Tuesday, October 6, 2026

भाषा कोई भी हो , दवा सस्ती मिले,सही मिले


अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

 उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने प्रदेश के चिकित्सकों से आग्रह किया है कि वे मरीजों के परामर्श-पर्चे पर दवाओं के नाम हिंदी अथवा देवनागरी लिपि में भी लिखें, ताकि मरीज आसानी से समझ सकें कि उन्हें कौन-सी दवा दी गई है। अपने पत्र के माध्यम से उन्होंने कहा कि मरीजों की सुविधा और उनके विश्वास को ध्यान में रखते हुए हिंदी में लिखी दवाओं को प्राथमिकता  दी जाए। ब्रजेश पाठक ने कहा कि लोकतंत्र लोकभाषा और जनभाषा के माध्यम से ही अधिक मजबूत होता है। चिकित्सक यदि मरीजों से उनकी मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा जैसे भोजपुरी, अवधी, ब्रजभाषा आदि में संवाद करेंगे, तो मरीज अपनी समस्या और चिकित्सकीय सलाह को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। इससे चिकित्सक और मरीज के बीच विश्वास भी और मजबूत होगा। उपमुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी विदेशों में भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिंदी के माध्यम से संवाद कर देश की भाषाई पहचान को मजबूत कर रहे हैं। उन्होंने चिकित्सकों से आह्वान किया कि वे मरीजों की सुविधा के लिए चिकित्सा संवाद को अधिक से अधिक सरल और स्थानीय भाषा में बनाएं। राष्ट्रनायकों की अभिलाषा, चले देश में देशज भाषा के भाव के साथ उप मुख्यमंत्री पाठक ने चिकित्सकों से इस पहल को जनसेवा का हिस्सा बनाने का आग्रह किया। उनका आदेश बहुत अच्छा है, किंतु इस आदेश से ज्यादा जरूरी है कि मरीजों को  गुणवत्ता वाली दवा सस्ती मिलें। उपचार सस्ता हो।  हिंदी में लिखने से ज्यादा जरूरी और महत्वपूर्ण है कि दवाएं सस्ती और गुणवत्ता पूर्ण  हों।  

आज बीमार की सबसे  बडी समस्या  मंहगी दवा है। महंगी होने पर भी कोई  गारंटी नही कि वह असली ही होगी।  हाल में कुत्ते के काटे पर लगने वाला रेबीज का टीके   की नकली खेप पकड़ी गई। हार्ट और कैंसर की दवाएं भी नकली पकड़ी  जाती  रही हैं। कुत्ते के काटने से रेबीज नामक बीमारी होने का  खतरा रहता है। इस बीमारी का पूरी दुनिया में कोई इलाज नहीं। हार्ट और कैंसर की नकली दवा तो मरीज के सीधे मौत के मुंह में धकेल रही हैं। एक बात और आज बाजार में लोकल कंपनी की मंहगी दवा भरी हैं। मैडिकल स्टोर वाह− वाही  लूटने के लिए खरीदार को दस प्रतिशत  से 20 प्रतिशत तक कमीशन देते हैं किंतु दवा तो  ज्यादा कमीशन के चक्कर में लोकल कंपनी की बेच रहे हैं। ब्रांडेड दवाएं तो   एक तरह से मार्केट से लगभग गायब होती जा रही हैं। मेरे घुटने के बदलने के दौरान में मुझे 886 रूपये की छह एंटी बायोटिक गोली अस्पताल के मैडिकल स्टोर से दी गईं,  जबकि सिपला की इसी दवा की दस गोली 113 रूपये की हैं।  दो साल पहले मेरी बाई पास सर्जरी हुई।  आपरेशन के दौरान तीन टाकें पक गए। इनके लिए सुबह –शाम एंटीबायोटिक इंजेक्शन लगते । अस्पताल से ये एक इंजेक्शन 1550 रूपये का मिलता।  होलसेल मार्केंट में इस  इंजेक्शन की कीमत तीन सौ रूपये थी1 अस्पताल में बाहर से खरीदा इंजेक्शन नही लगता था। इसीलिए हमें 1550 का इंजेक्शन खरीदना पड़ता। हालत यह है कि अब अस्पताल अपनी मर्जी से दवा  पर कीमत डलवाते  हैं। मरीज फंस गया चाहिए, फिर तो उसे लुटना ही लुटना  है।  ये ही हाल बीमारी के टैस्ट का है। मंत्री महोदय  दवा और रोगों के टैस्ट सस्ते कराने पर काम करना  होगा। सभी टैस्ट के समान रेट हों। अस्पताल या  नंर्सिम होम चलाने की अनुमति के साथ  अस्पताल से अनुबंध  किया जाए कि वह जनऔषधि की दवा बेचेंगे या ब्रांडेड कंपनी की।  इसके अतिरिक्त किसी लोकल कंपनी की दवा किसी कीमत पर नही बेची जाएगी।  

टैस्ट और दवा के नाम पर्चे पर हिंदी में लिखने की जगह जरूरी है कि मरीज को गुणवत्ता पूर्ण और सस्ती दवा मिलें। दवा की आनलाइन बिक्री शुरू हुई है, किंतु उस पर भी अधोमानक और नकली दवा मिलने की शिकायत आ रही हैं।

कैंसर की दवाओं और अन्य औषधियों की कीमतों में भारी मुनाफावसूली को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि दवाओं की एमआरपी (न्यूनतम खुदरा मूल्य), खुदरा मूल्य (रिटेल प्राइस)  पर अधिकतम 16 प्रतिशत तक सीमित होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। इसमें दवाओं की कीमतों का नियमन करने, जेनरिक दवाओं के इस्तेमाल और मेडिकल उपकरणों को ड्रग्स मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीओ) कानून, 2023 को लेकर चिंता जताई गई है।


जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कीमतों को रिटेल प्राइस के 16 प्रतिशत तक ही सीमित करने का सुझाव दिया। जस्टिस मेहता ने कहा कि कैंसर की एक दवा का खुदरा मूल्य तीन हजार रुपये है, लेकिन उसी दवा की एमआरपी 27 हजार रुपये है। उन्होंने कहा कि यह बहुत बड़ा अंतर है। सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं पर मुनाफाखोरी को लेकर गहरी चिंता जाहिर की। 

सुप्रीम कोर्ट ने डीपीसीओ के तहत जरूरी और गैर जरूरी दवाओं को लेकर भी सवाल उठाए। याचिका में कहा गया कि कॉरपोरेट अस्पताल अक्सर सरकारी योजनाओं के तहत इलाज कराने वाले मरीजों को इन-हाउस फार्मेसी से दवाएं खरीदने के लिए कहते हैं और ऊंची कीमत पर दवाएं खरीदने का बोझ अक्सर गरीब परिवारों पर पड़ता है, जो उन्हें अपनी जेब से चुकाना होता है।

केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस मुद्दे पर संतुलित रास्ता निकाला जाएगा। तुषार मेहता ने कहा कि मैं ये नहीं कह रहा कि याचिकाकर्ता सही या गलत हैं, लेकिन बीच का रास्ता निकालना होगा। जहां तक मेरी जानकारी है कि फार्मा कंपनियों को इससे फायदा नहीं हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट अब 12 अक्तूबर को इस मामले पर सुनवाई करेगा। 

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की दवाओं पर भारी मुनाफाखोरी को दिनदहाड़े डकैती करार दिया था। पीठ ने कहा था 'यह बिल्कुल चौंकाने वाली बात है कि जरूरी कैंसर की दवा का एमआरपी 27,000 रुपये है, जबकि रिटेलर को यह 2,700 रुपये में दी जा रही है। रिटेलर को दी जाने वाली कीमत से एमआरपी 10 गुना है।' कोर्ट ने कहा कि अगर यह जबरन वसूली नहीं है तो और क्या है?

एक बात और आप प्रदेश सरकार के अपने अस्पताल देखिए।  लखनऊ  स्तर से खरीदकर अस्पतालों को भेजी जाने वाली दवा स्थानीय कंपनियों की होती हैं। ये कंपनी कमीशन देती हैं तो एक्सपायर डेट के नजदीक वाली दवाई भेजती हैं। खरीदने  वाले अधिकारी अस्पताल  को आदेश करते हैं कि इन्हें जल्दी  बांटकर खत्म करिए। इसे रोकिए। सरकार के अस्पताल में मल्टी नेशनल कंपनी या सरकारी जन औषधि निर्मित  दवा के वितरण की व्यवस्था कराइये।  एक बात और प्राइवेट अस्पतालों में भर्ती  मरीज से कमरे का  प्रतिदिन का तो ऊंचा रेट लिया  ही जाता  है। स्टाफ  और डाक्टर की प्रत्येक विजिट का  अलग से वसूला  जाता है।   आज जरूरत  है कि उपचार के नाम पर होने वाली इस डकैती को रोका  जाए।


  −अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)