Sunday, October 31, 2010

नजीबाबाद का ताजमहल




शाहजहां द्वारा अपनी प्यारी                 बेगम      मुमताज                 की  यादगार के तौर पर बनवाया गया आगरा का ताजमहल पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। लेकिन उत्तर प्रदेश में बिजनौर जनपद के नजीबाबाद शहर में बने ताजमहल के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। लगभग 240 साल पूर्व चारमीनार नाम के इस ताजमहल को एक बेगम ने अपने पति की याद में बनवाया था। पुरातात्विक महत्व की यह इमारत सरकारी उपेक्षा के कारण आज बदहाल है औैर धीरे -धीरे दम तोड़ रही है।

दिल्ली से लगभग 190 किलोमीटर की दूरी पर नजीबाबाद के नाम से प्रसिद्ध शहर को एक रूहेला सरदार नजीबुद्दौला ने बसाया था। नजीबाबाद उत्तराखंड का प्रवेश द्वार है। कोटद्वार के रास्ते यहां से उत्तराखंड आया जाया जाता है। नजीबुद्दौला ने इस शहर में कई महत्वपूर्ण एवं खूबसूरत भवन बनवाए।
इसी नवाब नजीबुद्दौला के नवासे नवाब जहांगीर खान की याद में उनकी बेगम ने चारमीनार नाम से शानदार मजार बनवाया। इतिहास के जानकारों के अनुसार, नवाब जहांगीर खान की शादी किरतपुर के मुहल्ला कोटरा में हुई थी। शादी के दो साल बाद वह अपनी बेगम को लेने कोटरा गए हुए थे। लौटते समय जश्न की आतिशबाजी के दौरान छोड़ा गया गोला गांव जीवनसराय के पास आकर नवाब जहांगीर खान को लगा और उनकी मौत हो गई। उस हादसे से उनकी बेगम को बहुत धक्का लगा। उन्होंने नवाब की याद में नजीबाबाद के मोजममपुर तेली गढ़ी में चारमीनार नाम का शानदार मकबरा बनवाया।
इस मकबरे के चारों ओर चार मीनारें हैं। एक मीनार की गोलाई 15 फुट के आसपास है। प्रत्येक मीनार तीन खंडों में बनी है। दो मीनारों में ऊपर जाने के लिए 26-26 पैड़ी बनी हुई है। इनसे बच्चे और युवा आज भी मीनार पर चढ़ते उतरते हैं। लखौरी ईंटों से बनी इन मीनारों की एक दूसरे से दूरी 50 फुट के आसपास है। चारों मीनारों के बीच में बना भव्य गुंबद कभी का ढह गया। बताया जाता है कि इसी गुंबद में नवाब जहांगीर खान की कब्र है। हॉल में प्र्रवेश के लिए मीनारों के बीच में महराबनुमा दरवाजे बने हैं। मीनारें भी अब धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त हो रही हैं। मीनारों के नीचे के भाग की हालत बहत ही खराब है। उनकी ईंट लगातार निकलती जा रही हैं। नजीबाबाद और बिजनौर जनपद के इतिहास के जानकार बेगम द्वारा बनवाए गए इस चारमीनार ताजमहल के बारे में तो बात करते हैं, लेकिन वे यह नहीं बता पाते कि बेगम का नाम क्या था और वह कब तक जिंदा रहीं। यह भी कोई नहीं बता पाता कि इसके निर्माण पर कितनी लागत आई। ध्वस्त होने को तैयार पुरातात्विक महत्व के इस मकबरे के                 तरंत                 सर  क्षण की जरूरत            अमर                 उजाला         में                 तीस   


















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Thursday, October 28, 2010

उफ! गंगा की लहरों पर ये 7 घंटे

सोमवार।करवा चौथ से ठीक एक दिन पहले। निर्मल गंगा अविरल प्रवाह 2010। अभियान में 30 बोटशामिल थीं। बड़ा काफिला था।हरिद्वार से शुरू इस कारवां को गढ़मुक्तेश्वर पहुंचना था।काफिले में आईजी इंटेलीजेंस आदित्य कुमार मिश्रा भी थे। एकाएक एक बोट का फ्यूल खत्म हो गया। हम भटक गए। सात घंटे ‘गंगा मैया’-‘गंगा मैया’ करते बीते। अमर उजाला से जुड़े अशोक मधुप भी इसी बोट में थे। उन्हीं की जुबानी पूरी कहानी...




