Wednesday, December 2, 2020

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना पर जमीन न देने के कारण बिजनौर में नहीं बना ये विश्व विद्यालय

 अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना पर

जमीन न देने के कारण बिजनौर में नहीं बना ये विश्व विद्यालय


बिजनौर। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को बने आज 100 साल हो गए। एक दिसंबर 1920 को इस विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी। एएमयू के संस्थापक सर सैयद अहमद खां इस विश्व विद्यालय को बिजनौर में बनाना चाहते थे। उन्होंने बहुत कोशिश की। पर उस सयम के लोग इनके सोच को गलत मान बैठे। इनका विरोध किया। बाद में सर सैयद अहमद खां को बिजनौर में विश्वविद्यालय बनाने का इरादा छोड़ना पड़ा।

सर सैयद 1857 में बिजनौर में सदर अमीन थे। इनकी तैनाती के समय ही 1857 का प्रसिद्ध विद्रोह हुआ। अंग्रेज कलेकटर को नजीबाबाद के नवाब महमूद को जिले का कार्य भार सौंप कर भागना पड़ा। ये इस दौरान बिजनौर में ही सक्रिय रहे। कोशिश रही कि अंग्रेंज वापस आएं। नवाब महमूद की एक गलती से आजादी की ये लड़ाई हिंदू-मुस्लिम जंग में बदल गई। मजबूरी में हिंदू रईस अंग्रेजों के साथ हो गए। एक साल बाद अंग्रेज वापस आ गए। उनके विरोधियों को भागना पड़ा। जो पकड़ गए उन्हें मार दिया गया। विरोध करने वालों की संपत्ति जब्त कर ली गई।

समय आगे बढ़ गया। सर सैयद अहमद खां बिजनौर से चले गए किंतु उनका लगाव खत्म नहीं हुआ। उनकी कोशिश रही कि वे विश्वविद्यालय बिजनौर में बनाएं। उन्होंने कोशिश शुरू की। लोगों से बात की। कहा कि उन्हें जमीन दिलाने में सहयोग करें। उनकी छवि अंग्रेज बन गई थी। वे कहते भी थे कि वे नई रोशनी की शिक्षा दिलाना चाहते हैं। वे चाहते है कि कौम के बच्चे पढ़ें और आगे बढ़े। लोगों को लगा कि इनके यहां की पढ़ाई हमारी परंपरागत शिक्षा से अलग होगी। इससे धार्मिक शिक्षा खत्म हो जाएगी।

यह बात लोगों के मन में घर करती गई। उन्होंने सर सैयद अहमद खां का विरोध शुरू कर दिया। ‌बिजनौर के इतिहास के जानकार शकील बिजनौरी कहते हैं कि सैयद साहब ने लोगों को अपनी बात समझानी चाही, किंतु वे उनकी बात सुनने को तैयार ही नहीं थे। बिजनौर के ही रहने वाले उर्दू फारसी के विद्वान नजीर बिजनौरी से बात की। नजीर बिजनौरी के कहने पर लोगों ने सर सैयद अहमद की बात तो सुनी पर कोई मदद नहीं की ।

जमीन देने की बात भी हो गई किंतु विरोध बढ़ता देख उन्होंने बिजनौर में विश्वविद्यालय खोलने का इरादा छोड़ दिया।

बिजनौर इटर कालेज के प्रधानाचार्य आफताब अहमद का कहना है कि उस समय के लोगों का मानना रहा कि सर सैयद अहमद के विद्यालय की शिक्षा अंग्रेजों के लाभ के लिए होगी। हमारी शिक्षा, धा‌र्मिकता हमारे संस्कार, परंपराओं को नुकसान पंहुचाएगी।

दिल्ली विश्वविद्यालय में उर्दू के प्रवक्ता खालिद अलवी कहते हैं कि बिजनौर जिले का मुसलमान उस समय अंग्रेजों से नाराज था। वह किसी भी कीमत पर अंग्रेजों को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं था। वह सर सैयद अहमद को कट्टर अंग्रेज परस्त मानता था। इसलिए इनकी कोई बात सुनने और मानने को तैयार नहीं था। इसीलिए सर सैयद अहमद और उनकी शिक्षा का उसने विरोध किया।

अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े शमून कासमी का कहना है कि अगर बिजनौर में विश्वविद्यालय बनता को बहुत लाभ होता। लोगों को नौकरी मिलती। उस समय बिजनौर के मुस्लिम जमींदारों ने जमीन नहीं दी थी। अगर विश्वविद्यालय बिजनौर में बनता तो पूरे देश में बिजनौर का नाम रोशन होता।\


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Saturday, November 21, 2020

जैन तीर्थ के रूप में विकसित नहीं हो पाया पार्श्वनाथ का किला

 जैन तीर्थ के रूप में विकसित नहीं हो पाया पार्श्वनाथ का किला

मिलती हैं प्राचीन प्रतिमाएं

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बढ़ापुर ,प्रशासन व पुरातत्व विभाग की अनदेखी और जर्जर रास्तों की बिना पर क्षेत्र के काशीवाला का विख्यात पारसनाथ का किला अब तक जैन तीर्थ स्थल के रूप में विकसित नहीं हो सका है। खेतों में खुदाई के दौरान निकलने वाली प्रतिमाएं व खंडित मूर्तियां मंदिर एवं किले के अवशेष इस क्षेत्र में जैन धर्म के वैभव के छिपा होने की गवाही देते हैं। पुरातत्व महत्व का यह स्थान पुरातत्व विभाग व प्रशासन की उपेक्षा का शिकार है।

बढ़ापुर कसबे से करीब चार किमी दूर पूर्वी दिशा में स्थित काशीवाला के खेतों व जंगल में प्राचीन जैन धर्म की वैभवशाली संस्कृति के भग्नावशेष छिपे हुए है। काशीवाला में एक प्राचीन खंडहरनुमा दिखने वाले स्थान को क्षेत्रवासी पारसनाथ के किले के नाम से जानते है। इस स्थान पर पूर्व में हुई खुदाई के दौरान मिलने वाली जैन धर्म से संबंधित खंडित मूर्ति, मंदिरों एवं किले के अवशेष यहां पर प्राचीन समय में किन्ही जैन आचार्यों की स्थली या जैन धर्म अनुयायियों की कोई विशाल बस्ती या किसी जैन राजा का साम्राज्य होने की गवाही देते है।

बुजुर्ग व जानकर बताते है कि मोजा काशीवाला पुराने समय में भयंकर जंगल था। यहां जैन समाज से संबंधी प्राचीन मूर्तियों के मिलने का सिलसिला करीब सात दशक पूर्व तब शुरू हुआ जब पंजाब व अन्य स्थानों से आए सिख परिवारों ने काशीवाला के जंगल में खेती करना आरंभ किया। ऊंची-नीची भूमि को समतल एवं कृषि योग्य बनाने की गरज से खुदाई के दौरान मिली हजारों वर्ष पुरानी जैन धर्म से संबंधित मूर्तियां व शिलालेख और पत्थर के टीलों से इस स्थान पर किसी जैन राजा के साम्राज्य व जैन समाज की कोई विशाल बस्ती होने का आभास हुआ। उस समय खेतों से मिली प्राचीन मूर्तियों पर किसी स्तर से भी कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। बताते है कि पारसनाथ किले से प्रसिद्व इस स्थान पर सन् 1951 में रक्षाबंधन पर्व के दिन काशीवाला निवासी सिख हरदेव सिंह को खेत समतल करने के दौरान उसके खेत से एक विशाल आकार की मनोरम मूर्ति मिली जिसके मध्य में श्री महावीर स्वामी एक ओर नैमिनाथ जी तो दूसरी ओर चंद्रप्रभु विराजमान थे । इस मूर्ति पर सिंह, हाथी व देवी देवताओं का बड़े ही आकर्षक ढ़ंग से चि़त्रण किया गया था। यह मूर्ति काफी समय तक हरदेव सिंह के डेरे पर ही रही बाद में इस मूर्ति को राष्ट्रीय म्यूजियम दिल्ली ले जाने संबंधी प्रयास हुए। लेकिन जिले के जैन अनुयायियों ने मूर्ति को बिजनौर में ही रूकवा लिया और इस मूर्ति को श्री दिगंबर जैन मंदिर बिजनौर में स्थापित किया गया था। श्री महावीर स्वामी की इस मूर्ति के मिलने के उपरांत ही जैन समाज के लोगों का ध्यान इस ओर गया । सन 1952 में 21 सदस्यीय किला पारसनाथ समिति का गठन भी हुआ लेकिन समिति इस स्थान के लिए कुछ विशेष नही कर पायी। सन् 1998 में भी एक बार पुनः यह स्थान उस समय चर्चाओं में आया था जब जैन समाज ने जैन मुनि आचार्य शांति सागर जी महाराज (हस्तिनापुर) व वीर सागर जी महाराज के परम शिष्य बालपति ऐरन एवं बैराज सागर जी महाराज (बरेली) की अगुवाई में पारसनाथ किले से काफी दूर सिख अमरीक सिंह व अवतार सिंह के खेत के बीच स्थित एक टीलेनुमा स्थान पर खुदाई का कार्य प्रारंभ कराया ।यहां तीन दिन की खुदाई के उपरांत इस स्थान से जैन धर्म की छोटी व बड़ी अनेक खंडित मूर्तियां,पत्थरों के स्तंभ और दीवारों पर बनी प्राचीन मूर्तियां एव खंडहर प्रकट हुए। इस स्थान के समीप ही एक प्राचीन कुआं व तालाब होने के प्रमाण भी दिखायी दिए ।इन्होंने इस ओर इशारा किया कि इस क्षेत्र में प्राचीन समय में जैन धर्मावलंबियों का कोई ऐतिहासिक स्थल अवश्य रहा होगा। यदि प्रशासन, सरकार व पुरातत्व विभाग इस ऐतिहासिक स्थान में रूचि ले तो इस स्थान पर जैन सभ्यता व संस्कृति के दर्शन का हो पाना असंभव नही है। जैन समाज ने इस क्षेत्र की महत्ता के दृष्टिगत इस प्राचीन स्थल को पहचान दिलाने के लिए किसानों से यह संबंधित कृर्षि भूमि क्रय कर भव्य मंदिरों विशाल धर्मशाला व संग्रहालय बनाकर खुदाई में मिली सामग्रियों को संजोकर रखा है। इस क्षेत्र के विषय के जानकार काशीवाला निवासी मनोहरजीत सिंह कहना है कि यह क्षेत्र आल्हा -उदल कालीन है। गढ़ कासौं की लड़ाई यहीं हुई और इस लड़ाई में जौहर करने वाली चार रानियों की समाधियां भी बनी हैं। उपेक्षा के चलते रानियों की समाधियां भी क्षतिग्रस्त हो रही हैं।

जर्जर रास्ता भी बन रहा है विकास में बाधक।

जैन मंदिर के पुजारी एवं व्यवस्था देख रहे क्षितीज जैन व मुरादाबाद से मंदिर दर्शन करने आए श्रद्धालु प्रकाश चंद्र जैन का कहना है कि क्षेत्र काफी पिछड़ा है । जैन तीर्थ स्थली को आने वाला रास्ता बेहद जर्जर अवस्था में होने पर यहां आने वाले श्रृदालुओं को घोर कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है।

कोविड-19 के कारण टालना पड़ा पंचकल्याणक कार्यक्रम।

जैन मंदिर के प्रबंधक सुरेश चंद्र जैन का कहना है कि जैन धर्मावलंबी यहां दूर-दूर से आते हैं। श्रृदालु यहां आकर इस क्षेत्र की महत्ता की जानकारी करते है। जैन साध्वी दीदी उमा जैन तपस्या में लीन है। कोविड-19 के चलते मंदिर पर आने वालों की संख्यां नगण्य हो गई है। कोविड-19 के कारण ही मंदिर पर होने वाला पांच दिवसीय पंचकल्याणक कार्यक्रम भी टालना पड़ा है।

