Saturday, November 21, 2020

जैन तीर्थ के रूप में विकसित नहीं हो पाया पार्श्वनाथ का किला

 जैन तीर्थ के रूप में विकसित नहीं हो पाया पार्श्वनाथ का किला

मिलती हैं प्राचीन प्रतिमाएं

फोटो

बढ़ापुर ,प्रशासन व पुरातत्व विभाग की अनदेखी और जर्जर रास्तों की बिना पर क्षेत्र के काशीवाला का विख्यात पारसनाथ का किला अब तक जैन तीर्थ स्थल के रूप में विकसित नहीं हो सका है। खेतों में खुदाई के दौरान निकलने वाली प्रतिमाएं व खंडित मूर्तियां मंदिर एवं किले के अवशेष इस क्षेत्र में जैन धर्म के वैभव के छिपा होने की गवाही देते हैं। पुरातत्व महत्व का यह स्थान पुरातत्व विभाग व प्रशासन की उपेक्षा का शिकार है।

बढ़ापुर कसबे से करीब चार किमी दूर पूर्वी दिशा में स्थित काशीवाला के खेतों व जंगल में प्राचीन जैन धर्म की वैभवशाली संस्कृति के भग्नावशेष छिपे हुए है। काशीवाला में एक प्राचीन खंडहरनुमा दिखने वाले स्थान को क्षेत्रवासी पारसनाथ के किले के नाम से जानते है। इस स्थान पर पूर्व में हुई खुदाई के दौरान मिलने वाली जैन धर्म से संबंधित खंडित मूर्ति, मंदिरों एवं किले के अवशेष यहां पर प्राचीन समय में किन्ही जैन आचार्यों की स्थली या जैन धर्म अनुयायियों की कोई विशाल बस्ती या किसी जैन राजा का साम्राज्य होने की गवाही देते है।

बुजुर्ग व जानकर बताते है कि मोजा काशीवाला पुराने समय में भयंकर जंगल था। यहां जैन समाज से संबंधी प्राचीन मूर्तियों के मिलने का सिलसिला करीब सात दशक पूर्व तब शुरू हुआ जब पंजाब व अन्य स्थानों से आए सिख परिवारों ने काशीवाला के जंगल में खेती करना आरंभ किया। ऊंची-नीची भूमि को समतल एवं कृषि योग्य बनाने की गरज से खुदाई के दौरान मिली हजारों वर्ष पुरानी जैन धर्म से संबंधित मूर्तियां व शिलालेख और पत्थर के टीलों से इस स्थान पर किसी जैन राजा के साम्राज्य व जैन समाज की कोई विशाल बस्ती होने का आभास हुआ। उस समय खेतों से मिली प्राचीन मूर्तियों पर किसी स्तर से भी कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। बताते है कि पारसनाथ किले से प्रसिद्व इस स्थान पर सन् 1951 में रक्षाबंधन पर्व के दिन काशीवाला निवासी सिख हरदेव सिंह को खेत समतल करने के दौरान उसके खेत से एक विशाल आकार की मनोरम मूर्ति मिली जिसके मध्य में श्री महावीर स्वामी एक ओर नैमिनाथ जी तो दूसरी ओर चंद्रप्रभु विराजमान थे । इस मूर्ति पर सिंह, हाथी व देवी देवताओं का बड़े ही आकर्षक ढ़ंग से चि़त्रण किया गया था। यह मूर्ति काफी समय तक हरदेव सिंह के डेरे पर ही रही बाद में इस मूर्ति को राष्ट्रीय म्यूजियम दिल्ली ले जाने संबंधी प्रयास हुए। लेकिन जिले के जैन अनुयायियों ने मूर्ति को बिजनौर में ही रूकवा लिया और इस मूर्ति को श्री दिगंबर जैन मंदिर बिजनौर में स्थापित किया गया था। श्री महावीर स्वामी की इस मूर्ति के मिलने के उपरांत ही जैन समाज के लोगों का ध्यान इस ओर गया । सन 1952 में 21 सदस्यीय किला पारसनाथ समिति का गठन भी हुआ लेकिन समिति इस स्थान के लिए कुछ विशेष नही कर पायी। सन् 1998 में भी एक बार पुनः यह स्थान उस समय चर्चाओं में आया था जब जैन समाज ने जैन मुनि आचार्य शांति सागर जी महाराज (हस्तिनापुर) व वीर सागर जी महाराज के परम शिष्य बालपति ऐरन एवं बैराज सागर जी महाराज (बरेली) की अगुवाई में पारसनाथ किले से काफी दूर सिख अमरीक सिंह व अवतार सिंह के खेत के बीच स्थित एक टीलेनुमा स्थान पर खुदाई का कार्य प्रारंभ कराया ।यहां तीन दिन की खुदाई के उपरांत इस स्थान से जैन धर्म की छोटी व बड़ी अनेक खंडित मूर्तियां,पत्थरों के स्तंभ और दीवारों पर बनी प्राचीन मूर्तियां एव खंडहर प्रकट हुए। इस स्थान के समीप ही एक प्राचीन कुआं व तालाब होने के प्रमाण भी दिखायी दिए ।इन्होंने इस ओर इशारा किया कि इस क्षेत्र में प्राचीन समय में जैन धर्मावलंबियों का कोई ऐतिहासिक स्थल अवश्य रहा होगा। यदि प्रशासन, सरकार व पुरातत्व विभाग इस ऐतिहासिक स्थान में रूचि ले तो इस स्थान पर जैन सभ्यता व संस्कृति के दर्शन का हो पाना असंभव नही है। जैन समाज ने इस क्षेत्र की महत्ता के दृष्टिगत इस प्राचीन स्थल को पहचान दिलाने के लिए किसानों से यह संबंधित कृर्षि भूमि क्रय कर भव्य मंदिरों विशाल धर्मशाला व संग्रहालय बनाकर खुदाई में मिली सामग्रियों को संजोकर रखा है। इस क्षेत्र के विषय के जानकार काशीवाला निवासी मनोहरजीत सिंह कहना है कि यह क्षेत्र आल्हा -उदल कालीन है। गढ़ कासौं की लड़ाई यहीं हुई और इस लड़ाई में जौहर करने वाली चार रानियों की समाधियां भी बनी हैं। उपेक्षा के चलते रानियों की समाधियां भी क्षतिग्रस्त हो रही हैं।

