Monday, September 9, 2024

नार्मल के बीटीसी बनने का सफर

 

नार्मल के बीटीसी बनने का सफर

 

जब मैने जूनियर हाई स्कूल यानी कक्षा आठ की परीक्षा जूनियर हाई स्कूल झालू से पास की तो मेरे बाबा (ग्रांड फादर) ने मुझ से कहा था, जानार्मल की ट्रेनिंग कर ले। मास्टर बन जाएगा। पंडित केशव शरण शर्मा जी जिला परिषद के

चैयरमैन है, तो तेरा चयन भी हो जाएगा। मैने उनकी बात मानी और नार्मल की ट्रेनिंग के होने वाले साक्षात्कार में गया। पंडिंत जी उस साक्षात्कार में बैठे किंतु मेरी उम्र कम होने के कारण मेरा चयन न हो सका और मै प्राइमरी स्कूल का

मास्टर बनते बनते रह गया। पंडित जी रिश्ते के मेरे बाबा

लगते थे, वे जिला पंचायत के चेयरमैन

होते थे पर मेरा नार्मल की ट्रेनिंग में चयन न हो सका। हां एम. ए करने के बाद में मैने बीएड किया पर शिक्षण का

व्यवसाय रास न आया और तीन साल बाद उसे अलविदा कह पत्रकार बन गया।

 आज जिस बीटीसी की परीक्षा के लिए प्रवेश परीक्षा  हो रही है,  इतनी मारामारी मची हुई है, और बीटेक ,एमबीए , एमसीए, पीएचडी डिगरीधारक तक इसे करने के लिए आवेदन कर रहे हैं,प्राय मैरिट भी सत्तर प्रतिशत से ज्यादा रही है। मेरी

किशोरावस्था के समय इसमें प्रवेश की योग्यता मात्र कक्षा आठ पास थी। उस समय बीटीसी को नार्मल की ट्रेनिंग कहते

थे। इस ट्रेनिंग को कराने वाले स्कूलों को नार्मल स्कूल कहा जाता था।

क क्षा आठ तक की शिक्षा जिला पंचायत के अधीन थी। वही शिक्षकों को प्रशिक्षण दिलाती और उनकी नियुक्ति करती थी। बाद में लडक़ों के लिए नार्मल की ट्रेर्निंग करने की योग्यता हाई स्कूल हो गई जबकि लड़कियों की योगयता कक्षा आठ पास ही रही । १९६७ में ट्रेनिंग करने वाले शिक्षकों के प्रमाण पत्र पर इस योग्यता का बाकायदा उल्लेख है। इस प्रशिक्षण का नाम हिंदुस्तानी सर्टिफिकेट ट्रेनिंग था। इस ट्रेनिंग के लिए योग्यता बढऩी शुरू हुई तो इंटर होकर अब बीए हो गई। बाद में इसका नाम भी बदल कर बीटीसी हो गया। पहले यह ट्रेनिंग दो साल की होती थी , बाद में बीटीसी होने पर प्रशिक्षण की अवधि एक साल हुई, अब बढक़र इसकी अवधि फिर दो साल हो गई। पहले देहात में कक्षा आठ तककी शिक्षा का संचालन जिला पंचायत

और नगर में नगर पालिका करती थी।अब यह बेसिक शिक्षा के अधीन है।

       किसी समय गुरू को बहुत सम्मान मिलता था, शिक्षा पूरी करने पर गुरू दक्षिणा देने का प्रावधान था। महाभारत काल में  तो द्रोणाचार्य ने गुरू दक्षिणा में अपने शिष्य का दाएं हाथ का अंगूठा ही मांग लिया  था।

इन्ही द्रोणाचार्य ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए पांडवोंसे अपने दुश्‌मन राजा द्रुपद को बंदीके रूप में लाने को कहा था । उस समय तक गुरूकुल शिक्षा के साथ साथ देश के

संचालन में मददगार होते थे। तक गुरू छात्र को ज्ञान के साथ साथ तकनीकि शिक्षा और युद्धकला भी सिखाते थे।

हस्तिनापुर राज्य के राजकुमारों को पढ़ाने के लिए द्रोणाचार्य और कृपाचार्य जैसे गुरू के दरबारी होने और छात्रों से भेदभाव करने के कारण गुरू का पतन होना शुरू हुआ।गुरू की गरिमा गिरी तो शिक्षा कास्तर भी गिरा। गुरू दक्षिणा में अंगूठा

मांगे जाने की मिसाल भी महाभारत में ही मिलती है। शिक्षक के पतन कीयहां से हुई शुरूआत अब तक जारी रही। गुलामी के दौर में शिक्षक कासम्मान बहुत गिरा। आजादी के बाद भी कोई खास फर्क नहीं पडा़। और सबसेसरल छोटे बच्चों को पढ़ाने का

