Friday, June 19, 2026

छोटे शहरों को बचाइए हुजूर



सरकार हो  या न्यायपालिका ,नेता हो या राजनेता सबका ध्यान महानगरों  में सुविधा उपलब्ध कराने या उनका विकास कराने पर ज्यादा है। सारी योजनांए शहरों के लिए बन रही हैं।  न्याय पालिका का भी ध्यान उधर ही है। यह वहां शुद्ध जल की उपलब्धता और यातायात को सुचारू बनाने के लिए आदेश पारित कर रही है। तो बड़े शहरों के बढ़ते प्रदूषण को रोकने पर भी उसकी नजर है।ं इसके लिए भी नए नए आदेश  निर्देश दिए जा रहे है। कितुं छोटे शहरों की ओर किसी का ध्यान नही, जहां भारत की अधिकांश आबादी रहती है। देश की आत्मा बसती है।  

   शहरों को बचाने की मुहीम में हम छोटे शहरों को बिसरा बैठे हैं ओर हो सकता है कि जब तक देख के रहनुमाओं की नजर यहां पड़े तब तक हम बहुत  कुछ खो चुके हों। 

देहात अर्थात छोटे शहर एक सवा लाख तक की आबादी के नगर कभी शुद्ध पानी और शुद्ध हवा के लिए प्रसिद्ध थे। पानी तो नगर पालिकाओं की पेयजल आपूर्ति के कारण कभी का खराब हो गया। पेयजल के नमूने चाहें जिलाधिकारी आवास से लिए जाए या कहीं और किसी महत्वपूर्ण स्थानोंं से,वहां के पानी में भी क्लोरीन की मात्रा नहीं मिलती। काफी भवनों और अस्पतालों के गंदे पानी को  बोर करके जमीन में डाला जा रहा है। इससे जलस्त्रोत के प्रदूषित होने का खतरा बढ़ रहा है। मजबूरन शुद्ध पेयजल के लिए इन छोटे शहरों मे भी अब वाटर प्योरिफायर का चलन चल निकला है। अब तक यहां की  आक्सीजन किसी तरह से शुद्ध थी, सो अब उसे भी लगता है किसी की नजर लग गई है।

छोटे शहरों के रहनुमाओं की ख्ुादगर्जी के कारण यहां के कूड़ा  डालने के स्थान खत्म हो गया। भौतिकवादिता में कूड़ा घटा नहीं बढ़ता  जा रहा है। समस्या यह पैदा हो रही है कि यह जाए कहां। कूड़े की जमीन पर भवन बनाते समय यहां के रहनुमाओं ने यह ध्यान नहीं दिया कि कचरे को डाला कहां जाएगा। पालिकाओं केा कूड़ा साफ कराना है,  तो वह गली मुहल्ले से तो  उठ  रहा है, किंतु जा रहा है शहर के लावारिस स्थानों पर। मुहल्लों और बस्तियों में पड़े खाली प्लाट कूड़ाघर बन गए है। पूरे मुहल्ले का कूड़ा इन लावारिस स्थानों पर लाकर डाल दिया जाता है। कहीं जगह न मिलने पर इन्हें सड़कों के किनारे डाला जा रहा है। पालिकाओं के अध्यक्षों ने नगरों  के सभी संपर्र्क मार्गो पर   बड़े बड़े प्रवेश  द्वारा बनवाए है। इन पर उनकी ओर से लिखाया गया है कि  नगर में  आने पर आपका स्वागत है। आप और हम सोचतें कि शायद स्वागत ऐसी ही होगा  जैसे कर्ई बार फ्लाइट से उतर  एयरपोर्ट से निकलकर बाहर आते समय कुछ होटल वाले एक फूल और अपने  होटल का कार्ड पकड़ा देतें हैं।

