Wednesday, June 10, 2026

समय के पास भी नहीं कुछ सवालों का जवाब

 

 समय के पास भी नहीं कुछ सवालों का जवाब

अशोक मधुप

कुछ सवाल हैं ।मनमें आतें  हैं।उत्तर नही मिलता।इन सवालों का  जवाब न  इतिहास के पास है।न समय के पास।न मेरे पास  न आपके पास।पर सवाल तों हैं।

 हिंदू मान्यताओं के अनुसार, दीपावली के दिन ही भगवान राम 14 वर्षों के वनवास के बाद अपनी पत्नी सीता, भाई लक्ष्मण और अपने उत्साही भक्त हनुमान के साथ अयोध्या लौटे थे। यह अमावस्या की रात थी। अमावस्या की रात होने के कारण  काफी अंधेरा होता है। इसी वजह से उस दिन पूरे अयोध्या को दीपों और फूलों से श्री रामचंद्र के लिए सजाया गया था । इसलिए   सजाया  गया था कि भगवान राम के आगमन में उन्हें कोई परेशानी न हो, तबसे लेकर आज तक इसे दीपों का त्योहार और अंधेरे पर प्रकाश की जीत के रूप में मनाया जाता है।कभी  अयोध्या में भगवान राम की विजय के बाद  आने पर दीप जले थे,  आज पूरी दुनिया के हिंदू परिवार में दीपावली पर दीप  जलते हैं। उत्तर भारत का तो दीपावली  मुख्य  पर्व  है।

रावण से युद्ध के दौरान भगवान राम ने  अंगद का अपना  दूत बनाकर रावण के पास भेजा  था। भगवान राम चाहते थे। युद्ध   न हो  और  रावण  वैसे  ही उसे सीता को  सौंप दे। अंगद ने  रावण के दरबार में जाकर अपनी  बात रख  दी। अहंकारी रावण  यह मानने  को तैयार नही था,कि राम   उससे  ज्यादा शक्तिशाली हैं। वह अपनी शक्ति  का बखान  करने में लगा था। तब अंगद रावण  को सच्चाई  बताते कहता  है - सिंधु तरो उनको बनरा, तुसपै धनुरेख गई न तरी। बाँध्यो इ बाँधत सो न बँध्यो उन बारिधि बाँधि कै बाट करी। अजहूँ रघुनाथ-प्रताप की बात तुम्हैं दसकंठ न जानि परी। तेलनि तूलनि पूँछि जरी (जड़ी हुई, युक्त) न जरी ,गढ़, लंक जराई जरी।

वह कहता है  कि  उनका  बंदर  समुद्र पार कर लंका आ गया, और  तू  है कि तुझसे धनुष की लकीर ही पार न की गई।तू अपने बल का बखान करता है,  तुझसे तो उनका  बंदर ही बांध कर  नही रखा गया। वे भगवान राम समुद्र को लांघकर श्री लंका के द्वार तक  आ पंहुचे। अंगद कहता  है कि दशकंध  तुझे अब भी भगवान राम के प्रताप की बात  समझ में नही आई। तेरा  तेल लगा, कपड़ा  लगा। इसके बावजूद हनुमान  की पूंछ नही जली। उसने  तेरी  लंका को   जलाकर खाक कर दिया।

अंगद बार – बार रावण को   समझाना  चाहता  है किंतु वह अपने  और अपने सेनापतियों की ताकत का बखान  करता  है।  विवश  हो अंगद उसे  सीख  देने के  लिए अपना  पांव   यह कहकर रावण के दरबार में जमा देता है कि चल मैं  तेरे शूरवीरों की परीक्षा लेता  हूं। घोषणा  करता  हूं कि यदि तेरा  कोई भी सेनापति मेरा   पांव  जमीन से हिला  देगा तो मैं  सीता को हार जांगा  और भगवान राम   वापस  लौट जाएंगे। 

इसके बाद बारी −बारी से रावण के दरबारी शूरवीर आते  हैं। अंगद के पांव पर  जोर लागतें  हैं, किंतु पांव हिला  भी   नही पाते। महाबलि मेघनाथ भी   पांव  हिलाने के प्रयास में सफल हो जाता  है। रावण  के आने पर  अंगद   पांव हटा लेता है।

 रावण की सेना में एक से  एक− एक बलि, दैविक शक्ति  से प्राप्त  वीर थे। वे  किसी कारण से  पांव नही हटा पाए, किंतु यदि कोई भी   अंगद के   पांव को   हिला  देता ,तो  क्या  होताॽ शर्त  हारने के बाद क्या अंगद   वापस भगवान राम के पास   जा पाता। भगवान राम ने तो  अंगद को कोई ऐसा आदेश दिया नही था। अंगद  ने  ही जोश  में  इस  तरह का निर्णय  लिया।  पराजित अंगद शर्म के कारण कहीं जा  छिपता ,  तो राम को  पता  भी  नही लगता  कि रावण  के दरबार में क्या  हुआ था। अंगद के   वापस     पहुंचने  पर राम और  अन्य मान लेते  कि हो  सकता है, गुस्से में रावण  ने  अंगद को   जान से मार दिया  होगा।

