Wednesday, April 22, 2026

परिसीमन बिल गिरने से देश को तो लाभ मिला

 

 

अशोक मधुप

 

देश की आधी आबादी यानी महिलाओं को 33 फीसदी राजनीतिक आरक्षण देने वाला ऐतिहासिक बिल लोकसभा में भले ही गिर गया हो किंतु भाजपा को जो लाभ मिलना था,  वह मिल या।  इस बिल के माध्यम से वह यह संदेश देने में कामयाब रही कि हम तो महिलाओं को संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण देना  चाहते  है, कितु विपक्ष  नही चाहता।  विपक्ष  भी  इस बिल के गिरने को  अपनी विजय मानता है।  इस बिल के गिरने से भाजपा को लाभ मिले या विपक्ष को किंतु सबसे बड़ा  लाभ देश को हुआ है। इस बिल के पास होने से बढ़ने वाली लोकसभा और विधान सभा  सीट के    सांसदों के वेतन और भत्तों का  खर्च बच गया। नए सांसदों और विधायकों  की पेंशन की राशि का बोझ अब देश को नही उठाना पड़ेगा।

मोदी सरकार ने लोकसभा और विधानसभाओं में वर्तमान सीटों की संख्या एकमुश्त बढ़ाकर  डेढ़ गुना करने का जो प्रस्ताव इस बिल में किया था, उसका लाभ कुल मिलाकर 2250 सीटों का होता।  लोकसभा में वर्तमान 545 सीटों के हिसाब से की महिलाओं के 33  प्रतिशत आरक्षण के हिसाब से 205 सीटें बढ़तीं, जबकि सभी 28 राज्यों और दो केन्द्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में 2045 सीटों का इजाफा होता। यानी 70 करोड़ महिलाओं में से मात्र 2250 महिलाएं चुनकर विधानमंडलों में पहुंचतीं। इसमें राज्यसभा और विधानपरिषदों की सीटें शामिल नहीं हैं, क्योंकि उनकी संख्या बाद में तय होगी। तर्क दिया जा सकता है कि इस आरक्षण को महिलाओं की संख्या की बजाए उनके राजनीतिक-सामाजिक सशक्तिकरण, लैंगिक समता और राजनीतिक नैतिकता की पवित्र मंशा के आईने में देखा जाना चाहिए। सही है। लेकिन अगर बिल पास हो जाता। सासंदों और  विधायकों के क्षेत्र और सीट बढ़  जाती तो वढ़े सासदों , विधायकों के वेतन, भत्ते, सुविधाओं और पेंशन का बोझ तो देश पर ही पड़ता।

12 साल के कार्यकाल में यह पहला अवसर था, जब मोदी सरकार  की संसद में विधायी हार हुई। संसदीय इतिहास में 1990 में पंचायत सशक्तिकरण संशोधन बिल के राज्यसभा में गिरने के बाद यह पहला बिल है, जो लोकसभा में ही ढ़ह  गया। वैसे मोदी सरकार चाहती तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण बिल अपने दूसरे कार्यकाल में ला सकती थी, जब एनडीए के अपने 353 सांसद थे और कोई भी संशाधन बिल आसानी से पारित हो सकता था। लेकिन उसने तब ऐसा नहीं किया। 
भारतीय राजव्यवस्था में पिछले कुछ वर्षों से वित्तीय प्रबंधन और संसाधनों के आवंटन को लेकर एक व्यापक बहस छिड़ी हुई है। एक तरफ सरकार राजकोषीय घाटे को कम करने और अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के नाम पर पुरानी पेंशन योजनाओं और सैन्य भर्ती की पारंपरिक प्रक्रियाओं में आमूलचूल परिवर्तन कर रही है, वहीं दूसरी ओर लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के विस्तार के नाम पर विधायी निकायों के आकार को बढ़ाने की योजनाएं भी चर्चा के केंद्र में हैं। इन निर्णयों का भारतीय अर्थव्यवस्था और आम नागरिक के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सरकार के इन कदमों के पीछे तर्क दिया जाता है कि आधुनिक समय की चुनौतियों से निपटने के लिए संसाधनों का कुशल उपयोग अनिवार्य है, लेकिन जब बात सांसदों और जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं की आती है, तो जनता के बीच विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

पेंशन के मुद्दे पर सरकारी कर्मचारियों में व्यापक असंतोष देखा जा रहा है। केंद्र सरकार ने वित्तीय बोझ को कम करने के लिए लंबे समय से पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) के स्थान पर नई पेंशन योजना (एनपीएस) को प्राथमिकता दी है। हालिया वर्षों में महंगाई भत्ते (डीए) और महंगाई राहत (डीआर) में वृद्धि तो की गई है, जैसे कि 2026 के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार इसे 60 प्रतिशत तक पहुँचाया गया फिर भी यह वृद्धि कर्मचारियों की उन मांगों को शांत करने में विफल रही है। वे तो  सेवानिवृत्ति के बाद एक सुनिश्चित आय की गारंटी चाहते हैं। सरकार का तर्क है कि पेंशन पर होने वाला खर्च भविष्य में विकास कार्यों के लिए उपलब्ध बजट को कम कर सकता है, इसलिए निवेश-आधारित पेंशन प्रणाली अधिक व्यावहारिक है। हालांकि, सरकारी कर्मचारी इसे अपनी सामाजिक सुरक्षा में कटौती के रूप में देखते हैं, जिससे उनके भविष्य की स्थिरता पर सवालिया निशान लग जाते हैं। अर्थशास्त्री दावा करते हैं कि यदि पुरानी पेंशन दी गई तो कुछ राज्य आर्थिक रूप से दिवालिया  हो जाएगें,किंतु सासदों और विधायकों की संख्या  उनके  वेतन भत्तों और पेंशन से देश के सामने आने  वाली आर्थिक चुनौतियों की और ध्यान नही दिया जाता। यह कहीं गणना  नही होती कि इससे देश पर कितना बोझ  पड़ेगा।

