Friday, April 23, 2021

बिजनौर में जन्मे थे आर्य विज्ञान सत्य प्रकाश सरस्वती

23 अप्रैल 2021 में अमर उजाला में प्रकाशित मेरा लेख

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यूपी के इस जिले में सत्यप्रकाश सरस्वती ने लिया था जन्म, अंग्रेजी में किया था वेदों का अनुवाद



डॉ. सत्यप्रकाश (स्वामी  सत्यप्रकाश सरस्वती)
(1905-1995)  
आपका अध्ययन इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुआ। आपने रसायन शास्त्र विभाग से  Physico chemical studies of inorganic jellies  विषय पर डी.एससी. की उपाधि 1932ई.में प्राप्त की। 1930 ई. से ही रसायन शास्त्र विभाग में अध्यापन आरम्भ किया। 1962 ई. में विभागाध्यक्ष तथा 1967 ई. में सेवानिवृत्त हुये। आपके निर्देशन में 22 विद्यार्थियों ने डी.फिल. की उपाधि प्राप्त की।आपके 150से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हुये। वैज्ञानिक विकास की भारतीय परम्परा,  Founder of Sciences in Ancient India, A Critical study of Brahmagupta and his works, The Bakhshali manuscript( भारतीय अंकगणित की उपलब्ध प्राचीनतम पाण्डुलिपि का गणितीय प्रक्रियाओं के साथ सम्पादन)   Coins in Ancient India  (मुद्राशास्त्र पर लिखा गया शोधपूर्ण ग्रन्थ)  Advance Chemistry of Rare element,  रासायनिक शिल्प की एकक संक्रियाएं सी एस आई आर से प्रकाशित "भारत की सम्पदा" (Wealth of India- 22vol. ) के प्रमुख सम्पादक आदि उनके कुछ प्रमुख ग्रन्थ है। जितने विविध विषयों पर स्वामी सत्यप्रकाश जी का लेखन है शायद ही विश्व के किसी व्यक्ति ने इतना लिखा हो। वेद, शुल्बसूत्र, ब्राह्मण ग्रन्थ, उपनिषद्,  रसायन विज्ञान,भौतिक विज्ञान, अग्निहोत्र, अध्यात्म, धर्म,  दर्शन, योग, आर्यसमाज, स्वामी दयानन्द, नवजागरण आदि विविध विषयों पर सैकड़ों ग्रन्थ और लेख स्वामी सत्यप्रकाश जी द्वारा लिखे गये। चारों वेदों का अंग्रेजी में अनुवाद(23खण्डों में), शुल्बसूत्रों का सम्पादन,  The critical study of philosophy of Dayanand  और मानक हिन्दी अंग्रेजी कोश का सम्पादन उनके द्वारा किये गये उल्लेखनीय कार्य हैं। आप 1942ई. में स्वतन्त्रता आन्दोलन में जेल भी गये। स्वदेशी नमक आन्दोलन के समय जब अंग्रेजों ने भारतीय नमक खाने के योग्य नहीं है कहा तब नेहरूजी के कहने पर शोध कर लीडर अखबार में चार शोध पूर्ण लेख लिख कर दुनियाभर के वैज्ञानिकों की बोलती बन्द कर दी।  शतपथ ब्राह्मण पर आपके द्वारा  700पृष्ठों में  भूमिका लिखी गई जो ग्रन्थ को समग्रता से समझने में बहुत सहायक है। आपने  21बार से अधिक विभिन्न  देशों की यात्रायें की।विज्ञान परिषद प्रयाग से हिन्दी मासिक विज्ञान पत्रिका का सम्पादन १०वर्षों तक किया। विश्वविद्यालय में रहते हुये डॉ. सत्यप्रकाश का लेखन मुख्यत: विज्ञान के क्षेत्र में रहा और संन्यास के बाद का लेखन वैदिक साहित्य आर्य समाज और स्वामी दयानन्द विषयक। स्वामी सत्यप्रकाश जी वैज्ञानिक विचारक चिन्तक संन्यासी थे। वे अपने विचारों को लेखों और भाषणों के माध्यम से व्यक्त भी करते थे। उनके विचार कई बार भिन्नता लिये होते और असहमति का कारण बन जाते परन्तु उस विषय में उनका चिन्तन जारी रहता था। स्वामी जी की शताधिक रेडियो वार्तायें तथा पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख हैं जिनका संकलन और प्रकाशन अभी शेष है।स्वामी सत्यप्रकाश जी द्वारा अंग्रेजी में लिखे ग्रन्थों का हिन्दी में अनुवाद भी हिन्दी भाषी पाठकों के लिये अत्यन्त उपयोगी होगा। आपका निर्वाण 18जनवरी 1995 ई. में अपने *प्रिय शिष्य पं. दीनानाथ शास्त्री जी के आवास में अमेठी में हुआ। अन्त्येष्टि आर्य समाज विमान पुरी एच ए एल कोरवा अमेठी के प्रांगण में हुई। 