यदि किसी तरह शर्म और अपमान भूल अंगद  राम के पास  चला  जाता तो क्या  राम उसकी कही  बात मान   लेते।  उनका  तो   शर्त लगाने का  आदेश  था  नही,फिर  शर्त लगाना तो  अंगद की गलती थी, राम की नहीं।क्या वह सीता  को छोड़कर  वापस लौट जाते। लौटकर कहां जाते।क्या पत्नी को  गवांकर वे  अयोध्या   वापस   लौट पाते।क्या पत्नी गवांकर लौटने  पर उनका   वैसे  ही स्वागत  होता,  जैसे  लकां  विजेता होने  पर   उनका  हुआ है।   

विश्व के दो  महान युद्ध हुए। लगभग  सात   हजार साल पहले राम  और  रावण का युद्ध   हुआ। इसके बाद लगभग  पांच    हजार साल पहले  महाभारत हुआ।अंगद की तरह से भगवान कृष्ण भी हस्तिनापुर दरबार में सुलह का लगभग प्रस्ताव   लेकर गए थे।सुलह का कोई  रास्ता न  निकल  उन्होंने धृतराष्ट्र  से  कहा कि आधा शासन नही दे सकते  तो   पांच  गांव ही दे दें। इस पर दुर्योधन ने कहा था कि मैं सुईं  की नोक के बराबर भी भूमि नहीं दूंगा।यदि दुर्योधन पांच  गांव देने की बात स्वीकार कर लेता तो  क्या पांडव कृष्ण के इस प्रस्ताव   पर सहमत होते। क्योंकि उन्होंने तो कृष्ण  को आधा  राज लेने तक के प्रस्ताव पर  सहमति दी थी।ये सवाल  बार− बार मन में आते  हैं और अनुतरित  रह जाते  हैं।सवाल का  जवाब  तो समय ही देता।और अब तो  वह बहुत  आगे निकल गया।

दुनिया के दो महायुद्ध  हुए।  एक  राम −  रावण  युद्ध  दूसरा महा भारत। दोनों के काल में दो हजार साल के आसपास का  अंतर है किंतु दोनों की घटनाओं में काफी समानता  है।

रामायणकाल की मुख्य पात्र  सीता थी। वह मौन रहने वाली बहुत ही  सहनशील थीं। जबकि महाभारत काल की द्रोपदी  वाचाल थी।उसने अपने महल को  देखने  आए दुर्याधन को अंधे  का अंधा  कहकर आग में घी डालने का काम किया  था। सीता और द्रोपदी दोनों  ने बहुत सहन किया।अंतर यह है कि एक ने मौन रहकर और एक ने बोलते हुए सहन किया l दौपदी वाचाल है और सीता मौन हैं l द्रोपदी कृष्णा है सीता श्वेता है।द्रोपदी अग्नि से प्रकट हुई हैं इसलिए उनके व्यक्तित्व में अग्नि सी दाहकता है ।सीता में तितिक्षा है ।पृथ्वी की सहनशीलता और मौन रहकर सहन करना सीता का गुण है।

दोनों के लिए  स्वयंबर  हुए। भगवान राम को

स्वंयवर में  धनुष तोड़ना पड़ा। अर्जुन को बाण चढ़ाना मछली की आंख बेंधनी पड़ी।पिता के आदेश पर राम को  14 वर्ष के  लिए वनवास भोगना  पड़ा  और  जुए में हारने पर पांडव का 12 साल का  वनवास जाना   पड़ा।  11 साल के वनवास के साथ  एक साल का इसमें अज्ञात  वास भी शामिल था।

दोनों बार दूसरे पक्ष को समझाने के  लिए  शांति दूत भेजे  गए। दूत इस  तरह के व्यक्ति   चुने गए कि वह अपने व्यवहार से  अपने पक्ष  की शक्ति बताकर दूसरे पक्ष को नैतिक रूप से कमजोर कर सके।उनका  मौरल डाउन  कर सके। सीता की खोज में गए  हनुमान ने सीता  माता  को भगवान राम का संदेश देने के  बाद अपनी भूख  शांत करने के नाम पर अशोक वाटिका को  उजाड़  दिया।पकड़ने के लिए आए रावण के छोटे पुत्र  अक्षय कुमार को मार डाला।अक्षय कुमार की दरबार में पंहुची मौत की सूचना  पर मेघनाथ ने कहा  कि अक्षय  तो  मेरे बराबर बलशाली था। उसे कैसे  मारा  जा सकता  है।बाद में रावण के कहने पर मेघनाथ  बानर को पकडने  गए।  रावण ने आदेश दिया था कि  उत्पाती  बानर को  पकड़कर लाना।युद्ध हुआ। मेघनाथ  के ब्रह्मास्त्र  से  हनुमान बेहोश हो गए।  वह हनुमान को  बांध कर रावण के सामने ले  आया।

