Thursday, October 12, 2023

क्या हमास जैसे हमले के लिए हम तैयार हैं?

अशोक मधुप वरिष्ठ पत्रकार इस्राइल पर हमास ने हमला किया।इस हमले में 20 मिनट में पांच हजार के आसपास राकेट दागे गए।इतना ही नहीं यह इस्राइल का सुरक्षा घेरा और दीवार तोड़कर अपनी सुरक्षा और मारक क्षमता के लिए विख्यात इस्राइल में घुंस गए।उन्होंने इस्राइल में भारी तबाही मचाई। इस हमले में इस्राइल के एक हजार से ज्यादा नागरिक मारे गए। तीन हजार के आसपास घायल हुए हैं। सूचनाएं हैं कि 150 के आसपास महिला और बच्चों सहित इस्राइल के नागरिकों का अपहरण कर लिया।हमास के आंतकियों ने महिलाओं का निवस्त्र कर उनके सम्मान को तार− तार करने कोई कसर नही छोड़ी। इस्राइल की सुरक्षा व्यवस्था, सेना और गुप्तचर व्यवस्था पूरी दूनिया में विख्यात हैं।इस सबके बावजूद वहां इतना बड़ा नुकसान हुआ। ईश्वर न करे ,काश कभी ऐसा हमला हम पर ,भारत पर हो तो क्या हम इसके लिए तैयार हैं?हमें इस पर सोचना होगा। साथ ही आने वाली प्रत्येक परिस्थिति के मुकाबले के लिए हमें अपने को अभी से तैयार करना होगा। इस्राइल के पास दुनिया का आधुनिकतम सुरक्षा, प्रतिरक्षा और विश्व विख्यात सूचनातंत्र है।फिर भी वह इस हमले के सामने विफल होकर रह गया। 20 मिनट में पांच हजार मिजाइल छोड़ने, और टैंको से दीवार तोड़कर इस्राइल की सीमा में जल, थल और ग्लाइडर से एक साथ घुंसने की तैयारी एक दिन में नही हुई होगी।लंबा समय लगा होगा, किंतु इस्राइल के सुरक्षा और गुप्तचर तंत्र को इसकी भनक तक नही लगी। इस्राइल ही नही उसके मित्र देश अमेरिका तक को भी इस हमले की भनक तक नही हुई।ऐसा ही अमेरिका पर हमले के समय हुआ था। रोज दुनिया बदल रही है।युद्ध बदल रहा है।युद्ध का मैदान बदल रहा है। अल-कायदा के आतंकियों ने 11 सितंबर 2001 की सुबह चार अमेरिकी विमानों को हाईजैक कर लिया था। इन सभी का मकसद विमानों को अलग-अलग ऐतिहासिक स्थलों पर क्रैश कराने का था। सबसे पहला क्रैश अमेरिकन एयरलाइन फ्लाइट 11 का हुआ था, जो कि न्यूयॉर्क शहर में सुबह 8.46 बजे वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के उत्तरी टावर से टकराई थी। इसके 17 मिनट बाद ही यूनाइटेड एयरलाइंस फ्लाइट 175 बिल्डिंग के दक्षिणी टावर से टकराई। हाई अलर्ट जारी होने के बावजूद सुबह 9.37 बजे अमेरिकन एयरलाइंस फ्लाइट 77 वॉशिंगटन स्थित अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन से टकराई। चौथे हाईजैक हुए विमान यूनाइटेड एयरलाइंस फ्लाइट 93 का लक्ष्य व्हाइट हाउस या यूएस कैपिटल बिल्डिंग को निशाना बनाने का था, लेकिन यात्रियों से भिड़ंत की वजह से आतंकियों के हाथ से विमान का नियंत्रण छूट गया और यह पेन्सिलवेनिया के शैंक्सविल में मैदानी इलाके में गिर गया। अमेरिका में हुए इस हमले तक को सोच भी नही सकता था कि यात्री विमानों को शस्त्र के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।रूस यूक्रेन युद्ध लगभग 20 माह से जारी है।रूस के पास परमाणु हथियार हैं, किंतु यह हथियार दिखाने और अपनी शक्ति बताने के लिए है। दुनिया की बड़ी शक्ति होते भी 20 माह से युद्धरत रूस कुछ ज्यादा नही कर पा रहा।यूक्रेन के द्रोण रूस की मिजाइल पर भारी पड़ रहे हैं। भारत में मुंबई पर आतंकी हमला हमने देखा हैं।दिल्ली में संसद पर हुए हमले के घाव हम भूले नहीं हैं। आंतकियों के खुराफाती दिमाग किस तरह घटना का अंजाम दें, कुछ कहा नही जा सकता।इन सब के लिए सिर्फ मजबूत रक्षा तंत्र बनाने की जरूरत है। अभी खालिस्तानी गुरपतवंत पन्नू ने धमकी दी है कि खालिस्तान के लिए भारत पर हमास जैसे हमले किये जाएंगे। पाकिस्तान के कुछ कट्टर मुल्ला धमकी दे रहे हैं कि वह इस्राइल से लड़ने के लिए हमास को परमाणु बम देंगे। दुनिया के देश आधुनिक युद्धास्त्र बनाने में लगे हैं।परमाणु बम, हाइड्रोजन बम के आगे के विनाशक बम पर काम चल रहा है। सुपर सोनिक मिजाइल बन रही हैं, किंतु लगता है कि आधुनिक युद्ध इन सबसे अलग तरह के अस्त्र− शस्त्रों के लड़ा जाएगा। अलग तरह के युद्ध होंगे। लगता है कि आने वाले युद्ध सीमा पर नहीं, शहरों में लड़े जाएगे।