बिजनौर।रात के 11 बजे थे। चारों ओर पानी ही पानी।जाएं तो जाएं कहां? फ्यूल खत्म हो चुका था, हम रास्ता भटक गएथे। करें तो क्या करें? इन सवालों को लेकर हर कोई नौकायान के समय भयभीत था।

स्वामी अच्युतानंद मिश्र और पीएसी उत्तर प्रदेश के द्वारा चलाए जा रहे निर्मल गंगा अविरल प्रवाह यात्रा के साथ सोमवार को गंगा में बिताए आठ से ज्यादा घंटे किसी रोमांचक यात्रा से कम नहीं। रात के 11 बजे तक गंगा में घुप अंधेरे में नौकायन के महारथ की बदौलत रात साढे़ ग्यारह बजे गढ़मुक्तेश्वर के गंगा घाट पर सकुशल पंहुचना एक करिश्मा जैसा ही है। वह तो उस हालत में जब एक-एक कर वोट के पेट्रा्रल टैंक खाली होते जा रहे थे। इस यात्रा में हमारे एक साथी की तो तबियत बहुत ज्यादा खराब हो गई और उसे रास्ते के एक गांव में परिवार में शरण लेनी पड़ी ।

बिजनौर गंगा बैराज से सोमवार की शाम साढे़ तीन बजे हमने जब यात्रा शुरू की तो हमने सोचा भी नहीं था कि गंगा के बीच में घुप अंधेरे में हमें कई घंटे ऐसे भी बिताने होंगे । हम यह सेचकर यात्रा की एक मोटर वोट में सवार हुए थे कि चांदपुर क्षेत्र में बनने वाले मकदूमपूर सेतु पर उतर कर शाम पांच बजे तक बिजनौर आ जांएगे। वैसे यात्रा को गढमुक्तेश्वर शाम पांच बजे तक पंहुचना था। मेरे साथ एक पत्रकार अमित रस्तौगी और कांगे्रस के सीनियर नेता सुधीर पाराशर थे। वे बालावाली से यात्रा के साथ आए थे। उन्होंने हमारे अनुरोध पर मकदूमपुर तक चलना स्वीकर कर लिया था। वहां से लौटने के लिए अपनी गाड़ी मकदूमपुर बुला ली थी। बिजनौर से बैराज से 12 नाव का बेड़ा शाम साढे़ तीन बजे गढमुक्तेश्वर के लिए रवाना हुआ।

यात्रा को पांच बजे शाम गढमुक्तेश्वर पहुंचना था किंतु विदुर कुटी और गंज दारानगर पहुंचने में ही शाम पांच बज जाने पर हमें चिंता हुई। मकदूमपुर पुल के सामने से निकलते समय दिन छिपने लगा था। हमें यहां से छोटी धार से होकर अपनी गाड़ी तक पहुंचना था किंतु अंधेरा बढ़ता देख हम अपने नाविकों से बेडे़ से अपनी नाव को अलग धार में डालने का अनुरोध नही कर सके और गढ़मुक्तेश्वर से लौट आने का निर्णय लिया। (संबंधित खबरें और फोटो पेज छह पर भी)







1)निर्मल गंगा अविरल प्रवाह दल की एक नाव सूर्यास्त के समय गंगा से गुजरती हुई। (2) नाव से गुजरते महाराज अच्युतानंद।


निर्मल गंगा अविरल प्रवाह दल की नाव में गंगा से होकर गुजरते महाराज अच्युतानंद।





ऐसा तो कभी भी नहीं सोचा था!

बिजनौर। निर्मल गंगा अविरल यात्रा के साथ सफर करते समय यह कभी नहीं सोचा था कि सुबह पांच बजे घर वापसी होगी। इरादा यह था कि गंगा के बीच से जनपद के नजारे देखकर शाम पांच बजे तक बिजनौर लौट आया जाएगा। कल दुपहर दो बजे अमर उजाला के संवाददाता   कुछ पत्रकार साथियों के कहने पर मकदूमूपुर तक चलने को तैयार हो गए।

लंबे समय से मेरा इरादा गंगा के मध्य से जनपद को देखने का था। उसके प्रस्ताव आने पर मैं इंकार न कर सका। कांगे्रस के वरिष्ठ नेता सुधीर पाराशर स्वामी अच्युता नंद के नजदीकी है, वे पीछे से यात्रा के साथ आए थे। सो हमने मकदूमपुर तक उन्हें साथ चलने के लिए तैयार कर लिया और कहा कि अपनी गाड़ी वहीं मंगा ले, उससे लौट आएंगे। यात्रा बिजनौर से चलकर शाम पांच बजे गढ़मुक्तेश्वर पहुंची थी तो हम यह सोचकर यात्रा के साथ हो गए कि अब चलकर पांच बजे तक बिजनौर आ जाएंगे। बिजनौर गंगा बैराज पर स्वामी अच्युतानंद और अन्य ढाई बजे गंगा घाट पर आ गए, लेकिन चलने में साढे़ तीन बज गए। मकदुमपुर से पहले एक जगह बोट रुकी तो एक पत्रकार साथी नौका दल के लीडर पीएसी के आईजी की बोट में उनका इंटरव्यू करने को बैठ गया। सुधीर पाराशर के चालक ने बताया कि पुल के सामने से मेन धार की जगह छोटी धार में आए। यहां पहुंचते ही अंधेरा छाने लगा था, अत: हम चालकों से यह न कह सके कि गु्रप छोड़कर वे अपनी वोट छोटी धार में ले चले। कार्यालय को विलंब हो रहा था। परिजनों को बिना बताए आने की चिंता भी थी, लेकिन बेडे़ को छोड़ने का हम नाविकों से आग्रह न कर पाए और यह सोचकर बैठ गए कि यहां प्रतिवर्ष बनने वाले नाव के पुल का रास्ता छोड़ने पर उतर जाएंगे। इस रास्ते के सामने गंगा में कुछ व्यक्तियों को ले जाती एक नाव दिखाई दी। हम उसमें सवार होना भी चाहते थे, लेकिन एक साथी के दूसरे नाव में होने के कारण नहीं उतरे और तय कर लिया कि गढ़मुक्तेश्वर से लौट आएंगे। सुधीर पाराशर ने अपनी गाड़ी के चालक को गढमुक्तेश्वर पहुंचने को कह भी दिया। अंधेरा होने पर एक साइड में सब बोट रोकी गई और एक साथ चलने के निर्देश दिए गए। इससे पहले अंधेरा होते देख किसी अनहोनी की आशंका को रोकने और इसका सामना करने के लिए मैने और सुधीर ने लाइफ सेविंग जैकेट पहन ली थी। जैकेट पहनते समय मेरा इरादा अंधेरा होने के साथ बढ़ती ठंड से खुद को बचाने का था।