जर्जर रास्ता भी बन रहा है विकास में बाधक।

जैन मंदिर के पुजारी एवं व्यवस्था देख रहे क्षितीज जैन व मुरादाबाद से मंदिर दर्शन करने आए श्रद्धालु प्रकाश चंद्र जैन का कहना है कि क्षेत्र काफी पिछड़ा है । जैन तीर्थ स्थली को आने वाला रास्ता बेहद जर्जर अवस्था में होने पर यहां आने वाले श्रृदालुओं को घोर कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है।

कोविड-19 के कारण टालना पड़ा पंचकल्याणक कार्यक्रम।

जैन मंदिर के प्रबंधक सुरेश चंद्र जैन का कहना है कि जैन धर्मावलंबी यहां दूर-दूर से आते हैं। श्रृदालु यहां आकर इस क्षेत्र की महत्ता की जानकारी करते है। जैन साध्वी दीदी उमा जैन तपस्या में लीन है। कोविड-19 के चलते मंदिर पर आने वालों की संख्यां नगण्य हो गई है। कोविड-19 के कारण ही मंदिर पर होने वाला पांच दिवसीय पंचकल्याणक कार्यक्रम भी टालना पड़ा है।

शकील अहमद बढ़ापुर,

Friday, October 16, 2020

फिल्मी दुनिया के बड़े पत्रकार थे शम्स कंवल

          

धनाभाव से जूझते रहे पर टूटेे नहीं

गगन के हिंदुस्तानी मुुसलमान नंबर ने उन्हें मशहूर कर दिया

फोटो

अशोक मधुप

उर्दू के जाने माने पत्रकार- लेखक  शम्स कंवल  1925 में बिजनौर के एक मुस्लिम जमींदार ख़ानदान में पैदा हुए । बचपन में सुंदर होने के कारण उनके दादा शम्सुद्दीन   को जमील कह कर बुलाते थे। 1945 में बिजनौर के गवर्मेंट हाई स्कूल से मैट्र‌िक पास किया। शम्स कवंल का स्कूल की किताबों से अधिक साहित्यिक पुस्तकों में  मन लगता था। 1945 में मुरादाबाद इंटर काॅलेज से इंटर तथा लखनऊ से 1951 ग्रेजुएट किया। अपना नाम शम्स कंवल रख लिया । इसी नाम से कोमी आवाज़ लखनऊ में फिल्म एडिटर के तौर पर नौकरी करने लगे।

1952 में उन्होंने लखनऊ से अपनी फ़िल्मी 15 दिवसीय पत्रिका ‘ साज़‘ निकाली। क़रीब डेढ़ साल के बाद ये पत्रिका बंद हो गई। 1953 में दिल्ली आ गए और ‘फ़िल्मी दुनिया‘ में  सहायक संपादक बने ।1954 में ‘ रियासत‘ साप्ताहिक में असिटेंट एडिटर नियुक्त हुए। रोटी रोज़ी के लिए कई अख़बार व रिसालों में आलेख लिखे।

 1954 में  मुंबई चले गए। यहां उनको इंक़लाब अख़बार में फ़िल्म एडिटर की नौकरी मिल गई।1956 में उन्होंने फ़नकार साप्ताहिक अख़बार में संपादक हो गए। क़रीब डेढ़ साल के बाद शम्स जी फ़नकार से अलग हो गए।1959 में उन्होंने अपना साप्ताहिक फ़िल्म रिपोर्ट प्रकाशित किया । पैसों की तंगी में ये बंद हो गया। 1962 तक लगातार वे फिल्मी अख़बारों और रिसालों में आलेख, फिल्मी शख़्सियतों पर लेख, फ़िल्मों पर समीक्षा आदि  लिखते रहे।पाठक उनके लेखन के आनंद में मग्न रहते और नई तहरीरों के मुंतज़िर रहते। उनकी  आश्चर्यजनक संवेदनशील अभिव्यक्ति उनके गहन और गौण अध्ययन के द्वारा पाठकों के मन पर हुकूमत करने लगी।

गगन का प्रकाशन और सफर

मुबई के बड़े साहित्यकार और शम्स साहब के लंबे समय तक नजदीकी रहे असीम काव्यानी के अनुसार उन्होंने अपनी अथक मेहनत और विद्वता के बल पर  उल्हास नगर से  ‘गगन‘ मासिक का फ़रवरी 1963  में प्रकाशन शुरू किया। वे इसके  संपादक , पैकर और पोस्ट करने वाले ख़ुद ही थे। उनकी पत्नी शहनाज़ कंवल एक अच्छी और प्रसिद्ध कहानीकार है।ख़र्च में बचत के लिए  उन्होंने किताबत सीखी और गगन  की किताबत लगीं। शम्स साहब ने 22 साल के सफर में  गगन के दो विशेषांक  निकाले।1975 में ‘हिंदुस्तानी मुसलमान नंबर‘ 618 पृृष्ठ और 1984 में मज़ाहिबे आलम नंबर 1240 पृृष्ठ।

