अशोक
मधुप
वरिष्ठ
पत्रकार
आवारा
कुत्तों पर सुप्रीम कार्ट द्वारा अपने पुराने आदेश को बरकरार रखने से अब लगता है कि देश को आवारा कुत्तों
के आंतक से मुक्ति मिल जाएगी। लोगों को
रैबीज की जान लेवा बीमारी से छुटकारा मिल सकेगा। न्यायालय ने नेशनल हाईवे
अथार्टी को भी कहा कि यह मार्ग पर इस तरह बाड़ और अवरोध
बनाए कि आवारा पशु सड़क पर न जा सके। न्यायालय के नेशनल हाईवे अथार्टी को दिए आदेश
से आशा बनी है कि आवारा पशुओं के टकराने से होने वाली दुर्घटनाएं कम होंगी।
आवारा कुत्तों से जुड़े मामले में फैसला सुनाते हुए मंगलवार को
सुप्रीम कोर्ट पुराने अपने पुराने आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने 11 अगस्त के पिछले आदेशों में बदलाव करने का
निर्देश देने की मांग करने वाली सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया । पीठ ने फैसला
सुनाते हुए कहा, सभी राज्य हर
शहर में एनिमल सेंटर बनाएं। जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने फैसला सुनाते हुए
कहा, कुत्तों के काटने की घटना लगातार जारी है और
यह दिखाया है कि संबंधित अथॉरिटी की लापरवाही दिखती है। अदालत ने कहा, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों का यह
दायित्व है कि लोगों के जीवन की रक्षा करें। राइट टू लाइफ की रक्षा करना राज्य और
यूटी की जिम्मेदारी है। सर्वोच्च
अदालत ने कहा, 'गरिमा
के साथ जीवन जीने का अधिकार सभी का अधिकार है। इसकी के तहत पब्लिक प्लेस में
एक्सेस का अधिकार उनका है। बिना डर लोग कहीं जा सकें, ये उनका अधिकार है।' पीठ ने कहा, बच्चे
और बुजुर्ग पर अटैक हो रहा है। कुत्तों द्वारा इंटरनेशनल ट्रैवलर को निशाना बनाया
गया है। पीठ
ने राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश जारी करते हुए कहा, सभी राज्य व केंद्र शासित प्रदेश एनिमल बर्थ
कंट्रोल लागू करें। राज्य तमाम सुविधाओं वाले यूटी एबीसी सेंटर हर जिले में
स्थापित करें। कोर्ट ने कहा, वहां
स्टेरलाइजेशन और वेक्सिनेशन प्रोग्राम वहां हो पाए।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और
जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने याचिकाकर्ताओं, प्रतिवादियों, पीड़ितों, कुत्तों के पक्ष में
शामिल लोग, पशु कल्याण बोर्ड और भारत सरकार की दलीलें सुनने के
बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
पीठ ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एएनएचएआई) की ओर से पेश हुए अधिवक्ता की दलीलें भ सुनी । इसमें सात नवंबर, 2025 के उस निर्देश के अनुपालन का जिक्र था। अदालत ने
प्राधिकरण को राष्ट्रीय राजमार्गों से आवारा पशुओं को हटाने और सड़कों के किनारे
बाड़ लगाने के निर्देश दिये थे। न्यायालय ने भारतीय पशु कल्याण बोर्ड
(एडब्ल्यूबीआई) को पशु आश्रय स्थलों या पशु जन्म नियंत्रण सुविधाओं के लिए अनुमति
मांगने वाले गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ)के आवेदनों पर कार्रवाई करने का निर्देश
दिया।पीठ ने एडब्ल्यूबीआई का पक्ष रख रहे अधिवक्ता से कहा, 'या तो आप आवेदन स्वीकार करें या अस्वीकार करें, लेकिन इसे शीघ्रता से करें।' शीर्ष अदालत ने यह
टिप्पणी अधिवक्ता की इस दलील पर की कि सात नवंबर के आदेश के बाद, विभिन्न संगठनों से ऐसे आवेदनों में अचानक वृद्धि हुई है।
न्यायालय ने 13 जनवरी को कहा था कि वह राज्यों से कुत्ते के काटने की घटनाओं के
लिए भारी हर्जाना देने को कहेगी और ऐसे मामलों के लिए कुत्तों को खाना खिलाने
वालों को जवाबदेह ठहराएगी। अदालत ने पिछले पांच वर्षों से आवारा पशुओं से संबंधित
मानदंडों के लागू न होने पर भी चिंता जताई। अदालत ने कई मीडिया रिपोर्टों का
हवाला देते हुए कहा, "कुत्तों
के काटने का ख़तरा अब हवाई अड्डों और रिहायशी इलाक़ों समेत महत्वपूर्ण सार्वजनिक
स्थानों तक फैल चुका है।"अदालत ने कहा कि यह समस्या "बेहद व्यापक"
रूप ले चुकी है और "ऐसी घटनाओं का लगातार दोहराया जाना" निर्देशों के
पालन में कमी को दर्शाता है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जो अधिकारी इन आदेशों
