Saturday, June 20, 2026

क्यों नही होता राष्ट्रपति का निर्विरोध चुनाव

 

08/07/2022

अशोक मधुप

 

देश के सांसद और विधायक 18 जुलाई को देश के 15वें राष्ट्रपति पद के लिए प्रत्याशी का  चुनाव करेंगे। देश के सांसद और विधायक 18 जुलाई को राष्ट्रपति चुनाव में मतदान करेंगे। वोटों की गिनती 21 जुलाई को होगी । नया राष्ट्रपति 25 जुलाई तक राष्ट्रपति भवन में होगा।सत्ता पक्ष के प्रत्याशी के सामने विपक्ष का उम्मीदवार होने के कारण मतदान होगा।राष्ट्र के सबसे बड़े पद के लिए निर्विरोध चुनाव कराने की कोशिश क्यों नही होतीक्यों  केंद्र की सत्ताधारी पार्टी राष्ट्रपति के निर्विरोध चयन का प्रयास नही करती

भारत में राषट्रपति पद के लिए पांच साल में चुनाव होंता  है। डा राजेंद्र प्रसाद ही अकेले से व्यक्ति रहे, जिन्हें दो बार राष्ट्रपति रहने का सौभाग्य मिला। प्रतिभा  पाटिल को देश की पहली महिला राष्ट्रपति चुने जाने का गौरव प्राप्त है।

 भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में राष्ट्रपति के उम्मीदवार के लिए संगठन के सहयोगी दलों के साथ व्यापक विचार विमर्श किया। उसके बाद  पूर्व राज्यपाल  द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का  उम्मीदवार बनाना  तै हुआ।

पश्चिम  बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी प्रयास में रही कि  चुनाव में  विपक्ष का एक उम्मीदवार हो। कई नाम आए। जिनके नाम आए,  उनके द्वारा मना करने के बाद यशवंत  सिन्हा विपक्ष के उम्मीदवार बनने को तैयार हो गए। उनकी सहमति पर गठबंधन में शामिल दलों ने  उनकी उम्मीदवारी पर मुहर लगा दी।  

हालाकि इस गठबंधन में शामिल एक −दो दल से भी भाजपानीत गठबंधन के प्रत्याशी को वोट देने की घोषणा की। बसपा  सुप्रिमो मायावती ने भी भाजपा गठबंधन प्रत्याशी को समर्थन की घोषणा की। वह विपक्ष द्वारा बनाए गठबंधन में भी शामिल नहीं रहीं। 

इससे  पहले शरद पवार और नीतीश कुमार ने खुद को विपक्ष के राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवारों की सूची से बाहर कर लिया था।

इस चुनाव की खास बात यह है कि यदि विपक्ष एक जुट हो जाए तो केंद्र के सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन का प्रत्याशी विजयी नही हो सकता,किंतु अपने – अपने स्वार्थ  और हित के कारण यह एकजुट नही है।

 भाजपा रही हो या केंद्र की कांग्रेस की मजबूत सरकार कभी ये प्रयास नही हुआ कि चुनाव सर्वसम्मत हो।इस चुनाव के विपक्ष को भी  विश्वास में लिया जाए।इसी का परिणाम यह है कि आज तक राष्ट्रपति का निर्वाचन सर्व सम्मत  नही हुआ।नीलम संजीव रेड्डी निर्विरोध राष्ट्रपति बने पर तकनीकि कारणों से।  उनके सामने खड़े  सभी प्रत्याशियो के नामांकन चुनाव अधिकारी द्वा निरस्त कर दिए गए थे।इसके बाद वह निर्विरोध चुने गए।

आज भी केंद्र की सरकार और विपक्ष में अच्छे संबध नहीं। फिर भी प्रयास तो  होना ही चाहिए था।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं अपने स्तर से प्रयास करते तो ज्यादा बेहतर रहता। हालाकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार महत्वपूर्ण मुद्दों पर विपक्ष के साथ मीटिंग की।चीन से तनातनी का मामला हो या कोरोना  महामारी से बचाव का, इसमें राहुल गांधी और पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी का रवैया  सहयोगात्मक नहीं रहा।विपक्ष के कई नेताओं ने प्रधानमंत्री पर गैर जिम्मेदाराना टिप्पणी की। वे ये भी भूल गए कि प्रधानमंत्री किसी पार्टी का नही देश का होता है।प्रधानमंत्री को सबको सम्मान देना  चाहिए।

होना यह चाहिए कि प्रतिस्पर्धा ओर विरोध  तब तक होना चाहिए तब तक चुनाव होता है। चुनाव के बाद चुन कर आई सरकार का विपक्ष को सरकार के कार्यकाल पांच साल पूरे होने तक सहयोग करना  चाहिए। उसकी जनविरोधी नीति की आलोचना होनी चाहिए।स्वस्थ आलोचना होनी चाहिए, जबकि अब विरोध के लिए केंद्र और प्रदेश की चुनी  सरकार  का विरोध हो रहा है।

