Thursday, February 13, 2025

बड़ी चुनौती होगीं मणिपुर के नए मुख्यमंत्री के सामने

  

 


अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

मणिपुर में भाजपा के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह  ने रविवार को  त्यागपत्र देकर पार्टी की टूटन तो बचाली, किंतु भाजपा के लिए नए मुख्यमंत्री का  चयन बड़ा  कठिन होगा,  उससे ज्यादा कठिन होगा वहां बने नए मुख्य मंत्री को सत्ता संभालकर वहां के हालात को  सही करना। राज्य की बिगडी कानून व्यवस्था को सुधारना  उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। लगभग दो साल से  राज्य में  फैली हिंसा पर नियंत्रण पाना उसके सामने दातों चने चबाने जैसा होगा। मणिपुर की जनता का विश्वास जीतने के लिए उन्हें कठिन परिश्रम करना होगा।

मणिपुर की सीमा म्यांमार से लगी है।आरोप लगते रहे हैं कि चीन यहां के आतंकवादी संगठन , यहां  के आदिवासी को पहले से ही भड़काता रहा है।मणिपुर में विवाद और जातिय संघर्ष की शुरूआत का कारण मणिपुर उच्च न्यायालय का 19 अप्रैल 2023 का आदेश रहा। इस आदेश में  राज्य के बहुसंख्यक मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिया गया था। हाई कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया था कि वह 10 साल पुरानी सिफारिश को लागू करे जिसमें गैर-जनजाति मैतेई समुदाय को जनजाति में शामिल करने की बात कही गई थी। इस आदेश के बाद राज्य में मैतेई समुदाय और कुकी समुदाय के बीच विवाद शुरू हो गया और धीरे-धीरे यह हिंसक रूप लेने लगा।

मणिपुर में 16 जिले हैं, लेकिन, पूरा राज्य दो हिस्सों में बंटा हुआ है। पहला इंफाल घाटी, दूसरा पहाड़ी जिले। इंफाल घाटी मैतेई बहुल इलाका है. वहीं, पहाड़ी जिलों में नागा और कुकी जनजातियों का वर्चस्व है। विशेष तौर पर चार पहाड़ी जिलों में कुकी समुदाय के लोगों का राज है। मणिपुर की आबादी लगभग 28 लाख है. इसमें मैतेई समुदाय के लोग लगभग 53 फीसद हैं। मणिपुर के भूमि क्षेत्र का लगभग 10% हिस्सा इन्हीं लोगों के कब्जे में हैं।वहीं, कुकी समुदाय की राज्य में कुल आबादी 30 फीसदी हैं. इसी समुदाय के द्वारा मैतेई समुदाय को आरक्षण देने का विरोध करते रहा गया है। इसके पीछे इनकी दलील यह है कि अगर मैतेई समुदाय को आरक्षण मिलता है तो वे सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में दाखिले से वंचित हो जाएंगे। मैतेई लोग अधिकांश आरक्षण हथिया लेंगे। ज्ञातव्य है कि मैतेई समुदाय के द्वारा करीब 10 साल से राज्य सरकार से आरक्षण की मांग की जा रही है। मांग के पक्ष में फैसला नहीं आने के बाद मैतेई जनजाति कमेटी ने कोर्ट का रुख किया। कोर्ट ने इस मांग को लेकर राज्य सरकार से केंद्र से सिफारिश करने की बात कही है। इस सिफारिश के बाद ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन मणिपुर ने विरोध जताना शुरू कर दिया।इस आदेश के बाद राज्य में मैतेई समुदाय और कुकी समुदाय के बीच विवाद शुरू हो गया और धीरे-धीरे यह हिंसक रूप लेने लगा।

मैतेई को एसटी का दर्जा दिए जाने के हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ आदिवासी छात्र संघ के तीन  और चार मई 2023 'एकजुटता मार्च' के दौरान इंफाल और कुकी बहुल जिलों में हिंसा भड़क उठी। मणिपुर सरकार ने अगले पांच दिनों के लिए पूरे राज्य में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को निलंबित कर दिया और आठ जिलों में कर्फ्यू लगा दिया। इंफाल में 4 मई 2023 को भाजपा विधायक वुंगजागिन वाल्टे पर भीड़ ने हमला किया। इस दौरान करीब नौ हजार लोगों को हिंसा वाले क्षेत्र से निकाला गया। मणिपुर में जातीय हिंसा बढ़ने के वहां सेना को तैनात किया गया। राज्यपाल ने बढ़ती हिंसा के बीच देखते ही गोली मारने का आदेश जारी किए।हालत इतने खराब हुए कि आठ  मई 2023 को मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने बताया कि  कि, राज्य में जातीय संघर्षों में 60 निर्दोष लोगों की जान चली गई । 200 से अधिक घायल हो गए। इस जातीय हिंसा के कारण 35 हजार लोग बेघर हो गए। हिंसा में लगभग 1700 घर जला दिए गए, और पुलिस शस्त्रागार से 1041 हथियार और 7460 राउंड गोला-बारूद लूट लिया गया।केंद्र सरकार ने मणिपुर में हिंसा की जांच के लिए गुवाहाटी हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस अजय लांबा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया। दस जून 2023 को केंद्र ने विभिन्न जातीय समूहों के बीच शांति स्थापित करने के लिए मणिपुर के राज्यपाल और एन बीरेन सिंह के नेतृत्व में 51 सदस्यीय शांति समिति का गठन किया।14 जून 2023 और 15 जून 2023 को मणिपुर की एकमात्र महिला मंत्री नेम्फा किपगेन के इंफाल स्थित सरकारी आवास में आग लगा दी गई। 15 जून 2023 मणिपुर में फैली जातीय हिंसा की आग के कारण राज्य की कानून-व्यवस्था की स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई। हिंसा की आग में विदेश राज्य मंत्री आरके रंजन का आवास भी जलकर खाक हो गया।हालत इतने खराब हुए कि मणिपुर में हथियारबंद भीड़ ने भाजपा नेताओं, घरों और कार्यालयों को निशाना बनाया। इंफाल में भाजपा मंडल कार्यालय को जला दिया गया. हालांकि, समय रहते सेना और रैपिड एक्शन फोर्स ने भाजपा कार्यालयों और पार्टी के मणिपुर प्रमुख और एक राज्य मंत्री के घरों में आग लगाने के कई प्रयासों को विफल कर दिया. वहीं, 24 जून 2023 को भीड़ ने इंफाल पूर्वी जिले के कांगला सांगोमसांग में मणिपुर के कैबिनेट मंत्री एल सुसिंड्रो के गोदाम और फार्महाउस को जला दिया।  चार  अगस्त 2023 को मणिपुर की भीड़ ने आईआरबी (मणिपुर के बिष्णुपुर में द्वितीय भारत रिजर्व बटालियन (आईआरबी) मुख्यालय) से एलएमजी, मोर्टार, ग्रेनेड लूटे. 500 की भीड़ ने शस्त्रागार को निशाना बनाया और 298 राइफलें, एसएलआर और एलएमजी के साथ मोर्टार, ग्रेनेड और 16 हजार से अधिक राउंड मिक्सड गोला-बारूद लूट कर फरार हो गए।हालाकि न्यायालय ने अपने आदेश पर रोक लगा दी ,किंतु हालात उसके बाद भी सामान्य नही हुए।

