Monday, November 9, 2015

फौलाद का पेट


 क्या फौलाद का पेट संभव है?  आप कहेंगे नहीं,मैं  कहूंगा हां।एक आदमी का नहीं आज सभी भारतीयों का पेट फौलाद का है। 
 आज देश में सपंन्नता है। प्रायः सभी तरह का अनाज उपलब्ध है।कभी गेंहू अमेरिका से आता था , आज सारे देश में गेंहू उगता है। लगभग सभी देशवासी गेंहू की रोटी खाते हैं।
साढ -सत्तर के दशक में ऐसा नहीं था । खेती के साधन नहीं थे। बिजली नहीं थी। फसले प्रकृति पर निर्भर थीं।  बारिश पड़ जाती तो फसल हो जाती, न पड़ती तो रूखाः सूखा खाकर जीवन जीना पड़ता। प्रायः अनाज में बाजरा, जौ, चना आदि की रोटी बनती।  मक्का उत्पादित क्षेत्र में मक्का से रोटी बनती। गेंहू तो किसी बहुत संपन्न परिवार में खाया जाता। गेंहू बहुत मंहगा  होता। मोटा अनाज सस्ता। इसीलिए सब प्रायः मोटा अनाज ही खाते।
अमेरिका से आया लाल गेंहू राशन में मिलता। गरीब परिवार इसे राशन में लेकर खुले बाजार में बेच देते। इस घटिया गेंहू के भी अच्छे पैसे मिल जाता। उस समय राशन का गेंहू भी आय का साधन था। राशन में चीनी लेकर बाजार में बेच दी जाती।  सभी प्रायः गुड़  खाते । ज्यादातर परिवार में चाय भी गुड़ की बनती।
गेंहू के बारे में बुजुर्ग कहते  -गेंहू को पचाने के लिए फौलाद का पेट चाहिए। इसे पचाना आसान नहीं।मेरे बाबा हकीम राम किशन लाल तो इस कहावत को बार- बार दुहराते थे। 
वक्त बीतता गया। कब गेंहू आम आदमी को  उपलब्ध हो गया , पता ही  नहीं चला। कब सब भारत वासियों के पेट फौलाद के हो गए  इसका ज्ञान ही नही हुआ। आज पुराने बुजुर्ग होते और सबकों गेंहू खाते देखते तो अचंभा करते।
साढ सततर के दशक और अब के खान -पान में कितना फर्क  हो गया। यह मेरी पीढ़ी के व्यक्त‌ि ही समझ सकतें हैं?   उस समय के आम आदमी के खाने वाला अनाज आज संपन्न परिवार में टैक्ट चैंज करने के काम आता है।शादी - विवाह के समारोह में चने ,मक्का , बाजरे की रोटी जायके के लिए खाई  जाती है।  होटलों में खाना खाते प्रायः बेसन की रोटी की ‌ड‌िमांड जरूर होती है।
हमारे समय के लकड़ी को रांध कर चिकना बनाने वाले रंधे से  सिल्ली से बर्फ घिसकर अलग किया जाता था। इस बर्फ पर रंग- बिरंगा शर्बत डालकर बर्फ बेचने  वाला देता और हम उसे बड़े चाव से खाते। तिलली पर दूध को जमाकर बनाई  चुसकी गली कूंचों की शान थी।  दुपहर में इन्हें बेचने वाला आता। आवाज लगाता।बच्चे बर्फ लेने  दौड पड़ते। आज यह ‌डंडी पर ‌घ‌िसकर  चिपकाया बर्फ  और चुसकी  बड़े लोगों की दावतों की शान बन गईं।
एक बात और खरीदने वाले सब पैसे ही लेकर नही जाते थे।  इस समय वस्तु विनिमय का भी समय था। जिनके पास रुपये पैसे नहीं होते,वे अपने कमीज के अगले पल्ले में अनाज भरकर ले जाते और उसके बदले जरूरत का सामान ले आते। आज भी कहीं- कहीं गांव में ऐसा चलन है।
बात थी फौलाद के पेट की।गेंहू पचाने के लिए फौलाद का पेट चा‌ह‌िए की कभी कहावत थी । वक्त ने उसे बदल दिया। आज सभी के पेट फौलाद के हो गए।
अशोक मधुप

