Friday, June 19, 2026

बाघ को बचाने को वनों की घास को भी बचाना होगा

 बाघ को बचाने को वनों की घास को भी बचाना होगा 

पूरी दुनिया में भारतीय बाघों को बचाने की कवायद हो रही है। सबका ध्य्ाान बाघ की और है,किसी का ध्य्ाान वन की घास की और नहीं हैै। आज भारत के वनों में सबसे ज्य्ाादा खतरा वहंा की घास और पौधों को है, यदि वे न रहे तो बाघ भी नहीं रहेगा। 

प्रकृति एक चक्र में बंधी है। सब एक दूसरे से जुड़े हैं। शाकाहारी और मंासाहारी प्राणी अलग है, किंतु उनमें एक केे बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं । बाघ, चीते, गुलदार, लकड़श्ग्गे सब मंासाहारी प््रााणी है। हिरन, नील गाय,खरगोश, लोमड़ी, आदि शाकाहारी प््रााणी हैं। दोनों अलग अलग है किंतु दोनों केे बिना एक दूसरे का अस्तित्व नहीं है। वन के शाकाहारी प््रााणी घास ,पेड़ ,

पौधों को खाकर जीवित रहते हैंे। मंासाहारी पशु शेर आदि का भोजन ये शाकाहारी वन्य्ा प््रााणी नील गाय, हिरन आदि हैं। यदि वन में शाकाहारी प््रााणी न हो तो मंासाहारी प््रााणियों का जिंदा रहना असंश्व है। मंासाहारी प््रााणी मंास ही खंाएगे घास पेड़ पौध्ेा नहीं। 

आज सबसे ज्य्ाादा खतरा शाकाहारी प््रााणी नीलगाय हिरन आदि के भोजन घास को है। वनों में उग आई अमेरिकन प्र्रजाति की झाड़ी लैंटिना कैमेरा इस घास को तेजी से खत्म करती जा रही है । यह पिछले कुछ साल में वनों में बड़ी तेजी से साथ बढ़ी है। आज हालत यह है कि यह झाड़ी वन की 25 से 30प्रतिशत घंास को खत्म कर चुकी है और अन्य्ा घास पेड़ पौधों को अपनी चपेट में लेती जा रही है। इस झाड़ी की हालत यह है कि यह जहंा उग आती है इसे आसपास के पेड़ पौधे और घास पूरी तरह खत्म हो जातेे हैं। सूखा गर्मी भी इसका कुछ नही बिगाड़ पाती। गर्मी में यह पूरी तरह सूख जाती है किंतु जरा सा पानी मिलते ही यह फिर हरी श्री हो जाती है। बीस साल बाद भी यह हरी हो सकती है। वन 

अधिकारी इस झाड़ी के बढ़ाव को लेकर चिंतित हैं, उनकी समझ में इसका कोई उपाय नहीं आ रहा। यह झाड़ी बेंत की तरह होती है। कुछ जगह इसे पौधों से बेंत के फर्नीचर की भंाति फर्नीचर बनाया गया किंतु इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। रक्त बीज की तरह इसका पौधा दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है। 

बफर जोन , सफारी जोन से तो घास निकाली जा सकती है किंतु कोर जोन में तो बाहरी व्य्ाक्ति का प्रवेेश पूरी तरह प्रतिबंधित है। यहंा किसी चीज से बिलकुल छेड़छाड़ नही हो सकती। ऐसे में लेंटिना को रोकना संश्व नहीं है। आज वन्य्ा प््रााणियों के शहर की और आने वन क्षेत्र में रहने वालों पर हमले करने की घटनाओं के पीछे का मन्तव्य्ा यही है कि उन्हें सरलता से भोजन नहीं मिल रहा। उन्हें अब पेट श्रने के लिए आबादी की और आना पड़ रहा है। 

लेंटिना का आंतक अभी से प्रभाव दिखाने लगा है। आगे इससे और हालात खराब ही होंगे। ऐसे में बाघ संरक्षण की उसे बचाने े चिंतन और कवायद के बीच हमें वन के शाकाहारी प््रााणियों का भोजन घास को बचाने के उपाय और लैंटिना को खतृम करने पर भी ध्य्ाान देना होगा। 

 

अशोक मधुप 


04/01/2011


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