Tuesday, June 12, 2018

चित्रकार हरिपाल त्यागी से साक्षात्कार


पहला चित्र मां के गर्भ की भित्ती पर उंगलियों से खींचा होगा
देश के जाने माने चित्रकार हरिपाल त्यागी से साक्षात्कार

फोटो

बिजनौर,जनपद में पैदा हुए देश के जाने वाने चित्रकार हरिपाल त्यागी कहतें हैं कि शायद उन्होंने पहला चित्र मां के गर्भ की भित्ती पर उंगलियों से खींचा होगा। उनकी मां ने गर्भ की ‌भित्त‌ी पर कंपन महसूस कर उन्हें आशीर्वाद दिया होगा , तभी वह बचपन से आज तक अपने कार्य में व्यस्त हैं।
बीस अप्रैल 1934 में बिजनौर जनपद के महुआ गांव में जन्में हरिपाल त्यागी मूल रूप से चित्रकार हैं किंतु वे एक विख्यात कवि भी । शिक्षा बिजनौर के राजा ज्वाला प्रसाछ स्कूल में मैट्रिक तक हुई। 55 में शादी हो गई। अपने शौक के लिए वह ‌दिल्ली आ गए। संघर्ष की शुरूआत हुई । एक पत्रिका के लिए बनाए पहले चित्र पर एक रुपया मिला।सा‌थियों की सलाह   पर भौपाल चला गया। वहां भास्कर में कार्टूनिस्ट के रूप में काम शुरू किया। सन् 60 में दिल्ली आ गया। 64 में पहली नौकरी हिंदुस्तान में शुरू की । छह -सात माह काम किया। उसके बाद से कभी नौकरी नहीं।


त्यागी बताते हैं कि अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं उल्लेखनीय पुस्तकों में पेंटिंग्स तथा साहित्यिक रचनाओं प्रकाशित एवं संगृहित हुईं। देश के अनेक नगरों-महानगरों में एकल चित्रकला प्रदर्शनियां लगाई । सामूहिक कला-प्रदर्शनियों में भागीदारी की । मूलत: चित्रकार लेकिन लेखन भी किया। रचनाकार के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित ‘सुजन सखा हरिपाल' पुस्तक तथा ‘आधारशिलां (त्रैमासिक पत्रिका) का विशेषांक प्रकाशित हुआ। उनकी प्रकाशित पुस्तकें : ‘आदमी से आदमी तक (शब्दचित्र एवं रेखाचित्र) भीमसेन त्यागी के साथ सहयोगी पुस्तक। बच्चों के लिए कहानियों की चार पुस्तकें। किशोरों के लिए ‘ननकू का पाजामा' नामक एक लघु उपन्यास तथा ‘महापुरुषं (साहित्य के महापुरुषों पर केन्द्रित व्यंग्यात्मक निबन्ध) एवं रेखाचित्र हैं। इन्होंने कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं में कला संपादन भी। साहित्य एवं कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अनेक बार पुरस्कृत-सम्मानित हुए।
वे कहते हैं कि जीवन में पैसा खूब आया। किसी से मांगने की जरूरत नहीं पड़ी। लुटाया खूब।वे कहतें है कि मैँ साधारण आदकी की तरह जीता हूँ।बड़े आदमी की तरह चिंतन करता हूँ।साधारण आदमी की तरह रहता हूँ। उन्हें बेइमान किंतु पारदर्शी आदमी पंसद हैँ। ईमानदार आदमी बनता हैं और बनने वाले उन्हें पसद नहीं।
वे बताते हैँ कि शुरूआत में उनका बहुत शोषण हुआ। इसे उनका बुद्घुपना ही कहा जा सकता है। जैसे जैसे वे समाज के तौर - तरीके जानते गए शोषण कम होता गया। जीवन में समझौते तो करने ही पड़तें हैं किंतु ज्यादा समझौते नहीं किए।
युवा ‌‌चित्रकारों को वे सलाह देते हैं कि किताबी ज्ञान से कुछ होने वाला नहीं हैं। वे अपना दृष्ट‌िकोण पहचाने। ‌चित्र में क्या कहना चाहतें हैं, यह निश्चय कर काम करें। तजुर्बे और सवेंदनशीलता से अनुभव आएंगे।