सही मायने में एक तरह से विरोध  सरकार का नही मतदाता का है, जिसने सरकार  बनाई। अपमान भी सरकार बनाने  वाले मतदाता का है। चौधारी अजित सिंह मंच से ही कहा करते थे, राजनीति में न कोई किसी का स्थायी दुशमन होता है, न ही दोस्त।  समय के साथ गठबंधन होते और टूटते रहतें हैं।  इसलिए नाराजगी भी सी ही होनी चाहिए।बुजुर्ग कहते आएं है कि दुश्मनी सी करो कि कभी

आमने− सामने बैठना पड़े तो अपने पहले कहे पर शर्मींदगी न उठानी पड़े।  ये बात आज के राजनैतिक नही समझते। जनता की भी याद्दाश्त कमजोर है। बह नेताओं की कही बाते, अपनमानजनक टिप्पणी को याद नही रखती।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

 

आदरणीय संपादक जी,

18 जुलाई को होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनाव पर लेख प्रेषित है।

सादर

अशोक मधुप             

क्या ये समाज की बेटियों के साथ बलात्कार और हत्या नहीं

 

16/09/2022

अशोक मधुप

आज अखबारों में लखीमपुर खीरी की दो  बहनों के साथ बलात्कार के  बाद हत्या की खबर पढ़ रहा हूं। अखबारों ने इसे दलित युवतियों  के साथ बलात्कार के बाद हत्या की घटना बताया है। कुछ अखबारों ने  इसीको  लेकर समाचार पत्रों के शीर्षक भी लगाएं। कुछने इस घटना को लेकर संपादकीय भी  लिखे। उन्होंने दलित युवतियों के साथ बलात्कार और हत्या की घटनाओं पर चिंता    जाहिर की।अग्रलेख लिखे गए।  ऐसा ही बदायूं , उन्नाव और हाथरस में अनुसूचित जाति की लड़कियों या महिलाओं घटनाओं के समय हुआ था।आदिवासी युवतियों के साथ  घटना होने पर उन्हें आदिवासी बताकर घटना को ज्यादा गंभीर बताने की कोशिश होती है।कहीं पिछड़ा होने पर पिछड़ा बताकर ।वास्तव में    बेटियां न दलित होती हैं न  पिछली जाति की न आदिवासी ।  बेटियां  समाज की होती हैं। मुहल्ले की होती हैं।  पूरे गांव की  होती हैं। बेटियों को कभी दलित,पिछड़े आदिवासी,वर्ग और धर्म में  नही बांटना   चाहिए।अगर किसी युवती या बेटी के साथ कोई घटना होती है तो उससे  पूरे  समाज के माथे  पर कलंक लगता है।पूरे समाज को इसका विरोध करना चाहिए।  जातियों में बांट कर विरोध किया जाना उचित नहीं है। इससे  घटना  की गंभीरता कम होती है।

 वैसे भी दलित  या आदिवासी लड़कियों के साथ घटना होना तब  माना जाना चाहिए जब उस जगह पर होने पर अपराधियों द्वारा दूसरी जाति की लडकियों को छोड़ दिया जाता।या बलात्कार −हत्या जाति पूछने के  बाद होती ।

दूसरी जाति की युवती या महिला को छोड़  दिया जाता  , तब दलित या आदिवासी कहना  ठीक लगता। अन्यथा  नहीं।यह तो  सीधी बलात्कार और हत्या की घटना  है। अन्यथा किसी भी  युवती के साथ घटना हो सकती है। किसी भी  महिला के साथ घटना  घट  सकती है। कहीं भी  हो सकती है।  गांव में भी  हो सकती है। शहर में भी।घटना  को दुष्कर्म के बाद हत्या की  माना जाना चाहिए। ये  अपराध जाति विशेष की बेटी या महिला के साथ नहीं हुआ । समाज की बेटी  या महिला  के साथ हुआ है। हम इस प्रकार की  घटना  होने  पर  पीड़ित  को जाति बताकर  घटना की गंभीरता  सिद्ध करने का प्रयास करते है। बताना  चाहतें हैं कि हमारे समाज में , आदिवासी ,दलित अनुसूचित आदि की महिला सुरक्षित नही हैं। ये कोशिश क करते है कि इससे  अपराध की गंभीरता बड़ी हो सके। गंभीरता बढ़ सके ,पर सा  होता नहीं। समझने की बात यह है कि इससे अपराध की गंभीरता बढ़ती नहीं कम होती है। घट जाती है।