दल में थी 12 बोट


यात्रा दल में 12 बोट थे। प्रत्येक बोट में तीन, चार यात्री और तीन तीन पीएसी के नाविक थे। एक बोट में यात्रा के संरक्षक स्वामी अच्युतानंद अपने शिष्यों के साथ थे। एक में पीएसी के आईजी आदित्य मिश्रा अपने अन्य अधिकारियों के साथ थे। अन्य नावों में टीम के अन्य सदस्य हमें मिली वोट में तीनों चालक थे। रेत में फंसने पर मोटर चलाने वाला दूसरे चालकों से चप्पू चलाने को कहता। अन्य दोनों चालकों की हालत यह थी कि वह चप्पू एक साथ नहीं चलाते थे। कभी नाव बाएं भागती तो कभी दाएं और मोटर चालक के टोकने पर वह सुधार करते। अंधेरे में कुछ भी न दिखाई देने पर मन में भय था और चिंता भी। किंतु उनकी बातों से यह सब भय खत्म हो रहा था और उनकी बातों में आनंद आ रहा था। रेत आने पर नाविक पानी में डंडा डालकर उसका जल स्तर नापते। पानी मिलने पर मोटर चला दी जाती, जबकि रेत मिलने पर नाविक नाव चप्पू से खेते या उतरकर पानी में खींचते।

रेत आने पर मोटर बंद कर ऊपर उठा दी जाती और पानी मिलने पर स्टार्ट कर दी जाती।

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रास्ता भूल गए और गोल-गोल घूमने लगे

बिजनौर।अंधेरा होने पर हम एक जगह रास्ता भूल गए और गोल-गोल घूमने लगे। सब वोट आमने-सामने पानी में फैल गई। इस नौकायान के समय मुझे याद आ गया महाभारत सीरियल का दृश्य। इसमें भी गीता उपदेश के समय भी सारे महारथी ऐसे ही खडे़ दिखाये गए थे।

रात होने पर दिखाई देना बंद हो गया। दूर दूर तक जल ही जल नजर आ रहा था। आकाश में चांद चमक रहा था किंतु तनाव और चिंता के माहौल में उसे निहारने में किसी की रूचि नही थी। पानी कम होने पर मोटर बंद कर वोट खींचकर पानी में लाने और उसे आगे बढा़ने का सिलसिला रात साढे़ 11 बजे तक तक जारी रहा।

रात नौ बजे से स्टीमर के पेट्रेल खत्म होने का भय सताने लगा। थोड़ी देर में एक मोटर वोट के तेल खत्म होने की सूचना आ गई। हालत यह कि कहीं कोई रोशनी भी नजर नही आ रही। सब चारों ओर टकटकी लगाए देखते जा रहे थे। गढ़मुक्टेश्वर की लाइट देखने को आखें फाड़ रहे थे। एक जगह रोशनी और कुछ मंदिर दिखाई दिए। यहां घट पर मौजूद हमारे एक साथी ने बात की और गढ़ के छह सात किलोमाटर दूर बताने पर हमारा काफला आगे चल दिया। 11 बजे के आसपास गढ़मुक्टेश्वर के रेलवे पुल की लाइट दिखाई देने पर सफर का पड़ाव नजर आने लगा । आधा किलोमीटर पहले हमारे वोट का भी पेट्रोल खत्म हो गया ।

अब तक पांच वोट के इंजिन बंद हा चुक थे । हम एक वोट को खींचकर ला रहे थे। हमारे चालक नें बंद इंजिन वाली वोट के चालक से एक बार इंजिन चलाकर देखने को अनुरोध किया। कोशिश पर वोट का इंजिन चल गया और अब उसने हमारी वोट को घाट तक पंहुचाया। शाम पांच बजे बिजनौर पंहुचने वाले हम सबेरे पांच बजे ट्रकों से बैठकर किसी तरह बिजनौर पंहुचे।




