गोवा का नाम सुनते ही सबसे पहले जेहन में नीले समंदर की लहरें, दूर तक फैले रेतीले समुद्र तट, पुर्तगाली वास्तुकला की झलक और देर रात तक चलने वाली पार्टियां उभर आती हैं। लेकिन इस आधुनिक और चकाचौंध से भरे राज्य के भीतर एक ऐसा शांत, आध्यात्मिक और प्राचीन संसार भी सांस लेता है, जिसकी चर्चा अक्सर उतनी नहीं होती, जितनी होनी चाहिए। गोवा केवल मौज-मस्ती का केंद्र नहीं है, बल्कि यह महान संतों, प्राचीन ऋषियों और अनगिनत राजवंशों की आध्यात्मिक भूमि भी रहा है। यहां के कोने-कोने में बसे प्राचीन मंदिर इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि तमाम विदेशी आक्रमणों, मजहबी अत्याचारों और औपनिवेशिक बदलावों के थपेड़े खाने के बावजूद इस राज्य ने अपनी सनातनी जड़ों को न केवल सुरक्षित रखा, बल्कि उन्हें और अधिक मजबूती से सींचा है। एक बात और इन भव्य मंदिरों भीड़ न के बराबर है। सब कुछ शांत। न शोर । न शराबा। अधिकतर मंदिरों में सात्विक भोजन की कैंटीन भी है तो रहने के लिए प्रायः कक्ष भी हैं।
आप गोवा घूमने आ रहे हैं, तो यहां के शानदार
मंदिरों का दर्शन किए बिना आपकी यात्रा अधूरी मानी जाएगी। चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी के बीच जब गोवा पर
पुर्तगालियों का शासन स्थापित हुआ, तो
उन्होंने व्यापक स्तर पर हिंदू धार्मिक स्थलों को नष्ट करने और बलात धर्म परिवर्तन
कराने का अभियान चलाया। उस भयावह दौर में गोवा के मूल निवासी सारस्वत ब्राह्मणों
और अन्य सनातनी समुदायों ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर अपने आराध्य देवी-देवताओं
के विग्रहों (मूर्तियों) को पुर्तगाली नियंत्रण वाले क्षेत्रों (जैसे बारदेज, तिसवाड़ी और
साल्सेट) से चुपचाप निकाला। वे इन मूर्तियों को लेकर नदियों को पार कर उन
क्षेत्रों में चले गए जो उस समय मुस्लिम आदिलशाही या स्थानीय राजाओं के अधीन थे, जैसे कि पौंडा
(अंतूज़ महाल)। यही कारण है कि आज गोवा के सबसे प्रसिद्ध और भव्य मंदिर आपको तटीय
इलाकों के बजाय पोंडा के घने जंगलों, पहाड़ियों
और प्राकृतिक वादियों के बीच स्थित मिलते हैं। पोंडा पणजी से मात्र 28 किलोमीटर दूर है।
गोवा के मंदिरों की वास्तुकला
पूरी दुनिया में अनूठी है, क्योंकि
इसमें पारंपरिक हिंदू मंदिर निर्माण कला के साथ-साथ मुस्लिम (बीजापुरी) और
पुर्तगाली स्थापत्य कला का एक अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है। यहां के मंदिरों
की सबसे बड़ी विशेषता उनके परिसर में बने विशाल 'दीपस्तंभ' होते हैं, जो कई मंजिला ऊंचे होते हैं और
त्योहारों के दिनों में जब इनमें सैकड़ों दीये जलाए जाते हैं, तो पूरा परिसर
आलौकिक रोशनी से नहा उठता है। इसके अलावा, यहां
के मंदिरों की गुंबददार छतें, लकड़ी
पर की गई बारीक नक्काशी और पानी के सुंदर तालाब (टैंक) पर्यटकों को आकर्षित करते
हैं।
गोवा का सबसे लोकप्रिय और भव्य
मंदिर 'श्री
मंगेशी मंदिर' है, जो फोंडा तालुका के
प्रियोल गांव में स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव के एक रूप 'मंगेश' को समर्पित है, जिन्हें स्थानीय लोग
मंगिरीश भी कहते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार,
एक बार भगवान शिव ने माता पार्वती को डराने के लिए एक भयानक