प्रदेश सरकार के निय्रत्रण में हालत न देख मणिपुर कांग्रेस ने घोषणा की कि वह 10 फरवरी को बीरेन सिंह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाएगी. 9 फरवरी 2025 को मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने नौ फरवरी 2025 को राज्य में जातीय हिंसा भड़कने के करीब दो साल बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया।नवंबर 2024 तक मणिपुर की जातीय हिंसा में 258 लोगों की जान जा चुकी है। राज्य को 60 हजार से ज्यादा लोगों को विस्थापित करना पड़ा।

खास बात यह रही कि 60 सदस्यीय मणिपुर विधानसभा में कई भाजपा विधायक अब सीएम बीरेन सिंह के कामकाज का खुलकर विरोध कर रहे हैं।वर्तमान में 60 सदस्यीय सदन में सत्तारूढ़ भाजपा के 37 विधायक हैं. हालांकि, उनकी चिंता तब शुरू हुई जब पिछले साल 19 नवंबर को मुख्यमंत्री द्वारा बुलाई गई बैठक में कई विधायक शामिल नहीं हुए। छह विधायकों वाली एनपीपी जो भाजपा की सहयोगी थी, उसने पहले ही बीरेन सिंह से नाराजगी जताते हुए समर्थन वापस ले लिया है।दिलचस्प बात यह है कि एनपीपी प्रमुख और मेघालय के सीएम कोनराड के संगमा ने भी अपनी पार्टी के समर्थन के लिए पूर्व शर्त के रूप में बीरेन के प्रतिस्थापन की मांग की है।राज्य में शांति स्थापित करने में बीरेन सिंह सरकार की विफलता पर 10 कुकी विधायकों ने अपनी नाराजगी जाहिर की है, जिनमें से सात भाजपा के हैं।

अब बीरेन सिंह के त्यागपत्र के बाद राज्य के खराब हालात में भाजपा के लिए सर्व सम्मति  से मुख्यमंत्री का नाम तै करना बड़ा   चुनौती पूर्ण होगा। क्योंकि उसे  ऐसा आदमी खोजना होगा कि वह आंदोलनरत संगठनों  का विश्वास जीत सके।  वहां के हालात सुधारने में सक्षम हो।आने वाले मुख्य मंत्री के लिए भी  हिंसा की आग में फैले राज्य में शांति स्थापना का कार्य बड़ा चुनौती पूर्ण होगा।।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

 

 

 

 

 

 



Thursday, February 6, 2025

कैसे रुकें सिवरेज की सफाई में होने वाली मौत?

 

कैसे रुकें सिवरेज की सफाई में होने वाली मौत?

अशोक  मधुप

वरिष्ठ पत्रकार 

 कोलकता शहर में सिवरेज की सफाई के दौरान तीन श्रमिकों की मौत हो गई।घटना कोतकता  लेदर कंप्लेक्स में सीवरेज लाइन के साफ के दौरान हुई। सुपरिम कोर्ट काफी पहले  कह चुका है कि मरने वालों के परिवार को तीस −तीस लाख रूपया मुआवजा दिया जाए, किंतु ऐसा नही हो रहा। प्रदेश सरकार ने बीस − बीस लाख रूपये मुआवजा देकर ही मामला निपटा दिया। यह घटना सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश के चार दिन बाद हुई है, जिस  आदेश में सुपरिम कार्ट ने कहा कि कि दिल्ली ,मुंबई, कलकत्ता, चिननई,बंगलूरू और हैदराबाद जैसे मैट्रोपालिटिन शहरों में मैनुअल सफाई और सीवर सफाई पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया गया था।दरअस्ल न्यायालय आदेश करता है किंतु  उन आदेश के पालन के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को   या तो ये आदेश  पंहुच नही पाता।आदेश पंहुच पाता है तो फाइलों के दबाव में वे उसे पढ़ नही पाते।इसीलिए बार – बार आदेशों के  पालन में अनदेखी होती है। इन आदेशों को संबधित अधिकारियों तक पंहुचाने की प्रदेश स्तर पर त्वरित और प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए।

जुलाई 2022 में लोकसभा में प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों के अनुसार पांच साल में सीवर सफाई के दौरान 347 लोगों की मौत हुई। पांच सालों में भारत में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान कम से कम 347 लोगों की मौत हुई, जिनमें से 40 प्रतिशत मौतें उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और दिल्ली में हुईं।सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, 1993 के बाद से सीवर और सेप्टिक टैंक से होने वाली मौतों के 1,248 मामलों में से इस साल मार्च तक 1,116 मामलों में मुआवजे का भुगतान किया गया है. हालांकि, 81 मामलों में मुआवजे का भुगतान अभी भी लंबित है। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि राज्यों द्वारा 51 मामले बंद कर दिए गए हैं क्योंकि मृत व्यक्तियों के कानूनी उत्तराधिकारी नहीं मिल सके। 1993 के बाद के आंकडा से पता चलता है कि कि सीवर और सेप्टिक टैंक में होने वाली मौतों के सबसे अधिक 256 मामले तमिलनाडु में सामने आए. इसके बाद गुजरात (204), उत्तर प्रदेश (131), हरियाणा (115) और दिल्ली (112) का नंबर आता है. सीवर से होने वाली मौतों के सबसे कम मामले छत्तीसगढ़ (1) में दर्ज किए गए हैं, इसके बाद त्रिपुरा और ओडिशा में 2-2 मामले, दादर और नगर हवेली (3) और झारखंड (4) आते हैं।अप्रैल 2023 से मार्च 2024  तक के 58 मामलों में से सबसे ज्यादा मामले तमिलनाडु (11) से हैं, इसके बाद महाराष्ट्र और राजस्थान (11-11 मामले), और गुजरात (8) तथा पंजाब (6) का नंबर आता है.आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि 1993 के बाद से हुई 1,247 मौतों में से 456 मामले 2018 के बाद दर्ज किए गए हैं।

नौ  अक्तूबर 2024 को दिल्ली के सरोजिनी नगर इलाके में एक कंस्ट्रक्शन साइट पर तीन मजदूरों की मौत का मामला सामने आया है। ये  मजदूर सीवर लाइन साफ करने के लिए सीवर के अंदर उतरे थे।  सीवर लाइन से निकल रही जहरीली गैस की वजह से तीनों मजदूरों का दम घुट गया था। स्थानीय लोगों का कहना है कि सीवर में उतरे मजदूरों के लिए सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं थे।

23 अक्तूबर 2024 को राजस्थान के सीकर जिले में सफाई के दौरान तीन कर्मचारियों की मौत हो गई। ये मौत लगातार होती रहती है।रूक नही पातीं ।

 देश में सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौत की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने 20 अक्टूबर 2023 को कहा था कि सरकारी अधिकारियों को मरने वालों के परिजन को 30 लाख रुपए मुआवजा देना होगा।सीवर की सफाई के दौरान कोई सफाईकर्मी ​​​​​​स्थायी दिव्यांगता का शिकार होता है तो न्यूनतम मुआवजे के रूप में उसे 20 लाख रुपए दिया जाएगा। वहीं, अन्य दिव्यांगता पर अफसर उसे 10 लाख रुपए तक का भुगतान करेंगे।जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों को लेकर दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यह फैसला सुनाया।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हाथ से मैला ढोने की प्रथा पूरी तरह खत्म हो। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट्स को सीवर से होने वाली मौतों से संबंधित मामलों की निगरानी करने से ना रोके जाने का निर्देश दिया।

