Tuesday, August 18, 2020

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी 13

 पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी 13

23 दिसंबर 1989 को श्रमजीवी पत्रकार संघ के सम्मेलन में भाग लेने के लिए मुझे स्वगीय राजेंद्र पाल सिंह कश्यप, वीरेशबल आदि को गांधीनगर गुजरात जाना था। कार्यक्रम काफी पहले से निर्धारित था। हम उसकी तैयारी में लगे थे । पता चला कि नजीबाबाद के साथी जितेंद्र जैन को पुलिस ने पकड़ा। थाने में बुरी तरह मारा- प‌ीटा। दरवाजे के किवाड़ में देकर उनकी उंगली कुचल दीं गई। प्लास से नाखून खींचे गए। पुलिस जितना कर सकती थी ,उनके साथ किया। जितेंद्र जैन जेल भेज दिए गए।

नजीबाबाद के साथी अपने साथ मुझे भी जितेंद्र जैन से मिलने जेल ले गए। जितेंद्र जैन की हालत देखकर सबको बहुत गुस्सा आया। उन्होंने आप बीती भी सुनाई। यह बात मैंने वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय राजेंद्र पाल सिंह कश्पय को बताई। उन्होंने कहा कि हमें कल निकलना है। मैंने कहा निकलना तो शाम को है। बड़ी ज्यादती हुई है। कल दिन में प्रदर्शन कर लेते है्ं। वहीं से मैंने श्री बाबूसिंह चौहान साहब से बात की। चौहान साहब ने कहा कि वे भी जेल मेंं जितेंद्र जैन से मिलकर आए हैं। वास्तव में उसके साथ बहुत ही ज्यादती हुई है। बात चीत हुई।सहमति बनी की ज्यादती हुई है। आवाज उठाई जाए।अगले दिन 11 बजे प्रदर्शन करना तै हुआ। यह भी बात हो गई कि प्रदर्शन होगा, यह खबर सुबह के सब अखबारों में छप जाए।

बिजनौर के पत्रकारों में भी अन्य जगह की तरह धड़े बदी है। ,खेमें हैं। इसके बावजूद यह भी सत्य है कि पत्रकारों के विरुद्ध होने वाली ज्यादती पर एक साथ खड़े हो जाते हैं।

उस समय डा कश्मीर सिंह एसपी थे। नजीबाबाद में सत्तार नाम एक बदमाश था। उसके आंतक से सब परेशान थे। उसने जाब्ता गंज के सतीश की निर्ममता पूर्वक हत्या कर दी थी। उसके परिवार जन सत्तार की गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे।पोस्टमार्ट के बाद सतीश का शव नजीबाबाद आया। उसे जाब्तागंज जाना था किंतु लोगों ने घोषणा कर दी कि उसका अंतिम संस्कार कल्लू गंज में किया जाएगा। कल्लू गजं में शव जमीन पर रखकर ।अग्नि देने की प्रकिया चल रही थी कि एसडीएम और क्षेत्राध‌िकारी मौके पर पंहुच गए। शव कब्जे में लेकर भीड़ को भगा दिया गया। बताया जाता कि अधिकारियों ने इस मामले में नजीबाबाद के पत्रकारों से बात की थी।कहा था कि इस प्रकरण में पत्रकार जितेंद्र जैन की भूमिका संदिग्ध है। हो सकता है कि प्रशासन को लगा हो कि पत्रकार नहीं बोलेंगे । इसीलिए उसने जितेंद्र जैन के साथ बरबरता की।

अगले दिन समाचार छपा । 11 बजे पूरे जनपद से पत्रकार एकत्र हुए। प्रदर्शन हुआ।हमने कहा कि हम यूनियन के गुजराज सम्मेलन में जा रहे हैं। ये बात यहां उठाएंगे। हम रात में निकल गए।

बिजनौर में श्री बाबू सिंह चौहान रह गए। अधिकारी चौहान साहब का सम्मान करते ही थे। डरते भी थे। क्योंकि वे बड़े से बड़े प्रभाव के आगे दबते नहीं थे।

तत्कालीन एसपी डा कश्मीर सिंह अलग तरह के अधिकारी थे। उनके बिजनौर की मीडिया समेत समाज के सभी महत्वपूूर्ण लोगों से संबंध थे। हालत यह थी कि उनके तबादले पर जगह जगह विदाई कार्यक्रम हुए थे। शहर की दुकानों पर मिठाई नही बची थी।प्रदर्शन और चौहान साहब का रूआब जितेंद्र जैन को रिहा कराने में कामयाब आ गया। मामला खत्म हुआ।

छात्रवृति घोटाला

 छात्रवृति घोटाला

1993 में बिजनौर जनपद में हरिजन समाज कल्याण विभाग में घोटाला हुआ। यह लगभग 50 लाख रुपये का घोटाला था। दो वर्ष पूर्व अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए छात्र वृति देने की सरकार की योजना आई। इसमें व्यवस्था की गई थी कि छात्रवृति विद्यालय के खाते में जाएगी। इस व्यवस्था की कमी को बिजनौर समाज कल्याण विभाग के एक ल‌िपिक मोर्य ने पकड़ लिया। उसने जनपद के कुछ विद्यालय के प्रबधंक- प्रधानाचार्य के दोस्ती गांठी। उनसे कॉलेज के नाम से मिलते -जुलते नाम के खाते खुलवा लिए।विद्यालय को छात्रवृति न भेजकर विद्यालयों से मिलते -जुलते खातों में राशि डाल दी।

इस घोटाले का मुझे जून के आसपास पता चला। मैंने अमर उजाला में छापना शुरु किया। उस समय ओम सिह चौहान समाज कल्याण अधिकारी थे । वे दावा करते कि उनके यहां घोटाला हो ही नहीं सकता। सीडीओ सुंदर लाल मुयाल होते थे। उन्होंने हमारे समाचार देख तत्कालीन डीडीओ आरएस वर्मा को जांच सौंपी ।

इस प्रकरण लगभग आठ माह चला।प्रारंभिक जांच में 27 लाख का घोटाला मिला। 23 मार्च 1994 को समाज कल्याण अधिकारी ओम  सिंह चौहान  की गिरफ् तारी हुई।

समाज कल्याण विभाग में एक कर्मचारी होते थे मलिक। उनके पिता मेरे दोस्त होते थे।इस प्रकरण के चलने के दौरा एक दिन शाम को मलिक मेरे पास आए। अटैची उनके पास थी। वह बोले - छात्रवृति घोटाले के समाचार छापने बंद कर दें। अटैचीं में तीन लाख रुपये हैं। इन्हें रख लें। मैंने कहा - मलिक तुझे यह भी ख्याल नहीं आया कि तेरे वालिद मेरे दोस्त होतें हैं । वह बहुत शर्मीदा हुआ। अटैची लेकर वापस चला गया।