रावण अक्षय  कुमार के बद्ध से बहुत उत्तेजित था।   वह  हनुमान को  मारना  चाहता  था किंतु छोटे  भाई विभीक्षण ने रावण को सुझाया कि आप  नीतिवान है। नीति के अनुसार दूत  का वद्ध उचित नही, आप इसे कोई  दूसरा दंड  दे।  इस पर पूंछ जलाना तै  हुआ। हनुमान की पूंछ पर रूई, कपड़ा और  अन्य ज्वलनशील सामग्री बांध तेल डालकर आग लगा दी। पूंछ में आग लगते ही  हनुमान ने  बंधन  तोड़  डाले।लंका के भवनों पर चढ़ उन्हें  जलाना  शुरू कर दिया।इससे   लंका के राक्षस और रावण  के महाबलि में संदेश  गया कि जब एक बंदर इतनी बरबादी कर सकता है, तो  राम की पूरी सेना से  पार भी   पाना संभव न होगा।अंगद

द्वारा रावण  के दरबार में पांव  जमाना  भी   इसी तरह का  संदेश  देना था।रावण  के दरबार  का कोई  भी   सेनापति और वीर उनका  पांव  नही उठा पाया।महाबलि मेघनाथ भी   पांव उठाने के  प्रयास में  विफल  रहा। रावण के पांव उठाने के लिए आने पर अंगद ने  यह कहकर ही अपना  पांव पीछे कर लिया था कि मेरे पांव में  गिरने से कोई  लाभ  नही होगा, गिरना  है तो भगवान राम के पांव में जाकर गिरकर अपनी गलती के  लिए क्षमा मांगिए।

महाभारत में हस्तिनापुर दरबार में सुलह का प्रस्ताव लेकर गए कृष्ण  के सामने भी कुछ सा ही    हुआ।दुर्योधन के उत्तेजित  होने और कृष्ण के बंदी बनाने के  आदेश पर भगवान कृष्ण  को  अपना   विशाल रूप दिखाना पड़ा।

अशोक मधुप

(लेखक  वरिष्ठ पत्रकार हैं)

5678,9675899803

वृद्धावस्था अभिशाप भी है वरदान भी

 

वृद्धावस्था अभिशाप भी है वरदान भी। ये अपके जीने का तरीका है कि आप उसे अभिशाप समझतें हैं या वरदान।अभिशाप समझेंगे तो जल्दी चल देंगे।वरदान समझेंगे तो आनंद लेंगे। ज्यादा जीवन जिएंगे।वृद्धावस्था में भी युवा जैसा भोगेंगे ।

जिन्होंने रिटायर होते ही अपने का रिटायर मान लिया। उनकी कहानी जल्दी खत्म हो गई। जिंन्होंने नही माना, वह मस्त रहे।

बिजनौर के एक शायर हुए हैं शौक बिजनौरी।वह कलेक्ट्रेट में डीएम के पेशकार होते थे। सेवानिवृति पर उनके लिए  कलेक्ट्रेट में विदाई समारोह रखा  गया।उन्होंने कहा – आप विदाई पर जो मुझे  गले में जो पहना रहें हैं। उन्हें फूलों की माला कहना। गजरे कहना। हार मत कहना। मैंने नौकरी से   हार नही मानी । मैं  रिटायर नही हो रहा। नौकरी को रिटायर करके जा रहा हूं। मैंने 30 साल नौकरी की और देखना उससे ज्यादा समय पेंशन लूंगा।हुआ भी सा ही। वे लगभग 95 साल जिए। आखिरी  के समय में उन्हें कान से कुछ ऊंचा सुनाई देने  लगा था। घुटनों में दर्द था । मैंने उनसे कहा− कुछ दवा लीजिए।

उन्होंने जो कहा वह सुखद और आश्चर्य करने वाला है।उन्होंने कहा− 90  साल से ज्यादा उम्र हो गई ।आज तक इंजेक्शन नहीं लगवाया। कोई दवा नही खाई। अब किसलिएॽ किसके लिए ॽ

हां कुछ चीजे ध्यान रखने की है। बुढ़ापा आना है तो इसका खुद प्लान कीजिए। इसके लिए पहले से ही बजट बनाकर रखिये। उसी तरह निवेश कीजिए। इताना ज्यादा भी नहीं कि जवानी में बदहाल जीवन जिया जाए। एक परिवार के मुखिया ने अपने बच्चों से कहा कि  घर में छह माह का अनाज है। या तो शुरू के छह माह खालो । उसके बाद फाके रहना।  या शुरू के छह माह भूखे  रहो । बाद के छह माह खा लेना।

हमें न शुरू के छह माह भूखे  रहना है न बाद के । हमें थोड़ा कम खाकर ,  उसी में से बचाकर पूरे साल काम चलाना है।

दूसरी बात यह कि यह सोचकर जवानी में मस्ती मत मारिए कि  बुढ़ापे में बच्चे आपके लिए करेंगे। सोने के पालने में झुलाएंगे। वे

करेंगे। अपनी सामर्थ्य के हिसाब से खूब करेंगे। फिर भी आप बुढापे के लिए प्लान कीजिए । बचाइये। ये भी ध्यान रखिए कि बच्चों के भी अपने परिवार होंगे। उन्हें उसके लिए भी करना है।उनसे आपात्काल की मदद की सोचिए बस। प्रयास कीजिए कि किसी से मांगना न पड़े। भले ही वे आपके बच्चे हैं।