देहात में आज भी  अपराध होने पर गांव के सब एकत्र  हो  जातें हैं।विरोध करते हैं।   लखीमपुर खीरी प्रकरण में भी  लड़की की मां का शोर सुन गांव वाले एकत्र हो गए।  लड़कियों को खोजने निकल पड़े। शहरों में तो घटना  होती देख  हम आंख घुमा  लेते  हैं।दुर्घटना  से सड़क पर घायल पड़े व्यक्ति की मदद करना गंवारा नही करते ,  देखकर आगे बढ़  जाते  हैं।शहरी दुनिया के रहने वाले  हम  सब हस्तिनापुर राज के दरबारी बन जाते  हैं।   दरबार में सरेआम द्रौपदी की साड़ी  खींची   जाती है , और सब चुप रहते  हैं।

 पुरानी घटना  है  नादिर शाह ने दिल्ली  पर कब्जा  कर लिया।  उसके सिपाही लूटमार में लग गए।  उन्होंने कुछ युवतियों और महिलाओं से  बलात्कार किया।  हम भारतीय हिंदू हो या मुसलमान ,कोई  भी  हों महिलाओं का अपमान नही बर्दास्त कर सकते । सो  उस  सिपाहियों का खून कर दिया।  सिपाहियों के मारे जाने की सूचना पर नादिरशाह आग बबूला  हो गया।उसने कत्ले आम का हुकम दिया। बताया जाता है कि पांच घंटे में तीस हजार के लगभग पुरूष,  बच्चें, महिलाओं का कत्ले आम हुआ।

 

अभी  कामनवेल्थ गैम्स हुए।  उसमें   विजयी तो  भारत के खिलाड़ी  हो  रहे थे। घोषणा भी ये ही थी कि भारत को एक और मैडल मिला। भारत आते− आते  ये खिलाड़ी जातियों में बंट रहे थे।  कोई  कह रहा था  इतने  ब्राह्मण जीते । कोई कह रहा था−  इतने जाट खिलाड़ी  विजयी हुई।कोई  प्रदेश के हिसाब से खिलाड़ियों के आंकड़े बता रहा था।

विशेष कारण  के बिना  जातियों ,धर्म  , संप्रदाय और दलित, अगड़े  और पिछड़ो में बांटने की हमारी प्रवृति घातक है।इसपर रोक लगनी चाहिए।  इससे समाज कमजोर होता है। देश कमजोर होता है। महिलाओं की अस्मिता  को  दलित, पिछड़ों और आदिवासियों में मत बांटिए। बेटियां  समाज की होती हैं।  समाज का सम्मान होती हैं।  उन्हें समाज की ही बेटी बनी रहने दीजिए। हमतो  उस देश के रहने वाले  हैं  जहां  प्राचीन कालसे

मान्यता  है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।जहांनारी का पूजन और सम्मान होता है,वहीं देवताओं

का  वास होता है। 

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

 


 

भारतीय है कोकाकोला

 

 


 

1990 में एक फिल्म आई थी पूरब और पश्चिम। उसमें अमेरिका गए एक भारतीय युवक ने भारत की तारीफ की थी ।अमेरिका जा बसे भारतीय ने कहा क्या है तुम्हारे देश में? भूखे लोगों का देश। पेट भरने को अन्न भी नहीं हो पाता। जवाब में युवक गाता है -जब जीरो दिया मेरे भारत ने। भारत ने मेरे भारत ने ।दुनिया को तब गिनती आई ।तारों की भाषा भी भारत ने ही सिखलायी। देता ना दशमलव भारत तो यूं चांद पर जाना मुश्किल था। धरती और चांद की दुनिया का अंदाज लगाना मुश्किल था। सभ्यता जहां पहले आई। पहले जन्मी जहां पर कला। भारत ने दुनिया को इतना सभी नहीं दिया बल्कि दुनिया में सबसे ज्यादा लोकप्रिय और पिए जाने वाले पेय कोका कोला का भी परिचय कराया। कोका कोला की वेबसाइट के अनुसार अटलांटा में 8 मई 1986 को फार्मेसिस्ट डॉ जान पेम्वर्टन ने इस पेयपदार्थ की शुरुआत की ।इस समय इसकी शुरुआत एक सिरप के रूप में हुई ।इसमें कार्बोनेट वाटर मिला होता था ।धीमे धीमे इसकी लोकप्रियता बढ़ी। कुछ समय बाद डॉ पेमवर्टन के साथी फ्रैंक एम रॉबिंस ने इस कंपनी को कोका कोला नाम दिया ।शुरुआत में रोज इसके 9 बोतल बिकती थीं।आज दुनिया भर में इसकी 19 बिलियन बोतल बिकती हैं।