इसके बाद केस शुरु हो गया। एक दिन एक वकील साथी दफ्तर आए। बोले - समाज कल्याण का बाबू जगन लाल मोर्य को लेकर आऊंगा।वे चाहतां  है कि आप उन्हें लिखकर दे दें। इस घोटाले की जानकारी मैने मोर्य ने दी। इसके बाद आपने छापी। जो आपकी बात हो, उसमें से पांच हजार रुपये मुझे देने हैं।

वे बाद में मोर्य को लेकर आए। मोर्य को उम्मीद थी कि अमर उजाला से लिखकर  मिल जाने पर तू बच जाएगा। मैंने कहा कि लिखकर दे दूंगा। बीस लाख लूूंगा। मैं जानता था कि वह नहीं देगा। मैंने कहा मोर्य बाबू वह भूल गए, जब मैने तीन लाख लौटा दिए थे। तुमने कैसे सोच लिया कि मैं लिखकर दे दूंग?। मोर्य को तो उतना बुरा नहीं लगा, जितना मित्र महोदय को लगा। क्योंक‌ि मुफ्त में मिल रह पांच हजार रुपये का उनका नुकसान हो गया। 

Thursday, August 6, 2020

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -8

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -7
एक नेक्सलाइड के साथ बाढ़ में एक दिनआज देश के कई भाग में नेक्सलाइड का जोर है। सुरक्षा दलों पर ये घात लगाकर हमला करते रहें हैं। इस माहौल में सन् 84 के आसपास का एक नक्सली नेता के साथ बाढ़ में एक दिन बिताने का संस्मरण याद आ रहा है।
कॉलेज के समय से मैं मार्क्सवादी कम्युनिष्ट आंदोलन से जुड़ गया था। इसी दौरान वामपंथी आंदोलन की अलग -अलग विचारधाराओं से परिचय हुआ।कुछ समय शिक्षण कर पूर्णकालिक पत्रकारिता से जुड़ गया। लगभग 45 साल पूर्व अमर उजाला से जुड़ा। 80 के आसपास मैं घर  से समाचार भेजता था। घर ही एक तरह से मेरा कार्यालय था।
एक दिन कुर्ता पायजामा पहने कंधे पर थैला लटकाए एक साहब घर आए। उन्होंने अशोक कुमार के रुप में अपना परिचय दिया। अपने को सीपीआईएमएल की प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बताया। सीपीआईएमएल भारत की कम्युनिष्ट पार्टी मार्क्सवादी लेलिनवादी है।इसके कई भाग हो गए। अधिकतर सत्ता प्राप्त‌ि के लिए सशस्त्र  आंदोलन के रास्ते पर निकल गए। इन्हे की नेक्सलाईड कहा गया ।   अपने घर पर एक नेक्सलाईड को देख कर अचकचा गया। लगा कि इसके बैग में हैंड ग्रेनेट या स्टेनगन हो सकती है। मेरे दिमाग में नेक्सलाइड की यही छवि थी। खैर कुछ देर मुझे सामान्य होने में लगे। अशोक से बातचीत हुई। वह मेरे ही जनपद के रानीपुर गांव के रहने वाले हैं। बाद में उससे अच्छी दोस्ती हो गई। वह यदा - कदा आने लगे। अशोक मंडावर के गंगा खादर क्षेत्र में अपना संगठन बना रहा थे। इसी दौरान गंगा में बाढ़ आ गई। गंगा बहुत तबाही कर रही थीं। अशोक ने कहा कि गंगा बहुत तबाही कर रही है। चलो बाढ़ घुमाता हूं।
मुझे बाढ़ में जाने का कोई अनुभव नहीं था। तै हो गया कि अगले दिन सबेरे सात बजे मंडावर बस स्टैंड पर मिलेंगे। मुझे ध्यान नहीं था,कि अगले दिन तीज का पर्व है। बाढ का भी कोई  अनुभव नही था। ये ही दिमाग में भी कि गंगा किनारे जांऊगा। एक डेढ़ घंटे में देखकर लौट आउंगा।पत्नी निर्मल से नौ बजे तक आने को मैं कहकर कैमरा लेकर घर से निकल गया। अशोक मुझे मंडावर मिले। उसके साथ बैलगाड़़ी में बैठकर गंगा के किनारे बसे गांव डैबलगढ़ पहुंच गया। यह गांव अंग्रेज कलेक्टर डैबल द्वारा बसाया गया ब्रिटीशकालीन गांव हैं।
यहां नाश्ताकर हम नाव से बाढ़ देखने चल दिए। गंगा का जल पूरे उफान पर था। बड़े -बडे़ पेड़ पहाड़ों से बहकर आ रहे थे। गंगा की धार की जोरदार आवाज से ही डर लग रहा था। मुझे तैरना नहीं आता ।एक बार ज्योतिषी ने कहा था कि पानी से बचना। पानी में ले जाने वाले को अपना दुश्मन मानना। पानी में किसी के साथ नहीं जाना। गंगा की तेज उठती पटारों को देखकर मुझे डर लग रहा था। ऐसे में ज्योतिषी की बताई इस बात के याद आने पर मेरा डर और बढ़ गया। नाव में अशोक उनकी पार्टी का स्टेट सेकेट्री और लगभग एक दर्जन गांव वाले सवार थे। नाव खेवकों को गंगा की धार को पार करना था। अतः वे नाव को खींचकर धार से ऊपर की साइड में ले गए। ऐसी जगह देखकर क‌ि जहां से नाव पानी में बह कर दूसरी साइड में सही जगह जाकर लगे।