सरकारे और अधिकारी प्रायः मानते हैं कि न्यायालय आदेश करता रहता है।वह करे।उन्हें काम अपनी मर्जी से करना है।इसी कारण सिवरेज की सफाई में लगे कर्मचारियों को कार्य के दौरान न सुरक्षा उपकरण उपलब्ध करांए जाते हैं,  न मौत होने पर मुआवजा दिया जाता है। पीड़ित के परिवार वाले न ज्यादा शिक्षित होते हैं, न संपन्न।उन्हें न्यायालय के आदेश की जानकारी ही नही होती।इतना धन भी नही होता कि वह न्यायालय की शरण में जाएं। इसका फायदा विभागीय अधिकारी उठाते हैं।वह अपनी मनमर्जी  करते हैं।ऐसा प्रायः सभी जगह होता है।सिवरेज की सफाई में लगे कर्मचारियों की मौत की घटनाएं रोकने के लिए, उन्हें मैनुअल सिवरेज की सफाई के आदेश देने वालों पर  हत्या का मुकदमा दर्ज कराने से ही मौत रूकेंगी, अन्यथा नही।

प्रदेश  सरकारों को चाहिए कि वह एक ऐसा सेल बनाए, जो इस तरह की मौत की मोनिटरिंग करें। उनकी मौत के लिए अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार अधिकारियों के विरूद्ध कार्रवाई भी अमल में लाए।एक बात और राज्य स्तर पर बनाये सैल न्यायालयों  के आदेश नगर पालिका, नगर निगम आदि में भेजने की भी   तुंरत व्यवस्था हो।बताए कि यह आदेश हुआ है।सिवरेज की सफाई कराते इन नियमों का पालन करें।ये सैल ये भी मोनिटरिंग करें कि नगर निगम या नगर पालिका के पास  सिवरेज की सफाई के समय प्रयोग होने वाले उपकरण हैं या नही। क्या उनके कर्मचारी सफाई करते सुरक्षा उपकरणों का प्रयोग करते हैं या नही। जहां प्रयोग नही करते वहां कर्मचारियों को जागरूक किया जाए। उनके इन सुरक्षा उपकरणों के प्रयोग के लाभ बताए जाएं।उन्हें कहा जाए कि सिवरेज में उतरने से पहले सुरक्षा उपकरण  पहनने से उनकी जान बच  सकती है।देखने में आया है कि प्रायः स्थानीय निकाय के के पास सुरक्षा  उपकरण  ही नही हैं।उन्हें दबाव देकर ये उपकरण खरीदवाएं जाएं। कर्मचारियों को सुरक्षा उपकरण  पहनने की प्रशिक्षण  दिया जाए।

 स्थानीय निकायों को कहा जाए कि वह मैनुअल सिवरेज की सफाई न कराएं।इसके लिए उपकरण खरीदें। जिन स्थानीय निकायों के पास इन उपकरण खरीदने के लिए धन नही है, उन्हें धन उपलब्ध कराया जाए।सरकारों के इस मामले में गंभीर होने से ही सिवरेज की सफाई के दौरान सफाई कर्मचारियों की मौत की घटनांए रूक सकेंगी।सिवरेज की सफाई में मरने वाले कर्मचारियों के परिवार अनाथ होने से बच जाएगें।

अशोक  मधुप

 ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

Monday, January 20, 2025

क्या इरडा बीमा कंपनियों की नकेल कस सकेगा?

 क्या इरडा बीमा कंपनियों  की नकेल कस सकेगा?

अशोक मधुप

वरिष्ठ पत्रकार

बीमा कंपनियों के बारे में हाल ही में इरडा ( भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण) ने एक  रिपोर्ट जारी की है कि बीमा कंपनियां बीमा खरीदार द्वारा किए 100  रूपये के भुगतान पर 86 रूपये ही क्लेम देती हैं।इस रिपोर्ट में  और भी बहुत कुछ है किंतु इरडा ने यह नही बताया कि कम भुगतान करने वाली कंपनियों पर इरडा क्या कार्रवाई कर रही है?कितने मामलों में उसने पूरा भुगतान कराया?इस व्यवस्था में सुधार के लिए उसके द्वारा किए गए निर्णय क्या हैं?बिल प्राप्त हो जाने के बाद बिलों भुगतान क्यों नही हो रहा?भुगतान में विंलब की अवधि का उपभोक्ता  को सूद क्यों नही दिलाया जा रहा?

भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) की हालिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि सामान्य, स्वास्थ्य और सरकारी बीमा कंपनियां 100 रुपये का प्रीमियम लेकर सिर्फ 86 रुपये ही क्लेम देती हैं। कुछ बीमा कंपनियां तो 100 रुपये के एवज में 56 रुपये ही क्लेम दे रही हैं।रिपोर्ट में कहा गया है कि 2023-24 में सामान्य बीमा कंपनियों ने पॉलिसीधारकों को दावे के एवज में 76,160 करोड़ रुपये का भुगतान किया। यह 2022-23 की तुलना में 18 फीसदी अधिक है।

2023-24 में बीमा कंपनियों ने कुल 83 फीसदी दावों का निपटान किया और 11 फीसदी खारिज कर दिया। छह फीसदी दावे 31 मार्च, 2024 तक लंबित रहे। इस अवधि में सामान्य और स्वास्थ्य बीमा कंपनियों ने कुल 2.69 करोड़ स्वास्थ्य दावों का निपटान कर 83,493 करोड़ रुपये का भुगतान किया। प्रति क्लेम औसत रकम 31,086 रुपये रही। विश्लेषकों का कहना है कि प्रीमियम लेने और दावों के निपटान में क्रमशः 100 फीसदी और 80 फीसदी का औसत ठीक-ठाक है।

कुल दावों में से 72 फीसदी थर्ड पार्टी (टीपीए) ने निपटाए। बाकी 28 फीसदी दावों का निपटान कंपनियों ने अपने तरीके से किया। 66.16 फीसदी दावे कैशलेस तरीके से निपटाए गए, जबकि 39 फीसदी में रिइंबर्समेंट मिला।

सरकारी कंपनियों का क्लेम 100 रुपये के प्रीमियम के एवज में 90 रुपये से अधिक रहा है। नेशनल इंश्योरेंस ने 100 रुपये प्रीमियम लेकर 90.83 रुपये क्लेम दिया है। न्यू इंडिया ने 105.87 रुपये, ओरिएंटल ने 101.96 रुपये और यूनाइटेड इंडिया ने 109 रुपये क्लेम दिया है। सभी सरकारी बीमा कंपनियों का क्लेम औसत 103 रुपये रहा है।

भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) की हालिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि सामान्य, स्वास्थ्य और सरकारी बीमा कंपनियां 100 रुपये का प्रीमियम लेकर सिर्फ 86 रुपये ही क्लेम देती हैं। ये इरडा की रिपोर्ट है, जबकि सच्चाई कुछ और है। आप क्लेम मांग  कर देखिए ,ये कंपनियां कितना परेशान करती हैं। उपभोक्ता के बिल में  मनमर्जी  की कटौती तो आम बात है। इरडा  जो  बीमा कंपनियों पर नियंत्रण करती है।उनकी गतिविधियों पर रोक लगाती है।उसका कार्य है कि बीमा कंपनियों द्वारा अवैघ रूप से रोके गए भुगतान दिलाए।  उसके नियंत्रण के बावजूद  क्यों नही बीमा कंपनियों पर सही से नियत्रंण नही हो रहा। इरडा ने कहा कि  बीमा कंपनियां 100 रूपये के प्रीमियम पर 86 रूपया ही क्लेम दे रही है । रिपोर्ट में यह भी कहा गयाहै कि है। कुछ बीमा कंपनियां तो 100 रुपये के एवज में 56 रुपये ही क्लेम दे रही हैं।इरडा ने ये रिपोर्ट तो जारी कर दी किंतु यह नही बताया कि प्रीमियम की  एवज में कम भुगतान करने वाली बीमा कंपनियों के विरूद्ध वह क्या कार्रवाई कर रहा है?वह ऐसा कर कर रहा है कि बीमा कंपनियां पूरा भुगतान दें। उसे इस रिपोर्ट पर उठाए गए कदम और आदेश भी बताने चाहिए थें।

दरअस्ल  बीमा कंपनियों की भुगतन में मनमर्जी चलती है।बीमा कराने वाले की कोई नही सुनता। मेरा ओरिंयटल इंशोरेंस कंपनी का दस लाख का मैडिक्लेम है।दस साल से पुरानी पोलिसी है। पहले यह बीमा पांच लाख रूपये का था। लगभग छह साल पहले मैंने इसे बढ़ाकर दस लाख का करा लिया।दस लाख में मैं और मेरी पत्नी दोनों कवर है।मैंने लगभग  चार साल पहले  अपनी पत्नी की आंख का मोतियाबिदं का आपरेशन देहरादून के अमृतसर आई क्लीनिक में कराया। कंपनी का कहना है कि मोतियाबिदं के आपरेशन में हम चालिस हजार रूपये  का भुगतान करेंगे। आपने खर्च कितना ही किया हो, हमें इससे कुछ नही लेना।मैंने दोनों आखों के आपरेशन का 40− 40 हजार रूपये  का बिल कंपनी को  भेजा । पहले आपरेशन का इन्होंने अपनी मनमर्जी से 22 हजार का भुगतान किया। दूसरी आंख का चालिस हजार रूपये का भुगतान दिया। मैंने लिखा पढ़ी की तो उत्तर आया कि हम कर सकते हैं। हमने कर दिया।काफी लिखा पढ़ी करने  और धमकाने पर काफी समय बाद बचे 18 हजार रूपये भुगतान किया।इसके बाद मैंने घुटनों का ट्रांसप्लांट कराया।पहले घुटने का बिल भेजा। दो लाख 38 हजार का। इन्होंने भुगतान किया  दो लाख 36 हजार का।दूसरे घुटने के  आपरेशन का बिल बना दो लाख 42 हजार । इन्होंने इस भुगतान किया दो लाख 38 हजार । यह ठीक था । इतनी कटौती हो सकती है।इस पर किसी भी उपभोक्ता को आपत्ति नही होगी।

 पिछले साल मैं छोटे बेटे के पास राजकोट में था।वहां मुझे बाईपास सर्जरी करानी पड़ी।इस  सर्जरी का खर्च में इन्होंने करीब  70 हजार की कटौती की।इसमें 55 हजार के आसपास  आपरेशन के दौरान अस्पताल द्वारा मुझे खिलाए भोजन के साथ ही  आपरेशन में प्रयुक्त हुए सामान निडिल, ग्लोबज और सिरेंज  आदि के व्यय की की गई। अब को इनसे पूछने वाला नही कि आपरेशन के दौरान अस्पताल में रहने के दौरान क्या मरीज भोजन नही करेगा? क्या बिना भोजन किए आठ दिन रहा जा सकता है? इंजेक्शन सिरेंज , निडील ,ग्लोबस आदि के बिना आपरेशन हो सकता है, ? कितुं कोई सुनने वाला  नही।ये मेरा ही नही औरों का भी ये ही किस्सा है। उन्होने भी कहा कि उनके भी आपरेशन में प्रयोग हुईं  निडिल सिरेंज गलोब्स के भुगतान में मनमर्जी है। किसी केस में भुगतान कर देते हैं किसी में नहीं। ये समझ नही  आता कि भुगतान में  बीमा कंपनियों मनमर्जी क्यों करती हैं?  इरडा को स्पष्ट आदेश करना चाहिए कि वे क्या भुगतान करेंगी क्या नही।ये ही आदेश वाहनों के बारे में होना चाहिए।   इरडा ने पीछे आदेश किया कि अप्रेल 2024 से सभी  अस्पताल में कैशलेश की सुविधा मिलेगी, किंतु सभी कंपनी ऐसा नही कर रही। एक बात और अप्रेल 2024 से पहले अस्पताल को कैशलैश के पैनल में शामिल करने में भी बड़ा खेला है।प्राइवेट कंपनियां  तो केशलैश के पैनल में अस्पताल को शामिल करने में बहुत उदार हैं, कितुं सरकारी  कंपनी नहीं ।पत्नी की आखों का मोतियांबिंद का आपरेशन देहरादून के प्रसिद्ध  25 साल से ज्यादा पुराने अस्पताल अमृतसर आई क्लीनिक में कराया। इतना पुराना ये अस्पताल ओरियंटल इंशोरेंस कंपनी के पैनल में नही था ।गुजराज का स्टर्लिंग अस्पताल वहां का बड़ा और 25 साल पुराना अस्पताल है।इसकी गुजरात में कई ब्रांच है।यह भी  इस कंपनी के पैनल में नही है।छोटे शहरों के अस्पताल की तो बात ही क्या की जाएं।  पिछले अप्रेल से इरडा ने आदेश किया है कि पैनल में न होने वाले अस्पतालों में भी कैशलैश की सुविधा मिलेगी, किंतु अब भी इन कंपनी की मनमर्जी  चल रही है। सभी को कैशलैश की सुविधा नही मिल रही।मजबूरन लोगों को अस्पताल को पहले खुद भुगतान करना पड़ता है, बाद में बीमा कंपनी भुगतान करती हैं, वह भी मनमर्जी से । इस भुगतान में भी कई –कई माह लगा देती हैं। इरडा को चाहिए कि बीमा कंपनियों को यह भी आदेश करे कि बीमा कंपनियां बिल प्राप्त होने के बाद 15 दिन में बिल की राशि का भुगतान करें। भुगतान में विलंब होने पर बाजार दर से उपभोक्ता को  उसके बिल की राशि पर सूद दे।  

अशोक मधुप

 (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Thursday, January 16, 2025

अखबारों की सुर्खी नही बना प्रवासी सम्मेलन

  अखबारों की सुर्खी नही बना  प्रवासी सम्मेलन

अशोक मधुप

वरिष्ठ पत्रकार

आठ से दस जनवरी  तक चला 18वां प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन अखबारों की सुखियां भी नही बन सका।उड़ीसा राज्य के भुवनेश्वर में हुए इस  तीन दिवसीय सम्मेलन की कामयाबी पर न लेख लिखे गए न संपादकीय।  ये  सम्मेलन एक रूटिन का कार्यक्रम ही बन कर रह गया।सरकार ये वह भी नही बताया कि देश की विकास याजनाओं में बाधक देश में फैले   भ्रष्टाचर को रोकने की उसकी क्या योजनाएं हैं?प्रवासी भारतीयों के भारत के विकास में योगदान के लिए आने वाले प्रोजेक्ट की अनुमति आदि की मानिटरिंग के लिए उच्च स्तर पर इसकी देखरेख करने के लिए क्या करने का इरादा हैं? उच्च स्तर पर ये भी   देखा जाए कि  प्रोजेक्ट की अनुमति में अनावश्यक विलंब तो नही किया जा रहा?रिश्वत की चाहत में उद्योगपति को परेशान तो नही किया जा रहा?   