शकील अहमद बढ़ापुर,

Friday, October 16, 2020

फिल्मी दुनिया के बड़े पत्रकार थे शम्स कंवल

          

धनाभाव से जूझते रहे पर टूटेे नहीं

गगन के हिंदुस्तानी मुुसलमान नंबर ने उन्हें मशहूर कर दिया

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अशोक मधुप

उर्दू के जाने माने पत्रकार- लेखक  शम्स कंवल  1925 में बिजनौर के एक मुस्लिम जमींदार ख़ानदान में पैदा हुए । बचपन में सुंदर होने के कारण उनके दादा शम्सुद्दीन   को जमील कह कर बुलाते थे। 1945 में बिजनौर के गवर्मेंट हाई स्कूल से मैट्र‌िक पास किया। शम्स कवंल का स्कूल की किताबों से अधिक साहित्यिक पुस्तकों में  मन लगता था। 1945 में मुरादाबाद इंटर काॅलेज से इंटर तथा लखनऊ से 1951 ग्रेजुएट किया। अपना नाम शम्स कंवल रख लिया । इसी नाम से कोमी आवाज़ लखनऊ में फिल्म एडिटर के तौर पर नौकरी करने लगे।

1952 में उन्होंने लखनऊ से अपनी फ़िल्मी 15 दिवसीय पत्रिका ‘ साज़‘ निकाली। क़रीब डेढ़ साल के बाद ये पत्रिका बंद हो गई। 1953 में दिल्ली आ गए और ‘फ़िल्मी दुनिया‘ में  सहायक संपादक बने ।1954 में ‘ रियासत‘ साप्ताहिक में असिटेंट एडिटर नियुक्त हुए। रोटी रोज़ी के लिए कई अख़बार व रिसालों में आलेख लिखे।

 1954 में  मुंबई चले गए। यहां उनको इंक़लाब अख़बार में फ़िल्म एडिटर की नौकरी मिल गई।1956 में उन्होंने फ़नकार साप्ताहिक अख़बार में संपादक हो गए। क़रीब डेढ़ साल के बाद शम्स जी फ़नकार से अलग हो गए।1959 में उन्होंने अपना साप्ताहिक फ़िल्म रिपोर्ट प्रकाशित किया । पैसों की तंगी में ये बंद हो गया। 1962 तक लगातार वे फिल्मी अख़बारों और रिसालों में आलेख, फिल्मी शख़्सियतों पर लेख, फ़िल्मों पर समीक्षा आदि  लिखते रहे।पाठक उनके लेखन के आनंद में मग्न रहते और नई तहरीरों के मुंतज़िर रहते। उनकी  आश्चर्यजनक संवेदनशील अभिव्यक्ति उनके गहन और गौण अध्ययन के द्वारा पाठकों के मन पर हुकूमत करने लगी।

गगन का प्रकाशन और सफर

मुबई के बड़े साहित्यकार और शम्स साहब के लंबे समय तक नजदीकी रहे असीम काव्यानी के अनुसार उन्होंने अपनी अथक मेहनत और विद्वता के बल पर  उल्हास नगर से  ‘गगन‘ मासिक का फ़रवरी 1963  में प्रकाशन शुरू किया। वे इसके  संपादक , पैकर और पोस्ट करने वाले ख़ुद ही थे। उनकी पत्नी शहनाज़ कंवल एक अच्छी और प्रसिद्ध कहानीकार है।ख़र्च में बचत के लिए  उन्होंने किताबत सीखी और गगन  की किताबत लगीं। शम्स साहब ने 22 साल के सफर में  गगन के दो विशेषांक  निकाले।1975 में ‘हिंदुस्तानी मुसलमान नंबर‘ 618 पृृष्ठ और 1984 में मज़ाहिबे आलम नंबर 1240 पृृष्ठ।

  हिंदुस्तानी मुसलमान नंबर में हर फ़िरक़े व हर ख़्याल और नज़रिए के क़लमकारों के आलेख इकट्ठा किए गए हैं। इसमें मुसलमानों की एतिहासिक, राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर बहस की गई है। ये एक एंसाइक्लोपीडिया का दर्जा रखता है। मुस्लिम राजनैतिक आंदोलन, धार्मिक संस्थाएं, मुस्लिम बुद्धिजीवियों की जीवनियां व लिस्ट,उनके भाषणों के अंश आदि के साथ  ख़ुद शम्स कंवल का आलेख शामिल हैं।बाल ठाकरे,कृृष्ण चंद्र,कुंवर महेंद्र सिंह बेदी,गोपाल मित्तल, प्रो डब्लू बी स्मिथ, बसंत कुमार चटर्जी आदि के आलेख संकलित हैं। इस विशेषांक  की धूम चारों ओर मची। कई वर्षों तक ये विशेषांक लोगों के ज़हनों में हलचल मचाता रहा। आज भी इस संकलन की चर्चा अक्सर होती रहती है।      

मज़ाहिबे आलम नंबर आम पाठकों को रूचिकर न लगा। न ही लागत का पैसा वापस आ सका । मजबूरन  गगन का प्रकाशन बंद हो गया।

 दिल्ली की  लेखिका रकशंन्दा रूही मेहंदी के अनुसार शम्स जी 1985 में अपने  वतन बिजनौर वापस आ गए। मुंबई में 30 वर्ष में 30 किराए के मकान बदले। कुछ दिन बिजनौर में गुज़ारने के बाद पुश्तैनी मकान में से अपने हिस्से की रक़म से 1985 में  अलीगढ़ में अपना घर ‘सलामा‘ तामीर करवाया और वहीं बस गए।

लेखन चलता रहा, बड़े व प्रसिद्ध रिसालों में उनके आलेख प्रकाशित होते रहे।अक्तूबर 1994 में एक बार फिर मासिक रिसाला ‘उफ़क़ ता उफ़क़ का प्रकाशन शुरू किया। इसके  छह अंक ही  निकल सके । उनकी सेहत ख़राब होने लगी। । अंत समय में सपत्नीक बिजनौर आ गए। आठ अक्तूबर 1995 को बिजनौर में अपने मकान में आखिरी सांस ली।

चाय के रसिया  थे शम्स कंवल

शम्स साहब के जानकारों  के अनुसार  शम्स कंवल चाय के रसिया थे। 40 सिग्रेट रोज़ पीना उनका शौक था। लगभग शाकाहारी थे। 40 वर्ष की उम्र में खुद ही सिग्रेट  छोड़ दी। वो बदला लेने में यक़ीन रखते थे। माफ़ करना उन्हें नापसंद था। उनके इस बर्ताव ने उनके बहुत से दुश्मन पैदा कर दिए थे। घूमने फिरने से उन्हें दिलचस्पी न थी। किताबें पढ़ने से उनको बेपनाह दिली ख़ुशी मिलती थी।वे एक तरह से नास्तिक थे। आदर्शवादी नज़रिए के वे मानने वाले थे।  उर्दू ज़बान को सही पढ़ने और लिखने पर ज़ोर दिया।  एमर्जेंसी के वो तरफ़दार थे। वे सदा अपने बनाए नज़रियात पर क़ायम रहे।

अशोक मधुप

Tuesday, September 8, 2020

गंगा जल और मेरी प्यास पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी






पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी-13
गंगा जल और मेरी प्यास
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मुझे बहुत तेज प्यास लगी थी। गंगा पास से बह रही थी। मजबूरी ,मैं दुनिया का प्यास बुझाने वाली पतिति पावनी से अपनी प्यास नहीं बुझा सकता था।
कई साल पहले की घटना है। खिरनी गांव के पास गंगा में नाव पलट गई। नाव में सवार छह व्यक्ति डूब गए। मैंने तय किया कि इस क्षेत्र का भ्रमण किया जाए।मैं अपने साथी संजीव शर्मा को लेकर खिरनी के लिए चल दिया। बस ने हमें खिरनी गांव के पास उतार दिया। पैदल चलकर हम खिरनी गांव के पास बहती गंगा के तट पर पहुंचे।
एक नाविक दिखाई दिया।मैंने उससे गंगा पार ले जाने का अनुरोध किया।उसने पूछा।कहाँ जाओगे।मेरे बताने पर की खादर में घूमना चाहते हैं।
उसने कहा कि कोई फायदा नहीं ।जंगल के सभी रास्तों में पानी भरा है।वह तो अपने खेत से पशुओं के लिए चारा लेने जा रहा है। मजबूरी है बाबू।हमें पशुओं का पेट भरना है।आप मत जाओ।
हमने उसका कहना माना।
वहां से गंगा के किनारे बिजनौर साइड में चलने का निर्णय लिया। बरसात का मौसम था। गंगा पूरे उफान पर बह रही थी। हम गंगा के किनारे- किनारे चल दिए। खोलों में उतरते चढ़ते।कुछ आगे चलकर एक किले के खडंहर दिखाई दिए। महल के किनारे बने गोले जैसा था। वहां बड़ी ईंट के अद्धे लगे हुए थे।यहां पुराने समय की ईट लगभग दो इंच मोटी और एक से डेढ फीट तक लंबी होती थी। मैंने देखा कि इसमें लगी ईंट अधिकतर आधी है। महल का अधिकांश हिस्सा गंगा में बह गया था। यही भाग बचा था।लगाकी यहां ईट किसी पुराने महल /भवन की निकाल कर यहां लाकर लगाई गई है। कुछ फोटो आदि खींचे और एक ईंट अपने साथ लेकर हम चल दिए।
इससे पहले कभी ऐसा सफर नहीं किया था। सो सफर की कोई व्यवस्था भी नहीं की थी। सफर के लिए पानी नहीं लिया था। जबकि बहुत जरूरी था।कुछ दूर गंगा के खोलों में ऊंचे -नीचे चलकर थकान हो गई। प्यास लगने लगी। गर्मी ज्यादा थी।रास्ते में एक दो किसान मिले ।उनसे पूछा कि कहीं पानी मिलेगा। प्यास लगी है। उन्होंने आश्चर्य से हमें देखा कहा -गंगा बह तो रही है।
बरसात के कारण मिट्टी कट रही थी पानी मटमैला था। प्यास बहुत थी। पर गंगा के जल को देखकर पीने की इच्छा नहीं थी।ऐसे चलते दो घंटे बीत गए। प्यास से जीभ बाहर निकल आई थी।होठ सूख गये थे।
कैसी विवशता थी कि कल -कल करती मां पावनी के तट के किनारे चलने के वाबजूद जल नहीं पी सकते है। लग रहा था कि कहीं बरसात का मटमैला पानी बीमार न कर दे।
कुछ दूर बसा एक गांव दिखाई दिया ।हम उसकी ओर बढ़ गए। प्यास बर्दास्त से बाहर होती जा रही थी। गांव में घुसते ही छप्पर की बस्ती दिखाई दी।कुछ खपरैल के मकान भी थे। यहां जगह -जगह बरसात का पानी जमा था। उसमें सुअर पड़ेआराम कर रहे थे। लगा कि वाल्मीकियों का मुहल्ला है। एक जगह नल दिखाई दिया। उसके चारों ओर भी बेइंतहा गंदगी पसरी थी। पर प्यास ने सब कुछ भुला दिया।जगह - जगह पसरी गदंगी,उससे उठती बदबू का ध्यान छोड़ हमने बढ़कर जमकर पानी पिया। रुक- रुक कर दो तीन बार पानी पीने के बाद तृप्त हो पाएं ।कुछ जान में जान आई।तब आगे बढ़े।
अशोक मधुप