​सैनिकों की भर्ती के लिए लाई गई अग्निपथ योजना इसी वित्तीय पुनर्गठन की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जाती है। अग्निवीर योजना के तहत युवाओं को चार साल के लिए सेना में भर्ती किया जाता है, जिसके बाद केवल 25 प्रतिशत को ही स्थायी सेवा में रखा जाता है। शेष 75 प्रतिशत युवाओं को एकमुश्त सेवा निधि पैकेज देकर सेवामुक्त कर दिया जाता है, और उन्हें आजीवन पेंशन या अन्य चिकित्सा सुविधाएं नहीं दी जातीं। सरकार का उद्देश्य रक्षा बजट के एक बड़े हिस्से को, जो वर्तमान में वेतन और पेंशन में चला जाता है, आधुनिक हथियारों और तकनीक की खरीद में लगाना है। लेकिन इस योजना ने सुरक्षा विशेषज्ञों और युवाओं के बीच चिंता पैदा कर दी है। आलोचकों का कहना है कि पेंशन के अभाव में सैनिकों का मनोबल प्रभावित हो सकता है और चार साल बाद बेरोजगार होने का डर युवाओं को इस गौरवशाली पेशे से दूर कर सकता है।

​एक तरफ जहां देश की सुरक्षा और प्रशासनिक सेवा में लगे लोगों के लाभों को सीमित किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर 131वें संविधान संशोधन विधेयक के माध्यम से लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त किया गया है। वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों को बढ़ाकर लगभग 815 से 850 तक करने का प्रस्ताव है।इसी के साथ नए परीसीमन से विधायकों की भी 2045 सीट बढ़ने की व्यवस्था है। यह वृद्धि परिसीमन की प्रक्रिया के तहत की जा रही है, जिसका उद्देश्य बढ़ती जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व को संतुलित करना है। हालांकि यह कदम लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से तर्कसंगत लग सकता है, पर  इसके आर्थिक निहितार्थ अत्यधिक गंभीर हैं। सांसदों की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि का अर्थ है उनके वेतन, भत्तों, आवास, सुरक्षा और कार्यालय खर्चों में भी उसी अनुपात में बढ़ोतरी होना।

​यदि हम वर्तमान वित्तीय आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो एक सांसद का वेतन और विभिन्न भत्ते मिलाकर प्रतिमाह एक बड़ी राशि बनती है। वर्ष 2025-26 के संशोधित आंकड़ों के अनुसार, एक सांसद का मूल वेतन लगभग 1.24 लाख रुपये है। इसके अतिरिक्त, उन्हें निर्वाचन क्षेत्र भत्ता (लगभग 70,000 रुपये), कार्यालय भत्ता (लगभग 60,000 रुपये) और संसद सत्र के दौरान प्रतिदिन का दैनिक भत्ता (2,500 रुपये) मिलता है। यदि इन सबको जोड़ दिया जाए, तो एक सांसद पर सीधे तौर पर प्रतिमाह लगभग 2.7 लाख से 3 लाख रुपये का खर्च आता है। इसमें उनके लिए उपलब्ध मुफ्त बिजली (50,000 यूनिट), पानी (4,000 किलोलीटर), 34 मुफ्त हवाई यात्राएं, रेल यात्राएं और दिल्ली में मिलने वाले महंगे बंगलों का रखरखाव शामिल नहीं है। यदि लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 816 हो जाती है, तो केवल इन सीधे खर्चों के कारण देश पर प्रतिमाह करोड़ों रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।विधायकों की सीट बढ़ने से होने वाला  आर्थिक बोझ इसमें शामिल नही किया गया।

​इस अतिरिक्त वित्तीय बोझ का अनुमान लगाने के लिए यदि हम 273 नए सांसदों (816 - 543) को आधार मानें, तो केवल उनके वेतन और नियमित भत्तों पर ही प्रतिमाह लगभग 7.5 करोड़ से 8 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च होगा। वार्षिक आधार पर यह आंकड़ा 90 करोड़ से 100 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है। लेकिन यह तो केवल हिमशैल का सिरा है। प्रत्येक नए सांसद के लिए लुटियंस दिल्ली जैसे महंगे इलाकों में आवास की व्यवस्था करना, उनके कार्यालयों का निर्माण और उनके साथ तैनात होने वाले सुरक्षा कर्मियों व सहायक कर्मचारियों का वेतन इस खर्च को कई गुना बढ़ा देगा। इसके अलावा, सांसदों को मिलने वाली आजीवन पेंशन का खर्च भी भविष्य के बजटों पर एक स्थायी बोझ बन जाएगा।