बच्चन की पुस्तकों के बनाए चित्र



वे बतातें हैं कि प्रसिद्घ कवि हरिवंशराय बच्चन की पुस्तकों के कवर और अधिकांश स्केच उन्होंने ही बनाए।
वे बच्चन से पहली मुलाकात के बारे में बतातें है कि राज कमल प्रकाशन से उनकी पुस्तक छपनी थी। पुस्तक के कवर के कई ‌‌चित्र वह निरस्त कर चुके थे। मुझसे चित्र लेकर बच्चन जी से मिलने को कहा गया।बच्चन जी से मैँ उनके दिल्ली ‌स्थ‌ित निवास पर जाकर मिला। उन्होने मेंरे से चित्र लेकर बिना देखे उलटाकर रख दिया। कहा कि जिसने मेरी किताब नहीं पढ़ी ,वह उसका कवर कैसे बना सकता है। मैने उनसे कहा ‌कि ये आने कैसे कह दिया? फिर मैने छपने वाली ही नहीं उनकी पुरानी किताब कविताओं पर बेबाक टिप्पणी की । मुझ से प्रभा‌वित होकर उन्होंने राजकमल प्रकाशन को कहा कि आज से उनकी सारी किताबों के कवर और स्केच त्यागी ही करेंगे। जो ये करेंगे , वह उन्हें स्वीकर होंगे।




हरिपाल त्यागी की कविता
रेखाएं

रेखाएं-पागल हो गयी हैं
तुम्हें छूने को आतुर,
छटपटातीं, भगातीं,
बेचैन रेखाएं...

उलझ पड़तीं परस्पर और
फिर वे एक हो जातीं,
दौड़ पड़ती बावली
मासूम रेखाएं...

पगला गयी हैं सचमुच
तुम्हें छूने की धुन में।
कौन है वह, जो तड़पता
इन खरोंचों में...

रेखाएं-
पागल हो गयी हैं...


-अशोक मधुप

12 अप्रैल अमर उजाला बिजनौर के पेज ८ पर प्रकाशित

Friday, April 13, 2018

बिजनौर में भी हुआ था हिरन के शिकार का प्रयास


बिजनौर में भी हुआ था हिरन के शिकार का प्रयास
हिरन का शिकार सलमान खान को महंगा पड़ा। उन्हें हिरन मारने में जेल जाता पड़ा। भगवान राम को हिरन के शिकार के लिए माता सीता को खोना पड़ा था। इतिहास गवाह है कि ‌हिरन का जब -जब भी शिकार हुआ। नया इतिहास बना। सलमान खान और भगवान राम का शिकार दुखद कहानी बना ।
बिजनौर जनपद में भी हिरन के शिकार का प्रयास हुआ था। यह प्रयास समाज के लिए सुखद रहा। बिजनौर जनपद की श‌िकर गाथा काफी पुरानी हो गई । बिजनौर पहले वन क्षेत्र था। गंगा और राम गंगा के बीच अरण्य स्थल। गंगा राम गंगा के बीच बसा होने के कारण दस्यु और राजनैतिक हमलों से सुरक्षित स्थल। ऐसी जगह साधु महात्माओं के आश्रम के लिए बहुत उपयुक्त थी। इस भूमि में एक राजा आतें हैँ। उन्हें एक हिरन द‌िखाई देता है। ‌हिरन को देख वे अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाते हैं। अनुसंधान के लिए तरकश से तीन निकालते हैँ। धनुष पर तीर रखते ही सारथी उनका मन्तव्य समझ जाता है। वह हिरन के पीछे रथ दौड़ा देता है। हिरन बहुत तेज दौड़ता है। वह आने वाले संकट को भांप लेता है। जान बचाने के लिए दौड़ पड़ता है। मौत का भय उनकी गति कई गुनी बढ़ा देता है। वह कभी- इधर दौड़ता है।कभी उधर दौड़ता है। जान बचाने के लिए लुकाछिपी शुरू हो जाती है। राजा और उसके सारथी शिकार पर नजर गड़ाए हैँ। उनको यह पता ही नहीं चलता - कितनी दूर आ गए। कहां आ गए। अचानक रथ के मार्ग में आए कुछ तपस्वी उन्हें रोकतें हैं। कहते है राजन आश्रम का मृग है। इसका शिकार न करें। अचानक तपस्वी के रास्ते में आने पर राजा रूकतें हैं। और चारों और देखतें हैं । समझ जाते हैं कि वे आश्रम में आ गए। राजा थे दुष्यंत।कण्व ऋषि का आश्रम। यहां उन्हें मिलती है शकुतंला। मह‌‌र्ष‌ि की गोद ली पुत्री ।मेनका और विश्वामित्र की संतान। दुष्यंत और शकुंतला का प्रेम परवान चढ़ता है। इनसे हुए बच्चे का नाम भरत हुआ। ये देश का प्रतापी सम्राट हुआ। इसी के नामपर देश का नाम भारत वर्ष पड़ा।
अशोक मधुप

