Saturday, December 9, 2023

 कैद में भी  सुरक्षित नहीं कैदी


अशोक मधुप


कैसे हो  कैदियों की सुरक्षा।आज न कैदी जेल में  सुरक्षित है, न न्यायालय में ,न ही पुलिस कस्टेडी 


में।हर कैदी को जीवन के जीने का अधिकार है।  शासन की जिम्मेदारी है कि उसे पूरी   सुरक्षा दें। 


वह पुलिस हिरासत में हो या जेल मे पूरी तरह सुरक्षित रहे। सुरक्षित महसूस करे,किंतु आज इसके 


विपरित नजारा  है। और जेल की तो बात क्या देश की सबसे सुरक्षित धनबाद की झारखंड और 


दिल्ली की तिहाड़ जेल में  कैदी कत्ल  हो  रहे हैं।पुलिस कस्टेडी में कैदियों की सरेआम हत्या हो 


रही है। न्यायालय परिसर में ही नही, न्यायधीश के कक्ष तक में कैदी  कत्ल हो जाते हैं।सवाल यह 


है कि इन कैदियों की सुरक्षा  कैसे हो।इनकी  हत्याओं पर कैसे रोक लगेॽ



यूपी के अंबेडकर नगर के कुख्यात शूटर अमन सिंह की धनबाद जेल में हत्या हो गई है। रविवार दस दिसंबर को दोपहर तीन बजे अमन सिंह को नौ गोली मारी गई। अमन सिंह धनबाद के पूर्व डिप्‍टी मेयर की हत्‍या के मामले में वहां जेल में बंद था। कुख्‍यात बदमाश मुन्‍ना बजरंगी के लिए भाड़े पर हत्‍या करने वाला शूटर अमन सिंह यूपी का राजे सुल्‍तानपुर थाना क्षेत्र के जगदीशपुर कादीपुर गांव का रहने वाला था। अमन के करीबी आशीष रंजन और छोटू ने उसकी हत्या की जिम्मेदारी ली है। अमन सिंह पर कुल नौ गोली दागी गईं। इसमें से छह गोली लगी है। तीन गोली निशाने पर नहीं लगी थी। इससे इसकी संभावना बढ़ गई है कि एक से अधिक ने मिलकर गोली मारी है। लापरवाही बरतने वाले जेलर मो. मुस्तकीम अंसारी को तत्काल प्रभाव से निलंबित एवं स्थानांतरित करते हुए उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई चलाने का निर्देश दिया गया है। अमन की  हत्या में प्रयुक्त पिस्टल पुलिस ने धनबाद जेल से बरामद कर ली है। जेल से दो पिस्टल बरामद हुई है। अब सवाल यह उठ रहा है कि जेल में इतनी तगड़ी व्‍यवस्‍था होने के बावजूद जेल में हथियार पहुंचा कैसा?घटना के बाद तलीशी में जेल से आठ की  हजार नगदी समेत आधा दर्जन मोबाइल  बरामद  हुए जबकि दो दिन पहले जेल की तलाशी में  सुब कुछ ठीक−ठाक  मिला था। झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजय कुमार मिश्रा और जस्टिस आनंद सेन की खंडपीठ ने धनबाद जेल में बंद कुख्यात अपराधी अमन सिंह की गोली मारकर हत्या करने के मामले में स्वत: संज्ञान लिया है। खंडपीठ ने इस मामले में राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी है।चीफ जस्टिस की अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार से जवाब मांगा हैअदालत ने राज्य सरकार से घटना को लेकर पूछा कि जेल में हथियार कैसे पहुंच गए। जेल की सुरक्षा में चूक का कारण क्या है।


दिल्ली की राजधानी की अति सुरक्षित मानी जाने वाली तिहाड़  जेल में भी  कैदी सुरक्षित नही हैं। इस जेल में गैंगवार में अप्रेल− मई 2023 के   18 दिन में दो कैदी कत्ल कर दिये गए।  सीसीटीवी कैमरों से लैस हाई सिक्योरिटी सेल में घुसकर चार बदमाशों ने दिल्ली-एनसीआर के कुख्यात गैंगस्टर सुनील उर्फ टिल्लू ताजपुरिया की बेरहमी से हत्या कर दी। जितेंद्र मान उर्फ गोगी गैंग से जुड़े बदमाशों ने हाई सिक्योरिटी सेल की पहली मंजिल की ग्रिल काटी। इसके बाद बेडशीट के सहारे नीचे उतरकर आरोपियों ने टिल्लू के कमरे में ग्रिल के सरिये से बनाए गए सुए से धावा बोल दिया। हाथ में सुए लिए सभी बदमाशों ने टिल्लू पर एक के बाद एक 90 से अधिक वार किए। जब तक जेल प्रशासन को पता चला तब तक बहुत देर हो चुकी थी।हमले के दौरान टिल्लू को बचाने आया रोहित नाम का कैदी भी जख्मी हो गया। जेल प्रशासन टिल्लू और रोहित दोनों को नजदीकी डीडीयू अस्पताल ले गया, जहां टिल्लू को मृत घोषित कर दिया गया। टिल्लू की दिन-दहाड़े हुई हत्या के बाद तिहाड़ जेल की सुरक्षा को बढ़ा दिया गया है। विदेश में बैठे गैंगस्टर गोल्डी बरार ने फेसबुक पोस्ट कर हत्याकांड की जिम्मेदारी ली है।उसने अपने पोस्ट में लिखा है कि  उन्होंने टिल्लू की हत्या कर जितेंद्र मान उर्फ गोगी की हत्या का बदला ले लिया है 14 अप्रैल 2023  को जेल नंबर तीन में प्रिंस नामक कैदी की बॉबी, अता-उर-रहमान और विनय नामक कैदियों ने बेरहमी से हत्या कर दी थी। यह हत्या भी गैंगवार का नतीजा बताई गई थी।उस समय भी तिहाड़ की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हुए थे।हत्या, हत्या के प्रयास व अन्य धाराओं में मामला दर्ज कर गोगी गैंग के चार बदमाश दीपक उर्फ तितर (31), योगेश उर्फ टुंडा (30), राजेश (42) और रियाज खान (39) को औपचारिक रूप से इस मामले में गिरफ्तार कर लिया है।सुनील उर्फ टिल्लू ताजपुरिया (33) वर्ष हत्या, हत्या के प्रयास, मकोका, पुलिस टीम पर हमला और बलवा करने के करीब 11 मामलों में 2016 से जेल में बंद था। वह तिहाड़ जेल नंबर-8 के हाई सिक्योरिटी सेल में ग्राउंड फ्लोर पर था। जेल प्रशासन पुलिस को बताया कि मंगलवार सुबह उसकी सेल खोलने की तैयारी चल रही थी। इस बीच करीब 6.10 बजे पहली मंजिल पर बंद चारों कैदी दीपक उर्फ तितर, योगेश उर्फ टुंडा, राजेश और रियाज खान ने उस पर हमला बोल दिया। सेल में ही मौजूद कैदी रोहित ने टिल्लू को बचाने का प्रयास किया तो आरोपियों ने उस पर भी हमला किया। आरोपियों का इरादा भांपकर रोहित को जान बचाकर वहां से भाग गया।


ये जेल ये  हालात हैं।ऐसी ही स्थिति कमोबेश न्यायालय परिसर की है। 24 सितंबर 2021 को दिल्ली के  रोहिणी कोर्ट रूम में टिल्लू गैंग के शूटरों ने जितेंद्र मान उर्फ गोगी की हत्या कर दी थी।जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने मुठभेड़ के दौरान टिल्लू गैंग के दो शूटरों को मार गिराया था।  16 अगस्त 2022 को उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले का न्यायालय  परिसर के गेट पर बदमाशों ने हरियाणा से पुलिस कस्टडी में आये  लखन नामक  कैदी की अंधाधुंध फायर कर हत्याकर दी थी।इससे पहले भी इसी न्यायालय परिसर में राका नाम के एक बदमाश की कचहरी में हत्या की गई थी।19 दिसंबर 2019 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर की एक दोहरे हत्याकांड के आरोपी शहनवाज अंसारी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। हत्या उस समय की गई जब   आरोपी को बिजनौर जिला कोर्ट में सीजेएम के सामने पेश किया गया था। गोली लगने से शहनवाज अंसारी की मौके पर ही मौत हो गई।  आज तो हालत यह है कि पुलिस अभिरक्षा में आते −जाते कैदी भी सुरक्षित नहीं। 13 अप्रेल 2023  में प्रयागराज में मेडिकल के भारी पुलिस अभिरक्षा में अस्पताल लाते माफिया अतीक और उसके भाई  अशरफ की हत्या की गई।20 दिसंबर 2021 को राजस्थान के जोधपुर  पेशी से लौट रहे एक आरोपी सुरेश सिंह को   पुलिस कस्टडी में ही बदमाशों ने गोलियों से भून दिया।


तिहाड़ जेल में आरोपियों ने उस ब्लैक स्पाट  को चुना जहां सीसीटीवी कैमरे नही हैं।दरअस्ल अपराधी बहुत चतुर हैं।उन्हें पता है कि कहां कैमरे लगे हैं,कहां नहीं।यक्ष प्रश्न यह भी है कि कैमरे लगी तिहाड़ जेल में कैदी सरिए को घिस पर सुंआ बनाते रहे और जेल प्रशासन को पता ही नही चला।


कैदियों के साथ जेल में पहले बहुत  मारपीट और अमानवीय व्यवहार होता था।उनके मानवाधिकार को देखते  हुए जेल में कैमरे लगाये गए।कैमरे लगने के बाद क्यों ऐसी घटनांट होती हैं, ये जेल स्टाफ  और जले प्रशासन की लापरवाही साबित करने के लिए काफी है।


इन सब घटनाओं को देखते  हुए आज जरूरत है कि जेल,पुलिस अभिरक्षा  और न्यायालय परिसर में कैदियों की सुरक्षा पर फिर से मंथन हो।विशेषज्ञ  बैठें और मंथन करें कि कैसे कैदियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएं। जेल में गैंगवार रोकने के लिए यह भी सुनिश्चित किया जाए कि एक जेल में दो प्रति स्पर्धी गैंग रहें। जेल आते −जाते कैदियों के सुरक्षा घेरे में कोई बाहरी व्यक्ति  प्रवेश न करें।कैदियों के मीडिया के बात करने पर सख्ती से रोक हो।न्यायालय  परिसर में  भी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। यह ध्यान रहे कि कस्टेडी में कैदी की सुरक्षा की जिम्मेदारी,पुलिस, प्रशासन,न्यायपालिका के साथ  सरकार की भी है। गिरफ्त में आने के बाद बड़े से बड़ा  चौकस कैदी भी सुरक्षा के लिए प्रशासन पर निर्भर हो  जाता  है,ऐसे सुरक्षा में लापरवाही उसके कत्ल कराने के लिए जिम्मेदार होती है।


अशोक मधुप


( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

















Friday, December 8, 2023

कार सेवा के लिए वह जनून अदभुत, अकल्पनीय था


कार सेवा के लिए वह जनून अदभुत, अकल्पनीय था अशोक मधुप वरिष्ठ पत्रकार उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार। भाजपा और विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या में राम मंदिर के लिए कार सेवा करने का आह्वान किया। तारीख 30 अक्तूबर 1990 निर्धारित की गई।मुलायम सिंह ने कहना शुरू कर दिया कि कार सेवा की बात क्या कोई अयोध्या की बाबरी मश्जिद की और मुंह करने देख भी नही सकेगा।अयोध्या में परिंदा भी पर नही मार सकेगा। उसके ये भाषण हिंदू समाज के लिए चेतावनी थे। सनातन धर्म को खुला चैंलेंज था।ऐसे में हिंदुओं में अपनी ताकत, क्षमता, शौर्य और साहस दिखाने की ललक प्रज्जवित हो गई।सिर पर भगवा लपेट कर राम पर सर्वस्व लुटाने के लिए धर्मरक्षक घरों से अयोध्या के लिए निकल पड़े। किसी ने ये नही सोचा की क्या होगा।कोई लाठी−डंडा , तलवार भाला, बंदूक कुछ नही।सिर्फ आत्मशक्ति के बूते एक जोड़ी कपड़े ,हलका −फुल्का रास्ते में खाने− पीने का सामान लेकर दीवानों की टोलियां पूर देश से अयोध्या के लिए निकल पड़ीं। दरअस्ल हम भारतीय सब कुछ बर्दांश्त कर सकतें हैं। धर्म और सम्मान का अपमान नही। देश लगभग 700 साल मुस्लिम और दो सौ साल अंग्रेजों का गुलाम रहा।इस दौरान कोई बगावत नही हुई। कोई विद्रोह नही हुआ। मेरी राय में इन नौ सौ साल मे सिर्फ दो बार विद्रोह हुआ।पहला 1857 में दूसरा1990 में । दोनों बार तक विद्रोह हुआ, जब 1857 मेंसत्ता पर बैठे मदांध अंग्रेज और 1990 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिहं ने हिदू धर्म को ललकारा। उसे चेतावनी दी। अंग्रेजों की गुलामी से देशवासी परेशान थे। उनकी और पिट्ठुओं की ज्यादति बर्दाश्त से बाहर हों रहीं थीं। ऐसे में अंग्रेजों द्वारा सेना के प्रयोग के लिए लाये गए गाय और सुअर की चर्बी के कारतूसों ने विद्रोह की ज्वाला में पूरी आहूति ही दे दी।इन कारतूस को बंदूक में भरने से पहले सैनिक को कारतूस का मुंह अपने मुंह से खोलना पड़ता था।गाय को हिंदू पवित्र मानता है।मुसलमान सुअर को अपवित्र मानता है । काररतूस में गाय और सुअर की चर्बी लगी होने की सूचना ने बड़ी चिंगरी का काम किया। इसका पता लगते ही अंग्रेजों से नाराज हिंदू और मुस्लिम जवान विद्रोह पर उतर आए।पूरे देश की सैनिक छावनी धधक उठीं। अंग्रेजों का कत्ले आम शुरू हो गया।1990 में मुलायम सिंह ने अयोध्या में कार सेवा की सूचना पर जब कहा कि अयोध्या में परीदां भी पर नही मारेगा। बाबरी मश्जिद की ओर कोई नजर उठाकर भी नही देख सकेगा, तो हिंदू समाज ने इसे अपना अपमान माना। 30 अक्तूबर को कार सेवा शुरू होनी थी । उससे पहले भाजपा और विश्व हिंदू परिषद ने कार्यकर्ताओं को आदेश दिए कि 24 अक्तूबर का अपने घर से पूजन −अर्चन कर अयोध्या के लिए प्रस्थान करें। 30 अक्तूबर को कार सेवा शुरू होनी थी किंतु उससे पहले ही मुलायम सिंह ने प्रदेश की सीमा सील करा दीं। प्रदेश की सीमाओं पर बड़ी तादाद में सशस्त्र फोर्स लगा दी ।दूसरे प्रदेशों के कार सेवकों को यहां रोक कर वापिस भेजा जाने लगा। ।प्रदेश के जनपदों की सीमांए सील कर दी गईं तो कि दूसरे जिले के कार सेवक उस जनपद में प्रवेश न कर सकें।प्रदेश की सीमा के आने वाली ट्रेनों की तलाशी शुरू हो गई। परिणाम यह हुआ कि प्रदेश की सीमाओं पर कारसेवकों को रोका जाने लगा।उन्हें वापस जाने का आदेश दिया जाने लगा। कारसेवकों की ये टोली जहां रोकी जातीं, वही कुछ पीछे हटतीं।यहां तैनात वालिंटियर इन्हें आगे जाने के रास्ते बता देते।ये कहीं रेलवे की पटरी के किनारे –किनारे चले तो कहीं खेतों के किनारे की पगडंडियों से। रास्ते में नदी आई तो गांव वालों ने बताया कि कहां कम पानी है। कहां से निकला जाना है। रास्ते में जगह जगह− गांवों में इनके खाने की व्यवस्था भी थी। खाना शुद्ध सात्विक देसी घी से बना। सनातन समाज इन धर्मरक्षकों के स्वागत और सुरक्षा के लिए पलक पांवडे विछाए था। कार सेवकों का देवदूत और धर्मरक्षक की तरह स्वागत किया जाता । उनको कही गांव के स्कूल में टिकाया गया, तो कहीं अपने घर में । सबका मेहमानों से बड़ा स्वागत किया गया। बिजनौर में गंगा बैराज पर सहारनपुर, पंजाब और हरियाणा से आने वाले कार सेवकों को रोका गया। उधर हरिद्वार पर बिजनौर का बार्डर सील कर दिया गया। ये कार सेवक रोके जाने पर रूकते कुछ पीछे दांए− बाएं हटकर गांव के रास्तों से तो कुछ गंगा पार कर आगे के लिए चल दिए। गिरफ्तार किये गए कारसेवकों के लिए जेल में जगह कम पड़ गई तो स्कूल काँलेज में स्थायी जेल बनाई गई। यहां से ये कार सेवक मौका पाकर आगे के लिए रवाना होने लगे। स्थानीय कार्यकर्ता इन्हें आगे का रास्ता और योजना बताने लगे। अयोध्या से दो सौ किलो मीटर की दूरी से तो सुरक्षा और सख्त होने लगी। बिजनौर के कार सेवकों को लखनऊ में ट्रेन से उतर दिया गया। ये यहां से लगभग 150−160 किलोमीटर की यात्रा करके पैदल ही अयोध्या पंहुचे।एलआईयू इस तलाश में थी कि बिजनौर के कार सेवकों का रवानगी का पता चले किंतु ये 24 अक्तूबर को अपने घरों पर पूजन कर चुपके से रवाना हुए।रवाना होने से पूर्व परिवार वालों ने तिलक कर इन्हें विदाई दी। कामना की कि ये जिस कार्य के लिए जा रहे है, उसे पूरा करके लौंटे। पुलिस और एलआईयू को झांसा देकर ये कार सेवक जनपद के एक छोटे से स्टेशन चंदक से ट्रेन में बैठे। बिजनौर के कार सेवकों को लखनऊ में ट्रेन से उतार लिया गया। ये किसी तरह से पुलिस को चकमाकर आगे चल दिए। रास्ते पर जगह −जगह मार्गदर्शक इन्हें मिलते रहे । बताते रहे । कहां जाना है। कैसे जाना है। कहां रूकना है। ये धीरे− धीरे अयोध्या की ओर बढ़ते रहे। बिजनौर के एक कार सेवक स्वर्गीय मयंक मयूर बताते थे कि एक जगह पीएसी ने उन्हें गिरफ्तार कर दिया गया। उनके साथ एक साधु भी था। साधु ने इनसे धीरे से कहा − वह कुछ करेगा। भागने के लिए तैयार रहो। साधु ने अपनी भगवा धोती हटाकर अपने कमंडल में पेशाब किया। पीएसी वाले नही समय पाए कि वह क्या कर रहा है । फिर साधु ने अपनी चुल्लू में पेशाब लेकर चारों ओर फेंकना शुरू कर दिया। पेशाब के छींटों से बचने के लिए पीएसी वाले पीछे हटे।उनका घेरा ढीला हुआ और उनकी हिरासत में बैठे सारे कार सेवक भाग लिए। साधु भी उनके साथ चल दिया। वैसे भी पीएसी वाले उस साधु के पास आते अब बच रहे थे। वह बताते थे कि अयोध्या में कर्फ्यू लगा था। वे अयोध्या से सटे गांव में एक किसान की पशुशाला में पूरी रात छिपे रहे। पुलिस की रात भर गश्त और घरों की तलाशी जारी थी। उनका जत्था बहुत सवेरे अयोध्या के लिए निकल लिया।भारी सुरक्षा और पुलिस और अयोध्या में कर्यूार होने के बाद भी सवेरे अचानक लाखों कार सेवक जब अयोध्या में चारों ओर से उमडे तो पुलिस और प्रशासन हक्का −बक्का रह गया। उन्हें कार सेवको के आने की सूचना नही थी। उम्मीद थी तो ये कि ज्यादा से ज्यादा 50 − 100 ही कार सेवक आ सकेंगे। कारसेवा के आयोजक चाहते थे कि कार सेवा प्रतीकात्मक हो, किंतु ये तो धर्म पर जान फिदा करने निकल थे। पहले लाठी चार्ज हुआ।फिर अश्रुगैस छोड़्री गई।उसके बाद भी जब कार सेवक गुंबद पर पहुंच गए तो गोली चली।मयंक मंयूर इस कार सेवा का जिक्र करते रोमांचित हो जाते थे। उनमें जोश उमड़ आता था।गोलाकांड के समय भीड के बारे में खुद मुलायम सिंह ने स्वीकार किया था 11 लाख की भीड़ लाकर खड़ी कर दी गई थी। अशोक मधुप ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

कैद में भी सुरक्षित नहीं कैदी

कैद में भी सुरक्षित नहीं कैदी अशोक मधुप कैसे हो कैदियों की सुरक्षा।आज न कैदी जेल में सुरक्षित है, न न्यायालय में ,न ही पुलिस कस्टेडी में।हर कैदी को जीवन के जीने का अधिकार है। शासन की जिम्मेदारी है कि उसे पूरी सुरक्षा दें। वह पुलिस हिरासत में हो या जेल मे पूरी तरह सुरक्षित रहे। सुरक्षित महसूस करे,किंतु आज इसके विपरित नजारा है। और जेल की तो बात क्या देश की सबसे सुरक्षित धनबाद की झारखंड और दिल्ली की तिहाड़ जेल में कैदी कत्ल हो रहे हैं।पुलिस कस्टेडी में कैदियों की सरेआम हत्या हो रही है। न्यायालय परिसर में ही नही, न्यायधीश के कक्ष तक में कैदी कत्ल हो जाते हैं।सवाल यह है कि इन कैदियों की सुरक्षा कैसे हो।इनकी हत्याओं पर कैसे रोक लगेॽ यूपी के अंबेडकर नगर के कुख्यात शूटर अमन सिंह की धनबाद जेल में हत्या हो गई है। रविवार दस दिसंबर को दोपहर तीन बजे अमन सिंह को नौ गोली मारी गई। अमन सिंह धनबाद के पूर्व डिप्‍टी मेयर की हत्‍या के मामले में वहां जेल में बंद था। कुख्‍यात बदमाश मुन्‍ना बजरंगी के लिए भाड़े पर हत्‍या करने वाला शूटर अमन सिंह यूपी का राजे सुल्‍तानपुर थाना क्षेत्र के जगदीशपुर कादीपुर गांव का रहने वाला था। अमन के करीबी आशीष रंजन और छोटू ने उसकी हत्या की जिम्मेदारी ली है। अमन सिंह पर कुल नौ गोली दागी गईं। इसमें से छह गोली लगी है। तीन गोली निशाने पर नहीं लगी थी। इससे इसकी संभावना बढ़ गई है कि एक से अधिक ने मिलकर गोली मारी है। लापरवाही बरतने वाले जेलर मो. मुस्तकीम अंसारी को तत्काल प्रभाव से निलंबित एवं स्थानांतरित करते हुए उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई चलाने का निर्देश दिया गया है। अमन की हत्या में प्रयुक्त पिस्टल पुलिस ने धनबाद जेल से बरामद कर ली है। जेल से दो पिस्टल बरामद हुई है। अब सवाल यह उठ रहा है कि जेल में इतनी तगड़ी व्‍यवस्‍था होने के बावजूद जेल में हथियार पहुंचा कैसा?घटना के बाद तलीशी में जेल से आठ की हजार नगदी समेत आधा दर्जन मोबाइल बरामद हुए जबकि दो दिन पहले जेल की तलाशी में सुब कुछ ठीक−ठाक मिला था। झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजय कुमार मिश्रा और जस्टिस आनंद सेन की खंडपीठ ने धनबाद जेल में बंद कुख्यात अपराधी अमन सिंह की गोली मारकर हत्या करने के मामले में स्वत: संज्ञान लिया है। खंडपीठ ने इस मामले में राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी है।चीफ जस्टिस की अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार से जवाब मांगा हैअदालत ने राज्य सरकार से घटना को लेकर पूछा कि जेल में हथियार कैसे पहुंच गए। जेल की सुरक्षा में चूक का कारण क्या है। दिल्ली की राजधानी की अति सुरक्षित मानी जाने वाली तिहाड़ जेल में भी कैदी सुरक्षित नही हैं। इस जेल में गैंगवार में अप्रेल− मई 2023 के 18 दिन में दो कैदी कत्ल कर दिये गए। सीसीटीवी कैमरों से लैस हाई सिक्योरिटी सेल में घुसकर चार बदमाशों ने दिल्ली-एनसीआर के कुख्यात गैंगस्टर सुनील उर्फ टिल्लू ताजपुरिया की बेरहमी से हत्या कर दी। जितेंद्र मान उर्फ गोगी गैंग से जुड़े बदमाशों ने हाई सिक्योरिटी सेल की पहली मंजिल की ग्रिल काटी। इसके बाद बेडशीट के सहारे नीचे उतरकर आरोपियों ने टिल्लू के कमरे में ग्रिल के सरिये से बनाए गए सुए से धावा बोल दिया। हाथ में सुए लिए सभी बदमाशों ने टिल्लू पर एक के बाद एक 90 से अधिक वार किए। जब तक जेल प्रशासन को पता चला तब तक बहुत देर हो चुकी थी।हमले के दौरान टिल्लू को बचाने आया रोहित नाम का कैदी भी जख्मी हो गया। जेल प्रशासन टिल्लू और रोहित दोनों को नजदीकी डीडीयू अस्पताल ले गया, जहां टिल्लू को मृत घोषित कर दिया गया। टिल्लू की दिन-दहाड़े हुई हत्या के बाद तिहाड़ जेल की सुरक्षा को बढ़ा दिया गया है। विदेश में बैठे गैंगस्टर गोल्डी बरार ने फेसबुक पोस्ट कर हत्याकांड की जिम्मेदारी ली है।उसने अपने पोस्ट में लिखा है कि उन्होंने टिल्लू की हत्या कर जितेंद्र मान उर्फ गोगी की हत्या का बदला ले लिया है 14 अप्रैल 2023 को जेल नंबर तीन में प्रिंस नामक कैदी की बॉबी, अता-उर-रहमान और विनय नामक कैदियों ने बेरहमी से हत्या कर दी थी। यह हत्या भी गैंगवार का नतीजा बताई गई थी।उस समय भी तिहाड़ की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हुए थे।हत्या, हत्या के प्रयास व अन्य धाराओं में मामला दर्ज कर गोगी गैंग के चार बदमाश दीपक उर्फ तितर (31), योगेश उर्फ टुंडा (30), राजेश (42) और रियाज खान (39) को औपचारिक रूप से इस मामले में गिरफ्तार कर लिया है।सुनील उर्फ टिल्लू ताजपुरिया (33) वर्ष हत्या, हत्या के प्रयास, मकोका, पुलिस टीम पर हमला और बलवा करने के करीब 11 मामलों में 2016 से जेल में बंद था। वह तिहाड़ जेल नंबर-8 के हाई सिक्योरिटी सेल में ग्राउंड फ्लोर पर था। जेल प्रशासन पुलिस को बताया कि मंगलवार सुबह उसकी सेल खोलने की तैयारी चल रही थी। इस बीच करीब 6.10 बजे पहली मंजिल पर बंद चारों कैदी दीपक उर्फ तितर, योगेश उर्फ टुंडा, राजेश और रियाज खान ने उस पर हमला बोल दिया। सेल में ही मौजूद कैदी रोहित ने टिल्लू को बचाने का प्रयास किया तो आरोपियों ने उस पर भी हमला किया। आरोपियों का इरादा भांपकर रोहित को जान बचाकर वहां से भाग गया। ये जेल ये हालात हैं।ऐसी ही स्थिति कमोबेश न्यायालय परिसर की है। 24 सितंबर 2021 को दिल्ली के रोहिणी कोर्ट रूम में टिल्लू गैंग के शूटरों ने जितेंद्र मान उर्फ गोगी की हत्या कर दी थी।जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने मुठभेड़ के दौरान टिल्लू गैंग के दो शूटरों को मार गिराया था। 16 अगस्त 2022 को उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले का न्यायालय परिसर के गेट पर बदमाशों ने हरियाणा से पुलिस कस्टडी में आये लखन नामक कैदी की अंधाधुंध फायर कर हत्याकर दी थी।इससे पहले भी इसी न्यायालय परिसर में राका नाम के एक बदमाश की कचहरी में हत्या की गई थी।19 दिसंबर 2019 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर की एक दोहरे हत्याकांड के आरोपी शहनवाज अंसारी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। हत्या उस समय की गई जब आरोपी को बिजनौर जिला कोर्ट में सीजेएम के सामने पेश किया गया था। गोली लगने से शहनवाज अंसारी की मौके पर ही मौत हो गई। आज तो हालत यह है कि पुलिस अभिरक्षा में आते −जाते कैदी भी सुरक्षित नहीं। 13 अप्रेल 2023 में प्रयागराज में मेडिकल के भारी पुलिस अभिरक्षा में अस्पताल लाते माफिया अतीक और उसके भाई अशरफ की हत्या की गई।20 दिसंबर 2021 को राजस्थान के जोधपुर पेशी से लौट रहे एक आरोपी सुरेश सिंह को पुलिस कस्टडी में ही बदमाशों ने गोलियों से भून दिया। तिहाड़ जेल में आरोपियों ने उस ब्लैक स्पाट को चुना जहां सीसीटीवी कैमरे नही हैं।दरअस्ल अपराधी बहुत चतुर हैं।उन्हें पता है कि कहां कैमरे लगे हैं,कहां नहीं।यक्ष प्रश्न यह भी है कि कैमरे लगी तिहाड़ जेल में कैदी सरिए को घिस पर सुंआ बनाते रहे और जेल प्रशासन को पता ही नही चला। कैदियों के साथ जेल में पहले बहुत मारपीट और अमानवीय व्यवहार होता था।उनके मानवाधिकार को देखते हुए जेल में कैमरे लगाये गए।कैमरे लगने के बाद क्यों ऐसी घटनांट होती हैं, ये जेल स्टाफ और जले प्रशासन की लापरवाही साबित करने के लिए काफी है। इन सब घटनाओं को देखते हुए आज जरूरत है कि जेल,पुलिस अभिरक्षा और न्यायालय परिसर में कैदियों की सुरक्षा पर फिर से मंथन हो।विशेषज्ञ बैठें और मंथन करें कि कैसे कैदियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएं। जेल में गैंगवार रोकने के लिए यह भी सुनिश्चित किया जाए कि एक जेल में दो प्रति स्पर्धी गैंग रहें। जेल आते −जाते कैदियों के सुरक्षा घेरे में कोई बाहरी व्यक्ति प्रवेश न करें।कैदियों के मीडिया के बात करने पर सख्ती से रोक हो।न्यायालय परिसर में भी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। यह ध्यान रहे कि कस्टेडी में कैदी की सुरक्षा की जिम्मेदारी,पुलिस, प्रशासन,न्यायपालिका के साथ सरकार की भी है। गिरफ्त में आने के बाद बड़े से बड़ा चौकस कैदी भी सुरक्षा के लिए प्रशासन पर निर्भर हो जाता है,ऐसे सुरक्षा में लापरवाही उसके कत्ल कराने के लिए जिम्मेदार होती है। अशोक मधुप ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Monday, December 4, 2023

भाजपा की इस जीत के संकेत समझिए







भाजपा की इस जीत के संकेत समझिए 
अशोक मधुप 
वरिष्ठ पत्रकार 
 पांच राज्य विधान सभा चुनाव में से तीन विधान सभाओं में पूर्ण बहुमत पाकर भाजपा ने अपने विरोधियों के सपनों को चूर− चूर कर दिया। तीन राज्यों में पूर्ण बहुमत मिलने से सिद्ध हो गया कि जनता पर किसका विश्वास है। इन चुनाव ने साबित कर दिया कि मोदी मैजिक कम नही हुआ अपितु बढ़ता ही जा रहा है। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मिली इस विजय ने भाजपा में जहां नई ऊर्जा और जोश भर दिया वहीं विपक्ष को कमजोर किया है। अब विपक्षी दलों के गठबधंन इंडिया में वर्चस्व को लेकर नई रार शुरू होगी।एक बात और कांग्रेस के जातिगत जनगणना और वायदों पर जनता ने यकीन नही किया। कांग्रेस की पुरानी पेंशन योजना की गारंटी का भी इस चुनाव में कोई प्रभाव नजर नही आया। ये चुनाव भाजपा की जीत तो है ही इस चुनाव में कांग्रेस की हार भी है। इस चुनाव में यह भी लगा कि अब जनता ने आधा अधूरा समर्थन देना बंद कर दिया। जिसे दिया उसे पूरा बहुमत देकर चुना।पांच साल के लिए चुना। बार –बार चुनाव और कमजोर सरकारों को उसने अब चुनना बंद कर दिया। तेलंगाना में कांग्रेस की सरकार जरूर बनी किंतु भाजपा ने यहां भी अपना प्रभाव बढ़ाया।पिछली बार यहां उसके पास एक सीट थी। इस बार उसके प्रत्याशियों ने आठ सीट पर कब्जा किया। तेलगांना में पिछली बार भाजपा को 6.98 प्रतिशत वोट मिले थे। अबकि बार उसका प्रतिशत बढ़कर 13. 9 हो गया।मिजोरम में भी इस बार भाजपा की एक सीट और बढ़ गई। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पूर्ण बहुमत मिलने के बाद अब 11 राज्यों में उसकी अपनी सरकार हो गई।वह हरियाणा महाराष्ट्र मेघालय नागालैंड और सिक्किम में सहयोगियों के बल पर सत्ता में हैं। इस तरह से देश की आधी आबादी पर उसका कब्जा है। कांग्रेस कनार्टक हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना तक ही सीमित होकर रह गई। हिंदी पट्टी में तो एक तरह से भाजपा का पूरा कब्जा हो गया। भाजपा की सांसदों और केंद्रीय मंत्रियों को चुनाव में उतारने की नीति कामयाब रही।वे अधिकतर विजयी रहे। चुनाव में उतारे मंत्रियों और सांसदों की जगह भाजपा लोकसभा चुनाव में अब नए चेहरे उतारेगी। जिनका चुनाव में विरोध नही होगा। मध्यप्रदेश में कांग्रेस 2018 में 114 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। बहुमत से कुछ सीटें कम आने के कारण उसने निर्दलीय, समाजवादी पार्टी और बसपा विधायकों के समर्थन से सरकार बनाई थी। हालांकि, पार्टी के भीतर पैदा हुए राजनीतिक संकट ने भाजपा को 15 महीने बाद सत्ता में वापस ला दिया। मार्च 2020 में 22 कांग्रेस विधायकों के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में शामिल हो गए और कमल नाथ की सरकार सत्ता से बाहर हो गई। मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव के परिणाम ने साफ कर दिया कि मध्य प्रदेश की जनता ने कांग्रेस की गारंटियों पर विश्वास नहीं किया। कांग्रेस की रणनीतिक कमजोरी भी उस पर भारी पड़ी। पार्टी ने चुनाव प्रचार के दौरान जोर-शोर से महिलाओं को डेढ़ हजार रुपये प्रतिमाह देने, पांच सौ रुपये में रसोई गैस सिलेंडर, 100 यूनिट बिजली फ्री, 200 यूनिट बिजली हाफ, किसान कर्ज माफी, पुराने बिजली बिल की माफी, पुरानी पेंशन योजना की बहाली, जाति आधारित गणना सहित अन्य गारंटियां दी थीं। मतदाता इनके प्रभाव में नहीं आए और फिर भाजपा पर ही विश्वास जताया। मध्य प्रदेश में सरकार विराधी कोई लहर दिखाई नहीं दी। यहां भाजपा को 49 प्रतिशत और कांग्रेस का 40 प्रतिशत मत मिले। राजस्थान के रण में कांग्रेस के नेता अशोक गहलोत की जादूगरी काम नहीं आई। राजस्थान में 1993 के बाद जनता ने किसी दल को दुबारा सत्ता नही सौंपी। ऐसा ही इस बार हुआ। भाजपा राजस्थान में मोदी के नाम पर चुनाव लड़ी।यह उसके लिए फायदेमंद रहा।यदि किसी को मुख्यमंत्री बताकर लड़ती को नुकसान होता। मुख्यमंत्री उम्मीदवार के विरोधी उसे हराने में लग जाते। अब सब एकजुट नजर आए। कांग्रेस की हार का कारण शिकायतों के बाद भी विधायकों के टिकट नही कटना रहा । कांग्रेस ने पुरानों पर भरोसा किया जबकि जनता बदलाव चाहती थी। कांग्रेस को यहां अशोक गहलोत और पाइलेट को छोड़ तीसरा विकल्प चुनना था। अशोक गहलोत मद में थे। वे समझे बैठे थे कि उन्हें कोई नही हरा सकता ।कांग्रेस की 25 लाख रुपये की हेल्थ इश्योरेंस स्कीम भी काम नहीं आई। कांग्रेस की कई और योजनाएं भी जारी थीं। कांग्रेस के आलाकमान ने सचिन पायलट को इस चुनाव में शुरू से ही एक साथ काम करने के मना लिया था। कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी प्रचार में उतरे, मगर कुछ काम नहीं आया। यहां भाजपा को 42 प्रतिशत मत मिले तो कांग्रेस को 40 प्रतिशत। तमिलनाडू में सत्तारूढ वीआरएस को हार का सामना करना पडा। 119 सीट वाली विधान सभा में यहां कांग्रेस 64 सीट लेकर पूरे बहुमत से सत्ता में आई। कांग्रेस यहां सत्ता में आई जरूर किंतु भाजपा भी यहां लाभ में रही । पिछली बार भाजपा की एक सीट थी अब आठ हैं। तेलगांना में पिछली बार भाजपा को 6.98 प्रतिशत वोट मिले थे। अबकि बार उसका प्रतिशत बढ़कर 13. 9 हो गया। छत्तीसगढ में भूपेश बघेल की हार का कारण अतिविश्वास रहा। महादेव एप जैसे घोटाले भ्रष्टाचार कांग्रेस को ले डूबा।उसके लोक लुभावने वादों पर जनता ने यकीन नही किया। छत्तीसगढ में भाजपा को 46 प्रतिशत मत मिले।कांग्रेस को 42 प्रतिशत। मिजोरम के चुनाव परिणाम आ गए । यहां जोरम पीपुल्स मूवमेंट (जेडपीएम) ने बहुमत पाया। कांग्रेस से यहां भी भाजपा लाभ में रही। इस विधान सभा में कांग्रेस को एक सीट मिली तो भाजपा के खाते में दो सीट गईं। कांग्रेस के राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और मल्लिकार्जुन खरगे ने जाति आधारित गणना की गारंटी को बार-बार दोहराया। इसके माध्यम से दांव यह खेला गया था कि ओबीसी मतदाताओं को प्रभावित किया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।इतना जरूर हुआ कि इससे उसका परपरांगत अल्पसंख्यक वोट और छिटक गया।इस हार से कांग्रेस के सामने विपक्षी दलों के गठबंधन में ही चुनौती आने लगी हैं। अब तक सबसे बड़ा दल होने के कारण उसकी मांग की थी कि विपक्ष का प्रधानमत्री का उम्मीदवार कांग्रेस से होगा। जेडीयू के प्रदेश महासचिव निखिल मंडल ने एक्स पर एक पोस्ट करते हुए कांग्रेस पर हमला बोला है और कहा कि अब 'इंडिया गठबंधन' को नीतीश कुमार के अनुसार चलना होगा। एक बात और भाजपा की जीत का बड़ा कारण है उसका बूथ लेबिल तक बना संगठन, जबकि कोई और दल बूथ तक अपना संगठन नही खड़ा कर सका। भाजपा की आधी आबादी यानी महिलाओं में भी बड़ी पकड़ है। भाजपा ने महिलाओं का भी बूथ लेबिल तक संगठन खड़ा किया है। बड़ी बात यह भी है कि पार्टी के पास नरेंद्र मोदी जैसा जुझारू नेता भी है,जो बिना रूके बिना थके अनवरण कार्य में लगा रहता है। भाजपा की मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संगठन तो अपने कार्यकर्ताओं और संगठन के लिए विख्यात है ही। कांग्रेस नेता प्रमोद कृष्णम् ने इस चुनाव में कांग्रेस की हार को सनातन के विरोध का नतीजा बताया। कहा कि राहुल जो कर सकते थे किया। उनकी बात में दम लगता है । आज भारत में सनातन और राष्ट्रवाद का प्रभाव नजर आ रहा है। जनता अब एक मजबूत सरकार और मजबूत देश और एक मजबूत प्रधानमंत्री चाहती है। अशोक मधुप (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Sunday, December 3, 2023

बहुत अच्छा है विदेशों में खालिस्तान समर्थकों का विरोध




बहुत अच्छा है विदेशों में खालिस्तान समर्थकों का विरोध अशोक मधुप वरिष्ठ पत्रकार विदेशों विशेषकर अमेरिका और कनाडा से आई खबरें बहुत ही अच्छी हैं। भविष्य को लेकर आशा जगाने वाली खबरें हैं। खबर हैं कि कनाडा में भारतीय राजदूत के विरूद्ध प्रदर्शन करने वालों का वहां मौजूद भारतीयों ने जमकर विरोध किया। परिणाम स्वरूप प्रदर्शनकारियों को खालिस्तान के झंडे छोडकर भागना पडा। अमेरिका में खालिस्तान समर्थकों ने अमेरिका में भारतीय राजदूत तरनजीत सिंह संधू के साथ बदतमीजी की कोशिश नाकाम रही। संधू को अमेरिका में बसे सिखों ने न केवल सम्‍मानित किया बल्कि उनकी बातों को भी ध्‍यान से सुना। माना जा रहा है कि गुरपतवंत सिंह पन्‍नू के इशारे पर इस घटना को अंजाम दिया गया है।एक बात और भारत ने देश की गुरपतवंत सिंह पन्‍नू की संपत्तियों को हाल ही में जब्त किया है। यह कार्य तो बहुत पहले करना चाहिए था। गुरपतवंत सिंह पन्‍नू के खालिस्‍तानी आतंकी संगठन सिख फॉर जस्टिस की अमेरिका में भारतीय राजदूत तरनजीत सिंह संधू के साथ धक्‍का मुक्‍की करने की चाल फेल हो गई। खालिस्‍तानियों ने गुरुपर्व पर अमेरिका के न्‍यूयार्क शहर में स्थि‍त गुरुद्वारे में भारतीय राजदूत के साथ धक्‍का मुक्‍की की कोशिश की लेकिन उनकी यह चाल वहां मौजूद सिखों ने फेल कर दी। यही नहीं इन सिखों ने भारतीय राजदूत को सम्‍मानित भी किया। गुरुद्वारे के अंदर ही संधू का सिख समुदाय के लोगों ने जोरदार स्‍वागत किया गया था। इस कार्यक्रम के दौरान भारतीय राजदूत ने अफगानिस्‍तान से सुरक्षित तरीके से सिखों को निकालने का जिक्र किया और कहा कि सरकार हमेशा उनके साथ खड़ी है। कनाडा के सरे शहर में स्थित लक्ष्मी नारायण मंदिर के बाहर खालिस्तानियों ने श्रद्धालुओं को परेशान किया । जमकर बवाल मचाया। वहां कनाडा में भारत के राजदूत गए हुए थे। जब हिंदू उनका विरोध करने आगे आए तो वो लोग भाग गए।यह घटना 26 नवम्बर की है।खालिस्तानियों के हंगामे और श्रद्धालुओं को परेशान करने की खबर पर हिंदू मंदिर के बाहर इकट्ठा हो गए और खालिस्तानियों का विरोध किया। हिंदुओं ने हाथों में भगवा झंडे ले रखे थे। इन लोगों ने यहाँ साथ में तिरंगा भी लहराया और देशभक्ति वाले गीत चलाए।खालिस्तानियों की बेइज्जती करने के लिए भीड़ ने नारे भी लगाए। इसी घटना के वायरल वीडियो में खालिस्तानियों को गालियाँ भी पड़ती दिख रही हैं। एक वीडियो में भीड़ खालिस्तानियों के खिलाफ उल्टे –सीधे नारे भी लगा रही है।अपना विरोध होते देश ये एक डेढ़ दर्जन के आसपास खालिस्तान समर्थक अपने झंडे छोड़कर गायब हो गए।इन अतिवादियों का आरोप है कि कनाडा के हरदीप सिंह निज्जर की हत्या भारत ने कराई। खालिस्तान समर्थकों का जो अमेरिका और कनाडा में जो विरोध अब हुआ, वह तो बहुत पहले होना चाहिए था। शुरूआत में ही विरोध होने लगता तो वे ऐसा करने के हौंसले नही कर पाते। लंदन में भारतीय हाई कमीशन में तोड़फोड़ की घटना के विरोध नई दिल्ली में सिखों का प्रदर्शन हुआ था। बड़ी तादाद में सिख ब्रिटिश हाई कमीशन के बाहर जुटे और खालिस्तानियों की हरकत का विरोध किया। इसी तरह का विरोध उन देशों में भी होना चाहिए था , जहां कुछ खालिस्तानी खुराफात कर रहे हैं। अमेरिका गुरूद्वारे में सिख समाज ने इन खालिस्तानी का विरोध किया। ऐसा ही अन्य जगह भी सिख समाज को करना चाहिए था। उनकी चुप्पी इशारा करती है कि वह खालिस्तान के समर्थन में हैं , जबकि ऐसा है नहीं। कुछ ही सिरफिरे इस तरह की हरकत कर रहे हैं।1980 के आसपास भी ऐसी ही गलती हुई थी। पंजाब में बढ़ते खालिस्तानी आंदोलन का विरोध नही हुआ था। स्वर्ण मंदिर में भिंडरावाले के बसने का गुरूद्वारा प्रबंध समिति और सिख समाज को विरोध करना चाहिए था। उस समय की उनकी चुप्पी सेना को आपरेशन तक पहुंच गई। कनाडा और अमेरिका में हाल में खालिस्तान समर्थकों की छोटी मोटी कार्रवाई उनकी हताशा बताती है।भारत में कुछ कर पाने में असमर्थ विदेशों में बसे चंद अतिवादी झल्लाएं है। वे यह बताना चाहते हैं कि खालिस्तान का मुद्दा मरा नही। जबकि सच्चाई अब सब समझ रहे हैं । उधर कनाडा भारत पर लगाए अपने आरोप पर घिरता जा रहा है।कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडोने आरोप लगाया था कि कनाडा नागरिक हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत के राजनयिक का हाथ है। हरदीप सिंह निज्जर भारत से फरार अपराधी खालिस्तानी अतिवादी है। इस आरोप पर तनातनी बढ़ने के बाद भारत ने कई बार कनाड़ा से इस हत्या के सुबूत मांगे किंतु कनाडा ऐसा नही कर सका।आतंकी निज्जर की हत्या के मामले में भारत सरकार नें कनाडा की सुरक्षा एजेंसियों और एनएसए के अन्य अधिकारियों को हर संभव मदद का आश्वासन दिया था, लेकिन जब भारत अपने अधिकारियों को कनाडा भेजने का निर्णय किया तब उसने भारतीय टीमों को वीजा देने से इनकार कर दिया गया। दरअसल, भारत सरकार यह पता करने के लिए एक टीम को कनाडा भेजना चाह रही थी कि निज्जर की हत्या पर भारत के खिलाफ कनाडाई लोगों की क्या राय है? भारतीय सरकार का कहना है कि कनाडा को हमारी टीमों को आने की अनुमति देनी चाहिए और दिखाना चाहिए कि उनके पास हमारे खिलाफ क्या सबूत है, लेकिन वे हमारे कई बार के अनुरोधों के बावजूद वीजा जारी नहीं किया। भारत के एनएसए डोभाल और उनके कनाडाई समकक्ष ने आतंकवाद मुद्दे पर चर्चा की। डोभाल ने कनाडा में बैठे उपद्रवियों और आतंकवादियों के बारे में स्पष्ट जानकारी दी। डोभाल ने अपने समकक्ष को भारत के विभिन्न एजेंसियों और राज्य के पुलिस के वांटेडों की सूची और एलआर की भी सूची दी थी। एसए डोभाल ने बताया कि, ‘भारत समय-समय पर कनाडा के साथ समय-समय पर खुफिया जानकारी साझा की और वांटेडों के ठिकानों की जानकारी भी उपलब्ध कराई.’ उधर कनाडा के एनएसए ने भारत पर आतंकी निज्जर की हत्या का आरोप लगाया था, हालांकि डोभाल ने कहा कि अगर उसके हत्या में भारत का हाथ है तो एफआईआर या कोई स्पष्ट सबूत जारी करे।उमेश डोभाल ने कहा कि अगर हमारे तरफ से कोई दोषी निकला तो कड़ी कारवाई करेंगे, लेकिन कनाडाई कभी कोई सबूत पेश नहीं कर सके. भारत ने कहा कि कैनेडियन ये सब सिर्फ फेक नैरेटिव क्रिएट करने के लिए कर रहे हैं.कनाडा कभी भी आतंकी मामलों में जांच में कभी सहयोग क्यों नहीं किया, जहां कनाडा से हमले हुए थे. बताया जा रहा है कि वीडियो और ऑडियो सबूत जानने के बावजूद एक भी गिरफ्तारी नहीं हुई. कनाडा की धरती से आए दिन हिंदुओं को धमकियां मिलती रहती हैं, लेकिन वे पुन्नू को गिरफ्तार नहीं करते..ऐसा क्यों? भारत ने ये भी कहा कि निज्जर की मौत गैंगवार में हुई थी, जो कनाडा में इन आतंकवादी समूहों को पनाह देने का ही परिणाम है। कनाडा सा ही मामला अमेरिका का है । अमरिका ने सार्वजनिक रूप से न कह भारत के उच्चाधिकारियों से कहा कि उनके नागरिक की एक भारतीय द्वारा हत्या की कोशिश की गई।भारत और अमेरिका इस मामले की मिलकर जांच कर रहे हैं। अमेरिका ने शोर मचाकर भारत से संबंध खराब करने नही चाहे। उसे भारत को अपने हथियार बेचने हैं। वह भारत की जरूरत महसूस करता है। एक बात और आज भारत कमजोर नही है। अमेरिका हो या ब्रिटेन या फ्रांस सभी को भारत की जरूरत है। भारत इनसे खुलकर कहे कि भारत के आतंकवादी पालकर भारत से मित्रता नही चलेगी। मित्रता करनी है तो रूस की तरह साफ और सीधी होनी चाहिए। आपके देश में कोई भारत विरोधी बसता है तो उसे भारत को सौंपना होगा। अशोक मधुप ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Friday, December 1, 2023

