देश का राष्ट्रीय पक्षी मोर जंगलों से भी गायब होता जा रहा है, ऐसे में शहर में मोर के होने की बात पर यकीन नही होता। किंतु बिजनौर शहर में एक कोठी ऐसी भी है, जिसमें मोर रहते ही नहीं, बल्कि स्वच्छंद विचरण करते और अपनी प्रकृति के अनुरूप जीवन जीते हैं। यह जिलाधिकारी की कोठी है, जिसमें शाम के समय मोरों को नाचते देखना बिजनौर के लोगों के लिए आम बात है ।
मोर की आबादी बदलते पर्यावरण, जंगलों और वनों के कम होते क्षेत्र और उसमें बढ़ती इनसानी दखल अंदाजी के कारण घटती जा रही है। प्रतिबंध के बावजूद मोरों का शिकार जारी है। पर्यावरणविद मानते हैं कि अगर यही हाल रहा, तो आनेवाले समय में मोर किताबों में ही रह जाएंगे।
ऐसे मुश्किल दौर में बिजनौर के जिलाधिकारी की कोठी में मोरों का संरक्षण बड़ी बात है। लेकिन ये मोर पालतू नहीं हैं। ये अपने आप यहां विचरते रहते हैं। जिलाधिकारी की यह कोठी ब्रिटिश काल की है। कोठी कब बनी, इसके बारे में कुछ पता नहीं चलता, लेकिन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में तत्कालीन अंगरेज कलेक्टर अलेक्जेंडर ने रूहेला सरदार नजीबुद्दौला के पोते नवाब महमूद को जिले की कमान इसी कोठी में सौंपी थी। लगभग एक वर्ष तक नवाब महमूद ने यहीं से जनपद का प्रशासन संभाला।
बिजनौर हालांकि जिला मुख्यालय है, पर यहां की आबादी एक लाख के करीब है। शहर के बीचोबीच 17 एकड़ भूमि में जिलाधिकारी की कोठी स्थित है। कोठी तो सीमित क्षेत्र में ही है, बाकी हिस्से में खेत और बडे़-बडे़ पेड़ हैं। कोठी के चारों ओर चारदीवारी है। कोठी के पेड़ भी काफी पुराने और घने हैं। इस कोठी में लगभग पचास मोर रहते हैं। कोई नहीं जानता कि ये मोर यहां कब से हैं। स्थानीय लोग इसे काफी समय पहले से देखने की बात करते हैं। डीएम कोई भी बनके आया हो, सभी का इन्हें प्यार मिला है। उनके बच्चे भी मोरों को देखकर प्रसन्न होते हैं और इनके दाने-पानी की व्यवस्था करते हैं।
कोठी के दक्षिणी हिस्से में इनके लिए मिट्टी के बरतन में पानी रखा रहता है। शाम के समय तो कुछ मोर घूमते हुए कोठी के गेट तक आ जाते हैं और जिलाधिकारी के कर्मचारियों के हाथ से सामान लेकर खाते रहते हैं। कोठी का स्टाफ भी इनका बड़ा ध्यान रखता है। सभी अपने पास इनके खाने के लिए कुछ न कुछ रखता है। कोठी के स्टाफ के मुताबिक ये मोर उनसे हिल-मिल गए हैं। शाम के समय ये काफी देर तक नाचते रहते हैं। डीएम की कोठी होने के कारण यहां आम लोगों की आवाजाही प्रतिबंधित है, किंतु यहां किसी काम से आने वाले लोग इन मोरों को निहार कर आनंदित हुए बिना नहीं रहते।
अशोक मधुप
Amar Ujala Me editorial page per sabse aalag me 8 december 11 me prakashit
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Saturday, January 8, 2011
Wednesday, January 5, 2011
अपनी लाइन लंबी करो, दूसरे की छोटी नहीं :अतुल माहेश्वरी
अशोक मधुप
सोमवार को मैं दफ्तर में बैठा था कि एक फोन ने मुझे स्तब्ध कर दिया। समझ नहीं आया कि क्या हुआ?, कैसे हुआ? कुछ देर मेरी चेतना शून्य सी हो गई। एक ऐसा व्यक्ति जिसमें नेतृत्व का गुण था। मार्गदर्शन और निर्देशन की काबिलियत थी। कभी मन भटका तो उनसे बात की और चुटकियों में समस्या का हल करने वाले अमर उजाला के एमडी अतुल माहेश्वरी नहीं रहे, सुन कर यकीन नहीं हुआ। अतुलजी के अचानक चले जाने की सुन गहरा आघात लगा। मेरे से उम्र में छोटे थे, लेकिन मेरे लिए एक अभिभावक के रूप में रहे। मैंने 1977-78 के आसपास अमर उजाला बरेली में काम शुरू किया। उस समय एक स्थानीय दैनिक में काम करता था। किसी बात पर बिजनौर के पे्रस कर्मचारी हड़ताल पर चले गए, इससे बिजनौर में निकलने वाले सभी समाचार पत्रों का प्रकाशन बंद हो गया। हड़ताल 26 दिन तक चली। तब बिजनौर में अमर उजाला की 125 प्रतियां आती थीं। अखबार के विस्तार को बेहतर मौका था। मैने आदरणीय अतुलजी से बात की। मैंने कहा कि प्रेस एंपलाइज संकट में हैं। हम श्रमिकों की मदद कर अन्य अखबारों को ठप कर सकते हैं! इससे हड़ताल लंबी चलेगी और हमारी प्रसार संख्या बढ़ जाएगी। उन्होंने मुझे समझाया कि अखबार के प्रसार के लिए यह हथकंडा ठीक नहीं हैं। अतुलजी ने कहा कि हमें दूसरों को नुकसान पहुंचा कर आगे नहीं बढ़ना चाहिए। हम बिजनौर मुख्यालय से निकलने वाले अखबार के बंद होने पर प्रयास करें तो बेहतर है, लेकिन किंतु श्रमिकों को धन देकर हड़ताल को लंबा चलाना ठीक नहीं है। ऐसा ही उस समय हुआ जब बिजनौर में श्री सूर्यप्रताप सिंह डीएम थे। तहसील दिवस में जूस पीने से उनकी तबियत खराब हुई। एक समाचार पत्र ने प्रकाशित किया की डीएम को मारने की कोशिश की गई। समाचार प्रकाशित करने वाला स्थानीय दैनिक उस समय बिजनौर में सर्वाधिक प्रसार संख्या में था। इस प्रकरण में कुछ कर्मचारियों पर कार्रवाई होनी तय थी। उस समाचार पत्र ने सिर्फ डीएम के पक्ष को प्रकाशित किया। दूसरे पक्ष की उपेक्षा की गई। हमने दोनों पक्षों की आवाज को लोगों के सामने लाने का प्रयास किया। हमनेजहर देने के प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच की आवाज उठाई। समाचार छापने का क्रम चल ही रहा था कि स्थानीय दैनिक ने अमर उजाला परिवार से जुड़े आईएएस दीपक सिंघल के विरुद्घ समाचार प्रकाशित कर दिया। मेरी अतुलजी से बात हुई। मैंने कहा कि हम भी उनके खिलाफ छापेंगे। अतुलजी ने स्पष्ट रूप से इंकार कर दिया। बोले, अपनी लाइन लंबी करो, दूसरों की छोटी करने में मत लगो। समय बीत गया। आज उस समाचार पत्र की प्रसार संख्या सिमट चुकी है। एक दिन किरतपुर से लौटते समय अतुलजी मेरे साथ बिजनौर कार्यालय आ गए। वह जब मिलते थे, सभी परिचित और जानकारों के बारे में पूछा करते थे। स्थानीय समाचार पत्र के बारे में चर्चा हुई। मैंने बताया कि 400 या 500 प्रतियां ही छप रही हैं। उन्होंने कहा-याद है मैंने कहा था कि अपनी लाइन बड़ी करते रहो।