को लागू करने में विफल रहेंगे, उनके ख़िलाफ़ अवमानना और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती
है। फै़सला
सुनाते हुए अदालत ने कहा, "गरिमा के साथ जीने के
अधिकार में यह अधिकार भी शामिल है कि व्यक्ति कुत्तों के हमलों
के डर के बिना स्वतंत्र रूप से जीवन जी सके। राज्य मूक दर्शन बनकर नही रह सकता। अदालत भी उन कठोर ज़मीनी
हक़ीक़तों से आँखें नहीं मूँद सकती, जहाँ बच्चे, विदेशी यात्री और बुज़ुर्ग कुत्तों के काटने की घटनाओं का
शिकार हुए हैं. संविधान ऐसे समाज की कल्पना नहीं करता, जहाँ बच्चों और बुज़ुर्गों का जीवन केवल शारीरिक ताक़त या
क़िस्मत के भरोसे हो।
इससे पहले नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की एक
बेंच ने अपने एक आदेश में सभी राज्य सरकारों से कहा था कि वो आवारा कुत्तों और
मवेशियों को हाईवे, सड़कों
और एक्सप्रेस-वे से हटा दें। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था,
"इसका
सख़्ती से पालन करना ज़रूरी है वरना अधिकारियों को व्यक्तिगत तौर पर ज़िम्मेदार
ठहराया जाएगा"। कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों और केंद्र
शासित प्रदेशों को यह भी निर्देश दिए थे कि अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान, सार्वजनिक खेल परिसर, रेलवे स्टेशन जैसे सरकारी और निजी संस्थानों की पहचान कर उन्हें इस
तरह घेर दें कि आवारा कुत्ते अंदर न आ सकें। कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारियों को
ऐसे परिसरों से मौजूद आवारा कुत्तों को हटाकर उनकी नसबंदी करानी होगी. इसके बाद उन्हें
डॉग शेल्टर में भेजना होगा। कुछ वकीलों ने आदेश पर चिंता जताई थी
और कोर्ट से इसे संशोधित करने के लिए सुनवाई की मांग की. हालाँकि बेंच से इसे
ख़ारिज कर दिया।
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सुप्रीम कोर्ट की चिंता वास्तव
में उचित है, क्योंकि इंडियन
काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अनुसार, भारत में
रेबीज के कारण हर साल लगभग 5,700 लोगों की
जान जाती है | विश्व
स्वास्थ्य संगठन के अनुसार,
दुनिया भर में रेबीज से होने वाली कुल मौतों
का लगभग 36 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत से आता है। नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (एनसीडीसी) और
इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम (आईडीएसपी) की रिपोर्ट में हर साल कुत्ते के काटने के मामलों
में भारी वृद्धि देखी जा रही है | पिछले
वर्ष के दौरान भारत में कुत्ते के काटने के 37 लाख (37,15,713) से अधिक मामले दर्ज किए गए । रेबीज एक लगभग 100 प्रतिशत घातक बीमारी है। यानी
लक्षण (सिंटम्स) दीखने के
बाद इसे ठीक करना लगभग असंभव है | भारत में आवारा कुत्तों की समस्या एक गंभीर
मुद्दा बन चुकी है। भारत में साल 2024 में कुत्ते के काटने की 37,15,713
घटना रिपोर्ट की गई। राजधानी दिल्ली की बात की जाए तो यहां साल 2025 में केवल जनवरी के महीने में 3,196 (प्रतिदिन लगभग 103) कुत्ते के काटने के मामले सामने आए। 2024 में 25,210 (प्रतिदिन लगभग 69),
2023 में 17,874
(प्रतिदिन लगभग 49),
2022 में 6,691 (प्रतिदिन लगभग 18) ये वो मामले हैं जो रिपोर्ट किए गए
हैं।
कुत्ते के काटने पर दवा की चार डोज देने का प्रावधान
है। पहली डोज शून्य से एक दिन के बीच,दूसरी
शून्य ये तीन दिन, तीसरी शून्य से सात दिन और और चौथी शून्य से 28 दिन के बीच दी
जाती है। देखने में आया है कि सरकारी अस्पतालों में एक या दो डोज देकर ही काम
निपटा दिया जाता है। खुद इस पत्रकार के
बेटे को कुत्ते के काटने पर जिला अस्पताल में
दो डोज देकर इतिश्री कर दी गई। बाद
में दो डोज बाजार से खरीदकर लगवाईं गई। अब इस तरह की चिकित्सीय लापरवाही से कुत्ते के काटने के शिकार को रेबीज
नही होगा। न्यायालय ने आदेश तो दे दिया किंतु इस आदेश के पालन को भी सुनिश्चित करना जरूरी होगा, क्योंकि सरकारी
अमला इस कान से सुनकर दूसरे कान से
निकालने का अभ्यस्त हो चुका है।
अशोक
मधुप
(
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)