समाज को देहदान के लिए प्रेरित करेगी ये शपथ


समाज को देहदान के लिए प्रेरित करेगी ये शपथ अशोक मधुप वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन ने अपने 64वें वार्षिक अधिवेशन में एक ऐसा कार्य किया कि आना वाला समय उन्हें याद रखेगा। बहुत से लोग उनके पदचिन्हों का अनुसरण करेंगे।उनके इस कार्य से प्रेरणा लेंगे।इन चिकित्सकों ने महर्षि दधिचि की देहदान की परम्परा को आगे बढ़ाया।इस अधिवेशन में बीस हजार चिकित्सकों ने अपनी देहदान करने की शपथ ली। जो कार्य चिकित्सकों ने किया, वह कार्य अन्य संगठनों को भी करना चाहिए।काँलेज को करना चाहिए,विश्वविद्यालयों को करना चाहिए। भारत में प्रतिवर्ष पांच लाख से ज्यादा लोग वक्त पर अंग न मिलने से मौत का शिकार हो जाते हैं।इनमें से दो लाख के आसपास लोगों की मौत लिवर नहीं मिलने की वजह से होती है।इन मरने वालो में अधिकतर वे लोग होतें हैं जो पैसा देकर अंग नही खरीद सकते। पैसे वाले तो मन मांगा मोल देकर अंग खरीद लेते हैं।इसी कारण मानव अंगों के अवैध कारोबार को बढ़ावा मिलता है।भारत में प्रतिवर्ष दस लाख व्यक्तियों में अंगदान करने वालों की संख्या 0.8 है। विकसित देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, नीदरलैंड और जर्मनी में यह संख्या 10 से 30 के मध्य है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार एक मृत व्यक्ति के अंगदान से नौ लोगों को नया जीवन मिल सकता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण प्रतीक्षा सूची में 1,04999 पुरुष, महिला और बच्चे आज भी इस इंतज़ार में हैं कि कोई अंगदान करेगा और वे अपना जीवन जी सकेंगे। राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण प्रतीक्षा सूची में अकेले किडनी के जरूरतमंद व्यक्ति ही 88551 है।भारत में प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ लाख मौतें सड़क हादसों से होती हैं। वर्ष 2022 में ही 168491 मौत हुईं। इनमें सबसे पहले मस्तिष्क पूरी तरह से कार्य करना बंद कर देता है, ऐसा शरीर अंगदान के लिए उपयुक्त होता है। इसके बावजूद बमुश्किल दो -तीन प्रतिशत भाग्यशाली लोगों को नए अंग मिलते हैं।हृदय, फेफड़े, लिवर, किडनी, आंत, पैंक्रियाज ऐसे अंग हैं, जो मृत व्यक्ति के परिजनों द्वारा दान किए जा सकते हैं। आंख का कॉर्निया, हड्‌डी, त्वचा, नस, मांसपेशियां, टेंडन, लिगामेंट, कार्टिलेज, हृदय वाल्व भी मृत्यु के बाद किसी अन्य व्यक्ति के काम आ सकते हैं। जीवित व्यक्ति एक पूरी किडनी व लिवर का कुछ हिस्सा दान में दे सकता है। शेष एक किडनी से दानदाता का जीवन व्यतीत हो सकता है । लिवर समय के साथ बढ़ जाता है और पुन: अपनी पुरानी अवस्था में लौट आता है इसलिए दाता को किसी प्रकार की कोई दिक़्क़त नहीं होती है। भारत में अंगदान दाताओं की संख्या के कम होने के कारण हैं-सही जानकारी का अभाव, धार्मिक मान्यता, सांस्कृतिक भ्रांतियां और पूर्वाग्रह। लोगों में अंधविश्वास है कि यदि मृत व्यक्ति की आंखों को दान दिया जाता है तो उसे मरने के उपरांत स्वर्ग नहीं मिलता या अगले जन्म में वह आंख या दान दिए अंग के बिना पैदा होगा। जबकि अंगों को शरीर से निकालने से परंपरागत अंत्येष्टि क्रिया या दफन क्रियाओं में कोई बाधा नहीं आती। इससे शरीर के में भी कोई परिवर्तन नहीं होता। जबकि मृतक के परिजन मृतप्राय: रोगियों को अंग को बहुमूल्य उपहार के रूप में दान देकर अपने परिजन के जीवन को सार्थक बना सकते हैं। एक बात और रिपोर्ट बताती हैं कि जीवित व्यक्ति में भारत में अंग दान करने वाली महिलाएं ज्यादा है।पांच किडनी दान करने वालों में चार महिलांए हैं।वे भी ज्यादा पत्नी हैं। हिंदू पत्नी की इच्छा होती है कि पति के सामने उसका निधन हो। उसे वैधव्य न देखना पड़े। मान्यता है कि पति से सामने मरने वाली महिला पति के कंधे पर बैठकर सीधी स्वर्ग जाती है। भारतीय समाज में कुछ धार्मिक कार्यों में विधवा का शामिल होना निषिद्ध है। इसलिए महिला अपने पति के लिए प्रत्येक प्रकार का उत्सर्ग करने को तैयार हो जाती है। समाज में घर कर गई इस धारणा दो बदलना होगा।बताना होगा कि पति −पत्नी दोनों समान रूप से सामज के लिए उपयोगी है।इसलिए पत्नी की जरूरत पर पति को अंगदान करने के लिए आगे आना चाहिए। भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीन एवं महान संस्कृति है। दान, धर्म एवं उच्च संस्कार प्राचीन काल से ही हमारे समाज में वरिष्ठ स्थान रखते रहे हैं। महर्षि दधीचि ने अंगदान की पराकाष्ठा का उदाहरण समाज के समक्ष रखा। वह भारतीय संस्कृति के प्रथम अंगदानी कहे जाते हैं। देवता और दानव में युद्ध चल रहा था !दानव देवताओं पर भारी पड़ रहे थे। देवताओं को समझ नहीं आ रहा था कि युद्ध में कैसे विजय पाई जाए। इसके लिए वे ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने सुझाव दिया कि महर्षि दधीचि की अस्थियों से बने अस्त्र से दानवों को पराजित किया जा सकता है। देवता महर्षि दधीचि के पास गए। याचना की। महर्षि दधीचि द्वारा दी गई अस्थियों से बने वज्र से राक्षास ब्रजासुर का बद्ध हुआ। दानव पराजित हुए। आर्यव्रत की हजारों साल पुरानी देहदान और अंगदान की इस परंपरा में आज भी लोगों की रुचि नहीं है। मुझे याद है कि लगभग 40 साल पहले उत्तर प्रदेश के बिजनौर के स्टेडियम में खेल प्रतियोगिता के दौरान भाला लगने से एक कर्मचारी घायल हो गया था। उसे खून की जरूरत थी।कहे जाने पर भी उसके परिवार जनों ने खून नहीं दिया था। उसकी मदद के लिए स्टेडियम के खिलाड़ी आगे आये। उनके रक्त देने से कर्मचारी की जान बची।अच्छा यह है कि अब रक्तदान के प्रति तो लोगों में जागरूकता बढ़ी है, किंतु अंगदान के प्रति अभी चेतना नही है।अंगदान के प्रेरित करने वाले चिकित्सक और स्वास्थ्य कर्मियों की भी कमी है।यदि बड़े और सरकारी अस्पताल के चिकित्सक मृतक के परिजनों को अंगदान के लिए प्रेरित करने लगे तो बड़ा काम हो सकता है। अंगदान की प्रक्रिया बहुत लाभकर है पर जिस तेजी से बढ़नी चाहिए, उस तेजी से नहीं बढ़ी। अभी भी दुनिया के करोड़ों लोग इसलिए मर जाते हैं क्योंकि क्योंकि उनकी देह के अंग कार्य करना बंद कर देते हैं। यदि अन्य मरने वाले के सही अंग उनके परिवारजन दान करने लगें तो बहुतों की जान बच सकती है।अंगदान के नाम पर आंख देना ही शुरू हुआ है।यह भी न के बराबर। मानव कल्याण के लिये अंगदान का प्रचार प्रसार बहुत जरूरी है। अंगदान के लिए जनजागरण की जरूरत है। स्कूली शिक्षा से छात्रों में जनजागरण के लिए जागरूकता विकसित की जानी चाहिए। अन्य अभियानों की तरह अंगदान के लिए भी अभियान चलाने की जरूरत है।इसके लिए विभिन्न धर्मगुरूओं से संपर्क कर उनसे अनुरोध किया जाए कि वह अंगदान के लिए अपने समर्थकों को प्रेरित करें। वैसे हाल में अंगदान के लिए कई अच्छे स्लोगन सामने आए हैं।मरने के बाद भी यदि दुनिया की खूबसूरती देखते रहना चाहते हों तो आंखे दान करो।मरने के बाद भी दिल की धड़कन महसूस करनी हों, तो दिल दान करों।इस तरह के और रोचक नारे और स्लोगन बनाकर बढ़ियाकर प्रचार करने महर्षि दधीचि की देहदान की परम्परा को ओर आगे बढ़ाया जा सकता। और लोगों की जान बचायी जा सकती हैं। अशोक मधुप (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) https://www.hindi.awazthevoice.in/opinion-news/this-oath-will-inspire-people-to-donate-their-bodies-37443.html

