Wednesday, June 10, 2026

चित्रलेखा

 

भगवती चरण वर्मा

जन्म 30 अगस्त 1903 मृत्यु पांच अक्तूबर 1981

 

 

भगवती चरण वर्मा का उपन्यास चित्रलेखा आज  पढ़कर समाप्त किया। दो  दिन से पढ़ रहा था। मनन कर रहा था। उपन्यास बहुत पसंद आया।

जवानी के दौर में भी कभी पढ़ा था पर उसकी ज्यादा स्मृति नहीं । कुछ −कुछ घटनाएं याद थी। घटनाक्रम नजर में था। जवानी में उपन्यास और साहित्य पढ़ने का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन था। मेरे किशोर्य कॉल और युवावस्था में न टीवी था न रेडियो। यदि था तो कुछ संपन्न परिवारों तक। पढ़ाई में ज्यादा रुचि न थी, खेल में रुचि न थी, तो क्या करते बस उपन्यास ,कविता कहानी जो मिलता उसी को पढ़ता। मेरी पीढ़ी जिसकी  रुचि स्कूल शिक्षा में  कम थी, खेल पसंद ना था, वह उपन्यास पढ़ती। मेरा भी शुरुआत से यही शगल रहा।

उस समय उपन्यास के प्रिय लेखक थे , गुलशन नंदा ,प्यारेलाल ,ओम प्रकाश शर्मा , इबने सफी, गुरू दत,आचार्य चतुरसेन,वेद प्रकाश कंबोज आदि आदि। मैं एक दिन में कई −कई उपन्यास पढ़ लेता।

उस दौर में मैंने राहुल सांस्कृतायन का  बोल्गा से गंगा उपन्यास पढ़ा। तो गुनाहों के देवता  का भी पठन किया। रूसी लेखक की गोर्की का प्रसिद्ध उपन्यास मां पढा, तो भगवती चरण वर्मा का चित्रलेखा। साकेत ,कामायनी, आसूं, प्रिय− प्रवास जाने क्या −क्या पढ़ा।

झालू में खाली समय में घरके पास छतरी वाले कुएं  पर सर्वेश की साइकिल की मरम्मत की दुकान थी।उसे भी उपन्यास पढ़ने को शौक था।वहकाम में लगा रहता । मैं  उनके थले पर बैठा उपन्यास पढ़ता रहता। बीए की पढ़ाई के दौरान पिता जैन फार्म बिजनौर में मुनीम हो गए। वर्धमान काँलेज के पास क्वार्टर मिल गया।जैन फार्म और वर्धमान काँलेज एक ही परिवार का था। गर्मियों के अवकाश में नाश्ताकर दस बजे के आसपास में काँलेज की लाइब्रेरी में चला जाता। वहां फर्श बहुत साफ होता था। कोई भी कविता ,कहानी , साहित्य की किताब लेकर फर्श पर लेटकर पढता रहता।पुस्तकालय में पंखे चलते रहते थे।गर्मियों में फर्श ठंडा होता। आराम से दो बजे तक पढ़ता , उसके बाद  खाना खाने आ जाता। खाना खाकर फिर लाइब्रेरी पहुंच जाता।   

 बहुत कुछ पढ़ा, जो भी स्मृति पटल से लुप्त हो गया है। स्लेट पर लिखा पुराना पड़ने पर धुंधला गया है। सा ही चित्रलेखा के साथ हुआ ।

गुरु रत्नाकर अपने दो शिष्यों को पाप क्याहै,का ज्ञान कराने के लिए दो व्यक्तियों के पास भेजते हैं। महा व्यसनी बीजगुप्त के पास श्वेतांक को भेजते हैं । महा तपस्वी  कुमार गिरी के पास विशाल देव को भेजते हैं। दोनों को एक-एक वर्ष उनके संसर्ग में रहना है। जानना है कि पाप क्या है?

एक वर्ष बाद वे दोनों गुरु रत्नाककर के पास लौटते हैं। श्वेतांक महव्यसनी बीजगुप्त को देवता और त्याग की प्रतिमूर्ति बताता है। कुमार गिरी को पशु कहता है। कहता है कि कुमार गिरी अपने लिए जीता है। संसार में उसका जीवन व्यर्थ है । वे अपने जीवन के नियमों के प्रतिकूल  चल रहा है। अपने सुख के लिए उसने संसार की बाधाओं से मुंह मोड़ लिया है। कुमार गिरी पापी है।

विशाल देव के पास रहा दूसरा शिष्य कुमार गिरी की प्रशंसा करता है। कहता है कि योगी कुमार गिरी अजित हैं। उन्होंने ममत्व   को वशीभूत कर लिया है। वे संसार से बहुत ऊपर उठ चुकी है। उसकी राय में बीजगुप्त वासना का दास है । उसका जीवन संसार के भोग विलास में है। वह पापी है। वह पापमय संसार  का वह मुख्य मार्गी  है।

रत्नागिरी निष्कर्ष निकालते हैं । वे कहते हैं तुम दोंनों विभिन्न परिस्थिति में रहे । इसलिए  दोनों की पाप की धारणाएं भी भिन्न-भिन्न है। संसार में पाप कुछ भी नहीं है । केवल मनुष्य की दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है। प्रत्येक व्यक्ति एक विशेष प्रकार की मन प्रवृत्ति लेकर पैदा होता है। प्रत्येक व्यक्ति इस संसार के रंगमंच पर अभिनय करने के लिए आता है। अपनी मन प्रवृत्ति से प्रेरित होकर अपने पाठ को दोहराता है। यही मनुष्य का जीवन है। वह अपने स्वभाव के अनुकूल कार्य करता है। स्वभाव प्रकृति है। मनुष्य  अपना स्वामी नहीं है। वह प्रकृति का दास है। बिवश है। वह करता नहीं है। वह केवल साधन है। फिर पुण्य और पाप कैसा? हमें ममत्व प्रधान है। प्रत्येक मनुष्य सुख चाहता है। केवल व्यक्ति के सुख के केंद्र भिन्न है। कुछ सुख को मदिरा में देखते  हैं। कुछ उसको व्यभिचार में देखते हैं। कुछ त्याग में देखते हैं।पर सुख सब चाहते हैं। कोई व्यक्ति संसार में वह काम नहीं करेगा, जिससे उसे दुख मिले। यही मनुषय की मनप्रवृत्ति है । यही उसके   दृष्टिकोण से विषमता है।

रत्नागिरी कहते हैं कि संसार में इसीलिए पाप की परिभाषा नहीं हो सकती। हम न पाप करते हैं, न पूण्य करते हैं,  हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है।

अशोक मधुप

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