Wednesday, August 12, 2026

बोफोर्स कांडः एक झूठ के शापित होने का सच


अशोक मधुप  

वरिष्ठ  पत्रकार

एक झूठ के बल पर खड़ा हुआ  बोफोर्स   कांड सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद अब फाइलों में बंद हो गया। केस चालिस साल चला। इस पर 250 करोड़ रूपये व्यय  हुए। इतना सब होने और चालिस साल की जीतोड़ कवायद के   बाद भी बोफार्स खरीद में रिश्वत लेने की सच्चाई सामने नही आई। केस तो खत्म हो गया किंतु यह तै नही हो पाया  कि इस प्रकरण में रिश्वत ली गई या नहीं । कोर्ट के केस खारिज करने के बाद भी  रिशवत लेने का आरोप आज भी अपनी जगह खड़ा है।इस कांड का पूर्व  प्रधानमंत्री  राजीव गांधी एवं  अन्य   आरोपियों के माथे पर लगा बेइमानी का दाग कभी खत्म  नही हो पाएगा? क्या उनके परिवार माथे पर लगे इस कलंक से मुक्त हो पाएंगे? क्या उनके परिवार के सम्मान की हुई क्षति की कभी पूर्ति  हो सकेगी? पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के बार −बार बोले जाने वाले बोफोर्स खारीद में रिश्वत ने जनता के मन में  तक जमाये झूठ के कारण  राजीव गांधी से  जनता दूर हो गई और उन्हें अपनी सरकार तक गंवानी पड़ी ।   

सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुजा ब्रदर्स को बरी करने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के 2005 के फैसले के खिलाफ दायर अंतिम अपील को भी खारिज कर दिया है। इसके साथ ही भारत के सबसे चर्चित और लंबे समय तक चलने वाले भ्रष्टाचार के मामलों में से एक बोफोर्स कांड का कानूनी अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया है।


मामले में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विनोद के. चंद्रन की बेंच ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता  की स्थगन की मांग को ठुकराते हुए मामले की आखिरी याचिका को खारिज कर दिया। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने भी इस मामले में अपील की थी। इस  अपील को भी सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ही देरी के आधार पर खारिज कर दिया था। 1986 में हुए इस रक्षा सौदे का विवाद लगभग 40 साल तक अदालतों और भारतीय राजनीति के केंद्र में रहा और अंत में समाप्त हो गया।

 पूरा मामला 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के बीच हुए 1,437 करोड़ रुपये के उस समझौते से जुड़ा है। इसके तहत भारतीय सेना के लिए 400 हॉवित्जर तोपें खरीदी जानी थीं। साल 1987 में स्वीडिश रेडियो ने यह सनसनीखेज खुलासा किया कि इस सौदे को हासिल करने के लिए भारतीय राजनेताओं और रक्षा अधिकारियों को अवैध कमीशन दिए गए थे। इस खुलासे ने भारतीय राजनीति में तहलका मचा दिया था। 

कांग्रेस छोड़ने के बाद, विश्वनाथ प्रताप (वीपी) सिंह ने खुद को एक 'ईमानदार नेता' (मिस्टर क्लीन) के रूप में स्थापित किया। उन्होंने राष्ट्रीय मोर्चा (जनता दल) का गठन किया। 1989 के लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान वीपी सिंह अपनी रैलियों में बेहद आक्रामक रहे। वह अक्सर मंचों से अपनी जेब से एक सफेद पर्ची निकालकर लहराते थे।  उनका दावा था कि उस पर्ची पर बोफोर्स घोटाले के पुख्ता सबूत, दलाली की रकम पाने वालों के नाम और राजीव गांधी के कथित स्विस बैंक खातों के नंबर लिखे हैं। कथित स्विस बैंक खातों के नंबर लिखे हैं। इस आक्रामक अभियान ने जनता के बीच राजीव गांधी सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश पैदा किया। बोफोर्स घोटाले को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाकर वीपी सिंह ने विपक्ष को एकजुट किया।  इस आक्रामक अभियान ने जनता के बीच राजीव गांधी सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश पैदा किया। उनकी बेइंतहा छवी खराब की। राजीव गांधी सरकार पर गंभीर सवाल उठे और 1989 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार का इसे एक बड़ा कारण माना गया। प्रधानमंत्री बनते ही वीपी सिंह ने बोफोर्स कंपनी पर भारत के साथ भविष्य के किसी भी रक्षा सौदे के लिए प्रतिबंध लगा दिया। उन्होंने मामले की जांच के लिए अधिकारियों की एक विशेष टीम भी गठित की। 