किस्सा हिरन के शिकार का


किस्सा हिरन के  शिकार का 
मंडल के बड़े अधिकारी कर चुकें हैं कार्बेट में हिरन का शि‌कार

फिल्म कलाकार सलमान खान को राजस्थान में हिरन का शिकार करने में सजा हुई। मुरादाबाद मंडल के अधिकारी तो बहुत पहले नेशनल कार्बेट पार्क में हिरन का शिकार कर चुकें हैं।लेकिन तब शासन का दबदबा होने के चलते केवल इन अधिकारियों का ट्रांसफर किया गया था।मुकदमें भी दर्ज हुए थे।
यह घटना है साल 1982 में नए साल की ।बिजनौर के तत्कालीन डीएम अनीस अंसारी शौकीन मिजाज थे। खुद तो शायर थे  ही । शाम को उनकें यहां शायरों की महफिल जमती। नए साल का जश्न मनाने का प्रोग्राम बनाया था। इसके लिए वे मंडलायुुक्त मुरादाबाद अरविंद वर्मा और डीआईजी मुरादाबाद बीएस माथुर को भी  आंमत्रित किया गया। तत्कालीन एसपी एके सिंह भी इनके साथ थे। कालागढ़ में नए साल का जश्न मनाया गया।वहां सभी अधिकारियों ने रामगंगा में बोट‌िंग का आनंद लिया। बोट से ही कार्बेट में चले गए। तत्कालीन एसपी एके सिंह के साथ उनके बेटे भी थे। एकेसिंह के बेटे ने कार्बेट में शिकार करते हुए हिरन को गोली मार दी। बंदूक चलने की आवाज सुनकर आसपास मौजूद वन अधिकारी मौके पर आ गए। तब तक हिरन मर चुका था। उन्होंने शिकार के बारे में पूछा तो एसपी एके ‌स‌िंह का बेटे ने वन अधिकारियों को धमकाना शुरू कर दिया। वन अध‌िकारी ने इन सब को हिरासत में ले लिया। कार्बेट में सांसद अरूण नेहरू भी रूके हुए थे। कमिश्नर, डीआई, डीएम और एसपी जैसे अधिकारियों के शिकार करने पर अरूण नेहरू बहुत नाराज हुए। उन्होंने शासन से इन अधिकारियों के विरूद्घ कठोर कार्रवाई करने को कहा।  उस समय एसडीएम नगीना बिजेंद्र पाल सिंह के स्टेनो थे। बिजेंद्र पाल ‌सिंह भी इन अधिकारियों के साथ जाना चाहते थे पर किसी कारण से जा नहीं सके थे। पहले उन्हें बड़े अधिकारियों के साथ न जाने का अफसोस था।बाद में कार्बेट में शिकार की घटना पता चलने पर उन्होंने बहुत खुशी मनाई ।कहा था कि वे बाल बाल बच गए।
मंडलायुक्त जैसे अधिकारियों का मामला होने के कारण कार्बेट प्रशासन ने इन्हें हाथों हाथ जमानत दे दी थी। किंतु यह मामला इन सब अ‌ध‌िकारियों को भारी पड़ा। बिजनौर पुलिस अधीक्षक एके सिंह का 15 जनवरी को शासन ने तबादला कर दिया।डीएम अनीस अंसारी को 20 जनवरी, मंडलायुक्त अरविंद सिंह को 21 जनवरी को हटा दिया गया। डीआइजी भी इसीअवधि में हट गए।इन अधिकारियों पर मुकदमे चले।एके सिंह को तो इसका बहुत बड़ा खाम‌ियाजा भुगतना पड़ा। उनका प्रमोशन रूका रहा। सेवा निवृति से एक दिन पहले उन्हें सब मामला निपटाकर प्रमोशन दिया गया। बिजनौर के पुराने पत्रकार एंव कलेक्ट्रेट कर्मी इस घटना को नहीं भूले।‌
अशोक मधुप