यह भी ध्यान रखिए कि जीते जी अपनी संपत्ति का बंटवारा मत कीजिए। अपना धन अपनी संपत्ति अपने पास रखिए। विश्व प्रसिद्ध रेमंड कंपनी   के स्वामी संपत्ति बांटकर आज परेशान हैं। बच्चे न उन्हें घर में घुंसने देते हैं, न फैक्ट्री में। हां वसीयत जरूर करके रखिए । बैंक खातों और कागजों में नाँमनी जरूर कराईए।अपने जीवन साथी के साथ दो नंबर पर अपने बच्चों  को  नाॐमनी करा सकतें हैं।

−जवानी में ही स्वास्थ्य बीमा जरूर लीजिए। आगे चलकर वह मंहगा  हो जाता है। अपने  को व्यस्त करिए। लीखिए , पढ़िए या किसी सामाजिक कार्य में लग  जाइये  ।खाली मत रहिए।खाली दिमाग शैतान का घर होता है।

इस दुनिया में आए हैं तो आपके कार्य निर्धारित हैं। उसके बाद चल देना है। भगवान राम राक्षसों के विनाश के लिए आए थे। राज करने के लिए नहीं। राज करने का समय आया तो मुनि जी बुलावा  लेकर आ गए । मुनि जी के बुलावा आने का  इंतजार  मत कीजिए। उनके आने से पहले किसी अच्छे  कार्य के लिए जीवन अर्पित

कर दीजिए। जो कीजिए निस्वार्थ भाव से कीजिए । लिप्सा , माया, मोह और पुरस्कार के लालच में मत रहिए।

अशोक मधुप       

गोवा घूमिए भी, यहां के मंदिर भी देखि

 

 गोवा का नाम सुनते ही सबसे पहले जेहन में नीले समंदर की लहरें, दूर तक फैले रेतीले समुद्र तट, पुर्तगाली वास्तुकला की झलक और देर रात तक चलने वाली पार्टियां उभर आती हैं। लेकिन इस आधुनिक और चकाचौंध से भरे राज्य के भीतर एक ऐसा शांत, आध्यात्मिक और प्राचीन संसार भी सांस लेता है, जिसकी चर्चा अक्सर उतनी नहीं होती, जितनी होनी चाहिए। गोवा केवल मौज-मस्ती का केंद्र नहीं है, बल्कि यह महान संतों, प्राचीन ऋषियों और अनगिनत राजवंशों की आध्यात्मिक भूमि भी रहा है। यहां के कोने-कोने में बसे प्राचीन मंदिर इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि तमाम विदेशी आक्रमणों, मजहबी अत्याचारों और औपनिवेशिक बदलावों के थपेड़े खाने के बावजूद इस राज्य ने अपनी सनातनी जड़ों को न केवल सुरक्षित रखा, बल्कि उन्हें और अधिक मजबूती से सींचा है। एक बात और इन भव्य मंदिरों  भीड़ न के बराबर है। सब कुछ शांत। न शोर । न शराबा। अधिकतर  मंदिरों में सात्विक भोजन की कैंटीन भी  है तो रहने के लिए प्रायः कक्ष भी हैं।

 आप गोवा घूमने आ रहे हैं, तो यहां के शानदार मंदिरों का दर्शन किए बिना आपकी यात्रा अधूरी मानी जाएगी।  चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी के बीच जब गोवा पर पुर्तगालियों का शासन स्थापित हुआ, तो उन्होंने व्यापक स्तर पर हिंदू धार्मिक स्थलों को नष्ट करने और बलात धर्म परिवर्तन कराने का अभियान चलाया। उस भयावह दौर में गोवा के मूल निवासी सारस्वत ब्राह्मणों और अन्य सनातनी समुदायों ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर अपने आराध्य देवी-देवताओं के विग्रहों (मूर्तियों) को पुर्तगाली नियंत्रण वाले क्षेत्रों (जैसे बारदेज, तिसवाड़ी और साल्सेट) से चुपचाप निकाला। वे इन मूर्तियों को लेकर नदियों को पार कर उन क्षेत्रों में चले गए जो उस समय मुस्लिम आदिलशाही या स्थानीय राजाओं के अधीन थे, जैसे कि पौंडा (अंतूज़ महाल)। यही कारण है कि आज गोवा के सबसे प्रसिद्ध और भव्य मंदिर आपको तटीय इलाकों के बजाय पोंडा के घने जंगलों, पहाड़ियों और प्राकृतिक वादियों के बीच स्थित मिलते हैं। पोंडा पणजी  से मात्र 28 किलोमीटर दूर है।

गोवा के मंदिरों की वास्तुकला पूरी दुनिया में अनूठी है, क्योंकि इसमें पारंपरिक हिंदू मंदिर निर्माण कला के साथ-साथ मुस्लिम (बीजापुरी) और पुर्तगाली स्थापत्य कला का एक अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है। यहां के मंदिरों की सबसे बड़ी विशेषता उनके परिसर में बने विशाल 'दीपस्तंभ' होते हैं, जो कई मंजिला ऊंचे होते हैं और त्योहारों के दिनों में जब इनमें सैकड़ों दीये जलाए जाते हैं, तो पूरा परिसर आलौकिक रोशनी से नहा उठता है। इसके अलावा, यहां के मंदिरों की गुंबददार छतें, लकड़ी पर की गई बारीक नक्काशी और पानी के सुंदर तालाब (टैंक) पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