Sunday, November 8, 2015

दीपावली और कंदील


दीपावली का एक महत्वपूर्ण  भाग कंदील या कंडील  अब दीपावली से गायब हो गया। दीपावली पर कंदील बनाने का काम कई  सप्ताह पूर्व से शुरूकर दिया जाता था।
बासं की खप्पच बनाई  जातीं।  इनसे कंदील का ढांचा बनता। इस ढाचें पर रंग ‌ब‌िंरगी पन्नी लगाई जाती। कंदील इस तरह बनाया जाता कि उसमें आराम से बड़ा दीपक रखा जा सकता। 
कंदील बनाने से बड़ा काम होता  उसे टांगना। कई  बांस जोड़कर उसपर कंदील टांगने  की व्यवस्था की जाती। बांसं के ऊपर एक लंबी लकड़ी इस प्रकर लगाई जाती कि कंडील उतारते चढ़ाते बांस से न टकरांए। कंदील को उतारने -चढाने के लिए बांस के ऊपर लगी लकड़ी में गिररी लगाई  जाती। कंदील में दीप चलाकर धीरे- धीरे रस्सी के सहारे उसे ऊपर सरकाया जाता। ये ध्यान रखा जाता कि वह कम से कम हिले। जितना ज्यादा हिलता, कंडील के दीपक से उतना ही तेल ज्यादा गिरता। ज्यादा तेल गिरने दीपक जल्दी बुझ जाता। बाद में दीपक की जगह बिजली के वल्ब न ले ली। 
एक चीज और प्रत्येक व्यक्ति का प्रयास होता कि उसका कंदील ज्यादा ऊंचा हो।  इसके लिए कई बार कंप्टीशन हो जाता। कुछ जगह तो  ऊचाई बढ़ाने के लिए लोहे के पाइप और बल्ली तक प्रयोग जाती
कंदील भी कई तरह  के हो ते। गोल, हांडी जैसे तो कुछ नाव की तरह के कुछ कई कोणीय कंडील होते। दीपावली की रात अमावस की रात होती है।  आकाश में जलते ये दीप बहुत सुंदर लगते। ऐसा लगता कि आकाश में रंग बिरंगे तारे चमक रहे हों।  दीपावली से कई  दिन पहले से कंडील जलने  शुरू हो जाते और कई दिन बाद तक जलते रहते।
दीपावली के बाद इन कंदील को कपड़े में इस तरह लपेटकर रखा जाता कि वह अगले साल तक सुरक्षित रहे।
कंदील की पन्नी फट जाती तो अगले साल बदल दी जाती। उसका् ढांचा तो कई  साल तक चलता रहता।