  हिंदुस्तानी मुसलमान नंबर में हर फ़िरक़े व हर ख़्याल और नज़रिए के क़लमकारों के आलेख इकट्ठा किए गए हैं। इसमें मुसलमानों की एतिहासिक, राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर बहस की गई है। ये एक एंसाइक्लोपीडिया का दर्जा रखता है। मुस्लिम राजनैतिक आंदोलन, धार्मिक संस्थाएं, मुस्लिम बुद्धिजीवियों की जीवनियां व लिस्ट,उनके भाषणों के अंश आदि के साथ  ख़ुद शम्स कंवल का आलेख शामिल हैं।बाल ठाकरे,कृृष्ण चंद्र,कुंवर महेंद्र सिंह बेदी,गोपाल मित्तल, प्रो डब्लू बी स्मिथ, बसंत कुमार चटर्जी आदि के आलेख संकलित हैं। इस विशेषांक  की धूम चारों ओर मची। कई वर्षों तक ये विशेषांक लोगों के ज़हनों में हलचल मचाता रहा। आज भी इस संकलन की चर्चा अक्सर होती रहती है।      

मज़ाहिबे आलम नंबर आम पाठकों को रूचिकर न लगा। न ही लागत का पैसा वापस आ सका । मजबूरन  गगन का प्रकाशन बंद हो गया।

 दिल्ली की  लेखिका रकशंन्दा रूही मेहंदी के अनुसार शम्स जी 1985 में अपने  वतन बिजनौर वापस आ गए। मुंबई में 30 वर्ष में 30 किराए के मकान बदले। कुछ दिन बिजनौर में गुज़ारने के बाद पुश्तैनी मकान में से अपने हिस्से की रक़म से 1985 में  अलीगढ़ में अपना घर ‘सलामा‘ तामीर करवाया और वहीं बस गए।

लेखन चलता रहा, बड़े व प्रसिद्ध रिसालों में उनके आलेख प्रकाशित होते रहे।अक्तूबर 1994 में एक बार फिर मासिक रिसाला ‘उफ़क़ ता उफ़क़ का प्रकाशन शुरू किया। इसके  छह अंक ही  निकल सके । उनकी सेहत ख़राब होने लगी। । अंत समय में सपत्नीक बिजनौर आ गए। आठ अक्तूबर 1995 को बिजनौर में अपने मकान में आखिरी सांस ली।

चाय के रसिया  थे शम्स कंवल

शम्स साहब के जानकारों  के अनुसार  शम्स कंवल चाय के रसिया थे। 40 सिग्रेट रोज़ पीना उनका शौक था। लगभग शाकाहारी थे। 40 वर्ष की उम्र में खुद ही सिग्रेट  छोड़ दी। वो बदला लेने में यक़ीन रखते थे। माफ़ करना उन्हें नापसंद था। उनके इस बर्ताव ने उनके बहुत से दुश्मन पैदा कर दिए थे। घूमने फिरने से उन्हें दिलचस्पी न थी। किताबें पढ़ने से उनको बेपनाह दिली ख़ुशी मिलती थी।वे एक तरह से नास्तिक थे। आदर्शवादी नज़रिए के वे मानने वाले थे।  उर्दू ज़बान को सही पढ़ने और लिखने पर ज़ोर दिया।  एमर्जेंसी के वो तरफ़दार थे। वे सदा अपने बनाए नज़रियात पर क़ायम रहे।

अशोक मधुप

Tuesday, September 8, 2020

गंगा जल और मेरी प्यास पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी






पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी-13
गंगा जल और मेरी प्यास
---------
मुझे बहुत तेज प्यास लगी थी। गंगा पास से बह रही थी। मजबूरी ,मैं दुनिया का प्यास बुझाने वाली पतिति पावनी से अपनी प्यास नहीं बुझा सकता था।
कई साल पहले की घटना है। खिरनी गांव के पास गंगा में नाव पलट गई। नाव में सवार छह व्यक्ति डूब गए। मैंने तय किया कि इस क्षेत्र का भ्रमण किया जाए।मैं अपने साथी संजीव शर्मा को लेकर खिरनी के लिए चल दिया। बस ने हमें खिरनी गांव के पास उतार दिया। पैदल चलकर हम खिरनी गांव के पास बहती गंगा के तट पर पहुंचे।
एक नाविक दिखाई दिया।मैंने उससे गंगा पार ले जाने का अनुरोध किया।उसने पूछा।कहाँ जाओगे।मेरे बताने पर की खादर में घूमना चाहते हैं।
उसने कहा कि कोई फायदा नहीं ।जंगल के सभी रास्तों में पानी भरा है।वह तो अपने खेत से पशुओं के लिए चारा लेने जा रहा है। मजबूरी है बाबू।हमें पशुओं का पेट भरना है।आप मत जाओ।
हमने उसका कहना माना।
वहां से गंगा के किनारे बिजनौर साइड में चलने का निर्णय लिया। बरसात का मौसम था। गंगा पूरे उफान पर बह रही थी। हम गंगा के किनारे- किनारे चल दिए। खोलों में उतरते चढ़ते।कुछ आगे चलकर एक किले के खडंहर दिखाई दिए। महल के किनारे बने गोले जैसा था। वहां बड़ी ईंट के अद्धे लगे हुए थे।यहां पुराने समय की ईट लगभग दो इंच मोटी और एक से डेढ फीट तक लंबी होती थी। मैंने देखा कि इसमें लगी ईंट अधिकतर आधी है। महल का अधिकांश हिस्सा गंगा में बह गया था। यही भाग बचा था।लगाकी यहां ईट किसी पुराने महल /भवन की निकाल कर यहां लाकर लगाई गई है। कुछ फोटो आदि खींचे और एक ईंट अपने साथ लेकर हम चल दिए।
इससे पहले कभी ऐसा सफर नहीं किया था। सो सफर की कोई व्यवस्था भी नहीं की थी। सफर के लिए पानी नहीं लिया था। जबकि बहुत जरूरी था।कुछ दूर गंगा के खोलों में ऊंचे -नीचे चलकर थकान हो गई। प्यास लगने लगी। गर्मी ज्यादा थी।रास्ते में एक दो किसान मिले ।उनसे पूछा कि कहीं पानी मिलेगा। प्यास लगी है। उन्होंने आश्चर्य से हमें देखा कहा -गंगा बह तो रही है।
बरसात के कारण मिट्टी कट रही थी पानी मटमैला था। प्यास बहुत थी। पर गंगा के जल को देखकर पीने की इच्छा नहीं थी।ऐसे चलते दो घंटे बीत गए। प्यास से जीभ बाहर निकल आई थी।होठ सूख गये थे।
कैसी विवशता थी कि कल -कल करती मां पावनी के तट के किनारे चलने के वाबजूद जल नहीं पी सकते है। लग रहा था कि कहीं बरसात का मटमैला पानी बीमार न कर दे।
कुछ दूर बसा एक गांव दिखाई दिया ।हम उसकी ओर बढ़ गए। प्यास बर्दास्त से बाहर होती जा रही थी। गांव में घुसते ही छप्पर की बस्ती दिखाई दी।कुछ खपरैल के मकान भी थे। यहां जगह -जगह बरसात का पानी जमा था। उसमें सुअर पड़ेआराम कर रहे थे। लगा कि वाल्मीकियों का मुहल्ला है। एक जगह नल दिखाई दिया। उसके चारों ओर भी बेइंतहा गंदगी पसरी थी। पर प्यास ने सब कुछ भुला दिया।जगह - जगह पसरी गदंगी,उससे उठती बदबू का ध्यान छोड़ हमने बढ़कर जमकर पानी पिया। रुक- रुक कर दो तीन बार पानी पीने के बाद तृप्त हो पाएं ।कुछ जान में जान आई।तब आगे बढ़े।
अशोक मधुप