-प्रिय शिष्य पं. दीनानाथ शास्त्री
 

Monday, April 5, 2021

स्वामी सच्चिदानंद

स्वामी सच्चिदानंद सैतालिस साल बीत गए स्वामी सच्चिदानंद को शहीद हुए। आज भी मैं वह दृष्य नहीं भूला। आश्रम में उनके और उनके साथी के शव पड़े थे । मैँ उन्हें देखने गया था।उस समय मैं बीए में पढ़ता था। मेर घर की दूरी खारी से दो किलो मीटर है। सूचना मिली कि गोविंदपुर आश्रम में स्वामी जी का कत्ल हो गया। रात में बदमाशों ने उनकी और उनके एक साथी की गोली मार कर हत्या कर दी। स्वामी जी की बहुत प्रसिद्घी थी। क्षेत्र में बहुत सम्मान था। उनकी हत्या की सुन धक्का सा लगा। समझ में नहीं आया कि उनकी हत्या क्यों हुई। इतने अच्छे आदमी का भी कोई दुश्मन हो सकता है।हम साइकिल से भाग कर आश्रम पंहुचे। आश्रम में कुछ दूरी पर दो शव पड़े थे। एक स्वामी जी का और एक उनके साथी किसी रेड़डी का। लोग बता रहे थे कि स्वामी जी बहुत बहादुर थे। बदमाश स्वामी जी को मारना चाहते थे। किंतु जिस कमरे को उन्होंने खुलवाया ,उसमें उनके मित्र रेड़डी रूके हुए थे। उन्होंने रेड्डी को स्वामी जी समय गोलीमार दी। गोली की आवाज सुन स्वामी जी अपने कक्ष से बाहर आए। जार से कहां कौन है? क्या हो रहा है। मारने वालों ने देखा कि यह तो वही स्वामी जी हैं ,जिन्हें मारना था। उन्होंने स्वामी जी पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाकर स्वामी जी की हत्या कर दी। अगर स्वामी जी कक्ष से न निकलते , छिप जाते , भाग जाते तो वह बच सकते थे।किंतु वे बहादुर और निर्भीक थे। उन्होंने ऐसा नहीं ‌ क‌िया। बीए में मैँ वर्धमान कॉलेज में पढता था। डा एसआर त्यागी कॉलेज के प्राचार्य थे। स्वामी जी का उनके पास आना जाना था। स्वामी जी का वाहन साइकिल था। वे नंगे पांव रहते। कमर पर घुटनों तक एक चादर बांधते। गले मे उनके एक सफेद चादर पड़ी रहती। ये उनका पहनावा और उनकी पहचान थी। वहुत बार उन्हें आते जाते देखते। ब्रह्मचर्य का तेज उनके चेहरे से छलकता था। मैने 66 में हाई स्कूल किया। इंटर में प्रवेश लिया था। पिता जी चकबंदी में नौकरी करते थे। जनपद में चकबंदी का कार्य पूरा होने पर उसे जोनपुर भेज दिया गया। विभाग के सारे स्टाफ का भी जोनपुर को तबादला कर दिया गया। पिता जी को दादा जी ने जोनपुर नहीं जाने दिया। पिता जी ने नौकरी छोड़ दी। दादा जी हकीम थे।कोई ज्यादा आय नहीं थी।धनाभाग के कारण मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ी। झालू के पशु चिक‌ित्सालय पर श्याम बाबू सक्सैना वेटनरी स्टॉक मैन पद पर तैनात थे। उनके पास मेरी बैठ उठ थी। अधिकतर समय उनके साथ बीतता। स्वमी जी के आश्रम का कोई पशु बीमार हो जाता। वह उन्हें बलवा भेजते। मैँ भी उनके साथ जाता। आश्रम में दूध से हमारा स्वागत होता।चलते समय श्याम बाबू को दस और मुझे दो रुपये देना स्वामी जी कभी नहीं भूलते। मेरे मना करने पर भी दो का नोट जेब में डाल देते। पिछले आठ दस साल में कई बार आश्रम में जाना हुआ। स्वामी जी की एक तस्वीर जरूर नजर आई। अब तो बहुत कुछ बदल गया। अशोक मधुप 5 अप्रेल 2018