कार्य हो गया। जो कुछ नहीं कर पाता वह टीचर बन जाता।

    शिक्षा जगत से आए डा. राधाकृष्णनके समय से शिक्षकों को सम्मान मिलनाशुरू हुआ। उनके जन्म दिन पांच सितंबर

 को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा और शुरू हुआ

शिक्षकों के सम्मान का सिलसिला। आज शिक्षा का सुधार हुआ, शिक्षकों के वेतन बहुत अच्छे हुए तो योग्य युवकयुवतियों का इस और रूझान बढ़ा है। अब एमबीए, बीटेक यहां शिक्षक

बनने आ रहे है, किंतु वह यहां करेंगे क्या, काश वह अपनी योग्यतावाली तकनीकि शिक्षा में पढ़ाने जाते तो बहुत अच्छा रहता। यहां वे शिक्षा के प्रति समर्पण या कुछ नया करने की

भावना से नही आ रहे हैं। वे सरकारी नौकरी पाने की आस में

यहां आए है। उनका सोच यह है कि सरकारी नौकरी एक बार मिल गई तो फिर पूरी उम्र चैन से कटेगी।

हालात कैसे भी हो हमें आशा नहीं छोडऩी चाहिए ,उम्मीद रखनी चाहिएकि इनमें भी पंडित मदन मोहनमालवीय,नजीर अकबराबादी ,रविंद्र नाथ टैगोर जैसे गुरू निकलेंगे और शिक्षा के नए आयाम बनांएगे। आने वाला समय में शिक्षा का स्तर ही नहीं बढेग़ा ,अपितु शिक्षकों का समान भी

बढ़ेगा।

अशोक मधुप

 

हमारे धर्मस्थल, हमारा इतिहास

 