Tuesday, August 18, 2020

पत्र कारिता की शुरुआत

पत्र कारिता की शुरुआत

1973 में मैंने संस्कृत से एमए किया। जनता उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में त्रिभाषा शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिल गई। साक्षात्कार में शर्त वह रखी गई कि आपको हाईस्कूल को हिंदी स्ंस्कृत पढ़ानी पड़ेगी। यह भी बताया गया कि हाई स्कूल के लिए रखा शिक्षक योग्य नही ं है,क‌िंतु रखना प्रबंधन की मजबूरी है।मैंने एक साल वहॉ कार्य किया। गांव में बनी एक मित्र ने कहा -बीएड कर लो। शिक्षण सत्र पूराकर  मैने बीएड कर लिया।इसके बाद  भाषा शिक्षक के पद पर जैन कॉलेज नहटौर में नियुक्ति मिल गई। 400 के आसपास वेतन मिलता था। इस दौरान मैंने विद्युललेखा नाम से साप्ताहिक शुरु किया।अखबार नबीसी का शौक ऐसा चर्राया कि नौकरी छोड़ दी। अकेले अपने दम पर साप्ताहिक निकालना कभी लाभ का साधन नहीं हो सकता था। कुछ दिन बाद वह बंद हो गया।

एक मित्र की सलाह पर बंद पड़े स्वतंत्र आवाज को चलाने की जिम्मेदारी मिली। तीन माह वहां काम किया। वहां से एक पैसा भी नहीं मिला। राष्ट्रवेदना के संपादक विश्वामित्र शर्मा ने कृपा की । एक सौ रुपये माह पर अपने यहां संपादन के लिए रख लिया।यह सफर कई साल चला।बिजनौर में कम्युनिष्ट पार्टी के प्रभाव में आकर प्रेस एम्पलाइज यूनियन बना ली। हमने यूनियन बनाई तो दक्ष‌िण पंथी विचार धारा के विश्वामित्र शर्मा जी को सबसे ज्यादा बुरा लगा। वह प्रेस मालिक की यूनियन बना बैठे । इस दौरान में अमर उजाला से जुड़ चुका था। बिजनौर से खबर भेजने लगा था।एक दिन मित्रा जी ने कम्पोजीटर करण को हटाने का नोटिस दे दिया। इसी को लेकर प्रेस कर्मचारी ने  हड़ताल कर दी। लगभग 26 दिन हड़ताल चली। बिजनौर की सभी प्रेस में ताले लग गए। बिजनौर से निकलने वाले दो दैनिक बिजनौर टाइम्स और राष्ट्रवेदना भी नहीं छपे। 26 दिन बाद हड़ताल टूटी। इस दौरान मित्रा जी ने मुझे हटा दिया। प्रेस कर्मचारी मजदूर पेशा थे। उनके रोटी -रोजी के संकट को देखते हुए। मैंने हड़ताल ख्रत्म होना ही बेहतर समझा। अमर उजाला से भी कुछ नहीं आता था। आदरणीय अतुल जी विदेश चले गए। अमर उजाला से संपर्क टूट गया।

मैंने अपना साप्ताहिक बारूद और विस्फोट शुरू कर दिया।वह जिले के कर्मचारियों की आवाज बना। कर्मचारी ग्राहक बनते गए। खर्च चलने लगा। इस दौरान मेरे एक मित्र राजकीय कर्मचारी नेता नेतागिरी के कारण निलंबित कर दिए गए। वह भी मेरे साथ लग गए। अखबार के ग्राहक बनते । आई राशि का बड़ा हिंस्सा उनके परिवार की जरूरत को जाने लगा।प्रेस की हालत यह थी कि वह बरसात में अखबार छापना पंसद करती। क्योंकि उनके पास काम नहीं होता। जब शादी , स्कूल के पेपर आदि का समय होता तो अखबार नहीं छप पाता।

मुझे रेलवे स्टेशन पर अजय प्र‌िंट्र‌‌िग प्रेस मिल गई। उस पर ज्यादा काम नहीं था। प्रेस के अंदर के कक्ष में एक पलंग था । मैं घूमता -फिरता आता। वहीं सौ जाता। एक तरह से अजय के परिवार का अंग बन गया।

इस दौरान कई साथियों ने बहुत मदद की। पुरे के डाक्टर सिद्दीकी थे। वह मेरे बेरोजगारी के इस समय में मुझे एक सौ रुपया प्रतिमाह देते।विरेश बल मिल जाते तो जबरदस्ती घर ले जाकर खाना खिलाते। ओमपाल सिंह और शुगर मिल पर रहने वाले एक और साथी भी विरेश बल की तरह ही थे।

इस दौरान बिजनौर से उत्तर भारत टाइम्स की शुरूआत हुई।मैं इसमें डैक्स पर रख लिया गया। झालू से मैं सवेरे नौ बजे के आसपास आने वाली ट्रेन से बिजनौर आता। रात को तीन बजे की ट्रेन से वापस जाता।

ये सिलसिला चल रहा था कि एक दिन एक साहब आए। मुझसे मेरे बारे में पूछने लगे। बात चीत हुई। उन्होंने अपना परिचय सुबोध शर्मा के रूप में दिया बताया कि बरेली से आया हूं। अमर उजाला के मालिक अतुल माहेश्वरी जी ने बुलाया है।

मैं  उनके साथ बरेली चला गया। अतुल जी ने कहा - अमर उजाला के लिए काम करो। मैंने हां कर दिया। कुछ  तै नहीं किया।  उसके बाद भी आजतक कभी कुछ नहीं मांगा। कुछ नहीं चाहा।

लकड़ी के बॉक्स से लेकर डिजिटल कैमरे तक पहुंचा फोटोग्राफी का संसार

लकड़ी के बॉक्स से लेकर डिजिटल कैमरे तक पहुंचा फोटोग्राफी का संसार

फोटोग्राफी आर्ट थी, वह खत्म हो गई

व्यवसाय पैसे वाले हावी हो गए

अशोक मधुप

बिजनौर। फोटोग्राफी का जनपद का इतिहास 75- 80 साल के आसपास का होगा। बॉक्स कैमरों से हम आज ‌डिजिटल कैमरों तक पहुंच गए। मोबाइल में आए कैमरों ने हर व्यक्ति को फोटोग्राफर बना दिया। हालत यह हो गई कि आए कार्यक्रम में कवरेज के लिए आए व्यवसायिक और प्रेस फोटोग्राफर को फोटो खींचने के लिए जगह नहीं मिलती।मोबाइल धारक मोबाइल तान कर पहले ही तैयार हो जातें हैं।

बिजनौर के फाइन स्टूडियों के स्वामी शकील अहमद बतातें हैं मिर्दगान के रहने वाले हाजी जमीर अहमद कचहरी मार्ग पर स्थित सराय के प्रवेश द्वारा में बैठे रहते थे। फोटो बॉक्स कैमरों से खींचते थे। बाद में इनका बेटा काम करने लगा। ये लकड़ी का बड़ा बाक्स कैमरा रखते थे। इसके काले परदे में मुंह देकर फोटा खींचा जाता था। कैमरे में लगे बॉक्स में ही फोटो बनता था। मुख्य बाजार में तुफैल अहमद भी बॉक्स कैमरे से फोटो खींचते थे। आज यहां साहू शंभू दयाल जी का बाजार बन गया।विशेषकर बूरे और बताशों की दुकान हैं।

लिबर्टी फोटो स्टूडियो कि स्वामी पवन शर्मा कहतें हैं कि पहले फोटोग्राफी आर्ट थी। इसमें फोटोग्राफर की कला का परिचय मिलता था। इस समय निगेटिव बनता था। इसे गहरी काली पैंसिल से रिटच किया जाता था। दाग धब्बे मिटाए जाते थे। उसके बाद कलर किया जाता था। वे बतातें हैं कि इसके लिए गुर्टू साहब, उनके यहां काम करने वाले हरकेश सिंह, कौशिक चित्रशाला के रूपचंद, विशाल स्टूडियो के मोहम्मद सलीम, स्कूल रोड के फोटोग्राफर सईद अहमद, आरके स्टूडियों के राजेंद्र टांक प्रसिद्ध थे।रंगून फोटो स्टूडियों के स्वामी नसीम अहमद कहते हैं कि विशाल फोटो स्टूडियो के सलीम साहब ने कलर निगेटिव पर टचिंग की। उनकी देखा देख उन्होंने भी रंगीन न‌िगेटिव पर ट‌चिंग का काम किया। जजी पर विजय चौधरी का अपना विजय नाम से स्टूडियो था। इसके बाद अब उनके बेटे स्टूडियो चला रहे हैं। विजय चौधरी का बिजनौर की फोटोग्राफी में बड़ा नाम है। जजी का ही बाना फोटो स्टूडियो बंद हो गया। अब बाना साहब के बेटे रुपेंद्र बाना घर पर ही ड‌बिंग और बुकिंग का कामा कर रहे हैं।चित्रलोक स्टूडियो के मनोज पांडेय प्रसिद्ध से थे। निधन के बाद इनका स्टेडियो बंद हो गया। इनके भाई सुधीर धर से ही काम कर रहे हैं। उत्तम कलर लैब के ऋषिपाल सिंह बहुत पुराने फोटोग्राफर रहे हैं। मूल रुप से से मुजफ्फरनगर के रहने वाले हैं।घंटाघर के नीचे अनिल पंडित का पंडित फोटो स्टूडियो सन 1985 के आसपास बहुत प्रसिद्ध हुआ।

गूर्ट्र और कौशिक च‌ित्रशाला के आज के स्वामी योंगेंद्र शर्मा कहते हैं कि आज फोटोग्राफी में धन आ गया। आधुनिक संयत्र और महंगे उपकरण वाले लोग हावी हो गए। मूलरुप से फोटोग्राफर बेकार हो गए या कुछ और करने को मजबूर हैं। इस व्यवसाय में आए पैसे वालों ने उन लड़कों से काम कराना शुरु कर दिया जो इसका कुछ जानते भी नहीं। पहले फोटोग्राफर कम से कम फोटो खींचता था। क्योंकि उस समय उसके 120 एमएम के कैमरे की एक फिल्म में आठ या 12 ही फोटो खिंच पाते थे।उसके बाद 35 एमएम के कैमरे आए। इनमें 36 फोटो खिंचते ‌‌थे।अब तो डिजीटल युग है। चाहे कितने ही फोटो खींचे जाओ।

रीगल स्टेडियों के स्वामी राज बिहारी लाल सक्सेना उर्फ राजा कहते हैं कि उनका 40 साल पुराना स्टूडियो है। इससे पहले कई साल गुर्टू स्टूडियो पर काम किया। इस दौरान फोटोग्राफी की पूरी दुनिया बदल गई। पहले कैमरो में प्लेट लगती ‌थी फिर फिल्म आईं। डिजिटल युग शुरु हुआ तो ऐसे कैमरे आए जिनमें फ्लॉपी लगतीं थी। अब चिप और मैमोरी कार्ड का युग आ गया।

शौकीन

राम बाग कॉलोनी के रहने वाले विजय पंड‌ित घुमकड़ी और फोटोग्राफी 32 साल से कर रहे हैं। पूरे भारत वर्ष के साथ 30 देश घूम चुके हैं। जैमनी डेंटल क्लीनिक के स्वामी डा.हेमंत रस्तोगी को फोटोग्राफी में बड़ा लगाव है। अवसर मिलते ही घूमने निकल जाते हैं। जिला अस्पताल के नेत्र चिकित्सक मनोज सैन को फोटो के साथ वीडियो ग्राफी में बहुत रुचि है। कचहरी रोड के रहने वाले सुनील कुमार गुप्ता बढापुर में शिक्षक रहे। वन्य क्षेत्र होने के करण फोटोग्राफी के शौक में वहां 30 साल मोनी का नाम से स्टेडियो चलाया। सेवानिवृति के बाद अब बिजनौर में हैं। इनका बेटा वैन्तेय का बिजनौर में आर्ट काम ग्लेरियो के नाम से बड़ा स्टूडियो है।

