Monday, September 21, 2026

सभी तो प्रधानमंत्री के सहपाठी नही हो सकते

 

अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार  

पीएम नरेंद्र मोदी से एक मुलाकात के बाद उनके स्कूल फ्रेंड असगर अली वोरा की वर्षों पुरानी समस्या खत्म हो गई। मीरा भायंदर की जमीन पर अपने हक के लिए वह कई साल से अफसरों और विभागों के चक्कर काट रहे थे। असगर अली वोरा ने एक सप्ताह पहले पीएम मोदी से मुलाकात की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि भायंदर में उनकी जमीन पर बीजेपी विधायक नरेंद्र मेहता की कंस्ट्रक्शन कंपनी ने कब्जा कर लिया है। मुलाकात के सात दिनों के भीतर उनकी प्रॉब्लम खत्म हो गई। मंगलवार को बीजेपी विधायक ने बताया कि वह विवादित जमीन का कब्जा छोड़ रहे हैं और उस प्लॉट के लिए मिली कंस्ट्रक्शन की मंजूरी भी सरेंडर कर रहे हैं। नरेंद्र मेहता ने असगर अली वोरा के खिलाफ़ पहले की गई अपनी शिकायत वापस ले ली । 81 साल के असगर अली वोरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचपन के मित्र हैं। उन्होंने वोरा ने गुजरात के वडनगर के बी एन स्कूल में मोदी के साथ पढ़ाई की थी। उन्होंने आठ सितंबर को प्रधानमंत्री से मुलाकात की और अपनी जमीन पर कब्जे के बारे में बताया था। उन्होंने इस विवाद में पीएम मोदी से दख्ल देने की अपील की। वोरा ने बताया कि उन्होंने 1989 में भायंदर ईस्ट के नवघर में लगभग 2810 स्क्वायर मीटर जमीन खरीदी थी। 2011 में इस प्लॉट पर स्वयं बिल्डर्स और मेहता की सेवन इलेवन कंस्ट्रक्शन्स ने कब्जा कर लिया। वोरा ने कहा कि वह लगभग 15 सालों से अलग-अलग सरकारी अधिकारियों के पास यह मामला उठा रहे थे, किसी ने नहीं सुनी।

वोरा और प्रधानमंत्री  मोदी के बचपन के स्कूलमेट हैं। वे प्रधानमंत्री मोदी तक पहुंच गए। प्रधानमंत्री के साथ  उनका  फोटो  और खबर आने के बाद भाजपा विधायक समझ गए और पीछे हट गए। देश के प्रत्येक आदमी की पहुंच तो प्रधानमत्री तक नही। प्रत्येक व्यक्ति तो प्रधानमंत्री का मित्र और सहपाठी नही। वह अपनी समस्या को लेकर कहां जाए।

 उत्तर प्रदेश के शामली जिले के चौसाना गांव के रहने वाले और पूर्व शिक्षक मास्टर विजय सिंह  गांव की लगभग चार हजार  बीघा सार्वजनिक कृषि भूमि को भू-माफियाओं के चंगुल से मुक्त कराने और उसे भूमिहीनों या सार्वजनिक उपयोग में लाने की मांग को लेकर तीस से ज्यादा साल से आंदोलनरत है। जांच में  उनकी शिकायत मिलने पर भी अभी तक भूमि से कब्जे नही हटे। मास्टर विजय सिंह  ने 26 फरवरी 1996 को मुजफ्फरनगर जिलाधिकारी कार्यालय के सामने यह धरना शुरू किया था। इसके बाद यह धरना मुजफ्फरनगर के शिव चौक व कलेक्ट्रेट परिसर में निरंतर जारी है। इस लड़ाई के लिए उन्होंने अपनी सरकारी शिक्षक की नौकरी तक छोड़ दी और गांधीवादी रास्ते पर चलते हुए पिछले तीन दशकों से लगातार धरना दे रहे हैं। उनके इस अड़ियल और लंबे संघर्ष को 'लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स', 'इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स', 'एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स' और विश्व स्तर की कई अन्य रिकॉर्ड संस्थाओं द्वारा मान्यता दी गई है। प्रशासनिक जांचों में उनके आरोप सही पाए जाने और कई सरकारें व मुख्यमंत्री बदलने के बावजूद ज़मीन पर ठोस कार्रवाई और न्याय मिलने का इंतज़ार आज भी बना हुआ है, और उनका यह अनवरत सत्याग्रह जारी है। यही नही  नदियों के कछार की जमीन तो भूमाफियाओं के कब्जे में रहती है।  गरीब किसान अधिकारियों के दरबार में शिकायत करता थक जाता है, किंतु कहीं कोई  सुनवाई नही होती। फिल्म पानसिंह तोमर भी ऐसी ही एक घटना पर बनी है। फौजी को कब्जा  हुई  जमीन पर सब जगह शिकायत  करने पर भी न्याय नही मिलता। मजबूरी में एक दिन यह बंदूक उठाकर चंबल के  कछार में उतर जाता है। ऐसे ही एक उत्पीड़न के शिकार बीएसएफ के एक हवलदार लगभग बीस साल पहले मुझे मिले। उत्तेजित थे । बोले− जी करता है कि बंदूक लेकर एक दिन सारे दुश्मनों को मार दूं। उन्हें समझाया ।  उनकी शिकायत  छापी ।  अधिकरियों से कहा। किंतु थाने वाले उसका मजाक उड़ाते ।  कहते कैसा फौजी है। अपनी जमीन पर ही कब्जा  नही ले पा रहा। चलता रहा। कब्जा फिर भी नही मिला। अब नौकरी छोड़  कार्ट – कचहरी के चक्कर काट रहे हैं । बिजनौर जिले की ग्राम शाहलीपुर जमान की दीपू  शर्मा तो रोज  अपनी जमीन  पर माफियाओं के कब्जे की वीडियों फेसबुक पोस्ट कर अधिकारियों से अपील करती रहती है, किंतु कोई सुनवाई नही हो रही। 