कोका कोला शुरू होने के तीन साल के अंदर अटलांटा के कारोबारी असा ट्रिक्स सेंडलर की नजर पड़ी ।उन्होंने इसके उज्ज्वल भविष्य का अनुमान लगाया और $2300 में कोका कोला बिजनेस के अधिकार हासिल कर लिए। कोका कोला लेने के बाद सेंडलर एक बिजनेस मॉडल स्थापित किया ।इसमें कोका कोला एक ब्रांड बन गया। 2017 के रिकॉर्ड के अनुसार कंपनी की वार्षिक आय 34400 अरब डालर है।

गजब हिंदी डॉट कॉम के 28 जुलाई 17 के लेख के अनुसार यह कंपनी दुनिया का  पांचवा सबसे बड़ा ब्रांड है और प्रतिवर्ष 41 अरब डॉलर कमाता है ।दुनिया के 200 से ज्यादा देशों में कोका कोला के 900 प्लांट हैं इनमें 142200 कर्मचारी काम करते हैं 1,900,000,000 करोड़ बोतल हर दिन पी जाती हैँ?

यदि दुनिया में मौजूद कोका कोला की सभी बोतल को एक लाइन में लिटा दिया जाए तो यह लाइन 1677 बार धरती  से चांद पर आने जाने के बराबर होगी। दुनिया में पिए जाने वाले 3.0% प्रतिशत प्रोडक्ट कोका कोला के हैं और दुनिया की सबसे बड़ी पेय पदार्थ बनाने वाली कंपनी है ।

कोका कोला के बारे में कहा जाता है इसका फॉर्मूला बहुत गोपनीय है ।इस फार्मूले को दो अलग-अलग भाग में रखा गया है।

कंपनी के दो डायरेक्टर आधे आधे फार्मूले की जानकारी रखते हैं। यह दोनों डायरेक्टर कभी एक साथ नहीं रहते न प्लेन में एक साथ सफर करते हैं।

शर्मनाक है सबसे साक्षर प्रदेश केरल में दो महिलाओं की नरबलि

 

 आजादी के अमृत महोत्सव के वर्ष में केरल से दो महिलाओं के नरबलि देने की खबर चौंकाने वाली है।चौंकाने  वाली इसलिए भी है कि केरल देश का सबसे  ज्यादा शिक्षित प्रदेश  है। पुराने समय से कहा जाता रहा है कि यह समाज को शिक्षित करके देश से कुप्रथा, छुआछूत, बाल विवाह, जादू−टोने और नरबलि जैसी कुप्रथा  को खत्म कर दिया जाएगा। किंतु   यह घटना  ये बताने के लिए काफी है कि समाज में कुप्रथा किस   गहराई  तक हैं।देश के सबसे   शिक्षित प्रदेश  में  सा होना  चौकाने वाली घटना  है।

केरल के पथनमथिट्टा जिले एलंथूर में दो महिलाओं के अपहरण और फिर जादू-टोने में बेरहमी से हत्या की गई। इन महिलाओं के शवों को आरोपी ने अपने घर में ही दफना दिया। पुलिस ने बताया कि इस मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। जिन तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, उन्होंने इन महिलाओं की हत्या जादू-टोना अनुष्ठानके तहत की । आरोपियों को भरोसा था कि यदि वह मानव बलि देंगे तो उन्हें खूब सारा पैसा मिलेगा।पुलिस के अनुसार, जिन महिलाओं की हत्या की गई है वे केरल के एर्नाकुलम जिले की रहने वाली थी। इन महिलाओं की पहचान रोजलिन और पद्मा के रूप में हुई है, यह दोनों क्रमशः जून और सितंबर में लापता हो गई थी। पुलिस को  उनके लापता होने के मामलों की जांच के दौरान पता चला कि इन दोनों महिलाओं की मानव बलिदी गई थी।इतना  ही नही एक महिला के 56 टुकड़े  किये गए। शव को खाया भी गया।

कोच्चि शहर के पुलिस आयुक्त सीएच नागराजू ने मीडिया को बताया इन महिलाओं का सिर काट दिया गया और उनके शरीर को पथनमथिट्टा के एलंथूर में दफनाया गया था। पुलिस आयुक्त ने आगे कहा दंपति एक वित्तीय संकट का सामना कर रहे थे । उन्होंने भगवान को खुश करने और संकट से बाहर आने के लिए महिलाओं की बलि देने का फैसला किया।पुलिस ने एलंथूर से भगवल सिंह और लैला नाम के एक दंपति को हिरासत में लिया है। भगवल सिंह एक वैद्य के रूप में जाना जाता है जो अपने घर पर ही मरीजों की देखभाल करता था। इस मामले में पेरुंबवूर के शफी उर्फ ​​रशीद नाम के एक शख्स को भी   हिरासत में  लिया गया है। शफी   पर पुलिस को शक है कि  ये तांत्रिक है। ये ही  महिलाओं को वही दंपति के पास ले गया। दंपति भगवल सिंह और लैला दोनों का मानना था कि नरबलि देने से उनके घर में धन-संपत्ति आएगी। इसलिए दो महिलाओं की गला काटकर हत्या कर दी और फिर शव को खेत में दफना दिया।