Wednesday, December 2, 2020

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना पर जमीन न देने के कारण बिजनौर में नहीं बना ये विश्व विद्यालय

 अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना पर

जमीन न देने के कारण बिजनौर में नहीं बना ये विश्व विद्यालय


बिजनौर। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को बने आज 100 साल हो गए। एक दिसंबर 1920 को इस विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी। एएमयू के संस्थापक सर सैयद अहमद खां इस विश्व विद्यालय को बिजनौर में बनाना चाहते थे। उन्होंने बहुत कोशिश की। पर उस सयम के लोग इनके सोच को गलत मान बैठे। इनका विरोध किया। बाद में सर सैयद अहमद खां को बिजनौर में विश्वविद्यालय बनाने का इरादा छोड़ना पड़ा।

सर सैयद 1857 में बिजनौर में सदर अमीन थे। इनकी तैनाती के समय ही 1857 का प्रसिद्ध विद्रोह हुआ। अंग्रेज कलेकटर को नजीबाबाद के नवाब महमूद को जिले का कार्य भार सौंप कर भागना पड़ा। ये इस दौरान बिजनौर में ही सक्रिय रहे। कोशिश रही कि अंग्रेंज वापस आएं। नवाब महमूद की एक गलती से आजादी की ये लड़ाई हिंदू-मुस्लिम जंग में बदल गई। मजबूरी में हिंदू रईस अंग्रेजों के साथ हो गए। एक साल बाद अंग्रेज वापस आ गए। उनके विरोधियों को भागना पड़ा। जो पकड़ गए उन्हें मार दिया गया। विरोध करने वालों की संपत्ति जब्त कर ली गई।

समय आगे बढ़ गया। सर सैयद अहमद खां बिजनौर से चले गए किंतु उनका लगाव खत्म नहीं हुआ। उनकी कोशिश रही कि वे विश्वविद्यालय बिजनौर में बनाएं। उन्होंने कोशिश शुरू की। लोगों से बात की। कहा कि उन्हें जमीन दिलाने में सहयोग करें। उनकी छवि अंग्रेज बन गई थी। वे कहते भी थे कि वे नई रोशनी की शिक्षा दिलाना चाहते हैं। वे चाहते है कि कौम के बच्चे पढ़ें और आगे बढ़े। लोगों को लगा कि इनके यहां की पढ़ाई हमारी परंपरागत शिक्षा से अलग होगी। इससे धार्मिक शिक्षा खत्म हो जाएगी।

यह बात लोगों के मन में घर करती गई। उन्होंने सर सैयद अहमद खां का विरोध शुरू कर दिया। ‌बिजनौर के इतिहास के जानकार शकील बिजनौरी कहते हैं कि सैयद साहब ने लोगों को अपनी बात समझानी चाही, किंतु वे उनकी बात सुनने को तैयार ही नहीं थे। बिजनौर के ही रहने वाले उर्दू फारसी के विद्वान नजीर बिजनौरी से बात की। नजीर बिजनौरी के कहने पर लोगों ने सर सैयद अहमद की बात तो सुनी पर कोई मदद नहीं की ।