महाराष्ट्र के नासिक जिले स्थित निफाड़ कस्बे से एक हैरान करने वाला मामला सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा हैं। क्षेत्र में बढ़ रहे आवारा कुत्तों के आतंक और काटने की घटनाओं से स्थानीय नागरिक काफी समय से परेशान थे। बार-बार शिकायत देने के बाद भी जब प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो शिवसेना (यूबीटी) की युवा सेना के कार्यकर्ताओं ने विरोध जताने का यह अजीबोगरीब रास्ता चुना। कार्यकर्ता बोरियों में चार से पांच आवारा कुत्तों के पिल्लों को भरकर सीधे निफाड़ नगर पंचायत के मुख्याधिकारी के दफ्तर में ले गए और उनकी टेबल पर छोड़ दिया। टेबल पर कुत्तों के घूमने और अधिकारियों के सामने हुए इस ड्रामे के दौरान प्रशासन पर तंज कसते हुए अधिकारी को नोटों का हार पहनाने की भी कोशिश की गई।

  सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर ) और विभिन्न न्यायिक अध्ययनों के अनुसार, भारत की अदालतों में लंबित कुल दीवानी (सिविल ) मुकदमों में से लगभग 60 से 66  प्रतिशत  मामले केवल जमीन और संपत्ति विवादों से जुड़े हैं।  देश की निचली और उच्च अदालतों में जमीन व संपत्ति से जुड़े पांच करोड़  से अधिक मुकदमे लंबित हैं। इनमें एक बड़ा हिस्सा अवैध कब्जे, जाली दस्तावेजों  और भू-माफिया द्वारा हड़पी गई जमीनों का है।

ये आंकड़े  बताते है कि सभी पीडित तो  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सहपाठी नही हो सकते।  अंग्रेजों के समय की बनी व्यवस्था में पुलिस और  प्रशासनिक अधिकारियों को जनता पर नियंत्रण के लिए बनाया था। उनका तानाशाही  व्यवहार आज भी   नही बदला। अधिकारियों को हम जन सेवक नही बना पाए। इसलिए परेशान जनता  कोर्ट और कचहरी के चक्कर लगा रही है।    

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

Friday, September 18, 2026

कमाल, एक छोटे से गांव में एम डी डाक्टर



चिकित्सा जगत में बड़ा नाम है डा आर पी त्यागी

अशोक मधुप

बिजनौर,प्रत्येक छोटा मोटा डाक्टर शहर में जाकर निंसग होम बना कर धन कमाने में लग जाता है किंतु जनपद में एक चिकित्सक ऐसें भी हैं,जो एम डी होने ke बाद भी एक छोटे से गांव में चिकित्सा सुविधा देने में लगे हैँ और वह भी तब से जब एमडी खोजे भी नही मिलते थे।