Tuesday, August 18, 2020

पत्र कारिता की शुरुआत

पत्र कारिता की शुरुआत

1973 में मैंने संस्कृत से एमए किया। जनता उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में त्रिभाषा शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिल गई। साक्षात्कार में शर्त वह रखी गई कि आपको हाईस्कूल को हिंदी स्ंस्कृत पढ़ानी पड़ेगी। यह भी बताया गया कि हाई स्कूल के लिए रखा शिक्षक योग्य नही ं है,क‌िंतु रखना प्रबंधन की मजबूरी है।मैंने एक साल वहॉ कार्य किया। गांव में बनी एक मित्र ने कहा -बीएड कर लो। शिक्षण सत्र पूराकर  मैने बीएड कर लिया।इसके बाद  भाषा शिक्षक के पद पर जैन कॉलेज नहटौर में नियुक्ति मिल गई। 400 के आसपास वेतन मिलता था। इस दौरान मैंने विद्युललेखा नाम से साप्ताहिक शुरु किया।अखबार नबीसी का शौक ऐसा चर्राया कि नौकरी छोड़ दी। अकेले अपने दम पर साप्ताहिक निकालना कभी लाभ का साधन नहीं हो सकता था। कुछ दिन बाद वह बंद हो गया।

एक मित्र की सलाह पर बंद पड़े स्वतंत्र आवाज को चलाने की जिम्मेदारी मिली। तीन माह वहां काम किया। वहां से एक पैसा भी नहीं मिला। राष्ट्रवेदना के संपादक विश्वामित्र शर्मा ने कृपा की । एक सौ रुपये माह पर अपने यहां संपादन के लिए रख लिया।यह सफर कई साल चला।बिजनौर में कम्युनिष्ट पार्टी के प्रभाव में आकर प्रेस एम्पलाइज यूनियन बना ली। हमने यूनियन बनाई तो दक्ष‌िण पंथी विचार धारा के विश्वामित्र शर्मा जी को सबसे ज्यादा बुरा लगा। वह प्रेस मालिक की यूनियन बना बैठे । इस दौरान में अमर उजाला से जुड़ चुका था। बिजनौर से खबर भेजने लगा था।एक दिन मित्रा जी ने कम्पोजीटर करण को हटाने का नोटिस दे दिया। इसी को लेकर प्रेस कर्मचारी ने  हड़ताल कर दी। लगभग 26 दिन हड़ताल चली। बिजनौर की सभी प्रेस में ताले लग गए। बिजनौर से निकलने वाले दो दैनिक बिजनौर टाइम्स और राष्ट्रवेदना भी नहीं छपे। 26 दिन बाद हड़ताल टूटी। इस दौरान मित्रा जी ने मुझे हटा दिया। प्रेस कर्मचारी मजदूर पेशा थे। उनके रोटी -रोजी के संकट को देखते हुए। मैंने हड़ताल ख्रत्म होना ही बेहतर समझा। अमर उजाला से भी कुछ नहीं आता था। आदरणीय अतुल जी विदेश चले गए। अमर उजाला से संपर्क टूट गया।

मैंने अपना साप्ताहिक बारूद और विस्फोट शुरू कर दिया।वह जिले के कर्मचारियों की आवाज बना। कर्मचारी ग्राहक बनते गए। खर्च चलने लगा। इस दौरान मेरे एक मित्र राजकीय कर्मचारी नेता नेतागिरी के कारण निलंबित कर दिए गए। वह भी मेरे साथ लग गए। अखबार के ग्राहक बनते । आई राशि का बड़ा हिंस्सा उनके परिवार की जरूरत को जाने लगा।प्रेस की हालत यह थी कि वह बरसात में अखबार छापना पंसद करती। क्योंकि उनके पास काम नहीं होता। जब शादी , स्कूल के पेपर आदि का समय होता तो अखबार नहीं छप पाता।

मुझे रेलवे स्टेशन पर अजय प्र‌िंट्र‌‌िग प्रेस मिल गई। उस पर ज्यादा काम नहीं था। प्रेस के अंदर के कक्ष में एक पलंग था । मैं घूमता -फिरता आता। वहीं सौ जाता। एक तरह से अजय के परिवार का अंग बन गया।