दीपावली और गिफ्ट


 दीपावली पर अब गिफ्ट का चलन है।ग‌िफ्ट में मिठाई , फ्रूट्स्र, मेवे और जाने क्या? क्या? होता है। काम निकलने के लिए अ‌ध‌िकारी और नेताओं को प्रसन्न करने वाले गिफ्ट अलग होतें हैं।याद आता है पचास -पचपन साल पहले का जमाना।उस समय इस तरह की मिठाई बहुत कम होती थी। खांड की बनी मिठाई  होती थी। खांड एक तरह की  पिसी चीनी जैसी होती। इस खांड से  मिठाई बनती। इसे पक्की मिठाई  कहा जाता था। ये खांड के क्यूब होते थे । दीपावली की मशहूर मिठाई थी तो खांड के बने ख‌िलौ्ने। खांड के बने  हाथी, ऊंट,घोड़े।धान की खील के सा‌थ ये ही खाने को मिलते थे।खील और खिलौने की मिलने वालों के यहां भेजे जाते। उनके यहां से भी यही आते । मावे की मिठाई तो घर में दीपावली या किसी महत्वपूर्ण  अवसर पर आती। कुछ घरों में अब भी दीपावली पर ये खिलोने आते है किंतु नाम मात्र को।
दावतों में मिठाई की जगह  बूंदी के लड़्डू होते थे। दावत में जाने वाले अपने साथ रूमाल लेकर जाते। बड़ों को चार और बच्चों को दो लड्डू मिलते। आधे लड्डू खा लेते । आधे रूमाल में बांध कर घर ले आते। घर पर रहे परिवार के सदस्यों के खाने के लिए ये लड्डू लाए जाते थे। अधिकतर दावत - शादी- विवाद में ये बूंदी के ही लड्डू होते। कोई बहुत बड़ा संपन्न व्यक्त‌ि  होता तो उसके यहां कागज की प्लेट में पांच मिठाई होती। इमरती पेड़ा , मावे का लड्ड़ू,गुलाब जामुन आदि। अन्यथा एक ही मिठाई  उस समय थी बूंदी के लड़डू।

Saturday, November 7, 2015

बात दीपावली की करिए

  बात दीपावली की करिए
बात  असहिष्णुता की है। मौसम दीपावली का। इस मौसम में ये अच्छा नहीं लगता।
- ये तो रोशनी का पर्व  है। प्रकाश का पर्व  है। बात प्रकाश की होनी चाह‌िए।
- बात शमा की होनी चाह‌िए। उसपर फिदा होने वाले परवाने की होनी चाहिए।
-दीपावली पर दीपक की बात होनी चाहिए। मिठाई की बात होनी चाहिए।
- विकास समय का चक्र है। चलता रहता है ।  चलना   भी चाहिए। विकास गंगा जब बहेगी तो गंगोत्री से निकलेगी। पृथ्वी को  हरा भरा करेगी। शस्य श्यामला करती समुद्र  तक पंहुच जाएगी। ये ही तो यात्रा है। इस यात्रा में हमने इस पति‌त पावनी को पति‌त कर दिया।
-गंगा हमारे पाप धोती थी हमने कूड़ा करकट गंदगी डालकर इसे अपने कार्य ये विमुख कर दिया।उसे इस जगह पंहुचा दिया कि अब इसकी सफाई की जंग लड़नी पड़ रही है।
- बात दीपावली की थी। दीपावली पर हमने घरों को सुंदर -सुुदर पेंट से रंगना शुरू कर दिया।पहले हम पिडोल से घर की पुताई करते थे। आगन में गोबर से गोबरी होती थी। इनकी भीनी भीनी सुंगध को महसूस किया जा सकता है। बताया नहीं जा सकता।
अब  रंगब‌िंरगी झालरों से  घर को  रोशन करने का सिलसिला चल पड़ा। अपने घर को प्रकाशवान करने का । अपनी सपंन्नता दिखाने का। विकास चक्र में बिजली की झालर में हमने दीपक  को भुला दिया।
-पहले ऐसा नही था। दीपावली अलग तरह का पर्व  होता था।  दीपावली पूजन के बाद दीपों  की पूजा  की जाती थी। इन दीपों को  मंदिर ,जलस्त्रोत और रास्तों पर रखा जाता था। अन्य व्यक‌्त‌‌ियों की सुव‌िधा  के लिए, आराम के लिए।
-एक बड़ा  काम और होता था। अपने घर को प्रकाशित करने से पूर्व  आसपास वालों और पर‌िचितों के द्वार के  दोनों किनारों पर दीप रख्रकर उनकी समृद्ध‌ि की कामना की जाती थी। मनोत‌ि  मांगते कि हमारी तरह इनका घर भी प्रकाशवान हो। आसपास में घरों के द्वार पर दीप रखने का कार्य प्रायः परिवार की कन्याएं करती थी। इस कार्य के बाद अपने घर में प्रकाश होता था। दीप जलाए जाते थे।
&कुछ जगह ये काम अब भी होता है। गांव अब भी एक परिवार है। वहां ये सिलसिला आज भी जारी है ।
- शहरों में आज  हम अपने घर में प्रकाश करने में लगे है। अपने घर को जगमगा रहे है। आसपास वालों से कोई  लेना देना नहीं । हम एकांकी होते जा रहे हैं। समाज की बात भूल रहे हैं। सम्रग्रता की बात भूल रहे हैं।विश्व कुटुंबकम की बात करने वाले अब  अपने घर को सजा कर प्रसन्न हो रहे हैं। क्या हो गया हमें?