Thursday, April 12, 2018

बहुत कुछ बदल गया ४८ साल में

४८ साल एक युग होता है। पर इतना भी नहीं जितना परिवर्तन हो गया। मैने आज से ४८ साल पहले हाई स्कूल परीक्षा पास की थी। उस समय जनपद में कुछ ही छात्र प्रथम श्रेणी पाते थे। अधिकतर को तृतीय श्रेणी मिलती। द्वितीय श्रेणी पाने वाला अपने को बहुत भाग्यशाली समझता। पूरे गांव में उसकी विद्वता के चर्चे होते। प्रदेश का रिजल्ट होता था लगभग ३०-३५ प्रतिशत। हॉल  प्रदेश का इंटर का रिजल्ट देखकर मैं चौंक गया। परीक्षा में ९२.२ प्रतिशत छात्र उत्तीर्ण हुए हैं। सर्वाधिक अंक पाने वाली छात्रा के ९७ प्रतिशत से ज्यादा है। मेरे पड़ौस में झालू में टेलर होते थे पीरजी । नाम क्या था, यह कोई नहीं जानता। सब उन्हें पीर जी कहते थे। उनका लड़का जहीर मेरे से सीनियर थे। इनकी हाई स्कूल में सेकेंड डिवीजन आई थी। वह कहते थे । सेकेंड डिवीजन लाना मामूली बात नहीं है।  साइन्स में तो   लोहे के चने चबाने पड़ते हैं। बहुत मेहनत करनी होती है, जब जाकर सेकेंड डिवीजन आती है। ४५ प्रतिशत अंक पर सेंकेड डिवीजन मिलती थी। मेरे पास विज्ञान विषय थे। मुझे ४५.५ प्रतिशत अंक आए थे। मात्र एक अंक ज्यादा मिलने पर मुझे सेकेंड डिवीजन मिली। वर्ना थर्ड ही रहती पर मुझे गर्व है कि मैने सेकेंड डिवीजन से हाई स्कूल पास किया । आज आश्चर्य होता है, जब उसी यूपी बोर्ड के छात्रों को ९५ प्रतिशत नंबर मिले देखता हूं ,जिस बोर्ड में सेकेंड डिवीजन से पास होना किसी समय एक जंग जीतना था | 