इस दौरान कई साथियों ने बहुत मदद की। पुरे के डाक्टर सिद्दीकी थे। वह मेरे बेरोजगारी के इस समय में मुझे एक सौ रुपया प्रतिमाह देते।विरेश बल मिल जाते तो जबरदस्ती घर ले जाकर खाना खिलाते। ओमपाल सिंह और शुगर मिल पर रहने वाले एक और साथी भी विरेश बल की तरह ही थे।

इस दौरान बिजनौर से उत्तर भारत टाइम्स की शुरूआत हुई।मैं इसमें डैक्स पर रख लिया गया। झालू से मैं सवेरे नौ बजे के आसपास आने वाली ट्रेन से बिजनौर आता। रात को तीन बजे की ट्रेन से वापस जाता।

ये सिलसिला चल रहा था कि एक दिन एक साहब आए। मुझसे मेरे बारे में पूछने लगे। बात चीत हुई। उन्होंने अपना परिचय सुबोध शर्मा के रूप में दिया बताया कि बरेली से आया हूं। अमर उजाला के मालिक अतुल माहेश्वरी जी ने बुलाया है।

मैं  उनके साथ बरेली चला गया। अतुल जी ने कहा - अमर उजाला के लिए काम करो। मैंने हां कर दिया। कुछ  तै नहीं किया।  उसके बाद भी आजतक कभी कुछ नहीं मांगा। कुछ नहीं चाहा।

लकड़ी के बॉक्स से लेकर डिजिटल कैमरे तक पहुंचा फोटोग्राफी का संसार

लकड़ी के बॉक्स से लेकर डिजिटल कैमरे तक पहुंचा फोटोग्राफी का संसार

फोटोग्राफी आर्ट थी, वह खत्म हो गई

व्यवसाय पैसे वाले हावी हो गए

अशोक मधुप

बिजनौर। फोटोग्राफी का जनपद का इतिहास 75- 80 साल के आसपास का होगा। बॉक्स कैमरों से हम आज ‌डिजिटल कैमरों तक पहुंच गए। मोबाइल में आए कैमरों ने हर व्यक्ति को फोटोग्राफर बना दिया। हालत यह हो गई कि आए कार्यक्रम में कवरेज के लिए आए व्यवसायिक और प्रेस फोटोग्राफर को फोटो खींचने के लिए जगह नहीं मिलती।मोबाइल धारक मोबाइल तान कर पहले ही तैयार हो जातें हैं।

बिजनौर के फाइन स्टूडियों के स्वामी शकील अहमद बतातें हैं मिर्दगान के रहने वाले हाजी जमीर अहमद कचहरी मार्ग पर स्थित सराय के प्रवेश द्वारा में बैठे रहते थे। फोटो बॉक्स कैमरों से खींचते थे। बाद में इनका बेटा काम करने लगा। ये लकड़ी का बड़ा बाक्स कैमरा रखते थे। इसके काले परदे में मुंह देकर फोटा खींचा जाता था। कैमरे में लगे बॉक्स में ही फोटो बनता था। मुख्य बाजार में तुफैल अहमद भी बॉक्स कैमरे से फोटो खींचते थे। आज यहां साहू शंभू दयाल जी का बाजार बन गया।विशेषकर बूरे और बताशों की दुकान हैं।

लिबर्टी फोटो स्टूडियो कि स्वामी पवन शर्मा कहतें हैं कि पहले फोटोग्राफी आर्ट थी। इसमें फोटोग्राफर की कला का परिचय मिलता था। इस समय निगेटिव बनता था। इसे गहरी काली पैंसिल से रिटच किया जाता था। दाग धब्बे मिटाए जाते थे। उसके बाद कलर किया जाता था। वे बतातें हैं कि इसके लिए गुर्टू साहब, उनके यहां काम करने वाले हरकेश सिंह, कौशिक चित्रशाला के रूपचंद, विशाल स्टूडियो के मोहम्मद सलीम, स्कूल रोड के फोटोग्राफर सईद अहमद, आरके स्टूडियों के राजेंद्र टांक प्रसिद्ध थे।रंगून फोटो स्टूडियों के स्वामी नसीम अहमद कहते हैं कि विशाल फोटो स्टूडियो के सलीम साहब ने कलर निगेटिव पर टचिंग की। उनकी देखा देख उन्होंने भी रंगीन न‌िगेटिव पर ट‌चिंग का काम किया। जजी पर विजय चौधरी का अपना विजय नाम से स्टूडियो था। इसके बाद अब उनके बेटे स्टूडियो चला रहे हैं। विजय चौधरी का बिजनौर की फोटोग्राफी में बड़ा नाम है। जजी का ही बाना फोटो स्टूडियो बंद हो गया। अब बाना साहब के बेटे रुपेंद्र बाना घर पर ही ड‌बिंग और बुकिंग का कामा कर रहे हैं।चित्रलोक स्टूडियो के मनोज पांडेय प्रसिद्ध से थे। निधन के बाद इनका स्टेडियो बंद हो गया। इनके भाई सुधीर धर से ही काम कर रहे हैं। उत्तम कलर लैब के ऋषिपाल सिंह बहुत पुराने फोटोग्राफर रहे हैं। मूल रुप से से मुजफ्फरनगर के रहने वाले हैं।घंटाघर के नीचे अनिल पंडित का पंडित फोटो स्टूडियो सन 1985 के आसपास बहुत प्रसिद्ध हुआ।

