Thursday, April 12, 2018

बहुत कुछ बदल गया ४८ साल में

४८ साल एक युग होता है। पर इतना भी नहीं जितना परिवर्तन हो गया। मैने आज से ४८ साल पहले हाई स्कूल परीक्षा पास की थी। उस समय जनपद में कुछ ही छात्र प्रथम श्रेणी पाते थे। अधिकतर को तृतीय श्रेणी मिलती। द्वितीय श्रेणी पाने वाला अपने को बहुत भाग्यशाली समझता। पूरे गांव में उसकी विद्वता के चर्चे होते। प्रदेश का रिजल्ट होता था लगभग ३०-३५ प्रतिशत। हॉल  प्रदेश का इंटर का रिजल्ट देखकर मैं चौंक गया। परीक्षा में ९२.२ प्रतिशत छात्र उत्तीर्ण हुए हैं। सर्वाधिक अंक पाने वाली छात्रा के ९७ प्रतिशत से ज्यादा है। मेरे पड़ौस में झालू में टेलर होते थे पीरजी । नाम क्या था, यह कोई नहीं जानता। सब उन्हें पीर जी कहते थे। उनका लड़का जहीर मेरे से सीनियर थे। इनकी हाई स्कूल में सेकेंड डिवीजन आई थी। वह कहते थे । सेकेंड डिवीजन लाना मामूली बात नहीं है।  साइन्स में तो   लोहे के चने चबाने पड़ते हैं। बहुत मेहनत करनी होती है, जब जाकर सेकेंड डिवीजन आती है। ४५ प्रतिशत अंक पर सेंकेड डिवीजन मिलती थी। मेरे पास विज्ञान विषय थे। मुझे ४५.५ प्रतिशत अंक आए थे। मात्र एक अंक ज्यादा मिलने पर मुझे सेकेंड डिवीजन मिली। वर्ना थर्ड ही रहती पर मुझे गर्व है कि मैने सेकेंड डिवीजन से हाई स्कूल पास किया । आज आश्चर्य होता है, जब उसी यूपी बोर्ड के छात्रों को ९५ प्रतिशत नंबर मिले देखता हूं ,जिस बोर्ड में सेकेंड डिवीजन से पास होना किसी समय एक जंग जीतना था | 

Thursday, April 5, 2018

स्वामी सच्चिदानंद

सैतालिस साल बीत गए स्वामी सच्चिदानंद को शहीद हुए। आज भी मैं वह दृष्य नहीं भूला। आश्रम में उनके और उनके साथी के शव पड़े थे । मैँ उन्हें देखने गया था।उस समय मैं बीए में पढ़ता था।
मेर घर की दूरी खारी से दो किलो मीटर है। सूचना मिली कि गोविंदपुर आश्रम में स्वामी जी का कत्ल हो गया। रात में बदमाशों ने उनकी और उनके एक साथी की गोली मार कर हत्या कर दी।
स्वामी जी की बहुत प्रसिद्घी थी। क्षेत्र में बहुत सम्मान था। उनकी हत्या की सुन धक्का सा लगा। समझ में नहीं आया कि उनकी हत्या क्यों हुई। इतने अच्छे आदमी का भी कोई दुश्मन हो सकता है।हम साइकिल से भाग कर आश्रम पंहुचे। आश्रम में कुछ दूरी पर दो शव पड़े थे। एक स्वामी जी का और एक उनके साथी किसी रेड़डी का। लोग बता रहे थे कि स्वामी जी बहुत बहादुर थे। बदमाश स्वामी जी को मारना चाहते थे। किंतु जिस कमरे को उन्होंने खुलवाया ,उसमें उनके मित्र रेड़डी रूके हुए थे। उन्होंने रेड्डी को स्वामी जी समय गोलीमार दी। गोली की आवाज सुन स्वामी जी अपने कक्ष से बाहर आए। जार से कहां कौन है? क्या हो रहा है। मारने वालों ने देखा कि यह तो वही स्वामी जी हैं ,जिन्हें मारना था। उन्होंने स्वामी जी पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाकर स्वामी जी की हत्या कर दी। अगर स्वामी जी कक्ष से न निकलते , छिप जाते , भाग जाते तो वह बच सकते थे।किंतु वे बहादुर और निर्भीक थे। उन्होंने ऐसा नहीं ‌ क‌िया।
बीए में मैँ वर्धमान कॉलेज में पढता था। डा एसआर त्यागी कॉलेज के प्राचार्य थे। स्वामी जी का उनके पास आना जाना था। स्वामी जी का वाहन साइकिल था। वे नंगे पांव रहते। कमर पर घुटनों तक एक चादर बांधते। गले मे उनके एक सफेद चादर पड़ी रहती। ये उनका पहनावा और उनकी पहचान थी। वहुत बार उन्हें आते जाते देखते। ब्रह्मचर्य का तेज उनके चेहरे से छलकता था।
मैने 66 में हाई स्कूल किया। इंटर में प्रवेश लिया था। पिता जी चकबंदी में नौकरी करते थे। जनपद में चकबंदी का कार्य पूरा होने पर उसे जोनपुर भेज दिया गया। विभाग के सारे स्टाफ का भी जोनपुर को तबादला कर दिया गया। पिता जी को दादा जी ने जोनपुर नहीं जाने दिया। पिता जी ने नौकरी छोड़ दी। दादा जी हकीम थे।कोई ज्यादा आय नहीं थी।धनाभाग के कारण मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
झालू के पशु चिक‌ित्सालय पर श्याम बाबू सक्सैना वेटनरी स्टॉक मैन पद पर तैनात थे। उनके पास मेरी बैठ उठ थी। अधिकतर समय उनके साथ बीतता। स्वमी जी के आश्रम का कोई पशु बीमार हो जाता। वह उन्हें बलवा भेजते। मैँ भी उनके साथ जाता। आश्रम में दूध से हमारा स्वागत होता।चलते समय श्याम बाबू को दस और मुझे दो रुपये देना स्वामी जी कभी नहीं भूलते। मेरे मना करने पर भी दो का नोट जेब में डाल देते।
पिछले आठ दस साल में कई बार आश्रम में जाना हुआ। स्वामी जी की एक तस्वीर जरूर नजर आई। अब तो बहुत कुछ बदल गया।
अशोक मधुप
5 अप्रेल 2018