गोवा का सबसे लोकप्रिय और भव्य मंदिर 'श्री मंगेशी मंदिर' है, जो फोंडा तालुका के प्रियोल गांव में स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव के एक रूप 'मंगेश' को समर्पित है, जिन्हें स्थानीय लोग मंगिरीश भी कहते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव ने माता पार्वती को डराने के लिए एक भयानक बाघ का रूप धारण किया था। भयभीत होकर माता पार्वती ने शिव जी को पुकारते हुए कहा था 'त्राहि माम् गिरीश' (हे पर्वतों के स्वामी, मेरी रक्षा करें)। इसी वाक्य के अपभ्रंश से 'मंगिरीश' और बाद में 'मंगेश' नाम पड़ा। यह मंदिर मूल रूप से जुआरी नदी के तट पर कुशस्थली (वर्तमान कोरटालिम) में स्थित था, लेकिन वर्ष 1560 में पुर्तगालियों के डर से भक्त इस शिवलिंग को गुप्त रूप से प्रियोल ले आए। इस मंदिर की महत्ता इतनी अधिक है कि यह हजारों सारस्वत ब्राह्मण परिवारों के कुलदेवता हैं और संगीत सम्राज्ञी लता मंगेशकर का परिवार भी इसी गांव और मंदिर से ताल्लुक रखता है। राजधानी पणजी से मंगेशी मंदिर की दूरी लगभग 21 किलोमीटर है।

मंगेशी मंदिर के बिल्कुल करीब, फोंडा के ही कवले गांव में स्थित है 'श्री शांतादुर्गा मंदिर', जो गोवा के सबसे पूजनीय स्थलों में से एक है। यह मंदिर देवी दुर्गा के एक शांत और सौम्य रूप को समर्पित है इन्हें स्थानीय भाषा में 'सांतेरी' कहा जाता है। मान्यता है कि जब भगवान शिव और भगवान विष्णु के बीच एक भयंकर और विनाशकारी युद्ध छिड़ गया था, तब ब्रह्मा जी के अनुरोध पर जगदम्बा ने बीच में आकर दोनों को शांत कराया था इसके बाद उन्हें 'शांतादुर्गा' नाम मिला। गर्भगृह में माता की मूर्ति के दोनों तरफ शिव और विष्णु की मूर्तियां स्थापित हैं, जो इस पौराणिक घटना को दर्शाती हैं। इस मंदिर का इतिहास भी स्थानांतरण से जुड़ा है मूल रूप से यह साल्सेट के कलोसिम में था, जिसे पुर्तगालियों ने नष्ट कर दिया । इसके बाद 18वीं शताब्दी में मराठा राजा शाहू महाराज के मंत्री रामचंद्र पंत ने इस भव्य मंदिर का पुनर्निर्माण कवले में करवाया। इस मंदिर की वास्तुकला में पुर्तगाली शैली की खिड़कियां और रोमन शैली के रंगीन कांच देखे जा सकते हैं। पणजी से इस मंदिर की दूरी करीब 30 किलोमीटर है।यदि आप भारत के इतिहास और सबसे प्राचीन वास्तुकला के दीवाने हैं, तो आपको 'ताम्बडी सुरला महादेव मंदिर' जरूर जाना चाहिए। यह गोवा का एकमात्र ऐसा मंदिर है जो पुर्तगालियों और उससे पहले के मुस्लिम आक्रमणकारियों से पूरी तरह सुरक्षित रहा, क्योंकि यह पश्चिमी घाट के घने और दुर्गम जंगलों के बीच छिपा हुआ था। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में यादव राजा रामचंद्र के मंत्री हेमाद्री द्वारा बारीक काले बेसाल्ट पत्थरों से कराया गया था। यह मंदिर पूरी तरह से कदम-यादव शैली (जैन वास्तुकला से प्रभावित) में बना है। इसके गर्भगृह में एक प्राकृतिक शिवलिंग स्थापित है और मंदिर के खंभों पर हाथियों, लताओं और देवी-देवताओं की अत्यंत सुंदर नक्काशी की गई है। सावन के महीने और महाशिवरात्रि पर यहां की छटा देखते ही बनती है मंदिर के पास बहने वाली सुरला नदी की कलकल आवाज इस जगह की आध्यात्मिकता को कई गुना बढ़ा देती है। पणजी से यह मंदिर लगभग 65 किलोमीटर दूर भगवान महावीर वन्यजीव अभयारण्य के अंदर स्थित है। घने जंगलों के बीच से गुजरने वाला यह रास्ता खुद में एक अद्भुत रोमांच है।