​विवाद का मुख्य बिंदु यही है कि जब देश के सैनिकों और आम कर्मचारियों के लिए 'राजकोषीय अनुशासन' और 'पेंशन सुधार' की बात की जाती है, तो वही मापदंड जनप्रतिनिधियों पर लागू क्यों नहीं होते? अग्निवीर योजना के माध्यम से करोड़ों रुपये बचाने की कोशिश करने वाली सरकार जब सांसदों की फौज बढ़ाने की तैयारी करती है, तो आम नागरिक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या देश की प्राथमिकताएं सही दिशा में हैं। एक तरफ एक जवान है जो अपनी जवानी के चार साल देश को देता है और बिना पेंशन के घर लौट आता है, और दूसरी तरफ एक सांसद है जो केवल पांच साल के कार्यकाल के बाद आजीवन पेंशन और सुविधाओं का हकदार बन जाता है। एक बात और जहां कर्मचारी को पेंशन का हकदार बनने के लिए 20 से 25 साल की सेवा अनिवार्य  है,  वहां सांसद या विधायक के लिए ऐसा नही है। एक दिन के लिए सांसद या विधायक  बनने  पर उन्हें पूरी पेंशन मिलती है। सांसद या विधायक जितनी बार चुना जाता है,  उसकी   उ पेंशन में बढ़े कार्यकाल के हिसाब से वृद्धि मिलती है।कोई व्यक्ति  यदि चार बार सांसद  और तीन बार विधायक  बने तो उसे सांसद काल की चार और विधायक काल की तीन वृद्धि पेंशन में जुड़कर  मिलती है। वर्तमान   पंजाब सरकार ने  एक आदेश करने विधायक के लिए सिर्फ  एक पेंशन की व्यवस्था रखी है। ऐसा पूरे देश में क्यों नही हो सकता। सांसद और विधायकों के साथ भी ऐसा ही किया जाना चाहिए।    

भारत जैसे विकासशील देश में जहां शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के लिए संसाधनों की भारी कमी है, वहां विधायी विस्तार के खर्चों को बहुत सावधानी से तौलने की आवश्यकता है। लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे इस तरह से लागू किया जाना चाहिए कि यह आम जनता के त्याग और सैनिकों के समर्पण के साथ न्याय करे। यदि सरकार को वास्तव में राजकोषीय घाटे की चिंता है, तो उसे सांसदों के वेतन-भत्तों में भी कटौती करने और 'एक राष्ट्र, एक पेंशन' जैसी व्यवस्था पर विचार करना चाहिए, ताकि देश का पैसा सांसदों की सुख-सुविधाओं के बजाय उन लोगों पर खर्च हो जो वास्तव में देश की नींव को मजबूत करते हैं।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

 

 

Wednesday, April 15, 2026

कहां गए शांति के कपोत उड़ाने वाले?

 


अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

आज की दुनिया बारूद से धधक रही  है। रूस-यूक्रेन  से लेकर मध्य पूर्व के रेगिस्तानों तक, हर तरफ मिसाइलों की गूँज है। शांति की बाते  अब सुनाई  नही देतीं। शांति के कपोत उड़ाने  वाले दिखाई देने बंद हो गए। युद्ध की विभिषिका के विरोध में प्रदर्शन करने और मोमबत्त्ती  जलाने वाले अब सड़कों से गायब है। युद्ध के विरोध के स्वर धीमे  ही नही हुए ,पूरी तरह खामोश  हो गए। बुद्ध के संदेश अब किताबों में ही बंद होकर रह गए है। युद्धों के विरोध की कही से बात नही उठ रही।  दुनिया में शांति स्थित करने के लिए बने संयुक्त  राष्ट्रसंघ  के मुंह पर टेप चिपक गया। वह देख  सकता है। न कुछ बोल सकता है।  न आदेश कर सकता है।

विडंबना देखिए कि इक्कीसवीं सदी में हम मंगल पर बस्तियां बसाने की बात कर रहे हैं, लेकिन ज़मीन के चंद टुकड़ों और आपसी वर्चस्व के लिए हज़ारों बेगुनाहों का खून बहाने से भी पीछे नहीं हट रहे। युद्ध चाहे रूस और यूक्रेन के बीच हो, या इज़राइल, ईरान और अमेरिका के बीच का तनाव होजीत के झंडे चाहे जिस देश के हाथ आएं, हारती  हमेशा मानवता  है।  इन युद्ध में विजयी कोई भी हो, सदा पराजित तो मानव होती है। मरती बस इंसानियत है।

​इतिहास गवाह है कि युद्ध कभी समस्या का समाधान नहीं रहा, बल्कि यह नई समस्याओं का जन्मदाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के समय  भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी के कई  बार कहा कि दुनिया को युद्ध की नही , बुद्ध की जरूरत है। कई  मंचों से  उन्होंने यह मांग उठाई, किंतु किसी भी देश ने शांति का समर्थन नही किया। सब देश  गूंगे बन कर रह  गए।  आज भी  ये ही हाल है।  मरता  ईरान खाड़ी के उन देशों पर मिजाइल  और द्रोण  दाग कर तबाही मचा रहा है, जिनमे अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं। अपनी बरबादी होते देख ये देश ईरान पर अमेरिकी हमलों का उस तरह विरोध नही कर रहे , जिस तरह कि करना चाहिए।  

 रूस-यूक्रेन युद्ध के समय   जहाँ वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा संकट को जन्म दिया तो मध्य पूर्व (इज़राइल-हमास-ईरान) के संघर्ष ने दुनिया को धार्मिक और कूटनीतिक ध्रुवीकरण के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। इन लड़ाइयों में टैंकों की गड़गड़ाहट के बीच जो आवाज़ दब जाती है, वह हैएक मासूम बच्चे की चीख और एक बेबस माँ की कराह। युद्ध की सबसे बड़ी कीमत वे लोग चुकाते हैं जिनका राजनीति या सत्ता की लालसा से कोई लेना-देना नहीं होता। यूक्रेन के कीव से लेकर गाज़ा की गलियों और ईरान के गांव तक तक, हज़ारों औरतें और बच्चे मौत की नींद सो चुके हैं। जो उम्र खिलौनों से खेलने की थी, उस उम्र में बच्चे बमों के धमाकों को पहचानना सीख रहे हैं। हज़ारों बच्चे अनाथ हो चुके हैं और लाखों का भविष्य मलबे के नीचे दब गया है। युद्ध के दौरान महिलाओं को न केवल विस्थापन का दंश झेलना पड़ता है, बल्कि वे शारीरिक और मानसिक हिंसा का सबसे आसान लक्ष्य बनती हैं।