उन्होंने नाव धार में डाल दी। वे तेजी से चप्पू चलाकर नाव को दूसरी साइड में ले जाने की कोशिश कर रहे थे। नाव के दोंनो किनारों के बीच में बीच में छेद करके मोटे रस्से बांधे गए थे। इन रस्सों में चप्पू फंसे थे। खेवक इन्हीं रस्सों में चप्पू चलाकर नाव नियंत्रित कर रहे थे।नाव धार के बीच पहुंची थी कि चप्पू को रोकने वाली दांई एक साइड की रस्सी टूट गईं। चप्पू के रस्सी के फंदे से बाहर होते ही नाव दूसरी साइड को वह चली। नाविकों का कंट्रोल नाव से खत्म हो गया।नाव में बैठे एक युवक ने टूटी रस्सी को चप्पू के चारों ओर घुमाया ।छेद में टूटा सिरा निकाला और उसे कसकर पकड़कर बैठ गया। उसने ये काम बहुत जल्दी किया। खेवक ने तेजी से चप्पू चलाना प्रारंभ कर दिया । नाव संभल गई। अपने गंतव्य की ओर चलने लगी। यहां से हम गंगा के बीच के गांव खैरपुर ,खादर ,लाडपुर लतीफपुर और इन्छावाला आदि गांव पहुंचे। यहां के रहने वालों ने गंगा की बाढ़ को देख अपने - अपने परिवार मुजफ्फर नगर जनपद के शुक्रताल नामक स्थान पर पहुंचा दिए थे। शुक्रताल प्रसि़द्ध धार्मिक स्थल हैं। यहां बहुत सारी धर्मशालाएं हैं। इनमें इनके परिवार रुके थे।इन गांव से शुक्रताल  जाना सरल है। पानी को देखकर  किसानों ने   काफी पशु खोलकर आजाद कर  दिए  । ताकि वह बहकर अपनी जान बचा लें।कुछ पशु थे तो वह घुटनों तक पानी में खडे़ थे। हालाकि ग्राम वालों ने गांव और घरों के बाहर के किनारे मिट् टी और पत्थर लगाकर पानी रोकने के लिए उपाए किए थे फिर भी घरों में दो फुट तक पानी भरा था। बुग्गी के उपर चूल्हे रखकर खाना बनाने की व्यवस्था की हुई थी। प्रत्येक घर  का एक दो पुरुष सदस्य गांव में रूका था।लोगों से बात कर फोटो खींच हम यहां से लौट लिए।पानी में जौंक थी। ये आसपास के खेतों के किनारे की छोटी -छोटी झाड़ियों पर बैठी थीं। तिड़क कर नाव में आ जाती थीं। मुझे इनसे बचाने को नाव के बीच में पटरे पर बैठाया हुआ था । इसके बावजूद डर लग रहा था। जौंक एक छोटा कीड़ा होता है। यह आदमी और पशु के शरीर पर लगकर उसका खून चूंसता हैं। छोटा सा यह कीट खून पीकर काफी बड़ा हो जाता है। नाम में सवार एक दो गांव वालों को यह लगी। उन्होंने जोक को पकड़ा ।खींचकर छुडाया । पानी में फेंक दिया। खींचने में जौंक लगने की जगह से खून भी निकलने लगा।
हमें शाम हो गई थी किंतु नाव नदी में लाने के लिए स्थान नहीं मिल रहा था। नदी में उसी स्थल पर नाव डाली जाती हैं, जहां नदी और खेत का स्तर बराबर होता है। यहां खेत नदी से काफी ऊंचाई पर था। ढांग ढूढते अंधेंरा हो गया। इस दौरान डाक मक्खी निकलने लगीं। यह बहुत खतरनाक काले- नील  रंग की मोटी मक्खी होती है। इसके काटने से बड़े पशु तक के शरीर से खून निकलने लगता हैं।डाक मक्खी और जोक के डर से मैं सहमा और सुकड़ा बैठा था। चांदनी रात थीं, ऐसे में नाव का सफर बहुत सुहाना और सुखद लग रहा था। पर गहरे पानी में डूबने ,जौंक और डाक मक्खी के काटने के डर ने सब कुछ गड़बड़ कर रखा था। घर की भी चिंता हो आई थी। सबेरे के नौ बजे तक आने को कह आया था । अब रात के आठ बजने को हैं। त्योहार का दिन होने के कारण पत्नी निर्मल परेशान, मेरे इंतजार में बिना खाए -पिए बैठीं होगी।रात नौ बजे हम गांव में आकर पड़े । जल्दी -जल्दी पेट भरा। घर की चिंता दी। मैने खाना खाकर गांव वालों से कहा कि मुझे मंडावर पंहुचा दें किसी ट्रक आदि से बिजनौर पंहुच जाऊंगा। उन्होंने मनाकर दिया । कहा -रास्ते में बदमाश लगते हैं। अब जाना ठीक नहीं। घर की चिंता में ढंग से नींद भी नहीं आई। इस समय फोन होते नहीं थे, जो घर सूचित किया जा सके।सबेरे जल्दी उठकर मंडावर से पहली बस पकड़कर  लगभग नो बजे बिजनौर पंहुचा। घर पर निर्मल का रोते बुरा हाल था।  । निर्मल ने  बताया कि वह अभी  कुलदीप सिंह के यहां गई थी। मेरे अमर उजाला के दूसरे साथी कुलदीप सिहं उस सयम मुहल्ले में ही कुछ दूर पर रहतें थे। उनसे एसपी को कहलवाया है। एसपी ने पूछा -किसके साथ गए है, तो कुलदीप सिंह बताया कि एक नेक्सलाइड अशोक है, उसके साथ है। एसपी होशियार सिंह बलवारिया थे। वे भी बहुत नाराज हुए।
आकर मैने एसपी को फोन किया। बलवारिया मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे। मैंने उन्हें बताया कि मैं आ गया हूं, वह बहुत नाराज हुए। कहा नेक्सलाईड के साथ जाना ठीक नहीं । अभी एनएसए की फाइल चल रही है। ये और उसमें शामिल हो जाएगा।कई दिन लगे निर्मल का गुस्सा शांत होने में । उनका गुस्सा इस बात को लेकर था,कि त्योहार के दिन क्यों गए। हमारा त्यौहार खराब हुआ। बनाया खाना भी बेकार रहा।
अशोक मधुप
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Wednesday, August 5, 2020

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -7

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -7
एक नेक्सलाइड के साथ बाढ़ में एक दिनआज देश के कई भाग में नेक्सलाइड का जोर है। सुरक्षा दलों पर ये घात लगाकर हमला करते रहें हैं। इस माहौल में सन् 84 के आसपास का एक नक्सली नेता के साथ बाढ़ में एक दिन बिताने का संस्मरण याद आ रहा है।
कॉलेज के समय से मैं मार्क्सवादी कम्युनिष्ट आंदोलन से जुड़ गया था। इसी दौरान वामपंथी आंदोलन की अलग -अलग विचारधाराओं से परिचय हुआ।कुछ समय शिक्षण कर पूर्णकालिक पत्रकारिता से जुड़ गया। लगभग 45 साल पूर्व अमर उजाला से जुड़ा। 80 के आसपास मैं घर  से समाचार भेजता था। घर ही एक तरह से मेरा कार्यालय था।
एक दिन कुर्ता पायजामा पहने कंधे पर थैला लटकाए एक साहब घर आए। उन्होंने अशोक कुमार के रुप में अपना परिचय दिया। अपने को सीपीआईएमएल की प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बताया। सीपीआईएमएल भारत की कम्युनिष्ट पार्टी मार्क्सवादी लेलिनवादी है।इसके कई भाग हो गए। अधिकतर सत्ता प्राप्त‌ि के लिए सशस्त्र  आंदोलन के रास्ते पर निकल गए। इन्हे की नेक्सलाईड कहा गया ।   अपने घर पर एक नेक्सलाईड को देख कर अचकचा गया। लगा कि इसके बैग में हैंड ग्रेनेट या स्टेनगन हो सकती है। मेरे दिमाग में नेक्सलाइड की यही छवि थी। खैर कुछ देर मुझे सामान्य होने में लगे। अशोक से बातचीत हुई। वह मेरे ही जनपद के रानीपुर गांव के रहने वाले हैं। बाद में उससे अच्छी दोस्ती हो गई। वह यदा - कदा आने लगे। अशोक मंडावर के गंगा खादर क्षेत्र में अपना संगठन बना रहा थे। इसी दौरान गंगा में बाढ़ आ गई। गंगा बहुत तबाही कर रही थीं। अशोक ने कहा कि गंगा बहुत तबाही कर रही है। चलो बाढ़ घुमाता हूं।
मुझे बाढ़ में जाने का कोई अनुभव नहीं था। तै हो गया कि अगले दिन सबेरे सात बजे मंडावर बस स्टैंड पर मिलेंगे। मुझे ध्यान नहीं था,कि अगले दिन तीज का पर्व है। बाढ का भी कोई  अनुभव नही था। ये ही दिमाग में भी कि गंगा किनारे जांऊगा। एक डेढ़ घंटे में देखकर लौट आउंगा।पत्नी निर्मल से नौ बजे तक आने को मैं कहकर कैमरा लेकर घर से निकल गया। अशोक मुझे मंडावर मिले। उसके साथ बैलगाड़़ी में बैठकर गंगा के किनारे बसे गांव डैबलगढ़ पहुंच गया। यह गांव अंग्रेज कलेक्टर डैबल द्वारा बसाया गया ब्रिटीशकालीन गांव हैं।
यहां नाश्ताकर हम नाव से बाढ़ देखने चल दिए। गंगा का जल पूरे उफान पर था। बड़े -बडे़ पेड़ पहाड़ों से बहकर आ रहे थे। गंगा की धार की जोरदार आवाज से ही डर लग रहा था। मुझे तैरना नहीं आता ।एक बार ज्योतिषी ने कहा था कि पानी से बचना। पानी में ले जाने वाले को अपना दुश्मन मानना। पानी में किसी के साथ नहीं जाना। गंगा की तेज उठती पटारों को देखकर मुझे डर लग रहा था। ऐसे में ज्योतिषी की बताई इस बात के याद आने पर मेरा डर और बढ़ गया। नाव में अशोक उनकी पार्टी का स्टेट सेकेट्री और लगभग एक दर्जन गांव वाले सवार थे। नाव खेवकों को गंगा की धार को पार करना था। अतः वे नाव को खींचकर धार से ऊपर की साइड में ले गए। ऐसी जगह देखकर क‌ि जहां से नाव पानी में बह कर दूसरी साइड में सही जगह जाकर लगे।
उन्होंने नाव धार में डाल दी। वे तेजी से चप्पू चलाकर नाव को दूसरी साइड में ले जाने की कोशिश कर रहे थे। नाव के दोंनो किनारों के बीच में बीच में छेद करके मोटे रस्से बांधे गए थे। इन रस्सों में चप्पू फंसे थे। खेवक इन्हीं रस्सों में चप्पू चलाकर नाव नियंत्रित कर रहे थे।नाव धार के बीच पहुंची थी कि चप्पू को रोकने वाली दांई एक साइड की रस्सी टूट गईं। चप्पू के रस्सी के फंदे से बाहर होते ही नाव दूसरी साइड को वह चली। नाविकों का कंट्रोल नाव से खत्म हो गया।नाव में बैठे एक युवक ने टूटी रस्सी को चप्पू के चारों ओर घुमाया ।छेद में टूटा सिरा निकाला और उसे कसकर पकड़कर बैठ गया। उसने ये काम बहुत जल्दी किया। खेवक ने तेजी से चप्पू चलाना प्रारंभ कर दिया । नाव संभल गई। अपने गंतव्य की ओर चलने लगी। यहां से हम गंगा के बीच के गांव खैरपुर ,खादर ,लाडपुर लतीफपुर और इन्छावाला आदि गांव पहुंचे। यहां के रहने वालों ने गंगा की बाढ़ को देख अपने - अपने परिवार मुजफ्फर नगर जनपद के शुक्रताल नामक स्थान पर पहुंचा दिए थे। शुक्रताल प्रसि़द्ध धार्मिक स्थल हैं। यहां बहुत सारी धर्मशालाएं हैं। इनमें इनके परिवार रुके थे।इन गांव से शुक्रताल  जाना सरल है। पानी को देखकर  किसानों ने   काफी पशु खोलकर आजाद कर  दिए  । ताकि वह बहकर अपनी जान बचा लें।कुछ पशु थे तो वह घुटनों तक पानी में खडे़ थे। हालाकि ग्राम वालों ने गांव और घरों के बाहर के किनारे मिट् टी और पत्थर लगाकर पानी रोकने के लिए उपाए किए थे फिर भी घरों में दो फुट तक पानी भरा था। बुग्गी के उपर चूल्हे रखकर खाना बनाने की व्यवस्था की हुई थी। प्रत्येक घर  का एक दो पुरुष सदस्य गांव में रूका था।लोगों से बात कर फोटो खींच हम यहां से लौट लिए।पानी में जौंक थी। ये आसपास के खेतों के किनारे की छोटी -छोटी झाड़ियों पर बैठी थीं। तिड़क कर नाव में आ जाती थीं। मुझे इनसे बचाने को नाव के बीच में पटरे पर बैठाया हुआ था । इसके बावजूद डर लग रहा था। जौंक एक छोटा कीड़ा होता है। यह आदमी और पशु के शरीर पर लगकर उसका खून चूंसता हैं। छोटा सा यह कीट खून पीकर काफी बड़ा हो जाता है। नाम में सवार एक दो गांव वालों को यह लगी। उन्होंने जोक को पकड़ा ।खींचकर छुडाया । पानी में फेंक दिया। खींचने में जौंक लगने की जगह से खून भी निकलने लगा।
हमें शाम हो गई थी किंतु नाव नदी में लाने के लिए स्थान नहीं मिल रहा था। नदी में उसी स्थल पर नाव डाली जाती हैं, जहां नदी और खेत का स्तर बराबर होता है। यहां खेत नदी से काफी ऊंचाई पर था। ढांग ढूढते अंधेंरा हो गया। इस दौरान डाक मक्खी निकलने लगीं। यह बहुत खतरनाक काले- नील  रंग की मोटी मक्खी होती है। इसके काटने से बड़े पशु तक के शरीर से खून निकलने लगता हैं।डाक मक्खी और जोक के डर से मैं सहमा और सुकड़ा बैठा था। चांदनी रात थीं, ऐसे में नाव का सफर बहुत सुहाना और सुखद लग रहा था। पर गहरे पानी में डूबने ,जौंक और डाक मक्खी के काटने के डर ने सब कुछ गड़बड़ कर रखा था। घर की भी चिंता हो आई थी। सबेरे के नौ बजे तक आने को कह आया था । अब रात के आठ बजने को हैं। त्योहार का दिन होने के कारण पत्नी निर्मल परेशान, मेरे इंतजार में बिना खाए -पिए बैठीं होगी।रात नौ बजे हम गांव में आकर पड़े । जल्दी -जल्दी पेट भरा। घर की चिंता दी। मैने खाना खाकर गांव वालों से कहा कि मुझे मंडावर पंहुचा दें किसी ट्रक आदि से बिजनौर पंहुच जाऊंगा। उन्होंने मनाकर दिया । कहा -रास्ते में बदमाश लगते हैं। अब जाना ठीक नहीं। घर की चिंता में ढंग से नींद भी नहीं आई। इस समय फोन होते नहीं थे, जो घर सूचित किया जा सके।सबेरे जल्दी उठकर मंडावर से पहली बस पकड़कर  लगभग नो बजे बिजनौर पंहुचा। घर पर निर्मल का रोते बुरा हाल था।  । निर्मल ने  बताया कि वह अभी  कुलदीप सिंह के यहां गई थी। मेरे अमर उजाला के दूसरे साथी कुलदीप सिहं उस सयम मुहल्ले में ही कुछ दूर पर रहतें थे। उनसे एसपी को कहलवाया है। एसपी ने पूछा -किसके साथ गए है, तो कुलदीप सिंह बताया कि एक नेक्सलाइड अशोक है, उसके साथ है। एसपी होशियार सिंह बलवारिया थे। वे भी बहुत नाराज हुए।
आकर मैने एसपी को फोन किया। बलवारिया मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे। मैंने उन्हें बताया कि मैं आ गया हूं, वह बहुत नाराज हुए। कहा नेक्सलाईड के साथ जाना ठीक नहीं । अभी एनएसए की फाइल चल रही है। ये और उसमें शामिल हो जाएगा।कई दिन लगे निर्मल का गुस्सा शांत होने में । उनका गुस्सा इस बात को लेकर था,कि त्योहार के दिन क्यों गए। हमारा त्यौहार खराब हुआ। बनाया खाना भी बेकार रहा।
अशोक मधुप
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जब सलूजा पर हुआ हमला ।उनपर ही दर्ज हुआ हत्या का मुकदमा