हमारे धर्मस्थल, हमारा इतिहास


हमारे धर्मस्थल धार्मिक आस्था कें तो प्रतीक हैं। वे हमारे आस्था 

कें साथ-साथ आत्मविश्र्वास, सहयोग भावना ओर सहृदयता को 

बढ़ाते है। एक बड़ा काम यह हो रहा है कि इन स्थानों पर हमारे 

पारिवारिक इतिहास को संजोकर रखा जा रहा है।धर्मस्थल पर 


पुजारी और पंडे रहते हैं। ये धार्मिकस्थल पर जाने वाले को विधि-

विधान से पूजा-पाठ तो कराते ही हैं, उसके और उसके परिवार के

 रहने की व्यवस्था भी करते हैं। सबसे बड़ा काम यहां यह किया

 जाता है कि वहां जाने वाले के पारिवारिक इतिहास को संजोकर

 रखने का। उनके परिवार का कौन व्यक्तिं कब आया यहां, उसके

 बही-खातों में तो होता ही है साथ ही इतिहास होता है। पूर्वज और


 बच्चों का इतिहास।अक्तूबर २००७ मे बद्रीनाथ जाने का अवसर

 मिला। मेरे साथ गए मेरे दोस्त नरेंद्र मारवाड़ी बद्रीनाथ में, अलवर

 वालो की धर्मशाला में चले गए। वहां पंडित जी से बात की

 वंशानुक्रम कें बारे में बताया, तो पता चला कि उनके देहरादून में

 रहने वाले चाचा धर्मशाला के संरक्षक हैं। जल्दी में होने के कारण

 शाम को उनके पास बैठना हुआ। हम भी मारवाड़ी के साथ पंडित

 जी के पास गए। बात करते-करते पंडित जी ने अपनी बही खोलकर

 उनके गोत्र का विवरण खोला तो पता चला कि उनके पिता जी 41

वर्ष पूर्व यहां यात्रा को आए थे। यात्रा को आने कें बाद हुए उनके दो

 बच्चों का विवरण दर्ज नहीं थे। उन्होंने देखकर उनके दादा कें बारे

 में बताया कि वे ९३ साल पूर्व बद्रीनाथ आए थे। दोनों कें आने की

 तिथि तक वही में दर्ज थी। मारवाड़ी को अपने बाबा का नाम ज्ञात

 था। यहां बही से उन्होंने अपने बाबा कें पिता उनके भाई, बाबा कें

 दादा और उनके भाईयों आदि का विवरण नोट किया। पंडित जी ने

 अपनी वही में मारवाड़ी से अपने और उनके बच्चे, भाई और भाइयों

 के बच्चों की जानकारी नोट की। नीचे तारीख, माह,सन डालकर

 हस्ताक्षर कराए। ऐसा यही नहीं हर तीर्थस्थल में होता है। वहां के

 पंडित और पुजारी अपनी-अपनी वादियों में आने वालों का इतिहास

 दर्ज करके रखते हैं। 41 वर्ष पूर्व पिता के आने और 93वर्ष पूर्व

 दादा के आने की जानकारी पाकर नरेंद्र मारवाड़ी को तो अच्छा

 लगा ही किंतु इतिहास बड़ा सुखद लगा। यह भी अच्छा लगा कि

 यहां पुजारी पारिवारिक इतिहास वंशानुक्रञ्म का इतिहास रखे हैं।

 हिंदुओं में पारिवारिक विवरण दर्ज करने का प्राविधान नहीं है,

किंञ्तु मुस्लिमों में पारिवारिक विवरण रखने की व्यवस्था है। इसे वे

 शजरा कहते हैं। यह एक पेड़ की तरह का होता है। परिवार के


 प्रथम पुुरूष का नाम लिखकर उनके नीचे तीर का निशान बनाकर


 उनके पुत्र का नाम लिखा जाता है। दो पुत्र होते हैं तो दो तीर


 बनाए, दोनों के नाम दर्ज होते हैं। इन पुत्रों के बच्चों के विवरण

 तथा आने वाली संतान की जानकारी इसी प्रकार दर्ज होती जाती

 है।इन धार्मिक स्थलों के पुजारियों से संपर्क कर पारिवारिक इतिहास

 तैयार कराया जा सकता है। पुजारी कहीं जातिनुसार होते हैं, तो

 कहीं जनपद या क्षेत्रानुसार। किसी भी धार्मिकस्थल में जाने पर आप किसी पंडा या पुजारी से पूछे तो वह बता देंगे कि आपके परिवार, गोत्र के पुजारी कौन हैं तथा कहां रहते हैं।

Tuesday, September 3, 2024

समुद्री तूफान हरिकेन के साए में

 

समुद्री  तूफान हरिकेन के साए में

हम टेंपा ( अमेरिकावासी )इस  समय  समुद्री  तूफान  हरिकेन की चेतावनी के साए में हैं।सवेरे से बारिश  हो रही है।

बीते  शुक्रवार को मौसम विभाग की चेतावनी आई थी कि वृहस्पतिवार दुपहर हरिकेन आएगा।

इसका असर शुक्रवार  और शनिवार को  भी   रहेगा। हवाए  तेज  चलेंगी । जोरदार बारिश  होगा।  बताया गया था  कि बारिश एक से दो फिट तक  हो सकती है।  तूफान के दौरान तेज हवा चलने  से मकान को नुकसान पहुंच  सकता  है। छत उड़  सकती हैं।  बिजली  पानी बंद  हो सकता है।
चेतावनी आने के बाद ही लोगों ने घरों में खाने पीने का सामान संग्रह करना  शुरू कर दिया।हालत  यह रही कि शुक्रवार की शाम को  ही स्टोर से ब्रेड गायब  हो  चुकी थी।स्कूल काँलेज  दो दिन के लिए बंद हैं।शनिवार और रविवार का  यहां  अवकाश   होता  ही है। सो  स्कूल− काँलेज अब सोमवार को खुलेंगे।

यहां   लकड़ी के मकान  होते  हैं।  इनके दरवाजे और खिड़की कांच के । मकान खरीदने या किराए पर मिलते  समय  इन दरवाजों और खिड़कियों  पर लगने  वाले शटर भी   मिलते  हैं।शटर  प्रत्येक खिड़की पर  लगने   वाली टिन की चादर होती हैं।  ये  अलग खिड़की की अलग होती है।खिड़की के किनारे   पेंच फिकस होते  हैं,इन  पेंच को हटाइए  और उस खिड़की के लिए निर्धारित चादर  रखकर पेंच  खींच  दीजिए। एक खिड़की पर शटर लगाने में ज्यादा से ज्यादा  पंद्रह बीस मिनट   लगतें हैं।

यहां  लेबर बहुत मंहगी है।खिड़की पर शटर लगाने के लिए पता करने पर बताया गया कि एक खिड़की का 60  डालर देना  होगा। हमारे घर की 16 खिड़की  और दरवाजे हैं।यदि  इन पर किसी से शटर लगवाए  तो   960  डालर देने होंगे। तूफान खत्म होने के बाद  उतारने के भी।  सो ये काम  यहां  रहने वाले  खुद करते  हैं। मिलने वाले और  पड़ौसी भी   एक  दूसरे की मदद करते  हैं।

 यहां के रहने वाले घर से बहुत कम निकलते  हैं। वे घूमने जाते  हैं।  या कुत्ता  घुमाते हैं।

कल से सब घर के बाहर दिखाई  दे रहे हैं। घरों  पर शटर लगाते  हुए। तूफान  आने का  तनाव  तो  है, पर सब  सुरक्षा व्यवस्था  करते  आनन्द भी  ले रह हैं।  परिवार में  प्रायः  पति पत्नी और बच्चे ही हैं तो    मिलकर खिड़कियों पर शटर लगा रहे हैं।

हमारे घर की खिड़कियों  पर शटर लग गए।घर के  पिछले दरवाजे पर रेत के बोरे लगा दिएग गए  हैं। मकान के आगे सड़क से मकान की ऊंचाई  करीब फिट है।