अशोक मधुप
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Friday, October 23, 2015

मुहर्रम और प्रसाद


-आज हम श‌िक्ष‌‌ित होकर भी कम पढ़ों से ज्यादा गए बीते हैं। हम देश में हिंदू मुस्ल‌िम में बटें खड़े हैं।कोई  बीफ  पार्टी  दे रहा है, कोई पोर्क पार्टी। टी पार्टी देने की कोई  बात नहीं कर रहा।
कल मुहर्रम है। बड़े -बड़े  ताजिए निकलेंगे। उन्हें देखने और मर्सिया सुनने के लिए भीड़ उमड़ेगी किंतु  उसमें  एक ही तबका होगा। हिंदू  तो दूर दूर तक नजर भी नहीं आंएगे । मुझे याद आता है बचपन। हम छोटे- छोटे थे। मेरी मां बहुत कम पढ़ी थी। कक्षां पांच तक।  बह मुहर्रम के दिन बाजार से खील और बताशे खरीदती| मेरा हाथ पकडती | ताजिए के पास ले जाती। ताजिए पर प्रसाद चढ़ाती। हर ताजिए के नीचे इक सफेद चादर लगी होती। इस चादर में प्रसाद एकत्र होता रहता। ताजिए की देख रेख करने वाला इस प्रसाद में से मुट्ठी भरकर खील बताशे मां को दे देता। मां घर लाकर हमे प्रसाद के खील बताशे ख्र‌िलाती।
ये प्रसाद क्यों चढता था, क्या मान्यता थी म्रुझे अब लगभग 60 साल बाद याद नहीं। किंतु ताजियों पर प्रसाद चढ़ना आज भी याद है।
शहरों में भले ही ऐसा न हो किंतु मेरा मानना है कि गांव में कहीं न कहीं ये परंपरा  आज भी जीवित होगी। काश आगे भी ऐसा हो।हम ताजियो पर प्रसाद चढांए और मुस्लिम हमारी भगवान राम की बारात में सहयोग करेें ।
हम एक दूसरे की रवायत का आदर करें। मीट खाने को कोई किसी को नही रोकता। रोकता है दूसरों की भावनाओं का अपमान करने से। आप कुछ भी करें किंतु आपके मिलने वाले , परिच‌ित की आस्था को ठेस नहीं लगनी चाहिए। उनकी भावना का ख्याल रखा जाना चाहिए|
अशोक मधुप
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Wednesday, October 21, 2015