Sunday, March 4, 2018

देवी पूजा

१८ अप्रैल 1912
देवी पूजा
आज अष्ठमी है
नवरात्र की अष्ठमी।
भारत से बहुत दूर
अमेरिका में भी बसे
भारतीय हिंदू परिवार
भी मां को मानतें हैं,
नवरात्र में मां का
पूजन करते हैं।

नवरात्र शुरू होते ही
कुछ घरों में जोत जलाई जाती है।
कुछ भारतीय उपवास भी रखते हैं।
कुछ सप्तमी तक सात
या कुछ अष्ठमी तक आठ
व्रत रखतें हैं।
कुछ नवरात्र के प्रथम दिन
उपवास रखते है तो कुछ अंतिम दिन।
कुछ प्रथम और अंतिम दोनों दिन
रखतें हैं व्रत ।
सप्तमी तक उपवास करने वाले, 
अष्ठमी में अष्ठमी तक के उपवास
रखने वाले नवमी में देवी पूजते हैं।
कन्या जिमाते हैं।
जो उपवास नहीं रख पाते,
वो भी कन्याओं को जिमाने 
की रस्म करते हैं।
भोजन ,हलवा बनाते और
कन्याओं के घर में 
दक्षिणा सहित दे आते ।
कुछ दक्षिणा की जगह
 कन्याओं को दे आते है उपहार।
दो माह पूर्व हमारे परिवार में भी
आई है एक कन्या,
सुंदर सी बालिका।
खिलौना सी लाडली।
शिल्पी ने पूजन के बाद
उसका भी तिलक किया है।
शिल्पी की कई सहेली
पूजन कर अद्वीति के लिएं लाई उपहार,
दे गईं मिठाई और कुछ डालर।  
भारत में साल में  १८ दिन
पूजी जाती है बालिकाएं,
जिमाई जाती है, कन्याएं।
और फिर उसके बाद
पूरे साल परीक्षण कराकर
की जाती है उनकी हत्या, भ्रूण हत्या।
कहीं सम्मान के नाम पर
दे दीजाती है उनकी बलि।
या अमेरिका में तो ऐसा नहीं होता।
कन्या की भी लड़के की तरह दुलारते हैं।
बेटे की भांति बेटी को पालते हैं। 
बेटा हो या बेटी बच्चे के जन्मते ही,
जान पहचान वाले पहुंचने लगते है अस्पताल।
कोई न्यू बेबी लिखा बेलून लिए आता है,
तो कोई बेलकम न्यू बेबी 
लिखकर गिफ्ट लाता है।
अस्पताल के बेबी और मां के कक्ष में 
मनता है समारोह,
रहता है  जश्न का माहौल ।
अस्पताल से बेटी और मां के
घर आने के समय,
सजाया जाता है उनका कक्ष,
लगाई जाती है, बंदरबार।
कमरे में रंगे नोटिस बोर्ड पर
परिचित बेबी के लिए लिखते हैं
आशीर्वाद के संदेश।
  परिचित लड़कों की तरह 
लडकियों के लिए भी 
करते है दीर्घायु की कामना।
ऐसा तो भारत  में बेटे के लिए भी नहीं होता।
यहां अपार्टमेंट के गेट पर
कई मित्रों की पत्नियां घर आने पर
 तिलक कर बच्चे और मां की
आरती उतारती हैं,
मिठाई खिलाती हैं।
हमारे परिवार की नई
सदस्या अद्विती
दो माह की हो गई है।
इस समय हमारे कमरे में सो रही है
सोत सोते कभी हंसती है, कभी रोती रहती है।
लगता है कि वह सपनों में
खोई रहती है।
अच्छे सपने हंसाते है,
तो बुरे डराते हैं।
किंतु जरा सी 
आवाज या धमक
पर चौंक कर उठ जाती है,
लगता है कि बच्ची
समझती है, जानती है
नारी का भविष्य
इसी लिए डर जाती है,
वह भारत में नहीं जन्मी
वहां के बारे में कुछ 
जानती भी नहीं।
किंतु मां बाप और पूरा
परिवार तो भारतीय है,
कुछ चीजें संस्कारों से भी आती हैं।
बिना जाने बिन सीखें,
बहुत कुछ सिखा जाती हैं।
उसके  कदम की धमक
से  भी चौंकने,
बार -बार सपनों में
डरकर चीखने,
से मुझ लगता है कि
 भारत में 
कन्या और युवती पर हो रहे अत्याचार 
जुल्म उसे सोने नहीं देते।
डरावने सपने उसे
गहरी नींद में खोने नहीं देते।
पर मैं देखता हूं कि भारत मेंं
नहीं ,पूरी दुनिया में युवती के प्रति
समाज का व्यवहार एक सा है।
उन्हें ढंग से जीने नहीं देते।
हर जगह खूनी और मर्मभेदी
नजरों के वाण जगह -जगह डसते हैं।
बस्ती और गली कूचों में नहीं
कई बार घर में ही 
जहरीले सांप बसते हैं।
अशोक मधुप

