Tuesday, September 8, 2020

गंगा जल और मेरी प्यास पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी






पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी-13
गंगा जल और मेरी प्यास
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मुझे बहुत तेज प्यास लगी थी। गंगा पास से बह रही थी। मजबूरी ,मैं दुनिया का प्यास बुझाने वाली पतिति पावनी से अपनी प्यास नहीं बुझा सकता था।
कई साल पहले की घटना है। खिरनी गांव के पास गंगा में नाव पलट गई। नाव में सवार छह व्यक्ति डूब गए। मैंने तय किया कि इस क्षेत्र का भ्रमण किया जाए।मैं अपने साथी संजीव शर्मा को लेकर खिरनी के लिए चल दिया। बस ने हमें खिरनी गांव के पास उतार दिया। पैदल चलकर हम खिरनी गांव के पास बहती गंगा के तट पर पहुंचे।
एक नाविक दिखाई दिया।मैंने उससे गंगा पार ले जाने का अनुरोध किया।उसने पूछा।कहाँ जाओगे।मेरे बताने पर की खादर में घूमना चाहते हैं।
उसने कहा कि कोई फायदा नहीं ।जंगल के सभी रास्तों में पानी भरा है।वह तो अपने खेत से पशुओं के लिए चारा लेने जा रहा है। मजबूरी है बाबू।हमें पशुओं का पेट भरना है।आप मत जाओ।
हमने उसका कहना माना।
वहां से गंगा के किनारे बिजनौर साइड में चलने का निर्णय लिया। बरसात का मौसम था। गंगा पूरे उफान पर बह रही थी। हम गंगा के किनारे- किनारे चल दिए। खोलों में उतरते चढ़ते।कुछ आगे चलकर एक किले के खडंहर दिखाई दिए। महल के किनारे बने गोले जैसा था। वहां बड़ी ईंट के अद्धे लगे हुए थे।यहां पुराने समय की ईट लगभग दो इंच मोटी और एक से डेढ फीट तक लंबी होती थी। मैंने देखा कि इसमें लगी ईंट अधिकतर आधी है। महल का अधिकांश हिस्सा गंगा में बह गया था। यही भाग बचा था।लगाकी यहां ईट किसी पुराने महल /भवन की निकाल कर यहां लाकर लगाई गई है। कुछ फोटो आदि खींचे और एक ईंट अपने साथ लेकर हम चल दिए।
इससे पहले कभी ऐसा सफर नहीं किया था। सो सफर की कोई व्यवस्था भी नहीं की थी। सफर के लिए पानी नहीं लिया था। जबकि बहुत जरूरी था।कुछ दूर गंगा के खोलों में ऊंचे -नीचे चलकर थकान हो गई। प्यास लगने लगी। गर्मी ज्यादा थी।रास्ते में एक दो किसान मिले ।उनसे पूछा कि कहीं पानी मिलेगा। प्यास लगी है। उन्होंने आश्चर्य से हमें देखा कहा -गंगा बह तो रही है।
बरसात के कारण मिट्टी कट रही थी पानी मटमैला था। प्यास बहुत थी। पर गंगा के जल को देखकर पीने की इच्छा नहीं थी।ऐसे चलते दो घंटे बीत गए। प्यास से जीभ बाहर निकल आई थी।होठ सूख गये थे।
कैसी विवशता थी कि कल -कल करती मां पावनी के तट के किनारे चलने के वाबजूद जल नहीं पी सकते है। लग रहा था कि कहीं बरसात का मटमैला पानी बीमार न कर दे।
कुछ दूर बसा एक गांव दिखाई दिया ।हम उसकी ओर बढ़ गए। प्यास बर्दास्त से बाहर होती जा रही थी। गांव में घुसते ही छप्पर की बस्ती दिखाई दी।कुछ खपरैल के मकान भी थे। यहां जगह -जगह बरसात का पानी जमा था। उसमें सुअर पड़ेआराम कर रहे थे। लगा कि वाल्मीकियों का मुहल्ला है। एक जगह नल दिखाई दिया। उसके चारों ओर भी बेइंतहा गंदगी पसरी थी। पर प्यास ने सब कुछ भुला दिया।जगह - जगह पसरी गदंगी,उससे उठती बदबू का ध्यान छोड़ हमने बढ़कर जमकर पानी पिया। रुक- रुक कर दो तीन बार पानी पीने के बाद तृप्त हो पाएं ।कुछ जान में जान आई।तब आगे बढ़े।
अशोक मधुप

Tuesday, August 18, 2020

पत्र कारिता की शुरुआत

पत्र कारिता की शुरुआत

1973 में मैंने संस्कृत से एमए किया। जनता उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में त्रिभाषा शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिल गई। साक्षात्कार में शर्त वह रखी गई कि आपको हाईस्कूल को हिंदी स्ंस्कृत पढ़ानी पड़ेगी। यह भी बताया गया कि हाई स्कूल के लिए रखा शिक्षक योग्य नही ं है,क‌िंतु रखना प्रबंधन की मजबूरी है।मैंने एक साल वहॉ कार्य किया। गांव में बनी एक मित्र ने कहा -बीएड कर लो। शिक्षण सत्र पूराकर  मैने बीएड कर लिया।इसके बाद  भाषा शिक्षक के पद पर जैन कॉलेज नहटौर में नियुक्ति मिल गई। 400 के आसपास वेतन मिलता था। इस दौरान मैंने विद्युललेखा नाम से साप्ताहिक शुरु किया।अखबार नबीसी का शौक ऐसा चर्राया कि नौकरी छोड़ दी। अकेले अपने दम पर साप्ताहिक निकालना कभी लाभ का साधन नहीं हो सकता था। कुछ दिन बाद वह बंद हो गया।

एक मित्र की सलाह पर बंद पड़े स्वतंत्र आवाज को चलाने की जिम्मेदारी मिली। तीन माह वहां काम किया। वहां से एक पैसा भी नहीं मिला। राष्ट्रवेदना के संपादक विश्वामित्र शर्मा ने कृपा की । एक सौ रुपये माह पर अपने यहां संपादन के लिए रख लिया।यह सफर कई साल चला।बिजनौर में कम्युनिष्ट पार्टी के प्रभाव में आकर प्रेस एम्पलाइज यूनियन बना ली। हमने यूनियन बनाई तो दक्ष‌िण पंथी विचार धारा के विश्वामित्र शर्मा जी को सबसे ज्यादा बुरा लगा। वह प्रेस मालिक की यूनियन बना बैठे । इस दौरान में अमर उजाला से जुड़ चुका था। बिजनौर से खबर भेजने लगा था।एक दिन मित्रा जी ने कम्पोजीटर करण को हटाने का नोटिस दे दिया। इसी को लेकर प्रेस कर्मचारी ने  हड़ताल कर दी। लगभग 26 दिन हड़ताल चली। बिजनौर की सभी प्रेस में ताले लग गए। बिजनौर से निकलने वाले दो दैनिक बिजनौर टाइम्स और राष्ट्रवेदना भी नहीं छपे। 26 दिन बाद हड़ताल टूटी। इस दौरान मित्रा जी ने मुझे हटा दिया। प्रेस कर्मचारी मजदूर पेशा थे। उनके रोटी -रोजी के संकट को देखते हुए। मैंने हड़ताल ख्रत्म होना ही बेहतर समझा। अमर उजाला से भी कुछ नहीं आता था। आदरणीय अतुल जी विदेश चले गए। अमर उजाला से संपर्क टूट गया।