जनपद े चिकित्सा जगत में डा राम प्रसाद त्यागी जाना माना नाम है। उनकी सरलता े सब प्रशंसक है। दूर दूर तक हृदय रोग विशेषज्ञ े रूप में उनकी ख्याति है। ग्राम रतनगढ़ े रहने वाले डा त्यागी ने 1985 में एम डी किया। 86 में दिल्ली े दीनदयाल होस्पिटल हरिनगर में सीनियर रेसिडेंट हुए। यहीं कार्य करने े दौरान शनिवार की शाम को अपने पैत्रक गांव रतनगढ़ आ जाते और अपने गांव में रविवार को मरीज देखते। धीरे धीरे गांव े प्यार ने जोर मारा और अपने गांव में आकर पे्रिक्टस शुरू कर दी। 86 में इस गांव की आबादी दो हजार े आसपास रही होगी।

आज डा त्यागी का दूर दूर तक बड़ा नाम है । सबेरे वे मरीज देखना शुरू करते हैं और देर शाम तक उनका कार्य जारी रहता है। आसपास के ही नहीं दूर-दूर े मरीज भी उने पास उपचार को आते हैं। इसीजी और एक्सरे की सुविधा उने पास है। गंभीर मरीजों े रूकने का भी प्रबंध है। वे बताते हैं कि उन्होंने सन 86 में जब गांव में मरीज देखना शुारू किया था तो पांच रूपया फीस लेते थे। वे कहते हैं कि एक लड़का एक दिन आकर बोला सर मै मैडिकल स्टोर खोल लू ंऔर उन्होंने हां कर दी। बिजनौर े पास े एक युवक ने कहा कि वे रक्त आदि े नमूने टैस्ट े लिए बिजनौर ले जाने का काम करना चाहतें हैं। डाक्टर त्यागी कहते हैं कि मैने उनसे कहा कि वह टैस्ट बहुत कम और बेहद जरूरी ही लिखते हैँ, किंतु वह नहीं माना और उसने यह काम करना शुरू कर दिया।

वे कहते है कि आदमी आदमी की सोच है। इंसान तो यहां गांव में भी रहते हैँ। इनको भी अच्छे उपचार की जरूरत है। उन्होंने चिकित्सा कार्य े शुरूआत े दिन में देखा और महसूस किया कि सब डाक्टर शहर की ओर भाग रहे हैँ उन्होंने सोचा ऐसे में देहात में कौन चिकित्सा सुविधा देगा। औेर फिर यहां काम शुारू कर दिया।

उनका मानना है कि शहर से ज्यादा गांव को योग्य चिकित्सकों की जरूरत हैं। वे कहते है कि आज रूरल चिकित्सक बनाये जाने की बात हो रही है। उन्हें साढे़ तीन साल में डिगरी देकर देहात में तैनात किया जाएगा। डा त्यागी का मानना है कि देहात हो या शहर सब जगह योग्य व्यिक्त चाहिए। देहात में दोयम दर्ज े आदमी नहीं रहते। उन्हें भी बढिया उपचार की जरूरत है।

युवा पीढ़ी को संदेश पर वे कहते हैं कि आदमी को अपने व्यवसाय और समाज े प्रति इर्मानदार होकर काम करना चाहिए। बाकी सब ईश्वर पर छोड़ दिया जाए तो कभी परेशानी नहीं होगी। यह बात चिकित्सा जगह में नही सभी क्षेत्र में लागू होता है। ह़दय रोग े बचाव े लिए बह सबको सलाह देते हैं ज्यादा से ज्यादा हरी सब्जी और सामर्थ े अनुसार ज्यादा से ज्यादा ताजे फल खाओ।



बिजनौर, डा राम प्रकाश त्यागी रतनगढ़ के जमींदार परिवार से है। इने दो बेटी और एक बेटा है। दोनों बेटी बीडीएस कर रही है और लड़का एमबीबीएस कर रहा है। उनका इरादा बेटे को भी देहात में ही अपने साथ प्रेक्टिस कराने का इरादा है।

अशोक मधुप

भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत है ब्रिक्स का साझा प्रस्ताव

  

 

 


अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

 बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण और विकासशील देशों की एकजुटता के इतिहास में एक अत्यंत मील का पत्थर सिद्ध हुआ है। इस सम्मेलन ने न केवल ब्रिक्स (ब्राजीलरूसभारतचीन और दक्षिण अफ्रीका) के आर्थिक एवं राजनीतिक महत्व को रेखांकित कियाबल्कि यह स्पष्ट संदेश भी दिया कि वैश्विक शासन व्यवस्था में अब 'ग्लोबल साउथकी आवाज को लंबे समय तक अनसुना नहीं किया जा सकता। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित पश्चिमी प्रभुत्व वाली वित्तीय और कूटनीतिक प्रणालियोंविशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं की एकाधिकारवादी नीतियों के उत्तर में दिल्ली सम्मेलन एक सशक्त प्रतिमान बनकर उभरा। भारत की मेजबानी में आयोजित ब्रिक्स (बीरिक्सशिखर सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच मतभेदों के बावजूद भारत ने एक साझा 'सर्वसम्मतिबनाने में सफलता हासिल की।  यह भारत की बड़ी  कूटनीतिक सफलता है कि तमाम भू-राजनीतिक  मतभेदों के बावजूद भारत सभी सदस्य देशों को 45 से अधिक पेजों वाले सर्वसम्मति 'नई दिल्ली घोषणापत्रपर सहमत करने में सफल रहा। इसमें आतंकवाद के सभी रूपों की कड़े शब्दों में निंदा की गई और आतंकवाद के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंसतथा उसकी फंडिंग रोकने का साझा संकल्प लिया गया। इससे पहले के सम्मेलन में संयुक्त घोषणा पत्र  जारी कराना एक कठिन काम था।