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -6
जब सलूजा पर हुआ हमला ।उनपर ही दर्ज हुआ हत्या का मुकदमा

11 मार्च 19 94 । बिजनौर सूचना आई कि धामपुर में अमर उजाला के पत्रकार महेंद्र सलूजा के खिलाफ धारा 302 में मुकदमा दर्ज हुआ है। कुछ लोगों से सलूजा को हमला कर घायल कर दिया है।मैँ और वरिष्ठ साथी जनसत्ता संवाददाता ओपी गुप्ता जी टैक्सी कर धामपुर पंहुच गए। यहां के के शर्मा इंस्पैक्टर थे। के के शर्मा अलग तरह के पुलिस अधिकारी रहे। ऐसे अधिकारी जो बड़े - बड़े अधिकारी के दबाव के आगे भी नहीं झुके। वे दंगा रोकने के स्पेशलिस्ट थे। संभल दंगों के लिए मशहूर था। वे संभल में छह साल तैनात रहे। जबकि तीन साल से ज्यादा पुलिस अधिकारी का एक स्थान पर तैनाती का नियम नहीं था।के के शर्मा हमारे बहुत नजदीक थे। सलूजा धामपुर ‌थाने में ही मिले। डीएम अशोक कुमार चतुर्थ और कप्तान निरंजन लाल भी मौजूद थे। पता लगा कि एक दलित युवक को कहीं से सांप मिल गया था। युवक नसेड़ी था।वह उससे खेल रहा था। जैतरा के पास तालाब में उसे एक और सांप मिल गया। वह उससे भी खेलने लगा । तालाब में मिला सांप जहरीला था। उसने एक दो जगह काट लिया । पर ध्यान नहीं दिया। सलूजा को पता चला । वे मौके पर गए। फोटो खींचे। इसी दौरान थाने के दरोगा रविंद्र कुमार भी दो सिपाही के साथ मौके पर आ गए।उन्होंने समझाया। युवक की समझ में नहीं आया। काफी भीड़ एकत्र थी। सांप से खेलते युवक की मौत हो गई। युवक के परिजनों को लोगों ने चढ़ा दिया। यहां कि अखबार वाले फोटो खींचकर ले गए हैं । ये अखबार में छापेंगे। तो तुम फंस जाओंगे। महेंद्र सलूजा सरदार हैं। सरल हैं। दिन रात सड़क पर घूमने वाले कबीर परम्परा के पत्रकार।युवक के परिवार जनों से सलूजा को पकड़ लिया। उसे बुरी तरह मारा- पीटा। पकड़ कर थाने ले आए। सलूजा, दरोगा रविद्र स‌िंह थाने के दो सिपाही सहित कई लोगों ‌के खिलाफ आई पीसी की धारा 147, 302, 323 के अंतर्गत मुकदमा लिखाया कि इन्होंने षडयंत्र कर उनके परिवार जन को मारा। वह सांप से खेल रहा था। तालाब में दूसरा जहरीला सांप दिखाई दिया। इन्होंने एक राय की। दरोगा रविंद्र कुमार ने सांप को लाठी से उठाया। युवक के गले में डाल दिया। कहा खेल । इससे खेल। ये सांप जहरीला था। इसके काटने से सांप से खेलने वाले की मौत हो गई।प्रदेश में बसपा की सरकार थी। लगभग एक सप्ताह बाद मुख्यमंत्री मायावती जी को बिजनौर आना था। अतः दलित नेताओं ने पीड़ित परिवार को चढ़ा दिया। डटे रहना। इसकी पत्नी को सरकारी नौकरी भी मिलेगी । मुआवजा भी। हम पंहुचे । बात हुई। डीएम अशोक कुमार ने कहा कि मरने वाले की पत्नी को नौकरी दिलाई जाएगी। हमने कहा कि हमारे पत्रकार सलूजा पर हमला हुआ है। उसे क्या मिलेगा? डीएम ने कहा कि पांच हजार रुपये दिए जाएंगे।हम सलूजा केे इलाज के लिए बिजनौर को लेकर चलने लगे । एसपी निरंजन लाल ने कहा कि उपचार करा कर भिजवा देना। मैंने कहा कि हम माने की सलूजा मुलजिम है? इस पर इंस्पैक्टर के के शर्मा ने कहा कि कोई जरुरत नहीं। सलूजा मुलजिम नहीं हैं। आप जहां चाहें ले जांए। जहां रखे। निरंजन लाल अलग तरह के अधिकारी थे। पर के के शर्मा के सामने वे कुछ नहीं बोले।हम सलूजा  केे इलाज के लिए बिजनौर को लेकर चलने लगे । एसपी निरंजन लाल ने कहा कि उपचार करा कर भिजवा देना। मैंने कहा कि हम माने कि सलूजा मुलजिम है?  इस पर इंस्पैक्टर के के  शर्मा  ने कहा कि कोई जरुरत नहीं। सलूजा   मुलजिम नहीं हैं। आप जहां चाहें ले जाएॅ।  जहां रखे। निरंजन लाल  अलग तरह के अधिकारी थे। पर के के शर्मा के सामने वे कुछ नहीं बोले।
हम सलूजा को बिजनौर ले आए। जिला अस्पताल में भर्ती  करा दिया।अगले दिन डीएम  अशोक कुमार को अस्पताल ले जाकर सलूजा  को पांच  हजार रुपये  दिलाए। रुपये  देते फोटो  खिंचाया। कुलदीप सिंह ने कहा कि ये फोटो अखबार में छपना चाह‌‌िए ताकि लगे कि ये मुलजिम नहीं हैं। हमने  फोटो छपने भेज दिया।
डेस्क् को फोन कर कहा । तो उन्होंने कहा कि भदोरिया जी को बता दो। भदोरिया जी प्रदेश प्रभारी होते थे।उनसे फोटो छापने का अनुरोध  किया।
सुबह फोटो अखबार में नही था। मैने डैक्स के साथी से पूछा ।  उसने कहा क‌ि  पेेज पर लग चुका था। आपके फोन करने पर आलोक भदौरिया जी ने रुकवा दिया। मैने एडमिन के साथी राजीव  धीरज से बात की । धीरज  स्योहारा से हैं। स्योहारा में मेरे अधीन अमर उजाला के रिपोर्टर होते थे। फिर मेरठ चले गए। मैने उन्हें किस्सा सुनाया और कहा -  इस्तीफा भेज रहा हूॅ । उन्होंने कहा कि राजेंद्र ‌त्रिपाठी जी को बता दो। आज के अमर उजाला मेरठ के संपादक राजेंद्र त्रिपाठी उस समय क्राइम रिपोर्टर होते थे।  देर से सोए होंगे। मैंने उन्हें  फोन कर स्थ‌िति बता दी। कहा कि टैक्सी से इस्तीफा भेज रहा हूं।
अतुल जी के रहने के टाइम में मैं  नाराज होकर साल में एक -दो बार इस्तीफा भेज देता था। वह बुलाकर मना लेते थे।
दुपहर एक  बजे  अतुल जी का फोन आया। लोगों को सोने भी नहीं देते । मेरठ आइये।
मैँ  और साथी कुलदीप सिंह अखबार की टैक्सी से मेरठ  चले गए। उन्होंने हमारी आराम से बात सुनी।आलोक भदोरिया को  बुलाया। फोटो न छापने का कारण पूछा। उनसे कहा कि जिले में बैठकर ब्यूरो प्रमुख को वहां के हालात से काम करने पड़ते है। इसलिए  उनकी सुनिए। उसी के हिसाब से काम करिए। फोटो   सुबह के अखबार  में छप  जाना चाह‌िए।और इस तरह वह फोटो छप गया।
मुख्यमंत्री मायावती बिजनौर  आयीं। चलीं गईं। इस प्रकरण का जिक्र भी नहीं हुआ। 11 मार्च  1994 को दर्ज  मुकदमा एक माह बाद 12अप्रेल 94 को खत्म हो गया।  सलूजा पर हमले की आशंका को देख एसपी ने उन्हें तीन -तीन माह के लिए एक एक सशस्त्र गार्ड  दिया। तीन माह के बाद मंडलायुक्त की संस्तुति से इनके पास तीन ‌माह और गार्ड रहा।
सलूजा फक्कड़ रहे । शुरू से लेकर । अब भी ऐसे ही हैं। गार्ड रहा। कोई  वाहन तो था नहीं। सलूजा जी दिन भर साइकिल पर लिए घूमते। कभी सलूजा साइकिल चलाते । कभी गार्ड।।सलूजा जी आज अमर उजाला में नहीं हैं,पर सरलता वैसी ही है।अशोक मधुप

Sunday, August 2, 2020

जब मेरे विरूद्ध दर्ज हुआ सेना में विद्रोह फैलाने का मामला


जब मेरे विरूद्ध दर्ज हुआ  सेना में विद्रोह फैलाने का मामला---5


स्वर्ण मंदिर पर सेना ने धावा बोलकर आतंकवादियों को मार दिया था। काफी को  गिरफ्तार कर लिया था।आपरेशन हो  चुका था। इसे लेकर देश के सिखों में बहुत गुस्सा था। शाम के समय बिजनौर पुलिस कंट्रोल से मेेसेज  आया कि कोडिया छावनी से एक ट्रक में नौ  सिख जवान भागे हैं। उस समय आज के 'स्वतंत्र आवाज पोर्टल' के संपादक दिनेश शर्मा  यहां उत्तर भारत टाइम्स में कार्यरत थे। उन्हें यह मैसेज हाथ  लगा। उन्होंने उत्तर भारत टाइम्स के लिए  खबर की। मैंने अमर उजाला में भेज दी।उत्तर भारत टाइम्स ,बिजनौर लोकल तक  सीमित था।  उसपर कुछ फर्क  नही पड़ा।  

उस समय बरेली का अमर उजाला बिजनौर आता था। यह खबर सुबह के अमर उजाला  अखबार में छप गई। इससे अगले दिन खबर छपी कि कोडिया छावनी के कमांडिग आफिसर  ने मेरे (अशोक मधुप) और अमर  उजाला के संपादक- प्रकाशक स्वामी के  विरुद्ध सेना में विद्रोह करने का मुकदमा दर्ज  करा दिया है। बरेली से आदरणीय अत़ुल जी का  अखबार की टैक्सी  से पत्र आ गया कि कृपया देख लें। क्या मामला है?

मै  और साथी  कुलदीप सिंह एडवोकेट कोटद्वार चले गए। वहां अमर उजाला के रिपोर्टर पी डी कुकशाल साहब मिले। बहुत घबराए हुए थे। बोले जल्दी भाग जाओ । कोडिया छावनी के कमांडिग आफिसर को आपका पता चल  गया तो  जाने आपके साथ क्या करे।

हम  उनके साथ चाय की दुकान पर बैठ गए। चाय पीते हुए बात होने लगी।उन्होंने बताया कि आपकी खबर पढ़कर लगभग 10 बजे मैंने  छावनी फोन किया ,कमांडिग अफसर   से बात की। वह गाली देकर बोला कहाॅ  है ?मैं तो सुबह से  तेरी तलाश में हूं। मैने कहा - मैं  11 बजे आपके पास आ रहा हूँ। जाने से पहले आफिस गया । पता चला कि सुबह से फौज की गाड़ियाॅ मुझे  खोजती घूम रही हैं।

उन्होंने बताया कि मै  11 बजे छावनी पहुंचा। कमांडिग आफिसर  मुझे गाली दे, सो दे। एक घंटे तक वह बिफरा रहा। एक घंटा होने पर मैंने कहा - साहब  पानी पिलवाओ। आप भी पानी पियो।  दोनों ने पानी  पिया। वह कुछ ठंडा हुआ तो मैंने कहा -वह अखबार दिखाओ जिसमें खबर है। उन्होंने अखबार दिया। मैने खबर पढ़कर उन्हें सुनाया। खबर में था कि बिजनौर से हमारे संवाददाता अशोक मधुप  ने खबर दी है कि कोडिया छावनी से एक ट्रक में सवार नौ  जवान बिजनौर साइड को भागे हैं। उन्हें रोका  जाए।

उन्होंने बताया कि खबर आराम से पढ़ने के बाद  उसका गुस्सा शांत हुआ। इससे पहले वह  मुझे  गाली दे  रहा था। खबर पढ़ने के बाद  उसने आपको खूब गलियाया।

कुकशाल साहब से  हमने ऐसा प्रदर्शित किया कि हम डर गए हैं। तुरंत बिजनौर जा रहे हैँ। उनसे अलग होकर हम थाने पहुॅच गए। आईओ से मिले। आईओ का नाम याद नहीं। पर बहुत ही बढ़‌िया  और अच्छा पुलिस अधिकारी था।  उसने हमें चाय पिलाई। कहा कि इनका जवान भागने का वायरलैस तो हमारे यहां भी रिकार्ड है। उनकी राय थी कि जवान भागे । इन्होंने उनके भागने का वायरलैस किया। किंतु  रास्ते की जानकारी न होने के कारण वे पकड़ लिए गए। इन्होंने बाद में मामला दबा लिया।

उन्होंने आश्वस्त किया कि एक सप्ताह में मामला खत्म हो जाएगा। आईओ तीन -चार दिन बाद कमांडिग  आफिसर  के पास गए।उनसे कहा कि वे बिजनौर अशोक मधुप के पास गए थे। उन्होंने बताया कि यहां पुलिस कंट्रोल को कोडिया छावनी से  वायरलैस आया था। वे मुझे  लेकर पुलिस कंट्रोल गए। यहां रिकार्ड में दर्ज  आपका वायरलैस मैसेज मुझे दिखवाया।

बताएं  अब  क्या करना है ? केस आगे बढ़ता है तो  आपके ‌ख‌िलाफ  जाएगा।  कमांडिग अधिकारी का अब तक गुस्सा शांत हो चुका था। उन्हें लगा कि मामला आगे बढ़ा तो उनके विरूद्ध जाएगा  । सो  कहा छोड़ो। मामला खत्म करो। और इस तरह मामला खत्म हो गया। एक सप्ताह भी नहीं लगा।


अशोक मधुप
     

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी 4

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी 4

जब देहरादून प्रशासन ने मुझ पर लगानी चाही एनएसए---

कौन? कब? , यहाँ पर काम आ जाता है, कुछ पता नहीं चलता। हम सोच भी नहीं सकते कि ऐसा भी हो सकता है। ऐसा मेरे साथ तो कईं बार हुआ। कवि मनोज अबोध मेरे छोटे भाई की तरह से हैं। उनकी पत्रकारिता में रुचि शुरू से ही रही है। उत्तर भारत टाइम्स में काम करने के दौरान उनकी ,पोस्ट आफिस में नौकरी लग गई। सरकारी नौकरी के बाद भी उनका मन पत्रकारिता में रमा रहा। अपना शौक पूरा करने के लिए मनोज ने 'मंथन फीचर' नाम से फीवर सर्विस शुरू की। संपादक अपनी पत्नी इंदु भारद्वाज को बनाया।उसने मुझ से एक लेख मांगा। उस समय उत्तरांचल आंदोलन जोरों पर था। समय की मांग देखते हुए मैने इस आंदोलन के समर्थन में एक लेख लिख दिया। मनोज ने उसे संपादित किया। समाचार पत्रों को भेज दिया। उसने भेजी प्रति मुझे दिखाई। मैंने देखा कि उसमें एक वाक्य गलत हो गया है । यह वाक्य पहाड़ के रहने वालों के लिए भारी आपत्ति जनक था।मैंने उसे गलती से अवगत कराया। मनोज ने जब तक संशोधन भेजा तब तक विश्व मानव सहारनपुर में लेख छप चुका था।

लेख छपने के बाद पहाड़ के रहने वालों में गुस्सा होना स्वभाविक था। सो अगले दिन अखबार लेकर गई विश्व मानव की टैक्सी और अखबार को देहरादून में जला दिया गया। मेरे और विश्वमानव के खिलाफ प्रदर्शन हुए। विश्वमानव सहारनपुर के संपादक और मेरी गिरफ्तारी की मांग को लेकर आंदोलन हुए। दोनों पर रासुका लगाने की मांग हुई।

मेरे खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की सूचना देहरादून अमर उजाला से मेरठ आयी। मेरठ में उस समय डेस्क पर मेरे छोटे भाई जैसे सुभाष गुप्ता कार्यरत थे। उन्होंने वह सूचना टैक्सी से मुझे भिजवा दी। चिंता होना स्वभाव‌िक था।उस समय एच के बलवारिया बिजनौर में एसपी थे। के के सिह डीएम ।

हमारी मित्र मंडली के एक साथी हैं। हुकम सिंह । पेशे से वकील हैं। कचहरी में बैठते हैं। मिलना कम होता है। पर होता रहता है। वे बलवारिया साहब के कैंप आफिस पर किसी काम से गए थे। बलवारिया साहब किसी काम में व्यस्त थे। स्टेनो ने उन्हें अपने पास बैठा लिया। इसी दौरान घंटी बजी। अर्दली ने स्टेनो से कहा साहब बुला रहे हैं। स्टेनो बलवारिया साहब के कक्ष में चले गए। हुकम सिंह ने स्टेनो की मेज पर नजर दौड़ाई तो स्टेनो की मेज पर डीएम देहरादून का ,बिजनौर के डीएम और एस पी के नाम वायरलैस मैसेज पड़ा दिखा। इस मैसेज में मुझे एनएसए में निरूद्ध् करने का अनुरोध किया गया था। हुकम सिंह धीरे से इस पत्र की नकल कर लाए। उन्होंने ये नकल हमारे पत्रकार साथी वीरेश बल को दी। वीरेश बल ने मुझे बताया ।मैं, वीरेश बल, शिव कुमार शर्मा राजेंद्र पाल सिंह कश्पय साहब के पास गए।

राजेंद्र पाल सिंह उस समय दैनिक उत्तर भारत टाइम्स के संपादक थे। बिजनौर मुख्यालय पर पीटीआई सहित कईं अंग्रेजी दैनिक के रिपोर्टर भी थे। एक तरह सेहमारे अभिभावक थे।उनसे बातचीत हुई। तय हुआ कि डीएम और एसपी से मिला जाए।हम लोग डीएम के के सिंह से मिले। मदद की बात की। केके सिंह प्रमोशन ने डीएम बने थे। देहरादून के डीएम सीधे आईएएस थे। के के सिंह ने साफ मनाकर दिया । कहा कि वहां के डीएम ने लिखकर भेजा है। मैं इसमें कुछ भी मदद नहीं कर सकता।

हम सब बलवारिया साहब से मिले। उनसे हम लोगों की उठ -बैठ ठीक थी। उन्होंने मेरे से कहा कि एनएसए लगना आपके लाभ में है। आप गिरफ्तार होते ही हीरो बन जाओगे। देश भर में प्रदर्शन होंगे। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री निवास तक शोर मचेगा। दो तीन दिन में छूट जाओगे,पर मैं आपको हीरो नहीं बनने दूंगा। मैंने डीएम और एसपी देहरादून से कह दिया है कि हमारे यहां अशोक मधुप की इमेज बहुत अच्छी है। उनके किसी समाचार लेख से यहां कभी कोई विवाद नहीं हुआ। आपके यहां हुआ है। आप एनएसए का वारंट बनाकर भेज दें। मैँ तामीज करा दूंगा। मेरे यहां कुछ नहीं है, इसलिए अपने यहां से वारंट नही बनाऊंगा। उन्होंने कहा कि मैने बता दिया है कि पत्रकार का मामला है, एक दिन बाद ही देश भर में हंगामा मचेगा। आप करोगे आप झेलोगे।

पत्नी निर्मल भी मानसिक रूप से तैयार हो गईं।उन्होंने मुझे समझाया जो होगा।देखा जाएगा।चिंता मत करो ।हम जॉब में हैं।परेशानी वहाँ होती है।जहाँ अन्य आय का स्रोत न हो। मैं भी मानसिक रूप से तैयार होगया।सोचा जेल में आराम से पढ़ा लिखा जाएगा।चिंतन होगा।

पर समय इसके लिए तैयार नहीं था।

एनएसए टल गई। पर पता लगा कि मेरे और संपादक विश्व मानव सहारनपुर के विरूद्ध 295ए में देहरादून में मुकदमा दर्ज है।समाज में साम्प्रदायिक भावना भड़काने का। विश्वमानव की ओर से भी उसकी टैक्सी में आग लगाने , नुकसान होने आदि का मुकदमा दर्ज कराया गया था ।देहरादून वाला मुकदमा भी सहारनपुर भेज दिया गया ।

सहारनपुर में सुंदर लाल मुयाल एडीएम होते ‌थे। पहले ये बिजनौर भी डीडीओ और एडीएम रह गए थे। वर्धमान कॉलेज के विज्ञान विभाग के प्रवक्ता ओ पी गुप्ता जी जनसत्ता के संवादादाता हैं। गुप्ता जी की अधिकारियों के साथ न‌िकटता जग जाहिर थी। सुंदर लाल मुुयाल जी से भी उनकी घनिष्ठता थी। मैँ और ओपी गुप्ता जी दोनों सहारनपुर गए। विश्वमानव पहुंचे तो वहां बढ़ापुर के साथी शराफत हुसैन मिले। उन्होंने अपने साहित्य संपादक से मिलवाया। साहित्य संपादक का नाम अब याद नहीं। उन्होंने कहा कि आपका लेख बिल्कुल सही था। उसमें कुछ गलत नहीं था। वे गढ़वाल का गजेटियर पेश कर सकते हैं।

खैर! कुछ देर वहां रुके। शराफत बाहर तक छोड़ने आए।यहां से हम मुयाल साहब के पास गए। उहोंने केस के आईओ को बुला रखा था। आईओ ने कहा कि क्रास केस है। खत्म करने के आदेश हैं। मुयाल साहब ने कहा कि आज ही खत्म कर के एफआर की प्रति शाम तक मुझे पहुंचा दें। एक दो-दिन बाद उन्होंने एफआर की प्रति हमें भिजवादी । इस तरह इस प्रकरण का समापन हुआ। बहुत तनाव रहा।पर सुभाष गुप्ता जी,हुक्म सिंह जी,वीरेश बल जी, ओपी गुप्ता जी सुन्दर लाल मुयाल जी इस प्रकरण को निपटाने में बहुत मददगार रहे।