अब हालत यह है कि हम घर में बंद हैं। तूफान आने का इंतजार है।  सब चाहते हैं कि सब ठीक −ठाक  बीत जाए।लाइट जाने के  लिए  रोशनी के वास्ते  घर में छोटी सोलर  लाइट हैं।  इन्हें चार्ज कर  लिया गया है।  पीने के पानी का सबने  पर्याप्त  प्रबंध कर रखा  है।लाइट जाती नही , सो  इंवर्टर और  जेनरेटर की यहां जरूरत नही होती। कुछ  परिवारों से घरों पर सोलर सिस्टम लगवा रखा है। तूफान की चेतावनी के मद्देनजर  कुछ लोग  सुरक्षित जगहों  पर चले गए  हैं।

बारिश बहुत ज्यादा होने की  चेतावनी है  तो  दरवाजों के बाहर प्लाटिक की शीट  बिछाकर उस पर रेत के बोरे लगाए गए है। बोरों  की भी   दो −तीन परत  जमाई  गईं हैं।सबकी नजर मौसम विभाग के चैनल पर  है,क्या हो रहा है, तूफान  कब तक आएगा, कितना  प्रभावी है,सब यह जानने  के इच्छुक हैं।लाइट जाती है तो  टीवी और इंटरनेट भी  बंद  हो सकता है।

सवेरे से   बारिश  हो  रही है। अब हवा और बारिश बढ़ गई है।घर के सब दरवाजे  शटर  से  बंद हैं। दरवाजे  − खिड़की  बंद होने  से कुछ बाहर का कुछ भी  नही दिखाई  दे रहा। आवाजाही गैराज  से  होकर है। यहां  मोटराइज शटर लगा  है।  घंटे − दो  घंटे में यहीं से देख लेते हैं, क्या हो रहा हैॽ 

समय के पास भी नहीं कुछ सवालों का जवाब

 

 समय के पास भी नहीं कुछ सवालों का जवाब

अशोक मधुप

कुछ सवाल हैं ।मनमें आतें  हैं।उत्तर नही मिलता।इन सवालों का  जवाब न  इतिहास के पास है।न समय के पास।न मेरे पास  न आपके पास।पर सवाल तों हैं।

 हिंदू मान्यताओं के अनुसार, दीपावली के दिन ही भगवान राम 14 वर्षों के वनवास के बाद अपनी पत्नी सीता, भाई लक्ष्मण और अपने उत्साही भक्त हनुमान के साथ अयोध्या लौटे थे। यह अमावस्या की रात थी। अमावस्या की रात होने के कारण  काफी अंधेरा होता है। इसी वजह से उस दिन पूरे अयोध्या को दीपों और फूलों से श्री रामचंद्र के लिए सजाया गया था ।इसलिए   सजाया  गया था कि भगवान राम के आगमन में उन्हें कोई परेशानी न हो, तबसे लेकर आज तक इसे दीपों का त्योहार और अंधेरे पर प्रकाश की जीत के रूप में मनाया जाता है।कभी  अयोध्या में भगवान राम की विजय के बाद  आने पर दीप जले थे,  आज पूरी दुनिया के हिंदू परिवार में दीपावली पर दीप  जलते हैं।

उत्तर भारत का तो दीपावली  मुख्य  पर्व  है।

रावण से युद्ध के दौरान भगवान राम ने  अंगद का अपना  दूत बनाकर रावण के पास भेजा  था।भगवान राम चाहते थे। युद्ध   न हो  और  रावण  वैसे  ही उसे सीता को  सौंप दे।अंगद ने  रावण के दरबार में जाकर अपनी  बात रख  दी। अहंकारी रावण  यह मानने  को तैयार नही था,कि राम   उससे  ज्यादा शक्तिशाली हैं। वह अपनी शक्ति  का बखान  करने में लगा था। तब अंगद रावण  को सच्चाई  बताते कहता  है - सिंधु तरो उनको बनरा, तुसपै धनुरेख गई न तरी। बाँध्यो इ बाँधत सो न बँध्यो उन बारिधि बाँधि कै बाट करी। अजहूँ रघुनाथ-प्रताप की बात तुम्हैं दसकंठ न जानि परी। तेलनि तूलनि पूँछि जरी (जड़ी हुई, युक्त) न जरी ,गढ़, लंक जराई जरी।

वह कहता है  कि  उनका  बंदर  समुद्र पार कर लंका आ गया, और  तू  है कि तुझसे धनुष की लकीर ही पार न की गई।तू अपने बल का बखान करता है,  तुझसे तो उनका  बंदर ही बांध कर  नही रखा गया। वे भगवान राम समुद्र को लांघकर श्री लंका के द्वार तक  आ पंहुचे।अंगद कहता  है कि दशकंध  तुझे अब भी भगवान राम के प्रताप की बात  समझ में नही आई। तेरा  तेल लगा, कपड़ा  लगा।इसके बावजूद हनुमान  की पूंछ नही जली।उसने  तेरी  लंका को   जलाकर खाक कर दिया।