गोवा का एक और बेहद अनोखा मंदिर है 'श्री महालसा नारायणी मंदिर', जो पोंडा के मारडोल गांव में स्थित है। पूरे भारत में यह उन चुनिंदा मंदिरों में से एक है जहां भगवान विष्णु के स्त्री अवतार 'मोहिनी' की पूजा मुख्य देवी के रूप में की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब अमृत के लिए देवताओं और असुरों में विवाद हुआ, तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर असुरों को छला था और देवताओं को अमृतपान कराया था। यहां देवी महालसा की चार भुजाओं वाली मूर्ति है, जिनके पैरों के नीचे एक असुर दबा हुआ है। इस मंदिर के प्रांगण में गोवा का सबसे ऊंचा और सुंदर पीतल का दीपस्तंभ है इसमें 21 मंजिलें हैं और 150 से अधिक दीये एक साथ जलाए जा सकते हैं। इस मंदिर का इतिहास भी संघर्षपूर्ण रहा है, इसे नेरुल (बारदेज) से मारडोल स्थानांतरित किया गया था।

 उत्तरी गोवा के डिचोली (बिचोलिम) तालुका के नार्वे गांव में स्थित 'श्री सप्तकोटेश्वर मंदिर' का ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व बहुत गहरा है। भगवान शिव के अवतार सप्तकोटेश्वर कदम्ब राजवंश के मुख्य आराध्य देव थे। 14वीं शताब्दी में बहमनी सुल्तानों ने इस मंदिर को तहस-नहस कर दिया था इसे बाद में विजयनगर साम्राज्य के राजा हरिहरराय ने दोबारा बनवाया। लेकिन 1560 में पुर्तगालियों ने फिर से इस मंदिर को तोड़कर यहां एक चर्च खड़ा कर दिया। इसके बाद, मराठा साम्राज्य के छत्रपति शिवाजी महाराज ने वर्ष 1668 में इस क्षेत्र को पुर्तगालियों से मुक्त कराया । अपने आदेश पर सप्तकोटेश्वर मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर के प्रवेश द्वार पर शिवाजी महाराज के काल का एक शिलालेख आज भी मौजूद है।

पणजी शहर के भीतर ही एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित 'मारुति मंदिर' भी बेहद दर्शनीय है। अल्टिन्हो पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर भगवान हनुमान को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण पुर्तगाली शासन के अंतिम दिनों में बड़ी कठिनाइयों के बाद छिपकर किया गया था, क्योंकि उस समय सार्वजनिक रूप से हिंदू मंदिरों के निर्माण पर प्रतिबंध था। रात के समय जब इस मंदिर को आधुनिक लाइटों से सजाया जाता है, तो यह पणजी शहर के निचले हिस्सों से भी साफ चमकता हुआ दिखाई देता है। यहां से मांडवी नदी और पणजी शहर का विहंगम नजारा दिखता है।

 माशेल में स्थित 'देवकी कृष्ण मंदिर' पूरे भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान कृष्ण की पूजा उनकी माता देवकी के साथ की जाती है इसमें माता देवकी की गोद में बाल कृष्ण बैठे हुए हैं। वहीं सत्तरी तालुका के वालपोई में स्थित 'ब्रह्मा मंदिर' भारत के उन विरले मंदिरों में शामिल है जहां सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा की आदमकद मूर्ति स्थापित है। गोवा के ये सभी मंदिर सिर्फ पत्थरों और गारे की इमारतें नहीं हैं, बल्कि ये सदियों के दमन के खिलाफ सनातन आस्था की विजय के जीवंत स्मारक हैं।

 गोवा की अपनी अगली यात्रा की योजना बनाते समय  समंदर के किनारों की मौज-मस्ती, पब और क्रूज के साथ-साथ दो दिन इन ऐतिहासिक और आध्यात्मिक मंदिरों के लिए भी जरूर सुरक्षित रखें। इन मंदिरों की शांत परिक्रमा, ऊंचे दीपस्तंभों की भव्यता, प्राचीन तालाबों का शीतल जल और गर्भगृह से आती चंदन व कपूर की खुशबू आपके मन को एक ऐसी असीम शांति देगी जो आपको गोवा के किसी भी आधुनिक रिसॉर्ट में नहीं मिल सकती।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं)

 

 

मचछर और चाय का प्याला व्यंग

 