गढ़मुक्तेश्वर पहुंचे 11.30 बजे

हम साढे़ ग्यारह बजे गढ़मुक्तेश्वर घाट पर पहुंच गए। स्वामी जी तथा नौकाएं दल के पीएसी के जवानों का स्वागत चल रहा था। हम सुधीर पाराशर और उनके साथी को खोज रहे थे। पता लगा कि वह उस नाव में है, जिसका तेल सबसे पहले खत्म हुआ। हम उनके आने का इंतजार करने लगे। इनकी गाड़ी भी नहीं मिली। एक बजे एसपी पीएसी एक दुकान पर चाय पीते मिले। उन्होंने बताया कि सुधीर पाराशर व उनके साथी तिगरी में उतर गए हैं और वहीं पर उन्होंने गाड़ी मंगा ली है






मेरा      यह       यात्रा      संस्मरण  सत्ताइस          अक्तूबर    के      अमर     उजाला     मेरठ     में     छपा         है

Saturday, October 9, 2010

जिमाओ ही नहीं, जीने भी दो

नवरात्र पर विशेष




मातृशक्ति की आराधना के पर्व नवरात्रि में कन्याओं को भगवती का शुद्धत्तम रूप मानने और पूजने का चलन है। इसे उत्साह और उमंग से पूरा भी किया जाता है, लेकिन व्यवहार में कन्याओं के प्रति कुछ अलग ही नजरिया है।


अशोक मधुप

नवरात्र प्रारंभ हो गए हैं। आज दूसरा दिन है। इन दिनों देवियों की पूजा की जाती है। खासतौर पर शक्तिरूपिणी दुर्गा की। शक्ति के विभिन्न रूपों की आराधना करते हुए दुर्गा सप्तशती का जो स्तोत्र इन दिनों पढ़ा जाता है, उसमें प्रकृति में विद्यमान सभी तत्वों का स्मरण किया जाता है। उन तत्वों में भगवती को देवी और शक्ति के रूप में आराधा जाता है। शक्ति का मूल स्वरूप स्त्री ही है। उस स्मरण में कन्या को भी शक्ति का निर्दोष निष्कलुष और निर्मल रूप मानते हुए नमन किया हुआ है। स्तोत्र में ही नहीं पूजा आराधना में भी कन्याओं की पूजा की जाती है। पूरे नौ दिन उन्हें अलग -अलग तरह के उपहार देकर भोजन कराकर देवी को प्रसन्न करने का उपक्रम किया जाता है। नवरात्र के सभी दिनों में कन्या पूजन नहीं किया जाता हो तो भी अष्टमी और नवमी के दिन तो उन्हें जिमाते और पूजते हैं ।

साल में दो नवरात्रों में चार से अठारह दिन हम यह कार्य करते हैं, जबकि अन्य दिन प्राय कन्याओं की उपेक्षा करते हैं। वह उपेक्षा और तिरस्कार भू्रण हत्या के स्तर पर पहुंच जाता है। नवरात्र पर कन्या जिमा कर अपने पर गर्व महसूस करते हैं कि हम उनकी पूजा कर और भोजन करा कर बहुत बड़ा काम कर रहे हैं। अब ऐसा नहीं है । आज जरूरत कन्याओं को जिमाने की कम उन्हें कहें जिंदा रखने या जन्म लेने देने को उन्हें पलने बड़ा होने देने की ज्यादा है।

दोनों नवरात्रों पर मातृ शक्ति की आराधना में हर कोई श्रद्धालु लीन हो जाता है। इन दिनों हम मातृ शाक्ति रूपी देवियों की पूजा करते है। उपवास रखते हैं। हम मानते हैं कि देवियों में बड़ी शक्ति है। अष्टमी और नवमी के दिन हम अपने घरों में बुलाकर देवियों की प्रतीक कन्याओं की पूजा करते हैं और पूरे श्रद्घाभाव के साथ उन्हें भोजन कराते हैं। यह सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। जहां धार्मिक श्रद्घा के साथ हम देवियों की पूजा करते हैं, वहीं समाज में आई कुरुति, दहेज के कारण हम नहीं चाहते कि हमारे परिवार में लड़कियां हो। हम जन्म लेने से पहले गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण कराते हैं और यदि लड़की है तो गर्भपात कराकर उसे दुनिया में कदम रखने से पहले ही मौत की नींद सुला देते हैं।

जब देश में बालिकाएं नहीं जन्मेंगी तो जाहिर है प्रकृति का चक्र बदलेगा, और उसका असर नई पीढ़ी के जन्म और उदय पर भी पड़ेगा। धीरे- धीरे ऐसी स्थिति आएगी कि मनुष्य समाज का आकार सिकुड़ने लगेगा। इससे पहले स्त्रियों की संख्या कम हो जाने से हमारा सामाजिक ढांचा छिन्न -भिन्न हो जाएगा। इस परिवर्तन को लेकर समाज शास्त्री अभी से चिंतित है। आज देश भर में इसके लिए आंदोलन चल रहे हैं तो अन्य कई संगठन भू्रण हत्या रोकने पर काम कर रहे हैं।