घरों में लड़े जाएगे। गली –मुहल्लों में लड़े जाएंगे ।अभी से हमें इसके लिए सोचना और तैयार होना होगा। 30अक्तूबर 2021 को पुणे इंटरनेशनल सेंटर द्वारा आयोजित ‘पुणे डॉयलॉग’ में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने कहा कि भविष्य में खतरनाक जैविक हथियार दुनिया के लिए गंभीर परिणाम साबित हो सकता है। दुनिया के लिए किसी भी जानलेवा वायरस को हथियार बनाकर इस्तेमाल करना गंभीर बात है। एनएसए डोभाल ने अपने बयान में कोरोना वायरस का उदाहरण देते हुए जैविक हथियारों का मुद्दा उठाया। ‘आपदा एवं महामारी के युग में राष्ट्रीय सुरक्षा की तैयारियों ’ पर बोलते हुए अजीत डोभाल ने कहा कि आपदा और महामारी का खतरा किसी सीमा के अंदर तक सीमित नहीं रहता और उससे अकेले नहीं निपटा जा सकता । इससे होने वाले नुकसान को घटाने की जरूरत है। अभी तक पूरी दुनिया इस खतरे से जूझ रही है कि परमाणु बम किसी आंतकवादी संगठन के हाथ न लग जाए। उनके हाथ में जाने से इसे किस तरह रोका जाए? उधर आतंकवादी नए तरह के हथियार प्रयोग कर रहे हैं। शिक्षा बढ़ी है तो सबका सोच बढ़ा है। दुनिया के सुरक्षा संगठन समाज का सुरक्षित माहौल देने का प्रयास कर रहे हैं।आंतकवादी घटनाएं कैसे रोकी जांए, ये योजनाएं बना रहे हैं। आंतकवादी इनमें से निकलने के रास्ते खोज रहे हैं। वे नए−नए हथियार बना रहे हैं। अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सैंटर पर हमले से पहले कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि विमान को भी घातक हथियार के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। इसमें विमानों को बम की तरह इस्तेमाल किया गया।माचिस की तिल्ली आग जलाने के लिए काम आती है । बिजनौर में कुछ आंतकवादी इन माचिस की तिल्लियों का मसाला उतार कर उसे गैस के सिलेंडर में भर कर बम बनाते विस्फोट हो जाने से घायल हुए। हम विज्ञान और कम्यूटर की ओर गए। हमारे युद्धास्त्र कम्यूटरीकृत हो रहे हैं।उधर शत्रु इस सिस्टम को हैक करने के उपाए खोज रहा है। लैसर बम बन रहे हैं। हो सकता है कि हैकर शस्त्रों के सिस्टम हैक करके उनका प्रयोग मानवता के विनाश के लिए कर बैठे। बनाने वालों के निर्देश छोड़ से बने बनाए शस्त्र हैकर के इशारे पर चलने लगें। रोगों के निदान के लिए वैज्ञानिक रोगों के वायरस पर खोज रहे हैं। उनके टीके बना रहे हैं। दवा विकसित कर रहे हैं,तो कुछ वैज्ञानिक इस वायरस को शस्त्र के रूप में प्रयोग कर रहे हैं। साल 1763 में ब्रिटिश सेना ने अमेरिका पर चेचक के वायरस का इस्तेमाल हथियार की तरह किया । 1940 में जापान की वायुसेना ने चीन के एक क्षेत्र में बम के जरिये प्लेग फैलाया था। 1942 में जापान के 10 हजार सैनिक अपने ही जैविक हथियारों का शिकार हो गए थे। हाल ही के दिनों में आतंकी गतिविधियों के लिए जैविक हथियार के इस्तेमाल की बात सामने आई है।इससे हमें सचेत रहना होगा। सीमाओं की सुरक्षा के साथ इन जैविक शास्त्रों से निपटने के उपाए खोजने होंगे। इस्राइल दूसरे विश्व युद्ध से संघर्ष झेल रहा है। इसने प्रत्येक परिस्थिति के लिए अपने को तैयार किया हुआ है।ढाला हुआ है।इस तरह के हमलों के लिए उसने प्रत्येक घर में बंकर बनाए हुए हैं।वहां का लगभग प्रत्येक व्यक्ति एंव महिला युद्ध के लिए हर समय तैयार रहते हैं।वहां सैन्य प्रशिक्षण आवश्यक है। हमास के हमले का सबसे बड़ा सबक यह है कि दुनिया का कोई भी देश इस तरह के हमले नही रोक सकता।बस इस तरह के हमलों को रोकने की व्यवस्था कर सकता है।इस्राइल का सुरक्षा चक्र आइरन डोम पांच हजार मिजाइल के हमले के सामने कारगर नही रहा। हमारे पास रूस का बना एस 400 मिजाइलरोधी सिस्टम हैं। हमें सोचना होगा कि क्या यह इस तरह के भारी मिजाइल हमलों को रोकने में सक्षम है। या कोई अन्य सिस्टम चाहिए।हमें राष्ट्रीय आपदा या इस प्रकार के आतंकी हमले की हालत में अपना सहायता तंत्र विकसित करना होगा।उन्हें सभी प्रकार के हमलों या राष्ट्रीय आपदा के समय जनता की सुरक्षा , मदद, उपचार आदि देने के लिए तैयार करना होगा। अशोक मधुप (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Monday, October 2, 2023

मित्रता दिवस पर दोहे

एक मित्र ही खोजिए,जो हो दुख का यार। सुख में तो मिल जाएंगे,यारा मित्र हजार। -जब भी तुम बेचैन हो,करना मुझको याद । मन ही मन हो जायगा,बस सीधा संवाद। -अर्थ बहुत चिंतित भए,शब्द रहे हैं रोय। मतलब के संसार में,कैसे रिश्ते बोय? प्रेम डगर है अगन की,जल कर कुंदन होय। राधा, मीरा, हीर की,पीड़ा समझे कोय। – दिन बीता पूरा सखे!आयी होने रात। वेलेंटाइन दौर है ,कर लो कोई बात। -कैसे भी हालात हों,कैसी भी हो बात। अब तो छूटेगा नहीं ,मित्र ,तुम्हारा साथ। – एक बूंद था चाहिए,मिला असीमीत प्यार। ऊपर वाले मैं तेरा,करता जय -जय कार। महाभारत जीते बड़े,जीतीं भारी जंग। पग पग राह दिखा रहे,रहकर साथी सँग। -एक दोस्त की ही रही ,मुझे सदा दरकार। अगनित लेकर आ गए,झोली भर- भर प्यार। अशोक मधुप

क्या भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने जा रही है?

क्या भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने जा रही है? अशोक मधुप क्या भाजपा पश्चिम उत्तर प्रदेश के गढ़ को फतह करने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने जा रही है? बीजेपी सांसद और केंद्र सरकार में राज्यमंत्री संजीव बालियान ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को यूपी से अलग प्रदेश बनाने जाने की मांग कर इस आंशका को बढ़ा दिया है। बीजेपी से जुड़े जाट नेताओं की मेरठ में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय जाट संसद में संजीव बालियान ने कहा कि पश्चिम उत्तर प्रदेश अलग राज्य बने। इसके बाद यह देश का सर्वश्रेष्ठ राज्य होगा।केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान भी इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि वह चाहते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश एक अलग राज्य बने और मेरठ उस राज्य की राजधानी हो। इसकी मांग लंबे समय से हो रही है लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हो सका। बाद में पत्रकारों से रूबरू केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान ने इस मुद्दे को विस्तार देकर बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश केवल नौ करोड़ की आबादी वाला इलाका है। यूपी में सबसे ज्यादा राजस्व देने वाला इलाका है और यह इलाका शिक्षा, कृषि, उद्योग से समृद्ध भी है। अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश अलग राज्य बनता है तो यह देश का सबसे बेहतरीन राज्य होगा। यहां विकास की अपार संभावनाएं होंगी। उन्होंने यह भी बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजधानी मेरठ बने। सब जानते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासी राजधानी भी मेरठ को कहा जाता है। बेहतर कानून-व्यवस्था, अयोध्या में श्रीराममंदिर और जन कल्याणकारी योजनाओं को देने के बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश में बीजेपी की राह आसान नहीं दिखती। घोसी के विधानसभा उपचुनाव में हार के बाद अब बीजेपी को इंडिया गठबंधन लोकसभा की राह का रोड़ा प्रतीत हो रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की विजय तो उससे पहले ही दूर थी। अब और ज्यादा दुरूह लग रही है।भाजपा इसी इंडिया गठबंधन की काट निकालने की कोशिश कर रही है।पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलग− अलग समाज के लोगों से विचार कर मंथन कर रही है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोकसभा की चुनावी वैतरणी से कैसे पार लगा जाए । केंद्रीय सेवाओं में जाट आरक्षण बहाली को लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट आंदोलन का मूड बनाए बैठे हैं। इस आंदोलन की काट ढूंढने के लिए का रविवार को मेरठ में आयोजन किया। इस आयोजन में हर एक राजनीतिक दल के नेता आमंत्रित किए गए थे। पश्चिमी यूपी को हरित प्रदेश बनाकर अलग राज्य का दर्जा देने की मांग करीब तीन दशक पुरानी है। इस क्षेत्र में समाज के हर वर्ग के लोग अलग राज्य की मांग के लिए आंदोलन करते रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह इलाका है या यहां उद्योग धंधे नहीं हैं। यहां के लोगों की मुख्य शिकायत प्रमुख प्रशासनिक केंद्रों का विकेंद्रीकरण न होना है। अधिकतर सभी प्रमुख संस्थान लखनऊ और उसके पास ही केद्रिंत हैं।है।पश्चिमी उत्तर प्रदेशवासियों को यहां जाने में काफी परेशानी उठानी पडती है।इलाहाबाद हाईकोर्ट की पश्चिम में अलग बैंच बनाने की मांग तो 1956 से चली आ रही है।पश्चिम उत्तर प्रदेश के वादकारियों और अधिवक्ताओं की मांग रही है कि लाहोर से ज्यादा दूर उन्हें इलाहाबाद पड़ता है। पश्चिम उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की बैंच बने इस मांग को लेकर 1980 में तीर्व आंदोलन हुआ था। इसे पूरा न होते देख सुझाव आया कि हाईकोर्ट की बैंच की मांग छोडकर अलग प्रदेश की मांग करो। अलग प्रदेश बनेगा तो बैंच नहीं प्रदेशा का अपना ही हाईकोर्ट होगा। पश्चिमी यूपी का इलाका हर दृष्टि से प्रदेश के अन्य हिस्सों से आगे है। यहां के निवासियों का आरोप रहा है कि हमारे द्वारा दिया गया राज्य पूर्वी उत्तर प्रदेश के विकास में लग रहा है। प्रदेश में लगभग छह साल से भाजपा की सरकार है।इस दौरान भी कुछ नही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बारे में शिकायत रही है कि उनका ध्यान पूर्वी उत्तर प्रदेश और गोरखपुर के विकास पर ज्यादा है।पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उपेक्षा के कारण कभी पश्चिमी उत्तर प्रदेश और कभी हरित प्रदेश के नाम से लोगों ने संघर्ष किया है, पर आज तक मांग नहीं सुनी गई। उत्तराखंड को अलग किए जाने के बाद यह मांग और ज्यादा मुखर हुई थी ।मायावती अगर अलग राज्य बनाने का प्रस्ताव ला चुकी हैं। वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने के बारे में प्रधानमंत्री कोभी अपने मुख्यमंत्री काल में पत्र लिख चुकी हैं। बिजनौर के स्वामी ओमवेश ने 1989 में इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने बिजनौर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, गाजियाबाद, नोएडा, बुलंदशहर, अलीगढ़, मुरादाबाद, अमरोहा, बंदायू, आगरा, बरेली व शाहजहांपुर समेत 17 जिलों को मिलाकर गंगा प्रदेश बनाने की मांग की थी। इस मांग को लेकर उन्होंने दिल्ली के जंतर मंतर पर इसके लिए प्रदर्शन भी किया था। स्वामी ओमवेश के साथ इस आंदोलन में पूर्व सांसद हरेंद्र मलिक, वीरेंद्र वर्मा, सोहनवीर सिंह समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तमाम नेता शामिल हुए थे। इस मुद्दे पर ये तमाम नेता एकजुट हो गए थे।स्वामी ओमवेश ने 1996 तक गंगा प्रदेश को अलग राज्य बनाने का आंदोलन चलाया था। बाद में ये मुद्दा दब गया। रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह ने हरित प्रदेश बनाने की मांग करते हुए 1992 में इस मुद्दे को फिर हवा दी। उन्होंने जोर शोर से अलग प्रदेश बनाने का यह मुद्दा उठाया था। लगभग दो साल पहले बिजनौर से बसपा सांसद मलूक नागर ने संसद में पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने का मुद्दा उठाकर इसे फिर से हवा दे दी है। उन्होंने छोटे राज्य के फायदे भी बताए। सांसद ने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलग राज्य बनने से राजस्थान सरकार ने पिछड़ों के साथ जो अन्याय किया है, उसकी भरपाई की जा सकती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने की पहले भी मांग उठती रही है। लोकसभा चुनाव से साल में भाजपा के राज्य मंत्री की इस मांग से ऐसा लगता है कि भाजपा के उच्च नेतृत्व में कुछ चल रहा है। मंथन हो रहा है। हो सकता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विपक्ष को चित्त करने के लिए लंबे समय से चली आ रही पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने की मांग पूरी कर दे। अशोक मधुप (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Saturday, September 23, 2023

आर्य विद्वान डॉ. सत्यप्रकाश (स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती)

24 सिंतबर 1905 के लिए आर्य विद्वान डॉ. सत्यप्रकाश (स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती) चारों वेदों का अंग्रेजी अनुवाद करने वाले पहले भारतीय देश के जाने माने रसायनविद और आर्य विद्वान डॉ. सत्यप्रकाश (स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती) का जन्म उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद के बिजनौर के आर्यसमाज के एक कक्ष में 24 सिंतबर 1905 हुआ था। उन्होंने जीवन का अधिकांश समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय में रसायन-विभाग के अध्यक्ष के रूप में बिताया। सेवानिवृत्ति के बाद वे आर्य संन्यासी हुए। आर्य विद्वान के रूप में अपनी पहचान बनाई। वेदों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। डॉ. सत्यप्रकाश के पिता पंडित गंगा प्रसाद उपाध्याय बिजनौर राजकीय इंटर कॉलेज में अंग्रेजी के शिक्षक थे। वे आर्य समाजी थे। इसीलिए बिजनौर आर्य समाज में बने एक कक्ष में रहते थे। आज यह कक्ष महिला आर्य समाज का भाग है। इसी में 24 सितंबर 1905 को डॉ. सत्यप्रकाश सरस्वती का जन्म हुआ।पिता पंडित गंगा प्रसाद उपाध्याय के तबादले के बाद इनका परिवार इलाहाबाद चला गया। विद्वान डॉ. सत्यप्रकाश (स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती) की शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुई। 1930 में ये इलाहाबाद विश्वविद्यालय में रसायन विभाग के प्रवक्ता नियुक्त हुए। आपने रसायन शास्त्र विभाग से फीजिको कैमिकल स्टेडीज आफँ इनओरगेनिक जेलीज (Physico chemical studies of inorganic jellies )विषय पर डी.एससी. की उपाधि 1932ई.में प्राप्त की। । 1962 में विभागाध्यक्ष बने। आपके निर्देशन में 22 विद्यार्थियों ने डी.फिल. की उपाधि प्राप्त की। आपके 150 से ज्यादा शोध पत्र प्रकाशित हुए। पांच साल बाद 1967 में इस पद से सेवानिवृत्त हुए। इन्होंने 17 देशों की यात्राएं की। डॉ. सत्यप्रकाश सरस्वती का निधन 18 जनवरी 1995 को इनके प्रिय शिष्य पंडित दीनानाथ शास्त्री के आवास पर अमेठी में हुआ। डॉ. सत्यप्रकाश सरस्वती ने सेवानिवृत्त होने पर संन्यास ले लिया और आर्य समाज इलाहाबाद के एक कक्ष में रहने लगे। अपने पिता पंडित गंगा प्रसाद की जन्मशती पर उन्होंने बिजनौर आर्य समाज में आयोजित कार्यक्रम में स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती आए थे। छह सिंतबर 1981 को इन्होंने बिजनौर में भवन पर लगे पत्थर का अनावरण किया था। स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती के शिष्य पंडित दीनानाथ ने अनुसार स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती ने अपने अध्यापन काल में 22 से ज्यादा छात्रों को डीफिल कराई। 150 से अधिक उनके शोध प्रकाशित हुए। अपने सेवाकाल में उन्होंने कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे। विश्वविद्यालयों में विज्ञान की शिक्षा हेतु ऊँचे स्तर के ग्रन्थ अंग्रेजी में अधिकतर ब्रिटिश विज्ञान विशारदों द्वारा लिखित ही उपलब्ध होते थे। डॉ॰ सत्यप्रकाश, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विज्ञान संकाय में अध्यापक होने के कारण भारतीय विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को भली-भाँति अनुभव करते थे। अतः उन्होंने इसे दृष्टि में रखते हुए अंग्रेजी में विज्ञान से संबद्ध कई उपयोगी ग्रन्थ लिखे जो इस दिशा में उत्कृष्ट उदाहरण उपस्थित करते हैं। भारत ने प्राचीन काल में विज्ञान की विविध विधाओं में अन्वेषण कर विस्मयकारी प्रगति प्राप्त की थी। डॉ॰ सत्यप्रकाश ने समर्पित भाव से अथक परिश्रम कर तत्कालीन साहित्य को नवजीवन दे पूर्णरूपेण प्रमाणित कर दिया कि यह देश विज्ञान के क्षेत्र में अन्य देशों की अपेक्षा सर्वाधिक अग्रणी एवं सर्वोपरि है। विज्ञान संबन्धी अनेक पुस्तकें स्वामी जी ने लिखी हैं जो विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में तथा शोधार्थियों के पाथेय बने हुए हैं।विज्ञान नामक प्रसिद्ध हिन्दी पत्रिका ने दिसम्बर १९९७ का अंक 'डॉ सत्यप्रकाश विशेषांक' के रूप में निकाला था।फाउंडर ऑफ साइंसेस इन एंसिएंट इंडिया, कवांइस ऑफ एंसिएंट इंडिया, एडवांस केमिस्ट्री ऑफ रेयर एलीमेंट उनकी लिखी प्रमुख पुस्तक हैं। आर्य संन्यासी सन्यासी बनने पर उन्होंने आर्य समाज संबंधित साहित्य लिखा। अब तक वेदों को अंग्रेजी अनुवाद अंग्रेजों द्वारा किया गया था। डॉ. सत्यप्रकाश सरस्वती ने अंग्रेजी में 26 खंडों में चारों वेदों का अनुवाद किया। इसके अलावा शतपथ ब्राह्मण की भूमिका, उपनिषदों की व्याख्या, योगभाष्य आदि साहित्य का सृजन किया। जितने विविध विषयों पर स्वामी सत्यप्रकाश जी का लेखन है शायद ही विश्व के किसी व्यक्ति ने इतना लिखा हो। वेद, शुल्बसूत्र, ब्राह्मण ग्रन्थ, उपनिषद्, रसायन विज्ञान,भौतिक विज्ञान, अग्निहोत्र, अध्यात्म, धर्म, दर्शन, योग, आर्यसमाज, स्वामी दयानन्द, नवजागरण आदि विविध विषयों पर सैकड़ों ग्रन्थ और लेख स्वामी सत्यप्रकाश जी द्वारा लिखे गये। आप 1942 ई. में स्वतन्त्रता आन्दोलन में जेल भी गये। शतपथ ब्राह्मण पर आपके द्वारा 700 पृष्ठों में भूमिका लिखी गई जो ग्रन्थ को समग्रता से समझने में बहुत सहायक है। आपने 17 से अधिक देशों की यात्रायें की। अपने विषय में स्वामी जी ने लिखा है, मैं प्रात: सो कर उठता हूं। मैंने कार खरीदी, बेच दी, अब पैदल आने जाने का प्रयोग कर रहा हूं। मैंने डा. राम कृष्णन् (प्रसिद्ध वैज्ञानिक) के साथ कार्य किया। जेल में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के साथ रहा। मैंने हिन्दी में कम अंग्रेजी में अधिक लिखा है। मैंने विज्ञान के अध्ययन, अध्यापन और पुस्तकों के सम्पादन के साथ पुस्तकों पर पते चिपका कर उन्हें डाक से भेजने आदि का कार्य भी किया है। सन् 1983 में तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन में पुरस्कार हेतु जब आयोजन में उपस्थित स्वामीजी का मंच से नाम पुकारा गया तो स्वामी जी श्रोताओं के मध्य अपने स्थान पर ही बैठे रहे। उन्हें मंच पर जाना था परन्तु वह नहीं गये। हिन्दी की प्रख्यात कवित्री डा. महादेवी वर्मा जी ने दूर बैठे स्वामी जी को देखा तो वह स्थिति समझ गईं। वह स्ंवयं व अपने अन्य सहयोगियों के साथ मंच से उतर कर स्वामी जी के पास पहुंचीं और उन्हें वहीं सम्मानित किया। स्वामीजी का मंच पर न आना संन्यास आश्रम की उच्च परम्परा का निर्वाह था। सन्यास आश्रम धर्म के पालन की एक घटना उनके अपने परिवार से जुड़ी है। प्रो. धर्मवीर अजमेर ने लिखा है कि स्वामीजी महाराज कहीं बाहर से दिल्ली पधारे।उनके पुत्र दिल्ली में कार्यरत थे। उन्हें कोई सूचना देनी थी। स्वामीजी महाराज ने अपने पुत्र के कार्यालय में दूरभाष किया, विदित हुआ कि पुत्र घर गये हैं। पुत्र के निवास पर दूरभाष किया तो पता चला कि वह बीमार है, उन्हें हार्ट अटैक हुआ था। थोड़ी देर बाद पता चला कि पुत्र दिवंगत हो गये। स्वामीजी ने किसी से चर्चा नहीं की, कोई दु:ख व्यक्त नहीं किया और न घर जाकर अन्त्येष्टि में शामिल ही हुए। दयानन्द संस्थान, दिल्ली के अध्यक्ष महात्मा वेदभिक्षु से उनका बड़ा स्नेह था। उनसे दूरभाष पर सम्पर्क किया। कहने लगे आज आपसे बात करने की इच्छा हो रही है, मेरे कमरे में आ जाओ। दिन भर उनके साथ इधर −उधर की चर्चा करते रहे। पुत्र की अन्त्येष्टि के दो तीन दिन बाद पुत्र वधु स्वामीजी महाराज के पास आई तो स्वामी जी कुछ देर बात करने के बाद उनसे बोले कि ईश्वर की इच्छा, जो होना था हो गया, अब तुम अपना काम देखो, मैं अपना काम देखता हूं। मृत्यु से पूर्व स्वामीजी के अमेठी निवासी शिष्य श्री दीनानाथ सिंह एवं उनके परिवार ने रूग्णावस्था में उनकी जो सेवा-सुश्रुषा की वह सराहनीय एवं अनुकरणीय थी। श्री सत्यदेव सैनी, लखनऊ व उनका परिवार स्वामीजी का भक्त रहा है। मृत्यु से कुछ ही दिन पूर्व लखनऊ में चिकित्सा कराकर अस्पताल से डिस्चार्ज होने पर स्वामीजी कुछ देर सैनीजी के परिवार में रूके व सभी सदस्यों से मिल कर अमेठी गये थे। 18 जनवरी सन् 1995 को 90 वर्षीय स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती अनन्त यात्रा पर निकल गए। अशोक मधुप {लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं}

Thursday, September 21, 2023

नही रहे जाने माने चित्रकार सुशील वत्स

नही रहे जाने माने चित्रकार सुशील वत्स अशोक मधुप देश के जाने−माने चित्रकार सुशील वत्स का 26 जुलाई 2023 को मंडी धनौरा के आनन्द आश्रम में निधन हो गया।वे 93 वर्ष के थे। वत्स का जन्म 19 सितंबर को 1930 चांदपुर के मोहल्ला साहुआन में हुआ। सुशील वत्स के पिता मंडी रघुवीर सिंह शर्मा धनौरा के जूनियर हाईस्कूल में मुख्य अध्यापक थे। उनके पिता दीवारों पर सीमेंट से देवी- देवताओं की मूर्तियां बनाते थे। इन मँर्ति को देखकर बालक सुशील में चित्रकला के प्रति शौक पैदा हुआ। वे चित्र बनाने लगे। इस शौक में वे इतने रमें कि उसी को जीवन का लक्ष्य बना लिया। कुछ कर गुजरने के जज्बे ने सुशील वत्स के हाथ में कूंची दे दी और विश्व प्रसिद्ध बना दिया। सुशील वत्स ने कला की बारीकियों को समझा और मोड्रन आर्ट में अपना कैरियर बनाना तै किया। उन्होंने पूरी दुनिया में अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाई।उनकी पेंटिंग पांच लाख रूपये मूल्य तक में बिकीं। एक साक्षात्कार में सुशील वत्स बताते हैं कि जब उन्होंने कला में भविष्य बनाना तै किया और अपना निर्णय अपने पिता जी को बताया।उनके पिताजी ने समझाया कि कलाकार बनोगे तो भूखे मरोगे, किंतु उन्होंने उनकी बात नही मानी। और दिल्ली जा बसे। दिल्ली को अपना केंद्र बनाया।शुरू में 140 रूपये में नौकरी की। 20 रूपये महीना के एक टिन शेड़ में सर छुपाने की व्यवस्था हुई। कहीं जीने की सीढ़ियों पर बैठकर तो कही पेड़ की छावं में बैठकर वे अपने जुनून को परवान चढ़ाने में लग गए। वे रामजस काँलेज में कार्डिनेटर रहे।उनकी एक पेंटिग को 1956 में इंडियन अकेडमी आँफ फाइन आर्ट अमृसर ने गोल्ड मैडिल दिया।इस पुरस्कार के बाद उनकी कला को बेइंतहा सम्मान मिला। उन्होंने मुंबई, दिल्ली और केलीफोर्निया के अलावा पूरी दुनिया में अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाई।उन्हें कई नेशनल अवार्ड मिले।यूनेस्को फलोशिप मिली। सुशील वत्स की पेंटिंग पांच लाख रुपये तक में बिकी है। सुशील वत्स मंडी धनौरा के सन्त स्वर्गीय हीरानंद के अनुयायी है। दिल्ली में रहते हुए भी वे अधिकतर समय स्वामी हीरानंद के ही धनौरा स्थित आनंद आश्रम में बिताते रहे। मृत्यु पर्यन्त वे लंबी अवधि तक इसी आश्रम में रहे।उनके तीन पुत्री और एक पुत्र हैं।उनके शौक का उनके परिवार के किसी सदस्य ने अपना कैरियर नही बनाया। श्री सुशील वत्स की विशेषता थी कि वह कभी खाली नही बैठते थे।विजिंटिग कार्ड हो या अखबार वे उसपर कुछ न कुछ बनाते ही रहते थे।कुछ समय पूर्व कृष्णा काँलेज में चित्रकला प्रतियोगिता के उदघाटन के लिए वे आए हुए थे।काँलेज की दीवार चित्र बनाने के लिए।यहीं उन्होंने दो पेंटिंग बनाईं थीं। जीवन की यादें श्री वत्स बताते थे कि एक बार वह घर से भागकर बरेली पहुंच गए। वहां वे फौज में भर्ती हो गए। परिवार में पता चला तो हंगामा मच गया। पिता जी की लिखत –पढ़त क करने पर तीन माह बाद उन्हें सेना की सेवा से मुक्ति मिली। श्री सुशील वत्स की पुत्री सारिका पटेल कहती हैं कि उनके पिता ने आनन्द आश्रम को 70 साल दिए।किंतु आश्रम वालों ने उनकी बीमारी में उनके कमरे का ताला तोड़कर सारा सामन गायब कर दिया।आज उनके पास वत्स साहब की समृति के नाम पर कुछ भी नही है। अशोक मधुप

Thursday, September 14, 2023

हिंदी पर दोहे

 हिंदी अपनी है सखे,

अपना हिंदुस्तान,

इसपर भी अच्छा लगे ,
बजता जनमन गान।
- हिंदी का उत्थान जो,
है करने का ध्यान।
रोजगार से जोड़िए,
हिंदी को श्रीमान।
-कहीं कन्नड़ की बात तो,
कहीं सिंधी की बात।
हिंदी तो बढ़ती सदा,
सबका लेकर साथ।
-उर्दू ,कन्नड़,कोंकणी,
ओ पंजाबी दौर।
मिलकर के चल दें यदि,
हो हिंदी सिरमौर।
- किसको हिंदी दोष दे,
किस्से करे गुहार।
द्विभाषी जब हो गए,
हिंदी के अखबार।
-हिंदी,सिंधी,कोंकणी,
सब बहने श्रीमान।
एक देश, परिवार है,
सबका रखिये ध्यान।
-एक दिवस से कभी ना,
हो हिंदी उत्थान।
रोज मने हिंदी दिवस,
तब ही हो कल्याण ।
-न हिंदी हिंदी रही,
ना उर्दू श्रीमान।
दोनों मिलकर रच रहीं,
अपना हिंदुस्तान।
-देवनागरी लिपि हो,
हो हिंदवी में बात।
मिलकर सब भाषा चलें,
दें दुश्मन को मात।
- त्रिभाषा को पढ़ाइए,
बेसिक में श्रीमान ।
हिंदी इंग्लिश साथ दो ,
लोकल भाषा ज्ञान।
-हिंदी तो इस देश की ,
सदा रही है शान।
राजनीति पहुंचा रही,
बस इसको नुकसान ।
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Abhai Mital