युद्ध केवल इंसान को नहीं मारता, वह सदियों से बनी-बनाई सभ्यताओं और बुनियादी ढांचे को भी नष्ट कर देता है। स्कूलों, अस्पतालों और रिहायशी इमारतों पर गिरते बम यह दर्शाते हैं कि आधुनिक समाज कितना "असंवेदनशील" हो चुका है। जब एक अस्पताल पर मिसाइल गिरती है, तो वह केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं ढहती, बल्कि इंसानियत की आखिरी उम्मीद भी टूट जाती है। इन लड़ाइयों का असर केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं है। रूस-यूक्रेन संघर्ष ने दुनिया भर में अनाज की आपूर्ति श्रृंखला को तोड़ दिया इससे गरीब देशों में भुखमरी का खतरा बढ़ गया। ईंधन की बढ़ती कीमतें और खाद्य पदार्थों की कमी ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। जो खरबों डॉलर शिक्षा, स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन से लड़ने में खर्च होने चाहिए थे, वे आज आधुनिक हथियार और मिसाइलें बनाने में झोंके जा रहे हैं।

युद्ध का एक और खामोश शिकार हमारा पर्यावरण है। हज़ारों टन गोला-बारूद का इस्तेमाल वायुमंडल को ज़हरीला बना रहा है। जंगलों की आग, समुद्री प्रदूषण और ज़मीन में धंसे बारूदी सुरंग  आने वाली कई पीढ़ियों के लिए मौत का जाल बिछा रहे हैं। हम जिस धरती को बचाने की कसमें खाते हैं, उसी को युद्ध की आग में झोंक रहे हैं। संसाधनों को  बरबाद कर रहे हैं।जब हम टीवी पर बमबारी के दृश्य देखते हैं और उन्हें केवल एक "न्यूज़ अपडेट" की तरह छोड़ देते हैं, तो समझ लीजिए कि हमारे भीतर की इंसानियत मर चुकी है। युद्ध हमें क्रूर बना देता है। हम मौतों को केवल 'आंकड़ों' में गिनने लगते हैं। घृणा का यह बीज जो आज बोया जा रहा है, वह भविष्य में और अधिक कट्टरपंथ और आतंकवाद को जन्म देगा।

​अमेरिका आज दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह बन गया है। उसने इराक पर यह कह कर हमला किया था कि उसके पास कैमिकल और अन्य  घातक शस्त्र है। इराक हार गया। सद्दाम हुसैन पकड़े ही नही गए, उन्हें फांसी हो गई, किंतु अमेरिका इराक से कुछ भी बरामद नही कर पाया। उसका सब झूंठा  प्रचार रहा। अब ईरान पर यह कह कर इस्राइल और अमेरिका ने हमला किया कि वह परमाणु बम बनाने के नजदीक है। उसकी इस शक्ति को  खत्म करना  है। हमले जारी है।  इस दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने मीडिया से बात करते हुए  अपने मन की बात कह  दी कि उसे  ईरान के तेल पर कब्जा  करना  है। तीन  जनवरी 2026 को अमेरिकी सेना ने एक सैन्य ऑपरेशन के  दौरान वेनेजुयला   के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को उनके देश (कराकस) से गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई नार्को-आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी के आरोपों के बाद की गई। इसके बाद उन्हें न्यूयॉर्क लाया गया।  बहाना मादक पदार्थो  की तस्करी रोकना था किंतु   अब अमेरिकी राष्ट्र पति ट्रंप  कह रहे हैं कि वेनेजुयला  का तेल वे बेचेंगे।  उनकी मर्जी से बिकेगा। इस सब का मतलब साफ है कि दुनिया के संसाधनों पर अमेरिका की नजर है। वह किसी ने किसी बहाने उन पर कब्जा करना   चाहता है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप  का एक बड़ा बयान सामने आया। ट्रंप ने कहा है कि अगर थोड़ा और समय मिला तो अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोल सकता है और वहां से तेल लेकर बड़ा मुनाफा कमा सकता है। उनके इस बयान ने पहले से चल रहे संघर्ष को और संवेदनशील बना दिया है।

फिलहाल ईरान ने इस अहम समुद्री रास्ते को बंद कर दिया है। इस कारण दुनिया भर में तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है और कीमतों में तेजी देखी जा रहीयह संघर्ष अब सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहा है। अमेरिका और इस्राइल ने ईरान और लेबनान में कई ठिकानों पर हमले किए हैं। इसके जवाब में ईरान ने भी कई खाड़ी देशें पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। हाल के दिनों में हमलों की संख्या कुछ कम हुई है, लेकिन पूरी तरह रुकी नहीं है।

 ईरान के खिलाफ कार्रवाई में शामिल होने से इन्कार करने वाले ब्रिटेन जैसे वह  देश होर्मुज जलडमरूमध्य   के बंद होने  की वजह से जेट ईंधन नहीं पा रहे हैं। उनके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रप का  सुझाव है: पहला- अमेरिका से तेल खरीदो, हमारे पास बहुत है। दूसरा- हिम्मत जुटाओ, जलडमरूमध्य पर जाओ और उसे अपने कब्जे में ले लो।  