 इन स्वागत द्वारों पर आकर इस तरह का कुछ नहीं मिलता। इनमें  प्रवेश से काफी पहले से ही सड़क किनारे पड़े कूड़े कचरे के ढ़ेर और उनसे निकलती बदबू हमारा स्वागत करती है। इन नगरों मेंं प्रवेश के   बहुुत पहले से  कूड़े की गंध हमे बैचेन कर देती है नाक बंद करने के लिए।  यहां आकर सब  नाक पर  कपड़ा  रखने के लिए मजबूर हो जाते हैं । काफी तो बदबू से  परेशान हो अपने  वाहनों  के शीशें बंद कर लेते हैं। और ऐसे स्वागत करने वालों को मोटी गाली दिए बिना नही रहते।

मै लगभग एक लाख की आबादी वाले छोटे शहर मेंं रहता  हॅंू। अब से कुछ साल पहले तक नगर के सभी रास्तों पर सबेरे  के समय घूमने वाले मिल जाते थे। वे मस्ती से घूमते प्रकृति की शुद्ध वायु का आनंद लेते थे किंतु अब ऐसा नहीं होता। एक ऐसा रास्ता भी अब   नहीं मिलता  जिसपर  घूमने निकला जाए और कूड़ें के ढेर न दिखाई दें, उनकी बदबू न आए।  सब रास्तों पर सड़ते कूड़े की गंध नाक पर कपड़ा रखने को मजबूर कर देती है। कई बार यहां क ूड़ा डालने पर सफाई कर्मियों से झगड़े भी होते है किंतु वे भी क्या करे। अपने इलाके की सफाई की जिम्मेदारी उनकी है। कूड़ा नहीं उठांएगे तो इलाके वाले उल्टा सीधा कहेंगे। पालिकाधिकारियों की डाट और झेलनी होगी। ऐसे में  कूड़ा उन्हें कहीं तो ले जाकर डालना ही है। कहीं नहीं डाल पाते तो शहर के आसपास के खाली स्थान तालाब तक में यह कूड़ा डाल देते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश है कि पट चुके तालाब खोले जांए किंतु यहा कूड़ा निस्तारण के तालाब की भूमि को प्रयोग किया जा रहा हैँ। इससे भी ज्यादा सुलभ है शहर के बाहर सड़कों के किनारे की जगह। जहां मौका मिला, कूड़ा डालिए और चलते बनिए कोई पूछने वाला नही है।       मेरे जैसे छोटे शहर की वायु अब से कुछ साल पहले तक बहुत ही शुद्ध होती थी किंतु अब वह लगातार प्रदूषित होती जा रही है। देश ऐसे छोटे शहरों से भरा पड़ा है। उसकी बड़ी आबादी यहंी रहती है। अब महानगरों का प्रदूषण यहां भी घर करता जा रहा है। मेरी ङ्क्षचता इन्हीं छोटे शहरों को लेकर है। अभी से इन्हें बचाने की कवायद करने की जरूरत हैे।  महानगरों के लिए  बड़े बड़े बजट आ रहे है। सरकार और सत्ताधारियों का ध्यान उन्हीं नगरों की और है। छोटे शहरों की और नहीं।

हमें छोटेे शहरों के कूड़े कचरे के निस्तारण और उसके लिए  अभी से योजना बनानी होंगी। बड़े  शहरों के कूड़े से हम कहीं खाद बना रहे हैं तों कहीं बिजली। कहंीं वह कालोनियों के भराव के लिए प्रयोग हो रहा है। प्रदेश सरकार का कुछ समय पहले आदेश आया था कि छोटे तीन चार शहरों के बीच कोई जगह लेकर वहां कूड़ा डंप किया जाए किंंतु इस पर आज तक काम नहीं हुआ। दूसरे पालिकाओं के कूड़े के वाहनों को इन डंप तक ले जाने में तेल ज्यादा लगेगा। अभी ही छोटे शहरों की पालिकाएं आर्थिक समस्या से जूझ रही हैं।  जो भी हो हमे इन छोटे शहरों को बचाने ,उनकी प्राण वायु को शुद्ध रखने के  लिए जल्दी ही कुछ करना होगा। देश मे बहुत सारी एजीओ काम कर रही है। काश वे अपना कार्य क्षेत्र छोटे नगरों तक बना पातीं।  


अशोक मधुप

21/07/2010



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