शफी  पहली महिला  रोजलिन को यह कह कर दंपति के घार लाया कि उसे साफ्ट पोर्न फिल्म में काम करना होगा।  इसके लिए उसे दस लाख  रूपये मिलेंगे।घर में  आने पर रोजलिन को बिस्तर में  लेटने को कहा गया।फिल्म की शुटिंग के नाम पर तीनों आरोपियों ने महिला को  बिस्तर से बांध दिया।भागवल  सिंह हथोड़ा  ले आया।उसने हथौड़े से रोजलीन का सिर फोड दिया। सिंह की पत्नी लैला ने तलवार से रोजलीन की गर्दन काट दी।  चाकू  से रोजलीन के गुप्तागों पर वार किया गया। महिला के खून को घर के अलग – अलग हिस्सों में छिड़का गया।  बाद में राजलीन के शव को घर के खेत में  दफन कर दिया गया।दंपति ने बलि के बाद भी आर्थिक हालत में बदलाव न होने पर शफी से बलि के लिए एक और महिला  लाने को कहा ।  वह दूसरी महिला को लाया।  उसकी भी   पहली की ही तरह बलि दी गई।इस घटना के बाद इसी जनपद एक महिला के जादू टोना का वीडियों  वायरल हो रहा है।इस वीडियों में एक महिला बच्चे पर जादू −टोना कर रही है। पुलिस ने महिला के पति को गिरफ्तार कर लिया है।

यह केरल का पहला  ही केस नही है। केरल में  जून 2022 में भी लाटरी बेचने वाली एक 49 साल की महिला की बलि दी जा चुकी है। महिला को पैसों का लालच देकर एक कपल अपने साथ ले गया था। बाद में उसकी हत्या कर दी गई। आरोपियों ने महिला के शव के टुकड़े करके दफना दिया था।

आंकड़ों के अनुसार केरल में आजादी के बाद से अब तक बलि के आठ मामले दर्ज किए गए। पिछले साल मां ने अपने ही बच्चे की बलि चढ़ा दी। 2004 में बच्चे के हाथ-पांव काट दिए। 1996 में दंपति ने बच्चे की चाह में छह साल की बच्ची की बलि चढ़ा दी। 1983 में मां-बेटे ने शिक्षक की बलि देने की कोशिश की। 1973 में बच्चे की बलि दे दी गई। 1956 में गुरुवायुर में कृष्णन ने बीमार हाथी के लिए अपने दोस्त का गला रेत दिया। उसने कोर्ट में कहा था कि हाथी बड़ा जानवर है। इंसान छोटा। जब हाथी मर रहा हो तो इंसान के जिंदा रहने का कोई मतलब नहीं। 1955 में भी किशोर की गला दबाकर हत्या कर दी।

 ये सत्य है कि अंग्रेजों ने  देश को लूटा।हमारी प्राकृतिक संपदा  और संसांधनों का दोहन किया। सोने की चिड़िया के नाम से मशहूर भारत  को बरबाद कर दिया। पर ये भी   सही है कि उसने भारतीय  समाज के सुधार के लिए भी  काफी काम किया।भारत में बाल विवाह वर रोक लगाई।  विधवा  विवाह के लिए कानून  बनाया।भारत में नरबलि पर रोक गवर्नर लार्ड  हार्डिंग के समय में 1845 में पूरी तरह से लग चुकी थी।इस रोक को 177  साल बीत गए। किंतु नरबलि की घटनांए  रूकने का  नाम नही ले रहीं।नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो यानी एनसीआरबी  के आंकड़े बताते हैं कि जादू-टोने ने 10 साल में एक हजार से ज्यादा लोगों की जान ले ली है। 2012 से 2021 के बीच देश में 1,098 लोगों की मौत का कारण जादू-टोना ही था।

−17 अक्तूबर 2021  को बिहार के अररिया में एक छात्र की बलि दी गई।आरोपी ने इकबाल किया कि उसने पत्नी और बेटे के साथ मिलकर ये हत्या की।

−30 मई 2020 को ओडिशा के बाहुड़ा गांव के  ब्राह्मणी देवी मंदिर के पुजारी ने पूजा करने आए सरपंच की गर्दन काटकर हत्या कर दी । आरोपी पुजारी ने बताया कि कि चार दिन पहले हमें मां मंगला देवी का सपना आया था कि नरबलि देने से यह इलाका कोरोना महामारी से मुक्त हो जाएगा। इसके बाद रात को जब गांव के ही 55 वर्षीय सरोज प्रधान मंदिर में पहुंचे तब पुजारी ने धोखे से धारदार कटारी से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।