गूर्ट्र और कौशिक च‌ित्रशाला के आज के स्वामी योंगेंद्र शर्मा कहते हैं कि आज फोटोग्राफी में धन आ गया। आधुनिक संयत्र और महंगे उपकरण वाले लोग हावी हो गए। मूलरुप से फोटोग्राफर बेकार हो गए या कुछ और करने को मजबूर हैं। इस व्यवसाय में आए पैसे वालों ने उन लड़कों से काम कराना शुरु कर दिया जो इसका कुछ जानते भी नहीं। पहले फोटोग्राफर कम से कम फोटो खींचता था। क्योंकि उस समय उसके 120 एमएम के कैमरे की एक फिल्म में आठ या 12 ही फोटो खिंच पाते थे।उसके बाद 35 एमएम के कैमरे आए। इनमें 36 फोटो खिंचते ‌‌थे।अब तो डिजीटल युग है। चाहे कितने ही फोटो खींचे जाओ।

रीगल स्टेडियों के स्वामी राज बिहारी लाल सक्सेना उर्फ राजा कहते हैं कि उनका 40 साल पुराना स्टूडियो है। इससे पहले कई साल गुर्टू स्टूडियो पर काम किया। इस दौरान फोटोग्राफी की पूरी दुनिया बदल गई। पहले कैमरो में प्लेट लगती ‌थी फिर फिल्म आईं। डिजिटल युग शुरु हुआ तो ऐसे कैमरे आए जिनमें फ्लॉपी लगतीं थी। अब चिप और मैमोरी कार्ड का युग आ गया।

शौकीन

राम बाग कॉलोनी के रहने वाले विजय पंड‌ित घुमकड़ी और फोटोग्राफी 32 साल से कर रहे हैं। पूरे भारत वर्ष के साथ 30 देश घूम चुके हैं। जैमनी डेंटल क्लीनिक के स्वामी डा.हेमंत रस्तोगी को फोटोग्राफी में बड़ा लगाव है। अवसर मिलते ही घूमने निकल जाते हैं। जिला अस्पताल के नेत्र चिकित्सक मनोज सैन को फोटो के साथ वीडियो ग्राफी में बहुत रुचि है। कचहरी रोड के रहने वाले सुनील कुमार गुप्ता बढापुर में शिक्षक रहे। वन्य क्षेत्र होने के करण फोटोग्राफी के शौक में वहां 30 साल मोनी का नाम से स्टेडियो चलाया। सेवानिवृति के बाद अब बिजनौर में हैं। इनका बेटा वैन्तेय का बिजनौर में आर्ट काम ग्लेरियो के नाम से बड़ा स्टूडियो है।

एक कैमरा से कैसे किसी अच्छे काम को समाज में जगह दिलाई जा सकती है, आशीष लोया ने इसकी मिसाल पेश की है। श्री श्री रविशंकर की आर्ट ऑफ लिविंग संस्था से जुड़े आशीष लोया जब बैराज होकर बिजनौर आते -जाते थे तो उन्हें गंगा तट पर पक्षियों की चहचहाहट आकर्षित करती थी। उन्होंने एक दिन तट पर जाकर देखा तो पता चला कि वहां प्रवासी पक्षी थे। अपने कैमरे से उनके फोटो खिंचने शुरू किए। बाद में गंगा तट के दूसरी ओर के हजारों प्रवासी प‌क्षियों के फोटो खींचकर अफसरों को दिखाए। उनके प्रयास से ही गंगा के तटीय क्षेत्र को हैदरपुर वेटलैंड घोषित कर वन्य जीवों के लिए आरक्षित किया गया है।

डीएफओ एम सेम्मारन ने एटा में अपनी जॉब के दौरान जंगल में घूमना शुरू किया जंगल की सुंदरता उनके मन को भा गई। वन्य जीवन के खूबसूरत नजारों को सभी को दिखाने के लिए करीब ढाई लाख का कैमरा खरीदकर फोटोग्राफी शुरू कर दी। जिले के वन्य क्षेत्र में भी वे बहुत फोटोग्राफी करते हैं। उनके खींचे गए फोटो विकास भवन में लगाए गए हैं।

वर्ड फोटोग्राफी डे पर विशेष

पुरानी यादों को ताजा करती हैं फोटो-

चांदपुर के फोटोग्राफर सरदार परमजीत सिंह पिछले करीब 30 वर्षो से फोटोग्राफी का काम करते हैं। परमजीत ने बताया कि तस्वीरें बोलती हैं वजह उनसे जुड़ी यादें होती हैं। तस्वीर देखते ही पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। पिता परमजीत को देख पुत्र मनोरथ का मन भी फोटोग्राफी में रमने लगा है। उसने भी फोटोग्राफी में डिप्लोमा कर इस व्यवसाय को अपना लिया है।

-------------

अखबार की फोटो देख फोटोग्राफी में बढ़ी रूचि-

फोटोग्राफर लवली शर्मा करीब 32 साल से फोटोग्राफी का काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अखबार में छपी फोटो आकर्षित करती थी। यहीं से ही फोटोग्राफी की रूचि हो गई। उन्होनें बताया कि लम्हों को कैद कर लेने की कला फोटोग्राफी में ही सम्भव है।

लवली ने बताया कि पहले फोटोग्राफी काफी मुश्किल हुआ करती थी। फोटोग्राफी में कला दिखानी पड़ती थी। कैमरे में रिल चलती थी। निगेटिव से फोटो तैयार किए जाते थे। समय भी ज्यादा लगता था। जब से फोटोग्राफी डिजिटल हुई है तब से फोटोग्राफी काफी आसान हो गई है। पुरानी फोटोग्राफी की याद के लिए अभी भी पुराने कैमरे रखे हुए हैं।