जमीन देने की बात भी हो गई किंतु विरोध बढ़ता देख उन्होंने बिजनौर में विश्वविद्यालय खोलने का इरादा छोड़ दिया।

बिजनौर इटर कालेज के प्रधानाचार्य आफताब अहमद का कहना है कि उस समय के लोगों का मानना रहा कि सर सैयद अहमद के विद्यालय की शिक्षा अंग्रेजों के लाभ के लिए होगी। हमारी शिक्षा, धा‌र्मिकता हमारे संस्कार, परंपराओं को नुकसान पंहुचाएगी।

दिल्ली विश्वविद्यालय में उर्दू के प्रवक्ता खालिद अलवी कहते हैं कि बिजनौर जिले का मुसलमान उस समय अंग्रेजों से नाराज था। वह किसी भी कीमत पर अंग्रेजों को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं था। वह सर सैयद अहमद को कट्टर अंग्रेज परस्त मानता था। इसलिए इनकी कोई बात सुनने और मानने को तैयार नहीं था। इसीलिए सर सैयद अहमद और उनकी शिक्षा का उसने विरोध किया।

अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े शमून कासमी का कहना है कि अगर बिजनौर में विश्वविद्यालय बनता को बहुत लाभ होता। लोगों को नौकरी मिलती। उस समय बिजनौर के मुस्लिम जमींदारों ने जमीन नहीं दी थी। अगर विश्वविद्यालय बिजनौर में बनता तो पूरे देश में बिजनौर का नाम रोशन होता।\


2 disambar 2020

Saturday, November 21, 2020

जैन तीर्थ के रूप में विकसित नहीं हो पाया पार्श्वनाथ का किला

 जैन तीर्थ के रूप में विकसित नहीं हो पाया पार्श्वनाथ का किला

मिलती हैं प्राचीन प्रतिमाएं

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बढ़ापुर ,प्रशासन व पुरातत्व विभाग की अनदेखी और जर्जर रास्तों की बिना पर क्षेत्र के काशीवाला का विख्यात पारसनाथ का किला अब तक जैन तीर्थ स्थल के रूप में विकसित नहीं हो सका है। खेतों में खुदाई के दौरान निकलने वाली प्रतिमाएं व खंडित मूर्तियां मंदिर एवं किले के अवशेष इस क्षेत्र में जैन धर्म के वैभव के छिपा होने की गवाही देते हैं। पुरातत्व महत्व का यह स्थान पुरातत्व विभाग व प्रशासन की उपेक्षा का शिकार है।

बढ़ापुर कसबे से करीब चार किमी दूर पूर्वी दिशा में स्थित काशीवाला के खेतों व जंगल में प्राचीन जैन धर्म की वैभवशाली संस्कृति के भग्नावशेष छिपे हुए है। काशीवाला में एक प्राचीन खंडहरनुमा दिखने वाले स्थान को क्षेत्रवासी पारसनाथ के किले के नाम से जानते है। इस स्थान पर पूर्व में हुई खुदाई के दौरान मिलने वाली जैन धर्म से संबंधित खंडित मूर्ति, मंदिरों एवं किले के अवशेष यहां पर प्राचीन समय में किन्ही जैन आचार्यों की स्थली या जैन धर्म अनुयायियों की कोई विशाल बस्ती या किसी जैन राजा का साम्राज्य होने की गवाही देते है।

बुजुर्ग व जानकर बताते है कि मोजा काशीवाला पुराने समय में भयंकर जंगल था। यहां जैन समाज से संबंधी प्राचीन मूर्तियों के मिलने का सिलसिला करीब सात दशक पूर्व तब शुरू हुआ जब पंजाब व अन्य स्थानों से आए सिख परिवारों ने काशीवाला के जंगल में खेती करना आरंभ किया। ऊंची-नीची भूमि को समतल एवं कृषि योग्य बनाने की गरज से खुदाई के दौरान मिली हजारों वर्ष पुरानी जैन धर्म से संबंधित मूर्तियां व शिलालेख और पत्थर के टीलों से इस स्थान पर किसी जैन राजा के साम्राज्य व जैन समाज की कोई विशाल बस्ती होने का आभास हुआ। उस समय खेतों से मिली प्राचीन मूर्तियों पर किसी स्तर से भी कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। बताते है कि पारसनाथ किले से प्रसिद्व इस स्थान पर सन् 1951 में रक्षाबंधन पर्व के दिन काशीवाला निवासी सिख हरदेव सिंह को खेत समतल करने के दौरान उसके खेत से एक विशाल आकार की मनोरम मूर्ति मिली जिसके मध्य में श्री महावीर स्वामी एक ओर नैमिनाथ जी तो दूसरी ओर चंद्रप्रभु विराजमान थे । इस मूर्ति पर सिंह, हाथी व देवी देवताओं का बड़े ही आकर्षक ढ़ंग से चि़त्रण किया गया था। यह मूर्ति काफी समय तक हरदेव सिंह के डेरे पर ही रही बाद में इस मूर्ति को राष्ट्रीय म्यूजियम दिल्ली ले जाने संबंधी प्रयास हुए। लेकिन जिले के जैन अनुयायियों ने मूर्ति को बिजनौर में ही रूकवा लिया और इस मूर्ति को श्री दिगंबर जैन मंदिर बिजनौर में स्थापित किया गया था। श्री महावीर स्वामी की इस मूर्ति के मिलने के उपरांत ही जैन समाज के लोगों का ध्यान इस ओर गया । सन 1952 में 21 सदस्यीय किला पारसनाथ समिति का गठन भी हुआ लेकिन समिति इस स्थान के लिए कुछ विशेष नही कर पायी। सन् 1998 में भी एक बार पुनः यह स्थान उस समय चर्चाओं में आया था जब जैन समाज ने जैन मुनि आचार्य शांति सागर जी महाराज (हस्तिनापुर) व वीर सागर जी महाराज के परम शिष्य बालपति ऐरन एवं बैराज सागर जी महाराज (बरेली) की अगुवाई में पारसनाथ किले से काफी दूर सिख अमरीक सिंह व अवतार सिंह के खेत के बीच स्थित एक टीलेनुमा स्थान पर खुदाई का कार्य प्रारंभ कराया ।यहां तीन दिन की खुदाई के उपरांत इस स्थान से जैन धर्म की छोटी व बड़ी अनेक खंडित मूर्तियां,पत्थरों के स्तंभ और दीवारों पर बनी प्राचीन मूर्तियां एव खंडहर प्रकट हुए। इस स्थान के समीप ही एक प्राचीन कुआं व तालाब होने के प्रमाण भी दिखायी दिए ।इन्होंने इस ओर इशारा किया कि इस क्षेत्र में प्राचीन समय में जैन धर्मावलंबियों का कोई ऐतिहासिक स्थल अवश्य रहा होगा। यदि प्रशासन, सरकार व पुरातत्व विभाग इस ऐतिहासिक स्थान में रूचि ले तो इस स्थान पर जैन सभ्यता व संस्कृति के दर्शन का हो पाना असंभव नही है। जैन समाज ने इस क्षेत्र की महत्ता के दृष्टिगत इस प्राचीन स्थल को पहचान दिलाने के लिए किसानों से यह संबंधित कृर्षि भूमि क्रय कर भव्य मंदिरों विशाल धर्मशाला व संग्रहालय बनाकर खुदाई में मिली सामग्रियों को संजोकर रखा है। इस क्षेत्र के विषय के जानकार काशीवाला निवासी मनोहरजीत सिंह कहना है कि यह क्षेत्र आल्हा -उदल कालीन है। गढ़ कासौं की लड़ाई यहीं हुई और इस लड़ाई में जौहर करने वाली चार रानियों की समाधियां भी बनी हैं। उपेक्षा के चलते रानियों की समाधियां भी क्षतिग्रस्त हो रही हैं।