Thursday, April 5, 2018

स्वामी सच्चिदानंद

सैतालिस साल बीत गए स्वामी सच्चिदानंद को शहीद हुए। आज भी मैं वह दृष्य नहीं भूला। आश्रम में उनके और उनके साथी के शव पड़े थे । मैँ उन्हें देखने गया था।उस समय मैं बीए में पढ़ता था।
मेर घर की दूरी खारी से दो किलो मीटर है। सूचना मिली कि गोविंदपुर आश्रम में स्वामी जी का कत्ल हो गया। रात में बदमाशों ने उनकी और उनके एक साथी की गोली मार कर हत्या कर दी।
स्वामी जी की बहुत प्रसिद्घी थी। क्षेत्र में बहुत सम्मान था। उनकी हत्या की सुन धक्का सा लगा। समझ में नहीं आया कि उनकी हत्या क्यों हुई। इतने अच्छे आदमी का भी कोई दुश्मन हो सकता है।हम साइकिल से भाग कर आश्रम पंहुचे। आश्रम में कुछ दूरी पर दो शव पड़े थे। एक स्वामी जी का और एक उनके साथी किसी रेड़डी का। लोग बता रहे थे कि स्वामी जी बहुत बहादुर थे। बदमाश स्वामी जी को मारना चाहते थे। किंतु जिस कमरे को उन्होंने खुलवाया ,उसमें उनके मित्र रेड़डी रूके हुए थे। उन्होंने रेड्डी को स्वामी जी समय गोलीमार दी। गोली की आवाज सुन स्वामी जी अपने कक्ष से बाहर आए। जार से कहां कौन है? क्या हो रहा है। मारने वालों ने देखा कि यह तो वही स्वामी जी हैं ,जिन्हें मारना था। उन्होंने स्वामी जी पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाकर स्वामी जी की हत्या कर दी। अगर स्वामी जी कक्ष से न निकलते , छिप जाते , भाग जाते तो वह बच सकते थे।किंतु वे बहादुर और निर्भीक थे। उन्होंने ऐसा नहीं ‌ क‌िया।
बीए में मैँ वर्धमान कॉलेज में पढता था। डा एसआर त्यागी कॉलेज के प्राचार्य थे। स्वामी जी का उनके पास आना जाना था। स्वामी जी का वाहन साइकिल था। वे नंगे पांव रहते। कमर पर घुटनों तक एक चादर बांधते। गले मे उनके एक सफेद चादर पड़ी रहती। ये उनका पहनावा और उनकी पहचान थी। वहुत बार उन्हें आते जाते देखते। ब्रह्मचर्य का तेज उनके चेहरे से छलकता था।
मैने 66 में हाई स्कूल किया। इंटर में प्रवेश लिया था। पिता जी चकबंदी में नौकरी करते थे। जनपद में चकबंदी का कार्य पूरा होने पर उसे जोनपुर भेज दिया गया। विभाग के सारे स्टाफ का भी जोनपुर को तबादला कर दिया गया। पिता जी को दादा जी ने जोनपुर नहीं जाने दिया। पिता जी ने नौकरी छोड़ दी। दादा जी हकीम थे।कोई ज्यादा आय नहीं थी।धनाभाग के कारण मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
झालू के पशु चिक‌ित्सालय पर श्याम बाबू सक्सैना वेटनरी स्टॉक मैन पद पर तैनात थे। उनके पास मेरी बैठ उठ थी। अधिकतर समय उनके साथ बीतता। स्वमी जी के आश्रम का कोई पशु बीमार हो जाता। वह उन्हें बलवा भेजते। मैँ भी उनके साथ जाता। आश्रम में दूध से हमारा स्वागत होता।चलते समय श्याम बाबू को दस और मुझे दो रुपये देना स्वामी जी कभी नहीं भूलते। मेरे मना करने पर भी दो का नोट जेब में डाल देते।
पिछले आठ दस साल में कई बार आश्रम में जाना हुआ। स्वामी जी की एक तस्वीर जरूर नजर आई। अब तो बहुत कुछ बदल गया।
अशोक मधुप
5 अप्रेल 2018

Sunday, March 4, 2018

देवी पूजा

१८ अप्रैल 1912
देवी पूजा
आज अष्ठमी है
नवरात्र की अष्ठमी।
भारत से बहुत दूर
अमेरिका में भी बसे
भारतीय हिंदू परिवार
भी मां को मानतें हैं,
नवरात्र में मां का
पूजन करते हैं।