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के पूर्व महानिदेशक मोहम्मद अल बारदेई ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ 48 घंटे का अल्टीमेटम जारी करने के बाद खाड़ी देशों से हस्तक्षेप करने की तत्काल अपील की है। पूर्व आईएईए प्रमुख ने विनाशकारी सैन्य टकराव की संभावना का जिक्र किया। बारदेई ने एक्स पर एक पोस्ट में पड़ोसी खाड़ी देशों को संबोधित करते हुए कहा, "कृपया, एक बार फिर अपनी पूरी ताकत झोंक दें, इससे पहले कि यह पागल शख्स इलाके को आग का गोला बना दे।"मोहम्मद अल बारदेई ने अपनी गुहार को वैश्विक मंच तक पहुंचाते हुए युद्ध को रोकने में अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की भूमिका पर भी सवाल उठाया। संयुक्त राष्ट्र के साथ रूस-चीन-फ्रांस को संबोधित एक अलग पोस्ट में उन्होंने पूछा कि क्या इस पागलपन को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता है?
 युद्ध किसी समस्या का स्थायी हल नहीं है। इतिहास ने बार-बार सिखाया है कि युद्ध के मैदान में कभी कोई नहीं जीतता, बस जो कम हारता है वह खुद को विजेता घोषित कर देता है। रूस, यूक्रेन, इज़राइल, ईरान या अमेरिकाशक्ति का प्रदर्शन किसी को महान नहीं बनाता। महानता इस बात में है कि हम आने वाली पीढ़ी को एक ऐसी दुनिया दें जहाँ बारूद की गंध नहीं, बल्कि भाईचारे की मिठास हो। एक बार और अमेरिका वियतनाम और अफगानिस्तान में जाकर अपना अंजाम देख चुका है। बाद में बहुत कुछ गंवाकर वहां से भाग आया। ये ईरान है। यहां  के गांव वाले, युवाओं और बच्चों ने भी अब शस्त्रों से दोस्ती कर ली है। हथियार संभाल लिए है। अमेरिका के दो हैलिकोप्टर को मार गिराने वाला एक मामूली गडरिया है। इस गडरिए को तो युद्ध कला भी नही आती । सिर्फ  इतना जानता है कि ये हैलिकोप्टर  हमलावर अमेरिका के है।  जिस देश की जनता इतनी जुझारू और लड़ाका  हो ,  जिसके गडरिये अमेरिका जैसे देश के दो− दो आधुनिकतम  हैलिकोप्टर गिरा दें,उसे हराना संभव  नहीं।   

​आज दुनिया के शक्तिशाली राष्ट्रों को अपनी ज़िम्मेदारी  समझनी होगी । उन्हें  युद्ध के उन्माद को रोकना होगा। नहीं रोका, तो वह दिन दूर नहीं जब 'इंसान' तो बचेगा, लेकिन उसके भीतर की 'इंसानियत' पूरी तरह दफन हो चुकी होगी। हमें यह समझना होगा कि धरती पर सरहदें हमने खींची हैं, कुदरत ने नहीं। शांति की मेज़ पर बैठकर बात करना कमज़ोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी बहादुरी है। वक्त आ गया है कि हम "हथियारों की होड़" को छोड़कर "मानवता की जोड़" पर ध्यान दें। वरना इतिहास हमें उन लोगों के रूप में याद रखेगा ,जिनके पास सब कुछ था, बस एक-दूसरे के लिए दया और प्रेम नहीं था।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

Wednesday, April 1, 2026

नक्सलवाद के खात्में के बाद भी सरकार को बहुत कुछ करना होगा

 



अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

काफी पहले   केंद्र सरकार  ने  घोषणा की थी कि मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद समाप्त हो जाएगा। मार्च 2026 की  अवधि से  एक दिन    पहले ही गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में बड़ी घोषणा की । नक्सलवाद पर चर्चा के दौरान गृह मंत्री ने  कहा कि  देश में नक्सलवाद अब लगभग समाप्त हो चुका है।  आदिवासी इलाकों में असली न्याय पहुंचा है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि 2014 के बाद केंद्र सरकार की सख्त नीति, सुरक्षा अभियान और विकास योजनाओं के कारण संभव हुआ है। उन्होंने कहा कि सरकार  नक्सल प्रभावित क्षेत्र में तेजी से विकास करा  रही है। शिक्षा के लिए स्कूल और उपचार के लिए  वहां अस्पताल खुल रहे हैं। अमित शाह ने कहा कि नक्सलवाद की जड़ें खत्म हो रही हैं और आदिवासियों की आवाज अब संसद तक पहुंची है। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसने समस्या को बढ़ने दिया। मोदी सरकार के फैसलों से हालात बदले हैं। उन्होंने कहा कि नक्सल विचारधारा आदिवासियों को गुमराह करती है और अब देश नक्सलवाद मुक्त बनने की ओर बढ़ रहा है।

उन्होंने साफ कहा कि सरकार ने नक्सलियों से बातचीत नहीं, बल्कि उन्हें खत्म कर विकास को आगे बढ़ाने का रास्ता चुना। उन्होंने कहा कि जो हथियार उठाएगा, उसे कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने दावा किया कि नक्सलियों का पूरा केंद्रीय नेतृत्व, पोलित ब्यूरो और कमेटी अब खत्म हो चुकी है। काफी मारे गए,  बहुतों  ने सरेंडर किया । कुछ अभी फरार हैं।

शाह ने कहा कि देश अब नक्सलमुक्त होने की स्थिति में पहुंच चुका है। उन्होंने बताया कि कई बड़े ऑपरेशन जैसे बुढ़ा, थंडरस्टॉर्म और ब्लैक फॉरेस्ट चलाए गए।  इनमें भारी मात्रा में हथियार, आईईडी फैक्ट्री और अनाज बरामद हुआ। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़, तेलंगाना और ओडिशा के बड़े इलाके अब नक्सल प्रभाव से बाहर आ चुके हैं। सुरक्षा बलों और स्थानीय पुलिस की भूमिका को उन्होंने अहम बताया।

केंद्रीय  गृहमंत्री ने  बताया  कि  आजादी के समय देश संसाधनों की कमी और विकास की चुनौतियों से जूझ रहा था। कई दूर-दराज के इलाकों तक सरकार की पहुंच नहीं थी, सड़कों और सुविधाओं का अभाव था। ऐसे हालात में कुछ संगठनों ने इन कमजोरियों का फायदा उठाया। जहां राज्य की पकड़ कम थी, उन्हीं इलाकों को रेड कॉरिडोर बनाया गया। भोले-भाले आदिवासियों को भेदभाव और शोषण के नाम पर भड़काया गया और उनके हाथों में हथियार थमा दिए गए। हकीकत यह है कि इन क्षेत्रों में योजनाबद्ध भेदभाव नहीं, बल्कि विकास की कमी थी, जिसका इस्तेमाल कर हिंसा को बढ़ावा दिया गया।

शाह ने बताया कि केंद्र सरकार ने ऑल एजेंसी अप्रोच अपनाई। इसमें सीएपीएफ, राज्य पुलिस और खुफिया एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाया गया। फंडिंग और स्पोर्ट सिस्टम पर प्रहार किया गया। सरेंडर नीति लागू की गई। इसमें आत्मसमर्पण करने वालों को आर्थिक मदद और पुनर्वास दिया गया। उन्होंने कहा कि सरकार ने हर गांव तक अपनी पहुंच बनाई, इससे नक्सलवाद कमजोर हुआ।


उन्होंने  दावा किया   कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विकास हुआ। हजारों किलोमीटर सड़कें बनीं, मोबाइल टावर लगाए गए, बैंक, एटीएम और डाकघर खोले गए। शिक्षा के लिए एकलव्य स्कूल, आईटीआई और कौशल केंद्र बनाए गए। उन्होंने कहा कि विकास ही नक्सलवाद खत्म करने का सबसे बड़ा कारण बना।

शाह ने कहा कि नक्सलवाद गरीबी से नहीं, बल्कि विचारधारा से पैदा हुआ। उन्होंने कहा कि यह विचारधारा लोकतंत्र में विश्वास नहीं करती और बंदूक के जरिए सत्ता चाहती है। उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासियों को बरगलाकर उनके हाथ में हथियार दिए गए और विकास को रोका गया।


गृह मंत्री ने कहा कि सरकार आगे भी सख्ती और विकास दोनों पर काम जारी रखेगी। उन्होंने आदिवासी समाज को भरोसा दिलाया कि उनकी सुरक्षा और विकास सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि अब देश बंदूक से नहीं, संविधान से चलेगा और यही असली जीत है।

गृह मंत्री के अनुसार, जिस "रेड कॉरिडोर" का विस्तार कभी पशुपति से तिरुपति तक माना जाता था, वह अब सिमटकर केवल कुछ जिलों तक रह गया है। 2014 में जहाँ 126 जिले वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित थे, वहीं 2025-26 तक यह संख्या घटकर मात्र एक अंक में रह गई है। छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग, जो कभी नक्सलियों का अभेद्य किला माना जाता था। अब वह सुरक्षा बलों के नियंत्रण में है और वहां विकास की किरणें पहुँच रही हैं।

सरकार के इन दावों की पुष्टि जमीनी आंकड़ों से भी होती है। पिछले कुछ वर्षों में नक्सली हिंसा की घटनाओं में 70  प्रतिशत  से अधिक की कमी आई है। सुरक्षा बलों की शहादत के आंकड़ों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। "ऑपरेशन कगार" और "ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट" जैसे लक्षित अभियानों के माध्यम से सुरक्षा बलों ने नक्सली नेतृत्व की कमर तोड़ दी है। 2025 के दौरान ही 300 से अधिक नक्सली मारे गए । इनमें कई शीर्ष कमांडर शामिल थे। इसके साथ ही, हजारों की संख्या में कैडरों ने आत्मसमर्पण किया है,। यह समर्पण इस बात का प्रतीक है कि अब इस विचारधारा का आकर्षण खत्म हो रहा है।  इतना सब होने के बावजूद , इन सफलताओं के बावजूद नक्सलवाद की चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। सबसे बड़ी चुनौती भौगोलिक विषमता है। छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ जैसे घने वन क्षेत्र आज भी सुरक्षा बलों के लिए कठिन परीक्षा बने हुए हैं। नक्सलियों ने अपने पैर पीछे जरूर खींचे हैं, लेकिन वे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। वे अक्सर घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों का लाभ उठाकर छापामार हमले करने की ताक में रहते हैं। इसके अलावा, "अर्बन नक्सलिज्म" या वैचारिक उग्रवाद एक नई चुनौती बनकर उभरा है। शहरों में बैठे कुछ बौद्धिक समूह नक्सलियों को वैचारिक और रसद सहायता प्रदान करते हैं। इससे इस समस्या की जड़ें गहरी बनी रहती हैं। जब तक इन वैचारिक और वित्तीय नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त नहीं किया जाता, तब तक उग्रवाद के पुनर्जीवित होने का खतरा बना रहेगा।

एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती स्थानीय आदिवासियों के बीच विश्वास की बहाली है। दशकों से विकास की मुख्यधारा से कटे होने के कारण, कई क्षेत्रों में ग्रामीण अब भी सुरक्षा बलों को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। नक्सली अक्सर इस अविश्वास का फायदा उठाते हैं और ग्रामीणों को ढाल के रूप में उपयोग करते हैं। सुरक्षा बलों और स्थानीय जनता के बीच के इस "गवर्नेंस वैक्यूम" को भरना एक लंबी प्रक्रिया है। केवल सड़कों या मोबाइल टावरों का निर्माण पर्याप्त नहीं है; लोगों को यह महसूस कराना होगा कि सरकार उनकी संस्कृति और अधिकारों की रक्षक है। इसके साथ ही, पड़ोसी राज्यों के बीच समन्वय की कमी भी कई बार बाधा बनती है, क्योंकि नक्सली एक राज्य में दबाव बढ़ने पर दूसरे राज्य की सीमा में शरण ले लेते हैं।

विकास के मोर्चे पर, सरकार को "नियत नेल्लानार" (आपका अच्छा गांव) जैसी योजनाओं को और विस्तार देना चाहिए, जो अंतिम छोर तक बुनियादी सुविधाएं पहुँचाने पर केंद्रित हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण सबसे प्रभावी हथियार है। जब आदिवासियों के बच्चों के पास स्कूल होंगे और उनके युवाओं के पास रोजगार के अवसर होंगे, तो नक्सलियों की भर्ती प्रक्रिया स्वतः ही बंद हो जाएगी। कौशल विकास केंद्रों के माध्यम से स्थानीय युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना नक्सली विचारधारा के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है। साथ ही, वन अधिकारों (फोरेस्ट राइट  एक्ट) का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा  ताकि  आदिवासियों को अपनी जमीन पर मालिकाना हक का अहसास हो और वे उग्रवाद के बहकावे में न आएं।

मान्यता है कि , नक्सलवाद का पूर्ण उन्मूलन केवल बंदूकों के दम पर संभव नहीं है। वास्तव में ऐसा भी  नही हैं। कभी श्रीलंका में लिट्टे   बहुत मजबूत संगठन था।   उसके  लड़ाके बेमिसाल थे। श्रीलंका के साथ भारतवर्ष को भी  वह प्रभावित कर रहा था। इस पर भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी (1991), श्रीलंकाई राष्ट्रपति प्रेमदासा रनसिंघे (1993) सहित कई लोगों  की हत्या का आरोप है। श्रीलंका सरकार  से  इस संगठन को खत्म करने का  निर्णय  लिया। एक झटके में 2009 में लिट्टे  पूरी तरह खत्म हो  गया। न श्रीलंका   सरकार ने उसके लड़ाकों को फुसलाया।  न समर्पण के लिए कहा। बंदूक के बल पर लिट्टे को खत्म कर दिया। 

 भारत  सरकार   तो नक्सलवाद को खत्म करने के लिए इन्हें समझाने  और आत्म समर्पण  के लिए  प्रेरित कर रही है। सरकार को अपनी आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति को और अधिक उदार और प्रभावी बनाना चाहिए, ताकि भटक चुके युवा बिना किसी डर के मुख्यधारा में लौट सकें। 

 इस सबके लिए तकनीकी और खुफिया तंत्र को भी मजबूत करना होगा। आधुनिक तकनीक का उपयोग करके नक्सली गतिविधियों पर नजर रखना और उन्हें समय रहते रोकना संभव है। इसके अलावा, राज्यों और केंद्र के बीच बेहतर समन्वय भी आवश्यक है, क्योंकि नक्सलवाद कई राज्यों में फैला हुआ है। इससे निपटने के लिए संयुक्त प्रयासों की जरूरत होती है। मजबूत इच्छा शक्ति की भी  आवश्यक्ता  है।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं

Monday, March 23, 2026

धार्मिक स्थलों को क्यों नही मिलती बंदरों से मुक्ति

 

धार्मिक स्थलों को क्यों नही मिलती बंदरों से मुक्ति

अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

धार्मिक स्थलों को बंदरों से क्यों नही मिलती मुक्ति। सबसे बड़ा  यक्ष  प्रश्न  यह है कि इन स्थानों पर आने वाले श्रृद्धालु  कब तक इनके आंतक झेलते  रहेंगे? कब तक इनका  शिकार होते  रहेंगे?

 हाल में राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु अपने कार्यकाल में 19 मार्च को वृंदावन आईं। वे दूसरी बार यहां आईं है। इससे पहले इसी पद पर रहते हुए प्रणब मुखर्जी व रामनाथ कोविंद भी अपने कार्यकाल में दो बार वृंदावन आए थे। लेकिन, राष्ट्रपति मुर्मु  वृंदावन के तीन दिवसीय प्रवास पर आने वाली पहली राष्ट्रपति हैं। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्रप्रसाद, ज्ञानी जैल सिंह एक बार वृंदावन आए। उपराष्ट्रपति पद पर रहते हुए डॉक्टर शंकरदयाल शर्मा, आर वेंकटरामन, डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी वृंदावन अपनी धार्मिक यात्रा पर आ चुके हैं।