मैंने अपना साप्ताहिक बारूद और विस्फोट शुरू कर दिया।वह जिले के कर्मचारियों की आवाज बना। कर्मचारी ग्राहक बनते गए। खर्च चलने लगा। इस दौरान मेरे एक मित्र राजकीय कर्मचारी नेता नेतागिरी के कारण निलंबित कर दिए गए। वह भी मेरे साथ लग गए। अखबार के ग्राहक बनते । आई राशि का बड़ा हिंस्सा उनके परिवार की जरूरत को जाने लगा।प्रेस की हालत यह थी कि वह बरसात में अखबार छापना पंसद करती। क्योंकि उनके पास काम नहीं होता। जब शादी , स्कूल के पेपर आदि का समय होता तो अखबार नहीं छप पाता।

मुझे रेलवे स्टेशन पर अजय प्र‌िंट्र‌‌िग प्रेस मिल गई। उस पर ज्यादा काम नहीं था। प्रेस के अंदर के कक्ष में एक पलंग था । मैं घूमता -फिरता आता। वहीं सौ जाता। एक तरह से अजय के परिवार का अंग बन गया।

इस दौरान कई साथियों ने बहुत मदद की। पुरे के डाक्टर सिद्दीकी थे। वह मेरे बेरोजगारी के इस समय में मुझे एक सौ रुपया प्रतिमाह देते।विरेश बल मिल जाते तो जबरदस्ती घर ले जाकर खाना खिलाते। ओमपाल सिंह और शुगर मिल पर रहने वाले एक और साथी भी विरेश बल की तरह ही थे।

इस दौरान बिजनौर से उत्तर भारत टाइम्स की शुरूआत हुई।मैं इसमें डैक्स पर रख लिया गया। झालू से मैं सवेरे नौ बजे के आसपास आने वाली ट्रेन से बिजनौर आता। रात को तीन बजे की ट्रेन से वापस जाता।

ये सिलसिला चल रहा था कि एक दिन एक साहब आए। मुझसे मेरे बारे में पूछने लगे। बात चीत हुई। उन्होंने अपना परिचय सुबोध शर्मा के रूप में दिया बताया कि बरेली से आया हूं। अमर उजाला के मालिक अतुल माहेश्वरी जी ने बुलाया है।

मैं  उनके साथ बरेली चला गया। अतुल जी ने कहा - अमर उजाला के लिए काम करो। मैंने हां कर दिया। कुछ  तै नहीं किया।  उसके बाद भी आजतक कभी कुछ नहीं मांगा। कुछ नहीं चाहा।

लकड़ी के बॉक्स से लेकर डिजिटल कैमरे तक पहुंचा फोटोग्राफी का संसार

लकड़ी के बॉक्स से लेकर डिजिटल कैमरे तक पहुंचा फोटोग्राफी का संसार

फोटोग्राफी आर्ट थी, वह खत्म हो गई

व्यवसाय पैसे वाले हावी हो गए

अशोक मधुप

बिजनौर। फोटोग्राफी का जनपद का इतिहास 75- 80 साल के आसपास का होगा। बॉक्स कैमरों से हम आज ‌डिजिटल कैमरों तक पहुंच गए। मोबाइल में आए कैमरों ने हर व्यक्ति को फोटोग्राफर बना दिया। हालत यह हो गई कि आए कार्यक्रम में कवरेज के लिए आए व्यवसायिक और प्रेस फोटोग्राफर को फोटो खींचने के लिए जगह नहीं मिलती।मोबाइल धारक मोबाइल तान कर पहले ही तैयार हो जातें हैं।

बिजनौर के फाइन स्टूडियों के स्वामी शकील अहमद बतातें हैं मिर्दगान के रहने वाले हाजी जमीर अहमद कचहरी मार्ग पर स्थित सराय के प्रवेश द्वारा में बैठे रहते थे। फोटो बॉक्स कैमरों से खींचते थे। बाद में इनका बेटा काम करने लगा। ये लकड़ी का बड़ा बाक्स कैमरा रखते थे। इसके काले परदे में मुंह देकर फोटा खींचा जाता था। कैमरे में लगे बॉक्स में ही फोटो बनता था। मुख्य बाजार में तुफैल अहमद भी बॉक्स कैमरे से फोटो खींचते थे। आज यहां साहू शंभू दयाल जी का बाजार बन गया।विशेषकर बूरे और बताशों की दुकान हैं।

लिबर्टी फोटो स्टूडियो कि स्वामी पवन शर्मा कहतें हैं कि पहले फोटोग्राफी आर्ट थी। इसमें फोटोग्राफर की कला का परिचय मिलता था। इस समय निगेटिव बनता था। इसे गहरी काली पैंसिल से रिटच किया जाता था। दाग धब्बे मिटाए जाते थे। उसके बाद कलर किया जाता था। वे बतातें हैं कि इसके लिए गुर्टू साहब, उनके यहां काम करने वाले हरकेश सिंह, कौशिक चित्रशाला के रूपचंद, विशाल स्टूडियो के मोहम्मद सलीम, स्कूल रोड के फोटोग्राफर सईद अहमद, आरके स्टूडियों के राजेंद्र टांक प्रसिद्ध थे।रंगून फोटो स्टूडियों के स्वामी नसीम अहमद कहते हैं कि विशाल फोटो स्टूडियो के सलीम साहब ने कलर निगेटिव पर टचिंग की। उनकी देखा देख उन्होंने भी रंगीन न‌िगेटिव पर ट‌चिंग का काम किया। जजी पर विजय चौधरी का अपना विजय नाम से स्टूडियो था। इसके बाद अब उनके बेटे स्टूडियो चला रहे हैं। विजय चौधरी का बिजनौर की फोटोग्राफी में बड़ा नाम है। जजी का ही बाना फोटो स्टूडियो बंद हो गया। अब बाना साहब के बेटे रुपेंद्र बाना घर पर ही ड‌बिंग और बुकिंग का कामा कर रहे हैं।चित्रलोक स्टूडियो के मनोज पांडेय प्रसिद्ध से थे। निधन के बाद इनका स्टेडियो बंद हो गया। इनके भाई सुधीर धर से ही काम कर रहे हैं। उत्तम कलर लैब के ऋषिपाल सिंह बहुत पुराने फोटोग्राफर रहे हैं। मूल रुप से से मुजफ्फरनगर के रहने वाले हैं।घंटाघर के नीचे अनिल पंडित का पंडित फोटो स्टूडियो सन 1985 के आसपास बहुत प्रसिद्ध हुआ।

गूर्ट्र और कौशिक च‌ित्रशाला के आज के स्वामी योंगेंद्र शर्मा कहते हैं कि आज फोटोग्राफी में धन आ गया। आधुनिक संयत्र और महंगे उपकरण वाले लोग हावी हो गए। मूलरुप से फोटोग्राफर बेकार हो गए या कुछ और करने को मजबूर हैं। इस व्यवसाय में आए पैसे वालों ने उन लड़कों से काम कराना शुरु कर दिया जो इसका कुछ जानते भी नहीं। पहले फोटोग्राफर कम से कम फोटो खींचता था। क्योंकि उस समय उसके 120 एमएम के कैमरे की एक फिल्म में आठ या 12 ही फोटो खिंच पाते थे।उसके बाद 35 एमएम के कैमरे आए। इनमें 36 फोटो खिंचते ‌‌थे।अब तो डिजीटल युग है। चाहे कितने ही फोटो खींचे जाओ।

रीगल स्टेडियों के स्वामी राज बिहारी लाल सक्सेना उर्फ राजा कहते हैं कि उनका 40 साल पुराना स्टूडियो है। इससे पहले कई साल गुर्टू स्टूडियो पर काम किया। इस दौरान फोटोग्राफी की पूरी दुनिया बदल गई। पहले कैमरो में प्लेट लगती ‌थी फिर फिल्म आईं। डिजिटल युग शुरु हुआ तो ऐसे कैमरे आए जिनमें फ्लॉपी लगतीं थी। अब चिप और मैमोरी कार्ड का युग आ गया।

शौकीन

राम बाग कॉलोनी के रहने वाले विजय पंड‌ित घुमकड़ी और फोटोग्राफी 32 साल से कर रहे हैं। पूरे भारत वर्ष के साथ 30 देश घूम चुके हैं। जैमनी डेंटल क्लीनिक के स्वामी डा.हेमंत रस्तोगी को फोटोग्राफी में बड़ा लगाव है। अवसर मिलते ही घूमने निकल जाते हैं। जिला अस्पताल के नेत्र चिकित्सक मनोज सैन को फोटो के साथ वीडियो ग्राफी में बहुत रुचि है। कचहरी रोड के रहने वाले सुनील कुमार गुप्ता बढापुर में शिक्षक रहे। वन्य क्षेत्र होने के करण फोटोग्राफी के शौक में वहां 30 साल मोनी का नाम से स्टेडियो चलाया। सेवानिवृति के बाद अब बिजनौर में हैं। इनका बेटा वैन्तेय का बिजनौर में आर्ट काम ग्लेरियो के नाम से बड़ा स्टूडियो है।

एक कैमरा से कैसे किसी अच्छे काम को समाज में जगह दिलाई जा सकती है, आशीष लोया ने इसकी मिसाल पेश की है। श्री श्री रविशंकर की आर्ट ऑफ लिविंग संस्था से जुड़े आशीष लोया जब बैराज होकर बिजनौर आते -जाते थे तो उन्हें गंगा तट पर पक्षियों की चहचहाहट आकर्षित करती थी। उन्होंने एक दिन तट पर जाकर देखा तो पता चला कि वहां प्रवासी पक्षी थे। अपने कैमरे से उनके फोटो खिंचने शुरू किए। बाद में गंगा तट के दूसरी ओर के हजारों प्रवासी प‌क्षियों के फोटो खींचकर अफसरों को दिखाए। उनके प्रयास से ही गंगा के तटीय क्षेत्र को हैदरपुर वेटलैंड घोषित कर वन्य जीवों के लिए आरक्षित किया गया है।

डीएफओ एम सेम्मारन ने एटा में अपनी जॉब के दौरान जंगल में घूमना शुरू किया जंगल की सुंदरता उनके मन को भा गई। वन्य जीवन के खूबसूरत नजारों को सभी को दिखाने के लिए करीब ढाई लाख का कैमरा खरीदकर फोटोग्राफी शुरू कर दी। जिले के वन्य क्षेत्र में भी वे बहुत फोटोग्राफी करते हैं। उनके खींचे गए फोटो विकास भवन में लगाए गए हैं।

वर्ड फोटोग्राफी डे पर विशेष

पुरानी यादों को ताजा करती हैं फोटो-

चांदपुर के फोटोग्राफर सरदार परमजीत सिंह पिछले करीब 30 वर्षो से फोटोग्राफी का काम करते हैं। परमजीत ने बताया कि तस्वीरें बोलती हैं वजह उनसे जुड़ी यादें होती हैं। तस्वीर देखते ही पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। पिता परमजीत को देख पुत्र मनोरथ का मन भी फोटोग्राफी में रमने लगा है। उसने भी फोटोग्राफी में डिप्लोमा कर इस व्यवसाय को अपना लिया है।

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अखबार की फोटो देख फोटोग्राफी में बढ़ी रूचि-

फोटोग्राफर लवली शर्मा करीब 32 साल से फोटोग्राफी का काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अखबार में छपी फोटो आकर्षित करती थी। यहीं से ही फोटोग्राफी की रूचि हो गई। उन्होनें बताया कि लम्हों को कैद कर लेने की कला फोटोग्राफी में ही सम्भव है।

लवली ने बताया कि पहले फोटोग्राफी काफी मुश्किल हुआ करती थी। फोटोग्राफी में कला दिखानी पड़ती थी। कैमरे में रिल चलती थी। निगेटिव से फोटो तैयार किए जाते थे। समय भी ज्यादा लगता था। जब से फोटोग्राफी डिजिटल हुई है तब से फोटोग्राफी काफी आसान हो गई है। पुरानी फोटोग्राफी की याद के लिए अभी भी पुराने कैमरे रखे हुए हैं।

