Monday, November 24, 2025

टुन टुन

 उमा देवी खत्री, जिन्हें पूरा देश प्यार से टुनटुन के नाम से जानता है, हिंदी फिल्म जगत की पहली और अत्यंत लोकप्रिय महिला कॉमेडियन थीं। उन्होंने अपने विशिष्ट अंदाज़, अनोखी आवाज़, खास व्यक्तित्व और हास्य से भरे अभिनय से एक ऐसा मुकाम बनाया, जिसे आज भी कोई नहीं भूल सकता। वे केवल हंसी की दुनिया की सितारा ही नहीं थीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और प्रतिभा की मिसाल भी थीं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि कठिन परिस्थितियाँ भी यदि मन में दृढ़ निश्चय हो तो महान सफलता की राह रोक नहीं सकतीं।

उमा देवी का जन्म 11 जुलाई 1923 को उत्तर प्रदेश में हुआ। बचपन अत्यंत कठिनाइयों से भरा था। कम उम्र में ही माता-पिता का साया उठ गया और वे अनाथ हो गईं। गरीबी, अकेलापन और जीवन की संघर्षपूर्ण परिस्थितियों ने उन्हें समय से पहले ही बड़ा बना दिया। लेकिन इन कष्टों के बीच भी उमा देवी के मन में संगीत और कला के प्रति गहरा प्रेम बना रहा। उनकी आवाज़ अत्यंत अनूठी थी—मधुरता और भारीपन का एक ऐसा संगम, जो पहली ही बार सुनने पर ध्यान खींच ले।

जीवन में संघर्ष करते हुए वे मुंबई पहुंचीं और फिल्मों में काम पाने का प्रयास किया। शुरुआती दिनों में उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन प्रतिभा और आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने अपना रास्ता स्वयं बनाया। सबसे पहले उनका नाम उभरकर सामने आया एक गायिका के रूप में। 1947 में उनकी गायकी ने फिल्म जगत को चौंका दिया। “अफसाना लिख रही हूं दिले बेकरार का” जैसे गीतों ने उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया। उस समय की महान गायिका लता मंगेशकर द्वारा उन्हें अत्यंत सम्मान दिया गया और माना जाता है कि लता जी ने उमा देवी को सम्मानपूर्वक यह समझाया कि उनकी आवाज़ का उपयोग एक सीमित दायरे में ही संभव है, और अभिनय की ओर बढ़ना उनके लिए बेहतर राह हो सकती है।

उसी समय से उमा देवी ने अभिनय को अपनी नई दिशा बनाया। उनका भारी-भरकम शरीर, अलग अंदाज़ और सहजता से किए गए हास्य ने उन्हें दर्शकों का सबसे चहेता कलाकार बना दिया। वे कॉमिक भूमिकाओं में इस तरह रच-बस जाती थीं कि कई बार दर्शक केवल उनकी एक झलक से ही हंस पड़ते थे। निर्देशक और कलाकार उन्हें सेट पर “टुनटुन” कहकर बुलाने लगे और यही नाम बाद में उनकी पहचान बन गया। उनका नया नाम टुनटुन फिल्म इतिहास में अमिट हो गया।

1950 और 1960 के दशक में टुनटुन उस दौर की लगभग हर बड़ी फिल्म में हास्य भूमिका में दिखाई देती थीं। वे गुरु दत्त, देव आनंद, दिलीप कुमार, किशोर कुमार, मेहमूद और राज कपूर जैसे सितारों के साथ काम कर चुकी थीं। “आर-पार”, “मिस्टर एंड मिसेज 55”, “अड़चनें”, “सीआईडी”, “दिल्ली का ठग” और “कश्मीर की कली” जैसी फिल्मों में उनके हास्य प्रदर्शन को दर्शक आज भी याद करते हैं। उनकी विशेषता केवल मज़ाक करना ही नहीं थी, बल्कि वे दैनंदिन जीवन की छोटी-छोटी बातों में भी हास्य ढूंढ लेती थीं और उसे पर्दे पर इस तरह प्रस्तुत करती थीं कि किरदार जीवंत हो उठता था।

टुनटुन का हास्य कभी भी भद्दा नहीं होता था। वे शालीन, मधुर और स्वाभाविक अभिनय से हंसी पैदा करती थीं। महिलाओं के लिए हास्य भूमिका निभाना उस दौर में आसान नहीं था। समाज, फिल्म उद्योग और दर्शकों की दृष्टि में महिला कलाकारों के लिए एक तय दायरा था। लेकिन टुनटुन ने इस दायरे को तोड़ा और साबित किया कि चाहे अभिनय का कोई भी क्षेत्र हो—महिलाएं उसमें उत्कृष्टता प्राप्त कर सकती हैं। वे बताती थीं कि हंसाने वाला कलाकार लोगों के मन में सबसे गहरा असर छोड़ता है, क्योंकि वह दुखों के बीच मुस्कान पैदा करता है।

टुनटुन का निजी जीवन भी संघर्षों से भरा था, परंतु उन्होंने कभी इसे अपने करियर पर हावी नहीं होने दिया। वे एक समर्पित पत्नी और मां थीं। अपने परिवार के प्रति उनका प्रेम और जिम्मेदारी भी उतनी ही दृढ़ थी जितनी उनकी कला के प्रति समर्पण। काम के साथ वे हर परिस्थिति में अपने परिवार को सँभालती रहीं और अपने बच्चों को अच्छी परवरिश दी।

अपने लंबे करियर में टुनटुन ने लगभग 200 से अधिक फिल्मों में काम किया। उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि निर्माता-निर्देशक फिल्में लिखते समय विशेष रूप से हास्य दृश्यों में टुनटुन का चरित्र जोड़ देते थे। उनका नाम ही दर्शकों को थिएटर तक खींच लाने के लिए काफी होता था। 1990 के दशक तक वे फिल्म जगत से कुछ दूर हो गईं, लेकिन उनकी पहचान, लोकप्रियता और सम्मान में कभी कोई कमी नहीं आई।

24 नवंबर 2003 को टुनटुन का निधन हो गया। उनके जाने के बाद भारतीय सिनेमा ने एक ऐसे कलाकार को खो दिया, जिसने न केवल हंसी दी, बल्कि फिल्म जगत में महिलाओं के लिए हास्य भूमिकाओं का मार्ग भी प्रशस्त किया। वे एक ऐसी कलाकार थीं जिनका योगदान सिर्फ अभिनय तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने समाज को यह संदेश दिया कि संघर्ष किसी भी सपने को रोक नहीं सकता।