ब्रिक्स के सदस्य देशों के अपने-अपने रणनीतिक हितक्षेत्रीय प्राथमिकताएं और विदेश नीति संबंधी विचार  हैं। पश्चिम एशिया के मसले       पर यह विविधता और भी  साफ दिखाई देती है।  ईरान स्वयं संघर्ष में एक प्रमुख पक्ष है। उसके सऊदी अरब और यूएई के साथ सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर मतभेद हैं।  साझा बयान में न तो अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों का और न ही इसके बाद ईरान द्वारा फारस की खाड़ी के अपने पड़ोसी देशों पर किए गए हमलों का सीधे तौर पर जिक्र किया गया।  इसमें युद्ध के दौरान 'अधिकतम संयमबरतने की अपील की गई। इस साझा बयान में भारत ने यह दिखाया   कि कठिन भू-राजनीतिक परिस्थितियों में असहमतियों को अलग रखकर भी संवाद के रास्ते खुले रखे जा सकते हैं। ये साझा घोषणापत्र युद्ध खत्म नहीं करा फिर भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सहमति की दिशा में उठा हर कदम महत्व रखता है।

प्रस्ताव में  सदस्य देशों के बीच व्यापार में आने वाली शीर्ष 10 बड़ी रुकावटों को चिन्हित कर हटाने का लक्ष्य  रखा गया। हर साल 100 नए अंतरराष्ट्रीय स्टार्टअप्स का एक-दूसरे के बाजारों में विस्तार और कंपनियों के बीच 1,000 नई साझेदारियाँ बनाने की योजना और  शहरीकरण की चुनौतियों से निपटने और जलवायु-अनुकूल इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर सहमति बनी। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता घटानेस्थानीय मुद्राओं में सीमा-पार भुगतान को बढ़ावा देने तथा 'न्यू डेवलपमेंट बैंकके विस्तार पर प्रगति हुई। इस सम्मेलन में भारत के सफल 'डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर' (यूपीआईआधार मॉडल आदि) को ब्रिक्स देशों के साथ साझा करने पर मुहर लगी। इसके अलावाआर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआईको सुरक्षितपारदर्शी और ग्लोबल साउथ के हितों के अनुकूल बनाने के लिए साझा मानक तय करने पर बल दिया गया।

सम्मेलन के इतर भारत की  बड़ी उपलब्धि है वैश्विक नेताओं के साथ महत्वपूर्ण बातचीत । लंबे समय से चल रहे सीमा तनाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच सीधी बातचीत हुई। इसमें मतभेदों को विवाद में न बदलने और सीमा पर शांति बनाए रखने पर सहमति बनी। मोदी-शी जिनपिंग की मुलाकात से पहले बड़ा कदम  छह  साल बाद भारत-चीन के बीच सीधी फ्लाइट शुरू करना है। भारत-रूस के बीच  ऊर्जासमुद्री सुरक्षा और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने के लक्ष्य पर सहमति जताई गई।

सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों में तत्काल सुधार की मांग को मजबूती से दोहराया गयाताकि विकासशील देशों को वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रिया में उचित प्रतिनिधित्व मिल सके। भारत ने इस सम्मेलन के जरिए यह साबित किया कि वह वैश्विक गुटबाजी से दूर रहकर एक संतुलित और निष्पक्ष "आर्थिक और कूटनीतिक पुल" के रूप में काम करने की क्षमता रखता है।

दिल्ली शिखर सम्मेलन  ने यह साबित किया कि ब्रिक्स अब केवल एक विचार-विमर्श का मंच या बयानों तक सीमित रहने वाला समूह नहीं रहाबल्कि यह संस्थागत ढांचा तैयार करने में सक्षम एक ठोस आर्थिक ब्लॉक बन चुका है। इसके अतिरिक्तदेशों के वित्तीय संकट से निपटने के लिए आकस्मिक रिजर्व व्यवस्था पर चर्चा ने सदस्य राष्ट्रों को वैश्विक बाजार के उतार-चढ़ाव से एक सुरक्षा कवच प्रदान करने का प्रयास किया।