सात दशक पुराना है नजीबाबाद का फोटोग्राफी इतिहास

नजीबाबाद-18 अगस्त

ब्लैक एंड व्हाइट फोटोग्राफी में नजीबाबाद का इतिहास सात दशक पुराना है। नगर के जानेमाने फोटोग्राफर रहे स्व. महावीर प्रसाद गुप्ता ने आजादी के मात्र छह वर्ष बाद 1953 में नजीबाबाद में फोटोग्राफी की शुरूआत की थी। अपने मामा देहरादून निवासी सागर मल गोयल के साथ देहरादून में 16 वर्ष फोटोग्राफी का अनुभव लेने के बाद महावीर प्रसाद नजीबाबाद में ब्लैक एंड व्हाइट फोटोग्राफी में मील का पत्थर बने। महावीर प्रसाद को ब्लैक एंड व्हाइट फोटो को रंगीन फोटो में बदलने की भी महारथ थी। महावीर प्रसाद के पुत्रों फोटोग्राफर विनोद गुप्ता और विनय गुप्ता को विरासत में फोटोग्राफी की महारथ हासिल हुई। तीसरी पीढ़ी में कम्प्यूटराइज्ड फोटोग्राफी दौर में राजीव गुप्ता और संजीव गुप्ता ने भी अपने पिता और बाबा का नाम रोशन रखा।

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फोटो आर्ट और वीनस स्टूडियो के स्वामी मशहूर फोटोग्राफर मतलूब अहमद और उनके छोटे भाई अशरफ शमीम वारसी उर्फ शब्बन की फोटोग्राफी का भी जबाव नहीं था। ब्लैक एंड व्हाइट फोटो खींचना, संसाधनों की कमी के बावजूद उन्हे संवारने में उस जमाने के फोटो ग्राफरों का अपना हुनर था। फोटोग्राफर स्व. मतलूब अहमद के पुत्र अहसान उर्फ गुड्डू फोटो आर्ट स्टूडियो के माध्यम से फोटोग्राफी की विरासत को बखूबी आगे बढ़ा रहे हैं।

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70 के दशक में आरके स्टूडियो के माध्यम से फोटोग्राफर राजू टांक का नगर में नाम रहा। बाद में आरके स्टूडियो की कमान पूनम स्टूडियो के रूप में फोटोग्राफर स्व. मुन्ने भाई ने फोटोग्राफी कला का लोहा मनवाया।


। गांव छोईया नंगली निवासी तैयब अली को बचपन से घूमने का शौक था। एक फर्म में काम करते हुए उन्होंने अपने इस शौक को परवान चढ़ाया। वे जब घूमने से पीछे नहीं हटते तो इन यादों को सजोने के लिए फोटोग्राफी का खुमार चढ़ जाना बहुत सामान्य है। तैयब अली जहां भी जाते हैं वहां की यादों को वे अपने कैमरे में हमेशा के लिए सजो लेते हैं। कुछ समय पहले वे जोशीमठ में कल्पवृक्ष देखने भी गए थे जो पूरे भारत में केवल चार ही हैं। उनके पास 25 हजार फोटो का कलेक्शन है। वे फेसबुक ब्लॉग पर नई नई जगहों के फोटो डालकर वहां की जानकारी दे रहे हैं।

पीडब्लूडी में इंजीनियर नजीबाबाद निवासी ज्ञान प्रकाश का शौक ही फोटाग्राफी है। वे कुदरत के खूबसूरत नजारों के फोटो लेने के दीवाने हैं। ज्ञान प्रकाश फोटो लेने के लिए ऊंचे ऊंचे पहाड़ों पर भी पहुंच जाते हैं। ज्ञान प्रकाश का कहना है कि उन्हें फोटोग्राफी का शौक नहीं है बल्कि इसका नशा है। उनका कहना है कि कुदरत के नजारों के सामने इंसानी दुनिया कुछ भी नहीं है। वे अपने फोटो से सभी को कुदरत के नजारे दिखाते हैं।

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पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी 13

 पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी 13

23 दिसंबर 1989 को श्रमजीवी पत्रकार संघ के सम्मेलन में भाग लेने के लिए मुझे स्वगीय राजेंद्र पाल सिंह कश्यप, वीरेशबल आदि को गांधीनगर गुजरात जाना था। कार्यक्रम काफी पहले से निर्धारित था। हम उसकी तैयारी में लगे थे । पता चला कि नजीबाबाद के साथी जितेंद्र जैन को पुलिस ने पकड़ा। थाने में बुरी तरह मारा- प‌ीटा। दरवाजे के किवाड़ में देकर उनकी उंगली कुचल दीं गई। प्लास से नाखून खींचे गए। पुलिस जितना कर सकती थी ,उनके साथ किया। जितेंद्र जैन जेल भेज दिए गए।

नजीबाबाद के साथी अपने साथ मुझे भी जितेंद्र जैन से मिलने जेल ले गए। जितेंद्र जैन की हालत देखकर सबको बहुत गुस्सा आया। उन्होंने आप बीती भी सुनाई। यह बात मैंने वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय राजेंद्र पाल सिंह कश्पय को बताई। उन्होंने कहा कि हमें कल निकलना है। मैंने कहा निकलना तो शाम को है। बड़ी ज्यादती हुई है। कल दिन में प्रदर्शन कर लेते है्ं। वहीं से मैंने श्री बाबूसिंह चौहान साहब से बात की। चौहान साहब ने कहा कि वे भी जेल मेंं जितेंद्र जैन से मिलकर आए हैं। वास्तव में उसके साथ बहुत ही ज्यादती हुई है। बात चीत हुई।सहमति बनी की ज्यादती हुई है। आवाज उठाई जाए।अगले दिन 11 बजे प्रदर्शन करना तै हुआ। यह भी बात हो गई कि प्रदर्शन होगा, यह खबर सुबह के सब अखबारों में छप जाए।

बिजनौर के पत्रकारों में भी अन्य जगह की तरह धड़े बदी है। ,खेमें हैं। इसके बावजूद यह भी सत्य है कि पत्रकारों के विरुद्ध होने वाली ज्यादती पर एक साथ खड़े हो जाते हैं।

उस समय डा कश्मीर सिंह एसपी थे। नजीबाबाद में सत्तार नाम एक बदमाश था। उसके आंतक से सब परेशान थे। उसने जाब्ता गंज के सतीश की निर्ममता पूर्वक हत्या कर दी थी। उसके परिवार जन सत्तार की गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे।पोस्टमार्ट के बाद सतीश का शव नजीबाबाद आया। उसे जाब्तागंज जाना था किंतु लोगों ने घोषणा कर दी कि उसका अंतिम संस्कार कल्लू गंज में किया जाएगा। कल्लू गजं में शव जमीन पर रखकर ।अग्नि देने की प्रकिया चल रही थी कि एसडीएम और क्षेत्राध‌िकारी मौके पर पंहुच गए। शव कब्जे में लेकर भीड़ को भगा दिया गया। बताया जाता कि अधिकारियों ने इस मामले में नजीबाबाद के पत्रकारों से बात की थी।कहा था कि इस प्रकरण में पत्रकार जितेंद्र जैन की भूमिका संदिग्ध है। हो सकता है कि प्रशासन को लगा हो कि पत्रकार नहीं बोलेंगे । इसीलिए उसने जितेंद्र जैन के साथ बरबरता की।