जर्जर रास्ता भी बन रहा है विकास में बाधक।

जैन मंदिर के पुजारी एवं व्यवस्था देख रहे क्षितीज जैन व मुरादाबाद से मंदिर दर्शन करने आए श्रद्धालु प्रकाश चंद्र जैन का कहना है कि क्षेत्र काफी पिछड़ा है । जैन तीर्थ स्थली को आने वाला रास्ता बेहद जर्जर अवस्था में होने पर यहां आने वाले श्रृदालुओं को घोर कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है।

कोविड-19 के कारण टालना पड़ा पंचकल्याणक कार्यक्रम।

जैन मंदिर के प्रबंधक सुरेश चंद्र जैन का कहना है कि जैन धर्मावलंबी यहां दूर-दूर से आते हैं। श्रृदालु यहां आकर इस क्षेत्र की महत्ता की जानकारी करते है। जैन साध्वी दीदी उमा जैन तपस्या में लीन है। कोविड-19 के चलते मंदिर पर आने वालों की संख्यां नगण्य हो गई है। कोविड-19 के कारण ही मंदिर पर होने वाला पांच दिवसीय पंचकल्याणक कार्यक्रम भी टालना पड़ा है।

शकील अहमद बढ़ापुर,

Friday, October 16, 2020

फिल्मी दुनिया के बड़े पत्रकार थे शम्स कंवल

          

धनाभाव से जूझते रहे पर टूटेे नहीं

गगन के हिंदुस्तानी मुुसलमान नंबर ने उन्हें मशहूर कर दिया

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अशोक मधुप

उर्दू के जाने माने पत्रकार- लेखक  शम्स कंवल  1925 में बिजनौर के एक मुस्लिम जमींदार ख़ानदान में पैदा हुए । बचपन में सुंदर होने के कारण उनके दादा शम्सुद्दीन   को जमील कह कर बुलाते थे। 1945 में बिजनौर के गवर्मेंट हाई स्कूल से मैट्र‌िक पास किया। शम्स कवंल का स्कूल की किताबों से अधिक साहित्यिक पुस्तकों में  मन लगता था। 1945 में मुरादाबाद इंटर काॅलेज से इंटर तथा लखनऊ से 1951 ग्रेजुएट किया। अपना नाम शम्स कंवल रख लिया । इसी नाम से कोमी आवाज़ लखनऊ में फिल्म एडिटर के तौर पर नौकरी करने लगे।

1952 में उन्होंने लखनऊ से अपनी फ़िल्मी 15 दिवसीय पत्रिका ‘ साज़‘ निकाली। क़रीब डेढ़ साल के बाद ये पत्रिका बंद हो गई। 1953 में दिल्ली आ गए और ‘फ़िल्मी दुनिया‘ में  सहायक संपादक बने ।1954 में ‘ रियासत‘ साप्ताहिक में असिटेंट एडिटर नियुक्त हुए। रोटी रोज़ी के लिए कई अख़बार व रिसालों में आलेख लिखे।

 1954 में  मुंबई चले गए। यहां उनको इंक़लाब अख़बार में फ़िल्म एडिटर की नौकरी मिल गई।1956 में उन्होंने फ़नकार साप्ताहिक अख़बार में संपादक हो गए। क़रीब डेढ़ साल के बाद शम्स जी फ़नकार से अलग हो गए।1959 में उन्होंने अपना साप्ताहिक फ़िल्म रिपोर्ट प्रकाशित किया । पैसों की तंगी में ये बंद हो गया। 1962 तक लगातार वे फिल्मी अख़बारों और रिसालों में आलेख, फिल्मी शख़्सियतों पर लेख, फ़िल्मों पर समीक्षा आदि  लिखते रहे।पाठक उनके लेखन के आनंद में मग्न रहते और नई तहरीरों के मुंतज़िर रहते। उनकी  आश्चर्यजनक संवेदनशील अभिव्यक्ति उनके गहन और गौण अध्ययन के द्वारा पाठकों के मन पर हुकूमत करने लगी।

