कार्य ज्यादा बेहतर कर सकते हैं। कृषि विशेषज्ञ कृषि की नई योजनांए, नई रिसर्च पर ज्यादा बेहतर काम कर सकते हैं।प्रशासन का काम देखने के लिए अलग से अधिकारी होने चाहिए। विभागों के सीनियर विशेषज्ञों से प्रशासनिक कार्य लेकर उनकी प्रतिभा को क्षति पहुंचाई जाती है।ऐसे ही शिक्षा में हो, शिक्षक अपना काम करें। व्यवस्था देखने को प्रशासनिक अधिकारी अलग से हों। योगी आदित्यनाथ के इस निर्णय के दूरगामी परिणाम होंगे। प्रशासनिक कार्य से विशेषज्ञों को मुक्तकर उनसे उनका कार्य लिया जाएगा। इनकी जगह पर एमबीए रखे जाने से खाली घूम रहे एमबीए युवाओं को रोजगार मिलेगा। अशोक मधुप 8 jun 2021

Saturday, August 14, 2021

स्वामी रामदेव और एलोपैथिक चिकित्सकों में जवानी जंग

अशोक मधुप स्वामी रामदेव और एलोपैथिक चिकित्सकों में इस समय जवानी जंग जारी है।रामदेव आयुर्वेद और एलोपैथिक चिकित्सक अपनी −अपनी पैथी की महत्ता बताने में लगे हैं। दोनों अपनी – अपनी चिकित्सा पद्यति के गुण गाते नहीं अघा रहे ।अपनी चिकित्सा पद्यति का बड़ा बताने के चक्कर में दूसरी को नीचा दिखाने, कमतर बताने में लगे हैं। हालाकि स्वामी रामदेव केंद्रीय स्वास्थय मंत्री हर्षवर्धन के कहने पर खेद व्यक्त कर चुके हैं।इसके बावजूद जवानी जंग रूकने का नाम नहीं ले रही। जबकि दोनों की अपनी जगह अलग −अलग महत्ता है। दोनों का अलग−अलग महत्व है। एलोपैथी का गंभीर रोगों के उपचार में कोई जवाब नहीं है तो सदियों से भारतीयों का उपचार कर रही आयुर्वेद उपचार पद्यति का भी कोर्इ तोड़ नही हैं। कोरोना महामारी जब शुरू हुई तब तक उसका कोई उपचार नहीं था। उसकी भयावहता से सब सहमें थे। दुनिया डरी थी। सबको अपनी जान की चिंता थी । ऐसे गंभीर समय में एलोपैथिक चिकित्सक और स्टाफ आगे आया। उसने प्राणों की परवाह नहीं की। मरीज की जान बचाने के लिए दिनरात एक कर दिया। जो बन सकता था किया। उपलब्ध संसाधनों से वे लोगों की जान बचाने में लग गए।वैज्ञानिक आगे आए।उन्होंने एक वर्ष की अवधि में दुनिया को कोरोना की वैक्सीन उपलब्ध करा दी।ये आधुनिक चिकित्सा पद्यति का करिश्मा था। उसका कमाल था। कोराना के आने के समय जब दुनिया के पास इसका कोई उपचार नहीं था। इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी,तब हमारी प्राचीन चिकित्सा पद्यति आगे आई । आयुर्वेद आगे आया।उसने बताया कि सदियों से प्रयोग किया जा रहा आयुष काढ़ा, इस महामारी से लड़ने के लिए हमें सुरक्षा कवच देगा। हमारी इम्युनिटी बढ़ाएगा। रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करेगा। आयुर्वेद सदियों से बैकटीरिया जनित बीमारी से लड़ने के लिए नीम की महत्ता बताता रहा है। चेचक के मरीज के कमरे के बाहर नीम की टूटी टहनियां परिवार की महिलांए लंबे समय से रखती रहीं हैं। बीमार को नीम के पत्ते पके पानी में स्नान कराने का पुराना प्रचलन है। मान्यता है कि नीम बीमारी के कीटाणु मारता है। बुखार होने , ठंड लगने में तुलसा की चाय पीने का हमारे यहां पुराना चलन है। गिलोय भी इसी तरह की है। ऐसी बीमारी के समय गिलोय का काढा पीने का पुराना प्रचलन है। जब एलोपैथी के पास कोई दवा नहीं थी। उस समय भी हमारी परंपरागत पद्यति हमें बचा रहा थी। प्लेग , चेचक कोरोना जैसी बीमारी से लड़ने में मदद दे रही थी। हाथ मिलाने की परम्परा हमारी नहीं है। विदेशी है। हमारी दूर से हाथ जोड़कर प्रणाम करने की परंपरा है। इसका कोरोना काल में पूरी दुनिया ने लोहा माना।उसे कोरोना से बचाव में कारगर हथियार के रूप में स्वीकार किया। पुराना किस्सा है एक वैद्य जी की प्रसिद्ध दूर नगर के वैद्य जी को मिली। उन्होंने नए विख्यात हो रहे वैद्य जी का ज्ञान परखने का निर्णय लिया। एक शिष्य के उनके पास कोर्इ कार्य बताकर भेजा। पहले यात्रा पैदल होती थी। इसलिए आदेश किया कि आराम कीकर के पेड़ के नीचे करना। उसने ऐसा ही किया। वैद्य जी के पास जब वह पंहुचा तो उसकी बहुत खराब हालत थी। शरीर से जगह− जगह से खून बह रहा था । देखने से ऐसा लगता था कि वह कोढ़ का मरीज हो। वैद्य जी से वह मिला। उन्हें दूसरे वैद्य जी का संदेश दिया। वैद्य जी ने बीमारी के बारे में पूछा। उसने बता दिया।गुरू जी ने कीकर के वृक्ष के नीचे आराम करने को कहा था। । वैद्य जी समझ गये कि ये कीकर के नीचे आराम करने से हुआ है। वैद्य जी ने उसे नीम का काढ़ा पिलाया। पानी में नीम के पत्ते पकाकर स्नान कराया। जाते समय कहा कि रास्ते में नीम के पेड़ के नीचे विश्राम करते जाना। जब वह अपने गुरू जी के पास पंहुचा तो वह पूरी तरह स्वस्थ था। उसकी बीमारी खत्म हो गई थी। उसका शरीर पहले जैसा कांतिमान हो गया था। यह हमारी परंपरागत चिकित्सा है। इसे हम आयुर्वेद कहते हैं। यह पूर्वजों से चला आ रहा हमारा ज्ञान है। हमारी रसोई के मसाले पूरा आयुर्वेद है। इंसान का पूरा इलाज कर सकतें हैं। अशोक मधुप (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)