एक कैमरा से कैसे किसी अच्छे काम को समाज में जगह दिलाई जा सकती है, आशीष लोया ने इसकी मिसाल पेश की है। श्री श्री रविशंकर की आर्ट ऑफ लिविंग संस्था से जुड़े आशीष लोया जब बैराज होकर बिजनौर आते -जाते थे तो उन्हें गंगा तट पर पक्षियों की चहचहाहट आकर्षित करती थी। उन्होंने एक दिन तट पर जाकर देखा तो पता चला कि वहां प्रवासी पक्षी थे। अपने कैमरे से उनके फोटो खिंचने शुरू किए। बाद में गंगा तट के दूसरी ओर के हजारों प्रवासी प‌क्षियों के फोटो खींचकर अफसरों को दिखाए। उनके प्रयास से ही गंगा के तटीय क्षेत्र को हैदरपुर वेटलैंड घोषित कर वन्य जीवों के लिए आरक्षित किया गया है।

डीएफओ एम सेम्मारन ने एटा में अपनी जॉब के दौरान जंगल में घूमना शुरू किया जंगल की सुंदरता उनके मन को भा गई। वन्य जीवन के खूबसूरत नजारों को सभी को दिखाने के लिए करीब ढाई लाख का कैमरा खरीदकर फोटोग्राफी शुरू कर दी। जिले के वन्य क्षेत्र में भी वे बहुत फोटोग्राफी करते हैं। उनके खींचे गए फोटो विकास भवन में लगाए गए हैं।

वर्ड फोटोग्राफी डे पर विशेष

पुरानी यादों को ताजा करती हैं फोटो-

चांदपुर के फोटोग्राफर सरदार परमजीत सिंह पिछले करीब 30 वर्षो से फोटोग्राफी का काम करते हैं। परमजीत ने बताया कि तस्वीरें बोलती हैं वजह उनसे जुड़ी यादें होती हैं। तस्वीर देखते ही पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। पिता परमजीत को देख पुत्र मनोरथ का मन भी फोटोग्राफी में रमने लगा है। उसने भी फोटोग्राफी में डिप्लोमा कर इस व्यवसाय को अपना लिया है।

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अखबार की फोटो देख फोटोग्राफी में बढ़ी रूचि-

फोटोग्राफर लवली शर्मा करीब 32 साल से फोटोग्राफी का काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अखबार में छपी फोटो आकर्षित करती थी। यहीं से ही फोटोग्राफी की रूचि हो गई। उन्होनें बताया कि लम्हों को कैद कर लेने की कला फोटोग्राफी में ही सम्भव है।

लवली ने बताया कि पहले फोटोग्राफी काफी मुश्किल हुआ करती थी। फोटोग्राफी में कला दिखानी पड़ती थी। कैमरे में रिल चलती थी। निगेटिव से फोटो तैयार किए जाते थे। समय भी ज्यादा लगता था। जब से फोटोग्राफी डिजिटल हुई है तब से फोटोग्राफी काफी आसान हो गई है। पुरानी फोटोग्राफी की याद के लिए अभी भी पुराने कैमरे रखे हुए हैं।

सात दशक पुराना है नजीबाबाद का फोटोग्राफी इतिहास

नजीबाबाद-18 अगस्त

ब्लैक एंड व्हाइट फोटोग्राफी में नजीबाबाद का इतिहास सात दशक पुराना है। नगर के जानेमाने फोटोग्राफर रहे स्व. महावीर प्रसाद गुप्ता ने आजादी के मात्र छह वर्ष बाद 1953 में नजीबाबाद में फोटोग्राफी की शुरूआत की थी। अपने मामा देहरादून निवासी सागर मल गोयल के साथ देहरादून में 16 वर्ष फोटोग्राफी का अनुभव लेने के बाद महावीर प्रसाद नजीबाबाद में ब्लैक एंड व्हाइट फोटोग्राफी में मील का पत्थर बने। महावीर प्रसाद को ब्लैक एंड व्हाइट फोटो को रंगीन फोटो में बदलने की भी महारथ थी। महावीर प्रसाद के पुत्रों फोटोग्राफर विनोद गुप्ता और विनय गुप्ता को विरासत में फोटोग्राफी की महारथ हासिल हुई। तीसरी पीढ़ी में कम्प्यूटराइज्ड फोटोग्राफी दौर में राजीव गुप्ता और संजीव गुप्ता ने भी अपने पिता और बाबा का नाम रोशन रखा।

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फोटो आर्ट और वीनस स्टूडियो के स्वामी मशहूर फोटोग्राफर मतलूब अहमद और उनके छोटे भाई अशरफ शमीम वारसी उर्फ शब्बन की फोटोग्राफी का भी जबाव नहीं था। ब्लैक एंड व्हाइट फोटो खींचना, संसाधनों की कमी के बावजूद उन्हे संवारने में उस जमाने के फोटो ग्राफरों का अपना हुनर था। फोटोग्राफर स्व. मतलूब अहमद के पुत्र अहसान उर्फ गुड्डू फोटो आर्ट स्टूडियो के माध्यम से फोटोग्राफी की विरासत को बखूबी आगे बढ़ा रहे हैं।

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70 के दशक में आरके स्टूडियो के माध्यम से फोटोग्राफर राजू टांक का नगर में नाम रहा। बाद में आरके स्टूडियो की कमान पूनम स्टूडियो के रूप में फोटोग्राफर स्व. मुन्ने भाई ने फोटोग्राफी कला का लोहा मनवाया।


। गांव छोईया नंगली निवासी तैयब अली को बचपन से घूमने का शौक था। एक फर्म में काम करते हुए उन्होंने अपने इस शौक को परवान चढ़ाया। वे जब घूमने से पीछे नहीं हटते तो इन यादों को सजोने के लिए फोटोग्राफी का खुमार चढ़ जाना बहुत सामान्य है। तैयब अली जहां भी जाते हैं वहां की यादों को वे अपने कैमरे में हमेशा के लिए सजो लेते हैं। कुछ समय पहले वे जोशीमठ में कल्पवृक्ष देखने भी गए थे जो पूरे भारत में केवल चार ही हैं। उनके पास 25 हजार फोटो का कलेक्शन है। वे फेसबुक ब्लॉग पर नई नई जगहों के फोटो डालकर वहां की जानकारी दे रहे हैं।

पीडब्लूडी में इंजीनियर नजीबाबाद निवासी ज्ञान प्रकाश का शौक ही फोटाग्राफी है। वे कुदरत के खूबसूरत नजारों के फोटो लेने के दीवाने हैं। ज्ञान प्रकाश फोटो लेने के लिए ऊंचे ऊंचे पहाड़ों पर भी पहुंच जाते हैं। ज्ञान प्रकाश का कहना है कि उन्हें फोटोग्राफी का शौक नहीं है बल्कि इसका नशा है। उनका कहना है कि कुदरत के नजारों के सामने इंसानी दुनिया कुछ भी नहीं है। वे अपने फोटो से सभी को कुदरत के नजारे दिखाते हैं।

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पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी 13

 पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी 13

23 दिसंबर 1989 को श्रमजीवी पत्रकार संघ के सम्मेलन में भाग लेने के लिए मुझे स्वगीय राजेंद्र पाल सिंह कश्यप, वीरेशबल आदि को गांधीनगर गुजरात जाना था। कार्यक्रम काफी पहले से निर्धारित था। हम उसकी तैयारी में लगे थे । पता चला कि नजीबाबाद के साथी जितेंद्र जैन को पुलिस ने पकड़ा। थाने में बुरी तरह मारा- प‌ीटा। दरवाजे के किवाड़ में देकर उनकी उंगली कुचल दीं गई। प्लास से नाखून खींचे गए। पुलिस जितना कर सकती थी ,उनके साथ किया। जितेंद्र जैन जेल भेज दिए गए।

नजीबाबाद के साथी अपने साथ मुझे भी जितेंद्र जैन से मिलने जेल ले गए। जितेंद्र जैन की हालत देखकर सबको बहुत गुस्सा आया। उन्होंने आप बीती भी सुनाई। यह बात मैंने वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय राजेंद्र पाल सिंह कश्पय को बताई। उन्होंने कहा कि हमें कल निकलना है। मैंने कहा निकलना तो शाम को है। बड़ी ज्यादती हुई है। कल दिन में प्रदर्शन कर लेते है्ं। वहीं से मैंने श्री बाबूसिंह चौहान साहब से बात की। चौहान साहब ने कहा कि वे भी जेल मेंं जितेंद्र जैन से मिलकर आए हैं। वास्तव में उसके साथ बहुत ही ज्यादती हुई है। बात चीत हुई।सहमति बनी की ज्यादती हुई है। आवाज उठाई जाए।अगले दिन 11 बजे प्रदर्शन करना तै हुआ। यह भी बात हो गई कि प्रदर्शन होगा, यह खबर सुबह के सब अखबारों में छप जाए।

बिजनौर के पत्रकारों में भी अन्य जगह की तरह धड़े बदी है। ,खेमें हैं। इसके बावजूद यह भी सत्य है कि पत्रकारों के विरुद्ध होने वाली ज्यादती पर एक साथ खड़े हो जाते हैं।

उस समय डा कश्मीर सिंह एसपी थे। नजीबाबाद में सत्तार नाम एक बदमाश था। उसके आंतक से सब परेशान थे। उसने जाब्ता गंज के सतीश की निर्ममता पूर्वक हत्या कर दी थी। उसके परिवार जन सत्तार की गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे।पोस्टमार्ट के बाद सतीश का शव नजीबाबाद आया। उसे जाब्तागंज जाना था किंतु लोगों ने घोषणा कर दी कि उसका अंतिम संस्कार कल्लू गंज में किया जाएगा। कल्लू गजं में शव जमीन पर रखकर ।अग्नि देने की प्रकिया चल रही थी कि एसडीएम और क्षेत्राध‌िकारी मौके पर पंहुच गए। शव कब्जे में लेकर भीड़ को भगा दिया गया। बताया जाता कि अधिकारियों ने इस मामले में नजीबाबाद के पत्रकारों से बात की थी।कहा था कि इस प्रकरण में पत्रकार जितेंद्र जैन की भूमिका संदिग्ध है। हो सकता है कि प्रशासन को लगा हो कि पत्रकार नहीं बोलेंगे । इसीलिए उसने जितेंद्र जैन के साथ बरबरता की।

अगले दिन समाचार छपा । 11 बजे पूरे जनपद से पत्रकार एकत्र हुए। प्रदर्शन हुआ।हमने कहा कि हम यूनियन के गुजराज सम्मेलन में जा रहे हैं। ये बात यहां उठाएंगे। हम रात में निकल गए।

बिजनौर में श्री बाबू सिंह चौहान रह गए। अधिकारी चौहान साहब का सम्मान करते ही थे। डरते भी थे। क्योंकि वे बड़े से बड़े प्रभाव के आगे दबते नहीं थे।

तत्कालीन एसपी डा कश्मीर सिंह अलग तरह के अधिकारी थे। उनके बिजनौर की मीडिया समेत समाज के सभी महत्वपूूर्ण लोगों से संबंध थे। हालत यह थी कि उनके तबादले पर जगह जगह विदाई कार्यक्रम हुए थे। शहर की दुकानों पर मिठाई नही बची थी।प्रदर्शन और चौहान साहब का रूआब जितेंद्र जैन को रिहा कराने में कामयाब आ गया। मामला खत्म हुआ।

छात्रवृति घोटाला

 छात्रवृति घोटाला

1993 में बिजनौर जनपद में हरिजन समाज कल्याण विभाग में घोटाला हुआ। यह लगभग 50 लाख रुपये का घोटाला था। दो वर्ष पूर्व अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए छात्र वृति देने की सरकार की योजना आई। इसमें व्यवस्था की गई थी कि छात्रवृति विद्यालय के खाते में जाएगी। इस व्यवस्था की कमी को बिजनौर समाज कल्याण विभाग के एक ल‌िपिक मोर्य ने पकड़ लिया। उसने जनपद के कुछ विद्यालय के प्रबधंक- प्रधानाचार्य के दोस्ती गांठी। उनसे कॉलेज के नाम से मिलते -जुलते नाम के खाते खुलवा लिए।विद्यालय को छात्रवृति न भेजकर विद्यालयों से मिलते -जुलते खातों में राशि डाल दी।