अगले दिन समाचार छपा । 11 बजे पूरे जनपद से पत्रकार एकत्र हुए। प्रदर्शन हुआ।हमने कहा कि हम यूनियन के गुजराज सम्मेलन में जा रहे हैं। ये बात यहां उठाएंगे। हम रात में निकल गए।

बिजनौर में श्री बाबू सिंह चौहान रह गए। अधिकारी चौहान साहब का सम्मान करते ही थे। डरते भी थे। क्योंकि वे बड़े से बड़े प्रभाव के आगे दबते नहीं थे।

तत्कालीन एसपी डा कश्मीर सिंह अलग तरह के अधिकारी थे। उनके बिजनौर की मीडिया समेत समाज के सभी महत्वपूूर्ण लोगों से संबंध थे। हालत यह थी कि उनके तबादले पर जगह जगह विदाई कार्यक्रम हुए थे। शहर की दुकानों पर मिठाई नही बची थी।प्रदर्शन और चौहान साहब का रूआब जितेंद्र जैन को रिहा कराने में कामयाब आ गया। मामला खत्म हुआ।

छात्रवृति घोटाला

 छात्रवृति घोटाला

1993 में बिजनौर जनपद में हरिजन समाज कल्याण विभाग में घोटाला हुआ। यह लगभग 50 लाख रुपये का घोटाला था। दो वर्ष पूर्व अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए छात्र वृति देने की सरकार की योजना आई। इसमें व्यवस्था की गई थी कि छात्रवृति विद्यालय के खाते में जाएगी। इस व्यवस्था की कमी को बिजनौर समाज कल्याण विभाग के एक ल‌िपिक मोर्य ने पकड़ लिया। उसने जनपद के कुछ विद्यालय के प्रबधंक- प्रधानाचार्य के दोस्ती गांठी। उनसे कॉलेज के नाम से मिलते -जुलते नाम के खाते खुलवा लिए।विद्यालय को छात्रवृति न भेजकर विद्यालयों से मिलते -जुलते खातों में राशि डाल दी।

इस घोटाले का मुझे जून के आसपास पता चला। मैंने अमर उजाला में छापना शुरु किया। उस समय ओम सिह चौहान समाज कल्याण अधिकारी थे । वे दावा करते कि उनके यहां घोटाला हो ही नहीं सकता। सीडीओ सुंदर लाल मुयाल होते थे। उन्होंने हमारे समाचार देख तत्कालीन डीडीओ आरएस वर्मा को जांच सौंपी ।

इस प्रकरण लगभग आठ माह चला।प्रारंभिक जांच में 27 लाख का घोटाला मिला। 23 मार्च 1994 को समाज कल्याण अधिकारी ओम  सिंह चौहान  की गिरफ् तारी हुई।

समाज कल्याण विभाग में एक कर्मचारी होते थे मलिक। उनके पिता मेरे दोस्त होते थे।इस प्रकरण के चलने के दौरा एक दिन शाम को मलिक मेरे पास आए। अटैची उनके पास थी। वह बोले - छात्रवृति घोटाले के समाचार छापने बंद कर दें। अटैचीं में तीन लाख रुपये हैं। इन्हें रख लें। मैंने कहा - मलिक तुझे यह भी ख्याल नहीं आया कि तेरे वालिद मेरे दोस्त होतें हैं । वह बहुत शर्मीदा हुआ। अटैची लेकर वापस चला गया।

इसके बाद केस शुरु हो गया। एक दिन एक वकील साथी दफ्तर आए। बोले - समाज कल्याण का बाबू जगन लाल मोर्य को लेकर आऊंगा।वे चाहतां  है कि आप उन्हें लिखकर दे दें। इस घोटाले की जानकारी मैने मोर्य ने दी। इसके बाद आपने छापी। जो आपकी बात हो, उसमें से पांच हजार रुपये मुझे देने हैं।

वे बाद में मोर्य को लेकर आए। मोर्य को उम्मीद थी कि अमर उजाला से लिखकर  मिल जाने पर तू बच जाएगा। मैंने कहा कि लिखकर दे दूंगा। बीस लाख लूूंगा। मैं जानता था कि वह नहीं देगा। मैंने कहा मोर्य बाबू वह भूल गए, जब मैने तीन लाख लौटा दिए थे। तुमने कैसे सोच लिया कि मैं लिखकर दे दूंग?। मोर्य को तो उतना बुरा नहीं लगा, जितना मित्र महोदय को लगा। क्योंक‌ि मुफ्त में मिल रह पांच हजार रुपये का उनका नुकसान हो गया। 