Wednesday, September 13, 2023

हिंदी दिवस पर विदेशों में बसे भारतीय परिवार घरों में तो हिंदी में ही बोलते हैं


आज हिंदी दिवस है। हिंदी भाषी   अपने –अपने स्तर से हिंदी को बढ़ाने  और बचाए रखने में लगे हैं। विदेशों में  काम करने वाले भारतीय परिवार अपने घर में हिंदी को जिंदा रखे  हैं।  भले ही उनकी

 कामकाज और घर बाहर की  बोलचाल की भाषा अंग्रेजी हो किंतु घर में तो हिंदी में ही बातचीत होती है।

तीन बार छह− छह माह के लिए  मैं  अमेरिका  में बड़े बेटे अंशुल के पास रहा । अंशुल  यहां  पिछले  लगभग 15 साल से रह रहा है।यहां  अमेरिका में पैदा हुई अंशु और उसकी पत्नी शिल्पी के पास तीन बेटियां हैं। ऐसे ही लाखों भारतीय परिवार अमेरिका बसे  हैं।   यहां  बसे  इन  भारतीय परिवार की  कामकाज की  भाषा  अंग्रेजी है । घर से बाहर की   भाषा अंग्रेजी है। बाजार की भाषा  अंग्रेजी  है । बच्चों के स्कूल की भाषा अंग्रेजी है,  इसके बावजूद इनके घर की भाषा  हिंदी है।ये खुद घर में हिंदी बोलते  हैं,बच्चों को हिंदी बुलवाते  भी हैं। उन्हें  हिंदी सिखाते हैं।इनमें  से अधिकतर बच्चे  हिंदी पढ़   नही पाते। कुछ परिवार जरूर बच्चों को घर पर हिंदी पढ़ा रहे हैं।

अमेरिका  में रहने वाले भारतीयों की दोस्ती  प्रायःअपने  ही भारतीयों से हैं।यहां  बसे  अंग्रेज  और  अफ्रिकी लोगों से  इनके  आफिशियल या  व्यवयायिक 

रिश्ते हैं। जन्मदिन की पार्टी या शादी की वर्षगांठ के अवसर पर  ये आपस के सर्किल के भारतीय परिवार ही  मिलते  हैं । मिलते हैं तो  आपस में  हिंदी में ही बात करते हैं।पंजाबी ,बंगाली या  मराठी मूल के परिवार तो घर में पंजाबी, बंगाली या मराठी में आपस में  बात करते  हैं किंतु ये भारतीय  परिवार जब आपस में मिलते हैं तो हिंदी में ही ज्यादा बोलते  और बात करते हैं।अमेरिका ही नही,दुनिया में जहां− जहां भारतीय  हैं,उनके परिवार की घर की बोलचाल की भाषा  हिंदी ही है।

त्यौहार पर भारतीय परिधान शान से पहले जाते  हैं।  युवक कुर्ता  −  पायजामा  और युवतियां साड़ी पहनती हैं।यहां मंदिर हैं। भारतीय  हिंदू  परिवार मंदिर जाते हैं। मंदिर ये लोग ज्यादातर भारतीय परिधान कुर्ता −पायजामा महिलांए  साड़ी  या भारतीय सूट पहनकर जाना   पसंद करती हैं।मंदिर की बोलचाल की भाषा भी  प्रायः हिंदी  ही है। मंदिर के पुजारी विद्वान हैं।  उनका    संस्कृत का तो उच्चारण  तो बढ़िया है  ही ,हिंदी भी बढ़िया बोलते हैं।तबियत खराब होने  पर पिछली बार अंशुल ने  मुझे अमेरिका में डाक्टर का दिखाया। अंशुल ने मेरी परेशानी  अंग्रेजी में डाक्टर को बता रहा था।  इसके बावजूद डाक्टर से  अपनी कंपनी के हिंदी – अंग्रेजी  ट्रांसलेटर को स्पीकर आन कर  फोन पर लिया। ट्ररंसलेटर उनकी बात सुन मुझे  हिंदी में बताता। मेरे उत्तर को अंग्रेजी में अनुवाद  कर डाक्टर को । पूरी तरह से मेरी जानकारी से संतुष्ठ  होने पर ही डाक्टर ने मुझे दवा दी।

दुबई  तो  लगता ही हिंदीभाषियों का देश है।वहां  चाहे भारतीय हो, बंगलादेशी हो या पाकिस्तानी  सब हिंदी बोलते  मिलेंगे।  उनकी बोलचाल से नहीलगता  कि वे भारतीय नही हैं।  उनके बताने से  पता चलता है कि वे  पाकिस्तानी हैं या बंगला देशी।भारत में दक्षिण में  हिंदी भाषियों के साथ समस्या  आ  सकती है। यहां के लोग  जानकर हिंदी नही बोलते , किंतु  दुबई में ऐसा नही है।यहीं हालत नेपाल में भी है।

अशोक मधुप

(लेखक  वरिष्ठ  पत्रकार हैं)