इस घोटाले का मुझे जून के आसपास पता चला। मैंने अमर उजाला में छापना शुरु किया। उस समय ओम सिह चौहान समाज कल्याण अधिकारी थे । वे दावा करते कि उनके यहां घोटाला हो ही नहीं सकता। सीडीओ सुंदर लाल मुयाल होते थे। उन्होंने हमारे समाचार देख तत्कालीन डीडीओ आरएस वर्मा को जांच सौंपी ।

इस प्रकरण लगभग आठ माह चला।प्रारंभिक जांच में 27 लाख का घोटाला मिला। 23 मार्च 1994 को समाज कल्याण अधिकारी ओम  सिंह चौहान  की गिरफ् तारी हुई।

समाज कल्याण विभाग में एक कर्मचारी होते थे मलिक। उनके पिता मेरे दोस्त होते थे।इस प्रकरण के चलने के दौरा एक दिन शाम को मलिक मेरे पास आए। अटैची उनके पास थी। वह बोले - छात्रवृति घोटाले के समाचार छापने बंद कर दें। अटैचीं में तीन लाख रुपये हैं। इन्हें रख लें। मैंने कहा - मलिक तुझे यह भी ख्याल नहीं आया कि तेरे वालिद मेरे दोस्त होतें हैं । वह बहुत शर्मीदा हुआ। अटैची लेकर वापस चला गया।

इसके बाद केस शुरु हो गया। एक दिन एक वकील साथी दफ्तर आए। बोले - समाज कल्याण का बाबू जगन लाल मोर्य को लेकर आऊंगा।वे चाहतां  है कि आप उन्हें लिखकर दे दें। इस घोटाले की जानकारी मैने मोर्य ने दी। इसके बाद आपने छापी। जो आपकी बात हो, उसमें से पांच हजार रुपये मुझे देने हैं।

वे बाद में मोर्य को लेकर आए। मोर्य को उम्मीद थी कि अमर उजाला से लिखकर  मिल जाने पर तू बच जाएगा। मैंने कहा कि लिखकर दे दूंगा। बीस लाख लूूंगा। मैं जानता था कि वह नहीं देगा। मैंने कहा मोर्य बाबू वह भूल गए, जब मैने तीन लाख लौटा दिए थे। तुमने कैसे सोच लिया कि मैं लिखकर दे दूंग?। मोर्य को तो उतना बुरा नहीं लगा, जितना मित्र महोदय को लगा। क्योंक‌ि मुफ्त में मिल रह पांच हजार रुपये का उनका नुकसान हो गया। 

Thursday, August 6, 2020

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -8

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -8
कालागढ़ थानाध्यक्ष सुरेंद्र सिंह मलिक और कालागढ में सेना का आपरेशन
1984 के आसपास कालागढ़ के थानाध्यक्ष सुरेंद्र सिंह   मलिक होते थे। वे बिजनौर आते तो मिलते जरुर। हर बार अनुरोध होता - कालागढ़ घूमने आओ। तब कालागढ़ बिजनौर में होता था।मैं  कहता -जब आना होगा तब आपको फुरसत नहीं होगी। समय  निकलता रहा। 1984 का मध्यावधि चुनाव  हो चुका था।  चुनाव में कांग्रेस की मीरा कुमार विजयीं हुईं । उन्होंने राम विलास पासवान को हराया था। तीसरे नंबर पर मायावती रही थीं। ये मायावती का पहला चुनाव था।र‌िजल्ट घोषणा के तीन -चार  दिन बाद रविवार पड़ा।  उस सयम रविवार को रामायण सीरियल आता था। हमारे घर टीवी नहीं था।पड़ौस में एक परिवार में मैं  रामायण देख रहा था। पत्नी निर्मल ने आकर बताया। मुरादाबाद से कैरे साहब का फोन है।
उमेश कैरे  मुरादाबाद के प्रत‌िष्ठित  पत्रकार हैं। पीटीआई  समेत अंग्रेजी के कई  अखबार के   वे रिपोर्टर हैं। उस समय अमर उजाला का कार्यालय उनके घर पर था। आज भी मेरे बड़े भाई से भी वे मेरे लिए ज्यादा हैं। जब संकट आया। वे संकट मोचन बनकर आ खड़े हुए।कैरे साहब के पिता जी भी पीअीआई के रिपोर्टर होते थे। माता जी यूएनआई  की रिपोर्टर रहीं।
मैंने बात कीं। वो बोले -क्या कर रह हो। मैंने कहा - टीवी देख रहां हूं।वह बोले कालागढ़ चले  जाओ। वहां  सिख  आतकंवादियों के विरूद्ध  आर्मी  का आपरेशन चल रहा है।  अभियान में हैलिकाप्टर भी लगें हैं।पंजाब में सिख आंतकवाद जड़ जमा चुका था। उत्तर प्रदेश में इस ट्रेंनिग कैंप के मिलने का पहला मामला था।
घर से मैं  विशाल फोटो स्टूडियो  पहुंचा।  उस समय अमर उजाला का कोई कार्यालय  नहीं होता था। मैं विशाल स्टूडियों पर ही  बैठता। यहीं मेरी डाक आती।विशाल स्टडियों के स्वामी सलीम अच्छे फोटोग्राफर थे। मेरे बिलकुल छोट भाई की तरह थे।उनसे मैं अमर उजाला के लिए  फोटो खिंचाता था। मैने सलीम को साथ  लिया। दोनों  बस में बैठ कालागढ़ के लिए  निकल गए।
मन में बहुत घुकड़- पुकड़ थी। कैसे होगा? क्या होगा? सेना के अपरेशन के बीच कैसे कवरेज  होगा। सेना और आंतकवादियों की गोली के बीच हम कैसे बचेंगे? मैं  तनाव में नाखून चबाने लगता हूं। मैं  नाखून चबा रहा था। सलीम मेरे पास खामोश बैठा था। मुझे अहसास हो रहा था कि सलीम को लाकर गलती की।  मेरी तो पेशेगत मजबूरी थी।पत्रकारों के साथ तो कुछ भी हो सकता है। पर इसके साथ कुछ हो गया  तो क्या जवाब दूंगा। ये तो मेरी एक आवाज पर चला आया। मैं तो घर निर्मल  के बता कर आया हूं। इसने तो किसी से कुछ नहीं बताया। दुकान भी बंद नहीं की। सिर्फ  शटर डालकर चला आया।
हम   तीन बजे के आसपास कालागढ़ थाने पहुंचे। सुरेंद्र सिंह मिले। बहुत बिजी थे। वायरलैस पर मैसेज  गूंज  रहे थे। फोर्स की भागमभाग मची थी।उन्होंने चाय मंगा ली। खड़े - खड़े बातचीत होती रही। हमने कहा -मौके पर कैसे जाया जाएं। उन्होंने बताया कि बहुत दूर वन में है।ट्रेक्टर - ट्राली से भी फोर्स  बहुत मु‌श्किल  से पहुंच पा रही है। हैलिकाप्टर को कुछ नहीं मिला। कैंप की जगह धुंआ उठता मिला। आतंकवादी वहां से निकल गए। जगह थी कालागढ़ डेम के पीछे  । लगभग एक घंटा हम रुके।
माहौल केे हलाक फुलका करने क लिए मैंने सुरेंद्र सिंह से कहा  देखा- हमने क्या कहा था। जब हम आएंगे तो फुर्सत नही होगी।  उनके सपाट चेहरे पर हल्की सी मुसकान आई। हम  विदा लेकर चल  दिए।वहां से हम धामपुर आए। धामपुर से बरेली खबर नोट कराई। बाद में घर आ गए।
 ज्ञातव्य है कि कुछ दिन पूर्व उत्तर भारत टाइम्स से शाम को खाना  खाने घर आ रहा था। आज जहां सीएमओ आफिस है, यहां पहले जिला अस्पताल होता था। मेरा नियम था कि घर आते - जाते अस्पताल देखकर जाता था। मैने देखा पुलिस और एसआईयू के अधिकारियों के साथ दो घायल सिख हैं। दोनों  जवान , काफी तंदुरुस्त है। मैंने एलआईयू वालों से पूछा - क्या है? उन्होंने  कहा कुछ नहीं। एक्सीडेंन्ट हैं।
बाहर निकला तो एक स्टाफ  नर्स  दिखाई दी। वह मझले  से कद की कुछ भारी और सुदंर थी। बहुत मिलनसार ।  उसने इशाराकर मुझे बुलाया। कहा - आतंकवादी हैं। कालागढ़ के पास ट्रेनिंग कैंप चल रहा था। वहां से आपस में लड़ पड़े।  गोली लगी है। घायल हालत में बस से आते धामपुर -अफजलगढ़  के बीच पकड़े गए हैं।उसने  बताया कि अंंदर बीच के कमरे में इनसे पूछताछ होगी। मैं वहीं डयूटी पर हूं। रात को एक बजे के आसपास आना। एमरजैंसी में मिलूंगी। जो ये बताएंगे। तुम्हें बता दूंगी।
मैं  चला आया।  उस समय अखबार लेकर बरेली से टैक्सी तीन चार बजे के आसपास बिजनौर आती थी। यहां अखबार छोड़कर कोटद्वार जाती। वहां से सबेरे वापस बरेली।
रोडवेज का चौकीदार टैक्सी से अखबार उतरवाकर अपनी सुपुर्दगी में लेता। टैक्सी वाले को डाक  (समाचार का) पैकेट छोड देता।  नर्स  द्वारा बताई  जानकारी का पत्र आदरणीय अतुल जी के नाम बनाकर खबरों के लिफाफे में रख चौकीदार को दे दिया। एक दिन बाद सिख आंतकवादी कैंप में गोली चलने का समाचार मुरादाबाद से डीआईजी के हवाले से छपा।
उसके अगले   दिन से बिजनौर से शुरु हो गया। क्योंकि घायलों से पूछ ताछ की सबसे ज्यादा जानकारी मुझे थी। बाद में पुलिस  ट्रेनिंग कैंप की जगह गई। वहां खाई से दो आंतकवादियों की लाश निकालकर लाई। ये आपस की गोली बारी में मारे गए थे। इस खबर को लेकर बिजनौर पुलिस मुझसे नाराज  हो गई। एक ट्रेनीज दरोगा ने आधी रात को मुझे घर से अपहृत करने का प्र्यास भी किया।  अपहरण  के प्रयास पर  आगे  चर्चा  होगी। 
  अशोक मधुप