Thursday, August 6, 2020

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -8

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -7
एक नेक्सलाइड के साथ बाढ़ में एक दिनआज देश के कई भाग में नेक्सलाइड का जोर है। सुरक्षा दलों पर ये घात लगाकर हमला करते रहें हैं। इस माहौल में सन् 84 के आसपास का एक नक्सली नेता के साथ बाढ़ में एक दिन बिताने का संस्मरण याद आ रहा है।
कॉलेज के समय से मैं मार्क्सवादी कम्युनिष्ट आंदोलन से जुड़ गया था। इसी दौरान वामपंथी आंदोलन की अलग -अलग विचारधाराओं से परिचय हुआ।कुछ समय शिक्षण कर पूर्णकालिक पत्रकारिता से जुड़ गया। लगभग 45 साल पूर्व अमर उजाला से जुड़ा। 80 के आसपास मैं घर  से समाचार भेजता था। घर ही एक तरह से मेरा कार्यालय था।
एक दिन कुर्ता पायजामा पहने कंधे पर थैला लटकाए एक साहब घर आए। उन्होंने अशोक कुमार के रुप में अपना परिचय दिया। अपने को सीपीआईएमएल की प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बताया। सीपीआईएमएल भारत की कम्युनिष्ट पार्टी मार्क्सवादी लेलिनवादी है।इसके कई भाग हो गए। अधिकतर सत्ता प्राप्त‌ि के लिए सशस्त्र  आंदोलन के रास्ते पर निकल गए। इन्हे की नेक्सलाईड कहा गया ।   अपने घर पर एक नेक्सलाईड को देख कर अचकचा गया। लगा कि इसके बैग में हैंड ग्रेनेट या स्टेनगन हो सकती है। मेरे दिमाग में नेक्सलाइड की यही छवि थी। खैर कुछ देर मुझे सामान्य होने में लगे। अशोक से बातचीत हुई। वह मेरे ही जनपद के रानीपुर गांव के रहने वाले हैं। बाद में उससे अच्छी दोस्ती हो गई। वह यदा - कदा आने लगे। अशोक मंडावर के गंगा खादर क्षेत्र में अपना संगठन बना रहा थे। इसी दौरान गंगा में बाढ़ आ गई। गंगा बहुत तबाही कर रही थीं। अशोक ने कहा कि गंगा बहुत तबाही कर रही है। चलो बाढ़ घुमाता हूं।
मुझे बाढ़ में जाने का कोई अनुभव नहीं था। तै हो गया कि अगले दिन सबेरे सात बजे मंडावर बस स्टैंड पर मिलेंगे। मुझे ध्यान नहीं था,कि अगले दिन तीज का पर्व है। बाढ का भी कोई  अनुभव नही था। ये ही दिमाग में भी कि गंगा किनारे जांऊगा। एक डेढ़ घंटे में देखकर लौट आउंगा।पत्नी निर्मल से नौ बजे तक आने को मैं कहकर कैमरा लेकर घर से निकल गया। अशोक मुझे मंडावर मिले। उसके साथ बैलगाड़़ी में बैठकर गंगा के किनारे बसे गांव डैबलगढ़ पहुंच गया। यह गांव अंग्रेज कलेक्टर डैबल द्वारा बसाया गया ब्रिटीशकालीन गांव हैं।
यहां नाश्ताकर हम नाव से बाढ़ देखने चल दिए। गंगा का जल पूरे उफान पर था। बड़े -बडे़ पेड़ पहाड़ों से बहकर आ रहे थे। गंगा की धार की जोरदार आवाज से ही डर लग रहा था। मुझे तैरना नहीं आता ।एक बार ज्योतिषी ने कहा था कि पानी से बचना। पानी में ले जाने वाले को अपना दुश्मन मानना। पानी में किसी के साथ नहीं जाना। गंगा की तेज उठती पटारों को देखकर मुझे डर लग रहा था। ऐसे में ज्योतिषी की बताई इस बात के याद आने पर मेरा डर और बढ़ गया। नाव में अशोक उनकी पार्टी का स्टेट सेकेट्री और लगभग एक दर्जन गांव वाले सवार थे। नाव खेवकों को गंगा की धार को पार करना था। अतः वे नाव को खींचकर धार से ऊपर की साइड में ले गए। ऐसी जगह देखकर क‌ि जहां से नाव पानी में बह कर दूसरी साइड में सही जगह जाकर लगे।
उन्होंने नाव धार में डाल दी। वे तेजी से चप्पू चलाकर नाव को दूसरी साइड में ले जाने की कोशिश कर रहे थे। नाव के दोंनो किनारों के बीच में बीच में छेद करके मोटे रस्से बांधे गए थे। इन रस्सों में चप्पू फंसे थे। खेवक इन्हीं रस्सों में चप्पू चलाकर नाव नियंत्रित कर रहे थे।नाव धार के बीच पहुंची थी कि चप्पू को रोकने वाली दांई एक साइड की रस्सी टूट गईं। चप्पू के रस्सी के फंदे से बाहर होते ही नाव दूसरी साइड को वह चली। नाविकों का कंट्रोल नाव से खत्म हो गया।नाव में बैठे एक युवक ने टूटी रस्सी को चप्पू के चारों ओर घुमाया ।