Wednesday, June 10, 2026

मचछर और चाय का प्याला व्यंग

 

मच्छर र चाय का  प्याला

अशोक मधुप


 मच्छर। जी वो मच्छर हो था।सवेरे −सवेरे आया।फालतू में मूड़ ख़राब कर गया।मैंने उसे बुलाया तो था नहीं। खुद आया। मेरे कान पर नहीं गुनगुनाया।आने का कोई संकेत भी नहीं बताया।आकर मेरी चाय में गिर गया।पता नही नही चला, कब ये हो गया।सिप करने के लिये जब कप होंटो के पास गया,तब महाशय की उपस्थिति का अहसास हुआ।सवेरे में  उठकर मैं अपने और पत्नी के लिए रोज दो कप चाय बनाता हूँ। कुछ कड़क।बड़े कप में।पटियाला पेग के बराबर।पत्नी  सो रहीं थीं।उनका कप प्लेट से ढककर रख दिया।अपना कप हाथ में लेकर चाय सिप करने के लिए,कप के होठों के पास पहुंचते  अहसास हुआ कि आत्महत्या के इरादे से प्याले में मच्छर महाशय कूद गए।।मैंने उन्हें जल्दी से निकलने की बहुत कोशिश की।बचाने चाहे उसके प्राण।दिखानी चाही मानवता।पर प्रयास और कोशिश बेकार गई।गर्म चाय में डालने से उंगली र जल गई।बहुत झल्लाहट हो रही है।इसे डूबने कर लिए मेरा चाय का भरा कप ही मिला।कोई रास्ते में  नदी −तालाब नहीं मिला। कहीं  और डूब मरता । मेरी मेहनत से बनाई  चाय तो खराब न करता। सवेरे ही क्यों डूबा।  क्या जल्दी थी। दिन निकलने का  तो इंतजार करना था। इतनी जल्दी थी तो कहीं और जाकर मरना था।
जल्दी में मैने उसे चाय से निकाल कर फेंक दिया। कई   बार चाय पीने का इरादा किया। किंतु मन ने स्वीकार नहीं किया। आखिर मजबूर हो नाली में बहा दिया। जल्दी में यह भी तो नही देख पाया । वह नर था या मादा। विवाहित था या क्वारा।  धर्म  क्या था।  हिंदू , मुस्लिम , सिख इसाई, बौद्घ ,पारसी  या कोई  और। इसमें भी सवर्ण था, या पिछड़ा।अनुसूच‌ित जाति से तो नहीं था।  कुर्मी था या पासी। कौन था।  यादव तो नहीं था।यह भी पता नहीं चला कि वह अपनी ही जाति के लोगों का खून चूंसता था। या दूसरी  जाति के व्य‌क्त‌ियों का। सवर्ण था तो क्या सर्वहारा का खून चूंसता था। ऐसा तो  नही चुन− चुन कर पिछड़ों या दलितों को अपना शिकार बनाता रहा हो।
दलित था  तो क्या सवर्ण से नफरत करता था।  दलित के मुकाबले  ऊंची जाती वालों को  गहरा घाव कर खून चूंसता। अपनी जाती  को छोड़ देता। पर वह तो मच्छर रहा होगा।  साम्यवादी। उसे जाति धर्म से क्या? बस पेट भरने से मतलब। जो मिला । उसी का ही खून चूंस लिया।
एक नुकसान हो गया। मैं जल्दी में ज्यादा जानकारी भी नहीं कर पाया।  उसकी जान बचाने के चक्कर में यह भी नहीं देख सका कि वह टायलेट का मच्छर था या बाथ रूम का। बाथरूम का था तो आम  आदमी के या किसी रईस के बाथरूम का। सूंघ कर देखना चाहिए था। सुगंध  से पता चलता। उसमें बढ‌‌िया  सुगंध आ रही होती तो पता चलता कि किसी बड़े व्यक्ति के बाथरूम में चला बढ़ा है।  वैसे बड़े व्यक्ति के यहां तो मच्छर का होना ही मुश्किल है। यह तो गरीबों के घर या सार्वजनिक टायलेट में शान से पलतें और बढ़तें हैं।

एक बात अच्छी रही कि मर गया। अगर किसी मलेरिया, डेंगू के मरीज को काटकर आया होता । तब मुझे जरूर बीमार करता।किसी कोरोना के मरीज को छूकर  आया होता तो मुझे जरूर अस्पताल भिजवाता।अच्छा हुआ। चाय में डूब गया। उसके साथ उसमें जमा वैकटीरिया भी मर गए। अगर न मरता तो जाने कितनों को काटकर बीमार करता। देखकर लगा था कि काफी बड़ा था। शायद नौ जवान। लंबी टांगे । बड़े पंख। यह भी पता नहीं चला कि रात में किसके खून का आंनन्द लिया। किसी ‌महिला के खून का आनन्द लिया या युवती को किस ‌क‌िया। किसी युवक का खून चूंसा या बूढे का शिकार किया।


अशोक मधुप

 

 

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