Thursday, November 30, 2023

सभी श्रमिकों को सुरक्षित निकलने में कामयाब हुए फौलादी इरादे

अशोक मधुप वरिष्ठ पत्रकार दुनियां भर की दुआंए काम आ गईं। फौलादी इंसानी इरादों के आगे आखिर चट्टान हार गई।उत्तराखंड के उत्तरकाशी की सिल्क्यारा सुरंग में फंसे 41 श्रमिकों को आखिरकार 17 वें दिन बाहर निकाल लिया गया। उन्हें मेडिकल जांच के लिए अस्पताल ले जाया गया। खुद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह दोनों लगातार सुरंग के पास डटे रहे। पीएमओ के प्रधान सचिव पीके मिश्र भी मौके पर मौजूद रहे। सबसे पहले पांच श्रमिकों को बाहर निकाला गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरे घटनाक्रम पर नजर रखे थे।उन्होंने एक श्रमिक से खुद बात की।उत्तराखंड सरकार ने प्रत्येक श्रमिक को एक−एक लाख रूपया देने की घोषणा की।ये आपरेशन प्रदेश और केंद्र सरकार के संयुक्त प्रयास से कामयाब हुआ।सरकार की 17 एजेंसी के अलावा विदेशी विशेषज्ञ भी इसमें लगे रहे। यह बहुत ही अच्छा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस तरह के प्रत्येक मामले में खुद रूचि लेने लगते हैं।इस मामले में भी ऐसा ही हुआ।आपरेशन के उपकरण लाने के लिए सेना के हरक्युलिस विमान का प्रयोग हुआ। अमेरिका की ड्रिल करने वाली आगर मशीन तक लाकर लगाई गई। इस मामले में ऐसा नही हुआ कि अकेले एक ही एजेंसी बचाव में जुटी रही हो।पूरे देश का तंत्र इसमें लगा था। इस अभियन में सभी सुरक्षा एजेंसी की एकजुटता भी सामने आई। अन्यथा अन्य जगह सबकी अपनी −अपनी ढपली सबका अपना−अपना राग होता है। यह पहला अभियान नही था।वर्ष 2010 में चिली में कॉपर-सोने की खदान में काम करने वाले 33 श्रमिकों को 69 दिनों के लंबे अंतराल के बाद खदान से सकुशल बाहर निकाला गया था। ये खदान में काम करते थे। खदान में रास्ता अचानक टूटा और सभी लोग 700 मीटर नीचे फंस गए।13 नवंबर 1989 को पश्चिम बंगाल के रानीगंज की महाबीर खदान में 71 मजदूर अपना काम करते खदान में बाढ़ आने से फंस गए थे। ।इनमें से छह की डूबने से मौत हो गई। सुंरग के बराबर दूसरी सुंरग खोदकर 65 मजदूरों को बचाया जा सका था। 23 जून 2018 को थाईलैंड में 12 बच्चे यहां एक लंबी गुफा में फंस गए थे। थाईलैंड सरकार ने विदेशों से मदद मांगी।100 तैराक दुनिया भर से बुलाए गए । 18 दिन बाद ये बच्चे सकुशल निकल आए। उत्तरकाशी की सिल्क्यारा सुरंग घटना के बाद से मीडिया में आ रहा है कि हिमालय में सुंरग नही बननी चाहिए।इससे पहाड़ दरक रहे हैं। बड़े हादसे हो सकते हैं।जबकि विकास कार्य करते इस तरह का हादसा होता है।ऐसी बात होती हैं। ये भारत में नही पूरी दुनिया में होता है।हादसे होते हैं। होते रहेंगे किंतु इससे विकास का पहिंया तो नही रोका जा सकता। सड़के बनाना तो नही रूक सकता। ये सड़क चारधाम यात्रा को सुगम बनाने के साथ देश को सीमा से जोड़ने के लिए बनाई जा रही है। बार्डर तक सेना और उसके भारी उपकरणों की सरल आवाजाही के लिए बनाई जा रही है। ये तो देश की बडी जरूरत है। पहाड़ों पर जब भी विकास होता है तभी कुछ अपने को विशेषज्ञ मानने वाले और पर्यावरणविद शोर मचाने लगतें हैं।इनका यही कहना रहता है कि इससे पहाड़ दरकेंगे।वहां का पर्यावरण संतुलन बिगड़ेगा। टिहरी डैम बनते भी ऐसा ही हुआ था।उसके विरोध में लंबा आंदोलन चला था।इस परियोजना के विरोध में तो पर्यावरणाविद सुंदरलाल बहुगुणा ने तो 1995 में 45 दिन तक उपवास किया। इन सबके बावजूद टिहरी डैम बन गया। केदारनाथ आपदा के समय पहाड़ों से आए भारी जल को इसी डैम में लिया गया।इसी के कारण प्लेन में होने वाली भारी आपदा टल गई।अगर पानी टिहरी डैम में न लिया जाता तो नीचे प्लेन में भारी तबाही का सामना करना पड़ता। पहाड़ों में विकास कार्य के दौरान ही हादसे नही होते। हादसे सभी जगह होतें हैं। कहीं बनते पुल गिर जाते हैं तो कही कार्य में लगी विशाल क्रेन श्रमिकों पर आ गिरती है। अभी 23 अगस्त को मिजोरम के सैरांग इलाके के पास एक निर्माणाधीन रेलवे पुल गिरने से 17 मजदूरों की मौत हो गई। 18 मई 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में वाराणसी कैंट से लहरतारा के बीच बन रहे पुल के गिरन से 18 श्रमिक मरे । 31 मार्च 2016 को कोलकत्ता का विवेकानन्द फ्लाईओवर गिरने से क्रॉसिंग से गुजर रहे 50 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई, जबकि 90 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे। हादसे होते हैं। होते रहेंगे। इनकी वजह से विकास कार्य नही रोके जा सकते।हादसे होने का कारण श्रमिकों और यात्रियों की सुरक्षा में बरती गई लापरवाही होता है।इसमें भी ऐसा ही हुआ।सुरक्षा मानकों के परीक्षण के लिए बनी एजेंसी सही से जांच और कार्य नही करतीं।इन्ही के कारण हादसे जन्म लेते हैं।इस हादसे में भी ऐसा ही हुआ। बताया जाता है कि इस सुरंग के बराबर में एक और सुरंग बननी थी।दोनों सुरंगों को बीच− बीच में आपस में जोड़ा जाना था।सुरंग निर्माता कंपनी और निर्माण के मानकों की जांच में लगी एजेंसियों के अधिकारियों की जिम्मेदारी तै होनी चाहिए।उनके विरूद्ध कठोर तक कार्रवार्ई हो। एक बात और इस बचाव में रैट-होल खनिकों का भी बड़ा यागदान रहा। जबकि राष्ट्रीय हरित अधिकरण ( एनडीएमए)ने रैट-होल खनन पर रोक लगाई हुई है। अच्छा यह है कि रोक के बावजूद देश की पुरानी परंपरागत ये तकनीक अभी जिंदा है। ये महाभारतकालीन तकनीक है।इसी तकनीक से विदुर ने लाक्षागृह में सुरंग बनवाकर पांडवों को सुरक्षित निकलवा लिया था।ये ही तकनीक हादसे के शिकार श्रमिकों को बाहर निकालने में कामयाब हुई। राष्ट्रीय हरित अधिकरण के रोक के बावजूद इस तकनीक को जिंदा रखने के प्रयास होने चाहिए। जहां तक सुरंग के निर्माण की बात है।श्रमिकों के बचाने के अभियान में यह साफ हो गया कि यहां सामग्री अच्छी क्वालिटी की थी।इसी कारण अमेरिका की आगर मशीन भी गिरे मलबें में फंसे सुरंग के सरियों के आगे विवश हो गई। इंसान कठिन से कठिन चुनौती को स्वीकार करने का शुरू से आदि है।आदिम अवस्था से आज तक उसकी यही जद्दोजहद उसे जिंदा रखे हुए है। इसी की बदौलत वह चांद पर पंहुचा तो कभी उसने माउंट एवरेस्ट का फतह किया। प्रकृति और इंसान का ये संघर्ष अनवरत चलने वाली प्रकिया है। कभी ये चुनौती हैजे के रूप में सामने आती है तो कभी कोरोना के। इनसे हारकर तो नही बैठा जा सकता। जलप्रलय, भूकंप से डरकर निकलना ही जिजिविषा है।यही इस मामले में सामने आई। इस हादसे में फंसे श्रमिकों के बचाव से भारत की शाख दुनिया में बढ़ी है। पूरी दुनिया के चैनल और मीडिया इस बचाव कार्य को कवर कर रहा था।इन सबने इस बचाव में भारत की बचाव एजेंसियों की एकजुटता देखी और प्रशंसा की। अशोक मधुप (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)