भारी वादों और दावों के बावजूद, झूठ के बल पर बनी वीपी सिंह की सरकार  केवल 11 महीने चली।  सकार बनने के बाद वीपी  सिंह 11 महीने की आपनी सरकार के कार्यकाल में कोई भी सबेत नही दे सके। स्विस बैंक का खाता भी नही बता पाए।  ये सरकार राजीव गांधी के खिलाफ सीधे तौर पर कोई ठोस कानूनी सबूत पेश नहीं कर सकी। आलोचकों का कहना है कि चुनावी रैलियों में जिस पर्ची का दावा किया गया था, उसका सच कभी पूरी तरह सामने नहीं आ सका।

स्विस रेडियो  की एक घोषणा और वीवी सिंह द्वारा बार−बार रिश्वत  खाने के लगाए आरोप  ने इस महत्वपूर्ण  शस्त्र सौदे को नुकसान पंहुचाया। इस पर प्रतिबंध लगाया। यही बोफोर्स तोप कारगिल युद्ध में सबसे मारक शस्त्र बनी। अगर ये सौदा  रद्द न होता  तो देश की सेना  और ज्यादा मजबूत होतीं। एक बात और इस तरह के आरोप  लगाने के बाद अधिकारी और ज्यादा सचेत हो जाते हैं। वे देश और सेना  के लिए महत्वपूर्ण और अतिआवश्यक उपकरण भी लेते बचते हैं। 

इन कांड की सीबीआई ने  जांच की । सीबीआई ने जनवरी 1990 में एफआईआर दर्ज की। अक्तूबर 2000 में दायर की गई सप्लीमेंट्री चार्जशीट में हिंदुजा बंधुओं (श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश हिंदुजा) का नाम भी शामिल किया गया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने 31 मई 2005 को अपने फैसले में हिंदुजा ब्रदर्स और स्वीडिश फर्म एबी बोफोर्स के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया था। साथ ही, हाईकोर्ट ने सीबीआई की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए यह भी टिप्पणी की थी कि इस जांच पर सरकारी खजाने के करीब 250 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस मामले के लंबे खिंचने पर हैरानी जताई। जब याचिकाकर्ता के वकील ने कुछ मृत प्रतिवादियों के नाम हटाने के लिए चार हफ्ते का समय मांगा, तो जस्टिस पारदीवाला ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा, 'हिंदुजा ब्रदर्स और सीबीआई को लेकर यह सब क्या चल रहा है? सभी कार्यवाही रद्द हो चुकी हैं, यह क्या है? कितने साल बीत चुके हैं?' वहीं, वकील द्वारा यह याद दिलाने पर कि यह सौदा 1986 में हुआ था, बेंच ने स्पष्ट कर दिया कि अब इस मामले में और देरी या सुनवाई की कोई गुंजाइश नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम निर्णय के साथ ही बोफोर्स पे-ऑफ केस से जुड़ी सभी कानूनी लड़ाइयां अब आधिकारिक रूप से समाप्त हो गई हैं।

इस विवाद के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार को भारी राजनीतिक नुकसान हुआ। वर्ष 1989 के आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार का इसे एक प्रमुख कारण माना गया। इस मामले में ओत्तावियो क्वात्रोची और हिंदुजा बंधुओं जैसे नाम लंबे समय तक कानूनी और राजनीतिक बहसों का केंद्र रहे। लगभग चार दशकों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद, न्यायालय ने इस मामले से जुड़ी आखिरी याचिकाओं को खारिज कर दिया। स्विस  सरकार द्वारा कराई जांच भी  आरोप सिद्ध  नही कर सकी।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अब ये केस सदा−सदा के लिए बंद हो गया। एक आरोप की जांच पर सीबबीआई ने 250 करोड़ के आसपास व्यय किए। न्यायालय का लंबा समय बरबाद किया। न्यायालय भी केस का सच नही बता पाया। 40 साल चले केस में भी  यह तै नही हुआ कि बोफार्स खरीद में रिश्वत ली गई या नही। इस  सबके बाबजूद आरोप तो आज भी  वैसा ही खड़ा  है, जैसा पहले था।  40 साल में यह आरोप  अखबार और फाइलों के लाखों पन्नों  पर  छप गया। जनता में मन में यह धारणा इतनी पक्की हो गई, कि ये कभी खत्म नही  होगी। आने वाली पीढ़ियों तक इसे नही भूल पाएंगी। क्या आरोपी परिवारों के  भंग हुए सम्मान की भरपाई हो पाएगी।  यदि आरोप न आता तो हो सकता था कि राजीव गांधी की सरकार और चलती। बोफार्स कांड  बंद हो गया किंतु  राजीव गांधी और उनके तथा अन्यों के परिवार के माथे पर एक बार− बार बोले  जाने वाले झूठ के बल पर लगा  रिश्वतखोरी का कलंक कभी  खत्म हो पाएगा? कभी नहीं। हिटलर ने कहा था कि एक झूठ का बार− बार बोलिए,  वह सच बन जाएगा। ऐसा ही इस बोफोर्स कांड में हुआ। बोफार्स की खरीद में  रिश्वतखोरी का आरोप इतनी बार लगा कि यह हिटलर का सच बन गया।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)