Wednesday, August 5, 2020

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -7

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -7
एक नेक्सलाइड के साथ बाढ़ में एक दिनआज देश के कई भाग में नेक्सलाइड का जोर है। सुरक्षा दलों पर ये घात लगाकर हमला करते रहें हैं। इस माहौल में सन् 84 के आसपास का एक नक्सली नेता के साथ बाढ़ में एक दिन बिताने का संस्मरण याद आ रहा है।
कॉलेज के समय से मैं मार्क्सवादी कम्युनिष्ट आंदोलन से जुड़ गया था। इसी दौरान वामपंथी आंदोलन की अलग -अलग विचारधाराओं से परिचय हुआ।कुछ समय शिक्षण कर पूर्णकालिक पत्रकारिता से जुड़ गया। लगभग 45 साल पूर्व अमर उजाला से जुड़ा। 80 के आसपास मैं घर  से समाचार भेजता था। घर ही एक तरह से मेरा कार्यालय था।
एक दिन कुर्ता पायजामा पहने कंधे पर थैला लटकाए एक साहब घर आए। उन्होंने अशोक कुमार के रुप में अपना परिचय दिया। अपने को सीपीआईएमएल की प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बताया। सीपीआईएमएल भारत की कम्युनिष्ट पार्टी मार्क्सवादी लेलिनवादी है।इसके कई भाग हो गए। अधिकतर सत्ता प्राप्त‌ि के लिए सशस्त्र  आंदोलन के रास्ते पर निकल गए। इन्हे की नेक्सलाईड कहा गया ।   अपने घर पर एक नेक्सलाईड को देख कर अचकचा गया। लगा कि इसके बैग में हैंड ग्रेनेट या स्टेनगन हो सकती है। मेरे दिमाग में नेक्सलाइड की यही छवि थी। खैर कुछ देर मुझे सामान्य होने में लगे। अशोक से बातचीत हुई। वह मेरे ही जनपद के रानीपुर गांव के रहने वाले हैं। बाद में उससे अच्छी दोस्ती हो गई। वह यदा - कदा आने लगे। अशोक मंडावर के गंगा खादर क्षेत्र में अपना संगठन बना रहा थे। इसी दौरान गंगा में बाढ़ आ गई। गंगा बहुत तबाही कर रही थीं। अशोक ने कहा कि गंगा बहुत तबाही कर रही है। चलो बाढ़ घुमाता हूं।
मुझे बाढ़ में जाने का कोई अनुभव नहीं था। तै हो गया कि अगले दिन सबेरे सात बजे मंडावर बस स्टैंड पर मिलेंगे। मुझे ध्यान नहीं था,कि अगले दिन तीज का पर्व है। बाढ का भी कोई  अनुभव नही था। ये ही दिमाग में भी कि गंगा किनारे जांऊगा। एक डेढ़ घंटे में देखकर लौट आउंगा।पत्नी निर्मल से नौ बजे तक आने को मैं कहकर कैमरा लेकर घर से निकल गया। अशोक मुझे मंडावर मिले। उसके साथ बैलगाड़़ी में बैठकर गंगा के किनारे बसे गांव डैबलगढ़ पहुंच गया। यह गांव अंग्रेज कलेक्टर डैबल द्वारा बसाया गया ब्रिटीशकालीन गांव हैं।
यहां नाश्ताकर हम नाव से बाढ़ देखने चल दिए। गंगा का जल पूरे उफान पर था। बड़े -बडे़ पेड़ पहाड़ों से बहकर आ रहे थे। गंगा की धार की जोरदार आवाज से ही डर लग रहा था। मुझे तैरना नहीं आता ।एक बार ज्योतिषी ने कहा था कि पानी से बचना। पानी में ले जाने वाले को अपना दुश्मन मानना। पानी में किसी के साथ नहीं जाना। गंगा की तेज उठती पटारों को देखकर मुझे डर लग रहा था। ऐसे में ज्योतिषी की बताई इस बात के याद आने पर मेरा डर और बढ़ गया। नाव में अशोक उनकी पार्टी का स्टेट सेकेट्री और लगभग एक दर्जन गांव वाले सवार थे। नाव खेवकों को गंगा की धार को पार करना था। अतः वे नाव को खींचकर धार से ऊपर की साइड में ले गए। ऐसी जगह देखकर क‌ि जहां से नाव पानी में बह कर दूसरी साइड में सही जगह जाकर लगे।
उन्होंने नाव धार में डाल दी। वे तेजी से चप्पू चलाकर नाव को दूसरी साइड में ले जाने की कोशिश कर रहे थे। नाव के दोंनो किनारों के बीच में बीच में छेद करके मोटे रस्से बांधे गए थे। इन रस्सों में चप्पू फंसे थे। खेवक इन्हीं रस्सों में चप्पू चलाकर नाव नियंत्रित कर रहे थे।नाव धार के बीच पहुंची थी कि चप्पू को रोकने वाली दांई एक साइड की रस्सी टूट गईं। चप्पू के रस्सी के फंदे से बाहर होते ही नाव दूसरी साइड को वह चली। नाविकों का कंट्रोल नाव से खत्म हो गया।नाव में बैठे एक युवक ने टूटी रस्सी को चप्पू के चारों ओर घुमाया ।छेद में टूटा सिरा निकाला और उसे कसकर पकड़कर बैठ गया। उसने ये काम बहुत जल्दी किया। खेवक ने तेजी से चप्पू चलाना प्रारंभ कर दिया । नाव संभल गई। अपने गंतव्य की ओर चलने लगी। यहां से हम गंगा के बीच के गांव खैरपुर ,खादर ,लाडपुर लतीफपुर और इन्छावाला आदि गांव पहुंचे। यहां के रहने वालों ने गंगा की बाढ़ को देख अपने - अपने परिवार मुजफ्फर नगर जनपद के शुक्रताल नामक स्थान पर पहुंचा दिए थे। शुक्रताल प्रसि़द्ध धार्मिक स्थल हैं। यहां बहुत सारी धर्मशालाएं हैं। इनमें इनके परिवार रुके थे।इन गांव से शुक्रताल  जाना सरल है। पानी को देखकर  किसानों ने   काफी पशु खोलकर आजाद कर  दिए  । ताकि वह बहकर अपनी जान बचा लें।कुछ पशु थे तो वह घुटनों तक पानी में खडे़ थे। हालाकि ग्राम वालों ने गांव और घरों के बाहर के किनारे मिट् टी और पत्थर लगाकर पानी रोकने के लिए उपाए किए थे फिर भी घरों में दो फुट तक पानी भरा था। बुग्गी के उपर चूल्हे रखकर खाना बनाने की व्यवस्था की हुई थी। प्रत्येक घर  का एक दो पुरुष सदस्य गांव में रूका था।लोगों से बात कर फोटो खींच हम यहां से लौट लिए।पानी में जौंक थी। ये आसपास के खेतों के किनारे की छोटी -छोटी झाड़ियों पर बैठी थीं। तिड़क कर नाव में आ जाती थीं। मुझे इनसे बचाने को नाव के बीच में पटरे पर बैठाया हुआ था । इसके बावजूद डर लग रहा था। जौंक एक छोटा कीड़ा होता है। यह आदमी और पशु के शरीर पर लगकर उसका खून चूंसता हैं। छोटा सा यह कीट खून पीकर काफी बड़ा हो जाता है। नाम में सवार एक दो गांव वालों को यह लगी। उन्होंने जोक को पकड़ा ।खींचकर छुडाया । पानी में फेंक दिया। खींचने में जौंक लगने की जगह से खून भी निकलने लगा।
हमें शाम हो गई थी किंतु नाव नदी में लाने के लिए स्थान नहीं मिल रहा था। नदी में उसी स्थल पर नाव डाली जाती हैं, जहां नदी और खेत का स्तर बराबर होता है। यहां खेत नदी से काफी ऊंचाई पर था। ढांग ढूढते अंधेंरा हो गया। इस दौरान डाक मक्खी निकलने लगीं। यह बहुत खतरनाक काले- नील  रंग की मोटी मक्खी होती है। इसके काटने से बड़े पशु तक के शरीर से खून निकलने लगता हैं।डाक मक्खी और जोक के डर से मैं सहमा और सुकड़ा बैठा था। चांदनी रात थीं, ऐसे में नाव का सफर बहुत सुहाना और सुखद लग रहा था। पर गहरे पानी में डूबने ,जौंक और डाक मक्खी के काटने के डर ने सब कुछ गड़बड़ कर रखा था। घर की भी चिंता हो आई थी। सबेरे के नौ बजे तक आने को कह आया था । अब रात के आठ बजने को हैं। त्योहार का दिन होने के कारण पत्नी निर्मल परेशान, मेरे इंतजार में बिना खाए -पिए बैठीं होगी।रात नौ बजे हम गांव में आकर पड़े । जल्दी -जल्दी पेट भरा। घर की चिंता दी। मैने खाना खाकर गांव वालों से कहा कि मुझे मंडावर पंहुचा दें किसी ट्रक आदि से बिजनौर पंहुच जाऊंगा। उन्होंने मनाकर दिया । कहा -रास्ते में बदमाश लगते हैं। अब जाना ठीक नहीं। घर की चिंता में ढंग से नींद भी नहीं आई। इस समय फोन होते नहीं थे, जो घर सूचित किया जा सके।सबेरे जल्दी उठकर मंडावर से पहली बस पकड़कर  लगभग नो बजे बिजनौर पंहुचा। घर पर निर्मल का रोते बुरा हाल था।  । निर्मल ने  बताया कि वह अभी  कुलदीप सिंह के यहां गई थी। मेरे अमर उजाला के दूसरे साथी कुलदीप सिहं उस सयम मुहल्ले में ही कुछ दूर पर रहतें थे। उनसे एसपी को कहलवाया है। एसपी ने पूछा -किसके साथ गए है, तो कुलदीप सिंह बताया कि एक नेक्सलाइड अशोक है, उसके साथ है। एसपी होशियार सिंह बलवारिया थे। वे भी बहुत नाराज हुए।
आकर मैने एसपी को फोन किया। बलवारिया मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे। मैंने उन्हें बताया कि मैं आ गया हूं, वह बहुत नाराज हुए। कहा नेक्सलाईड के साथ जाना ठीक नहीं । अभी एनएसए की फाइल चल रही है। ये और उसमें शामिल हो जाएगा।कई दिन लगे निर्मल का गुस्सा शांत होने में । उनका गुस्सा इस बात को लेकर था,कि त्योहार के दिन क्यों गए। हमारा त्यौहार खराब हुआ। बनाया खाना भी बेकार रहा।
अशोक मधुप
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जब सलूजा पर हुआ हमला ।उनपर ही दर्ज हुआ हत्या का मुकदमा

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -6
जब सलूजा पर हुआ हमला ।उनपर ही दर्ज हुआ हत्या का मुकदमा