ं वर्तमान हालात को देखते हुए आशीर्वाद देने का तरीका भी बदल रहा है। कभी लोग महिलाओं को पुत्रवान होने का आशीर्वाद देते थे। अब भी देते हैं, लेकिन कन्या भू्रण की हत्या के विरोध में लगे सामाजिक संगठन संतानवान होने का आर्शीवाद देने की तैयारी कर रहे हैं। इससे पुत्र पुत्री का भेद मिटेगा। और भू्रण हत्या रूकेगी।

पुत्र की चाह हमारी संस्कृति के उस दर्शन की देन है कि पुत्रवान ही मोक्ष की प्राप्ति करते हैं। अंतिम संस्कार पुत्र के हाथों की होना चाहिए। समाज में बहुत परिवर्तन आ रहा है। कन्याओं वाले कई परिवार अपनी बेटियों पर गर्व कर रहे हैं और बिना भेदभाव से भाव से उन्हें पाल पोष कर योग्य बना रहे हैं। अब तो कन्याएं भी अपने पिताओं की कई जगह कपाल क्रिया करने लगी हैं। बेटे की तरह मां बाप का सहारा बन रही हैं।

बिगड़ते सामाजिक ढांचे के बचाने के लिए आज जरूरत कन्याओं को जिमाने के साथ उन्हें जीवानें , जीवित रखने की है। अष्टमी और नवमी के दिन कन्याओं को जिमाने के साथ साथ यदि उनके जीवित रखने तथा गर्भ में हत्या न करने का संकल्प ले तो निश्चित रूप से समाज के बिगड़ते ढांचे को बचाने में मददगार हो सकते हैं।

बढ़ती भक्ति-घटती शक्ति

कन्याओं को जन्म लेने ही नहीं देने की बढ़ती प्रवृत्ति के नतीजे अभी से दिखाई देने लगे हैं। जनगणना के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार महिलाओं की संख्या अब कुल आबादी में प्रति हजार 933 रह गई है, जबकि 1991 में महिलाआें की संख्या प्रति हजार पर 970 थी। विडंबना यह कि नवरात्र आराधना और शक्तिपूजा में लोगों का रुझान बेतहाशा बढ़ा है।

यह अनुपात शहरी और पढ़े-लिखे और संपन्न वर्ग में ज्यादा गड़बड़ाया है। हरियाणा और गुजरात में यह संख्या क्रमश: 818 और 883 रह गई है। माना जा रहा है कि देश भर में यह महिलाओं की संख्या प्रति हजार 800 के आसपास होगी। ।
मेरा उपरोक्त लेख अमर उजाला में  नौ सिंतबर 2010 को श्रद्धा नाम के पेज पर छपा है