नवरात्र शुरू होते ही
कुछ घरों में जोत जलाई जाती है।
कुछ भारतीय उपवास भी रखते हैं।
कुछ सप्तमी तक सात
या कुछ अष्ठमी तक आठ
व्रत रखतें हैं।
कुछ नवरात्र के प्रथम दिन
उपवास रखते है तो कुछ अंतिम दिन।
कुछ प्रथम और अंतिम दोनों दिन
रखतें हैं व्रत ।
सप्तमी तक उपवास करने वाले, 
अष्ठमी में अष्ठमी तक के उपवास
रखने वाले नवमी में देवी पूजते हैं।
कन्या जिमाते हैं।
जो उपवास नहीं रख पाते,
वो भी कन्याओं को जिमाने 
की रस्म करते हैं।
भोजन ,हलवा बनाते और
कन्याओं के घर में 
दक्षिणा सहित दे आते ।
कुछ दक्षिणा की जगह
 कन्याओं को दे आते है उपहार।
दो माह पूर्व हमारे परिवार में भी
आई है एक कन्या,
सुंदर सी बालिका।
खिलौना सी लाडली।
शिल्पी ने पूजन के बाद
उसका भी तिलक किया है।
शिल्पी की कई सहेली
पूजन कर अद्वीति के लिएं लाई उपहार,
दे गईं मिठाई और कुछ डालर।  
भारत में साल में  १८ दिन
पूजी जाती है बालिकाएं,
जिमाई जाती है, कन्याएं।
और फिर उसके बाद
पूरे साल परीक्षण कराकर
की जाती है उनकी हत्या, भ्रूण हत्या।
कहीं सम्मान के नाम पर
दे दीजाती है उनकी बलि।
या अमेरिका में तो ऐसा नहीं होता।
कन्या की भी लड़के की तरह दुलारते हैं।
बेटे की भांति बेटी को पालते हैं। 
बेटा हो या बेटी बच्चे के जन्मते ही,
जान पहचान वाले पहुंचने लगते है अस्पताल।
कोई न्यू बेबी लिखा बेलून लिए आता है,
तो कोई बेलकम न्यू बेबी 
लिखकर गिफ्ट लाता है।
अस्पताल के बेबी और मां के कक्ष में 
मनता है समारोह,
रहता है  जश्न का माहौल ।
अस्पताल से बेटी और मां के
घर आने के समय,
सजाया जाता है उनका कक्ष,
लगाई जाती है, बंदरबार।
कमरे में रंगे नोटिस बोर्ड पर
परिचित बेबी के लिए लिखते हैं
आशीर्वाद के संदेश।
  परिचित लड़कों की तरह 
लडकियों के लिए भी 
करते है दीर्घायु की कामना।
ऐसा तो भारत  में बेटे के लिए भी नहीं होता।
यहां अपार्टमेंट के गेट पर
कई मित्रों की पत्नियां घर आने पर
 तिलक कर बच्चे और मां की
आरती उतारती हैं,
मिठाई खिलाती हैं।
हमारे परिवार की नई
सदस्या अद्विती
दो माह की हो गई है।
इस समय हमारे कमरे में सो रही है
सोत सोते कभी हंसती है, कभी रोती रहती है।
लगता है कि वह सपनों में
खोई रहती है।
अच्छे सपने हंसाते है,
तो बुरे डराते हैं।
किंतु जरा सी 
आवाज या धमक
पर चौंक कर उठ जाती है,
लगता है कि बच्ची
समझती है, जानती है
नारी का भविष्य
इसी लिए डर जाती है,
वह भारत में नहीं जन्मी
वहां के बारे में कुछ 
जानती भी नहीं।
किंतु मां बाप और पूरा
परिवार तो भारतीय है,
कुछ चीजें संस्कारों से भी आती हैं।
बिना जाने बिन सीखें,
बहुत कुछ सिखा जाती हैं।
उसके  कदम की धमक
से  भी चौंकने,
बार -बार सपनों में
डरकर चीखने,
से मुझ लगता है कि
 भारत में 
कन्या और युवती पर हो रहे अत्याचार 
जुल्म उसे सोने नहीं देते।
डरावने सपने उसे
गहरी नींद में खोने नहीं देते।
पर मैं देखता हूं कि भारत मेंं
नहीं ,पूरी दुनिया में युवती के प्रति
समाज का व्यवहार एक सा है।
उन्हें ढंग से जीने नहीं देते।
हर जगह खूनी और मर्मभेदी
नजरों के वाण जगह -जगह डसते हैं।
बस्ती और गली कूचों में नहीं
कई बार घर में ही 
जहरीले सांप बसते हैं।
अशोक मधुप