नरबलि पर तो  आजादी से  102 साल पहले अंग्रेज के समय में रूक गई थी।इसके बाबजूद ये भारतीय समाज में  आज भी   जिंदा है।  आज भी नरबलि की घटनांए प्रकाश में आते  रहतें हैं।

आज भी देश में तंत्रमंत्रदकियानूसी मान्यताएं और नासमझी इतनी ज्यादा हावी है कि लोग अपने फायदे के लिए दूसरे की जान लेते भी नहीं झिझकते।  

नरबलि  तथा अन्य सामाजिक कुप्रथाओं के  खिलाफ समाज को जागृत करने का सरकार द्वारा लगातार  अभियान चलता रहा है। देश में शिक्षा में  भी  वृद्धि हुई। जनचेतना बढ़ी ,इसके बावजूद देश में ये कुप्रथा  जारी हैं। 1929 से  बाल विवाह पर रोक है।  इसके बावजूद बाल विवाह होते  रहतें हैं।

आज देश का सबसे ज्यादा शिक्षा  वाला  प्रदेश केरल हैं।यहां  भारतीय  कम्युनिष्ट पार्टी माकपा की सरकार  है।  प्रदेश में जनता का वामपंथ  की और झुकाव है।माकपा  तो पहले ही कुप्रथाओं का विरोध करती रही है। इसलिए  इस प्रदेश में  नरबलि के बारे में कोई  सोच भी नही सकता।यहां  साक्षरता का प्रतिशत 96 है।

 जबकि आंध्र प्रदेश में  66.4,राजस्थान में 69.7,बिहार में  70.90,तेलंगाना  में  72.8 प्रतिशत उत्तर प्रदेश में  73.0,मध्य प्रदेश में  73.7,झारखंड में  74.3 और कर्नाटक  में  77.2  प्रतिशत साक्षरता है। केरल के अलावा अन्य प्रदेश में घटना का होना  साक्षरता का कम प्रतिशत माना जाता है।किंतु  केरल में तो सा नही है।हालाकि इस तरह की घटनांए  मिलने पर कठोर कार्रवाई  होती है।किंतु हमारी न्यायिक प्रणाली का बड़ा दोष  है, कि इसके पूरा होने में लंबा समय लगता  है।  सालों  लग जाते है। 25− 30  साल लग जाना आम बात है ।जरूरत  है कि नरबलि के मामले में फास्ट ट्रेक  कोर्ट में  केस  चले। तेजी से अपील पर भी कार्यवाही पूरी कर आरोपियों को कुछ ही माह में कठोरतम सजा दी जाए।  इस प्रकार के जघन्य  मामलों के निर्णय बड़े  स्तर पर प्रचारित हों,अखबार  और इलेक्ट्रिक मीडिया की सुर्खी बनें ,समाज में बहस का मुद्दा बने, ताकि आगे से  सा करते आदमी डरे।समाज की कुप्रथाओं पर रोक के लिए  जनचेतना  का काम स्कूली स्तर पर शुरू हो। स्कूलों में सवेरे  प्रार्थना के समय कुप्रथाओं को रोकने के लिए छात्रों को   जागृत किया जाए।

जादू,टोने, टोटकों की सच्चाई  जनता  तक पहुंचे। धार्मिक संस्थाओं और धर्म गुरूओं को भी इस अभियान में शामिल करना  होगा,  ताकि वे अपने शिष्य  और उनके परिवार को इसके प्रति जागृत करें। सुदूर क्षेत्र में रहने वालों को भी शिक्षा मिले।तभी  जाकर सी घटनाओं को रोका  जा सकेगा। 

केरल में दो महिलाओं की हत्या के बाद अब काला जादू के खिलाफ कानून बनाने की मांग उठने लगी है। तीन साल पहले 2019 में बिल बना भी, लेकिन विधानसभा में पेश तक नहीं हुआ। इसमें काला जादू, मानव बलि रोकने के प्रावधान थे। सरकार भी इस बिल पर मौन साधे है। केरल सरकार को अब इस कानून को  लागू करने के लिए दबाव बढ़ेगा। वैसे  देश में नरबलि पर तो पहले ही रोक है।सिर्फ  काले कानून पर रोक की बात है। 

 

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)  

 

 

 

 

आदरणीय  संपादक जी,

केरल में हुई दो महिलाओं की नरबलि पर वरिष्ठ पत्रकार श्री अशोक मधुप

का ये लेख प्रकाशनार्थ प्रेषित है।लेख के साथ   प्रकाशन के लिए   उनका फोटो भी भेजा  जा रहा है।  कृपया प्रकाशित लेख की कटिंग या पीडीएफ भिजवाने का कष्ट करें। आभारी होंगे ।सादर