अंगद बार – बार रावण को   समझाना  चाहता  है किंतु वह अपने  और अपने सेनापतियों की ताकत का बखान  करता  है।  विवश  हो अंगद उसे  सीख  देने के  लिए अपना  पांव   यह कहकर रावण के दरबार में जमा देता है कि चल में  तेरे शूरवीरों की परीक्षा लेता  हूं। घोषणा  करता  हूं कि यदि तेरा  कोई भी सेनापति मेरा   पांव  जमीन से हिला  देगा तो मैं  सीता को हार जांऊगा  और भगवान राम   वापस  लौट जाएंगे। 

इसके बाद बारी −बारी से रावण के दरबारी शूरवीर आते  हैं। अंगद के पांव पर  जोर लागतें  हैं, किंतु पांव हिला  भी   नही पाते।महाबलि मेघनाथ भी   पांव  हिलाने के प्रयास में सफल हो जाता  है।रावण  के आने पर  अंगद   पांव हटा लेता है।

 रावण की सेना में एक से  एक− एक बलि,दैविक शक्ति  से प्राप्त  वीर थे।वे  किसी कारण से  पांव नही हटा पाए, किंतु यदि कोई भी   अंगद के   पांव को   हिला  देता ,तो  क्या  होताॽशर्त  हारने के बाद क्या अंगद   वापस भगवान राम के पास   जा पाता। भगवान राम ने तो  अंगद को कोई ऐसा आदेश दिया नही था। अंगद  ने  ही जोश  में  इस  तरह का निर्णय  लिया।  पराजित अंगद शर्म के कारण कहीं जा  छिपता ,  तो राम को  पता  भी  नही लगता  कि रावण  के दरबार में क्या  हुआ था।अंगद के   वापस  न   पहुंचने  पर राम और  अन्य मान लेते  कि हो  सकता है, गुस्से में रावण  ने  अंगद को   जान से मार दिया  होगा।

यदि किसी तरह शर्म और अपमान भूल अंगद  राम के पास  चला  जाता तो क्या  राम उसकी कही  बात मान   लेते।  उनका  तो   शर्त लगाने का  आदेश  था  नही,फिर  शर्त लगाना तो  अंगद की गलती थी, राम की नहीं।क्या वह सीता  को छोड़कर  वापस लौट जाते। लौटकर कहां जाते।क्या पत्नी को  गवांकर वे  अयोध्या   वापस   लौट पाते।क्या पत्नी गवांकर लौटने  पर उनका   वैसे  ही स्वागत  होता,  जैसे  लकां  विजेता होने  पर   उनका  हुआ है।   

विश्व के दो  महान युद्ध हुए। लगभग  सात   हजार साल पहले राम  और  रावण का युद्ध   हुआ।इसके बाद लगभग  पांच    हजार साल पहले  महाभारत हुआ।अंगद की तरह से भगवान कृष्ण भी हस्तिनापुर दरबार में सुलह का लगभग प्रस्ताव   लेकर गए थे।सुलह का कोई  रास्ता न  निकल  उन्होंने धृतराष्ट्र  से  कहा कि आधा शासन नही दे सकते  तो   पांच  गांव ही दे दें। इस पर दुर्योधन ने कहा था कि मैं सुईं  की नोक के बराबर भी भूमि नहीं दूंगा।यदि दुर्योधन पांच  गांव देने की बात स्वीकार कर लेता तो  क्या पांडव कृष्ण के इस प्रस्ताव   पर सहमत होते। क्योंकि उन्होंने तो कृष्ण  को आधा  राज लेने तक के प्रस्ताव पर  सहमति दी थी।ये सवाल  बार− बार मन में आते  हैं और अनुतरित  रह जाते  हैं।सवाल का  जवाब  तो समय ही देता।और अब तो  वह बहुत  आगे निकल गया।

दुनिया के दो महायुद्ध  हुए।  एक  राम −  रावण  युद्ध  दूसरा महा भारत। दोनों के काल में दो हजार साल के आसपास का  अंतर है किंतु दोनों की घटनाओं में काफी समानता  है।

रामायणकाल की मुख्य पात्र  सीता थी। वह मौन रहने वाली बहुत ही  सहनशील थीं। जबकि महाभारत काल की द्रोपदी  वाचाल थी।उसने अपने महल को  देखने  आए दुर्याधन को अंधे  का अंधा  कहकर आग में घी डालने का काम किया  था। सीता और द्रोपदी दोनों  ने बहुत सहन किया।अंतर यह है कि एक ने मौन रहकर और एक ने बोलते हुए सहन किया l दौपदी वाचाल है और सीता मौन हैं l द्रोपदी कृष्णा है सीता श्वेता है।द्रोपदी अग्नि से प्रकट हुई हैं इसलिए उनके व्यक्तित्व में अग्नि सी दाहकता है ।सीता में तितिक्षा है ।पृथ्वी की सहनशीलता और मौन रहकर सहन करना सीता का गुण है।

दोनों के लिए  स्वयंबर  हुए। भगवान राम को

स्वंयवर में  धनुष तोड़ना पड़ा। अर्जुन को बाण चढ़ाना मछली की आंख बेंधनी पड़ी।पिता के आदेश पर राम को  14 वर्ष के  लिए वनवास भोगना  पड़ा  और  जुए में हारने पर पांडव का 12 साल का  वनवास जाना   पड़ा।  11 साल के वनवास के साथ  एक साल का इसमें अज्ञात  वास भी शामिल था।

दोनों बार दूसरे पक्ष को समझाने के  लिए  शांति दूत भेजे  गए। दूत इस  तरह के व्यक्ति   चुने गए कि वह अपने व्यवहार से  अपने पक्ष  की शक्ति बताकर दूसरे पक्ष को नैतिक रूप से कमजोर कर सके।उनका  मौरल डाउन  कर सके। सीता की खोज में गए  हनुमान ने सीता  माता  को भगवान राम का संदेश देने के  बाद अपनी भूख  शांत करने के नाम पर अशोक वाटिका को  उजाड़  दिया।पकड़ने के लिए आए रावण के छोटे पुत्र  अक्षय कुमार को मार डाला।अक्षय कुमार की दरबार में पंहुची मौत की सूचना  पर मेघनाथ ने कहा  कि अक्षय  तो  मेरे बराबर बलशाली था। उसे कैसे  मारा  जा सकता  है।बाद में रावण के कहने पर मेघनाथ  बानर को पकडने  गए।  रावण ने आदेश दिया था कि  उत्पाती  बानर को  पकड़कर लाना।युद्ध हुआ। मेघनाथ  के ब्रह्मास्त्र  से  हनुमान बेहोश हो गए।  वह हनुमान को  बांध कर रावण के सामने ले  आया।

रावण अक्षय  कुमार के बद्ध से बहुत उत्तेजित था।   वह  हनुमान को  मारना  चाहता  था किंतु छोटे  भाई विभीक्षण ने रावण को सुझाया कि आप  नीतिवान है। नीति के अनुसार दूत  का वद्ध उचित नही, आप इसे कोई  दूसरा दंड  दे।  इस पर पूंछ जलाना तै  हुआ। हनुमान की पूंछ पर रूई, कपड़ा और  अन्य ज्वलनशील सामग्री बांध तेल डालकर आग लगा दी। पूंछ में आग लगते ही  हनुमान ने  बंधन  तोड़  डाले।लंका के भवनों पर चढ़ उन्हें  जलाना  शुरू कर दिया।इससे   लंका के राक्षस और रावण  के महाबलि में संदेश  गया कि जब एक बंदर इतनी बरबादी कर सकता है, तो  राम की पूरी सेना से  पार भी   पाना संभव न होगा।अंगद

द्वारा रावण  के दरबार में पांव  जमाना  भी   इसी तरह का  संदेश  देना था।रावण  के दरबार  का कोई  भी   सेनापति और वीर उनका  पांव  नही उठा पाया।महाबलि मेघनाथ भी   पांव उठाने के  प्रयास में  विफल  रहा। रावण के पांव उठाने के लिए आने पर अंगद ने  यह कहकर ही अपना  पांव पीछे कर लिया था कि मेरे पांव में  गिरने से कोई  लाभ  नही होगा, गिरना  है तो भगवान राम के पांव में जाकर गिरकर अपनी गलती के  लिए क्षमा मांगिए।

महाभारत में हस्तिनापुर दरबार में सुलह का प्रस्ताव लेकर गए कृष्ण  के सामने भी कुछ ऐसा ही    हुआ।दुर्योधन के उत्तेजित  होने और कृष्ण के बंदी बनाने के  आदेश पर भगवान कृष्ण  को  अपना   विशाल रूप दिखाना पड़ा।

अशोक मधुप

(लेखक  वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

संपादक  जी,

कुछ प्रश्न  हैं  जिनका  उत्तर न  इतिहास के पास  है  न समय के।दीपावली का  पर्व भगवान राम के श्रीलंका   विजय कर लौटने की खुशी में   मनाया  जाता  है। प्रश्न यह  है कि सुलह  का प्रस्ताव   लेकर  राम के दरबार में गया  अंगद रावण के सेनापतियों की परीक्षा लेने के लिए अपना पांव रावण  के दरबार में यह कहकर जमा  देता है कि यदि कोई तेरा वीर मेरे  पांव  को हिला  देगा तो मैं  सीता माता  को हार जाऊंगा। भगवान राम लौट जाएंगे।  रावण में दरबार में एक से एक बलि,शक्तिशाली और दैविक क्षमता संपन्न शूरवीर थे।यदि इनमें कोई भी   अंगद का  पांव  हिला देता,  तो  क्या भगवान राम बिना सीता  को लिए वापस आ जातेॽइन्हीं सवालों  पर ये लेख प्रेषित है। आशा है पसंद आएगा।

सादर

अशोक मधुप

व्हाटसएप नंबर 942215678,9675899803

Wednesday, August 28, 2024

आरक्षण खत्म करने की बात कौन करेगा?

आरक्षण खत्म करने की बात कौन करेगा?

अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार 

दलित और पिछड़े युवाओं के उत्थान के लिए लाया गया  आरक्षण अब सत्ता में पहुंचने माध्यम बनता जा रहा है। अलग −अलग राज्य में राजनैतिक दल जहां आरक्षण को  अपने  हिसाब से अदल − बदल रहे हैं, वही प्राइवेट सैक्टर में भी आरक्षण  लागू करने की कोशिश हो  रही है। कुछ राज्यों ने अपने यहां ये आरक्षण लागू किया पर वहां के हाईकोर्ट ने उसे  अवैध बताते  हुए रोक लगा दी, पर ये कोशिश  जगह –जगह जारी है। 

सर्वोच्च न्यायालय की सात न्यायधीश की संविधान पीठ आरक्षण में क्रीमीलेयर लागू करने की बात की तो  विपक्ष ने राजनैतिक लाभ उठाने के लिए इसका विरोध शुरू कर दिया। हालाकि प्रधानमंत्र नरेंद्र मोदी आश्वस्त कर चुके हैं कि आरक्षण में क्रीमीलेयर लागू नही होगा ,इसके बावजूद आरक्षण  समर्थक राजनैतिक दलों ने इसके विरूद्ध  आंदोलनरत हैं। अभी वे भारत बंद का आह्वान कर ही चुके हैं। इससे  पहले  कर्नाटक में प्राइवेट नौकरी में स्थानीय के लिए शत प्रतिशत आरक्षण को लागू करने पर खड़ा  हो गया। हालाकि प्रदेश कैबनेट में पांस किया गया ये कानून विरोध को देखते हुए ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है, पर खत्म नहीं किया गया। मुख्यमंत्री ने कहा है कि अगली केबनेट की बैठक में इसपर फिर विचार होगा।   

 हाल के लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण के आते –आते प्रचार आरक्षण पर आकर सिमट गया। भाजपा नेता  अपने भाषणों में दावा कर रहे है कि हम देश में मुस्लिम आरक्षण लागू नही होने देंगे।खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सभाओं में मुस्लिम आरक्षण पर चिंता जाहिर कर   रहे हैं। वह कह रहे हैं कि सत्ता में आते ही इंडिया गठबंधन  दलित और पिछडों का आरक्षण काटकर  मुस्लिमों को दे देगा।वे देश  का विभाजन करवा देंगे।इस पर कुछ बड़े नेता तो  चुप्पी साधे है किंतु समाजवादी पार्टी के सांसद एसटी हसन ने एक बयान में कहा है कि इंडिया गठबधंन के सत्ता में आते ही संविधान में संशोधन कर मुस्लिमों को  सरकारी सेवाओं में आरक्षण  दिया जाएगा। 

देश को आजाद हुए 75 साल से ज्यादा हो गए।आजादी के बाद दलित समाज को विकास की धारा में शामिल करने के लिए  दस साल के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी।आज ये आरक्षण राजनेताओं को सत्ता में पंहुचने का  माध़्यम नजर आने लगा है,  वे इसे बढ़ाने की बात कर रहे हैं।खत्म करने की नहीं। किसी को यह सोचने की फुरसत नही कि आरक्षण की मार से बचने के लिए देश के प्रतिभाशाली युवा आज विदेशों में जाकर शिक्षा ले रहे है। शिक्षा पूरी कर वहीं नौकरी या व्यवसाय  कर चुने गए देश के विकास में योगदान कर रहे हैं।भारत के बाहरर जाकर बसी भारत की मेधा से प्रभावित  होते देश के विकास पर किसी को सोचने का समय नहीं ।

प्राइवेट सेक्टर की नौकरियों में आरक्षण को लेकर कर्नाटक सरकार ने यूटर्न ले लिया है। सरकार ने पहले सी और डी कैटेगरी की प्राइवेट नौकरियों में स्थानीय लोगों को आरक्षण देने की बात कही थी। फिलहाल, आरक्षण के उस फैसले पर रोक लगा दी गई है। कैबिनेट ने फैसला स्थगित कर दिया है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने प्राइवेट सेक्टर में कन्नड़ लोगों को 100 फीसदी आरक्षण देने को लेकर सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट की थी। अपनी इस पोस्ट में उन्होंने कहा, हम कन्नड़ समर्थक सरकार हैं।सरकार के इस फैसले का चौतरफा विरोध होने पर इस पर रोक लगा दी गई। सरकार का कहना है कि इस बिल पर वह पुनर्विचार करेगी. देश में यह पहला ऐसा मामला नहीं है। 