इस बार के प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन का विषय-‘विकसित भारत में प्रवासी भारतीयों का योगदान’ जरूर रहा किंतु इसमें न कोई निर्णय हुए न कोई विशेष प्रस्ताव। प्रवासियों को भारत के चुनाव में मत देने का अधिकार है, किंतु न वे वोट बनवाने में रूचि रखते हैं, न वोट डालने में। उनसे वोट बनवाने और देश के विकास के लिए अपनी सरकार बनाने के लिए वोट करने की अपील की जा सकती थी किंतु वह भी नही की गई। 2003  से मनाना  शुरू हुई  प्रवासी सम्मेलन अभी तक एक औपचारिकता ही लगा।

भुवनेश्वर में  इस प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन की शुरुआत बुधवार को   विदेश मंत्री एस जयशंकर के उदबोधन से हुई। उन्होंने प्रवासी भारतीयों और भारतीय मूल के लोगों से 'विकसित भारत' के निर्माण में सक्रिय रूप से भाग लेने का आह्वान किया। ओडिशा को असीमित अवसरों की भूमि बताते हुए मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने गुरुवार को प्रवासी भारतीयों से राज्य की विकास यात्रा में भाग लेने का आह्वान किया।

इस प्रवासी भारतीय दिवस के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए श्री माझी ने कहा, “ओडिशा सिर्फ़ अपने गौरवशाली अतीत और प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं जाना जाता; यह भविष्य के लिए असीम अवसरों की भूमि है।” ओडिशा के निवेशक-अनुकूल वातावरण पर प्रकाश डालते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य अब भारत में निवेश के लिए सबसे स्वागत योग्य स्थलों में से एक है। मुख्यमंत्री ने कहा, "मैं आप सभी से इन अवसरों का लाभ उठाने और अपनी मातृभूमि के विकास और समृद्धि में योगदान देने का आग्रह करता हूं। वैश्विक भारतीय प्रवासी समुदाय के सदस्य के रूप में, आप दुनिया के लिए हमारे राजदूत हैं। मैं आपको ओडिशा और भारत के लिए एक उज्ज्वल भविष्य को आकार देने में हमारे साथ हाथ मिलाने के लिए आमंत्रित करता हूं। हम सब मिलकर 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं।"

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नौ को जनवरी,  सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि आज विश्व भारत की बात सुनता है, तथा देश अपनी विरासत के कारण ही अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यह बताने में सक्षम है कि भविष्य युद्ध में नहीं, बल्कि बुद्ध में निहित है।

इस मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने प्रवासी भारतीय एक्सप्रेस को भी हरी झंडी भी दिखाई। यह भारतीय प्रवासियों के लिए स्पेशल टूरिस्ट ट्रेन है, जो दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से चली और तीन सप्ताह तक कई टूरिस्ट प्लेसेज तक जाएगी। विदेश मंत्रालय की प्रवासी तीर्थ दर्शन योजना के तहत इसका संचालन किया जा रहा है। गौरतलब है कि इस कार्यक्रम के लिए 70 देशों से तीन हजार से ज्यादा प्रतिनिधि ओडिशा पहुंचे हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरुवार को सम्मेलन में चार प्रदर्शनियों का उद्घाटन किया, जिनमें भारत की सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं और प्रवासी भारतीयों के योगदान को प्रदर्शित किया गया। उन्होंने कहा कि  प्रवासी भारतीय दिवस, भारत और उसके प्रवासियों के बीच संबंधों को प्रगाढ़ करने वाली एक संस्था बन चुकी है। श्री मोदी ने उल्‍लेख किया कि हम सब मिलकर भारत, भारतीयता, अपनी संस्कृति और प्रगति का उत्‍सव मनाते हैं और साथ ही अपनी जड़ों से जुड़ते हैं।राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने 10 जनवरी के समापन सत्र में प्रवासी भारतीयों को संबाधित किया। और प्रवासी भारतीय सम्मान पुरस्कार प्रदान किए।

राष्ट्रपति ने इस अवसर पर अपने संबोधन में कहा कि प्रवासी भारतीय हमारे देश की सर्वश्रेष्ठ पहचान हैं। चाहे वह प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, कला या उद्यमिता का क्षेत्र हो, प्रवासी भारतीयों ने अपनी ऐसी छाप छोड़ी है जिसे दुनिया स्वीकार करती है और सम्मान देती है।

दुनिया भर से आए सैकड़ों प्रवासी भारतीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए भुवनेश्वर के जनता मैदान में एकत्र हुए। उन्होंने गर्मजोशी से स्वागत और इस आयोजन की तैयारियों को लेकर ओडिशा की सराहना की। प्रवासी भारतीयों ने कहा कि यह आयोजन राज्य की जीवंत सांस्कृतिक धरोहर का अनुभव करने का एक बेहतरीन अवसर प्रदान कर रहा है।

पचास वर्षों से स्लोवेनिया में रहने वाली एक प्रवासी भारतीय कोकी वेबर ने इस आयोजन में शामिल होने को लेकर खुशी जाहिर की। वह नमस्ते नाम का एक कारोबार चलाती हैं, जिसमें भारतीय हस्तशिल्प को बढ़ावा दिया जाता है। उन्होंने कहा, मैं भारतीय हस्तशिल्प से बने चमड़े के सामान, रेशमी स्कार्फ, अगरबत्तियां और इनर गारमेंट्स बेचती हूं, जो सभी भारत में बने होते हैं। कोकी ने ओडिशा को भारत का एक छिपा हुआ रत्न बताया। 

इस सम्मेलन के आयोजन से पूर्व सरकार द्वारा वह नही बताया गया कि अब तक आयोजित 17 प्रवासी सम्मेलन की उपलब्धि कया है। इसके माध्यम से देश में कितने उद्योग आए।कितनी भारतीय प्रतिभाएं स्वदेश  वापिस लौटी। हालाकि यह सर्व विदित है कि प्रवासी भारतीय  पहले के मुकाबले अब सूदूर देश में अपने को ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। वे मानते  है कि मुसीबत की घड़ी में उनका देश और वहां की सरकार उनके साथ मजबूती से खड़ी होगी और भरसक मदद करेगी।