यादों में लौटता हूं तो याद आता है कि मैं आज जिस मकान में रहता हूं मकान मालिक उसे बेच रहे थे। उनका पहला ऑफर मेरे लिए था। मेरे पास इतने पैसे नहीं थे। मैं बरेली गया था अतुलजी से बात हुई । मैंने कहा कुछ रुपयों की जरूरत होगी। उन्होंने कहा बैनामा होने से एक दिन पहले बता देना। मैंने फोन किया तो रात को टैक्सी से ड्राफट मिल गया।
बरेली से प्रकाशित होने वाले अमर उजाला में उर्दू शायर स्व. निश्तर खानकाही व्यंग्य लिखते थे, मेरठ संस्करण में व्यंग्य छपना बंद हो गया। अतुलजी ने इस बारे में मुझसे जानकारी मांगी। निश्तर खानकाही से मैंने पूछा तो उन्होंने कहा कि कुछ लेख का पारिश्रमिक नहीं मिला है। मैने अतुलजी को बताया। अतुलजी ने शीघ्र ही उन्हें पारिश्रमिक भिजवाया। अतुलजी के साथ बिताए गए छोटे से सफर में उनकी मदद करने की फेहरिस्त बहुत लंबी है। अतुलजी ने कितने लोगों की मदद की, शायद यह उन्हें भी याद नहीं होगा।
अतुलजी बहुत ही सरल और विनम्र थे। उनके साथ काम करते हुए कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि हम मालिक के साथ हैं। हमेशा उन्होंने दोस्ताना व्यवहार कायम रखा। एक बार मै बरेली गया था। देर रात को टेलीपि्रंटर पर खबर आ गई कि रूस के राष्ट्रपति नहीं रहे। कार्यालय के पत्रकार साथी गोपाल विनोदी वामपंथी विचारधारा के थे। अतुलजी ने विनोदीजी एवं अन्य सभी साथियों को बुलाया। अतुलजी ने कहा कि रूस के राष्ट्रपति का निधन हो गया है। शायद विनोदजी को मौका मिल जाए।
5december 2011 ke amar ujala me prakashit
सोमवार को मैं दफ्तर में बैठा था कि एक फोन ने मुझे स्तब्ध कर दिया। समझ नहीं आया कि क्या हुआ?, कैसे हुआ? कुछ देर मेरी चेतना शून्य सी हो गई। एक ऐसा व्यक्ति जिसमें नेतृत्व का गुण था। मार्गदर्शन और निर्देशन की काबिलियत थी। कभी मन भटका तो उनसे बात की और चुटकियों में समस्या का हल करने वाले अमर उजाला के एमडी अतुल माहेश्वरी नहीं रहे, सुन कर यकीन नहीं हुआ। अतुलजी के अचानक चले जाने की सुन गहरा आघात लगा। मेरे से उम्र में छोटे थे, लेकिन मेरे लिए एक अभिभावक के रूप में रहे। मैंने 1977-78 के आसपास अमर उजाला बरेली में काम शुरू किया। उस समय एक स्थानीय दैनिक में काम करता था। किसी बात पर बिजनौर के पे्रस कर्मचारी हड़ताल पर चले गए, इससे बिजनौर में निकलने वाले सभी समाचार पत्रों का प्रकाशन बंद हो गया। हड़ताल 26 दिन तक चली। तब बिजनौर में अमर उजाला की 125 प्रतियां आती थीं। अखबार के विस्तार को बेहतर मौका था। मैने आदरणीय अतुलजी से बात की। मैंने कहा कि प्रेस एंपलाइज संकट में हैं। हम श्रमिकों की मदद कर अन्य अखबारों को ठप कर सकते हैं! इससे हड़ताल लंबी चलेगी और हमारी प्रसार संख्या बढ़ जाएगी। उन्होंने मुझे समझाया कि अखबार के प्रसार के लिए यह हथकंडा ठीक नहीं हैं। अतुलजी ने कहा कि हमें दूसरों को नुकसान पहुंचा कर आगे नहीं बढ़ना चाहिए। हम बिजनौर मुख्यालय से निकलने वाले अखबार के बंद होने पर प्रयास करें तो बेहतर है, लेकिन किंतु श्रमिकों को धन देकर हड़ताल को लंबा चलाना ठीक नहीं है। ऐसा ही उस समय हुआ जब बिजनौर में श्री सूर्यप्रताप सिंह डीएम थे। तहसील दिवस में जूस पीने से उनकी तबियत खराब हुई। एक समाचार पत्र ने प्रकाशित किया की डीएम को मारने की कोशिश की गई। समाचार प्रकाशित करने वाला स्थानीय दैनिक उस समय बिजनौर में सर्वाधिक प्रसार संख्या में था। इस प्रकरण में कुछ कर्मचारियों पर कार्रवाई होनी तय थी। उस समाचार पत्र ने सिर्फ डीएम के पक्ष को प्रकाशित किया। दूसरे पक्ष की उपेक्षा की गई। हमने दोनों पक्षों की आवाज को लोगों के सामने लाने का प्रयास किया। हमनेजहर देने के प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच की आवाज उठाई। समाचार छापने का क्रम चल ही रहा था कि स्थानीय दैनिक ने अमर उजाला परिवार से जुड़े आईएएस दीपक सिंघल के विरुद्घ समाचार प्रकाशित कर दिया। मेरी अतुलजी से बात हुई। मैंने कहा कि हम भी उनके खिलाफ छापेंगे। अतुलजी ने स्पष्ट रूप से इंकार कर दिया। बोले, अपनी लाइन लंबी करो, दूसरों की छोटी करने में मत लगो। समय बीत गया। आज उस समाचार पत्र की प्रसार संख्या सिमट चुकी है। एक दिन किरतपुर से लौटते समय अतुलजी मेरे साथ बिजनौर कार्यालय आ गए। वह जब मिलते थे, सभी परिचित और जानकारों के बारे में पूछा करते थे। स्थानीय समाचार पत्र के बारे में चर्चा हुई। मैंने बताया कि 400 या 500 प्रतियां ही छप रही हैं। उन्होंने कहा-याद है मैंने कहा था कि अपनी लाइन बड़ी करते रहो।