छेद में टूटा सिरा निकाला और उसे कसकर पकड़कर बैठ गया। उसने ये काम बहुत जल्दी किया। खेवक ने तेजी से चप्पू चलाना प्रारंभ कर दिया । नाव संभल गई। अपने गंतव्य की ओर चलने लगी। यहां से हम गंगा के बीच के गांव खैरपुर ,खादर ,लाडपुर लतीफपुर और इन्छावाला आदि गांव पहुंचे। यहां के रहने वालों ने गंगा की बाढ़ को देख अपने - अपने परिवार मुजफ्फर नगर जनपद के शुक्रताल नामक स्थान पर पहुंचा दिए थे। शुक्रताल प्रसि़द्ध धार्मिक स्थल हैं। यहां बहुत सारी धर्मशालाएं हैं। इनमें इनके परिवार रुके थे।इन गांव से शुक्रताल  जाना सरल है। पानी को देखकर  किसानों ने   काफी पशु खोलकर आजाद कर  दिए  । ताकि वह बहकर अपनी जान बचा लें।कुछ पशु थे तो वह घुटनों तक पानी में खडे़ थे। हालाकि ग्राम वालों ने गांव और घरों के बाहर के किनारे मिट् टी और पत्थर लगाकर पानी रोकने के लिए उपाए किए थे फिर भी घरों में दो फुट तक पानी भरा था। बुग्गी के उपर चूल्हे रखकर खाना बनाने की व्यवस्था की हुई थी। प्रत्येक घर  का एक दो पुरुष सदस्य गांव में रूका था।लोगों से बात कर फोटो खींच हम यहां से लौट लिए।पानी में जौंक थी। ये आसपास के खेतों के किनारे की छोटी -छोटी झाड़ियों पर बैठी थीं। तिड़क कर नाव में आ जाती थीं। मुझे इनसे बचाने को नाव के बीच में पटरे पर बैठाया हुआ था । इसके बावजूद डर लग रहा था। जौंक एक छोटा कीड़ा होता है। यह आदमी और पशु के शरीर पर लगकर उसका खून चूंसता हैं। छोटा सा यह कीट खून पीकर काफी बड़ा हो जाता है। नाम में सवार एक दो गांव वालों को यह लगी। उन्होंने जोक को पकड़ा ।खींचकर छुडाया । पानी में फेंक दिया। खींचने में जौंक लगने की जगह से खून भी निकलने लगा।
हमें शाम हो गई थी किंतु नाव नदी में लाने के लिए स्थान नहीं मिल रहा था। नदी में उसी स्थल पर नाव डाली जाती हैं, जहां नदी और खेत का स्तर बराबर होता है। यहां खेत नदी से काफी ऊंचाई पर था। ढांग ढूढते अंधेंरा हो गया। इस दौरान डाक मक्खी निकलने लगीं। यह बहुत खतरनाक काले- नील  रंग की मोटी मक्खी होती है। इसके काटने से बड़े पशु तक के शरीर से खून निकलने लगता हैं।डाक मक्खी और जोक के डर से मैं सहमा और सुकड़ा बैठा था। चांदनी रात थीं, ऐसे में नाव का सफर बहुत सुहाना और सुखद लग रहा था। पर गहरे पानी में डूबने ,जौंक और डाक मक्खी के काटने के डर ने सब कुछ गड़बड़ कर रखा था। घर की भी चिंता हो आई थी। सबेरे के नौ बजे तक आने को कह आया था । अब रात के आठ बजने को हैं। त्योहार का दिन होने के कारण पत्नी निर्मल परेशान, मेरे इंतजार में बिना खाए -पिए बैठीं होगी।रात नौ बजे हम गांव में आकर पड़े । जल्दी -जल्दी पेट भरा। घर की चिंता दी। मैने खाना खाकर गांव वालों से कहा कि मुझे मंडावर पंहुचा दें किसी ट्रक आदि से बिजनौर पंहुच जाऊंगा। उन्होंने मनाकर दिया । कहा -रास्ते में बदमाश लगते हैं। अब जाना ठीक नहीं। घर की चिंता में ढंग से नींद भी नहीं आई। इस समय फोन होते नहीं थे, जो घर सूचित किया जा सके।सबेरे जल्दी उठकर मंडावर से पहली बस पकड़कर  लगभग नो बजे बिजनौर पंहुचा। घर पर निर्मल का रोते बुरा हाल था।  । निर्मल ने  बताया कि वह अभी  कुलदीप सिंह के यहां गई थी। मेरे अमर उजाला के दूसरे साथी कुलदीप सिहं उस सयम मुहल्ले में ही कुछ दूर पर रहतें थे। उनसे एसपी को कहलवाया है। एसपी ने पूछा -किसके साथ गए है, तो कुलदीप सिंह बताया कि एक नेक्सलाइड अशोक है, उसके साथ है। एसपी होशियार सिंह बलवारिया थे। वे भी बहुत नाराज हुए।
आकर मैने एसपी को फोन किया। बलवारिया मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे। मैंने उन्हें बताया कि मैं आ गया हूं, वह बहुत नाराज हुए। कहा नेक्सलाईड के साथ जाना ठीक नहीं । अभी एनएसए की फाइल चल रही है। ये और उसमें शामिल हो जाएगा।कई दिन लगे निर्मल का गुस्सा शांत होने में । उनका गुस्सा इस बात को लेकर था,कि त्योहार के दिन क्यों गए। हमारा त्यौहार खराब हुआ। बनाया खाना भी बेकार रहा।
अशोक मधुप
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Wednesday, August 5, 2020