Monday, September 6, 2010

नार्मल के बीटीसी बनने का सफर


जब मैने जूनियर हाई स्कूल यानी कक्षा
आठ की परीक्षा जूनियर हाई स्कूल
झालू से पास की तो मेरे बाबा
(ग्रांड फादर) ने मुझ से कहा था, जा
नार्मल की ट्रेनिंग कर ले। मास्टर बन
जाएगा। पंडित केशव शारण शर्मा जी जिला परिषद के
चैयरमैन है, तो तेरा चयन भी हो
जाएगा। मैने उनकी बात मानी और
नार्मल की ट्रेनिंग के होने वाले
साक्षात्कार में गया। पंडिंत जी उस
साक्षात्कार में बैठे किंतु मेरी उम्र
कम होने के कारण मेरा चयन न हो
सका और मै प्राइमरी स्कूल का
मास्टर बनते बनते रह गया। पंडित
जी रिश्ते के मेरे बाबा
लगते थे, वे जिला पंचायत के चैयरमैन
होते थे पर मेरा नार्मल की ट्रेनिंग
में चयन न हो सका। हां एम. ए करने के बाद
में मैने बीएड किया पर शिक्षण का
व्यवसाय रास न आया और तीन साल बाद
उसे अलविदा कह पत्रकार बन गया।
      आज जिस बीटीसी की परीक्षा के लिए
इतनी मारामारी मची हुई है, और
बीटैक ,एमबीए , एमसीए, पीएचडी
डिगरीधारक तक इसे करने के लिए
आवेदन कर रहे हैं,प्राय मैरिट भी
सत्तर प्रतिशत से ज्यादा रही है। मेरी
किशोरावस्था के समय इसमें प्रवेश की
योग्यता मात्र कक्षा आठ पास थी। उस समय
बीटीसी को नार्मल की ट्रेनिंग कहते
थे। इस ट्रेनिंग को कराने वाले
स्कूलों को नार्मल स्कूल कहा जाता था।
क क्षा आठ तक की शिक्षा जिला पंचायत
के अधीन थी। वही शिक्षकों को
प्रशिक्षण दिलाती और उनकी नियुक्ति
करती थी। बाद में लडक़ों के लिए
नार्मल करने की योग्यता हाई स्कूल
हो गई जबकि लड़कियों की योगयता कक्षा
आठ पास ही रही । १९६७ में ट्रेनिंग
करने वाले शिक्षकों के प्रमाण पत्र पर
इस योग्यता का बाकायदा उल्लेख है। इस
प्रशिक्षण का नाम हिंदुस्तानी
सर्टिफिकेट ट्रेनिंग था। इस
ट्रेनिंग के लिए योग्यता बढऩी शुरू
हुई तो इंटर होकर अब बीए
हो गई। नाम भी बदल कर बीटीसी हो
गया। पहले यह ट्रेनिंग दो साल की
होती थी , बाद में बीटीसी होने पर
प्रशिक्षण की अवधि एक साल हुई, अब
बढक़र इसकी अवधि फिर दो साल
हो गई। पहले देहात में कक्षा आठ तक
की शिक्षा का संचालन जिला पंचायत
और नगर में नगर पालिका करती थी।
अब यह बेसिक शिक्षा के अधीन है।
       किसी समय गुरू को बहुत सम्मान
 मिलता था, शिक्षा पूरी करने पर गुरू दक्षिणा
देने का प्रावधान था। महाभारत काल में
तो द्रोणाचार्य ने गुरू दक्षिणा में अपने
अपमान का बदला लेने के लिए पांडवों
से अपने दुश्‌मन राजा द्रुपद को बंदी
के रूप में मांगा था। उस समय तक
गुरूकुल शिक्षा के साथ साथ देश के
संचालन में मददगार होते थे। यह छात्र
को ज्ञान के साथ साथ तकनीकि शिक्षा
और युद्धकला भी सिखाते थे।
हस्तिनापुर राज्य के राजकुमारों
को पढ़ाने के लिए द्रोणाचार्य और
कृपाचार्य जैसे गुरू के दरबारी होने
और छात्रों से भेदभाव करने के
कारण गुरू का पतन होना शुरू हुआ।
गुरूञ् की गरिमा गिरी तो शिक्षा का
स्तर भी गिरा। गुरू दक्षिणा में अंगूठा
मांगे जाने की मिसाल भी महाभारत में
ही मिलती है। शिक्षक के पतन की
यहां से हुई शुरूआत अब तक जारी
रही। गुलामी के दौर में शिक्षक का
सम्मान बहुत गिरा। आजादी के बाद भी
कोई खास फर्क नहीं पडा़। और सबसे
सरल छोटे बच्चों को पढ़ाने का
कार्य हो गया। जो कुच्छ नहीं कर
पाता वह टीचर बन जाता।
    शिक्षा जगत से आए डा. राधाकृष्णन
के समय से शिक्षकों को सम्मान मिलना
शुरू हुआ। उनके जन्म दिन पांच सितंबर
 को शिक्षक दिवस के रूप में
मनाया जाने लगा और शुरू हुआ
शिक्षकों के सम्मान का सिलसिला। आज
शिक्षा का सुधार हुआ, शिक्षकों के
वेतन बहुत अच्छे हुए तो योग्य युवक
युवतियों का इस और रूझान बढ़ा
है। अब एमबीए, बीटैक यहां शिक्षक
बनने आ रहे है, किं तु वह यहां
करेंगे क्या, काश वह अपनी योग्यता
वाली तकनीकि शिक्षा में पढ़ाने जाते
तो बहुत अच्छा रहता। यहां वे शिक्षा
के प्रति समर्पण या कुछ नया करने की
भावना से नही आ रहे हैं। वे
सरकारी नौकरी पाने की आस में
यहां आए है। उनका सोच यह है कि
सरकारी नौकरी एक बार मिल गई तो
फिर पूरी उम्र चैन से कटेगी।
हालात कैसे भी हो हमें आशा नहीं
छोडऩी चाहिए ,उम्मीद रखनी चाहिए
कि इनमें भी पंडित मदन मोहन
मालवीय,नजीर अकबराबादी ,रविंद्र नाथ
टैगोरजैसे गुरू निकलेंगे और
शिक्षा के नए आयाम बनांएगे। आने वाला
समय में शिक्षा का स्तर ही नहीं
बढेग़ा ,अपितु शिक्षकों का समान भी
बढ़ेगा।
अशोक मधुप

Saturday, September 4, 2010

डाकू का किला

सुलताना डाकू का किला


अशोक मधुप

Story published in AMAR UJALA ON EDITORIAL PAGE  Saturday, September 04, 2010 1:16 AM



बिजनौर जनपद में नजीबाबाद से लगभग ढाई किलोमीटर की दूरी पर स्थित पत्थरगढ़ का किला सुलताना डाकू के किले के रूप में विख्यात है। यह वही सुलताना डाकू था, जिसने ब्रिटिश सरकार को नाकों चने चबवाए थे। मजबूरन उसे पकड़ने के लिए ब्रिटिश सरकार को फे्रडी यंग के नेतृत्व में विशेष दल बनाना पड़ा था।