व्यापारिक दृष्टिकोण से दिल्ली सम्मेलन में एक अत्यंत दूरदर्शी निर्णय यह लिया गया कि सदस्य देश आपस में अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देंगे। अंतर-ब्रिक्स व्यापार में अमेरिकी डॉलर और यूरो पर निर्भरता कम करने के इस प्रयास का मुख्य उद्देश्य क्रेडिट सुविधाओं को आसान बनाना और विनिमय दरों के जोखिमों को कम करना था। पश्चिमी वित्तीय आधिपत्य और प्रतिबंधों की राजनीति के आलोक में यह पहल वैश्विक अर्थव्यवस्था के विकेंद्रीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम मानी गई। इसके साथ हीव्यापार मंत्रियों के स्तर पर हुए समझौतों ने यह सुनिश्चित किया कि सदस्य देशों के बीच मालसेवाओं और निवेश का प्रवाह सुचारू रूप से हो सके।

यदि दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन का विश्लेषण किया जाएतो इसके बहुआयामी सकारात्मक परिणामों के साथ-साथ कई ऐसे अंतर्विरोध और सीमाएं भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं जो इस संगठन की दक्षता को चुनौती देती हैं। सबसे बड़ा अंतर्विरोध ब्रिक्स के दो सबसे बड़े सदस्योंभारत और चीनके बीच मौजूद रणनीतिक और सीमा संबंधी अविश्वास है। दिल्ली सम्मेलन के मंच पर जहां दोनों देशों के नेतृत्व ने आर्थिक सहयोग पर सकारात्मक प्रतिबद्धता दिखाईवहीं परदे के पीछे सीमा विवादक्षेत्रीय आधिपत्य की होड़ और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन का आक्रामक रुख एक अनसुलझी चुनौती बना रहा।

शासन प्रणालियों और विचारधाराओं का अंतर भी इस सम्मेलन की एक बड़ी सीमा के रूप में रेखांकित हुआ। भारत और ब्राजील जहां जीवंत लोकतांत्रिक देश हैंवहीं चीन और रूस में एकदलीय अथवा सत्तावादी शासन संरचनाएं हैं। इस वैचारिक भिन्नता के कारण अंतरराष्ट्रीय कानूनोंमानवाधिकारों और वैश्विक नीतियों पर ब्रिक्स का एक एकीकृत दृष्टिकोण बना पाना बेहद जटिल हो जाता है। पश्चिमी देश किसी भू-राजनीतिक संकट पर प्रतिबंध लगाते हैंतो रूस और चीन का रुख स्पष्ट रूप से पश्चिम-विरोधी होता हैजबकि भारत और ब्राजील एक 'गैर-पश्चिमीलेकिन 'पश्चिम-विरोधी नहींका संतुलन पसंद करते हैं। दिल्ली सम्मेलन में भारत की कूटनीति की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उसने इस सम्मेलन को किसी सीधे पश्चिम-विरोधी मोर्चे में तब्दील होने से रोका और इसे विकास केंद्रित बनाए रखा।

जलवायु परिवर्तनऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा जैसे वैश्विक मुद्दों पर भी दिल्ली सम्मेलन में व्यापक मंथन हुआ। सम्मेलन ने यह स्पष्ट किया कि जलवायु परिवर्तन के ऐतिहासिक उत्तरदायित्व के लिए विकसित देशों को धन और तकनीक हस्तांतरण की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। इसके साथ हीस्वास्थ्य क्षेत्र में अनुसंधान और महामारी जैसी आपदाओं से निपटने के लिए साझा तंत्र बनाने पर भी सहमति व्यक्त की गई

दिल्ली सम्मेलन ने भारत के वैश्विक कद को बढ़ाने में अभूतपूर्व योगदान दिया। भारत ने खुद को एक ऐसे जिम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी के रूप में प्रस्तुत किया जो एक तरफ पश्चिमी गुटों के साथ मजबूत संबंध रख सकता हैतो दूसरी तरफ रूसचीन और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ मिलकर नए वैश्विक समीकरण भी गढ़ सकता है। भारत की यह 'बहु-संलग्नतानीति दिल्ली सम्मेलन में पूरी तरह सफल दिखाई दीजहां उसने पश्चिमी शक्तियों को नाराज किए बिना विकासशील देशों का सशक्त नेतृत्व किया।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं)