Sunday, March 17, 2019

मिलते जुलते चुनाव चिन्ह की वजह से हार गए थे रामविलास पासवान

मिलते जुलते चुनाव चिन्ह की वजह से हार गए थे रामविलास पासवान
मामूली पांच हजार मतों के अंतर से जीतीं थी मीरा कुमार
बिजनौर, १६ मार्च
अशोक मधुप
कभी कभी नेता के कद के आगे उसका चुनाव चिन्ह आड़े आने से भी चुनाव की तस्वीर बदल जाती है। साल १९८५ में बिजनौर सीट पर हुए दिलचस्प उपचुनाव में केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान को एक से चुनाव चिन्ह का भारी खामियाजा भुगतना पड़ा था। पूरे चुनाव में हर किसी को पासवान के जीतने की उम्मीद थी। पर इस सीट से चौधरी जगजीवन राम की पुत्री और कांग्रेस प्रत्याशी मीरा कुमार ने बाजी मार ली थी।
कांग्रेस सांसद गिरधारी लाल की मौत के बाद बिजनौर लोकसभा सीट से कांग्रेस ने १९८५ में हुए उपचुनाव में दिग्गज कांग्रेसी नेता बाबू जगजीवन राम की पुत्री मीरा कुमार को चुनाव मैदान में उतारा। बसपा से मायावती चुनाव लड़ रहीं थी। दलित मजदूर किसान पार्टी से केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान चुनाव मैदान में डटे थे। देशभर के नेताओं का बिजनौर में जमावड़ा लगा था। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी , पूर्व मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह, भजनलाल, पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, एनडी तिवारी, हरियाणा के मुख्यमंत्री बंशीलाल मीरा कुमार के चुनाव में प्रचार करने के लिए आए थे। वीररामविलास पासवान के चुनाव प्रचार में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह, पूर्व उपप्रधानमंत्री देवीलाल, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, बीजू पटनायक समेत कई दिग्गज चुनाव मैदान में उतरे थे। इस चुनाव में रामविलास पासवान का चुनाव चिन्ह हल जोतता किसान था। एक निर्दलीय प्रत्याशी को कंधे पर हल रखे किसान का चुनाव चिन्ह मिल गया।
पूरे चुनाव में पासवान - जिताओ, पासवान जिताओ की बात होती रही। सभाओं में पासवान जिताने के नारे लगे। चुनाव चिन्ह का किसी ने प्रचार नहीं किया।
वोटरों ने मुगालते में रामविलास पासवान की जगह निर्दलीय प्रत्याशी को खूब वोट दिए। मीरा कुमार को एक लाख २८ हजार ८६ वोट मिले। रामविलास पासवान को एक लाख २२ हजार ७५३ व बसपा सुप्रीमो मायावती को ६१ हजार ५०४ वोट मिले। रामविलास पासवान इस दिलचस्प चुनाव को 5333 मतों से हार गए। निर्दलीय को 13766 मत मिले।किसी को भी उनके चुनाव में हारने की उम्मीद नहीं थी।
अशोक मधुप

Sunday, February 10, 2019

रामकुमार शर्मा वैद्य

कल को बसंत -पंचमी है ऋतुराज बसंत।दूर दूर तक पीली आभा और बिखरा होता है अनुपम सौंदर्य ।जब भी बसंत आता है बिजनौर के

रामकुमार शर्मा वैद्य बहुत याद आते हैं।वे इस अवसर को हर साल मनाते थे।तीन दिवसीय कार्यक्रम के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे।अंतराष्ट्रीय स्तर का कवि सम्मेलन होता।खेल होते।वैद्य थे। अतःवनौषधि -प्रदर्शनी भी लगती। वैद्य जी को आयुर्वेद के कई ग्रंथ कंठस्थ थे।

रामकुमार जी मूलतः पैजनियां , बिजनौर निवासी थे |वैद्य जी पत्रकार थे।"कण्व भूमि "नाम से अपना साप्ताहिक निकालते।दिल्ली से निकलने वाले एक दैनिक के रिपोर्टर थे। वालीवाल के खिलाड़ी थे। सिविल लाइन्स में उनकी शंकर औषधालय नाम से दुकान थी।बाद में नजीबाबाद बस स्टेंड पर आ गए थे।उनकी सिविल लाइन की दुकान पर बड़ा बेटा हरीश बैठने लगा। वैद्य जी की अपनी फार्मेसी थी।रावली में कण्वाश्रम की स्थापना के लिए उन्होंने बहुत कार्य किया।उनके साथी थे नई बस्ती निवासी श्री चंद्र शेखर शास्त्री जी।रावली के स्कूल प्रांगण में कण्वऋषि की प्रतिमा लगवायी।इसका उद्घाटन उन्होंने पूर्व रक्षमन्त्री जगजीवन राम से कराया था। बाद में सब खत्म हो गया।
उनके जाने के बाद बसंत पर बिजनौर में कार्यक्रम ही होने बन्द हो गए।
बहुआयामी प्रतिभा के धनी वैद्य जी को नमन।हार्दिक श्रद्धांजलि 

Tuesday, June 12, 2018

चित्रकार हरिपाल त्यागी से साक्षात्कार


पहला चित्र मां के गर्भ की भित्ती पर उंगलियों से खींचा होगा
देश के जाने माने चित्रकार हरिपाल त्यागी से साक्षात्कार

फोटो

बिजनौर,जनपद में पैदा हुए देश के जाने वाने चित्रकार हरिपाल त्यागी कहतें हैं कि शायद उन्होंने पहला चित्र मां के गर्भ की भित्ती पर उंगलियों से खींचा होगा। उनकी मां ने गर्भ की ‌भित्त‌ी पर कंपन महसूस कर उन्हें आशीर्वाद दिया होगा , तभी वह बचपन से आज तक अपने कार्य में व्यस्त हैं।
बीस अप्रैल 1934 में बिजनौर जनपद के महुआ गांव में जन्में हरिपाल त्यागी मूल रूप से चित्रकार हैं किंतु वे एक विख्यात कवि भी । शिक्षा बिजनौर के राजा ज्वाला प्रसाछ स्कूल में मैट्रिक तक हुई। 55 में शादी हो गई। अपने शौक के लिए वह ‌दिल्ली आ गए। संघर्ष की शुरूआत हुई । एक पत्रिका के लिए बनाए पहले चित्र पर एक रुपया मिला।सा‌थियों की सलाह   पर भौपाल चला गया। वहां भास्कर में कार्टूनिस्ट के रूप में काम शुरू किया। सन् 60 में दिल्ली आ गया। 64 में पहली नौकरी हिंदुस्तान में शुरू की । छह -सात माह काम किया। उसके बाद से कभी नौकरी नहीं।


त्यागी बताते हैं कि अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं उल्लेखनीय पुस्तकों में पेंटिंग्स तथा साहित्यिक रचनाओं प्रकाशित एवं संगृहित हुईं। देश के अनेक नगरों-महानगरों में एकल चित्रकला प्रदर्शनियां लगाई । सामूहिक कला-प्रदर्शनियों में भागीदारी की । मूलत: चित्रकार लेकिन लेखन भी किया। रचनाकार के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित ‘सुजन सखा हरिपाल' पुस्तक तथा ‘आधारशिलां (त्रैमासिक पत्रिका) का विशेषांक प्रकाशित हुआ। उनकी प्रकाशित पुस्तकें : ‘आदमी से आदमी तक (शब्दचित्र एवं रेखाचित्र) भीमसेन त्यागी के साथ सहयोगी पुस्तक। बच्चों के लिए कहानियों की चार पुस्तकें। किशोरों के लिए ‘ननकू का पाजामा' नामक एक लघु उपन्यास तथा ‘महापुरुषं (साहित्य के महापुरुषों पर केन्द्रित व्यंग्यात्मक निबन्ध) एवं रेखाचित्र हैं। इन्होंने कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं में कला संपादन भी। साहित्य एवं कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अनेक बार पुरस्कृत-सम्मानित हुए।
वे कहते हैं कि जीवन में पैसा खूब आया। किसी से मांगने की जरूरत नहीं पड़ी। लुटाया खूब।वे कहतें है कि मैँ साधारण आदकी की तरह जीता हूँ।बड़े आदमी की तरह चिंतन करता हूँ।साधारण आदमी की तरह रहता हूँ। उन्हें बेइमान किंतु पारदर्शी आदमी पंसद हैँ। ईमानदार आदमी बनता हैं और बनने वाले उन्हें पसद नहीं।
वे बताते हैँ कि शुरूआत में उनका बहुत शोषण हुआ। इसे उनका बुद्घुपना ही कहा जा सकता है। जैसे जैसे वे समाज के तौर - तरीके जानते गए शोषण कम होता गया। जीवन में समझौते तो करने ही पड़तें हैं किंतु ज्यादा समझौते नहीं किए।
युवा ‌‌चित्रकारों को वे सलाह देते हैं कि किताबी ज्ञान से कुछ होने वाला नहीं हैं। वे अपना दृष्ट‌िकोण पहचाने। ‌चित्र में क्या कहना चाहतें हैं, यह निश्चय कर काम करें। तजुर्बे और सवेंदनशीलता से अनुभव आएंगे।


बच्चन की पुस्तकों के बनाए चित्र



वे बतातें हैं कि प्रसिद्घ कवि हरिवंशराय बच्चन की पुस्तकों के कवर और अधिकांश स्केच उन्होंने ही बनाए।
वे बच्चन से पहली मुलाकात के बारे में बतातें है कि राज कमल प्रकाशन से उनकी पुस्तक छपनी थी। पुस्तक के कवर के कई ‌‌चित्र वह निरस्त कर चुके थे। मुझसे चित्र लेकर बच्चन जी से मिलने को कहा गया।बच्चन जी से मैँ उनके दिल्ली ‌स्थ‌ित निवास पर जाकर मिला। उन्होने मेंरे से चित्र लेकर बिना देखे उलटाकर रख दिया। कहा कि जिसने मेरी किताब नहीं पढ़ी ,वह उसका कवर कैसे बना सकता है। मैने उनसे कहा ‌कि ये आने कैसे कह दिया? फिर मैने छपने वाली ही नहीं उनकी पुरानी किताब कविताओं पर बेबाक टिप्पणी की । मुझ से प्रभा‌वित होकर उन्होंने राजकमल प्रकाशन को कहा कि आज से उनकी सारी किताबों के कवर और स्केच त्यागी ही करेंगे। जो ये करेंगे , वह उन्हें स्वीकर होंगे।




हरिपाल त्यागी की कविता
रेखाएं

रेखाएं-पागल हो गयी हैं
तुम्हें छूने को आतुर,
छटपटातीं, भगातीं,
बेचैन रेखाएं...

उलझ पड़तीं परस्पर और
फिर वे एक हो जातीं,
दौड़ पड़ती बावली
मासूम रेखाएं...

पगला गयी हैं सचमुच
तुम्हें छूने की धुन में।
कौन है वह, जो तड़पता
इन खरोंचों में...

रेखाएं-
पागल हो गयी हैं...


-अशोक मधुप

12 अप्रैल अमर उजाला बिजनौर के पेज ८ पर प्रकाशित

Friday, April 13, 2018

बिजनौर में भी हुआ था हिरन के शिकार का प्रयास


बिजनौर में भी हुआ था हिरन के शिकार का प्रयास
हिरन का शिकार सलमान खान को महंगा पड़ा। उन्हें हिरन मारने में जेल जाता पड़ा। भगवान राम को हिरन के शिकार के लिए माता सीता को खोना पड़ा था। इतिहास गवाह है कि ‌हिरन का जब -जब भी शिकार हुआ। नया इतिहास बना। सलमान खान और भगवान राम का शिकार दुखद कहानी बना ।
बिजनौर जनपद में भी हिरन के शिकार का प्रयास हुआ था। यह प्रयास समाज के लिए सुखद रहा। बिजनौर जनपद की श‌िकर गाथा काफी पुरानी हो गई । बिजनौर पहले वन क्षेत्र था। गंगा और राम गंगा के बीच अरण्य स्थल। गंगा राम गंगा के बीच बसा होने के कारण दस्यु और राजनैतिक हमलों से सुरक्षित स्थल। ऐसी जगह साधु महात्माओं के आश्रम के लिए बहुत उपयुक्त थी। इस भूमि में एक राजा आतें हैँ। उन्हें एक हिरन द‌िखाई देता है। ‌हिरन को देख वे अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाते हैं। अनुसंधान के लिए तरकश से तीन निकालते हैँ। धनुष पर तीर रखते ही सारथी उनका मन्तव्य समझ जाता है। वह हिरन के पीछे रथ दौड़ा देता है। हिरन बहुत तेज दौड़ता है। वह आने वाले संकट को भांप लेता है। जान बचाने के लिए दौड़ पड़ता है। मौत का भय उनकी गति कई गुनी बढ़ा देता है। वह कभी- इधर दौड़ता है।कभी उधर दौड़ता है। जान बचाने के लिए लुकाछिपी शुरू हो जाती है। राजा और उसके सारथी शिकार पर नजर गड़ाए हैँ। उनको यह पता ही नहीं चलता - कितनी दूर आ गए। कहां आ गए। अचानक रथ के मार्ग में आए कुछ तपस्वी उन्हें रोकतें हैं। कहते है राजन आश्रम का मृग है। इसका शिकार न करें। अचानक तपस्वी के रास्ते में आने पर राजा रूकतें हैं। और चारों और देखतें हैं । समझ जाते हैं कि वे आश्रम में आ गए। राजा थे दुष्यंत।कण्व ऋषि का आश्रम। यहां उन्हें मिलती है शकुतंला। मह‌‌र्ष‌ि की गोद ली पुत्री ।मेनका और विश्वामित्र की संतान। दुष्यंत और शकुंतला का प्रेम परवान चढ़ता है। इनसे हुए बच्चे का नाम भरत हुआ। ये देश का प्रतापी सम्राट हुआ। इसी के नामपर देश का नाम भारत वर्ष पड़ा।
अशोक मधुप

किस्सा हिरन के शिकार का


किस्सा हिरन के  शिकार का 
मंडल के बड़े अधिकारी कर चुकें हैं कार्बेट में हिरन का शि‌कार

फिल्म कलाकार सलमान खान को राजस्थान में हिरन का शिकार करने में सजा हुई। मुरादाबाद मंडल के अधिकारी तो बहुत पहले नेशनल कार्बेट पार्क में हिरन का शिकार कर चुकें हैं।लेकिन तब शासन का दबदबा होने के चलते केवल इन अधिकारियों का ट्रांसफर किया गया था।मुकदमें भी दर्ज हुए थे।
यह घटना है साल 1982 में नए साल की ।बिजनौर के तत्कालीन डीएम अनीस अंसारी शौकीन मिजाज थे। खुद तो शायर थे  ही । शाम को उनकें यहां शायरों की महफिल जमती। नए साल का जश्न मनाने का प्रोग्राम बनाया था। इसके लिए वे मंडलायुुक्त मुरादाबाद अरविंद वर्मा और डीआईजी मुरादाबाद बीएस माथुर को भी  आंमत्रित किया गया। तत्कालीन एसपी एके सिंह भी इनके साथ थे। कालागढ़ में नए साल का जश्न मनाया गया।वहां सभी अधिकारियों ने रामगंगा में बोट‌िंग का आनंद लिया। बोट से ही कार्बेट में चले गए। तत्कालीन एसपी एके सिंह के साथ उनके बेटे भी थे। एकेसिंह के बेटे ने कार्बेट में शिकार करते हुए हिरन को गोली मार दी। बंदूक चलने की आवाज सुनकर आसपास मौजूद वन अधिकारी मौके पर आ गए। तब तक हिरन मर चुका था। उन्होंने शिकार के बारे में पूछा तो एसपी एके ‌स‌िंह का बेटे ने वन अधिकारियों को धमकाना शुरू कर दिया। वन अध‌िकारी ने इन सब को हिरासत में ले लिया। कार्बेट में सांसद अरूण नेहरू भी रूके हुए थे। कमिश्नर, डीआई, डीएम और एसपी जैसे अधिकारियों के शिकार करने पर अरूण नेहरू बहुत नाराज हुए। उन्होंने शासन से इन अधिकारियों के विरूद्घ कठोर कार्रवाई करने को कहा।  उस समय एसडीएम नगीना बिजेंद्र पाल सिंह के स्टेनो थे। बिजेंद्र पाल ‌सिंह भी इन अधिकारियों के साथ जाना चाहते थे पर किसी कारण से जा नहीं सके थे। पहले उन्हें बड़े अधिकारियों के साथ न जाने का अफसोस था।बाद में कार्बेट में शिकार की घटना पता चलने पर उन्होंने बहुत खुशी मनाई ।कहा था कि वे बाल बाल बच गए।
मंडलायुक्त जैसे अधिकारियों का मामला होने के कारण कार्बेट प्रशासन ने इन्हें हाथों हाथ जमानत दे दी थी। किंतु यह मामला इन सब अ‌ध‌िकारियों को भारी पड़ा। बिजनौर पुलिस अधीक्षक एके सिंह का 15 जनवरी को शासन ने तबादला कर दिया।डीएम अनीस अंसारी को 20 जनवरी, मंडलायुक्त अरविंद सिंह को 21 जनवरी को हटा दिया गया। डीआइजी भी इसीअवधि में हट गए।इन अधिकारियों पर मुकदमे चले।एके सिंह को तो इसका बहुत बड़ा खाम‌ियाजा भुगतना पड़ा। उनका प्रमोशन रूका रहा। सेवा निवृति से एक दिन पहले उन्हें सब मामला निपटाकर प्रमोशन दिया गया। बिजनौर के पुराने पत्रकार एंव कलेक्ट्रेट कर्मी इस घटना को नहीं भूले।‌
अशोक मधुप

Thursday, April 12, 2018

बहुत कुछ बदल गया ४८ साल में

४८ साल एक युग होता है। पर इतना भी नहीं जितना परिवर्तन हो गया। मैने आज से ४८ साल पहले हाई स्कूल परीक्षा पास की थी। उस समय जनपद में कुछ ही छात्र प्रथम श्रेणी पाते थे। अधिकतर को तृतीय श्रेणी मिलती। द्वितीय श्रेणी पाने वाला अपने को बहुत भाग्यशाली समझता। पूरे गांव में उसकी विद्वता के चर्चे होते। प्रदेश का रिजल्ट होता था लगभग ३०-३५ प्रतिशत। हॉल  प्रदेश का इंटर का रिजल्ट देखकर मैं चौंक गया। परीक्षा में ९२.२ प्रतिशत छात्र उत्तीर्ण हुए हैं। सर्वाधिक अंक पाने वाली छात्रा के ९७ प्रतिशत से ज्यादा है। मेरे पड़ौस में झालू में टेलर होते थे पीरजी । नाम क्या था, यह कोई नहीं जानता। सब उन्हें पीर जी कहते थे। उनका लड़का जहीर मेरे से सीनियर थे। इनकी हाई स्कूल में सेकेंड डिवीजन आई थी। वह कहते थे । सेकेंड डिवीजन लाना मामूली बात नहीं है।  साइन्स में तो   लोहे के चने चबाने पड़ते हैं। बहुत मेहनत करनी होती है, जब जाकर सेकेंड डिवीजन आती है। ४५ प्रतिशत अंक पर सेंकेड डिवीजन मिलती थी। मेरे पास विज्ञान विषय थे। मुझे ४५.५ प्रतिशत अंक आए थे। मात्र एक अंक ज्यादा मिलने पर मुझे सेकेंड डिवीजन मिली। वर्ना थर्ड ही रहती पर मुझे गर्व है कि मैने सेकेंड डिवीजन से हाई स्कूल पास किया । आज आश्चर्य होता है, जब उसी यूपी बोर्ड के छात्रों को ९५ प्रतिशत नंबर मिले देखता हूं ,जिस बोर्ड में सेकेंड डिवीजन से पास होना किसी समय एक जंग जीतना था | 

Thursday, April 5, 2018

स्वामी सच्चिदानंद

सैतालिस साल बीत गए स्वामी सच्चिदानंद को शहीद हुए। आज भी मैं वह दृष्य नहीं भूला। आश्रम में उनके और उनके साथी के शव पड़े थे । मैँ उन्हें देखने गया था।उस समय मैं बीए में पढ़ता था।
मेर घर की दूरी खारी से दो किलो मीटर है। सूचना मिली कि गोविंदपुर आश्रम में स्वामी जी का कत्ल हो गया। रात में बदमाशों ने उनकी और उनके एक साथी की गोली मार कर हत्या कर दी।
स्वामी जी की बहुत प्रसिद्घी थी। क्षेत्र में बहुत सम्मान था। उनकी हत्या की सुन धक्का सा लगा। समझ में नहीं आया कि उनकी हत्या क्यों हुई। इतने अच्छे आदमी का भी कोई दुश्मन हो सकता है।हम साइकिल से भाग कर आश्रम पंहुचे। आश्रम में कुछ दूरी पर दो शव पड़े थे। एक स्वामी जी का और एक उनके साथी किसी रेड़डी का। लोग बता रहे थे कि स्वामी जी बहुत बहादुर थे। बदमाश स्वामी जी को मारना चाहते थे। किंतु जिस कमरे को उन्होंने खुलवाया ,उसमें उनके मित्र रेड़डी रूके हुए थे। उन्होंने रेड्डी को स्वामी जी समय गोलीमार दी। गोली की आवाज सुन स्वामी जी अपने कक्ष से बाहर आए। जार से कहां कौन है? क्या हो रहा है। मारने वालों ने देखा कि यह तो वही स्वामी जी हैं ,जिन्हें मारना था। उन्होंने स्वामी जी पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाकर स्वामी जी की हत्या कर दी। अगर स्वामी जी कक्ष से न निकलते , छिप जाते , भाग जाते तो वह बच सकते थे।किंतु वे बहादुर और निर्भीक थे। उन्होंने ऐसा नहीं ‌ क‌िया।
बीए में मैँ वर्धमान कॉलेज में पढता था। डा एसआर त्यागी कॉलेज के प्राचार्य थे। स्वामी जी का उनके पास आना जाना था। स्वामी जी का वाहन साइकिल था। वे नंगे पांव रहते। कमर पर घुटनों तक एक चादर बांधते। गले मे उनके एक सफेद चादर पड़ी रहती। ये उनका पहनावा और उनकी पहचान थी। वहुत बार उन्हें आते जाते देखते। ब्रह्मचर्य का तेज उनके चेहरे से छलकता था।
मैने 66 में हाई स्कूल किया। इंटर में प्रवेश लिया था। पिता जी चकबंदी में नौकरी करते थे। जनपद में चकबंदी का कार्य पूरा होने पर उसे जोनपुर भेज दिया गया। विभाग के सारे स्टाफ का भी जोनपुर को तबादला कर दिया गया। पिता जी को दादा जी ने जोनपुर नहीं जाने दिया। पिता जी ने नौकरी छोड़ दी। दादा जी हकीम थे।कोई ज्यादा आय नहीं थी।धनाभाग के कारण मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
झालू के पशु चिक‌ित्सालय पर श्याम बाबू सक्सैना वेटनरी स्टॉक मैन पद पर तैनात थे। उनके पास मेरी बैठ उठ थी। अधिकतर समय उनके साथ बीतता। स्वमी जी के आश्रम का कोई पशु बीमार हो जाता। वह उन्हें बलवा भेजते। मैँ भी उनके साथ जाता। आश्रम में दूध से हमारा स्वागत होता।चलते समय श्याम बाबू को दस और मुझे दो रुपये देना स्वामी जी कभी नहीं भूलते। मेरे मना करने पर भी दो का नोट जेब में डाल देते।
पिछले आठ दस साल में कई बार आश्रम में जाना हुआ। स्वामी जी की एक तस्वीर जरूर नजर आई। अब तो बहुत कुछ बदल गया।
अशोक मधुप
5 अप्रेल 2018