नजीबाबाद को रूहेला सरदार नजीबुद्दौला ने बसाया था। उसने यहां कई महल और मसजिदें बनवाईं। नजीबाबाद से लगभग डेढ़ किलोमीटर पूर्व में 40 एकड़ भूभाग में वर्ष 1755 में एक भव्य किला बनाकर इसे पत्थरगढ़ किला नाम दिया था। इसकी दीवारें इतनी मोटी थीं कि उन पर दो ट्रक बराबर में दौड़ सकते थे। आगे की दीवार इतनी ऊंची बनाई गई कि पीछे की दीवार पर स्थित फौज आराम से घूमकर दुश्मन का मुकाबला करती रहे और दुश्मन की उस पर नजर भी न पड़े। जिला गजेटियर के मुताबिक, इसमें मोरध्वज के किले के पत्थर लाकर लगाए गए। वर्ष 1857 में नजीबुद्दौला के एक वंशज नवाब महमूद खां ने अंगरेजों से सत्ता छीन ली। पर लगभग साल भर बाद ब्रिटिशों ने नवाब महमूद को हरा दिया और नजीबाबाद पर कब्जा कर पत्थरगढ़ के किले को तोड़-फोड़ दिया। नवाब महमूद सपरिवार नेपाल भाग गए और वहीं मलेरिया से उनका निधन हो गया।



भातू जनजाति के अपराध रोकने के लिए अंगरेजों ने इस किले को सुधार गृह बनाया। जगह-जगह से भातुओं को यहां लाकर विभिन्न लघु-उद्योगों का प्रशिक्षण दिया जाता था। अंगरेज इन पर बेइंतहा जुल्म करते और कठिन श्रम कराते। ब्रिटिशों के जुल्म से परेशान इस किले में रहनेवाला एक युवक बागी बन गया और भागकर अपराध को अंजाम देने लगा। सेठों को लूटने और गरीबों की मदद करने के कारण लोगों ने उसे सुलतान नाम से पुकारा। वही धीरे-धीरे सुलताना हो गया। तराई में सुलताना के अपराध और गरीबों के मदद के किस्से आज भी मशहूर हैं। कई साल की मशक्कत के बाद फे्रडी यंग के नेतृत्व में बने विशेष दल ने उसे पकड़ा और फांसी दे दी। उस विशेष दल में प्रसिद्ध शिकारी जिम कार्बेट भी शामिल थे। उन्होंने अपनी पुस्तकमाई इंडिया में सुलताना-इंडियन रॉबिनहुड नाम से एक लेख लिखा है, जिसमें उसकी जमकर प्रशंसा की गई है।

आज यह किला पुरातत्व विभाग की संपत्ति है। इसके दो भव्य द्वार हैं, जिसमें से एक नजीबाबाद की ओर खुलता है। इसके दरवाजों पर बनाए गए डिजाइन बहुत ही खूबसूरत हैं। इस समय किले की सिर्फ बाउंडरी ही बची है, जो देख-रेख के अभाव में जगह-जगह से टूट-फूट गई है। पुरातत्व विभाग द्वारा अब इस किले का जीर्णोद्धार कराया जा रहा है।

Saturday, August 14, 2010

सबसे अलग

 सबसे बड़ा मिट्टी का बांध 
उत्तराखंड में रामगंगा नदी पर बना कालागढ़ डैम दुनिया के प्रसिद्ध अजूबों जैसा ही है। इसे एशिया का सबसे बड़ा मिट्टी का डैम होने का सौभाग्य प्राप्त है। डैम एरिया में मैसूर के कावेरी नदी पर बने वृंदावन गार्डन की तर्ज पर विकसित शानदार उद्यान भी है। कालागढ़ से कार्बेट में प्रवेश के लिए एक गेट भी है। इस गेट से प्रवेश कर कार्बेट के वन्य प्राणियों का भी आसानी से अवलोकन किया जा सकता है। यहां से कंडी मार्ग से कोटद्वार और रामनगर भी जाया जा सकता है।
शिवालिक पहाड़ियां पर्यटकों को हमेशा अपनी ओर आकर्षित करती रही हैं। दिल्ली से लगभग 250 किलोमीटर की दूरी पर रामगंगा के तट पर कालागढ़ स्थित है। दिल्ली से मेरठ, बिजनौर होकर लगभग पांच घंटे में कालागढ़ पहुंचा जा सकता है। कालागढ़ में सिंचाई विभाग के कुछ रेस्ट हाउस और प्रशिक्षण केंद्र हैं। डैम बनने के समय कर्मचारियों और अधिकरियों के लिए कुछ कॉलोनी बनाई गई थीं। रिजर्व वन होने के कारण डैम बनने के बाद कालागढ़ की भूमि कार्बेट प्रशासन को सौंप दी गई। उसने यहां बनी कई कॉलोनी गिरा दी। हालांकि कुछ कालोनी अब भी हैं। यहां एक छोटा बाजार भी है।
मिट्टी का डैम होने के कारण कालागढ़ एक दर्शनीय स्थल है। रामगंगा के पानी को रोकने के लिए पहाड़ियों के बीच रेत-सीमेंट का ढांचा नहीं, बल्कि मिट्टी और पत्थर लगाए गए हैं। बांध के साथ ही बिजली घर भी बना है। यहां 66-66 मेगावाट की तीन यूनिट लगी हैं। तीनों मिलाकर 198 मेगावाट बिजली बनाती है। डैम में 365.3 मीटर पानी सिंचाई के लिए रिजर्व वाटर के रूप में रखा जाता है।
बांध के नजदीक शानदार पार्क तो है ही, इसमें बनी सुरंग भी कम आकर्षक नहीं है। लगभग 70 मीटर गहरी इस सुरंग से रामगंगा के जल के नीचे पहुंचा जा सकता है। जल के नीचे अपने को खडे़ देखकर शरीर में अजीब-सी झुरझुरी उठने लगती है। यहीं एक सुरंग अंदर ही अंदर बिजलीघर तक चली जाती है। डैम के नीचे एक तरह से सुरंगों का जाल बिछा हुआ है। सुरक्षा की दृष्टि से इनमें प्रवेश नहीं दिया जाता।
रामगंगा नदी में घड़ियाल तथा विभिन्न प्रकार की मछलियां हैं। डैम एरिया में वृंदावन गार्डन की तरह विकसित एक उद्यान के 450 मीटर लंबे फव्वारे में बहता पानी और उस पर पड़ती रंग-बिरंगी रोशनी मन को मोह लेती है। इस उद्यान में विभिन्न प्रजातियों के पौधे और फूल भी कम आकर्षक नहीं हैं। हालांकि देखरेख के अभाव में उद्यान इस समय खस्ता हालत में हैं। अगर कालागढ़ पर पर्याप्त ध्यान दिया जाए, तो यह एक शानदार पर्यटक स्थल के रूप में विकसित हो सकता है।
अशोक मधुप