दिवित फीचर्स

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बीस दिन में 500 करोड़ का बिजनेस अशोक मधुप

 

 


ashokmadhup@gmail.com

15 अगस्त बीत गया।प्रधानमंत्री का हर घर तिंरगा अभियान बड़ी  कामयाबी के साथ संपन्न हो गया। कामयाबी के साथ  संपन्न  ही नही हुआ, बल्कि  20− 25 दिन के  इस अभियान में देश  ने 500  करोड़ रूपये का  व्यवसाय किया। पर कुछ हैं  जो  प्रत्येक काम में खराबी निकालते हैं।  गलती ढ़ूंढते  है।  उनका काम ही कमी निकालना है।  व अच्छा  सोच  नही सकते। अच्छा देख नही सकते। सा ही इस अभियान के साथ  हुआ। पहले उनका कहना था कि इतने झंडे  एक साथ कैसे बनेंगे कैसे तैयार होंगेअब उनकी परेशानी है कि घरों पर फहराए झंडो का  क्या होगाउन्हें  संभाल कर कैसे   रखा जाएगा।इन्हें प्रत्येक कार्य में कमी निकालनी है, निकालेंगे।अब इन्हें कौन समझाए कि जाड़े खत्म होने पर हम जाड़ो में प्रयुक्त हुए कपड़े अगले  साल में इस्तेमाल करने के लिए क्या  संजोकर नहीं रख देते    क्या गर्मी के कपड़े  जाड़े  आने पर संदूक या अटैंची में नही चले  जाते। ये तो मात्र  एक झंडा है।

सारा  विपक्ष मिलकर नरेंद्र मोदी बनना   चाहता है। वह मोदी बनना चाहता है।  मोदी को समझना  नही चाहता।  मोदी को समझे और अच्छी  तरह जाने बिना  तो  नरेंद्र मोदी नही बना    जा सकता। पिछले  आठ साल के कार्यकाल में नरेंद्र मोदी ने लोगों में राष्ट्रीयता  की भावना बलवती की। देशभक्ति की भावना को मजबूत किया।उसी का परिणाम है नोटबंदी हो या  जीएसटी लागू करना,  लागू करते के समय ही कुछ शोर मचा।  उसके बाद सब  सामान्य हो गया।विपक्ष और निगेटिव सोचने  वालों ने बहुत हंगामा  काटा,  पर सब सामान्य  हो गया।अगली बार चुनाव में नोटबंदी से परेशान जनता और जीएसटी से पीड़ित व्यापारी ने नरेंद्र मोदी पर फिर विश्वास जताया।उन्हें बहुमत के साथ दूसरी बार भी  प्रधानमंत्री बनाया।   सा ही  कोराना  वैक्सीन के   तैयार होने पर हुआ। किसी ने वैक्सीन को मोदी −पानी बताया तो किसी ने उसे नुकसानदायक कहा।   देश के बड़े  गणितज्ञ कह रहे थे इतनी आबादी को  वैक्सीन कैसे  लगेगीइसमें तो बहुत साल लगेंगे। जबकि आज एक सिंतबर तक पूरे देश में दो अरब  12 करोड़ 52 लाख 83 हजार 253  वैकसीन के डोज  लग गए। कैसे इतना हो गया अब हो गया तो चुप्पी साधे हैं।

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  काफी समय से लोकल फार वोकल पर जोर दे रहे हैं। उनका ध्यान  इसी पर है। तिंरगा  अभियान को हम इसी से जोड़कर देखें।  पता चलेगा कि हर घर तिरंगा अभियान से देश भर में इस बार 30 करोड़ से अधिक राष्ट्रीय ध्वज की बिक्री हुई। लगभग 500 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ ।कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAT )ने कहा कि राष्ट्रभक्ति और स्व-रोजगार से जुड़े इस अभियान ने कोआपरेटिव व्यापार के लिए संभावनाएं खोल दी है। कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीसी भरतिया ने बताया कि देश के लोगों की तिरंगे की अभूतपूर्व मांग को पूरा करने के लिए लगभग 20 दिनों के रिकॉर्ड समय में 30 करोड़ से अधिक तिरंगे का निर्माण किया। इससे  लगभग  500 करोड़ का नया व्यवसाय हुआ। वह व्यवसाय जो  अब तक बहुत कम था।आलोचना  करने वाले इस अभियान के उज्जवल पक्ष का नही देख रहे।  ये  नहीं देख  रहे कि प्रधानमंत्री के  एक आह्वान पर एक झटके में पांच सौ करोड़ रूपये  का व्यवसाय  हो  गया।झंडा बनाने के काम में लोगों को कितना  लाभ  हुआ। कितने हाथों काकाम मिला। कितने घरों के बच्चों के खिलौने  और खरीदे गए।  इस घर−  घर झंडा अभियान से   पहले कोई  सोच भी नही सकता था कि झंडा बनाने का व्यवसाय इतना  बड़ा भी     हो सकता है।  क्या  इससे  पहले कभी  इस तरह का  आह्वान हुआ है।  पूर्व प्रधानमंत्री  लालबहादुर  शास्त्री ने पाकिस्तान संघर्ष के समय एक दिन अन्न  न खाने का  आह्वान  किया था।  इसका  इस तरह  का  असर जरूर दिखाई  दिया था।  उसके बाद नहीं।