व‌िजयदशमी

व‌िजयदशमी 
कल विजयदशमी है। दशहरा का पर्व। बचपन से जवानी तक इस पर्व को मनाने का बेइतहां  इंतजार रहता था।
आठ दस दिन पूर्व से रामलीला शुरू हो जाती। उससे पहले उसकी रिहर्सल शुरू होती। दिन छिपे से कई- कई घंटे तक अभ्यास चलता। डाईलॉग बोलना ,एकट‌ि्ंग  कराना सीनियर द्वारा सिखाया जाता। दशहरा के अगले दिन भरत मिलाप के जुलूस के साथ  रामलीला खत्म हो जाती।  उसके बाद शुरू होता नाटकों के मंचन का दौर। उनकी रिहर्सल चलती।
भरत  मिलाप के जुलूस में अखाड़े निकलते। कलाकार उसमें अपनी कला का प्रदर्शन करते। कोई लाठी केे करतब ‌दिखाता। कोई  बरैटी घुमाता। तलवार चलाना तो बस किसी -किसी के बस की बात होती। अखाड़ों में अलग -अलग तरह के करबत  दिखाने के लिए युवाओं को काफी पहले से तैयार किया जाने लगता। अखाड़े एक तरह की युद्ध कला स‌िखाना था। युवाओं को जरूरत के लिए तैयार करने , युद्ध के लिए   शिक्ष‌ित करने का माध्यम। दशहरा आने से पहले का 15- 20 दिन का समय बहुत व्यस्त ‌होता युवा और बच्चों के लिए। रात की रामलीला के लिए तो बड़ा अभ्यास करना होता था।
 जिनको रात की लीला में रोल करने का  मौका न मिलता।  उनकी कोशिश होती ‌कि दिन की लीला में ही कोई पार्ट मिल जाए। राम की बानर और रावण  की राक्षस सेना में तो उन्हें भी जगह मिल जाती थी, जिन्हें कुछ नहीं करना होता था । बानर सेना में मुंह लाल रंगवाकर और लाल कपड़े पहन कमर में पूंछ लगवानी होती। रावण की सेना की पहचान काले चेहरे नीला कोट और बड़ी बड़ी मूंछ होती। 
दिन की रामलीला के कलाकारों का रात की लीला के कलाकारों जैसा रूतबा तो नहीं होता था। किंतु राम बारात, भरत मिलाप के जुलूस में दिन के कलाकारों को ही मौका मिलता । जुलूस के दौरान भक्तों द्वारा उनकी  खूब खातिरदारी होती। कुछ भक्त तो राम -सीता -लक्ष्मण  और हनुमान के चरण पूजते।क्या समा होता‍?
अब तो रामलीला स्क्रीन पर दिखाई जाने लगी। रामलीला का युग गया। टीवी आ जाने के बाद रामलीला देखने वालों का टोटा हो गया। परिणाम हुआ कि स्टेज के कलाकार खत्म होने लगे। किसी की रंग मंच में रूचि नहीं रही। नई प्रतिभाएं इस क्षेत्र में आनी बंद हो गईं। रामलीला और नाटक के देखने वाले जब नही रहे,तो कलाकार किसके लिए अभ्यास करें।
अखाडे भी अब परम्परा निभाने के ल‌िए ही रह गए। नए कलाकार भी इधर नहीं आ रहे। लाठी और तलवार का युग रहा नहीं। तो इनमें लोगों को रूचि भी नही रह गई। अब कुछ रह गया तो रस्म पूरी करना ही है।
दशहरा पूजन के बाद दशहरा मेले में जाने से पूर्व  नील कंठ देखने की परंपरा थी। दशहरा पूजने के बाद पर‌िवार के पुरूष नीलकंठ देखने जंगलों में निकल जाते। दशहरा पूजन के बाद नील कंठ देखना शुभ संमझा जाता था। अब तो दशहरा पूजन के बाद नील कंठ देखने निकलना सपनों की बात रह गई। अखबारी जिंदगी में दशहरा पूजन भी भागदौड़ में ही होता। सवेरे की मी‌ट‌िंग और मुख्यालय की रिपोर्ट‌िंग की प्रक्रिया और शाम केेेे समाचार भेजने की आपाधापी में नीलकंठ को देखने जंगल में यार दोस्तों के साथ जाना तो एक मृग मरीचिका बन गया। दशहरा मेला देखना जीवन यात्रा में कब छूट गया , पता ही नही चला।   
अशोक मधुप
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Tuesday, October 20, 2015

