Wednesday, December 17, 2008

बेटों से कम नही बेटिंया







युग बदल गया हैं। कभी लड़के लड़कियों में फर्क समझा जाता था किंतु अब ऐसा नही है। बेटी भी बेटों से कम नही है।यहां आज कुछ ऐसा ही हुआ।


मेरे पड़ौस में एक सेवानिवृत अवर अभिंयता रहते हैं किशन खन्ना । उम्र होगी ६५ साल ।पति पत्नी बहुत मस्त। बहुत मिलनसार। इनके चार बेटिंया। चारों बेटियों की उन्होंने शादी कर दी। रात किशन खन्ना की तबियत खराब हुईं। दो बार पहले हार्ट अटेक हो चुका था। ठीक से उपचार न मिलने पर रात में उनका निधन हो गया। मुहल्ले वाले परेशान थे कि अंतिम संस्कार कौन करेगा। सबसे छोटी लड़की इनके पास आई हुई थी! एक और लड़की की शहर में ही शादी हुई थी। वह तथा गाजियाबाद वाली आ चुकी थी! चौथी सबसे बड़ी लड़की नही आई थी।


बिजनौर जैसे छोटे शहर में कोई सोच भी नही सकता था। कि गाजियाबाद में रहने वाली बेटी मुक्ता ने पिता के अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया। उसने घर पर पिता का पिंडदान किया। तीनों बहने नंगे पांव शव यात्रा में साथ नहीं । गंगा बैराज पर गईं। वही चौथी भी आ गई। मुक्ता ने पिता की चिता को आग दी आैर कपाल क्रिया सहित सभी रस्म अदा की। गंगा बैराज पर कई शवों का अंतिम संस्कार चल रहा था ,उनके साथ आए व्यक्ति एक युवती को अंतिम संस्कार की क्रिया करते देख आश्चर्यचकित थे। शहरों में तो लड़कियां यह कार्य करने लगी है किंतु बिजनौर जैसे छोटे शहर के लिए यह सब नया था किंतु मुझे यह देखकर अच्छा लगा कि इन बेटियों ने साबित कर दिया कि वे बेटों से कम नही हैं ।

7 comments:

Mired Mirage said...

लेख पढ़कर खुशी हुई । दाह संस्कार करना तो अच्छी बात है परन्तु बहुत समय से बेटियाँ अपने जीवित माता पिता का साथ निभाती आ रही हैं व उनका ध्यान रख रही हैं । मेरे खयाल से जीते जी साथ देना भी कोई छोटी बात नहीं है । यदि बेटियाँ चाहती हैं कि उन्हें भी बेटों सा मान मिले तो माता पिता के प्रति अपने कर्त्तव्य भी उन्हें निभाने होंगे, चाहे इसके लिए उन्हें समाज से मुकाबला करना पड़े ।
घुघूती बासूती

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

बेटियों ने साबित कर दिया कि वे बेटों से कम नही हैं
***FANTASTIC


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संगीता पुरी said...

ऐसे अनुकरणीय उदाहरण अन्‍य जगहों पर भी देखे जाने चाहिए।

Amit said...

bahut accha laga phad kar....ab wo kisi maamle main ladkoo se peeche nahi hain......

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बेटे-बेटियों का फर्क तो माता-पिता और समाज ही बनाता है. बाद में वे ख़ुद भी इसी के अभ्यस्त हो जाते हैं.

Navnit Nirav said...

namskar,
lekh kaphi acha laga.main is blog world main naya hoon par maine aapko shayad pahle bhi padha hai.main grameen prabandhan ka vidyarthi hoon.aur aaj hi Gender and develoment ki class main is vishay par charcha ho rahi thi. is vichar se aapka yah lekh kaphi prasangik hai.
dhanyavad.

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

मेरी शादी के एक वर्ष के उपरांत मेरी बेटी का जन्म हुआ| जिसका नाम हम दोनों दम्पति ने शिज़ा रखा| मैं बयान नहीं कर सकता की मैं कितना खुश था| दुर्भाग्यवश मेरी शादी के 3 वर्ष पश्चात मेरी तलाक़ हो गई| आज जब इस लेख को पढ़ा तो अचानक मुझे मेरी बेटी याद आ गई जो अपनी माँ के पास ही रहती है| वैसे मैं एक बात यहाँ ज़रूर लिखना चाहूँगा कि आज तक मुझे ऐसा कभी भी महसूस नहीं हुआ की मेरे बेटी हुई बेटा क्यूँ नहीं हुआ| आज मेरी बेटी शिज़ा 2 साल की हो चुकी है| मैं अपनी बेटी को बहुत प्यार करता हूँ और मिस करता हूँ|