बाघ का रूप धारण किया था। भयभीत होकर माता पार्वती ने शिव जी को पुकारते हुए कहा
था 'त्राहि
माम् गिरीश' (हे
पर्वतों के स्वामी, मेरी
रक्षा करें)। इसी वाक्य के अपभ्रंश से 'मंगिरीश' और बाद में 'मंगेश' नाम पड़ा। यह मंदिर
मूल रूप से जुआरी नदी के तट पर कुशस्थली (वर्तमान कोरटालिम) में स्थित था, लेकिन वर्ष 1560 में पुर्तगालियों के
डर से भक्त इस शिवलिंग को गुप्त रूप से प्रियोल ले आए। इस मंदिर की महत्ता इतनी
अधिक है कि यह हजारों सारस्वत ब्राह्मण परिवारों के कुलदेवता हैं और संगीत
सम्राज्ञी लता मंगेशकर का परिवार भी इसी गांव और मंदिर से ताल्लुक रखता है।
राजधानी पणजी से मंगेशी मंदिर की दूरी लगभग 21
किलोमीटर है।
मंगेशी मंदिर के बिल्कुल करीब, फोंडा के ही कवले
गांव में स्थित है 'श्री
शांतादुर्गा मंदिर', जो
गोवा के सबसे पूजनीय स्थलों में से एक है। यह मंदिर देवी दुर्गा के एक शांत और
सौम्य रूप को समर्पित है। इन्हें स्थानीय भाषा
में 'सांतेरी' कहा जाता है।
मान्यता है कि जब भगवान शिव और भगवान विष्णु के बीच एक भयंकर और विनाशकारी युद्ध
छिड़ गया था, तब
ब्रह्मा जी के अनुरोध पर जगदम्बा ने बीच में आकर दोनों को शांत कराया था। इसके बाद उन्हें 'शांतादुर्गा' नाम मिला। गर्भगृह
में माता की मूर्ति के दोनों तरफ शिव और विष्णु की मूर्तियां स्थापित हैं, जो इस पौराणिक घटना
को दर्शाती हैं। इस मंदिर का इतिहास भी स्थानांतरण से जुड़ा है। मूल रूप से यह
साल्सेट के कलोसिम में था, जिसे
पुर्तगालियों ने नष्ट कर दिया । इसके
बाद 18वीं
शताब्दी में मराठा राजा शाहू महाराज के मंत्री रामचंद्र पंत ने इस भव्य मंदिर का
पुनर्निर्माण कवले में करवाया। इस मंदिर की वास्तुकला में पुर्तगाली शैली की खिड़कियां
और रोमन शैली के रंगीन कांच देखे जा सकते हैं। पणजी से इस मंदिर की दूरी करीब 30 किलोमीटर है।यदि आप
भारत के इतिहास और सबसे प्राचीन वास्तुकला के दीवाने हैं, तो आपको 'ताम्बडी सुरला
महादेव मंदिर' जरूर
जाना चाहिए। यह गोवा का एकमात्र ऐसा मंदिर है जो पुर्तगालियों और उससे पहले के
मुस्लिम आक्रमणकारियों से पूरी तरह सुरक्षित रहा, क्योंकि यह पश्चिमी घाट के घने और
दुर्गम जंगलों के बीच छिपा हुआ था। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में
यादव राजा रामचंद्र के मंत्री हेमाद्री द्वारा बारीक काले बेसाल्ट पत्थरों से
कराया गया था। यह मंदिर पूरी तरह से कदम-यादव शैली (जैन वास्तुकला से प्रभावित)
में बना है। इसके गर्भगृह में एक प्राकृतिक शिवलिंग स्थापित है और मंदिर के खंभों
पर हाथियों, लताओं
और देवी-देवताओं की अत्यंत सुंदर नक्काशी की गई है। सावन के महीने और महाशिवरात्रि
पर यहां की छटा देखते ही बनती है।
मंदिर के पास बहने वाली सुरला नदी की कलकल आवाज इस जगह की आध्यात्मिकता को कई गुना
बढ़ा देती है। पणजी से यह मंदिर लगभग 65 किलोमीटर
दूर भगवान महावीर वन्यजीव अभयारण्य के अंदर स्थित है। घने जंगलों के बीच से गुजरने
वाला यह रास्ता खुद में एक अद्भुत रोमांच है।
गोवा का एक और बेहद अनोखा मंदिर
है 'श्री
महालसा नारायणी मंदिर', जो
पोंडा के मारडोल गांव में स्थित है। पूरे भारत में यह उन चुनिंदा मंदिरों में से
एक है जहां भगवान विष्णु के स्त्री अवतार 'मोहिनी' की पूजा मुख्य देवी
के रूप में की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब अमृत के लिए
