Friday, June 19, 2026

टप्पल की टाउनशिप कैैंसिल होने से हारा तो किसान ही है

 आंदोलन भले ही जीता हो पर 



अलीगढ़ के टप्पल में चल रहा किसानों का आंदोलन प्रदेश सरकार द्वारा वहां की टाउनशिप खत्म करने की घोषणा के साथ खत्म होता। इस आंदोलन में  शामिल होने वाले नेता टाउनशिप को वापस लेने की घोषणा को किसान आंदोलन की जीत भले ही बता रहे हों, कुछ भी दावे कर रहे हों किंतु इस टाउनशिप के वापस होने से अंततः हारा किसान ही है। यहां यदि कोई  जीता है तो कुछ राजनेता और उनकी राजनीति।किसानों को  लाभ तभी था,जब यहां टाउनशिप कायम रहती और उसमें जाने वाली जमीन का उसे भरपूर मुआवजा मिलता। किसानों के यहंा आंदोलन चलाने का उद्देश्य भी  यही था कि टाउनशिप बने और उन्हें बढ़िया मुआवजा मिले।टाउनशिप कैंसिल होने से यहंा के किसानों केा ही  सबसे जयादा नुकसान हुआ है, क्यांेकि उसकी जमीन के अब न इतने अच्छे  रेट मिलेंगे, नही उनके गंाव का विकास होगा। दूसरा

 उद्योगपति भी अब यहां कल कारखाना लगाते टाउनशिप बनाते हिचकेगा।     

टाउनशिप खत्म होने की घोषणा पर टप्पल के किसान दो भागों में बंट गए हैं। एक वह जो नही चाहते कि यहां टाउनशिप बने; दूसरे वे किसान जो  मांग कर रहे है कि टाउनशिप वापस हो। उनका कहना  है कि इस टाउनशिप के कैंसिल होने से सबसे ज्यादा टप्पल के किसानों का नुकसान हुआ है। यहां टाउनशिप बनती तो सबसे ज्यादा लाभ टप्पल को ही मिलता। ऐसा यहां ही नहीं हुआ, पश्चिमी बंगाल के सिंगनूर में भी उस समय हुआ था, जब रतन आटा ने अपना नैनो  बनाने का कानखाना    सिंगनूर से हटाकर कहीं  दूसरी जगह ले जाने की घोषणा की थी। सिंगनूर के किसान पहले अंादेालन करते रहे । वे कहते रहे कि वे नैनों के प्रस्तावित कारखाने को अपनी जमीन नही देंगे, किंतु कारखाना के प्रोजेक्ट निरस्त होने पर उन्हें धक्का लगा। उन्होंने इसे सिंगनूर में ही बनाने के लिए  प्रदर्शन किए। किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी।सिंगनूर हो या टप्पल,या दादरी किसानों का लाभ इसमें हैं कि यहां उद्योग लगे , टाउनशिप बने। किसान चाहते भी यहंीं हैं। आंदोलन के माध्यम से वह सरकार या उद्योग लगाने वाली कंपनी पर ज्यादा मुआवजे, जमीन देने वाले परिवार के एक सदस्य को लगने वाले  उद्योग में नौकरी की डिमांड आदि करते है। आंदोलन के माध्यम से सरकार  या 

उद्योग लगाने वाली कंपनी पर  दवाब देकर काफी मांगों को मनवा लेते भी हैं। यही होना भी चाहिए। उद्योगपति का प्रोजेक्ट स्थगित करने  पर उसका ज्यादा कुछ नही बिगड़ता। रतन टाटा  सिंगनूर से प्राजेक्ट वापस लेने की  घोषणा बाद में करते हैं, गुजरात के मुख्यम़त्री का पहले आफर आ जाता है कि उनके राज्य में आकर उद्योग लगा लें।     

दरअस्त प्रत्येक प्रदेश की तरह, क्षेत्र की तरक्की के लिए आवश्यक है कि वहां ज्यादा से ज्यादा उद्योग लगें, उद्योगों से विस्तार के साथ ही क्षेत्र के विकास के बड़े रास्ते खुलतें हैं। पिछले दिनों मुझे बजाज चीनी मिल के बिलाई प्लांट में  एक कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला। मै  इसी क्षे़त्र का रहने  वाला हूं। मै यह  देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि कार्यकम्र मेें लगा लाउउस्पीकर दस किलो मीटर दूर बसे कस्बे झालू के एक दुकानदार का है  और खाना बनाने वाले कारीगर भी झालू के हैं, फोटोग्राफर दूसरे छह किलोमीटर दूर के  नगर हल्दौर  के हैं। उद्योग जहां लगता है, वहा के रहने वालों को जमाीन के मुआवजे और नौकरी आदि के माध्यम से प्रत्यक्ष लाभ मिलता है। उद्योग लगाने वाले  लेबर  भी वही की लेतें हैं, क्योंकि उन्हे वह सस्ती पड़ती हैं।