( मेरा यह लेख अमर उजाला में 14 अगस्त 2010 को संपादकीय पेज पर सबसे अलग में छपा है)

Saturday, July 10, 2010

रोशनी बांटने की मिसाल

शनी बांटने की मिसाल
अशोक मधुप
published on : Saturday, July 10, 2010    12:31 AM in amarujala
महर्षि दधीचि ने मानव कल्याण के लिए अपनी अस्थियां दान की थीं, लेकिन बिजनौर जनपद के धामपुर निवासी हरीश चंद्र आत्रेय ने अपनी आंखें तो मानव कल्याण के लिए दीं ही, उन्होंने सात हजार से ज्यादा लोगों की आंखें लेकर लोगाें को रोशनी देने के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के आई बैंक को भेजीं। बिजनौर जैसे पिछड़े और छोटे जनपद से प्रतिमाह दस से पंद्रह आंखें लेकर ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट को भेजना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। दूसरों को जीवन पर्यंत रोशनी देने में लगे रहे डॉ. हरीश चंद्र आत्रेय की कल पहली पुण्यतिथि है।
बिजनौर जनपद के रतनगढ़ गांव के रहने वाले हरीशचंद आत्रेय का जन्म १२ जनवरी, १९२२ को कनखल, हरिद्वार में हुआ था। हरिद्वार महाविद्यालय में अध्ययन के दौरान वर्ष १९३९ में उन्होंने १५ सदस्यीय छात्र जत्थे के साथ चंद्राकिरण शारदा (अजमेर) के नेतृत्व में गुलबर्गा (कर्नाटक) में आयोजित सत्याग्रह अभियान में भाग लिया। उसके बाद वह १३ महीने गुलबर्गा, उस्मानाबाद, औरंगाबाद एवं निजामाबाद की जेलों में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा कैद करके रखे गए। जेल की दुर्दशा पर सत्याग्रहियों ने भूख हड़ताल की, तो अंगरेजों ने कैदियों पर गोली चलाई। एक गोली उनके बाएं हाथ में लगी, जिसका निशान जीवन पर्यंत रहा।
आजादी मिलने के बाद धामपुर में उन्होंने अपना आवास बना लिया। जंगलों की सैर करना और शिकार खेलना उनका शौक था। शिकार के दौरान एक भूखे अंधे शेर को एक गीदड़ द्वारा मांस लाकर देने की घटना से प्रभावित होकर उन्होंने कभी शिकार न करने और नेत्रहीनों को रोशनी दिखाने का संकल्प लिया। उसी घटना से प्रभावित होकर उन्होंने धामपुर में आई बैंक बनाया। वर्ष १९८४ में देश में कुल १७० आंखें प्रत्यारोपित की गईं। इनमें से ११५ आंखें धामपुर के आई बैंक के माध्यम से उपलब्ध कराई गई थीं। नेत्र चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के कारण वर्ष २००८ में भाऊराव देवरस सेवा न्यास ने उन्हें सम्मानित किया था।
डॉ. आत्रेय द्वारा स्थापित आई बैंक से हर महीने १५ आंखें राष्ट्र को समर्पित की जाती थीं। लगातार इतने नेत्रदान देश में तो छोड़िए, समूचे दक्षिण-पश्चिम एशिया में एक रिकॉर्ड है। एम्स में प्रतिवर्ष प्रत्यारोपित होने वाले नेत्रों में लगभग तीन चौथाई योगदान धामपुर आई बैंक का होता था।
पिछले साल ११ जुलाई की रात आधुनिक युग के इस दधीचि ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं। उनकी आंखें स्वाभाविक ही आई बैंक को भिजवा दी गईं। वह आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी उपलब्धि पूरे क्षेत्र को प्रोत्साहित करती है।