गगन का प्रकाशन और सफर

मुबई के बड़े साहित्यकार और शम्स साहब के लंबे समय तक नजदीकी रहे असीम काव्यानी के अनुसार उन्होंने अपनी अथक मेहनत और विद्वता के बल पर  उल्हास नगर से  ‘गगन‘ मासिक का फ़रवरी 1963  में प्रकाशन शुरू किया। वे इसके  संपादक , पैकर और पोस्ट करने वाले ख़ुद ही थे। उनकी पत्नी शहनाज़ कंवल एक अच्छी और प्रसिद्ध कहानीकार है।ख़र्च में बचत के लिए  उन्होंने किताबत सीखी और गगन  की किताबत लगीं। शम्स साहब ने 22 साल के सफर में  गगन के दो विशेषांक  निकाले।1975 में ‘हिंदुस्तानी मुसलमान नंबर‘ 618 पृृष्ठ और 1984 में मज़ाहिबे आलम नंबर 1240 पृृष्ठ।

  हिंदुस्तानी मुसलमान नंबर में हर फ़िरक़े व हर ख़्याल और नज़रिए के क़लमकारों के आलेख इकट्ठा किए गए हैं। इसमें मुसलमानों की एतिहासिक, राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर बहस की गई है। ये एक एंसाइक्लोपीडिया का दर्जा रखता है। मुस्लिम राजनैतिक आंदोलन, धार्मिक संस्थाएं, मुस्लिम बुद्धिजीवियों की जीवनियां व लिस्ट,उनके भाषणों के अंश आदि के साथ  ख़ुद शम्स कंवल का आलेख शामिल हैं।बाल ठाकरे,कृृष्ण चंद्र,कुंवर महेंद्र सिंह बेदी,गोपाल मित्तल, प्रो डब्लू बी स्मिथ, बसंत कुमार चटर्जी आदि के आलेख संकलित हैं। इस विशेषांक  की धूम चारों ओर मची। कई वर्षों तक ये विशेषांक लोगों के ज़हनों में हलचल मचाता रहा। आज भी इस संकलन की चर्चा अक्सर होती रहती है।      

मज़ाहिबे आलम नंबर आम पाठकों को रूचिकर न लगा। न ही लागत का पैसा वापस आ सका । मजबूरन  गगन का प्रकाशन बंद हो गया।

 दिल्ली की  लेखिका रकशंन्दा रूही मेहंदी के अनुसार शम्स जी 1985 में अपने  वतन बिजनौर वापस आ गए। मुंबई में 30 वर्ष में 30 किराए के मकान बदले। कुछ दिन बिजनौर में गुज़ारने के बाद पुश्तैनी मकान में से अपने हिस्से की रक़म से 1985 में  अलीगढ़ में अपना घर ‘सलामा‘ तामीर करवाया और वहीं बस गए।

लेखन चलता रहा, बड़े व प्रसिद्ध रिसालों में उनके आलेख प्रकाशित होते रहे।अक्तूबर 1994 में एक बार फिर मासिक रिसाला ‘उफ़क़ ता उफ़क़ का प्रकाशन शुरू किया। इसके  छह अंक ही  निकल सके । उनकी सेहत ख़राब होने लगी। । अंत समय में सपत्नीक बिजनौर आ गए। आठ अक्तूबर 1995 को बिजनौर में अपने मकान में आखिरी सांस ली।

चाय के रसिया  थे शम्स कंवल

शम्स साहब के जानकारों  के अनुसार  शम्स कंवल चाय के रसिया थे। 40 सिग्रेट रोज़ पीना उनका शौक था। लगभग शाकाहारी थे। 40 वर्ष की उम्र में खुद ही सिग्रेट  छोड़ दी। वो बदला लेने में यक़ीन रखते थे। माफ़ करना उन्हें नापसंद था। उनके इस बर्ताव ने उनके बहुत से दुश्मन पैदा कर दिए थे। घूमने फिरने से उन्हें दिलचस्पी न थी। किताबें पढ़ने से उनको बेपनाह दिली ख़ुशी मिलती थी।वे एक तरह से नास्तिक थे। आदर्शवादी नज़रिए के वे मानने वाले थे।  उर्दू ज़बान को सही पढ़ने और लिखने पर ज़ोर दिया।  एमर्जेंसी के वो तरफ़दार थे। वे सदा अपने बनाए नज़रियात पर क़ायम रहे।

अशोक मधुप