 इसके अलावा सामान लाने ले जाने के लिए वाहन लोकल लिए जाते हैं। उद्योग के  कर्मचारी खरीदारी के लिए स्थानीय बाजार पर ही निर्भर रहते हैं। दूध, फल, सब्जी अनाज सब स्थानीय बाजार से ही खरीदा जाता है।उद्योेग लगते हैं तो वाहनों के आने जाने के लिए सड़के भी बनती है,। उद्योग में कार्यरत स्टाफ के बच्चों के लिए स्कूल-कालेज भी ख्ुालतें है।, एक तरह से क्षेत्र का चहंुमुखी विकास होता है। उद्योग के कैंसिल होन से क्षे़त्र का विकास 50-60 साल पीछे चला जाता है। 

आंदोलन जब प्रारंभ होता है तो उसके चलाने वालों का सोच दूसरा होता है किंतु जैसे जैेस वह गति पकड़ता है, वैसे ही वैसे उसमें अन्य व्यक्ति भी आकर जुड़ते जाते हैं और एक तरह से आंदोलन अतिवादियों के हाथों में चला जाता है। इनका कार्य अपनी राजनीति चमकाना भर होता है, आंदोलनकारियों की लाभ हानि से नहीं।कुछ नेता आकर यहां अपनी राजनीति करने लगते हैं;। टिप्पल के आंदोलन में भी ऐसा ही हुआ। आंदेालन श्ुारू हुआ। तब नेतृत्व वहां के किसानों  के  हाथ में था और बढ़ा तो सभी राजनैतिक दल इस आंदांेलन की आग में  अपनी रोटी सेकने कूद पड़े। कांगे्रस से राहुल गंाधी आंदोलन मे कूदे तो भाजपा के राजनाथ ंिसह ने अंादोलन स्थल पर ही जाकर डेरा डाल लिया।राजोद के अजित सिंह और भाकियू के महेंद्र सिंह टिकैत पहले ही इस आंदोलन में शामिल हो चुके थे। सपा ने भी अंादोलन को समर्थन दिया। हालत तो यहां तक पंहुची कि रालोद की संसंद घेरने की घोषणा का स्वयं बसपा ने भी समर्थन कर दिया।

इस आंदेालन से सब दल एक मंच पर दिखाई  दिए,प्रश्न यह है कि केंद्र में बैठी कांग्रेस और प्रदेश की बसपा सरकार जब किसानों की मांगों केा सही मान रहीं थी, तो मांगों को पूरा क्यो ंनही किया गया; किसान नोयडा के बराबर मुआवजे की मांग कर रहे थे, ये दल चाहते तो किसानों को नोयडा से भी दस-बीस- सौ गुुना जयादा मुआवजा दे सकते थे,क्योंकि करना तो उन्हें ही था। सच्चाई यह है कि ये दल हो या अन्या किसी केा किसानों के हित की ंिचता नहीं थी, उनका कार्य इस आंदोलन के माध्यम से  राजनीति करना था, और वह उसे करने मे कामयाब रहे।       

  ंकिसानों को यह समझना होगा कि कल कारखाने, बिजलीघर , हवाई  अड्डे जमीन पर ही बनते है, आकाश में नहीं । जमीन पर कारखाने बिजलीघर हवाई अड्डे  बनेंगे ता उनके लिए जमीन भी  अधिगृहित होंगी, इसके लिए वे अच्छे मुआवजे आदि की बात करें और अन्य सुविधा चाहे, किंतु ऐसा न करे कि बात टूटे और उद्योग लगाने वालो को दूसरी जगह ंउद्योग लगाने को बाध्य होना पडे़। ंिसंगनूर से नैनो कारखाना हटा तो गुजरात में चला गया। व्यापारी को उद्योग लगाना हैं वह एक जगह नही दूसरी जगह लगा लेगा किंतु जिस प्रस्तावित जगह से उद्योग जाएगा ,उसके विकास का रास्ता तो अवरूद्ध होगा ही।   


अशोक मधुप 

09/05/2010

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