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -7

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -7
एक नेक्सलाइड के साथ बाढ़ में एक दिनआज देश के कई भाग में नेक्सलाइड का जोर है। सुरक्षा दलों पर ये घात लगाकर हमला करते रहें हैं। इस माहौल में सन् 84 के आसपास का एक नक्सली नेता के साथ बाढ़ में एक दिन बिताने का संस्मरण याद आ रहा है।
कॉलेज के समय से मैं मार्क्सवादी कम्युनिष्ट आंदोलन से जुड़ गया था। इसी दौरान वामपंथी आंदोलन की अलग -अलग विचारधाराओं से परिचय हुआ।कुछ समय शिक्षण कर पूर्णकालिक पत्रकारिता से जुड़ गया। लगभग 45 साल पूर्व अमर उजाला से जुड़ा। 80 के आसपास मैं घर  से समाचार भेजता था। घर ही एक तरह से मेरा कार्यालय था।
एक दिन कुर्ता पायजामा पहने कंधे पर थैला लटकाए एक साहब घर आए। उन्होंने अशोक कुमार के रुप में अपना परिचय दिया। अपने को सीपीआईएमएल की प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बताया। सीपीआईएमएल भारत की कम्युनिष्ट पार्टी मार्क्सवादी लेलिनवादी है।इसके कई भाग हो गए। अधिकतर सत्ता प्राप्त‌ि के लिए सशस्त्र  आंदोलन के रास्ते पर निकल गए। इन्हे की नेक्सलाईड कहा गया ।   अपने घर पर एक नेक्सलाईड को देख कर अचकचा गया। लगा कि इसके बैग में हैंड ग्रेनेट या स्टेनगन हो सकती है। मेरे दिमाग में नेक्सलाइड की यही छवि थी। खैर कुछ देर मुझे सामान्य होने में लगे। अशोक से बातचीत हुई। वह मेरे ही जनपद के रानीपुर गांव के रहने वाले हैं। बाद में उससे अच्छी दोस्ती हो गई। वह यदा - कदा आने लगे। अशोक मंडावर के गंगा खादर क्षेत्र में अपना संगठन बना रहा थे। इसी दौरान गंगा में बाढ़ आ गई। गंगा बहुत तबाही कर रही थीं। अशोक ने कहा कि गंगा बहुत तबाही कर रही है। चलो बाढ़ घुमाता हूं।
मुझे बाढ़ में जाने का कोई अनुभव नहीं था। तै हो गया कि अगले दिन सबेरे सात बजे मंडावर बस स्टैंड पर मिलेंगे। मुझे ध्यान नहीं था,कि अगले दिन तीज का पर्व है। बाढ का भी कोई  अनुभव नही था। ये ही दिमाग में भी कि गंगा किनारे जांऊगा। एक डेढ़ घंटे में देखकर लौट आउंगा।पत्नी निर्मल से नौ बजे तक आने को मैं कहकर कैमरा लेकर घर से निकल गया। अशोक मुझे मंडावर मिले। उसके साथ बैलगाड़़ी में बैठकर गंगा के किनारे बसे गांव डैबलगढ़ पहुंच गया। यह गांव अंग्रेज कलेक्टर डैबल द्वारा बसाया गया ब्रिटीशकालीन गांव हैं।
यहां नाश्ताकर हम नाव से बाढ़ देखने चल दिए। गंगा का जल पूरे उफान पर था। बड़े -बडे़ पेड़ पहाड़ों से बहकर आ रहे थे। गंगा की धार की जोरदार आवाज से ही डर लग रहा था। मुझे तैरना नहीं आता ।एक बार ज्योतिषी ने कहा था कि पानी से बचना। पानी में ले जाने वाले को अपना दुश्मन मानना। पानी में किसी के साथ नहीं जाना। गंगा की तेज उठती पटारों को देखकर मुझे डर लग रहा था। ऐसे में ज्योतिषी की बताई इस बात के याद आने पर मेरा डर और बढ़ गया। नाव में अशोक उनकी पार्टी का स्टेट सेकेट्री और लगभग एक दर्जन गांव वाले सवार थे। नाव खेवकों को गंगा की धार को पार करना था। अतः वे नाव को खींचकर धार से ऊपर की साइड में ले गए। ऐसी जगह देखकर क‌ि जहां से नाव पानी में बह कर दूसरी साइड में सही जगह जाकर लगे।
उन्होंने नाव धार में डाल दी। वे तेजी से चप्पू चलाकर नाव को दूसरी साइड में ले जाने की कोशिश कर रहे थे। नाव के दोंनो किनारों के बीच में बीच में छेद करके मोटे रस्से बांधे गए थे। इन रस्सों में चप्पू फंसे थे। खेवक इन्हीं रस्सों में चप्पू चलाकर नाव नियंत्रित कर रहे थे।नाव धार के बीच पहुंची थी कि चप्पू को रोकने वाली दांई एक साइड की रस्सी टूट गईं। चप्पू के रस्सी के फंदे से बाहर होते ही नाव दूसरी साइड को वह चली। नाविकों का कंट्रोल नाव से खत्म हो गया।नाव में बैठे एक युवक ने टूटी रस्सी को चप्पू के चारों ओर घुमाया ।छेद में टूटा सिरा निकाला और उसे कसकर पकड़कर बैठ गया। उसने ये काम बहुत जल्दी किया। खेवक ने तेजी से चप्पू चलाना प्रारंभ कर दिया । नाव संभल गई। अपने गंतव्य की ओर चलने लगी। यहां से हम गंगा के बीच के गांव खैरपुर ,खादर ,लाडपुर लतीफपुर और इन्छावाला आदि गांव पहुंचे। यहां के रहने वालों ने गंगा की बाढ़ को देख अपने - अपने परिवार मुजफ्फर नगर जनपद के शुक्रताल नामक स्थान पर पहुंचा दिए थे। शुक्रताल प्रसि़द्ध धार्मिक स्थल हैं। यहां बहुत सारी धर्मशालाएं हैं। इनमें इनके परिवार रुके थे।इन गांव से शुक्रताल  जाना सरल है। पानी को देखकर  किसानों ने   काफी पशु खोलकर आजाद कर  दिए  । ताकि वह बहकर अपनी जान बचा लें।कुछ पशु थे तो वह घुटनों तक पानी में खडे़ थे। हालाकि ग्राम वालों ने गांव और घरों के बाहर के किनारे मिट् टी और पत्थर लगाकर पानी रोकने के लिए उपाए किए थे फिर भी घरों में दो फुट तक पानी भरा था। बुग्गी के उपर चूल्हे रखकर खाना बनाने की व्यवस्था की हुई थी। प्रत्येक घर  का एक दो पुरुष सदस्य गांव में रूका था।लोगों से बात कर फोटो खींच हम यहां से लौट लिए।पानी में जौंक थी। ये आसपास के खेतों के किनारे की छोटी -छोटी झाड़ियों पर बैठी थीं। तिड़क कर नाव में आ जाती थीं। मुझे इनसे बचाने को नाव के बीच में पटरे पर बैठाया हुआ था । इसके बावजूद डर लग रहा था। जौंक एक छोटा कीड़ा होता है। यह आदमी और पशु के शरीर पर लगकर उसका खून चूंसता हैं। छोटा सा यह कीट खून पीकर काफी बड़ा हो जाता है। नाम में सवार एक दो गांव वालों को यह लगी। उन्होंने जोक को पकड़ा ।खींचकर छुडाया । पानी में फेंक दिया। खींचने में जौंक लगने की जगह से खून भी निकलने लगा।
हमें शाम हो गई थी किंतु नाव नदी में लाने के लिए स्थान नहीं मिल रहा था। नदी में उसी स्थल पर नाव डाली जाती हैं, जहां नदी और खेत का स्तर बराबर होता है। यहां खेत नदी से काफी ऊंचाई पर था। ढांग ढूढते अंधेंरा हो गया। इस दौरान डाक मक्खी निकलने लगीं। यह बहुत खतरनाक काले- नील  रंग की मोटी मक्खी होती है। इसके काटने से बड़े पशु तक के शरीर से खून निकलने लगता हैं।डाक मक्खी और जोक के डर से मैं सहमा और सुकड़ा बैठा था। चांदनी रात थीं, ऐसे में नाव का सफर बहुत सुहाना और सुखद लग रहा था। पर गहरे पानी में डूबने ,जौंक और डाक मक्खी के काटने के डर ने सब कुछ गड़बड़ कर रखा था। घर की भी चिंता हो आई थी। सबेरे के नौ बजे तक आने को कह आया था । अब रात के आठ बजने को हैं। त्योहार का दिन होने के कारण पत्नी निर्मल परेशान, मेरे इंतजार में बिना खाए -पिए बैठीं होगी।रात नौ बजे हम गांव में आकर पड़े । जल्दी -जल्दी पेट भरा। घर की चिंता दी। मैने खाना खाकर गांव वालों से कहा कि मुझे मंडावर पंहुचा दें किसी ट्रक आदि से बिजनौर पंहुच जाऊंगा। उन्होंने मनाकर दिया । कहा -रास्ते में बदमाश लगते हैं। अब जाना ठीक नहीं। घर की चिंता में ढंग से नींद भी नहीं आई। इस समय फोन होते नहीं थे, जो घर सूचित किया जा सके।सबेरे जल्दी उठकर मंडावर से पहली बस पकड़कर  लगभग नो बजे बिजनौर पंहुचा। घर पर निर्मल का रोते बुरा हाल था।  । निर्मल ने  बताया कि वह अभी  कुलदीप सिंह के यहां गई थी। मेरे अमर उजाला के दूसरे साथी कुलदीप सिहं उस सयम मुहल्ले में ही कुछ दूर पर रहतें थे। उनसे एसपी को कहलवाया है। एसपी ने पूछा -किसके साथ गए है, तो कुलदीप सिंह बताया कि एक नेक्सलाइड अशोक है, उसके साथ है। एसपी होशियार सिंह बलवारिया थे। वे भी बहुत नाराज हुए।
आकर मैने एसपी को फोन किया। बलवारिया मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे। मैंने उन्हें बताया कि मैं आ गया हूं, वह बहुत नाराज हुए। कहा नेक्सलाईड के साथ जाना ठीक नहीं । अभी एनएसए की फाइल चल रही है। ये और उसमें शामिल हो जाएगा।कई दिन लगे निर्मल का गुस्सा शांत होने में । उनका गुस्सा इस बात को लेकर था,कि त्योहार के दिन क्यों गए। हमारा त्यौहार खराब हुआ। बनाया खाना भी बेकार रहा।
अशोक मधुप
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