वही पार्क है

   वही पार्क है,
पुराना पार्क।
जहाँ हम तुम मिला करते थे।
एक दूसरे को निहारते
घंटो बैठे रहते थे मौन।
खामोश।
कभी कुछ कहने की
 जरूरत ही नहीं पड़ी।
क्योंकि आजतक वे
शब्द ही नही बन सके,
जो मन की बात कह पाते।
जो मनका हाल 
जवां पर ले आते।
जो ह्रदय के भाव
बयां कर सकते।
ऐसे में बस  प्रभावी
होता है मौन।
बिना कहे,बिना बोले
एक दूसरे की बात
समझ लेता मन।
जान लेता भाव।
एक दूसरे को निहारते
कभीं तुम हंस देतीं
कभी मैं मुस्करा देता।
कर बार मेँ हंसता,
तुम मुस्करातीं।
लगातार ऐसे ही चलता रहता
बातों का सिलसिला।
आज बहुत दिन बाद,
बहुत साल  बाद
लगभग 5 दशक के
अंतराल के बाद
यहाँ आया हूँ।
पार्क वही है पुराना
जाना पहचाना।
इसके चप्पे चप्पे को
पहचानता हूँ मै।
वह पेड़ आज भी वहीं है
जिसपर तुमने अपना नाम
लिखकर दिल का निशान
बनवाकर मेरे से  दिलके 
आरपार बनवाया था
 तीर का निशान।
उसके बाद लिखवाया था
मुझसे मेरा नाम।
कहा था इस पेड़ के रहते
 ये नहीं मिटेगी,
तुम्हारे मेरे प्रेम की निशानी।
हम साथ रहें या ना रहें
जब भी यहाँ आएंगे।
इसे देखकर आ जाएगी,
एक दूसरे की याद।
मैं उसी पेड़ में नीचे खड़ा
निहार रहा हूँ उस लिखे को।
महसूस कर रहा हूँ तुम्हारी लिखावट।
महसूस कर रहा हूँ
 तुम्हारी सासों की सुगंध।
तुम्हारे शरीर को मादकता।
तुम्हारी हंसी की 
खिलखिलाहट।
सब कुछ
5 दशक के
अंतराल के बाद भी।
धीरे से तुम्हारे नाम
और तुम्हारे द्वारा बनाए
दिल के निशांन पर
उंगलियां घुमाता हैं।
महसूस करता हूँ तुम्हारा 
स्पर्श। तुम्हारी छूअन।
लगता है कि इतने 
अंतराल के बाद भी,
इसमें बसा है तुम्हारा रोम रोम।
एक जोड़े को पास से 
निकलते देख,
वहाँ से हटकर 
आ जाता हूँ
उस झाड़ी के पास,
जिनके नीचे घासपर
जहां तुम ओर मैं
आमने सामने बैठे 
रहते थे।
एक दूसरे को 
देखते रहते थे।
निहारते रहते थे।
कटिंग के बाद भी यह
 झाड़ी अब काफी बड़ी ही गई।
पर उस जगह पर हरी दूब
आज भी कालीन सी बिछी हुई है।
बनाया हुआ है
हरा मखमली बिछोना।
लगता है कि हमारे बाद
यहाँ आकर कोई नही बैठा।
शायद यह दूब 
इतने साल बाद भी
कर रही है
तुम्हारे मेरे आकर
आमने सामने बैठने का इंतजार।
उसे शायद ये पता नहीं
कि यहाँ आकर 
बैठने वाला जोड़ा
अब कभी लौटकर नहीं आ आएगा।
मन भारी होने लगता है
इस जगह को देखकर।
ये यहाँ से हट कर
पूरे पार्क का चक्कर  लगता हूँ।
पार्क में चांदनी का वह 
पेड़ अब भी है
जिसके सफेद फूलों के 
कालीन पर हम बहुत बहुत देर 
बैठे रहते थे।
हरसिंगार का वह पेड़
अब भी वहीँ है,
जिसके नीचे हम बहुत देर 
खड़े रहते थे।
जिसके सफेद पीले फूल 
हमपर झरते रहते थे।
कई बार मैं जोर से हारसिंगार को हिलाता।
वह भी प्रसन्न हो अपने फूलों
की कर देता
हम पर बारिश।
पार्क बहुत बदल गया
लग गए फव्वारे
रंग बिरंगी लाइट।
सैकड़ों तरह के फूलों के
पौधे।
पर चांदनी ,हारसिंगार 
के पेड़ वहीं हैं।
हमारी बैठने की जगह
की झाड़ियां भी वहीं है।
किन्तु ये सब बूढ़े हो गए
मेरी तरह।
तुम कालेज के समय
जो बिछड़ी तो
फिर नही मिलीं।
शायद तुम भी तो
जो गइं होंगी बूढ़ी
झाड़ी ,इन दोनों दरख़्त
ओर मेरी तरह।
तुम्हारे चेहरे पर भी
उभर आईं होंगी झुर्रियां।
आखों पर लग गया होगा
चश्मा।
 बालो में उतर आई होगी 
चांदनी।
वास्तव में बहुत कुछ
 बदल गया ।
वक्त भी,चांदनी ओर हारसिंगार का पेड़
 तुम भी
ओर मैं खुद भी।
अशोक मधुप