अंततः, उमा देवी खत्री ‘टुनटुन’ भारतीय फिल्मों की वह धरोहर हैं, जिन्होंने भारतीय सिनेमा में हास्य अभिनय को नए आयाम दिए। वे हंसी की रानी थीं—एक ऐसी रानी, जिसकी मुस्कान और आवाज़ आज भी लोगों के दिलों में गूंजती है। उनका जीवन प्रेरणा है कि प्रतिभा, साहस और आत्मविश्वास से हर कठिनाई पर विजय पाई जा सकती है।




शिया धर्मगुरु कल्बे सादिक : शिक्षा, सुधार और एकता के प्रवर्तक

 कल्बे सादिक आधुनिक भारत के उन विशिष्ट धर्मगुरुओं में से रहे, जिन्होंने धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठकर समाज में एकता, शिक्षा और साम्प्रदायिक सौहार्द का अद्भुत संदेश दिया। वे शिया मुस्लिम समुदाय के प्रतिष्ठित विद्वान, चिंतक और सुधारक थे, लेकिन उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान थी—समाज के हर वर्ग के लिए समान प्रेम और सेवा की भावना। वे धार्मिक उपदेशों को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखते थे, बल्कि उन्हें जीवन में उतारकर दिखाते थे। इसी कारण वे देशभर में सम्मान और विश्वास के प्रतीक बने।

कल्बे सादिक का जन्म 22 जून 1939 को लखनऊ शहर के एक प्रतिष्ठित धार्मिक परिवार में हुआ। उनके पिता मौलाना कल्बे हुसैन एक प्रसिद्ध आलिम थे। घर का वातावरण धार्मिक, विद्वत्तापूर्ण और समाजसेवा के संस्कारों से भरा हुआ था। बचपन से ही कल्बे सादिक की रूचि अध्ययन, चिंतन और तर्कपूर्ण चर्चा में रहती थी। उन्होंने अरबी, फारसी, उर्दू, इतिहास, इस्लामी दर्शन और अन्य धार्मिक विषयों में गहन अध्ययन किया। बाद में इंग्लैंड से आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर वे एक प्रखर वक्ता और गहन विचारक के रूप में विकसित हुए।

धर्मगुरु होने के बावजूद उनका दृष्टिकोण आधुनिक, वैज्ञानिक और प्रगतिशील था। वे हमेशा कहते थे कि “यदि शिक्षा नहीं है तो धर्म का असली उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता।” इसी विचारधारा के चलते उन्होंने शिक्षा को अपने जीवन का मुख्य साधन बना लिया। उन्होंने लखनऊ में तल्लीम-ओ-तरबिय्यत आंदोलन को नई गति दी और गरीब तथा वंचित बच्चों की पढ़ाई के लिए कई संस्थान स्थापित किए। टूटी पैर वाली कुर्सियों और बिना बिजली के कमरों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए उन्होंने आधुनिक स्कूल, कॉलेज और टेक्निकल संस्थान खड़े किए। उनकी यह सोच थी कि सिर्फ मदरसों की शिक्षा पर्याप्त नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान, गणित और तकनीक में भी मुस्लिम समाज को आगे आना होगा।

कल्बे सादिक केवल शिक्षा सुधारक ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक सुधार के भी बड़े पैमाने पर प्रवर्तक थे। उन्होंने दहेज के खिलाफ बहुत मजबूत आवाज उठाई। वे मंचों से खुलकर कहते थे कि दहेज लेना या देना इस्लाम के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने अपने समुदाय में सादगीपूर्ण निकाह का अभियान चलाया और स्वयं भी अपने घराने में इसका पालन किया। वे सामाजिक बुराइयों को धार्मिक आदेशों के माध्यम से नहीं, बल्कि तर्क, करुणा और मानवीयता के आधार पर समझाते थे।

भारत में धार्मिक तनाव और साम्प्रदायिक संघर्ष लंबे समय से चुनौती रहे हैं। ऐसे समय में कल्बे सादिक हिंदू-मुस्लिम एकता के सबसे सशक्त चेहरों में से रहे। उनकी तकरीरों में हमेशा भाईचारे, राष्ट्रीय एकता और मानवीय मूल्यों का संदेश होता था। वे कहते थे कि “धर्म बांटता नहीं, जोड़ता है। जो जोड़ता नहीं, वह धर्म नहीं।” उनकी सभाओं में सभी धर्मों के लोग शामिल होते थे और उनकी बातों से प्रेरणा लेते थे। वे राम और रहीम की एकता पर जोर देते थे और भारत की सांझी विरासत को एक अमूल्य धरोहर बताते थे।

कल्बे सादिक का व्यक्तित्व अत्यंत सरल, सौम्य और विनम्र था। वे बड़े से बड़े मंच पर भी सादगी भरा पहनावा रखते थे और सामान्य भाषा में जटिल धार्मिक विषयों को समझा देते थे। उनकी शैली में संयम, करुणा और गंभीरता का अनोखा मेल होता था। वे आलोचना से घबराते नहीं थे और न ही किसी विवाद में कठोरता दिखाते थे। उनकी वाणी में ऐसी मिठास थी कि कटु से कटु दिल भी पिघल जाता था।

स्वास्थ्य कमजोर रहने के बावजूद वे आखिरी समय तक समाजसेवा और शिक्षा के कार्यों में लगे रहे। उन्होंने गरीबों की सहायता, छात्रवृत्ति कार्यक्रमों और सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा दिया। उनका यह भी मानना था कि यदि समाज को आगे बढ़ाना है तो महिलाओं की शिक्षा अत्यंत आवश्यक है। इसलिए उन्होंने मुस्लिम लड़कियों की पढ़ाई के लिए विशेष प्रयास किए और उनके लिए कई संस्थान स्थापित कराए।





कल्बे सादिक ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि धर्म का उद्देश्य मनुष्य को श्रेष्ठ बनाना है, न कि उसे दूसरों से अलग करना। वे धार्मिक श्रेष्ठता की जगह मानवीय श्रेष्ठता को महत्व देते थे। वे इस्लाम को ज्ञान, तर्क और प्रेम का धर्म मानते थे और उसकी व्याख्या आधुनिक संदर्भों में करते थे। उनकी यह विशेषता उन्हें सिर्फ एक धर्मगुरु नहीं, बल्कि एक समाज-सुधारक और मानवतावादी चिंतक के रूप में स्थापित करती है।