सात दशक पुराना है नजीबाबाद का फोटोग्राफी इतिहास

नजीबाबाद-18 अगस्त

ब्लैक एंड व्हाइट फोटोग्राफी में नजीबाबाद का इतिहास सात दशक पुराना है। नगर के जानेमाने फोटोग्राफर रहे स्व. महावीर प्रसाद गुप्ता ने आजादी के मात्र छह वर्ष बाद 1953 में नजीबाबाद में फोटोग्राफी की शुरूआत की थी। अपने मामा देहरादून निवासी सागर मल गोयल के साथ देहरादून में 16 वर्ष फोटोग्राफी का अनुभव लेने के बाद महावीर प्रसाद नजीबाबाद में ब्लैक एंड व्हाइट फोटोग्राफी में मील का पत्थर बने। महावीर प्रसाद को ब्लैक एंड व्हाइट फोटो को रंगीन फोटो में बदलने की भी महारथ थी। महावीर प्रसाद के पुत्रों फोटोग्राफर विनोद गुप्ता और विनय गुप्ता को विरासत में फोटोग्राफी की महारथ हासिल हुई। तीसरी पीढ़ी में कम्प्यूटराइज्ड फोटोग्राफी दौर में राजीव गुप्ता और संजीव गुप्ता ने भी अपने पिता और बाबा का नाम रोशन रखा।

-----------------

फोटो आर्ट और वीनस स्टूडियो के स्वामी मशहूर फोटोग्राफर मतलूब अहमद और उनके छोटे भाई अशरफ शमीम वारसी उर्फ शब्बन की फोटोग्राफी का भी जबाव नहीं था। ब्लैक एंड व्हाइट फोटो खींचना, संसाधनों की कमी के बावजूद उन्हे संवारने में उस जमाने के फोटो ग्राफरों का अपना हुनर था। फोटोग्राफर स्व. मतलूब अहमद के पुत्र अहसान उर्फ गुड्डू फोटो आर्ट स्टूडियो के माध्यम से फोटोग्राफी की विरासत को बखूबी आगे बढ़ा रहे हैं।

---------------------

70 के दशक में आरके स्टूडियो के माध्यम से फोटोग्राफर राजू टांक का नगर में नाम रहा। बाद में आरके स्टूडियो की कमान पूनम स्टूडियो के रूप में फोटोग्राफर स्व. मुन्ने भाई ने फोटोग्राफी कला का लोहा मनवाया।


। गांव छोईया नंगली निवासी तैयब अली को बचपन से घूमने का शौक था। एक फर्म में काम करते हुए उन्होंने अपने इस शौक को परवान चढ़ाया। वे जब घूमने से पीछे नहीं हटते तो इन यादों को सजोने के लिए फोटोग्राफी का खुमार चढ़ जाना बहुत सामान्य है। तैयब अली जहां भी जाते हैं वहां की यादों को वे अपने कैमरे में हमेशा के लिए सजो लेते हैं। कुछ समय पहले वे जोशीमठ में कल्पवृक्ष देखने भी गए थे जो पूरे भारत में केवल चार ही हैं। उनके पास 25 हजार फोटो का कलेक्शन है। वे फेसबुक ब्लॉग पर नई नई जगहों के फोटो डालकर वहां की जानकारी दे रहे हैं।

पीडब्लूडी में इंजीनियर नजीबाबाद निवासी ज्ञान प्रकाश का शौक ही फोटाग्राफी है। वे कुदरत के खूबसूरत नजारों के फोटो लेने के दीवाने हैं। ज्ञान प्रकाश फोटो लेने के लिए ऊंचे ऊंचे पहाड़ों पर भी पहुंच जाते हैं। ज्ञान प्रकाश का कहना है कि उन्हें फोटोग्राफी का शौक नहीं है बल्कि इसका नशा है। उनका कहना है कि कुदरत के नजारों के सामने इंसानी दुनिया कुछ भी नहीं है। वे अपने फोटो से सभी को कुदरत के नजारे दिखाते हैं।

--

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी 13

 पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी 13

23 दिसंबर 1989 को श्रमजीवी पत्रकार संघ के सम्मेलन में भाग लेने के लिए मुझे स्वगीय राजेंद्र पाल सिंह कश्यप, वीरेशबल आदि को गांधीनगर गुजरात जाना था। कार्यक्रम काफी पहले से निर्धारित था। हम उसकी तैयारी में लगे थे । पता चला कि नजीबाबाद के साथी जितेंद्र जैन को पुलिस ने पकड़ा। थाने में बुरी तरह मारा- प‌ीटा। दरवाजे के किवाड़ में देकर उनकी उंगली कुचल दीं गई। प्लास से नाखून खींचे गए। पुलिस जितना कर सकती थी ,उनके साथ किया। जितेंद्र जैन जेल भेज दिए गए।

नजीबाबाद के साथी अपने साथ मुझे भी जितेंद्र जैन से मिलने जेल ले गए। जितेंद्र जैन की हालत देखकर सबको बहुत गुस्सा आया। उन्होंने आप बीती भी सुनाई। यह बात मैंने वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय राजेंद्र पाल सिंह कश्पय को बताई। उन्होंने कहा कि हमें कल निकलना है। मैंने कहा निकलना तो शाम को है। बड़ी ज्यादती हुई है। कल दिन में प्रदर्शन कर लेते है्ं। वहीं से मैंने श्री बाबूसिंह चौहान साहब से बात की। चौहान साहब ने कहा कि वे भी जेल मेंं जितेंद्र जैन से मिलकर आए हैं। वास्तव में उसके साथ बहुत ही ज्यादती हुई है। बात चीत हुई।सहमति बनी की ज्यादती हुई है। आवाज उठाई जाए।अगले दिन 11 बजे प्रदर्शन करना तै हुआ। यह भी बात हो गई कि प्रदर्शन होगा, यह खबर सुबह के सब अखबारों में छप जाए।

बिजनौर के पत्रकारों में भी अन्य जगह की तरह धड़े बदी है। ,खेमें हैं। इसके बावजूद यह भी सत्य है कि पत्रकारों के विरुद्ध होने वाली ज्यादती पर एक साथ खड़े हो जाते हैं।