मच्छर र चाय का  प्याला

अशोक मधुप


 मच्छर। जी वो मच्छर हो था।सवेरे −सवेरे आया।फालतू में मूड़ ख़राब कर गया।मैंने उसे बुलाया तो था नहीं। खुद आया। मेरे कान पर नहीं गुनगुनाया।आने का कोई संकेत भी नहीं बताया।आकर मेरी चाय में गिर गया।पता नही नही चला, कब ये हो गया।सिप करने के लिये जब कप होंटो के पास गया,तब महाशय की उपस्थिति का अहसास हुआ।सवेरे में  उठकर मैं अपने और पत्नी के लिए रोज दो कप चाय बनाता हूँ। कुछ कड़क।बड़े कप में।पटियाला पेग के बराबर।पत्नी  सो रहीं थीं।उनका कप प्लेट से ढककर रख दिया।अपना कप हाथ में लेकर चाय सिप करने के लिए,कप के होठों के पास पहुंचते  अहसास हुआ कि आत्महत्या के इरादे से प्याले में मच्छर महाशय कूद गए।।मैंने उन्हें जल्दी से निकलने की बहुत कोशिश की।बचाने चाहे उसके प्राण।दिखानी चाही मानवता।पर प्रयास और कोशिश बेकार गई।गर्म चाय में डालने से उंगली र जल गई।बहुत झल्लाहट हो रही है।इसे डूबने कर लिए मेरा चाय का भरा कप ही मिला।कोई रास्ते में  नदी −तालाब नहीं मिला। कहीं  और डूब मरता । मेरी मेहनत से बनाई  चाय तो खराब न करता। सवेरे ही क्यों डूबा।  क्या जल्दी थी। दिन निकलने का  तो इंतजार करना था। इतनी जल्दी थी तो कहीं और जाकर मरना था।
जल्दी में मैने उसे चाय से निकाल कर फेंक दिया। कई   बार चाय पीने का इरादा किया। किंतु मन ने स्वीकार नहीं किया। आखिर मजबूर हो नाली में बहा दिया। जल्दी में यह भी तो नही देख पाया । वह नर था या मादा। विवाहित था या क्वारा।  धर्म  क्या था।  हिंदू , मुस्लिम , सिख इसाई, बौद्घ ,पारसी  या कोई  और। इसमें भी सवर्ण था, या पिछड़ा।अनुसूच‌ित जाति से तो नहीं था।  कुर्मी था या पासी। कौन था।  यादव तो नहीं था।यह भी पता नहीं चला कि वह अपनी ही जाति के लोगों का खून चूंसता था। या दूसरी  जाति के व्य‌क्त‌ियों का। सवर्ण था तो क्या सर्वहारा का खून चूंसता था। ऐसा तो  नही चुन− चुन कर पिछड़ों या दलितों को अपना शिकार बनाता रहा हो।
दलित था  तो क्या सवर्ण से नफरत करता था।  दलित के मुकाबले  ऊंची जाती वालों को  गहरा घाव कर खून चूंसता। अपनी जाती  को छोड़ देता। पर वह तो मच्छर रहा होगा।  साम्यवादी। उसे जाति धर्म से क्या? बस पेट भरने से मतलब। जो मिला । उसी का ही खून चूंस लिया।
एक नुकसान हो गया। मैं जल्दी में ज्यादा जानकारी भी नहीं कर पाया।  उसकी जान बचाने के चक्कर में यह भी नहीं देख सका कि वह टायलेट का मच्छर था या बाथ रूम का। बाथरूम का था तो आम  आदमी के या किसी रईस के बाथरूम का। सूंघ कर देखना चाहिए था। सुगंध  से पता चलता। उसमें बढ‌‌िया  सुगंध आ रही होती तो पता चलता कि किसी बड़े व्यक्ति के बाथरूम में चला बढ़ा है।  वैसे बड़े व्यक्ति के यहां तो मच्छर का होना ही मुश्किल है। यह तो गरीबों के घर या सार्वजनिक टायलेट में शान से पलतें और बढ़तें हैं।

एक बात अच्छी रही कि मर गया। अगर किसी मलेरिया, डेंगू के मरीज को काटकर आया होता । तब मुझे जरूर बीमार करता।किसी कोरोना के मरीज को छूकर  आया होता तो मुझे जरूर अस्पताल भिजवाता।अच्छा हुआ। चाय में डूब गया। उसके साथ उसमें जमा वैकटीरिया भी मर गए। अगर न मरता तो जाने कितनों को काटकर बीमार करता। देखकर लगा था कि काफी बड़ा था। शायद नौ जवान। लंबी टांगे । बड़े पंख। यह भी पता नहीं चला कि रात में किसके खून का आंनन्द लिया। किसी ‌महिला के खून का आनन्द लिया या युवती को किस ‌क‌िया। किसी युवक का खून चूंसा या बूढे का शिकार किया।


अशोक मधुप

 

 

चित्रलेखा

 

भगवती चरण वर्मा

जन्म 30 अगस्त 1903 मृत्यु पांच अक्तूबर 1981

 

 

भगवती चरण वर्मा का उपन्यास चित्रलेखा आज  पढ़कर समाप्त किया। दो  दिन से पढ़ रहा था। मनन कर रहा था। उपन्यास बहुत पसंद आया।

जवानी के दौर में भी कभी पढ़ा था पर उसकी ज्यादा स्मृति नहीं । कुछ −कुछ घटनाएं याद थी। घटनाक्रम नजर में था। जवानी में उपन्यास और साहित्य पढ़ने का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन था। मेरे किशोर्य कॉल और युवावस्था में न टीवी था न रेडियो। यदि था तो कुछ संपन्न परिवारों तक। पढ़ाई में ज्यादा रुचि न थी, खेल में रुचि न थी, तो क्या करते बस उपन्यास ,कविता कहानी जो मिलता उसी को पढ़ता। मेरी पीढ़ी जिसकी  रुचि स्कूल शिक्षा में  कम थी, खेल पसंद ना था, वह उपन्यास पढ़ती। मेरा भी शुरुआत से यही शगल रहा।

उस समय उपन्यास के प्रिय लेखक थे , गुलशन नंदा ,प्यारेलाल ,ओम प्रकाश शर्मा , इबने सफी, गुरू दत,आचार्य चतुरसेन,वेद प्रकाश कंबोज आदि आदि। मैं एक दिन में कई −कई उपन्यास पढ़ लेता।