11 मार्च 19 94 । बिजनौर सूचना आई कि धामपुर में अमर उजाला के पत्रकार महेंद्र सलूजा के खिलाफ धारा 302 में मुकदमा दर्ज हुआ है। कुछ लोगों से सलूजा को हमला कर घायल कर दिया है।मैँ और वरिष्ठ साथी जनसत्ता संवाददाता ओपी गुप्ता जी टैक्सी कर धामपुर पंहुच गए। यहां के के शर्मा इंस्पैक्टर थे। के के शर्मा अलग तरह के पुलिस अधिकारी रहे। ऐसे अधिकारी जो बड़े - बड़े अधिकारी के दबाव के आगे भी नहीं झुके। वे दंगा रोकने के स्पेशलिस्ट थे। संभल दंगों के लिए मशहूर था। वे संभल में छह साल तैनात रहे। जबकि तीन साल से ज्यादा पुलिस अधिकारी का एक स्थान पर तैनाती का नियम नहीं था।के के शर्मा हमारे बहुत नजदीक थे। सलूजा धामपुर ‌थाने में ही मिले। डीएम अशोक कुमार चतुर्थ और कप्तान निरंजन लाल भी मौजूद थे। पता लगा कि एक दलित युवक को कहीं से सांप मिल गया था। युवक नसेड़ी था।वह उससे खेल रहा था। जैतरा के पास तालाब में उसे एक और सांप मिल गया। वह उससे भी खेलने लगा । तालाब में मिला सांप जहरीला था। उसने एक दो जगह काट लिया । पर ध्यान नहीं दिया। सलूजा को पता चला । वे मौके पर गए। फोटो खींचे। इसी दौरान थाने के दरोगा रविंद्र कुमार भी दो सिपाही के साथ मौके पर आ गए।उन्होंने समझाया। युवक की समझ में नहीं आया। काफी भीड़ एकत्र थी। सांप से खेलते युवक की मौत हो गई। युवक के परिजनों को लोगों ने चढ़ा दिया। यहां कि अखबार वाले फोटो खींचकर ले गए हैं । ये अखबार में छापेंगे। तो तुम फंस जाओंगे। महेंद्र सलूजा सरदार हैं। सरल हैं। दिन रात सड़क पर घूमने वाले कबीर परम्परा के पत्रकार।युवक के परिवार जनों से सलूजा को पकड़ लिया। उसे बुरी तरह मारा- पीटा। पकड़ कर थाने ले आए। सलूजा, दरोगा रविद्र स‌िंह थाने के दो सिपाही सहित कई लोगों ‌के खिलाफ आई पीसी की धारा 147, 302, 323 के अंतर्गत मुकदमा लिखाया कि इन्होंने षडयंत्र कर उनके परिवार जन को मारा। वह सांप से खेल रहा था। तालाब में दूसरा जहरीला सांप दिखाई दिया। इन्होंने एक राय की। दरोगा रविंद्र कुमार ने सांप को लाठी से उठाया। युवक के गले में डाल दिया। कहा खेल । इससे खेल। ये सांप जहरीला था। इसके काटने से सांप से खेलने वाले की मौत हो गई।प्रदेश में बसपा की सरकार थी। लगभग एक सप्ताह बाद मुख्यमंत्री मायावती जी को बिजनौर आना था। अतः दलित नेताओं ने पीड़ित परिवार को चढ़ा दिया। डटे रहना। इसकी पत्नी को सरकारी नौकरी भी मिलेगी । मुआवजा भी। हम पंहुचे । बात हुई। डीएम अशोक कुमार ने कहा कि मरने वाले की पत्नी को नौकरी दिलाई जाएगी। हमने कहा कि हमारे पत्रकार सलूजा पर हमला हुआ है। उसे क्या मिलेगा? डीएम ने कहा कि पांच हजार रुपये दिए जाएंगे।हम सलूजा केे इलाज के लिए बिजनौर को लेकर चलने लगे । एसपी निरंजन लाल ने कहा कि उपचार करा कर भिजवा देना। मैंने कहा कि हम माने की सलूजा मुलजिम है? इस पर इंस्पैक्टर के के शर्मा ने कहा कि कोई जरुरत नहीं। सलूजा मुलजिम नहीं हैं। आप जहां चाहें ले जांए। जहां रखे। निरंजन लाल अलग तरह के अधिकारी थे। पर के के शर्मा के सामने वे कुछ नहीं बोले।हम सलूजा  केे इलाज के लिए बिजनौर को लेकर चलने लगे । एसपी निरंजन लाल ने कहा कि उपचार करा कर भिजवा देना। मैंने कहा कि हम माने कि सलूजा मुलजिम है?  इस पर इंस्पैक्टर के के  शर्मा  ने कहा कि कोई जरुरत नहीं। सलूजा   मुलजिम नहीं हैं। आप जहां चाहें ले जाएॅ।  जहां रखे। निरंजन लाल  अलग तरह के अधिकारी थे। पर के के शर्मा के सामने वे कुछ नहीं बोले।
हम सलूजा को बिजनौर ले आए। जिला अस्पताल में भर्ती  करा दिया।अगले दिन डीएम  अशोक कुमार को अस्पताल ले जाकर सलूजा  को पांच  हजार रुपये  दिलाए। रुपये  देते फोटो  खिंचाया। कुलदीप सिंह ने कहा कि ये फोटो अखबार में छपना चाह‌‌िए ताकि लगे कि ये मुलजिम नहीं हैं। हमने  फोटो छपने भेज दिया।
डेस्क् को फोन कर कहा । तो उन्होंने कहा कि भदोरिया जी को बता दो। भदोरिया जी प्रदेश प्रभारी होते थे।उनसे फोटो छापने का अनुरोध  किया।
सुबह फोटो अखबार में नही था। मैने डैक्स के साथी से पूछा ।  उसने कहा क‌ि  पेेज पर लग चुका था। आपके फोन करने पर आलोक भदौरिया जी ने रुकवा दिया। मैने एडमिन के साथी राजीव  धीरज से बात की । धीरज  स्योहारा से हैं। स्योहारा में मेरे अधीन अमर उजाला के रिपोर्टर होते थे। फिर मेरठ चले गए। मैने उन्हें किस्सा सुनाया और कहा -  इस्तीफा भेज रहा हूॅ । उन्होंने कहा कि राजेंद्र ‌त्रिपाठी जी को बता दो। आज के अमर उजाला मेरठ के संपादक राजेंद्र त्रिपाठी उस समय क्राइम रिपोर्टर होते थे।  देर से सोए होंगे। मैंने उन्हें  फोन कर स्थ‌िति बता दी। कहा कि टैक्सी से इस्तीफा भेज रहा हूं।
अतुल जी के रहने के टाइम में मैं  नाराज होकर साल में एक -दो बार इस्तीफा भेज देता था। वह बुलाकर मना लेते थे।
दुपहर एक  बजे  अतुल जी का फोन आया। लोगों को सोने भी नहीं देते । मेरठ आइये।
मैँ  और साथी कुलदीप सिंह अखबार की टैक्सी से मेरठ  चले गए। उन्होंने हमारी आराम से बात सुनी।आलोक भदोरिया को  बुलाया। फोटो न छापने का कारण पूछा। उनसे कहा कि जिले में बैठकर ब्यूरो प्रमुख को वहां के हालात से काम करने पड़ते है। इसलिए  उनकी सुनिए। उसी के हिसाब से काम करिए। फोटो   सुबह के अखबार  में छप  जाना चाह‌िए।और इस तरह वह फोटो छप गया।
मुख्यमंत्री मायावती बिजनौर  आयीं। चलीं गईं। इस प्रकरण का जिक्र भी नहीं हुआ। 11 मार्च  1994 को दर्ज  मुकदमा एक माह बाद 12अप्रेल 94 को खत्म हो गया।  सलूजा पर हमले की आशंका को देख एसपी ने उन्हें तीन -तीन माह के लिए एक एक सशस्त्र गार्ड  दिया। तीन माह के बाद मंडलायुक्त की संस्तुति से इनके पास तीन ‌माह और गार्ड रहा।
सलूजा फक्कड़ रहे । शुरू से लेकर । अब भी ऐसे ही हैं। गार्ड रहा। कोई  वाहन तो था नहीं। सलूजा जी दिन भर साइकिल पर लिए घूमते। कभी सलूजा साइकिल चलाते । कभी गार्ड।।सलूजा जी आज अमर उजाला में नहीं हैं,पर सरलता वैसी ही है।अशोक मधुप

Sunday, August 2, 2020

जब मेरे विरूद्ध दर्ज हुआ सेना में विद्रोह फैलाने का मामला


जब मेरे विरूद्ध दर्ज हुआ  सेना में विद्रोह फैलाने का मामला---5


स्वर्ण मंदिर पर सेना ने धावा बोलकर आतंकवादियों को मार दिया था। काफी को  गिरफ्तार कर लिया था।आपरेशन हो  चुका था। इसे लेकर देश के सिखों में बहुत गुस्सा था। शाम के समय बिजनौर पुलिस कंट्रोल से मेेसेज  आया कि कोडिया छावनी से एक ट्रक में नौ  सिख जवान भागे हैं। उस समय आज के 'स्वतंत्र आवाज पोर्टल' के संपादक दिनेश शर्मा  यहां उत्तर भारत टाइम्स में कार्यरत थे। उन्हें यह मैसेज हाथ  लगा। उन्होंने उत्तर भारत टाइम्स के लिए  खबर की। मैंने अमर उजाला में भेज दी।उत्तर भारत टाइम्स ,बिजनौर लोकल तक  सीमित था।  उसपर कुछ फर्क  नही पड़ा।  

उस समय बरेली का अमर उजाला बिजनौर आता था। यह खबर सुबह के अमर उजाला  अखबार में छप गई। इससे अगले दिन खबर छपी कि कोडिया छावनी के कमांडिग आफिसर  ने मेरे (अशोक मधुप) और अमर  उजाला के संपादक- प्रकाशक स्वामी के  विरुद्ध सेना में विद्रोह करने का मुकदमा दर्ज  करा दिया है। बरेली से आदरणीय अत़ुल जी का  अखबार की टैक्सी  से पत्र आ गया कि कृपया देख लें। क्या मामला है?

मै  और साथी  कुलदीप सिंह एडवोकेट कोटद्वार चले गए। वहां अमर उजाला के रिपोर्टर पी डी कुकशाल साहब मिले। बहुत घबराए हुए थे। बोले जल्दी भाग जाओ । कोडिया छावनी के कमांडिग आफिसर को आपका पता चल  गया तो  जाने आपके साथ क्या करे।

हम  उनके साथ चाय की दुकान पर बैठ गए। चाय पीते हुए बात होने लगी।उन्होंने बताया कि आपकी खबर पढ़कर लगभग 10 बजे मैंने  छावनी फोन किया ,कमांडिग अफसर   से बात की। वह गाली देकर बोला कहाॅ  है ?मैं तो सुबह से  तेरी तलाश में हूं। मैने कहा - मैं  11 बजे आपके पास आ रहा हूँ। जाने से पहले आफिस गया । पता चला कि सुबह से फौज की गाड़ियाॅ मुझे  खोजती घूम रही हैं।

उन्होंने बताया कि मै  11 बजे छावनी पहुंचा। कमांडिग आफिसर  मुझे गाली दे, सो दे। एक घंटे तक वह बिफरा रहा। एक घंटा होने पर मैंने कहा - साहब  पानी पिलवाओ। आप भी पानी पियो।  दोनों ने पानी  पिया। वह कुछ ठंडा हुआ तो मैंने कहा -वह अखबार दिखाओ जिसमें खबर है। उन्होंने अखबार दिया। मैने खबर पढ़कर उन्हें सुनाया। खबर में था कि बिजनौर से हमारे संवाददाता अशोक मधुप  ने खबर दी है कि कोडिया छावनी से एक ट्रक में सवार नौ  जवान बिजनौर साइड को भागे हैं। उन्हें रोका  जाए।

उन्होंने बताया कि खबर आराम से पढ़ने के बाद  उसका गुस्सा शांत हुआ। इससे पहले वह  मुझे  गाली दे  रहा था। खबर पढ़ने के बाद  उसने आपको खूब गलियाया।

कुकशाल साहब से  हमने ऐसा प्रदर्शित किया कि हम डर गए हैं। तुरंत बिजनौर जा रहे हैँ। उनसे अलग होकर हम थाने पहुॅच गए। आईओ से मिले। आईओ का नाम याद नहीं। पर बहुत ही बढ़‌िया  और अच्छा पुलिस अधिकारी था।  उसने हमें चाय पिलाई। कहा कि इनका जवान भागने का वायरलैस तो हमारे यहां भी रिकार्ड है। उनकी राय थी कि जवान भागे । इन्होंने उनके भागने का वायरलैस किया। किंतु  रास्ते की जानकारी न होने के कारण वे पकड़ लिए गए। इन्होंने बाद में मामला दबा लिया।

उन्होंने आश्वस्त किया कि एक सप्ताह में मामला खत्म हो जाएगा। आईओ तीन -चार दिन बाद कमांडिग  आफिसर  के पास गए।उनसे कहा कि वे बिजनौर अशोक मधुप के पास गए थे। उन्होंने बताया कि यहां पुलिस कंट्रोल को कोडिया छावनी से  वायरलैस आया था। वे मुझे  लेकर पुलिस कंट्रोल गए। यहां रिकार्ड में दर्ज  आपका वायरलैस मैसेज मुझे दिखवाया।

बताएं  अब  क्या करना है ? केस आगे बढ़ता है तो  आपके ‌ख‌िलाफ  जाएगा।  कमांडिग अधिकारी का अब तक गुस्सा शांत हो चुका था। उन्हें लगा कि मामला आगे बढ़ा तो उनके विरूद्ध जाएगा  । सो  कहा छोड़ो। मामला खत्म करो। और इस तरह मामला खत्म हो गया। एक सप्ताह भी नहीं लगा।


अशोक मधुप
     

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी 4

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी 4

जब देहरादून प्रशासन ने मुझ पर लगानी चाही एनएसए---

कौन? कब? , यहाँ पर काम आ जाता है, कुछ पता नहीं चलता। हम सोच भी नहीं सकते कि ऐसा भी हो सकता है। ऐसा मेरे साथ तो कईं बार हुआ। कवि मनोज अबोध मेरे छोटे भाई की तरह से हैं। उनकी पत्रकारिता में रुचि शुरू से ही रही है। उत्तर भारत टाइम्स में काम करने के दौरान उनकी ,पोस्ट आफिस में नौकरी लग गई। सरकारी नौकरी के बाद भी उनका मन पत्रकारिता में रमा रहा। अपना शौक पूरा करने के लिए मनोज ने 'मंथन फीचर' नाम से फीवर सर्विस शुरू की। संपादक अपनी पत्नी इंदु भारद्वाज को बनाया।उसने मुझ से एक लेख मांगा। उस समय उत्तरांचल आंदोलन जोरों पर था। समय की मांग देखते हुए मैने इस आंदोलन के समर्थन में एक लेख लिख दिया। मनोज ने उसे संपादित किया। समाचार पत्रों को भेज दिया। उसने भेजी प्रति मुझे दिखाई। मैंने देखा कि उसमें एक वाक्य गलत हो गया है । यह वाक्य पहाड़ के रहने वालों के लिए भारी आपत्ति जनक था।मैंने उसे गलती से अवगत कराया। मनोज ने जब तक संशोधन भेजा तब तक विश्व मानव सहारनपुर में लेख छप चुका था।

लेख छपने के बाद पहाड़ के रहने वालों में गुस्सा होना स्वभाविक था। सो अगले दिन अखबार लेकर गई विश्व मानव की टैक्सी और अखबार को देहरादून में जला दिया गया। मेरे और विश्वमानव के खिलाफ प्रदर्शन हुए। विश्वमानव सहारनपुर के संपादक और मेरी गिरफ्तारी की मांग को लेकर आंदोलन हुए। दोनों पर रासुका लगाने की मांग हुई।

मेरे खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की सूचना देहरादून अमर उजाला से मेरठ आयी। मेरठ में उस समय डेस्क पर मेरे छोटे भाई जैसे सुभाष गुप्ता कार्यरत थे। उन्होंने वह सूचना टैक्सी से मुझे भिजवा दी। चिंता होना स्वभाव‌िक था।उस समय एच के बलवारिया बिजनौर में एसपी थे। के के सिह डीएम ।

हमारी मित्र मंडली के एक साथी हैं। हुकम सिंह । पेशे से वकील हैं। कचहरी में बैठते हैं। मिलना कम होता है। पर होता रहता है। वे बलवारिया साहब के कैंप आफिस पर किसी काम से गए थे। बलवारिया साहब किसी काम में व्यस्त थे। स्टेनो ने उन्हें अपने पास बैठा लिया। इसी दौरान घंटी बजी। अर्दली ने स्टेनो से कहा साहब बुला रहे हैं। स्टेनो बलवारिया साहब के कक्ष में चले गए। हुकम सिंह ने स्टेनो की मेज पर नजर दौड़ाई तो स्टेनो की मेज पर डीएम देहरादून का ,बिजनौर के डीएम और एस पी के नाम वायरलैस मैसेज पड़ा दिखा। इस मैसेज में मुझे एनएसए में निरूद्ध् करने का अनुरोध किया गया था। हुकम सिंह धीरे से इस पत्र की नकल कर लाए। उन्होंने ये नकल हमारे पत्रकार साथी वीरेश बल को दी। वीरेश बल ने मुझे बताया ।मैं, वीरेश बल, शिव कुमार शर्मा राजेंद्र पाल सिंह कश्पय साहब के पास गए।

राजेंद्र पाल सिंह उस समय दैनिक उत्तर भारत टाइम्स के संपादक थे। बिजनौर मुख्यालय पर पीटीआई सहित कईं अंग्रेजी दैनिक के रिपोर्टर भी थे। एक तरह सेहमारे अभिभावक थे।उनसे बातचीत हुई। तय हुआ कि डीएम और एसपी से मिला जाए।हम लोग डीएम के के सिंह से मिले। मदद की बात की। केके सिंह प्रमोशन ने डीएम बने थे। देहरादून के डीएम सीधे आईएएस थे। के के सिंह ने साफ मनाकर दिया । कहा कि वहां के डीएम ने लिखकर भेजा है। मैं इसमें कुछ भी मदद नहीं कर सकता।

हम सब बलवारिया साहब से मिले। उनसे हम लोगों की उठ -बैठ ठीक थी। उन्होंने मेरे से कहा कि एनएसए लगना आपके लाभ में है। आप गिरफ्तार होते ही हीरो बन जाओगे। देश भर में प्रदर्शन होंगे। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री निवास तक शोर मचेगा। दो तीन दिन में छूट जाओगे,पर मैं आपको हीरो नहीं बनने दूंगा। मैंने डीएम और एसपी देहरादून से कह दिया है कि हमारे यहां अशोक मधुप की इमेज बहुत अच्छी है। उनके किसी समाचार लेख से यहां कभी कोई विवाद नहीं हुआ। आपके यहां हुआ है। आप एनएसए का वारंट बनाकर भेज दें। मैँ तामीज करा दूंगा। मेरे यहां कुछ नहीं है, इसलिए अपने यहां से वारंट नही बनाऊंगा। उन्होंने कहा कि मैने बता दिया है कि पत्रकार का मामला है, एक दिन बाद ही देश भर में हंगामा मचेगा। आप करोगे आप झेलोगे।

पत्नी निर्मल भी मानसिक रूप से तैयार हो गईं।उन्होंने मुझे समझाया जो होगा।देखा जाएगा।चिंता मत करो ।हम जॉब में हैं।परेशानी वहाँ होती है।जहाँ अन्य आय का स्रोत न हो। मैं भी मानसिक रूप से तैयार होगया।सोचा जेल में आराम से पढ़ा लिखा जाएगा।चिंतन होगा।

पर समय इसके लिए तैयार नहीं था।

एनएसए टल गई। पर पता लगा कि मेरे और संपादक विश्व मानव सहारनपुर के विरूद्ध 295ए में देहरादून में मुकदमा दर्ज है।समाज में साम्प्रदायिक भावना भड़काने का। विश्वमानव की ओर से भी उसकी टैक्सी में आग लगाने , नुकसान होने आदि का मुकदमा दर्ज कराया गया था ।देहरादून वाला मुकदमा भी सहारनपुर भेज दिया गया ।

सहारनपुर में सुंदर लाल मुयाल एडीएम होते ‌थे। पहले ये बिजनौर भी डीडीओ और एडीएम रह गए थे। वर्धमान कॉलेज के विज्ञान विभाग के प्रवक्ता ओ पी गुप्ता जी जनसत्ता के संवादादाता हैं। गुप्ता जी की अधिकारियों के साथ न‌िकटता जग जाहिर थी। सुंदर लाल मुुयाल जी से भी उनकी घनिष्ठता थी। मैँ और ओपी गुप्ता जी दोनों सहारनपुर गए। विश्वमानव पहुंचे तो वहां बढ़ापुर के साथी शराफत हुसैन मिले। उन्होंने अपने साहित्य संपादक से मिलवाया। साहित्य संपादक का नाम अब याद नहीं। उन्होंने कहा कि आपका लेख बिल्कुल सही था। उसमें कुछ गलत नहीं था। वे गढ़वाल का गजेटियर पेश कर सकते हैं।

खैर! कुछ देर वहां रुके। शराफत बाहर तक छोड़ने आए।यहां से हम मुयाल साहब के पास गए। उहोंने केस के आईओ को बुला रखा था। आईओ ने कहा कि क्रास केस है। खत्म करने के आदेश हैं। मुयाल साहब ने कहा कि आज ही खत्म कर के एफआर की प्रति शाम तक मुझे पहुंचा दें। एक दो-दिन बाद उन्होंने एफआर की प्रति हमें भिजवादी । इस तरह इस प्रकरण का समापन हुआ। बहुत तनाव रहा।पर सुभाष गुप्ता जी,हुक्म सिंह जी,वीरेश बल जी, ओपी गुप्ता जी सुन्दर लाल मुयाल जी इस प्रकरण को निपटाने में बहुत मददगार रहे।

 


Tuesday, July 28, 2020

पत्रकारिता की भूली बिसरी कहानी -3

पत्रकारिता की भूली बिसरी कहानी -3

बिजनौर में रामलीला मैदान में भाजपा के व‌रिष्ठ नेता अटल विहारी बाजपेयी जी की सभा थी। उस दिन अचानक रेहड़ के पत्रकार साथी अशोक कुमार शर्मा  आ गए। बोले- पुलिस के एक दरोगा को  मकान किराए पर दे दिया था। उसका तबादला हो गया किंतु वह मकान खाली नहीं कर रहा।

मैंने पूरी बात सुनी। उन्हें सभास्थल पर अपने साथ ले गया।  मुझे  उम्मीद थी कि वहां एसपी साहब मिलेंगे।पुलिस अधीक्षक उस समय दिलीप त्रिवेदी जी ही  थे।  वह कार्यक्रम स्थल पर बाहर ही मिल गए। मैंने अशोक शर्मा  जी को उनसे मिलवाया। उन्होंने समस्या सुनी। कहा कि एक सप्ताह में मकान खाली हो जाएगा। एक सप्ताह की बात सुनकर मुझे आश्चर्य  हुआ।
इसपर उन्होंने कहा कि कल बरेली में आईजी की मी‌ट‌िंग है। मुझे उसमें जाना  है। आई जी साहब से कहकर इस दरोगा का  बरेली जनपद में तबादला करा दूंगा। आर्डर आने के बाद तुरंत उसे रिलीव कर   दिया जाए्गा।ऐसे में वह स्वतः मकान खाली कर जाएगा। या करा दिया जाएगा। ऐसा ही हुआ भी।

ऐसा ही मकान का एक मामला मेरे मित्र रज्जी खन्ना उर्फ  राजकिशोर खन्ना का फंसा। स्वर्गीय रज्जी खन्ना की मुख्य डाक घर के सामने  जोली टीवी नाम से  दुकान थी। जैन मंदिर के पास डाक्टर दीपक के क्लिनिक के ऊपर का एक पोर्शन खाली था। पुलिस के एक हैड कांस्टेबिल ने  इसे किराए के लिए मांगा। रज्जी खन्ना ने उस समय के हिसाब से  किराया काफी ज्यादा,  पांच हजार रुपये के आसपास प्रतिमाह बताया। सही राशि मुझे अब याद नहीं। वह मकान में आकर रहने लगा। एक म‌हीना बीता ।दो महीने बीते। उसने रज्जी खन्ना को किराया नहीं  दिया। किराया मांगा  तो बोला कि मै  तुम्हारे मुहल्ले  की सुरक्षा कर रहा हूं। तुम खुद मुझे  इसके लिए 20 हजार रूपये महीना दो।  मामला चलता रहा। उसका अम्हेड़ा चौकी केे लिए तबादला हो गया। वह अपना सामान तो ले गया किंतु मकान से ताला नही खोल कर गया। रज्जी खन्ना से कह गया कि मेरी बंदूक रखी है। ताला मत तोड़ लेना।

यह सुन रज्जी खन्ना हक्के - बक्के रह  गए। वे थे  तुनक मिजाज। भ्रष्टाचार विरोधी एक संगठन भी चलाते थे। जरा जरा सी बात पर गुुस्सा आ जाता था।उन्होंने आव देखा न ताव ।  इस घटना का इश्तहार छपवाया। शहर में बंटवा दिया। एसपी को भी दे आए। मामला नहीं ‌निपटा। हमारे पत्रकार साथी शिवकुमार जी  उनके पास बैठते थे। शिवकुमार जी ने यह कहानी मुझे बताई। हल्दौर के थानाध्यक्ष बल्ले सिंह हमारे मित्र थे।अम्हेड़ा चौकी उनके अधीन थी।वे जब भी बिजनौर आते थे  तो मुझसे  जरूर मिलते  थे। मैने समस्या उन्हें बताई। उन्होंने कहा कि मामला निपट जाएगा। एक दो दिन बाद उन्होंने उस दीवान से लेकर मकान की चाबी मुझे भिजवा दी। तब मैंने कहा - रज्जी भाई मकान देते समय देख तो लेते कि लेने वाले की हालत किराया देने की है भी या नहीं।  मकान ऐसे ही ,बिना सोचे समझे किसी को भी किराये पर देना उचित नहीं है । फालतू के लफड़े लेते हो।