उस समय डा कश्मीर सिंह एसपी थे। नजीबाबाद में सत्तार नाम एक बदमाश था। उसके आंतक से सब परेशान थे। उसने जाब्ता गंज के सतीश की निर्ममता पूर्वक हत्या कर दी थी। उसके परिवार जन सत्तार की गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे।पोस्टमार्ट के बाद सतीश का शव नजीबाबाद आया। उसे जाब्तागंज जाना था किंतु लोगों ने घोषणा कर दी कि उसका अंतिम संस्कार कल्लू गंज में किया जाएगा। कल्लू गजं में शव जमीन पर रखकर ।अग्नि देने की प्रकिया चल रही थी कि एसडीएम और क्षेत्राध‌िकारी मौके पर पंहुच गए। शव कब्जे में लेकर भीड़ को भगा दिया गया। बताया जाता कि अधिकारियों ने इस मामले में नजीबाबाद के पत्रकारों से बात की थी।कहा था कि इस प्रकरण में पत्रकार जितेंद्र जैन की भूमिका संदिग्ध है। हो सकता है कि प्रशासन को लगा हो कि पत्रकार नहीं बोलेंगे । इसीलिए उसने जितेंद्र जैन के साथ बरबरता की।

अगले दिन समाचार छपा । 11 बजे पूरे जनपद से पत्रकार एकत्र हुए। प्रदर्शन हुआ।हमने कहा कि हम यूनियन के गुजराज सम्मेलन में जा रहे हैं। ये बात यहां उठाएंगे। हम रात में निकल गए।

बिजनौर में श्री बाबू सिंह चौहान रह गए। अधिकारी चौहान साहब का सम्मान करते ही थे। डरते भी थे। क्योंकि वे बड़े से बड़े प्रभाव के आगे दबते नहीं थे।

तत्कालीन एसपी डा कश्मीर सिंह अलग तरह के अधिकारी थे। उनके बिजनौर की मीडिया समेत समाज के सभी महत्वपूूर्ण लोगों से संबंध थे। हालत यह थी कि उनके तबादले पर जगह जगह विदाई कार्यक्रम हुए थे। शहर की दुकानों पर मिठाई नही बची थी।प्रदर्शन और चौहान साहब का रूआब जितेंद्र जैन को रिहा कराने में कामयाब आ गया। मामला खत्म हुआ।

छात्रवृति घोटाला

 छात्रवृति घोटाला

1993 में बिजनौर जनपद में हरिजन समाज कल्याण विभाग में घोटाला हुआ। यह लगभग 50 लाख रुपये का घोटाला था। दो वर्ष पूर्व अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए छात्र वृति देने की सरकार की योजना आई। इसमें व्यवस्था की गई थी कि छात्रवृति विद्यालय के खाते में जाएगी। इस व्यवस्था की कमी को बिजनौर समाज कल्याण विभाग के एक ल‌िपिक मोर्य ने पकड़ लिया। उसने जनपद के कुछ विद्यालय के प्रबधंक- प्रधानाचार्य के दोस्ती गांठी। उनसे कॉलेज के नाम से मिलते -जुलते नाम के खाते खुलवा लिए।विद्यालय को छात्रवृति न भेजकर विद्यालयों से मिलते -जुलते खातों में राशि डाल दी।

इस घोटाले का मुझे जून के आसपास पता चला। मैंने अमर उजाला में छापना शुरु किया। उस समय ओम सिह चौहान समाज कल्याण अधिकारी थे । वे दावा करते कि उनके यहां घोटाला हो ही नहीं सकता। सीडीओ सुंदर लाल मुयाल होते थे। उन्होंने हमारे समाचार देख तत्कालीन डीडीओ आरएस वर्मा को जांच सौंपी ।

इस प्रकरण लगभग आठ माह चला।प्रारंभिक जांच में 27 लाख का घोटाला मिला। 23 मार्च 1994 को समाज कल्याण अधिकारी ओम  सिंह चौहान  की गिरफ् तारी हुई।

समाज कल्याण विभाग में एक कर्मचारी होते थे मलिक। उनके पिता मेरे दोस्त होते थे।इस प्रकरण के चलने के दौरा एक दिन शाम को मलिक मेरे पास आए। अटैची उनके पास थी। वह बोले - छात्रवृति घोटाले के समाचार छापने बंद कर दें। अटैचीं में तीन लाख रुपये हैं। इन्हें रख लें। मैंने कहा - मलिक तुझे यह भी ख्याल नहीं आया कि तेरे वालिद मेरे दोस्त होतें हैं । वह बहुत शर्मीदा हुआ। अटैची लेकर वापस चला गया।

इसके बाद केस शुरु हो गया। एक दिन एक वकील साथी दफ्तर आए। बोले - समाज कल्याण का बाबू जगन लाल मोर्य को लेकर आऊंगा।वे चाहतां  है कि आप उन्हें लिखकर दे दें। इस घोटाले की जानकारी मैने मोर्य ने दी। इसके बाद आपने छापी। जो आपकी बात हो, उसमें से पांच हजार रुपये मुझे देने हैं।

वे बाद में मोर्य को लेकर आए। मोर्य को उम्मीद थी कि अमर उजाला से लिखकर  मिल जाने पर तू बच जाएगा। मैंने कहा कि लिखकर दे दूंगा। बीस लाख लूूंगा। मैं जानता था कि वह नहीं देगा। मैंने कहा मोर्य बाबू वह भूल गए, जब मैने तीन लाख लौटा दिए थे। तुमने कैसे सोच लिया कि मैं लिखकर दे दूंग?। मोर्य को तो उतना बुरा नहीं लगा, जितना मित्र महोदय को लगा। क्योंक‌ि मुफ्त में मिल रह पांच हजार रुपये का उनका नुकसान हो गया।