उस दौर में मैंने राहुल सांस्कृतायन का  बोल्गा से गंगा उपन्यास पढ़ा। तो गुनाहों के देवता  का भी पठन किया। रूसी लेखक की गोर्की का प्रसिद्ध उपन्यास मां पढा, तो भगवती चरण वर्मा का चित्रलेखा। साकेत ,कामायनी, आसूं, प्रिय− प्रवास जाने क्या −क्या पढ़ा।

झालू में खाली समय में घरके पास छतरी वाले कुएं  पर सर्वेश की साइकिल की मरम्मत की दुकान थी।उसे भी उपन्यास पढ़ने को शौक था।वहकाम में लगा रहता । मैं  उनके थले पर बैठा उपन्यास पढ़ता रहता। बीए की पढ़ाई के दौरान पिता जैन फार्म बिजनौर में मुनीम हो गए। वर्धमान काँलेज के पास क्वार्टर मिल गया।जैन फार्म और वर्धमान काँलेज एक ही परिवार का था। गर्मियों के अवकाश में नाश्ताकर दस बजे के आसपास में काँलेज की लाइब्रेरी में चला जाता। वहां फर्श बहुत साफ होता था। कोई भी कविता ,कहानी , साहित्य की किताब लेकर फर्श पर लेटकर पढता रहता।पुस्तकालय में पंखे चलते रहते थे।गर्मियों में फर्श ठंडा होता। आराम से दो बजे तक पढ़ता , उसके बाद  खाना खाने आ जाता। खाना खाकर फिर लाइब्रेरी पहुंच जाता।   

 बहुत कुछ पढ़ा, जो भी स्मृति पटल से लुप्त हो गया है। स्लेट पर लिखा पुराना पड़ने पर धुंधला गया है। सा ही चित्रलेखा के साथ हुआ ।

गुरु रत्नाकर अपने दो शिष्यों को पाप क्याहै,का ज्ञान कराने के लिए दो व्यक्तियों के पास भेजते हैं। महा व्यसनी बीजगुप्त के पास श्वेतांक को भेजते हैं । महा तपस्वी  कुमार गिरी के पास विशाल देव को भेजते हैं। दोनों को एक-एक वर्ष उनके संसर्ग में रहना है। जानना है कि पाप क्या है?

एक वर्ष बाद वे दोनों गुरु रत्नाककर के पास लौटते हैं। श्वेतांक महव्यसनी बीजगुप्त को देवता और त्याग की प्रतिमूर्ति बताता है। कुमार गिरी को पशु कहता है। कहता है कि कुमार गिरी अपने लिए जीता है। संसार में उसका जीवन व्यर्थ है । वे अपने जीवन के नियमों के प्रतिकूल  चल रहा है। अपने सुख के लिए उसने संसार की बाधाओं से मुंह मोड़ लिया है। कुमार गिरी पापी है।

विशाल देव के पास रहा दूसरा शिष्य कुमार गिरी की प्रशंसा करता है। कहता है कि योगी कुमार गिरी अजित हैं। उन्होंने ममत्व   को वशीभूत कर लिया है। वे संसार से बहुत ऊपर उठ चुकी है। उसकी राय में बीजगुप्त वासना का दास है । उसका जीवन संसार के भोग विलास में है। वह पापी है। वह पापमय संसार  का वह मुख्य मार्गी  है।

रत्नागिरी निष्कर्ष निकालते हैं । वे कहते हैं तुम दोंनों विभिन्न परिस्थिति में रहे । इसलिए  दोनों की पाप की धारणाएं भी भिन्न-भिन्न है। संसार में पाप कुछ भी नहीं है । केवल मनुष्य की दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है। प्रत्येक व्यक्ति एक विशेष प्रकार की मन प्रवृत्ति लेकर पैदा होता है। प्रत्येक व्यक्ति इस संसार के रंगमंच पर अभिनय करने के लिए आता है। अपनी मन प्रवृत्ति से प्रेरित होकर अपने पाठ को दोहराता है। यही मनुष्य का जीवन है। वह अपने स्वभाव के अनुकूल कार्य करता है। स्वभाव प्रकृति है। मनुष्य  अपना स्वामी नहीं है। वह प्रकृति का दास है। बिवश है। वह करता नहीं है। वह केवल साधन है। फिर पुण्य और पाप कैसा? हमें ममत्व प्रधान है। प्रत्येक मनुष्य सुख चाहता है। केवल व्यक्ति के सुख के केंद्र भिन्न है। कुछ सुख को मदिरा में देखते  हैं। कुछ उसको व्यभिचार में देखते हैं। कुछ त्याग में देखते हैं।पर सुख सब चाहते हैं। कोई व्यक्ति संसार में वह काम नहीं करेगा, जिससे उसे दुख मिले। यही मनुषय की मनप्रवृत्ति है । यही उसके   दृष्टिकोण से विषमता है।

रत्नागिरी कहते हैं कि संसार में इसीलिए पाप की परिभाषा नहीं हो सकती। हम न पाप करते हैं, न पूण्य करते हैं,  हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है।

अशोक मधुप