देवताओं और असुरों में विवाद हुआ, तब
भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर असुरों को छला था और देवताओं को अमृतपान कराया
था। यहां देवी महालसा की चार भुजाओं वाली मूर्ति है, जिनके पैरों के नीचे एक असुर दबा हुआ
है। इस मंदिर के प्रांगण में गोवा का सबसे ऊंचा और सुंदर पीतल का दीपस्तंभ है। इसमें 21 मंजिलें हैं और 150 से अधिक दीये एक साथ
जलाए जा सकते हैं। इस मंदिर का इतिहास भी संघर्षपूर्ण रहा है, इसे नेरुल (बारदेज)
से मारडोल स्थानांतरित किया गया था।
उत्तरी गोवा के डिचोली (बिचोलिम) तालुका के
नार्वे गांव में स्थित 'श्री
सप्तकोटेश्वर मंदिर' का
ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व बहुत गहरा है। भगवान शिव के अवतार सप्तकोटेश्वर कदम्ब
राजवंश के मुख्य आराध्य देव थे। 14वीं
शताब्दी में बहमनी सुल्तानों ने इस मंदिर को तहस-नहस कर दिया था। इसे बाद में विजयनगर
साम्राज्य के राजा हरिहरराय ने दोबारा बनवाया। लेकिन 1560 में पुर्तगालियों ने
फिर से इस मंदिर को तोड़कर यहां एक चर्च खड़ा कर दिया। इसके बाद, मराठा साम्राज्य के
छत्रपति शिवाजी महाराज ने वर्ष 1668 में
इस क्षेत्र को पुर्तगालियों से मुक्त कराया । अपने आदेश पर सप्तकोटेश्वर मंदिर का
भव्य जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर के प्रवेश द्वार पर शिवाजी महाराज के काल का एक
शिलालेख आज भी मौजूद है।
पणजी शहर के भीतर ही एक पहाड़ी
की चोटी पर स्थित 'मारुति
मंदिर' भी
बेहद दर्शनीय है। अल्टिन्हो पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर भगवान हनुमान को समर्पित है।
इस मंदिर का निर्माण पुर्तगाली शासन के अंतिम दिनों में बड़ी कठिनाइयों के बाद
छिपकर किया गया था, क्योंकि
उस समय सार्वजनिक रूप से हिंदू मंदिरों के निर्माण पर प्रतिबंध था। रात के समय जब इस मंदिर
को आधुनिक लाइटों से सजाया जाता है, तो
यह पणजी शहर के निचले हिस्सों से भी साफ चमकता हुआ दिखाई देता है। यहां से मांडवी
नदी और पणजी शहर का विहंगम नजारा दिखता है।
माशेल में स्थित 'देवकी कृष्ण मंदिर' पूरे भारत का
एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान कृष्ण की पूजा उनकी माता देवकी के साथ की जाती है। इसमें माता देवकी की
गोद में बाल कृष्ण बैठे हुए हैं। वहीं सत्तरी तालुका के वालपोई में स्थित 'ब्रह्मा मंदिर' भारत के उन विरले
मंदिरों में शामिल है जहां सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा की आदमकद मूर्ति
स्थापित है। गोवा के ये सभी मंदिर सिर्फ पत्थरों और गारे की इमारतें नहीं हैं, बल्कि ये सदियों के
दमन के खिलाफ सनातन आस्था की विजय के जीवंत स्मारक हैं।
गोवा की अपनी अगली यात्रा की योजना बनाते समय समंदर के किनारों की मौज-मस्ती, पब और क्रूज के
साथ-साथ दो दिन इन ऐतिहासिक और आध्यात्मिक मंदिरों के लिए भी जरूर सुरक्षित रखें।
इन मंदिरों की शांत परिक्रमा, ऊंचे
दीपस्तंभों की भव्यता, प्राचीन
तालाबों का शीतल जल और गर्भगृह से आती चंदन व कपूर की खुशबू आपके मन को एक ऐसी
असीम शांति देगी जो आपको गोवा के किसी भी आधुनिक रिसॉर्ट में नहीं मिल सकती।
अशोक मधुप
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार
हैं)
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