लुभाव


आज समाज में बाजारवाद हावी है। कंपनी अपने उत्पाद बेचने को नई- नई स्कीम ला रहीं हैं। बड़े टीवी के साथ छोटा टीवी फ्री में मिल रहा है। एक सामान खरीदने पर एक या दो पीस निशुल्क द‌िए जा  रहे हैं। त्योहारों पर छूट के नाम पर खूब माल बिक रहा है। सेल भी यहीं है। आन लाइन खरीदारी में मौसमी सेल भी यही है। सब    सामान बेचने का फंडा है। आज ही  ऐसा हो रहा है, ऐसा नहीं है।
 मेरे यहां कपड़ों पर प्रेस करने वाला काफी बुजुर्ग था । एक दिन मुझे कहीं कार्यक्रम में जाना था। कपड़ों  के साथ  रूमाल भी प्रेस कराना था।मैंने उससे बूझा - कभी तुमने लुभाव लिया है? वह अपने बचपन में लौट आया। कुछ सेकेंड बाद सोचकर  बोला - हां बाबू जी बहुत बार लिया है। जब बचपन में कुछ सामान लेने जाते थे, तो दुकानदार से लुभाव जरूर लेते थे। भले ही कितनी देर रूकना पड़े। कभी दुकान वाला हाथ पर कुछ परमल के दाने रख देता या लुभाव  के नाम पर एक- दो मूगफंली दे देता। कुछ रूककर  वह बोला- आपको लुभाव की कैसे याद आ गई? मैने कहा कि आज चार कपड़ों के साथ प्रेस के लिए एक लुभाव भी है। कपड़ो में रूमाल को देख वह खूब हंसा। उसके बाद मैं जब उसे कपड़े प्रेस को देता और उनके साथ रूमाल नहीं होता तो वह खुद  कहता - क्या बात है बाबू जी आज कपड़ों के साथ लुभाव नहीं है।
 मेरे बचपन के समय लुभाव का प्रचलन था। आप दुकान पर कुछ सामान खरीदने  जाते तो दुकानदार आपको   लुभाव के नाम पर कुछ न कुछ जरूर दे देता। कभी कुछ चने । तो कभी कुछ इलायची के दानें। उस समय ग्राहक को पटाए रखने का यह फंडा था। विशे षकर बच्चों को पटाने का । जहां से बच्चों को लुभाव मिलता ,बच्चे खरीदारी के लिए उसी दुकान पर जाते। धीरे - धीरे ये चलन में आ गया। सभी दुकानदार लुभाव देने लगे। बच्चे अब अपना हक समझ कर लुभाव मांगने लगे। लुभाने के लिए दी जाने वाली चीज लुभाव हो गई ।कई- कई बार ग्राहक ज्यादा होने पर दस- दस मिनट रूकना पड़ता। पर लुभाव लिए बिना हम दुकान से नहीं हटते।मैंने तो बचपन में बहुत लुभाव लिया है। पता नहीं आपको इसका सौभाग्य मिला या नहीं।
अशोक मधुप