कर्नाटक से पहले प्राइवेट सेक्टर में स्थानीय लोगों को आरक्षण देने के लिए आंध्र प्रदेश और हरियाणा में कोशिश की गई थी. वहीं, मध्य प्रदेश में भी सरकार ने ऐसा ही कहा था, लेकिन यह कोशिश रंग नहीं ला पाई थी। 2019 में आंध्र प्रदेश में पहली बार ऐसा कोई कानून बना था जहां 75 प्रतिशत स्थानीय लोगों को प्राइवेट नौकरियों में आरक्षण देने की बात कही गई थी। पर हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था। फिलहाल, ये मामला सुप्रीम कोर्ट में है।

महाराष्ट्र  में  2019 में शिवसेना-कांग्रेस और एनसीपी के गठबंधन की सरकार बनने के बाद प्राइवेट नौकरियों में स्थानीयों को 80 प्रतिशत  नौकरियां देने का प्रस्ताव लाया गया था। सरकार सरकार इसे विधानसभा में भी लाना चाहती थी। लेकिन इसे लाया नहीं गया।कर्नाटक में कई बार प्राइवेट जॉब में कन्नड़ों के लिए आरक्षण तय करने की कोशिश हो चुकी है। सिद्धारमैया सरकार में ये तीसरी बार है जब ऐसी कोशिश हो रही है। इससे पहले 2014 और 2017 में भी सरकार कोशिश कर चुकी है। वहीं अक्टूबर 2020 में येदियुरप्पा की अगुवाई में बीजेपी सरकार ने प्राइवेट नौकरियों में ग्रुप सी  और डी में 75  प्रतिशत  आरक्षण स्थानीयों को देने का ऐलान किया था। हालांकि, ये लागू नहीं हो सका था।

हरियाणा  में  2020 में तब की मनोहर लाल खट्टर की सरकार ने प्राइवेट नौकरियों में स्थानीयों को 75 प्रतिशत  आरक्षण देने के लिए कानून पास किया था। हाईकोर्ट ने पिछले साल नवंबर में इस कानून को रद्द कर दिया।झारखंड  में  दिसंबर 2023 में हेमंत सोरेन की सरकार ने सरकारी नौकरियों की ग्रुप तीन और चार  में स्थानीयों को 100 प्रतिशत  आरक्षण देने के मकसद से बिल पास किया था। ये बिल विधानसभा में पास हो गया था, लेकिन गवर्नर ने इसे लौटा दिया था।

आज के हालात का निष्कर्ष ये  है कि प्रत्येक दल आरक्षण की सीढ़ी से सत्ता में  पंहुचने के प्रयास में लगा है। उसे  उससे  वास्ता नही कि आरक्षण की जद में आने वाली प्रतिभांए इसे  लेकर क्या  सोचती हैं?

2012  में केंद्र सरकार प्रमोशन में आरक्षण का बिल ला चुकी है। संसद में बिल रखे जाने के दौरान एक सांसद द्वारा  मंत्री से छीन कर बिल की प्रति फाड़ दिए जाने के कारण ये अटक गया। नही तो प्रमोशन में भी आरक्षण लागे हो चुका होता।     

अब क्रीमीलेयर तै करने के बारे में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान  पीठ के आंदेश को वे ही ठेंगा दिखाने को तैयार हैं जो अब तक इससे  लाभ  लेते  रहे हैं। आरक्षण का लाभ  उठा चुके उच्च स्थिति में  पंहुचने वाले ही विकास की धारा से वंचित अपनी जाति  वालों के  लिए आरक्षण का लाभ छोड़ने को तैयार नही हैं।

आज हालत यह है कि सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ आदेश करे या कोई  अन्य  मांग हो, आरक्षण को कम करने को कोई  राजनैतिक  दल छोड़ने को तैयार नही। कोई  इसके खत्म करने की बात नही कर रहा।सब बढ़ाने की बात कर रहे हैं।आरक्षण के दायरे से बाहर की जाति और उसे युवा ये सब देख रहे हैं। अभी हाल में यूपीएससी में लेटरल एंट्री को लेकर हुए बवाल ने बाद सरकार ने 45 पदों पर लेटरल एंट्री का प्रस्ताव वापस लेना पड़ा। विपक्ष का कहना था कि सरकार आरक्षण खत्म करने की कोशिश कर रही है। विपक्ष आरोप  लगा रहा है, सरकार अपनी छवि बचाने को बार −बार पीछे हटती जा रही है। ऐसे में आरक्षण  से बाहर रह रही युवा पीढ़ी के भविष्य की किसी को चिंता  नहीं।आरक्षण समर्थक कोई नेता और राजनैतिक दल ये नही सोच रहा कि ये आरक्षण से बाहर रहे युवा   उनके बारे में क्या विचार और सोच  बना रहे हैं?