यादों में लौटता हूं तो याद आता है कि मैं आज जिस मकान में रहता हूं मकान मालिक उसे बेच रहे थे। उनका पहला ऑफर मेरे लिए था। मेरे पास इतने पैसे नहीं थे। मैं बरेली गया था अतुलजी से बात हुई । मैंने कहा कुछ रुपयों की जरूरत होगी। उन्होंने कहा बैनामा होने से एक दिन पहले बता देना। मैंने फोन किया तो रात को टैक्सी से ड्राफट मिल गया।
बरेली से प्रकाशित होने वाले अमर उजाला में उर्दू शायर स्व. निश्तर खानकाही व्यंग्य लिखते थे, मेरठ संस्करण में व्यंग्य छपना बंद हो गया। अतुलजी ने इस बारे में मुझसे जानकारी मांगी। निश्तर खानकाही से मैंने पूछा तो उन्होंने कहा कि कुछ लेख का पारिश्रमिक नहीं मिला है। मैने अतुलजी को बताया। अतुलजी ने शीघ्र ही उन्हें पारिश्रमिक भिजवाया। अतुलजी के साथ बिताए गए छोटे से सफर में उनकी मदद करने की फेहरिस्त बहुत लंबी है। अतुलजी ने कितने लोगों की मदद की, शायद यह उन्हें भी याद नहीं होगा।
अतुलजी बहुत ही सरल और विनम्र थे। उनके साथ काम करते हुए कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि हम मालिक के साथ हैं। हमेशा उन्होंने दोस्ताना व्यवहार कायम रखा। एक बार मै बरेली गया था। देर रात को टेलीपि्रंटर पर खबर आ गई कि रूस के राष्ट्रपति नहीं रहे। कार्यालय के पत्रकार साथी गोपाल विनोदी वामपंथी विचारधारा के थे। अतुलजी ने विनोदीजी एवं अन्य सभी साथियों को बुलाया। अतुलजी ने कहा कि रूस के राष्ट्रपति का निधन हो गया है। शायद विनोदजी को मौका मिल जाए।
5december 2011 ke amar ujala me prakashit
Sunday, January 2, 2011
45 साल में नहीं सुधरी भूदान गांव की तस्वीर
चारों कालोनियों के संपर्क मार्ग जर्जर
अशोक मधुप
बिजनौर। भूदान की इन चारों कालोनी के सपंर्क मार्ग बहुत ही खराब है। नजदीक में टांडा माई दास पड़ता है। इसकी यहां से दूरी पांच किलोमीटर है। वन के इस रास्ते पर दो नदियां हैं। अच्छा रास्ता कंडी रोड से है। गांव से कंडी रोड का लगभग एक किलोमीटर मार्ग कच्चा और खराब है। कंडी रोड से बढ़ापुर 29 किलोमीटर दूर पड़ता है। इस मार्ग पर जंगली हाथी के समूह घूमते रहते हैं। कई बार इनका सामना हो जाता है।
अस्पताल तो हैं पर डॉक्टर ही नहीं
बिजनौर। चारों कालोनी की पांच हजार की आबादी में सरकारी चिकित्सा परामर्श, आया आदि की कोई व्यवस्था नहीं। टांडा माई दास में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं हैं लेकिन वहां चिकित्सक नहीं मिलता। इन्हें तो उपचार या कक्षा आठ से ऊपर की शिक्षा के लिए सुलभ जगह 19 किलो मीटर दूर कोटद्वार ही है। रुक्मिणी और माया जैसे कई विद्यार्थी हैं जो कोटद्वार पढ़ने के लिए साइकिल से प्रतिदिन आते जाते हैं। गांव में बेसिक शिक्षा का एक प्राइमरी और एक जूनियर स्कूल है। इनमें एक एक शिक्षक और एक एक शिक्षा मित्र तैनात हैं। शिक्षक यदाकदा ही यहां आते हैं। शिक्षा मित्र गांव के होने के कारण गांव में ही रहते और स्कूल चलाते हैं। गांव वाले बताते हैं कि यहां तैनात एक शिक्षक ने अपनी जगह एक टीचर रख रखा है। वह प्रतिदिन पढ़ाता है। उसे वह छह सौ रुपये महीना भुगतान करता है।
बहुत खराब हालत है बस्ती की
स्र
बिजनौर। भूदान आंदोलन में भूमिहीनों को भूपति बनना बड़ा कष्टकर रहा। दान में मिली जमीन 45 साल बीतने के लिए बाद भी खेती योग्य नहीं हो सकी।
आचार्य विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के तहत बिजनौर जनपद में भी लगभग 700 एकड़ भूमि दान की गई थी। यह जमीन वन क्षेत्र में स्थित है। यहां बढ़ापुर से कंडी रोड होकर जाना पड़ता है। वन के इस मार्ग से इन गांव की दूरी 29 किलोमीटर है। प्रशासन ने 1965 में इस जमीन के 25- 25 बीघे के पट्टे करके लगभग 90 भूमिहीनों में जमीन बांट दी। यहां चार कालोनी बसी। इन कालोनी में 45 साल बाद आज भी न बिजली पहुंची, न ही सिंचाई के साधन विकसित हुए। किसान आज भी बारिश पर निर्भर है। आज इन गांवों की आबादी पांच हजार के करीब है, पर हैंडपंप छह ही हैं। यहीं नहीं पानी बहुत गहराई में है। जिस कारण नल लग नहीं पाते। गांव चारों ओर से नदियों से घिरे हैं। ऐसे में यहां बरसात में आवाजाही नहीं हो पाती। चिकित्सा सुविधा के लिए टांडा माईदास जाना पड़ता है। पांच किलो मीटर के इस वन मार्ग में दो नदियां पड़ती हैं। रात में टांडामाई दास में चिकित्सक नहीं मिलते। इन खराब परिस्थितियों में मजबूरन काफी पट्टेधारक अपनी भूमि दूसरों को सौंप अन्य जगह चले गए हैं। यहां एक प्राइमरी और एक जूनियर स्कूल है, लेकिन तैनात होने के बाद भी शिक्षक पढ़ाने नहीं आते। गांव के दो शिक्षा मित्र हैं, वे ही दोनों स्कूल चला रहे हैं। हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए वन क्षेत्र के बीच के मार्ग कंडी रोड से 19 किलोमीटर दूर पढ़ने कोटद्वार जाना होता है।
ढिबरी और लालटेन का ही है सहारा
बिजनौर। भूदान कालोनी में गांव वालों ने घरों के आगे बल्लियां लगा रखी है। वे कहते हैं कि इससे वन्य प्राणी दूर रहते हैं। बिजली न होने के कारण ढिबरी और लालटेन का ही प्रयोग करते हैं। डीलर तेल देने उनके गांव ही आता है, लेकिन पांच की जगह ढाई लीटर तेल देता है। शंकुतला देवी, बिट्ट आदि का कहना है कि विधायक वोट मांगने ही उनके यहां आए थे।