इस सम्मेलन में केंद्र द्वारा  प्रवासियों से भारत के विकास में योगदान की अपील के साथ यह नही बताया गया कि वे देश  विकास का माहौल बनाने के लिए क्या कर रहा है।  हाल में एक सर्वे में दावा किया गया है कि 100 में से 66 लोगों को अपना काम  कराने के लिए सरकारी तंत्र को रिश्वत देनी पड़ती है। चलते देश में उद्यमिता को बढ़ावा देने की सिंगल विंडो क्लियरेंस और ईज आफ डुइंग बिजनेस जैसे प्रयासों को पलीता लग रहा है।एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि करीब 66 प्रतिशत कंपनियों को सरकारी सेवाओं का लाभ लेने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है। कंपनियों ने दावा किया कि उन्होंने सप्लायर क्वॉलीकेशन, कोटेशन, ऑर्डर प्राप्त करने तथा भुगतान के लिए रिश्वत दी है। लोकल सर्कल्स की रिपोर्ट के अनुसार कुल रिश्वत का 75 प्रतिशत कानूनी, माप- तौल, खाद्य, दवा, स्वास्थ्य आदि सरकारी विभागों के अधिकारियों को दी गई।जांच रिपोर्ट कहती है कि कई कारोबारियों ने जीएसटी अधिकारियों, प्रदूषण विभाग, नगर निगम और बिजली विभाग को रिश्वत देने की भी सूचना दी है। पिछले 12 महीनों में जिन कंपनियों ने रिश्वत दी, उनमें से 54 प्रतिशत को ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया, जबकि 46 प्रतिशत ने समय पर काम पूरा करने के लिए भुगतान किया। इस तरह की रिश्वत जबरन वसूली के बराबर है।केंद्र सरकार को  इस रिपोर्ट के बारे  टिप्पणी करनी चाहिए थी। यह भी बताना चाहिए था कि इस भ्रष्टाचार के नाम पर इस जबरन वसूली रोकने की इसकी क्या योजनांए है?देश में उद्योग लगाने के लिए माहौल बनाने के लिए उसकी क्या तैयारी हैं?

अशोक मधुप

 (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Wednesday, January 8, 2025

आदमी अब घर से बाहर क्या खाएं?

आदमी अब घर से बाहर क्या खाएं? अशोक मधुप वरिष्ठ पत्रकार हाल में खबर आई है कि आगरा में 18 प्रसिद्ध और बड़ी कंपनियों के नाम से नकली घी तैयार हो रहा था। तैयार घी की पूरे यूपी समेत कई प्रदेशों में सप्लाई होती थी।इस घी से बाजार में फास्ट फूड तैयार होते हैं।पहले भी समय –समय पर नकली घी पकड़ा जाता रहा है। बाजार में पनीर, दूध, मावा और अन्य खाद्य पदार्थ के नकली होने की शिकायतें मिलती रहती हैं।आटा,दाल और अन्य खाद्य सामन भी घटिया क्वालिटी का पकड़ा जाता रहा है।पिछले कुछ समय से खाने या पानी में थूकने, पेशाब करने , खाने के बर्तन को नाली के पानी में धोने की शिकायते रहीं हैं। ऐसे में प्रश्न पैदा होता है कि आदमी घर से बाहर अब क्या खाएं? सफर में पेट भरने के लिए आदमी क्या करे? क्या हमें पुरानी स्थिति पर जाना होगा, जब आदमी घर से ही खाना लेकर चलता था। घर का खाना खत्म होने पर फल खाकर काम चलाता था, किंतु बाजार का नही खाता था। या अब उसे घर से बड़ी कंपनियों के रेटीमेड फूट पैकेट लेकर चलने होंगे? आगरा के ताजगंज के मारुति सिटी रोड पर नवविकसित कॉलोनी के प्लॉट में नकली देसी घी तैयार करके पूरे प्रदेश में सप्लाई किया जा रहा था। पुलिस और एसओजी की टीम ने छापा मारकर अमूल, मधुसूदन, पतंजलि सहित 18 मशहूर ब्रांडों के नाम की पैकिंग में नकली देसी घी जब्त किया है। इसमें रिफाइंड व अन्य कैमिकल की मिलावट की जा रही थी। फैक्टरी के मैनेजर सहित पांच लोग गिरफ्तार किए हैं। डीसीपी सिटी सूरज कुमार राय ने बताया कि मारुति सिटी रोड पर मारुति प्रभासम कॉलोनी में राजेश अग्रवाल नामक व्यक्ति के प्लॉट में टिन शेड डालकर फैक्टरी संचालित की जा रही थी। प्लॉट किराए पर ले रखा था। पूछताछ में बताया गया कि ग्वालियर निवासी बृजेश अग्रवाल, पंकज अग्रवाल, नीरज अग्रवाल का प्योर इट के नाम से देसी घी का ब्रांड है। उन्होंने करीब छह माह पूर्व फैक्टरी खोली थी। कॉलोनी के राजेश भारद्वाज को मैनेजर बनाया था। बाजार से जिस ब्रांड की डिमांड मिलती थी, उसी ब्रांड के स्टिकर लगाकर टिन और डिब्बों में पैक कर दिया जाता था। प्रेस को यह भी बताया गया कि फैक्टरी में भारी मात्रा में बना हुआ घी, कच्चा माल, कई कंपनियों के स्टीकर, प्रयोग की जाने वालीं मशीन, पैकिंग मशीन आदि बरामद की गई हैं। बरामद माल की कीमत करोड़ों में बताई जा रही है। पुलिस फैक्टरी के संचालक और कर्मचारियों के विरुद्ध अपनी तरफ से मुकदमा दर्ज कर रही है। एफएसडीए की टीम को भी कार्रवाई के लिए बुलाया गया है। आरोपियों से पूछताछ की जा रही है। पुलिस ने बताया कि छापे से कुछ देर पहले ही नकली देसी घी के 50 टिन की खेप मेरठ भेजी गई थी। इस माल की बरामदगी के प्रयास किए जा रहे हैं। पुलिस ने बताया कि नकली देसी घी प्रदेश के अलावा आसपास के राज्यों में सप्लाई किया जा रहा था। पॉम आयल, रिफाइंड, वनस्पति और एसेंस से तैयार हो रहा था।सुगंध असली घी जैसी और दाने भी रवेदार, एकबारगी तो पुलिस टीम को भी असली घी का भ्रम हुआ। डीसीपी सिटी सूरज कुमार राय ने बताया कि वह खुद मौके पर पहुंचे। सबसे पहला सवाल यह किया कि घी कैसे बनाते थे। आरोपियों ने बताया कि देसी घी की लोगों को पहचान नहीं है। कोई खुशबू देखता है तो कोई दाने। वो लोग पॉम ऑयल, रिफाइंड, वनस्पति घी, कैमिकल को मिलाकर देसी घी तैयार किया करते थे। उसमें एसेंस मिलाते थे। ताकि खुशबू आए। मौके से एक्सपाइरी डेट का रिफाइंड भी मिला। पुलिस ने आरोपियों से पूछा कि इसको क्यों खरीदा। मजदूरों ने बताया कि एक्सपाइरी डेट का माल सस्ता मिलता है। जब वे देसी घी बनाते थे तो इस रिफाइंड का भी प्रयोग करते थे। आगरा पुलिस के अनुसार बिल्टियों की जांच में पता चला कि नकली देसी घी को राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, असम व बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश के दो दर्जन से ज्यादा शहरों के फास्ट फूड बाजारों में सीधे बेचा जाता था। इसी घी से डोसा, भल्ले, समोसे और आमलेट तक बनाया जाता था। खाद्य और औषधि विभाग ग्वालियर के अनुसार रामनाथ अग्रवाल व उनके परिवार के लोग पहले नकली घी के कारोबार में लिप्त थे और रासुका भी लगी थी।2010 के बाद से इन्होंने ग्वालियर छोड़ दिया था। इससे पहले 24 नवंबर 2023 को दिल्ली पुलिस ने द्वारका में एक ऐसी फैक्ट्री का भंडाफोड़ किया है, जहां मिलावटी घी बनाया जाता था और उसे पतंजलि, मदर डेयरी और अमूल जैसे ब्रांड का स्टिकर लगे हुए कंटेनर में भरकर बेचा जाता था। बाबा रामदेव की नामी-गिरामी कंपनी पतंजलि ब्रांड गाय के घी का सैंपल खाद्य सुरक्षा और औषधि विभाग के द्वारा साल 2021 में दीपावली के पर्व पर टिहरी जनपद के घनसाली में एक दुकान से सैंपल भरा गया था। इसके बाद सैंपल को राज्य की प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजा गया तो, सैंपल फेल पाया गया। खाद्य संरक्षा विभाग के द्वारा कंपनी को नोटिस जारी किया तो, कंपनी ने राज्य की लैबोरेट्री को रिपोर्ट को गलत साबित किया। खाद्य संरक्षा विभाग के द्वारा केंद्रीय प्रयोगशाला में सैंपल भेजा गया तो केंद्रीय प्रयोगशाला में भी बाबा रामदेव की पतंजलि ब्रांड गाय के घी का सैंपल फेल पाया गया। आज लोगों का घर से निकलना, घूमना, यात्र करना, विभागीय कार्य से बाहर जाना आम बात है।इन लोगों को ऐसे में घर से बाहर ढ़ाबों, होटल और फाष्ट फूड सैंटर से ही पेट भरना होता है। बाजार में नकली दूध पनीर की पहले ही शिकायत रही हैं।अन्य खाद्य पदार्थ की भी शुद्धताकी कोई गारंटी नही। बिजनौर जनपद के चांदपुर क्षेत्र में पिछले साल नवरात्रि के अवसर पर बाजार में बिक रहे घटिया क्वालिटी का कोटू का आटा का खाकर काफी व्यक्ति पहले ही बीमार पड़ चुकें हैं। पिछले एक डेढ़ वर्ष से शिकायत मिल रही हैं कि कुछ लोग खाने में थूक रहे हैं। फलों पर पेशाब डालकर छिड़क रहे हैं।ब्रेड में थूका जा रहा है। खाने की सामग्री अपवित्र कर बेची जा रही है। मानव की फितरत रही है कम पैसा लगाकर ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाना। उसे इससे कोई मतलब नही कि उसके द्वारा उत्पादित खाद्य सामग्री खाने से खाने वाले पर क्या असर पड़ेगा। नकली सामान तैयार करने वालों को इससे कोई लेना − देना नही कि उनके द्वारा तैयार नकली और निम्न क्वालिटी के सामान के प्रयोग करने वाला बीमार होगा या नही ।क्या असर होगा। वह मरेगा या जिएगा। इसे मिलावट को रोकने के लिए सरकार का आगे आना होगा। मिलावट करने वालों के खिलाफ कड़ी और आजीवन कारावास जैसी सजा, संपत्ति की जब्ती जैसी कार्रवाई अमल में लानी होगी।भोजन को अशुद्ध करने के मामले में धर्म गुरूओं को आगे आकर जनचेतना पैदा करनी होगी। यदि ऐसा न हुआ तो हो सकता है, कि आने वाले समय में आदमी आज से 100 साल पीछे की हालत में चला जाए।यह घर से खाना और सफर में तैयार किए जाने वाले खाने का सामान लेकर चलता । इस सामान के खत्म होने पर यह विवशता में फल आदि खाकर काम चलाता था, किंतु बाजार का कुछ नही खाता था। यह भी हो सकता है कि आने वाले समय में सफर पर जाने वाला अपने साथ बड़ी कंपनी की तैयार खाद्य सामग्री लेकर चले और सफर में उसी से उदर पूर्ति करे। अशोक मधुप ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Friday, December 20, 2024

कुछ भी कहो, सरकारी तंत्र में नही घटा भ्रष्टाचार

 

अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

केंद्र और भाजपा शासित राज्यों की सरकारे कितना  ही भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने का दावा करें किंतु सच्चाई इसके वितरीत है। एक सर्वे में दावा किया गया है कि 100 में से 66 लोगों को अपना काम  कराने के लिए सरकारी तंत्र को रिश्वत देनी पड़ती है किंतु सच्चाई इसके विपरीत है। शायद ही कोई विभाग ऐसा होगा जहां बिना   रिश्वत दिए काम हो जाए।सब जगह हालत बहुत खराब है।गैर भाजपा राज्यों की तरह भाजपा  शासित राज्यों में भी  प्रशासनिक तंत्र में भ्रष्टाचर का बोलबाला है। सरकारें मौन हैं।

देश में केंद्र और राज्य सरकारें कारोबार में सहूलियत और निजी क्षेत्र के निवेश में तेजी लाने पर जोर दे रहीं हैं। वहीं भ्रष्ट सरकारी मशीनरी अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल कंपनियों और उद्यमियों से अवैध तरीके से पैसे उगाहने में लगी हैं, जिसके चलते देश में उद्यमिता को बढ़ावा देने की सिंगल विंडो क्लियरेंस और ईज आफ डुइंग बिजनेस जैसे प्रयासों को पलीता लग रहा है।एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि करीब 66 प्रतिशत कंपनियों को सरकारी सेवाओं का लाभ लेने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है। कंपनियों ने दावा किया कि उन्होंने सप्लायर क्वॉलीकेशन, कोटेशन, ऑर्डर प्राप्त करने तथा भुगतान के लिए रिश्वत दी है। लोकल सर्कल्स की रिपोर्ट के अनुसार कुल रिश्वत का 75 प्रतिशत कानूनी, माप- तौल, खाद्य, दवा, स्वास्थ्य आदि सरकारी विभागों के अधिकारियों को दी गई।

जांच रिपोर्ट कहती है कि कई कारोबारियों ने जीएसटी अधिकारियों, प्रदूषण विभाग, नगर निगम और बिजली विभाग को रिश्वत देने की भी सूचना दी है। पिछले 12 महीनों में जिन कंपनियों ने रिश्वत दी, उनमें से 54 प्रतिशत को ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया, जबकि 46 प्रतिशत ने समय पर काम पूरा करने के लिए भुगतान किया। इस तरह की रिश्वत जबरन वसूली के बराबर है।

सरकारी एजेंसियों के साथ काम करते समय कंपनियों के काम जान बूझ कर रोके जाते हैं और रिश्वत लेने के बाद ही फाइल को मंजूरी दी जाती है। सीसीटीवी कैमरों लगाने से सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ है। सर्वे में दावा किया गया है कि सीसीटीवी से दूर, बंद दरवाजों के पीछे रिश्वत दी जाती है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि सरकारी ई-प्रोक्योरमेंट मार्केटप्लेस जैसी पहल भ्रष्टाचार को कम करने के लिए अच्छे कदम हैं, लेकिन सरकारी विभागों में रिश्वत लेने के रास्ते खुले हुए हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर डेलायट इंडिया के पार्टनर आकाश शर्मा ने कहना है कि बहुत सी कंपनियों को लगता है कि नीतियों और प्रक्रिया के मामलों में थोड़ा पैसा देते रहने नियम कानून के मोर्चे पर कड़ी जांच पड़ताल और जुर्माने से बच जाएंगे। सर्वे में 18,000 कारोबारियों के जवाब को शामिल किया गया है। सर्वे देश के 159 जिलों में हुआ है।

व्यवसायों ने पिछले 12 महीनों में आपूर्तिकर्ता के रूप में अर्हता प्राप्त करने, कोटेशन और ऑर्डर सुरक्षित करने तथा भुगतान एकत्र करने के लिए विभिन्न प्रकार की संस्थाओं को रिश्वत देने की बात स्वीकार की है। यह सर्वेक्षण 22 मई से 30 नवंबर 2024 के बीच किया गया था। सर्वेक्षण में भाग लेने वाली व्यावसायिक फर्मों ने कहा कि 75 प्रतिशत रिश्वत कानूनी, मेट्रोलॉजी, खाद्य, औषधि, स्वास्थ्य आदि विभागों के अधिकारियों को दी गई।

 सरकारी विभागों को घूस देने वाले कारोबारियों का प्रतिशत इस प्रकार है। कानूनी, माप तौल, खाद्य, दवा और स्वास्थ्य विभाग- 75,लेबर और पीएफ विभाग- 69,संपत्ति और भूमि पंजीकरण – 68,जीएसटी अधिकारी- 62,प्रदूषण विभाग- 59,नगर निगम- 57,इनकम टैक्स- 47,अग्नि शमन- 45,पुलिस- 43,परिवहन- 42,बिजली- 41,आबकारी- 38।

ये आंकड़े कुछ भी हों, सच्चाई इससे भी बदतर है। ये बड़े स्तर की बात है।स्थानीय स्तर पर तो हालत इससे भी खराब है।भाजपा शासित प्रदेश वाले राज्यों में तो सपा −बसपा शासन काल में जहां गलत काम एक हजार रूपये में हो जाता था, अब भाजपा शासन में गलत काम तो होता ही नही ,सही काम  कराने के भी एक हजार की जगह बीस हजार रूपये दिए जाते हैं।बिजली के कनेक्शन के लिए आवेदन करिये। ये बहुत छोटा काम है, किंतु बिजली इंस्पैक्टर को रिश्वत दिए कनेक्शन स्वीकृत नही होगा।बिजली की फीटिंग किसी से भी कराएं किंतु बिजली विभाग के अधिकृत ठेकेदार से बिजली फीटिंग का प्रमाणापत्र लेना होता है। यही ठेकेदार बिजली इंस्पैक्टर का भाग भी आपसे ले लेता है। रजिस्ट्रार आफिस में धड़ल्ले से बैनामे  की राशि का दो प्रतिशत वसूला जाता है। यह राशि अधिकारी सीधे नही लेते । बैनामा लिखने वाला कातिब लेता है। शाम को बैठकर आराम से दिन भर का लेन −देन हो जाता है।एनओसी देने वाले विभागों की तो हालत और भी खराब है। फायर विभाग के अधिकारियों ने तो  अपने ठेकेदार रख लिए हैं। अग्नि सुरक्षा का सारा काम ये ही कराते हैं।इसके बाद भी एनओसी साइन करने के लिए लाखों रूपया वसूला जाता है। और तो और अग्निशमन अधिकारी एनओसी देने से पहले फायर उपकरण  अपने चहेते ठेकेदार से सप्लाई कराते हैं। स्थानीय  निकाय में निर्माण  कार्यों में 45 से 55 प्रतिशत सरे आम कमीशन लिया जा रहा है।

केंद्र और प्रदेश सरकार के आदेश हैं कि सरकारी खरीद जेम पार्टल से हो।इसका भी  रास्ता निकल गया।  कंपनी के एजेंट अधिकारियों से मिलते हैं। कमीशन तै होता है। अधिकारी अपना जैम पोर्टल का पासवर्ड

कंपनी के एजेंट को बता देते हैं। एजेंट पासवर्ड   लेकर जैम पार्टल से ही अपनी फर्म से खरीदारी करता है। सामान के रेट में अधिकारियों का कमीशन जुड़ जाता है।सब वैसे ही चल रहा है। कहीं कुछ नही बदला। सरकार  भ्रष्टाचार रोकने को आदेश  बाद में करती है । अधिकारी और सप्लायर रास्ता  पहले निकाल लेतें हैं। उत्तर प्रदेश में आदेश  हो गए कि सामन प्रदेश स्तर से खरीदा जाएगा।  अब काम और भी   सरल हो गया। पहले जिलों में अधिकारियों से संपर्क  कर माल सप्लाई होता था। अब अकेले प्रदेश स्तर में ही जुगाड़ करना  पड़ता है।इसी का कारण है कि जिलों के अस्पतालों में वितरण के लिए वे  दवाई आती हैं, जिनकी एक्सपायर डेट नजदीक होती है। दवा आने के साथ ही आदेश  आते हैं कि दवा की एक्सपायर डेट नजदीक है।जल्दी बांटकर दवा खत्म करो।सरकारी अस्पतालों में मरीजों को घटिया क्वालिटी  के भेजन वितरण की शिकायत आम बात हैं किंतु कुछ होता  नहीं।

लेखक एक दिन दूधिए से बात कर रहा था।लेखक ने दूधिए से पूछा कि किसी को कुछ देना तो  नही पड़ता।  उसने कहा कि तीन इंस्पैक्टर हैं। दो प्रतिमाह 1500− 1500 रूपये लेते हैं। और तीसरा दो हजार। मैंने पूछा कितने दूधिए हैं।  उसनें कहा कि बिजनौर जैसे छोटे  शहर में तीन हजार दूधिए दूध सप्लाई करते हैं।पास्पोर्ट के आवेदन के वेरीफिकेशन के लिए पुलिस और एलआइयू में जाकर देखिए।ऐसे ही पुलिस में चरित्र की जांच के लिए जाइए। बिना लिए −दिए कुछ नही होगा।

भ्रषटाचार की इससे बड़ी सीमा क्या होगी, कि अधिकारियों ने राइफल एसोसिएशन के नाम पर शास्त्रों के लांइसैंस बनाने पर 10 से 30 हजार रूपये तक कुछ जगह वसूलने शुरू कर दिए।शस्त्र  नवीनीकरण  पर तो शुल्क एसोसिएशन शुल्क लंबे समय से लिया जा रहा है । इस एसोसिएशन में जमा धन  का न कोई हिसाब है न ही कोई आडिट। ऐसे ही जनपद के नाम पर कल्याण समिति बना ली ।हैसियत और वारिसैन बनवाने आने वालों  से बड़ी रकम वसूलनी शुरू कर दी।ये रकम     

अधिकारियों के ऐश− और आराम पर खर्च होने लगी।अधिकारियों की कोठी में थोक में एयर कंडीशन  लगने लगे। कोठियों की राजाओं जैसी सजावट होने लगी।  अलग− अलग जगह अलग −अलग तरह के रास्ते निकाल लिए।

पुराने लोग कहते हैं कि भ्रष्टाचर ऊपर    से नीचे जाता है, किंतु अब ऐसा नही है। अब  ऊपर की न शिकायते मिलती हैं न चर्चाएं किंतु नीचे तो सब और लूट के द्वार खुलें हैं। कहीं भी जाइए।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)