निवर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी दो बार वृंदावन आए। आश्रय सदन में वृद्ध विधवा माताओं से मुलाकात करने आए थे। राष्ट्रपति पद पर रहते प्रणब मुखर्जी पहली बार 16 नवंबर 2014 को अक्षयपात्र में चंद्रोदय मंदिर के भूमि पूजन में आए तो दूसरी बार 18 नवंबर 2015 को चैतन्य महाप्रभु के वृंदावन आगमनोत्सव के पांच सौ वे वर्ष पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम में आए थे। राष्ट्रपति पद पर रहते ज्ञानी जैल सिंह 1987 में वृंदावन आए और रंगजी मंदिर में दर्शन करने पहुंचे थे 1957 में देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्रप्रसाद वृंदावन आए। उप राष्ट्रपति पद पर रहते 1985 में आर वेंकटरामन, 1993 में डॉ. शंकरदयाल शर्मा, 1959 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन वृंदावन आ चुके हैं। राष्ट्रपति या  कोई  वीवीआईपी जब भी  वृंदावन आता है। प्रत्येक बार उनकी सुरक्षा तो  होती ही है। सबसे बड़ा काम होता है वीवीआईपी को यहां के झपटमार बदंर से बचाना। ये  बंदर झपटामार कर श्रद्धालु का चश्मा  उतारते  और किसी ंची जगह पेड़ या दीवार पर जाकर बैठ जाते हैं। ये चश्मा तभी लौटाते हैं जब उन्हें खाने के लिए फ्रुटी, केला  या दूसरे खाने के सामान दिए जाएं। वीवीआईपी दौरे को  देखते हुए  प्रशासन लंगूरों के जगह− जगह कट आउट लगवाता है।  माना  जाता है कि लंगूर से बंदर डरतें हैं।उन्हें डराने के लिए ऐसा  किया जाता है। कुछ जगह लंगूर भी  लाकर बांध  दिए जाते  हैं। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु की सुरक्षा से लेकर रूट पर व्यवस्थाओं को दुरस्त करने के लिए जिला प्रशासन ने रात दिन एक कर दिया। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु के दौरे को देखते एक प्रशासन ने लंगूरों के जगह− जगह कट आउट लगवाए।

लेखक को  चित्रकूट में हनुमान गढ़ी  जाने का अवसर मिला। वहां रास्ते में बंदर और लंगूर मिलते और आपके कपड़े और बैग पकड़कर रोक लेते हैं। वे आपके  बैग और जेब से खाने का सामान प्रसाद  आदि निकालकर ही आपको आगे जाने देते हैं। शुक्रताल में तो  हनुमान धाम में बंदरों को भगाने के  लिए लंगूर  बांधा हुआ था।   बंदर उसके अभयस्त हो गए थे। उन्हें पता था  कि रस्सी में बंधे लंगूर की पंहुच कहां तक हैं। बदंर आते   और लंगूर की पंहुच की दूरी से अगल रहकर लौट जाते।

 प्रश्न है कि वीवीआइपी के आने पर ही  क्यों  बंदरों को रोकने की व्यवस्था होती है। देश के आम आदमी को भी  वीवीआईपी क्यों नही समझा जाता। उसकी सुरक्षा की  जिम्मेदारी भी तो  सरकार की है। उसके लिए क्यों नही ऐसी व्यवस्थाएं होती।  बंदर हम हिंदुओं की श्रद्धा है। हम उसे पवित्र  मानते हैं। पूजनीय मानते  है।  इतना होने पर भी  उसके भोजन की व्यवस्था क्यों नही करते। अयोध्या में बड़ी तादाद में बंदर है। हनुमान गढ़ी पर मैंने बंदरों को फूलों  की माला  तोड़कर  उसमें  भोजन के अंश तलाशते  देखा है। इसी शहर में डस्टविन से भोजन खोजते बंदर मुझे मिलें हैं। हमारी समाज सेवी संस्थाए क्यों नही इनके भोजन की जरूरत पूरी करती। बंदरों की संख्या  लगातार बढ़ रही है। बढती बंदरों की जनसंख्या को भोजन चाहिए। भोजन ने मिलने वह निरीह प्राणी अपना  पेट भरने के लिए कुछ तो करेगा।

 बंदरों के आतंक के कारण  कई शहरों  में तो महिलाओं और बच्चों का छतों पर जाना  कठिन हो गया है। शहरों की नही अब तो जंगल में भी इनकी बढ़ती आबादी किसानों के लिए संकट बन चुकी है। भोजन के अभाव में बंदर खेतों की फसल तोड़कर खा रहे हैं। गेंहू की बाली खा जाते है। बोए गए गन्ने के बीज जमीन से निकाल कर वे अपनी उदरपूर्ति  कर रहे हैं। किसान फसल की रक्षा को लेकर परेशान हैं।अब तो किसानों ने  खेतों की रक्षा के लिए नौकर रखने शुरू कर दिए हैं।

आज बंदरों का  आंतक धार्मिक स्थलों के साथ अन्य स्थानों पर भी  बढ़ता जा रहा है।  शहरी आबादी के साथ  किसान भी परेशान है। आज जरूरी हो गया है कि  सरकार द्वारा बंदरों की आबादी कम करने के  लिए अभियान चलाया जाए। बंदरों के ग्रुप  लीडर की नसंबदी कराकर उनकी आबादी नियंत्रित की जाए।    जनता के शोर मचाने पर बंदरों  का पकड़कर  जंगलों में छोड़ा जाना कोई स्थायी निदान नही है। ये जंगल और वनों से लौटकर फिर आबादी की ओर आ जाते हैं। बढ़ती बंदरों की आबादी को भोजन चाहिए। भोजन न मिलने पर उन्हें भी  पेट भरना है। जैसे आदमी अपनी भोजन की जरूरत पूरी करने के लिए दूसरे साधन ढ़ूंढ़ता है। वैसे ही आज बंदर कर रहे हैं। तीर्थ स्थलों पर चश्मा छीन रहे हैं तो कुछ जगह श्रद्धालुओं को  पकड़कर उनके बैग से भोजन ले रहे हैं। गांव और शहरों में भोजन के लिए कपड़े  उठाकर ले जाना आम बात है। ये उठाए गए कपड़े तब छोड़ते हैं, जब उन्हें खाने की सामग्री मिल जाए।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं)