Wednesday, November 26, 2008

यादें badrinath यात्रा 2





यात्रा, अवधि, badriinaath
मार्ग दो फोटो एक बद्रीनाथ में पड़ी बर्फ, दूसरा भारत का अंतिम गांव माणा
ऋषिकेश से माणा सीमा का अंतिम गांव तक का मार्ग नेशनल हाईवे है, इसके बावजूद इसकी हालत बहुत खराब है। श्रीनगर से ऋषिकेश के बीच कई जगह हाटमिक्स से बना होने के कारण यह मार्ग बहुत अच्छा है, किंतु ऋषिकेश से देवप्रयाग के बीच बहुत खराब। जबकि यहां सडक़ काफी चौड़ी है और इसे हाटमिकस से बनाया जा सकता है। उतरांचल के वासी कहते हैं कि इस मार्ग की मरम्मत को प्रत्येक वर्ष करोड़ो रूपया आता है और केंद्रींय सडक़ संगठन के अधिकारी उसे खुर्द-बुर्द करते रहते हैं। खैर आज भी २००७ में हमें ऋषिकेश से बद्रीनाथ आने-जाने में १५ से 16 घंटे लगे।किंतु आज से पहले क्या हालत होगी इस बारे में हमारे बस चालक ने बताया कि 20 साल पूर्व पांच दिन में बद्रीनाथ पहुंचा जाता था। चढ़ाई ज्यादा थी, गाडिय़ों के इंजन ज्यादा पावर के न होने के कारण गर्म जल्दी होते थे। लौटते दो दिन लगते थे। क्योंकि ढ़ाल पर आना होता है। सोचता हूं कि यह हालत 20 साल पहले की थी। नरेंद्र मारवाड़ी के बाबा तो 93 साल पूर्व बदीनाथ गए थे, उस समय कैसे होता था। बुजुर्ग बताते हैं कि तीन चार माह लगते थे, क्योंकि पूरी यात्रा पैदल होती थी। गांव-कस्बे से परिजन-मिलने वाले बद्रीनाथ यात्री को माला आदि पहनाकर बस्ती से बाहर तक विदा करने आते थे। शायद यह सोचकर कि यह न लौटे। यात्री अपने तेहरवीं आदि के संस्कार स्वयं कर यात्रा शुरू करते थे कि रास्ते में मर खप गए तो कोई अंतिम संस्कार भी नही करेगा। यात्री अपने साथ हल्के विस्तर के अलावा खाने-पीने का सामान रखते थे। जगह-जगह यह काफिला रूकता । वहीं बनाकर भोजन आदि करता और आगे बढ़ जाता। ज्यादा सामान ले जाना संभव नही होता। रास्ते में पडऩे वाले बाजार एवं दुकान आदि से सामान खरीदते जाते थे। काफी व्यक्ति तो बीमारी, ठंड आदि के कारण रास्ते में ही मर-खप जाते थे। बद्रीनाथ की हमारे धर्मशाला के पंडित बताते हैं कि सीजन में यहां १०,15हजार तक यात्री प्रतिदिन आते हैं जबकि इतने लोगों की व्यवस्था नहीं है। धर्मशाला के बरांडे तक में श्रद्धालु रात को भरे होते हैं। कुछ इस दौरान यहां मर भी जाते हैं। नवंबर के मध्य बर्फ पडऩे के कारण बद्रीनाथ और माणा बंद कर दिया जाता है। यहां के निवासी नीचे आ जाते हैं। बताया जाता है कि ठंड के मौसम में यहां १० से १५ फुट तक बर्फ पड़ती है। वे बताते हैं कि यहां भवनों की छते ढालदार इसीलिए हैं कि बर्फ इनके ऊपर न रूके, अन्यथा वे फट जाएंगी। यहां के पुजारी बताते हैं कि नवंबर के मध्य तक तक का सामान आदि को पैक कर स्टोर में रख नीचे चले जाते हैं। ठंड के तीन-चार माह में यहां काफी नुकसान हो जाता है। लौटने पर मरम्मत आदि करानी होती है। ठंड और आैर बर्फ के मौसम में भी बद्रीनाथ में भी कुठ साधु रूकते और मनन चिंतन तथा साधना करते हैं। इस बार उतरांचलप्रशासन ने इन्हें भी नोटिस देकर कहा है कि वे भी १८ को बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद होने पर वह भी नीचे चलें जाएंगे। हालांकि इस आदेश को लेकर यहां के पुजारी, पंडा आदि में रोष है।वह इसे परंपराओं से चलती आ रही व्यवस्था के विपरीत बताते हैं। उधर, जहां ये सब गतिविधि roon जाती है।वहीं माणा के पास बने सैन्य शिविर में जीवन चलता रहता है। माणा से चीन सीमा पांच किलोमीटर होने के कारण यहां शिविर में तैनात जवानों को हड्डियां गलाने वाली ठंड में भी देश की खातिर सीमाओं पर सर्किय रहना होता है। नजर रखनी होती है।

2 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अच्छा विवरण है। कई नई जानकारियाँ भी।

अशोक पाण्डेय said...

फोटो और आलेख दोनों अच्‍छे लगे। बद्रीनाथ का दर्शन कराने के लिए आभार।