उसके बाद कोई नहीं आया। सांसद अजरूद्दीन की तो उन्होंने कभी सूरत ही नहीं देखी है। पूर्व प्रधान निजामुलहसन का कहना है कि यदि गांव में बिजली आ जाए और सिंचाई के साधन बढ़ जाए तो यहां के रहने वालों का जीवन स्तर सुधर सकता है। संपर्क मार्ग भी शीघ्र बनने चाहिए।
बिजनौर। आचार्य विनोबा भावे ने 1951 में भूदान आंदोलन प्रारंभ किया। उन्होंने जमीनदारों और राजा-महाराजाओं से जमीन दान में लेकर भूमिहीनों में बांटना प्रारंभ किया। इसी समय जमींदारी प्रथा खत्म हो रही थी। सरकार द्वारा भूमि की सीमा निर्धारित कर दी गई। लोगों ने निर्धारित सीमा से अधिक भूमि हाथ से जाती देख उसे भूदान में देना अच्छा समझा।
जनपद में लगभग 700 एकड़ सन 60 के आसपास भूदान में मिली जमीन के पट्टे होने और उन पर कालोनी बनने में कई साल लग गए। भूदान में मिली जमीन में चार कालोनी बसाई गई। कालोनी को एक-दो, तीन-चार नंबर दिए गए। 65 के आसपास यहां आकर वह लोग बसे जिन्हें जमीन मिली। यहां आने वालों के नए सपने थे। कलवा सिंह बिजनौर के पास पमड़ावली से यहां आए तो गंगा राम सिंह कुम्हेड़ा से। कई गढ़वालियों को यहां भूमि मिली तो कई बोक्सा परिवार बसाए गए। चार नंबर कालोनी को तो बोक्सा कालोनी का ही नाम पड़ा। सबके सपने थे, जमीन पर जीतोड़ मेहनत कर संपन्नता की और बढ़ना। जमीन मिली थी लेकिन घर खुद बनाने थे। पट्टे पाने वाले गरीब थे। अत: कच्ची पक्की झोंपड़ी डाल कर बस गए, लेकिन 45 साल में इनके हाथ बेबसी ओर मजबूरी के अलावा कुछ हाथ नहीं लगा।
कलवा सिंह का कहना है कि 45 साल बाद भी गांव में बिजली नहीं पहुंची, जबकि उत्तराखंड की लाइन गांव से तीन किलोमीटर दूर है, तो उत्तर प्रदेश की बिजली लाइन दो किलोमीटर दूर। कृषि पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है। वन क्षेत्र होने के कारण वन्य प्राणियों का आवाजाही बनी रहती है।
जो फसलों को तबाह कर देते हैं। गांव परनवाला में तो एक गांव बसने के समय का कुआं ही है। इसका भी कई बार पानी काफी खरब हो जाता है।
Amarujala meerut ki bijnor dak me 2 january 2011 me prakashit
अशोक मधुप
बिजनौर। भूदान की इन चारों कालोनी के सपंर्क मार्ग बहुत ही खराब है। नजदीक में टांडा माई दास पड़ता है। इसकी यहां से दूरी पांच किलोमीटर है। वन के इस रास्ते पर दो नदियां हैं। अच्छा रास्ता कंडी रोड से है। गांव से कंडी रोड का लगभग एक किलोमीटर मार्ग कच्चा और खराब है। कंडी रोड से बढ़ापुर 29 किलोमीटर दूर पड़ता है। इस मार्ग पर जंगली हाथी के समूह घूमते रहते हैं। कई बार इनका सामना हो जाता है।
अस्पताल तो हैं पर डॉक्टर ही नहीं
बिजनौर। चारों कालोनी की पांच हजार की आबादी में सरकारी चिकित्सा परामर्श, आया आदि की कोई व्यवस्था नहीं। टांडा माई दास में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं हैं लेकिन वहां चिकित्सक नहीं मिलता। इन्हें तो उपचार या कक्षा आठ से ऊपर की शिक्षा के लिए सुलभ जगह 19 किलो मीटर दूर कोटद्वार ही है। रुक्मिणी और माया जैसे कई विद्यार्थी हैं जो कोटद्वार पढ़ने के लिए साइकिल से प्रतिदिन आते जाते हैं। गांव में बेसिक शिक्षा का एक प्राइमरी और एक जूनियर स्कूल है। इनमें एक एक शिक्षक और एक एक शिक्षा मित्र तैनात हैं। शिक्षक यदाकदा ही यहां आते हैं। शिक्षा मित्र गांव के होने के कारण गांव में ही रहते और स्कूल चलाते हैं। गांव वाले बताते हैं कि यहां तैनात एक शिक्षक ने अपनी जगह एक टीचर रख रखा है। वह प्रतिदिन पढ़ाता है। उसे वह छह सौ रुपये महीना भुगतान करता है।
बहुत खराब हालत है बस्ती की
स्र
बिजनौर। भूदान आंदोलन में भूमिहीनों को भूपति बनना बड़ा कष्टकर रहा। दान में मिली जमीन 45 साल बीतने के लिए बाद भी खेती योग्य नहीं हो सकी।
आचार्य विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के तहत बिजनौर जनपद में भी लगभग 700 एकड़ भूमि दान की गई थी। यह जमीन वन क्षेत्र में स्थित है। यहां बढ़ापुर से कंडी रोड होकर जाना पड़ता है। वन के इस मार्ग से इन गांव की दूरी 29 किलोमीटर है। प्रशासन ने 1965 में इस जमीन के 25- 25 बीघे के पट्टे करके लगभग 90 भूमिहीनों में जमीन बांट दी। यहां चार कालोनी बसी। इन कालोनी में 45 साल बाद आज भी न बिजली पहुंची, न ही सिंचाई के साधन विकसित हुए। किसान आज भी बारिश पर निर्भर है। आज इन गांवों की आबादी पांच हजार के करीब है, पर हैंडपंप छह ही हैं। यहीं नहीं पानी बहुत गहराई में है। जिस कारण नल लग नहीं पाते। गांव चारों ओर से नदियों से घिरे हैं। ऐसे में यहां बरसात में आवाजाही नहीं हो पाती। चिकित्सा सुविधा के लिए टांडा माईदास जाना पड़ता है। पांच किलो मीटर के इस वन मार्ग में दो नदियां पड़ती हैं। रात में टांडामाई दास में चिकित्सक नहीं मिलते। इन खराब परिस्थितियों में मजबूरन काफी पट्टेधारक अपनी भूमि दूसरों को सौंप अन्य जगह चले गए हैं। यहां एक प्राइमरी और एक जूनियर स्कूल है, लेकिन तैनात होने के बाद भी शिक्षक पढ़ाने नहीं आते। गांव के दो शिक्षा मित्र हैं, वे ही दोनों स्कूल चला रहे हैं। हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए वन क्षेत्र के बीच के मार्ग कंडी रोड से 19 किलोमीटर दूर पढ़ने कोटद्वार जाना होता है।
ढिबरी और लालटेन का ही है सहारा
बिजनौर। भूदान कालोनी में गांव वालों ने घरों के आगे बल्लियां लगा रखी है। वे कहते हैं कि इससे वन्य प्राणी दूर रहते हैं। बिजली न होने के कारण ढिबरी और लालटेन का ही प्रयोग करते हैं। डीलर तेल देने उनके गांव ही आता है, लेकिन पांच की जगह ढाई लीटर तेल देता है। शंकुतला देवी, बिट्ट आदि का कहना है कि विधायक वोट मांगने ही उनके यहां आए थे।
उसके बाद कोई नहीं आया। सांसद अजरूद्दीन की तो उन्होंने कभी सूरत ही नहीं देखी है। पूर्व प्रधान निजामुलहसन का कहना है कि यदि गांव में बिजली आ जाए और सिंचाई के साधन बढ़ जाए तो यहां के रहने वालों का जीवन स्तर सुधर सकता है। संपर्क मार्ग भी शीघ्र बनने चाहिए।
बिजनौर। आचार्य विनोबा भावे ने 1951 में भूदान आंदोलन प्रारंभ किया। उन्होंने जमीनदारों और राजा-महाराजाओं से जमीन दान में लेकर भूमिहीनों में बांटना प्रारंभ किया। इसी समय जमींदारी प्रथा खत्म हो रही थी। सरकार द्वारा भूमि की सीमा निर्धारित कर दी गई। लोगों ने निर्धारित सीमा से अधिक भूमि हाथ से जाती देख उसे भूदान में देना अच्छा समझा।
जनपद में लगभग 700 एकड़ सन 60 के आसपास भूदान में मिली जमीन के पट्टे होने और उन पर कालोनी बनने में कई साल लग गए। भूदान में मिली जमीन में चार कालोनी बसाई गई। कालोनी को एक-दो, तीन-चार नंबर दिए गए। 65 के आसपास यहां आकर वह लोग बसे जिन्हें जमीन मिली। यहां आने वालों के नए सपने थे। कलवा सिंह बिजनौर के पास पमड़ावली से यहां आए तो गंगा राम सिंह कुम्हेड़ा से। कई गढ़वालियों को यहां भूमि मिली तो कई बोक्सा परिवार बसाए गए। चार नंबर कालोनी को तो बोक्सा कालोनी का ही नाम पड़ा। सबके सपने थे, जमीन पर जीतोड़ मेहनत कर संपन्नता की और बढ़ना। जमीन मिली थी लेकिन घर खुद बनाने थे। पट्टे पाने वाले गरीब थे। अत: कच्ची पक्की झोंपड़ी डाल कर बस गए, लेकिन 45 साल में इनके हाथ बेबसी ओर मजबूरी के अलावा कुछ हाथ नहीं लगा।
कलवा सिंह का कहना है कि 45 साल बाद भी गांव में बिजली नहीं पहुंची, जबकि उत्तराखंड की लाइन गांव से तीन किलोमीटर दूर है, तो उत्तर प्रदेश की बिजली लाइन दो किलोमीटर दूर। कृषि पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है। वन क्षेत्र होने के कारण वन्य प्राणियों का आवाजाही बनी रहती है।
जो फसलों को तबाह कर देते हैं। गांव परनवाला में तो एक गांव बसने के समय का कुआं ही है। इसका भी कई बार पानी काफी खरब हो जाता है।
Amarujala meerut ki bijnor dak me 2 january 2011 me prakashit
Sunday, December 19, 2010
ब्रह्म स्वरूप बेदिल
ब्रह्मस्वरूप बेदिल की पुण्य तिfथ
हिंदी, उर्दू, फारसी का तालमेल ‘बेदिल साहब
धामपुर। ब्रह्म स्वरूप बेदिल फक्कड़ व्यक्ति का नाम है, जो कविता और दोस्ती के लिए प्रसिद्ध रहा।
बेदिल साहब की धामपुर में कपडे़ की दुकान और अखबारों की एजेंसियां थी। सबेरे अखबार बांटने निकलते तो कब लौटे ये किसी को पता नहीं होता था। कोई कवि या शायर मिल जाए तो फिर तो राम ही मालिक है कि कब वापसी हो। नया शेर या कविता तो कई बार अखबार के खरीदारों के हिस्से में भी आ जाती थी।
बेदिल साहब पूरी तरह मस्त थे। खुलकर हंसते थे। अपनी कविता या शेर कहकर खुद ही जोर से हंस पड़ते थे। पान खाने के इतने शौकीन थे कि उनके मुंह में हर समय पान रहता था और अधिकतर बात करते समय पान का पीक मुंह से बहकर गालों पर आ जाता था। बेदिल की शिक्षा कोई ज्यादा न थी किंतु स्वाध्याय के बूते पर उनका हिंदी, उर्दू और फारसी में बड़ा दखल था, तीनों भाषाओं के शब्द उनकी रचनाओं में जगह-जगह प्रयोग भी हुए हैं। 16 जुलाई 1917 में जन्में बेदिल का 19 दिसंबर 1991 में निधन हुआ। आज उनकी बीसवीं पुण्य तिथि है, किंतु ऐसा उनके चाहने वालों को नहीं लगता कि बेदिल हमारे बीच नही हैं।
नहटौर के जैन विद्या मंदिर इंटर कॉलेज में अध्यापन कार्य के दौरान प्राय: अधिकतर शाम धामपुर की गलियों में कवियों और शायरों के साथ घूमते गुजरती थीं। उन्हीं अनेक शाम के मेरे साथी बेदिल भी रहे। उनकी मस्ती उनका अंदाज-ए-बयां मै आज तक नहीं भूल पाया। कभी धामपुर जाता हूं तो ऐसा लगता है कि जाने किधर से बेदिल निकल कर आएंगे और कंधे पर हाथ मार शेर सुनाने लगेंगे। उनकी बीसवीं पुण्य तिथि पर उनके कुछ कता, शेर श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत हैं।
- वक्त रुकता नहीं है, रोके से,
घी निकलता नहीं है, फोके से। उनको कुछ और ही बनाना था, आदमी बन गया है धोके से।
- जिंदगी एक चराग है बेदिल,
इसमें सांसों का तेल जलता है। सांस पूरे हुए बुझी बाती,
इसमें धुआं नहीं निकलता है।
- यू तो सब अपनी अपनी कहते हैं,
भेद दुनिया का कौन पाता है।
एक मेला सा लग रहा है यहां,
एक आता है, एक जाता है।
- जिंदगी और मौत बस एक ही लिबास,
एक पहना एक उतारा, धर दिया।
आदमी है किस कदर का बदहवास,
जो भी पहना वो पुराना कर दिया।
- मत बिठाना, मत उठाना मुझको दोस्त,
खुद ही आ जाऊंगा मैं, खुद ही चला जाऊंगा।
- यों तो दुनिया तमाम उनकी है,
एक हमीं गैर है किसी के लिए।
प्रस्तुति : अशोक मधुप’
Saturday, December 18, 2010
गोपाल दास नीरज से एक भेंट
हरेक पल को जिया पूरी एक सदी की तरह...
‘कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे’
स्
अशोक मधुप
बिजनौर।पद्य विभूषण गोपालदास नीरज गीतों की दुनिया और हिन्दी साहित्य का जाना माना नाम है। उनकी गजल और दोहे साहित्य जगत की अनमोल धरोहर है। नीरज जी के एक कार्यक्रम में आने की सूचना पर उनके साक्षात्कार को जब नजीबाबाद रोड स्थित डॉ निरंकार सिंह त्यागी के आवास पर पहुंचा तो नीरज एक कमरे में रजाई में आराम कर रहे थे। उनके पलंग के पास उनका वाकर रखा था। 86 साल की उम्र में आज वे इसके सहारे चलते हैं।इस तरह शुरू हुआ प्रश्नोत्तर का सिलसिला
प्रश्न : नीरज जी कविता लिखनी कब शुरू की?
उत्तर: माँ बचपन में गुजर गई थी। एटा में मै अपनी बुआ के यहां रह कर पढ़ता था, गाने का शौक था तथा अच्छा गाने के कारण साथी और परिचित मुझे सहगल कहकर पुकारते थे। वहां एक कवि सम्मेलन में मैने बलबीर सिंह रंग को काव्य पाठ करते सुना। रंग अपने समय के प्रसिद्ध कवि थे। वे अपने गीत गाकर पढ़ते थे। उनसे प्रभावित होकर ही मैने कविता लिखनी शुरू की। मेरी पहली कविता है-
मुझको जीवन आधार नहीं मिलता,
आशाओं का संसार नहीं मिलता
एटा में जागरण नाम से साप्ताहिक समाचार पत्र निकलता था उसके सम्पादक कुंवर बहादुर बेचैन ने यह कविता अपने अंक में छपवाई थी। उस कविता को लंबे समय तक मै सीने से चिपकाए घूमता रहा। मुझे हरिवंश राय बच्चन की पुस्तक निशा निमंत्रण पढ़ने को मिली।जीवन से निराशा थी ऐसे में कविता पाठ लिखना शुरू कर दिया और संघर्ष नाम की पहली पुस्तक 1943 में प्रकाशित कराई। इस पुस्तक को निशा निमंत्रण को समर्पित किया। धीरे-धीरे कविता लिखते रहे, किन्तु अपना रास्ता अलग बनाया। बच्चन जी की कविता में लक्षण व्यंजनाओं का अभाव है। दिन जल्दी जल्दी ढलता है सीधी कविता है। मैने प्रेम को देखा। उसके के लिए सदा नई परिभाषा गढ़ी।
गीत लिखा: कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे, जिन्दगी मैंने गुजारी नहीं सभी की तरह,
हरेक पल को जिया पूरी एक सदी की तरह।
तुम्हारी याद जो ता उम्र मेरे साथ रही,
छुपा है रखा उसे, ख्वाबे आखरी की तरह।
लोग मुझे शृंगार का कवि कहते हैं लेकिन मैं शृंगार का कवि नहीं, एक दार्शनिक कवि हूं। कुछ विद्वान कहते हैं कि दर्शन कविता के लिए नहीं हैं जबकि मैं कहता हूं कविता दर्शन के बिना नहीं हो सकती।
आज जी भर देख लो तुम चांद को क्या पता यह रात फिर आए न आए। यहां दर्शन है।
प्रश्न: आपने ज्योतिष पर भी काफी लिखा है?
उत्तर: ज्योतिष एक विज्ञान है। इस संसार में कोई स्थिर नही है। सूर्य चांद तारे ही नहीं चल रहे। हर चीज लय में चल रही है। नदी लय में चल रही है। हमारा रक्त लय में चल रहा है। इसी पर ज्योतिष केंद्रित है।
चरण सिंह के प्रधानमंत्री बनते ही कह दिया था कि 30 को कुछ गड़बड़ हो जाएगी। हुआ भी ऐसा हीं। यह संक्रांति काल था। इसमें गड़बड़ होती ही है। ज्योतिष में तीन पुस्तकें लिखी, किन्तु परिचितों ने कहा कि यह तुम्हारा विषय नहीं समय बरबाद मत करो। और मैं अपने रास्ते पर आ गया।
प्रश्न: अपने विशाल साहित्य में अपनी सर्वश्रेष्ठ कविता कौन सी मानते हैं?
उत्तर:
कविता बच्चों की तरह है। आदमी को अपने सभी बच्चे प्यारे होते हैं, कोई ज्यादा प्यारा या कम प्यारा नहीं। किन्तु मैने मां संबोधन से चार पांच कविताएं लिखी हैं इन्हें मैं सर्व श्रेष्ठ मानता हूं। दो वर्ष मेरे अवसाद में बीते एक तरह से विक्षिप्त की तरह जीवन जिया। लगता था कि मां मुझे बुला रही हैं। कहती है तुम परेशान हो मेरे पास आ जाओ ऐसे में मैने लिखा:
मां मत ऐसे टेर की मेरा मन अकुलाए। ,तू तो दे आवाज वहां से, यहां न मुझसे बजे बांसुरी।
तू डाटे उस ठौर, चढ़ाए यहां हर एक फूल पांखुरी, तेरा करु न तो तू बिगडे़, जग की सुनु न तो वह झगडे़।
समझ में नहीं ंआता कि इस पार जाऊं या उस पार।
प्रश्न: नीरज अगर कवि नहीं होते तो क्या होते
उत्तर:
क्लर्क होता, काफी समय क्लर्की की है। उसी समय की लिखी पुस्तक संघर्ष है।
प्रश्न: आप अपनी परिभाषा क्या कहेंगे?
उत्तर:
नीरज के दो रूप हैं एक : कमल और दूसरा मोती मैं अपने आपको कमल मानता हूं जो गंदगी में रह कर भी उससे दूर रहता है।
प्रश्न: आप और संतोषानन्द जैसे कद्दावर कवि गीतकार फिल्मों में गए किन्तु वहां से चले क्यों आए?
उत्तर:
नीरज: मैं फिल्मी दुनिया में गया नहीं बुलाया गया था आज भी बुलाया जाता हूं। मेरे गीतों की
पिक्चरों ने सिलवर जुबली मनाई। खूब चली मैरे लिखे गीत आज भी गुन गुनाए जाते हैं। राज कपूर, शंकर जयकिशन मेरे साथी थे। एस डी वर्मन ने मेरे गीत खूब गाए। फिल्मी दुनिया में राजनीति की जोड़ तोड़ चलता है, मैं यह सब नहीं कर सकता इसीलिए लौट आया।
प्रश्न: आज के फिल्मी गीतों ्रकुछ कहें?
उत्तर:
आज के गीत पचास शब्दों में ही सिमटे हैं उसमें भाव नहीं हैं।
प्रश्न: पुराने समय के कवि सम्मेलन और आज के कवि सम्मेलन में क्या फर्क है?
उत्तर: पहले कवि सम्मेलन की अध्यक्षता जाने माने कवि मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, रामधारी सिंह दिनकर, निराला एवं महादेवी वर्मा आदि करते थे आज राजनेता करते हैं। आज तो मंच से कविता ही नहीं कही जा रही।
प्रश्न: आज हिंदी कवि भी गजल लिख रहे हैं क्या कारण हैं?
उत्तर:
गजल लिखना बहुत सरल है उसकी हर दो पंक्तियां अपने में अलग होती है। विपरीत भाव भी हो सकते हैं किन्तु गीत में ऐसा नहीं हैं। गीत में प्रारम्भ से लेकर अन्त तक भाव नहीं बदल सकता। गजल उर्दू की विद्या है गीत हिंदी की। हिंदी में गजल लिखना बहुत कठिन हैं वह भाव ही नहीं आ सकता। मुगल शासन में उर्दू कोर्ट की भाषा बनी। उर्दू दरबारी भाषा बनी तो हिंदी गांव खेत और खलिहान की ओर चली गई।
गजल का अर्थ प्रेमिका से बात करना है। प्रेमिका से बात आंखों से ज्यादा होती है। होंठों से कम। संकेत भाषण नहीं हो सकते। इसी में अध्यात्म आ जाए तो अच्छा हो जाता है।
खुशी भी नहीं, बेखुदी भी नहीं हैं,
चले आइए अब कोई भी नहीं है।
हम तेरी याद में ए यार वहां तक पहुंचे
होश ये भी न रहा कि कहां तक पहुंचे
कौन ज्ञानी , न ध्यानी, न ब्राह्मण, न शेख
वो कोई और थे जो तेरे मंका तक पहुंचे।
र
अंदाज-ए नीरज
Amar Ujala Meerut me 18 me prakashit
Amar Ujala Meerut me 18 me prakashitFriday, December 17, 2010
कवि गोपाल दास नीरज की नसीहत
रामदेव अपना काम करें, राजनीति नहीं
अशोक मधुप
बिजनौर।प्रसिद्घ कवि पद्मभूषण श्री गोपाल दास नीरज ने कहा है कि स्वामी रामदेव को अपना काम करना चाहिए, राजनीति नहीं। वे अपना काम सही ढंग से करते रहें, यही बहुत बड़ा काम होगा।
एक कार्यक्रम में भाग लेने आए नीरज ने एक लंबी भेंट में कहा कि गड़बड़ तभी होती है, जब आदमी में स्वाभिमान आ जाता है। आज स्वामी रामदेव की हालत भी ऐसी ही है। उन्होंने कहा कि आज गड़बड़ यहीं हो रही है कि सब दूसरे को सुधारने पर लगे हैं, अपने को नहीं। अपने को सुधार लें तो कोई समस्या हीं न हो। आज सब दूसरे को बुरा कह रहे हैं।
कवि नीरज कहते हैं कि हम तो लंबे समय से कवि सम्मेलन के माध्यम से लेगों को पूरी पूरी रात जगाने में लगे हैं किंतु कोई जागता ही नहीं। बस कविता सुनते समय ताली बजाकर काम खत्म कर देते हैं । वे कहते है कि आज सब धन कमाने में लगे हैं। चारों ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला है। राजनीति जनसेवा का माध्यम थी, इसी तरह धर्म और चिकित्सा जनकल्याण के लिए थे किंतु सब उलट गया। अब सब धन बनाने में लग गए हैं। हालांकि जीवन में पैसा भी बहुत जरूरी है, किंतु जिस तरह से जितना पैसा अर्जित किया जा रहा है, वह गलत है। अर्थजीवन का माध्यम होना चाहिए, लक्ष्य बन जाना ठीक नहीं हैं। आज जो हो रहा है, वह पतन की चरम सीमा है।
देश के हालात पर नीरज चिंतित हो उठते हैं। वे कहते हैं कि आज जो चल रहा है, वह देश की गुलामी का कारण बनेगा। विदेशी उद्योग का तेजी से देश में आना खतरनाक है। इससे हमारे उद्योग धंधे बंद हो रहे हैं। वे देश में बढ़ती चोरी डकैती के लिए जनसंख्या वृद्घि को जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि जनंसख्या वृद्घि को रोकेबिना देश का विकास संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रति वर्ष दो लाख दस करोड़ बच्चे जन्म ले रहे हैं, इनमें से साठ लाख प्रतिवर्ष मर जाते हैं। इसके बारे में कोई नहीं सोच रहा है। वोट के चक्कर में सब देश क ो बरबाद करने पर तुले बैठे हैं।
Amar Ujala me 17 december me prakashit
Tuesday, December 14, 2010
25वें वर्ष में अमर उजाला ने किया प्रवेश, सम्मानित हुए कई हमसफर
सच के जोश के साथ मनी रजत जयंती
12 dicmeber 2010
मेरठ। यह सिर्फ गर्व और संतोष का मौका नहीं था। यह मौका था उत्साह के साथ झूमने-गाने के साथ ही उन पलों को याद करने का भी जिन पलों में ‘अमर उजाला’ ने पूरी शिद्दत के साथ सच का साथ दिया और जिनकी बदौलत उसने सफलतापूर्वक अपनी स्थापना के 25 साल पूरे किए। मोहकमपुर स्थित संस्थान कार्यालय में रविवार को आयोजित रजत जयंती समारोह में दिन भर रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। इस मौके पर संस्थान ने उन ‘हमसफरों’ को भी सम्मानित किया जो तमाम अच्छे-बुरे हालात में अडिग ‘अमर उजाला’ के साथ बने रहे।
समारोह में प्रकाशन क्षेत्र के विभिन्न शहरों और इलाकों से आए लोगों ने अमर उजाला से जुड़े अपने संस्मरण सुनाए। साथ ही ऐसे कई किस्से सुनाए जिसने साबित किया कि कैसे ‘अमर उजाला’ ने निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए किसी के सामने न झुकने का अपना व्रत बनाए रखा। चाहे वह 1987 के दंगे रहे हों या फिर रामपुर का लाठीचार्ज। समारोह में ‘अमर-उजाला’ के स्थानीय संपादक सूर्यकांत द्विवेदी, महाप्रबंधक भवानी शर्मा, वरिष्ठ समाचार संपादक सुनील शाह ने ‘अमर उजाला’ के मेरठ संस्करण के प्रकाशन के समय से ही जुड़े रहे लोगों को उपहार और नारियल देकर सम्मानित किया।
सम्मानित लोगों में नगीना से अशोक कुमार जैन, हल्दौर से राजेंद्र सिंह, कालागढ़ से माहेश्वरी ब्रदर्स, धामपुर से दिनेश चंद्र अग्रवाल, मोरना से राजेंद्र राठी, जानीखुर्द से राकेश कुमार जिंदल, धामपुर से नवीन न्यूज एजेंसी, रामपुर मनिहारन से सतीश कुमार सचदेवा, छुटमलपुर से अशोक न्यूज एजेंसी, मोरना से गुढ़ल न्यूज एजेंसी, दबथुआ से रामफल गुप्ता, जानीखुर्द से जिंदल न्यूज एजेंसी, मुजपफरनगर से देवेंद्र खबरबंदा, मेरठ से रामभरोसे गुप्ता, रफीक अहमद, राजेंद्र मौर्या, रामटेक शर्मा, सईद अहमद, अशोक प्रियरंजन, अशोक मधुप, ललित पुनैठा, संजय शर्मा, इंद्रपाल मवाना के राजपाल राजू शामिल रहे।