24 नवंबर 2020 को उनके निधन से देश ने एक अद्भुत व्यक्तित्व खो दिया। परंतु उनके विचार, उनके कार्य और उनकी शिक्षाएं आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं। उनसे जुड़ी संस्थाएं आज भी हजारों बच्चों और गरीब परिवारों का जीवन बदल रही हैं। उनकी याद में आयोजित कार्यक्रमों में अक्सर एक ही बात दोहराई जाती है—“कल्बे सादिक ने इंसानियत का पैगाम दिया, और यह पैगाम कभी नहीं मिटेगा।”

अंततः, कल्बे सादिक का जीवन भारतीय मुस्लिम समाज ही नहीं बल्कि पूरे देश की सामाजिक-सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। वे एक ऐसे नेता थे जिन्होंने शब्दों से ज्यादा कार्यों से यह साबित किया कि शिक्षा, भाईचारा और मानवता ही समाज को सही दिशा दे सकते हैं। उनका जीवन आज भी नई पीढ़ी के लिए एक प्रकाशस्तंभ की तरह है।

सर छोटू राम : किसान आंदोलनों के आधार स्तंभ

 







सर छोटू राम भारतीय राजनीति के उन विरले नेताओं में गिने जाते हैं जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन किसानों, मजदूरों और ग्रामीण समाज के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। उन्हें आधुनिक भारत का किसान मसीहा कहा जाता है। उनका व्यक्तित्व केवल एक नेता का नहीं बल्कि सामाजिक सुधारक, दूरदर्शी चिंतक और न्यायप्रिय प्रशासक का रहा। उनके विचारों और नीतियों ने उत्तर भारत के ग्रामीण समाज को नई दिशा दी और बाद में स्वतंत्रता आंदोलन में ग्रामीण चेतना को मजबूत किया।

सर छोटू राम का जन्म 24 नवंबर 1881 को तत्कालीन पंजाब प्रांत के रोहतक जिले के गढ़ी सांपला गांव में हुआ। उनका मूल नाम राऊ रिचपाल था, जिसे बाद में छोटू राम के रूप में जाना गया। सामान्य कृषक परिवार में जन्म लेने के कारण उन्होंने बचपन से ही किसानों की कठिनाइयों को नजदीक से देखा। यही अनुभव उनके पूरे जीवन के आधार बने और यही कारण था कि उन्होंने पढ़ाई-लिखाई के बाद भी शहरों की चमक-दमक से दूर रहकर ग्रामीण भारत की समस्याओं को केंद्र में रखा।

उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव और जिला मुख्यालय में पूरी की। आगे की उच्च शिक्षा के लिए वे दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज गए और फिर कानून की पढ़ाई के लिए आगरा और अलाहाबाद में अध्ययन किया। वे अत्यंत तेजस्वी, स्पष्टवादी और मेहनती विद्यार्थी थे। कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वकालत शुरू की, परंतु उनका मन हमेशा किसानों और मजदूरों की दुर्दशा पर चिंतित रहता था। इसी चिंता ने उन्हें राजनीति और सामाजिक सेवा की ओर मोड़ा।

राजनीति में प्रवेश के बाद उनका लक्ष्य बहुत स्पष्ट था—किसानों को साहूकारों और जमींदारों की शोषणकारी व्यवस्था से मुक्त कराना। उन्होंने यूनियनिस्ट पार्टी के माध्यम से पंजाब के ग्रामीण समाज को संगठित किया। उस समय किसानों पर अत्यधिक कर्जा होता था और सूदखोरी की वजह से उनकी जमीनें लगातार छीनी जा रही थीं। सर छोटू राम ने इस समस्या को जड़ से समझा और किसानों के लिए ऐतिहासिक कानून बनवाए। उनमें सबसे महत्वपूर्ण था—पंजाब राहत-ए-कर्ज अधिनियम। इस कानून ने किसानों को साहूकारों की पकड़ से काफी हद तक मुक्त कराया और उनकी जमीनों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसके अलावा उन्होंने पंजाब कृषि उत्पादक विपणन अधिनियम बनवाया, जिससे किसानों को अपने उत्पादों की बेहतर कीमत मिल सके। मंडियों की व्यवस्था को नियंत्रित कर उन्होंने बिचौलियों के शोषण पर रोक लगवाई। सर छोटू राम के प्रयासों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा का संचार हुआ। उन्होंने किसान सभा, सहकारी समितियों और ग्रामीण विकास योजनाओं को बढ़ावा दिया। वे हमेशा जोर देते थे कि भारत की असली शक्ति गांवों में है और यदि गांव मजबूत होंगे, तो राष्ट्र भी मजबूत होगा।

सर छोटू राम ने केवल किसानों के आर्थिक हितों की ही नहीं, बल्कि उनके सामाजिक उत्थान की भी चिंता की। उन्होंने समाज में फैली छुआछूत, जातिगत भेदभाव और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। वे शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम मानते थे। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका मानना था कि शिक्षित किसान ही अपने अधिकारों और कर्तव्यों को बेहतर तरीके से समझ सकता है।

सर छोटू राम अत्यंत सादगीपूर्ण और उच्च नैतिक मूल्यों वाले व्यक्ति थे। सत्ता में रहते हुए उन्होंने कभी भी व्यक्तिगत लाभ नहीं उठाया। उनका जीवन अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी का उदाहरण रहा। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद उनके विरोधी भी उनकी सत्यनिष्ठा और दूरदर्शिता का सम्मान करते थे। ब्रिटिश सरकार ने सामाजिक योगदान और प्रशासनिक दक्षता को देखते हुए उन्हें “सर” की उपाधि दी, परंतु उन्होंने हमेशा खुद को किसानों का सेवक ही माना।

उनका प्रभाव इतना व्यापक था कि उन्हें आज भी हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के ग्रामीण समाज में गहरी श्रद्धा से याद किया जाता है। उनकी नीतियों से लाभान्वित किसान उन्हें अपने पथप्रदर्शक के रूप में देखते हैं। कहा जाता है कि यदि सर छोटू राम का निधन 1945 में न हुआ होता, तो स्वतंत्र भारत की कृषि नीति और भी अधिक किसान-केंद्रित होती।

सर छोटू राम का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो समाज के वंचित वर्गों को सशक्त बनाए, जो अपने पद का उपयोग सेवा और सुधार के लिए करे, न कि स्वार्थ के लिए। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे—विशेषकर आज के दौर में, जब किसान मुद्दे चर्चा के केंद्र में हैं।

अंततः, सर छोटू राम केवल एक नेता नहीं थे, बल्कि एक आंदोलन थे—ग्रामीण चेतना का, न्याय के संघर्ष का और भारत के किसानों को सम्मान दिलाने का। उनका जीवन देश के भविष्य के लिए प्रेरणा-स्रोत है और रहेगा।

Sunday, November 23, 2025

आर्य समाज नेता और सांसद प्रकाशवीर शास्त्री : धर्म, राष्ट्र और संस्कृति के तेजस्वी पुरोधा

 



प्रकाशवीर शास्त्री भारतीय राजनीति, धर्म और समाज-सुधार की उन दुर्लभ विभूतियों में से थे जिन्होंने अपने व्यक्तित्व, विद्वता और तेजस्वी वाणी के बल पर न केवल आर्य समाज को नई दिशा दी, बल्कि भारतीय संसद में भी भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद की सशक्त आवाज बनकर उभरे। वे एक ऐसे नेता थे जिनका संपूर्ण जीवन वेद-मार्ग, राष्ट्र-सेवा और सामाजिक जागरण के लिए समर्पित रहा। विद्वान, संत, विचारक और कर्मयोगी — इन सभी विशेषणों को वे सही अर्थों में सार्थक करते थे।

प्रकाशवीर शास्त्री का जन्म 30 दिसंबर 1924 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के मवाना क्षेत्र के टिटोली गांव में हुआ। उनका मूल नाम प्रकाश चंद्र था। बचपन से ही उनमें अध्यात्म, अध्ययन और वाक्चातुर्य की अद्भुत प्रवृत्ति दिखाई देती थी। घर का वातावरण धार्मिक था और परिवार का झुकाव वैदिक परंपरा की ओर था। उन्हें संस्कृत और वेदों का अध्ययन कराने हेतु गुरुकुल भेजा गया, जहाँ उनकी प्रतिभा तेज़ी से निखरती चली गई। बाद में उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय और गुरुकुल कांगड़ी से उच्च शिक्षा प्राप्त की और संस्कृत साहित्य में “शास्त्री” की उपाधि के साथ वे एक सिद्धहस्त विद्वान के रूप में सामने आए।

आर्य समाज की सुधारवादी, तार्किक और वैदिक विचारधारा ने प्रकाशवीर शास्त्री को गहराई से प्रभावित किया। वे केवल अनुयायी नहीं रहे, बल्कि संगठन के अग्रणी चिंतक और प्रवक्ता बने।
उनकी प्रवचन शैली अत्यंत ओजस्वी थी। वेद, उपनिषद, संस्कृत साहित्य और तर्क—इन सभी विषयों पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि वे पूरे देश में आर्य समाज के सबसे प्रभावशाली वक्ताओं में गिने जाने लगे।

आर्य समाज के मंचों से उन्होंने—अस्पृश्यता के उन्मूलन,समानता, शिक्षा के प्रसार, नशाबंदी,स्वदेशी,और वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना जैसे मुद्दों पर प्रभावी अभियान चलाए। उनकी वाणी में सत्य और तर्क की ताकत थी, इसलिए वे आम लोगों से लेकर विद्वानों तक सब पर गहरा प्रभाव डालते थे।


सामाजिक सुधारों के योद्धा

प्रकाशवीर शास्त्री ने अपना अधिकांश जीवन समाज में व्याप्त कुरीतियों को चुनौती देने में लगाया। उन्होंने जाति-विभेद, अंधविश्वास, बाल-विवाह, पाखंड और वैदिक मार्ग से हटकर चली आ रही विकृतियों के खिलाफ लगातार आवाज उठाई।

उनका मानना था कि भारत की असली शक्ति उसकी संस्कृति है, और यह शक्ति तभी प्रकट होगी जब समाज शिक्षित, संगठित और नैतिक मूल्यों से संपन्न बनेगा।
वे युवाओं को वैदिक ज्ञान, वैज्ञानिक सोच और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा देने के लिए सदैव तत्पर रहते थे।

राजनीतिक जीवन का आरंभ

उनकी लोकप्रियता, विद्वत्ता और समाज में प्रभाव के कारण उन्हें राजनीति में आने का निमंत्रण मिला, परंतु वे सत्ता से ज्यादा सेवा को महत्व देते थे। फिर भी, जब महसूस हुआ कि संसद देश की निर्णायक संस्था है और वहां भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवादी विचारधारा की सशक्त आवाज की आवश्यकता है, तब उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा।वे 1967 में तीसरी लोकसभा के लिए चुने गए। शास्त्री जी आर्य समाज, वेद-धर्म और राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दों पर संसद में अत्यंत तार्किक, प्रभावी और निर्भीक ढंग से अपनी बात रखते थे।उनके भाषण न सिर्फ तथ्यपूर्ण होते थे, बल्कि उनमें वैदिक संस्कृति का ओज भी होता था। यही कारण है कि शत्रु-दल के नेता भी उनका सम्मान करते थे।


प्रकाशवीर शास्त्री ने संसद में—धर्मांतरण रोकने, कश्मीर नीति, शिक्षा सुधार, भारतीय भाषाओं के संवर्धन,गौ-रक्षा,और राष्ट्रीय चरित्र निर्माण जैसे मुद्दों पर अपनी प्रभावी आवाज उठाई।

वे हिंदी के प्रबल समर्थक थे। उनका मत था कि भारत की पहचान उसकी मातृभाषा से है और शासन-प्रशासन में भारतीय भाषाओं का उपयोग बढ़ाना आवश्यक है। संसद में कई बार उन्होंने संस्कृत और हिंदी के पक्ष में ऐतिहासिक भाषण दिए, जिन्हें आज भी विद्वान लोग उदाहरण के रूप में उद्धृत करते हैं।

वेद-धर्म और भारतीयता के प्रचारक

शास्त्री जी ने देश के कोने-कोने में जाकर वैदिक धर्म और संस्कृत साहित्य के पुनर्जागरण का अभियान चलाया। वे कहते थे—
“भारत की आत्मा वेदों में है; यदि हम वेदों से दूर हो गए तो हमारी संस्कृति खो जाएगी।”उनकी प्रवचन शैली लोगों के मन में वैदिक आस्था का संचार करती थी। वे logic-based spirituality के पक्षधर थे—जहां धर्म अंधविश्वास नहीं, बल्कि ज्ञान और अनुशासन का मार्ग है।

लेखन और विचारधारा

प्रकाशवीर शास्त्री केवल वक्ता ही नहीं, उच्चकोटि के लेखक भी थे।
उनकी कई पुस्तकें, निबंध और भाषण आज भी आर्य समाज और वैदिक साहित्य के महत्वपूर्ण ग्रंथों में गिनी जाती हैं।

उनका लेखन—प्रखर तर्क,सरल भाषा, और गहरी राष्ट्रीय चेतना से भरा हुआ होता था।

असमय निधन पर शोक

1977 में अचानक उनका निधन हो गया। वे मात्र 52 वर्ष के थे। इतने कम जीवन में उन्होंने जितना काम किया, वह किसी बड़े आंदोलनकारी या आध्यात्मिक नेता के लिए भी प्रेरणा है। उनके जाने से भारतीय राजनीति, आर्य समाज और धर्म-सुधार आंदोलनों को अपूरणीय क्षति पहुँची।

प्रकाशवीर शास्त्री एक ऐसे व्यक्ति थे जिनके व्यक्तित्व में धर्म, राष्ट्र, विद्या और सेवा चारों एक साथ प्रवाहित होती थीं।
वे आर्य समाज के अग्रणी नेता, तेजस्वी वक्ता, विद्वान संस्कृताचार्य, सामाजिक सुधारक और सशक्त सांसद थे।आज भी भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रवाद और वैदिक परंपराओं की चर्चा जब भी होती है, प्रकाशवीर शास्त्री का नाम सम्मानपूर्वक याद किया जाता है। उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि स्पष्ट विचार, उच्च चरित्र और समर्पण से कोई भी व्यक्ति समाज और राष्ट्र के लिए महान कार्य कर सकता है। वे सचमुच भारत के तेजस्वी दीप थे, जिनकी ज्योति आज भी वैदिक सत्य और राष्ट्रभक्ति का प्रकाश फैलाती है।

Saturday, November 22, 2025

मुख्यमंत्री होकर भी अब उछल−कूद नही कर सकेंगे नीतीश कुमार


अशोक मधुप
वरिष्ठ पत्रकार
प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी का ये कथन  इस बार के बिहार के जनादेश पर सही उतरता है कि बिहार दुनिया को राजनीति सिखाता है। इस जनादेश ने जहां विपक्षी दलों को उनकी औकात बता दी,वहीं नीतीश कुमार को भी  बता दिया कि अगले पांच साल भाजपा के बिना गुजारा नही है। मुख्यमंत्री बने रहना है तो भाजपा को साथ लेकर चलना होगा। उसे नजर अंदाज कर मुख्यमंत्री नही रह सकते। इस बार आप  पाला नही बदल पाओगे।  भाजपा के दबाव में काम करना होगा।

बिहार में नई सरकार गठन को लेकर तस्वीर अब काफी हद तक साफ होती दिख रही है। एनडीए गठबंधन के मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार की ही ताजपोशी होगी, जबकि बीजेपी को दो डिप्टी सीएम दिए जाने की चर्चा तेज है।
इस बार भाजपा न सिर्फ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, बल्कि जेडीयू के बगैर भी वह एनडीए के अन्य सहयोगियों के साथ जादुई आंकड़े को पार कर गई । ऐसे में नीतीश कुमार के लिए भाजपा के साथ किसी तरह का बिहार में बार्गेनिंग करना अब सरल नहीं रह गया है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की ओर से यह बार-बार दोहराया गया है कि चुनाव के बाद भी परिणाम चाहे जो भी आएं, गठबंधन के चेहरे नीतीश कुमार ही बने रहेंगे। जेडीयू की ओर से भी यह बात दोहराई गई है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही होंगे। वैसे ये तय है कि ज्यादा सीट मिलने   के कारण नीतीश कुमार के मंत्री मंडल में भी भाजपा के मंत्रियों की संख्या भारी होगी।
बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की ऐतिहासिक जीत ने एक बार फिर बता दिया कि ये चमत्कार  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व, गृहमंत्री अमित शाह की चुनावी रणनीति की देन है। एनडीए की जीत के पीछे उनके 10 प्रमुख वादे पंचामृत गारंटी, रोजगार सृजन, ,महिलाओं के लिए योजनाएं, मुफ्त शिक्षा, कृषि सुधार तथा बुनियादी ढांचे का विकास आदि शामिल है। इस बार के चुनाव की विशेषता यह भी है कि  बिहार की 243 सीट में एनडीए गठबंधन को 202 ,महांगठबंधन को 35, एआईएमआईएम को पांच और अन्य को एक सीट मिली। भाजपा को 89 सीट मिली और वह प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। नीतीश कुमार की जदयू को 85 सीट मिली।  1951 के बाद बिहार में इस बार सबसे ज्यादा  67.13 प्रतिशत मतदान हुआ। ये मतदान  पिछले विधानसभा चुनाव से 9.6 प्रतिशत ज्यादा है। इस बार के मतदान में पुरुषों की हिस्सेदारी 62.98 प्रतिशत रही और महिलाओं की 71.78 प्रतिशत। पुरुषों की तुलना में महिलाओं का मतदान 8.15 प्रतिशत ज्यादा रहा । ऐसा लगता   है कि एनडीए ने एकतरफा बिहार की महिलाओं का विश्वास जीता  है। महागठबंधन की करारी हार बताती है कि चुनावी रैलियों में भीड़ जरूर इकट्ठी हुई, भाषणों में तीखे हमले भी हुए, लेकिन विपक्ष जनता का विश्वास नही जीत सका। इन चुनावों की  बड़ी देन  चिराग पासवान का उभार रहा। उन्होंने यह साबित कर दिया कि वे  भविष्य के निर्णायक खिलाड़ी हैं। सीटों पर उनकी मजबूत पकड़ ने यह बता दिया कि वे आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति को नए सिरे से लिखेंगे।
इस बार के चुनाव में पहली बार ‘जन सुराज पार्टी ‘ नामक एक नया राजनैतिक दल ने भी बिहार की राजनीति में अपनी ज़ोरदार उपस्थिति दर्ज कराने के लिए सभी 243 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए।बड़ी बात यह है कि इस पार्टी के लगभग सभी उम्मीदवार शिक्षित,बुद्धिजीवी,पूर्व नौकर शाह,पूर्व आई ए एस,आई पी एस,वैज्ञानिक,गणितज्ञ तथा शिक्षाविद हैं, किंतु किसी को विजय  नही मिली। जन सुराज पार्टी ‘ के संस्थापक व अकेले रणनीतिकार व स्टार प्रचारक वही प्रशांत किशोर हैं, जो नरेंद्र मोदी व भाजपा से लेकर देश के अधिकांश राजनैतिक दलों व नेताओं के लिये एक पेशेवर के रूप में चुनावी रणनीति तैयार करने के बारे में जाने जाते हैं। पार्टी की बुरी हार ने यह साबित कर दिया कि उनके दावों में कोई दम नही था।

इस बार ऐतिहासिक जीत के बाद बिहार की जनता को एनडीए से अपेक्षाएं भी बहुत हैं। देखना है कि एनडीए  सरकार उनकी अपेक्षाओं पर कैसे खरी उतरती है। एनडीए को सुशासन लाने, रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए काम करने के साथ साथ राज्य में ऐसी भी व्यवस्था करनी होगी कि बिहार में तस्करी से शराब न आ सके। शराब बंदी पूरी तरह और सख्ती से लागू हो। कुल मिलाकर बिहार की जनता ने जो भारी मतदान किया वह जंगलराज, परिवारवाद तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ है। मतदान सुशासन, स्त्री सुरक्षा और पलायन रोकने के पक्ष में है। विपक्ष ने बिहार के जेन- जी को भड़काने का प्रयास किया लेकिन उसने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भरोसा जताया। बिहार के चुनाव परिणाम साधारण  नहीं है। इनका परिणाम भारत के भविष्य के निर्माण की दिशा तय करने वाला है।इस चुनावी जनादेश को जनविश्वास की कसौटी से देखना होगा। विश्लेषकों द्वारा बिहार विधानसभा 2025 चुनाव में  राजग की जीत सुनिश्चित मानी जा रही थी तथापि महागठबंधन की इतनी करारी हार की आशंका किसी को नहीं थी,  राजग और महागठबंधन  के नेताओं को भी नहीं। इन परिणामों ने सभी को चौंकाया है। राजग की अप्रत्याशित जीत, भाजपा नीत मोदी सरकार तथा बिहार में नीतीश सरकार पर जनता के भरोसे की जीत है। बीस वर्ष बाद भी लालू के शासनकाल का जंगलराज जनता भूल नहीं पाई है । बिहार की जनता ने जातिवाद, परिवारवाद, मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीतिक को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। गरीब, महिला, किसान और युवा मतदाता का नया समीकरण स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
बिहार के 2025 विधानसभा चुनाव न केवल एक राजनीतिक जीत है बल्कि लोकतांत्रिक पुनर्पुष्टि का संकेत हैं। एनडीए की जीत स्पष्ट और व्यापक है, जो महिलाओं, जातिगत गठजोड़, संगठनात्मक मजबूती और मजबूत कल्याण नीतियों के मिश्रण से संभव हुई। वहीं, विपक्ष को यह सोचना होगा कि उसका जनसंवाद आखिर कहाँ चूक गया और भविष्य में उसे कैसे समायोजित किया जाए। यह परिणाम बिहार की राजनीति के अगले अध्याय की शुरुआत हो सकती है — लेकिन यह भी सच है कि लोकतंत्र अब और अधिक सक्रिय, उत्तरदायी और बहुआयामी होता जा रहा है। भविष्य में न सिर्फ पार्टियों की राजनीतिक रणनीतियाँ, बल्कि उनके विकास मॉडल और सामाजिक संकल्प भी इस मतदाता-जनादेश द्वारा परख की जाएँगी।
अशोक मधुप
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Friday, October 31, 2025

अमृता प्रीतम : प्रेम, पीड़ा और मानवीय संवेदनाओं की कवयित्री




भारतीय साहित्य में अमृता प्रीतम का नाम स्त्री चेतना, संवेदना और प्रेम के सशक्त स्वर के रूप में अमर है। उन्होंने न केवल पंजाबी साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि हिंदी साहित्य को भी नई दिशा दी। अमृता प्रीतम की रचनाओं में एक औरत की आत्मा बोलती है—जो समाज की बंदिशों के बावजूद अपनी पहचान और अपने प्रेम के लिए संघर्ष करती है। वह कवयित्री ही नहीं, बल्कि कहानीकार, उपन्यासकार, निबंधकार और विचारक भी थीं।


प्रारंभिक जीवन


अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त 1919 को गुजरांवाला (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनके पिता करतार सिंह हितकारी एक कवि और विद्वान थे, जबकि माता हरनाम कौर धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। अमृता का बचपन स्नेह और संस्कारों में बीता, परंतु जब वह 11 वर्ष की थीं, तभी उनकी माँ का निधन हो गया। इस घटना ने अमृता के भीतर गहरी संवेदना और अकेलेपन की अनुभूति भर दी, जो आगे चलकर उनके लेखन का स्थायी भाव बन गई।


साहित्यिक आरंभ और लेखन यात्रा


अमृता ने बहुत छोटी उम्र से ही लेखन आरंभ कर दिया था। 16 वर्ष की आयु में उनका पहला कविता संग्रह “अमृत लेहरां” प्रकाशित हुआ। प्रारंभिक रचनाओं में रोमानी भावनाएँ थीं, परंतु धीरे-धीरे उनमें सामाजिक यथार्थ और स्त्री अस्मिता की गूंज स्पष्ट होने लगी। विभाजन के दौर में उन्होंने जिस दर्द को देखा, उसे उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कविता “आज आखां वारिस शाह नूं” में उकेरा—


> "अज आख्या वारिस शाह नूं, कितों कबर विच्चों बोल..."

यह कविता भारत-पाकिस्तान के विभाजन के दौरान हुई मानवीय त्रासदी का करुण चित्रण है। इस एक कविता ने अमृता प्रीतम को अमर कर दिया।




प्रमुख रचनाएँ


अमृता प्रीतम ने 100 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिनमें कविता, उपन्यास, आत्मकथा, कहानी संग्रह और निबंध शामिल हैं।

उनकी प्रसिद्ध कृतियों में —


कविता संग्रह: आखां वारिस शाह नूं, नागमणि, कागज़ ते कैनवास, संगम, सत्तावन वर्षों के बाद।


उपन्यास: पिंजर, धरती सागर ते सीमा, रसीदी टिकट, कोरे कागज, दूआरे, जिंदगीनामां।

इनमें “पिंजर” (1948) को विशेष प्रसिद्धि मिली। यह उपन्यास भारत विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जिसमें एक स्त्री ‘पूरो’ की कहानी के माध्यम से अमृता ने स्त्री की पीड़ा, समाज की कठोरता और मानवीय करुणा का अद्भुत चित्रण किया है। इस उपन्यास पर बाद में एक लोकप्रिय फिल्म भी बनी।



स्त्री चेतना की स्वरधारा


अमृता प्रीतम भारतीय समाज की उन कुछ लेखिकाओं में से थीं, जिन्होंने औरत के भीतर की भावनाओं, उसकी स्वतंत्रता और उसकी पहचान को बड़ी निडरता से व्यक्त किया। उन्होंने प्रेम को केवल रोमांटिक दृष्टि से नहीं, बल्कि आत्मा की स्वतंत्रता के रूप में देखा। उनकी कविताएँ और गद्य रचनाएँ पुरुष-प्रधान समाज में औरत की अपनी जगह की तलाश का दस्तावेज़ हैं।


निजी जीवन और प्रेम


अमृता प्रीतम का निजी जीवन भी उतना ही संवेदनशील और चर्चित रहा जितना उनका साहित्य। 16 वर्ष की आयु में उन्होंने प्रीतम सिंह से विवाह किया, परंतु यह वैवाहिक जीवन बहुत सुखद नहीं रहा। विभाजन के बाद वे दिल्ली आ गईं और रेडियो में काम करने लगीं। धीरे-धीरे उन्होंने पारंपरिक रिश्तों से अलग होकर स्वतंत्र जीवन जीना चुना।


उनके जीवन में प्रसिद्ध कवि साहिर लुधियानवी का नाम गहराई से जुड़ा है। अमृता ने साहिर के प्रति अपने गहरे प्रेम को कभी छिपाया नहीं। उनकी आत्मकथा “रसीदी टिकट” में उन्होंने इस संबंध की अंतरंग झलकियाँ दी हैं। साहिर के प्रति उनके भावों को उन्होंने अपनी अनेक कविताओं में उकेरा। बाद के वर्षों में प्रसिद्ध चित्रकार इमरोज़ उनके जीवन में आए, जिन्होंने अमृता के साथ कई दशकों तक गहरी मित्रता और आत्मिक साझेदारी निभाई। अमृता ने कहा था—


> “इमरोज़ मेरा आज है, और साहिर मेरा बीता हुआ कल।”




साहित्यिक सम्मान और योगदान


अमृता प्रीतम को उनके साहित्यिक योगदान के लिए अनेक पुरस्कार और सम्मान मिले। उन्हें 1956 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1969 में पद्मश्री, 1982 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार और 2004 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। वह स्वतंत्र भारत की पहली प्रमुख पंजाबी महिला लेखिका थीं, जिन्हें इस स्तर पर मान्यता मिली।


उनकी आत्मकथा “रसीदी टिकट” भारतीय आत्मकथात्मक साहित्य की कालजयी कृति मानी जाती है। इसमें उन्होंने न केवल अपने जीवन का लेखा-जोखा दिया, बल्कि अपने समय, समाज और स्त्री की स्थिति पर गहरा विमर्श प्रस्तुत किया।


अंत समय और विरासत


अमृता प्रीतम का निधन 31 अक्टूबर 2005 को दिल्ली में हुआ। उनके साथ इमरोज़ अंत तक रहे। अमृता आज भी भारतीय साहित्य में एक प्रेरणा हैं—एक ऐसी स्त्री लेखिका, जिसने अपनी कलम से समाज की रूढ़ियों को चुनौती दी और प्रेम, मानवीयता तथा स्वतंत्रता के नए आयाम स्थापित किए।


निष्कर्ष


अमृता प्रीतम केवल एक कवयित्री नहीं, बल्कि एक युग थीं। उन्होंने अपने जीवन और लेखन दोनों में यह साबित किया कि स्त्री भी सोच सकती है, लिख सकती है और अपने दिल की बात कह सकती है। उनका साहित्य स्त्री के मौन को शब्द देता है, और उनकी कविताएँ आज भी हर संवेदनशील आत्मा में गूंजती हैं।

Wednesday, October 29, 2025

अस्थिर गठबंधन और युवा बनाम अनुभवी नेतृत्व की जंग बिहार विधानसभा चुनाव 2025:



अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार 

बिहार का 2025 विधानसभा चुनाव राजनीतिक अस्थिरता, नए सिरे से बने गठबंधनों, और युवा बनाम अनुभवी नेतृत्व के बीच सीधे मुकाबले के कारण भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ बन चुका है। यह चुनाव न केवल राज्य के शासन की दिशा तय करेगा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इस बार का चुनावी परिदृश्य पिछले चुनावों से कई मायनों में अलग है, खासकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बार-बार पाला बदलने ने इस जंग को और भी दिलचस्प बना दिया है। यह चुनाव मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का राजनैतिक भविष्य भी तै करेगा। 


बिहार की राजनीति हमेशा से ही गठबंधनों के टूटने और बनने के लिए जानी जाती है, लेकिन 2025 के चुनाव से पहले का घटनाक्रम अभूतपूर्व रहा।जनवरी 2024 में, जनता दल (यूनाइटेड) के नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेतृत्व वाले महागठबंधन को छोड़कर नौवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के साथ मिलकर सरकार बनाई। इस बार एनडीए में प्रमुख रूप से बीजेपी, जदयू और जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (एचएएम) शामिल हैं।

एनडीए गठबंधन विकास और सुशासन के पुराने एजेंडे पर भरोसा कर रहा है, साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय चेहरा एक बड़ा फैक्टर है। हालांकि, नीतीश कुमार के दल-बदल से उपजी विश्वसनीयता का संकट एनडीए के लिए एक चुनौती है। सीट बंटवारे को लेकर कुछ छोटे सहयोगियों में असंतोष की खबरें और मगध जैसे कुछ क्षेत्रों में पिछले चुनाव में एनडीए का कमजोर प्रदर्शन इस गठबंधन के लिए चिंता का विषय है। 

नीतीश कुमार के एनडीए में लौटने के बाद, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के युवा नेता तेजस्वी यादव महागठबंधन के एकमात्र और निर्विवाद नेता बन गए हैं। इस गठबंधन में आरजेडी, कांग्रेस, और वाम दल (CPI, CPI-ML) शामिल हैं। महागठबंधन का मुख्य फोकस तेजस्वी यादव के 'रोजगार और विकास' के वादे पर है। तेजस्वी, अपने पिता लालू प्रसाद यादव के सामाजिक न्याय के आधार को आर्थिक न्याय के साथ जोड़कर एक नया राजनीतिक विमर्श बनाने की कोशिश कर रहे हैं। तेजस्वी यादव खुद को परिवर्तनकारी नेता के रूप में पेश कर रहे हैं, जो 'डबल इंजन' सरकार की कथित विफलता और पुराने जंगलराज के आरोपों का मुकाबला 'युवा और विजनरी' नेता की छवि से कर रहे हैं।

बिहार की राजनीति में जातिगत समीकरण हमेशा से ही निर्णायक रहे हैं। इस चुनाव में भी '4 C' (कास्ट, कैंडिडेट, कैश और कोऑर्डिनेशन) फैक्टर महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। जीतन राम मांझी (HAM) और मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (VIP) जैसे छोटे क्षेत्रीय दल, जो क्रमशः मुसहर और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) के मतदाताओं पर प्रभाव रखते हैं, निर्णायक साबित हो सकते हैं। VIP, जो अब महागठबंधन में है, मिथिलांचल क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ के कारण गठबंधन को मजबूती दे सकता है।

 यादव-मुस्लिम (MY) समीकरण RJD का पारंपरिक आधार है, जबकि NDA कुर्मी-कोइरी के साथ मिलकर अगड़ी जातियों और दलितों के एक हिस्से को साधने की कोशिश कर रहा है।


यह चुनाव केवल गठबंधन की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जनहित के मुद्दों पर भी लड़ा जा रहा है। तेजस्वी यादव ने 10 लाख सरकारी नौकरियों का अपना पुराना वादा दोहराया है, जो राज्य के युवा मतदाताओं के बीच एक बड़ा चुनावी मुद्दा है। एनडीए 'जंगलराज' के आरोपों को फिर से हवा दे रहा है, लेकिन तेजस्वी यादव ने इस बार इसे 'डबल जंगलराज' कहकर पलटवार किया है। वे  मौजूदा NDA सरकार पर कानून व्यवस्था बनाए रखने में विफल रहने का आरोप लगाया है।


 दोनों गठबंधन राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के विकास पर अपने-अपने दावों के साथ मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। शुरुआती सर्वे (2025 की शुरुआत में) NDA को बढ़त दिखाते रहे हैं, लेकिन तेजस्वी की ताबड़तोड़ रैलियों और महागठबंधन के जमीनी प्रचार ने मुकाबला काँटे की टक्कर में बदल दिया है।

बिहार का चुनावी परिणाम बहुत हद तक काँटे की टक्कर में फंसा हुआ दिखता है, जहाँ जीत-हार का फैसला कुछ ही सौ वोटों के अंतर से हो सकता है (जैसा कि 2020 में हिल्सा जैसी सीटों पर हुआ था)।


 तेजस्वी यादव के लिए यह चुनाव उनकी राजनीतिक परिपक्वता और नेतृत्व की क्षमता की सबसे बड़ी परीक्षा है। तो  यह चुनाव नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत पर एक जनमत संग्रह भी होगा, जिनके बार-बार पाला बदलने की आलोचना हो रही है। एनडीए के भीतर, यह भाजपा की ताकत को भी परखेगा कि क्या वह अपने सहयोगियों पर निर्भरता कम करके खुद को राज्य की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित कर सकती है।

इस बार के चुनाव में पहली बार ‘जन सुराज पार्टी ‘ नामक एक नया राजनैतिक दल भी बिहार की राजनीति में अपनी ज़ोरदार उपस्थिति दर्ज करा रहा है।’जन सुराज पार्टी ‘ जैसे किसी नवगठित दल द्वारा अपने पहले ही चुनाव में राज्य की सभी 243 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करना ही अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। बड़ी बात यह है कि इस पार्टी के लगभग सभी उम्मीदवार शिक्षित,बुद्धिजीवी,पूर्व नौकर शाह,पूर्व आई ए एस,आई पी एस,वैज्ञानिक,गणितज्ञ तथा शिक्षाविद हैं जबकि चुनाव मैदान में कूदे अन्य पारंपरिक राष्ट्रीय व क्षेत्रीय राजनैतिक दलों के उम्मीदवारों की शिक्षा,उनके आचरण, चरित्र व योग्यता के विषय में कुछ अधिक बताने की ज़रुरत ही नहीं। बहरहाल इस नये नवेले राजनैतिक दल ‘जन सुराज पार्टी ‘ के संस्थापक व अकेले रणनीतिकार व स्टार प्रचारक वही प्रशांत किशोर हैं, जो नरेंद्र मोदी व भाजपा से लेकर देश के अधिकांश राजनैतिक दलों व नेताओं के लिये एक पेशेवर के रूप में चुनावी रणनीति तैयार करने के बारे में जाने जाते हैं। देश के विभिन्न राजनैतिक दलों को अपनी रणनीति का लोहा मनवाने के बाद मूल रूप से बिहार के ही रहने वाले प्रशांत किशोर ने अपनी योग्यता का प्रयोग सर्वप्रथम अपने ही राज्य के विकास के लिये करने का निर्णय लिया और 2022 में बिहार की जनता को जागरूक करने व उन्हें उनकी व पूरे राज्य की बदहाली के मूल कारणों से अवगत कराने के मक़सद से बिहार में ‘जन सुराज अभियान’ चलने की घोषणा की। इस घोषणा के बाद ही उन्होंने राज्य में लगभग 3,000 किलोमीटर की पदयात्रा भी की। देखना  है कि बिहार की राजनीति में यह कितना   परिवर्तन लाने में सफल होते हैं। 


संक्षेप में, बिहार 2025 का चुनाव स्थिरता बनाम परिवर्तन, अनुभव बनाम युवा ऊर्जा, और पुराने जातिगत आधार बनाम नए आर्थिक विमर्श के बीच का संघर्ष है। मतगणना के दिन तक, राज्य की 243 सीटों पर अनिश्चितता का माहौल बना रहेगा।

अशोक मधुप

(लेखक  वरिष्ठ पत्रकार हैं)