Monday, October 19, 2015

गढ़वाल भूूकंप और मैं


कई  बार ज्यादा सुरक्षा भी खतरा लेकर आती है। ऐसा ही  गढ़वाल भूूकंप के समय| मेरे साथ हुआ |
  बिजनौर में 1990 में दंगा हुआ था। हमारी  गली के अंदर पांच परिवार रहते हैं। गली मंदिर की साइड में ही खुली है। गली के हम पांचों परिवारों ने मिलकर गली के मुह पर चैनल लगा कर इसे बंद करा दिया। सुरक्षा के लिए रात में दस बजे चैनल को बंद कर उसमें ताला लगा देते। ताले की पाचों परिवार पर चाबी थी । जिसे आना होता अपनी चाबी से दरवाजा खोल लेता। चैनल के पास दीवार पर लगे बोर्ड पर पांचों परिवार की घंटी लगी थीं। सो किसी मेहमान को भी परेशानी नहीं थी। जिसका मेहमान आता।  उसकी घंटी बजा देता। संबधित परिवारजन ताला  खोल देते।
20 अक्तूबर 1991  की रात। किसी को कुछ पता नहीं था क्या होने वाला है। कुछ समय बाद प्रलय आने वाली है, इसका किसी को गुमान भी न था। सब  आराम से सोए। रात में जोर से पंलग हिलने  और भूूकंप का शोर मचने पर मैं घर से बाहर निकलने के लिए भागा। दूसरे कमरे में बच्चों के साथ सोई पत्नी को  आवाज दी । उससे  बच्चों को उठाकर बाहर आने को कहा। इस दौरान लाइट भाग चुकी थी । किसी तरह घर के मेन गेट का कुंडा खोकर बाहर भागा। घुप अंधेरा | हाथ को  हाथ नजर नहीं आ रहा था। किसी तरह झपट कर चैनल पर पंहुचा । वहां ताला लगा  था। घर से बाहर निकलते चाबी लानी भूल गया था । चाबी लाने की याद आई तो सोचा अंधेरे में  ताला खुलेगा कैसे। ऐसी आपदा के समय बचने के लिए चार से पांच सेंकेड का समय होता है। यदि आप ऐसे में खुले मैदान में पंहुचे तो ठीक । नहीं तो प्रकृति आपका भाग्य तै करेगी। मौसम कुछ ठंडा था किंतु ये सब   ख्याल आने पर घबराह ट के कारण मुझे पसीना आ गया। पर कुछ बस में नहीं था। वैसे भी मेरा घर बिजनौर की पुरानी आबादी में है।पुरानी आबादी में खुुला स्थान होता कहां है। घर से सटा मंदिर तो है ।  उसमें कुछ जगह भी है किंतु उसके चारों ओर तो ऊंंचे- ऊंचे भवन है। मैं  बहुत तनाव में था कि कैसे कंरू ,  अब क्या होगा? उधर घर के अंदर से पत्नी की आवाज आई। ये बच्चे तो उठ ही नही  रहें। क्या करू?
क्या जवाब देता । इस दौरान पड़ौसी भी निकल आए। हरेक का अपना  तजुर्बा। अपना अनुभव।लगे बतियाने।  अपनी- अपनी बीती सुनाने ।
मैं तो सब कुछ  कुछ प्रकृति पर  छोड़ में भी घर में आकर पलंग पर लेट गया। सवेरे पता चला रात में भूूकंप ने उत्तराचंल में प्रलय ला  दी है।
प्रलय मैने कभी देेखी नहीं। बस इतिहास की किताबों में उसे  जरूर पढ़ा है। मै समझता हूं कि गढ़वाल का 91 का भूकंप, सूनामी की समुद्र तट क्षेत्र में तबाही और केदारनाथ आपदा अलग- अलग रूप में प्रलय ही तो थीं।प्रलय भी ऐसी ही होती होगी।
अशोक मधुप

Wednesday, June 17, 2015

१८५७ की आजादी की लडा ई और बिजनौर

                १८५७ की आजादी की लड़ाई पर अमर उजाला में छपा मेरा एक पुराना  लेख

Tuesday, June 16, 2015

धर्म के नाम पर पशु क्रुरता

                                      अमर उजाला में एक सितम्बर २००० को धर्म के नाम पर हो
                                          रही पशु क्रुरता  पर छपा मेरा एक लेख

बिजनौर जनपद में कपास उत्पादन की जगह गन्ने ने ली

                               अमर उजाला में सात फरवरी २००० में बिजनोर जनपद की खेती के
                                 बदलाव पर छापा मेरा एक लेख

Sunday, June 14, 2015

दानिश जावेद स्क्रिप्ट राइटर




                           
                              अमर उजाला मेरठ के १४ जून के अंक  में प्रकाशित मेरा एक लेख। 

Friday, February 20, 2015

बिजनौर का फिल्म इडस्ट्री में योगदान


२६ अप्रैल २०१२ में अमर उजाला में बिजनौर   का फिल्म इडस्ट्री में योगदा न पर प्रकाशित मेरा लेख