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सतरंगी रंगों में रंगा कार्यालय
25वीं सालगिरह पर पूरा अमर-उजाला कार्यालय सजावट के रंगों में रंगा। प्रत्येक विभाग ने थीम बेस्ड सजावट कर अपने कार्यालय को सजाया। फूलों और गुब्बारों से कार्यालय को सजाया गया। संपादकीय विभाग ने चित्रों पर प्रेरणास्पद संदेश लिखकर लोगों को कर्मठता, ईमानदारी, आत्मविश्वास, प्रेरणा के संदेश दिए। लाइब्रेरी विभाग ने समाचार पत्र का पहला संस्करण लगाकर पुरानी यादें ताजा कीं। तकनीकी विभाग ने 25वीं सालगिरह की थीम लेकर फूलों से खास सजावट की। भारतीय संस्कृ ति और शैली को ध्यानार्थ करते हुए कार्यालय को मोरपंख से सजाया।
25वीं सालगिरह के अवसर पर कार्यालय में खास रंगोली सजाई गई। विभागों की फिमेल कार्यकर्ताओं ने फूल, कुट्टी और रंगों के सामंजस्य से पारंपरिक रंगोली बनाई। फूल, गणेश, दीपक और बेल के डिजायन वाली रंगोली ने पूरे कार्यालय की शोभा बढ़ा दी।
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कंप्यूटर पर भी छाया
सिल्वर जुबली समारोह में सभी लोग भाग ले रहे थे। कार्यालयीन सजावट के साथ कंप्यूटर्स पर भी अमर-उजाला छाया रहा। डिजायनर मुकेश ऋषि ने खास स्क्रीन सेवर बनाया। जो सभी कंप्यूटर्स पर देखने मिला।
मोहकमपुर स्थित अमर उजाला कार्यालय में 25वीं वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में केक काटते अशोक मधुप, नवीन कुमार, और इंद्रपाल।
12 dicmeber 2010
मेरठ। यह सिर्फ गर्व और संतोष का मौका नहीं था। यह मौका था उत्साह के साथ झूमने-गाने के साथ ही उन पलों को याद करने का भी जिन पलों में ‘अमर उजाला’ ने पूरी शिद्दत के साथ सच का साथ दिया और जिनकी बदौलत उसने सफलतापूर्वक अपनी स्थापना के 25 साल पूरे किए। मोहकमपुर स्थित संस्थान कार्यालय में रविवार को आयोजित रजत जयंती समारोह में दिन भर रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। इस मौके पर संस्थान ने उन ‘हमसफरों’ को भी सम्मानित किया जो तमाम अच्छे-बुरे हालात में अडिग ‘अमर उजाला’ के साथ बने रहे।
समारोह में प्रकाशन क्षेत्र के विभिन्न शहरों और इलाकों से आए लोगों ने अमर उजाला से जुड़े अपने संस्मरण सुनाए। साथ ही ऐसे कई किस्से सुनाए जिसने साबित किया कि कैसे ‘अमर उजाला’ ने निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए किसी के सामने न झुकने का अपना व्रत बनाए रखा। चाहे वह 1987 के दंगे रहे हों या फिर रामपुर का लाठीचार्ज। समारोह में ‘अमर-उजाला’ के स्थानीय संपादक सूर्यकांत द्विवेदी, महाप्रबंधक भवानी शर्मा, वरिष्ठ समाचार संपादक सुनील शाह ने ‘अमर उजाला’ के मेरठ संस्करण के प्रकाशन के समय से ही जुड़े रहे लोगों को उपहार और नारियल देकर सम्मानित किया।
सम्मानित लोगों में नगीना से अशोक कुमार जैन, हल्दौर से राजेंद्र सिंह, कालागढ़ से माहेश्वरी ब्रदर्स, धामपुर से दिनेश चंद्र अग्रवाल, मोरना से राजेंद्र राठी, जानीखुर्द से राकेश कुमार जिंदल, धामपुर से नवीन न्यूज एजेंसी, रामपुर मनिहारन से सतीश कुमार सचदेवा, छुटमलपुर से अशोक न्यूज एजेंसी, मोरना से गुढ़ल न्यूज एजेंसी, दबथुआ से रामफल गुप्ता, जानीखुर्द से जिंदल न्यूज एजेंसी, मुजपफरनगर से देवेंद्र खबरबंदा, मेरठ से रामभरोसे गुप्ता, रफीक अहमद, राजेंद्र मौर्या, रामटेक शर्मा, सईद अहमद, अशोक प्रियरंजन, अशोक मधुप, ललित पुनैठा, संजय शर्मा, इंद्रपाल मवाना के राजपाल राजू शामिल रहे।
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सतरंगी रंगों में रंगा कार्यालय
25वीं सालगिरह पर पूरा अमर-उजाला कार्यालय सजावट के रंगों में रंगा। प्रत्येक विभाग ने थीम बेस्ड सजावट कर अपने कार्यालय को सजाया। फूलों और गुब्बारों से कार्यालय को सजाया गया। संपादकीय विभाग ने चित्रों पर प्रेरणास्पद संदेश लिखकर लोगों को कर्मठता, ईमानदारी, आत्मविश्वास, प्रेरणा के संदेश दिए। लाइब्रेरी विभाग ने समाचार पत्र का पहला संस्करण लगाकर पुरानी यादें ताजा कीं। तकनीकी विभाग ने 25वीं सालगिरह की थीम लेकर फूलों से खास सजावट की। भारतीय संस्कृ ति और शैली को ध्यानार्थ करते हुए कार्यालय को मोरपंख से सजाया।
25वीं सालगिरह के अवसर पर कार्यालय में खास रंगोली सजाई गई। विभागों की फिमेल कार्यकर्ताओं ने फूल, कुट्टी और रंगों के सामंजस्य से पारंपरिक रंगोली बनाई। फूल, गणेश, दीपक और बेल के डिजायन वाली रंगोली ने पूरे कार्यालय की शोभा बढ़ा दी।
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कंप्यूटर पर भी छाया
सिल्वर जुबली समारोह में सभी लोग भाग ले रहे थे। कार्यालयीन सजावट के साथ कंप्यूटर्स पर भी अमर-उजाला छाया रहा। डिजायनर मुकेश ऋषि ने खास स्क्रीन सेवर बनाया। जो सभी कंप्यूटर्स पर देखने मिला।
मोहकमपुर स्थित अमर उजाला कार्यालय में 25वीं वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में केक काटते अशोक मधुप, नवीन कुमार, और इंद्रपाल।
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