मुझ  एक साधु का किस्सा  याद आता  है।  इसके आश्रम के पास का रहने वाला एक किसान उसके  पास आया।  बोला थोड़ी सी जमीन है। छह माह बाद बेटी की शादी है। प्रभु  कृपा करो।  साधु  ने कहा   समय है।  पूरी जमीन में  लौकी का बीज लगा दे। जब तैयार हो जाए तो बता देना।किसान ने एक दिन साधु को यह बताया कि  की लौकी की फसल तैयार है। उन्होंने भक्तों से कहा कि कल जब आश्रम आओं तो अपने  सामने की तोड़ी एक− एक  लौकी लेकर  आना ।  सा ही  हुआ किसान की सारी लौकी बिक गई।  भक्तों की लाई लौकी से  इस दिन आश्रम में सब्जी बनी। आश्रमवासी और भक्तों के लौकी खाने से किसान की मदद भी  हो गई। किसी को खबर भी  नही हुई।माना की मोदी साधु नही है।   सन्यासी नही है। किंतु  इनके एक जरा  से प्रयास ने देश को पांच सौ करोड़ का नया  बिजनेस दे दिया। बीस – पच्चीस दिन का  काम और 500  करोड़ का रिटर्न। इसके लिए  नए  संयत्र भी  नहीं लगाने पड़े। ये आलोचक देश के उत्पाद में  हुई  वृद्धि को ये नही देख रहे। जब कुछ बड़ा  होता  है तो   उसमें कुछ कमी भी  रह जाती है।ये कमी तो  हमारी हैं।  हम तिंरगा  अभियान को समझे नही। कहीं फहराता  झंडा रह गया तो  इसमें अभियान का क्या दोषॽ कहीं जमीन पर झंडा  गिरा और किसी ने नहीं उठाया तो  ये  अभियान की तो  गलती नहीं।  ये  तसे हमारी गलती है।

हां  इस अभियान से हम इतना   जरूर समझे कि देश में पिछले कुछ साल में पैदा हुआ राष्ट्र भक्ति का ज्वार अब उतरने वाला  नही है।   और इसे बनाए  रखने की जरूरत है।लोकल फार वोकल का असर ये है कि देश के नेतृत्व  ने कुछ नही कहा।  लोकल फार वोकल के प्रभाव के कारण गणेश  चतुर्थी  उत्सव के अवसर पर चीन से एक भी मूर्ति भारत में नहीं आई। कारोबारी संगठन कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट)  प्रवीण खंडेलवाल ने बताया कि एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष देशभर में भगवान गणेश की 20 करोड़ से ज्यादा मूर्तियां खरीदी जाती हैं इससे अनुमानित 300 करोड़ रुपये से ज्यादा का व्यापार होता है। पिछले दो साल से देशभर में गणपति की इको-फ्रेंडली मूर्तियों को स्थापित करने का चलन तेजी से बढ़ा है। इससे पहले चीन से बड़े पैमाने पर भगवान गणेश की प्लास्टर ऑफ पेरिस, स्टोन, मार्बल तथा अन्य सामानों से बनी मूर्तियों का आयात होता था। सस्ती होने के कारण चीन से इन प्रतिमाओं का आयात होता था, लेकिन पिछले दो साल में कैट के चीनी वस्तुओं के बहिष्कार अभियान के चलते चीन से भगवान गणेश की मूर्तियों का आयात बंद हो गया । इसकी जगह पर्यावरण के अनुकूल मूर्तियों को स्थापित करने का चलन बढ़ा है।देश का खुद का व्यापार बढ़ा  है।इको फ्रैंडली मूर्ति अपने यहां ही तैयार होकर  बिक रही हैं, इसे देखिए । जानिए और मानिए कि महात्मा गांधी का स्वदेशी का सपना तेजी से पूरा  हो  रहा है।इसीलिए कहा गया   है  कि  अच्छा  देखिए। अच्छा सोचिए। किसी कार्य का काला  पक्ष    मत देखिए।उसमें कुछ अच्छा भी  होगा। उसके उज्जवल पक्ष को  देखिए ,समझिए। जानिए।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 02/09/2022