वही पार्क है

   वही पार्क है,
पुराना पार्क।
जहाँ हम तुम मिला करते थे।
एक दूसरे को निहारते
घंटो बैठे रहते थे मौन।
खामोश।
कभी कुछ कहने की
 जरूरत ही नहीं पड़ी।
क्योंकि आजतक वे
शब्द ही नही बन सके,
जो मन की बात कह पाते।
जो मनका हाल 
जवां पर ले आते।
जो ह्रदय के भाव
बयां कर सकते।
ऐसे में बस  प्रभावी
होता है मौन।
बिना कहे,बिना बोले
एक दूसरे की बात
समझ लेता मन।
जान लेता भाव।
एक दूसरे को निहारते
कभीं तुम हंस देतीं
कभी मैं मुस्करा देता।
कर बार मेँ हंसता,
तुम मुस्करातीं।
लगातार ऐसे ही चलता रहता
बातों का सिलसिला।
आज बहुत दिन बाद,
बहुत साल  बाद
लगभग 5 दशक के
अंतराल के बाद
यहाँ आया हूँ।
पार्क वही है पुराना
जाना पहचाना।
इसके चप्पे चप्पे को
पहचानता हूँ मै।
वह पेड़ आज भी वहीं है
जिसपर तुमने अपना नाम
लिखकर दिल का निशान
बनवाकर मेरे से  दिलके 
आरपार बनवाया था
 तीर का निशान।
उसके बाद लिखवाया था
मुझसे मेरा नाम।
कहा था इस पेड़ के रहते
 ये नहीं मिटेगी,
तुम्हारे मेरे प्रेम की निशानी।
हम साथ रहें या ना रहें
जब भी यहाँ आएंगे।
इसे देखकर आ जाएगी,
एक दूसरे की याद।
मैं उसी पेड़ में नीचे खड़ा
निहार रहा हूँ उस लिखे को।
महसूस कर रहा हूँ तुम्हारी लिखावट।
महसूस कर रहा हूँ
 तुम्हारी सासों की सुगंध।
तुम्हारे शरीर को मादकता।
तुम्हारी हंसी की 
खिलखिलाहट।
सब कुछ
5 दशक के
अंतराल के बाद भी।
धीरे से तुम्हारे नाम
और तुम्हारे द्वारा बनाए
दिल के निशांन पर
उंगलियां घुमाता हैं।
महसूस करता हूँ तुम्हारा 
स्पर्श। तुम्हारी छूअन।
लगता है कि इतने 
अंतराल के बाद भी,
इसमें बसा है तुम्हारा रोम रोम।
एक जोड़े को पास से 
निकलते देख,
वहाँ से हटकर 
आ जाता हूँ
उस झाड़ी के पास,
जिनके नीचे घासपर
जहां तुम ओर मैं
आमने सामने बैठे 
रहते थे।
एक दूसरे को 
देखते रहते थे।
निहारते रहते थे।
कटिंग के बाद भी यह
 झाड़ी अब काफी बड़ी ही गई।
पर उस जगह पर हरी दूब
आज भी कालीन सी बिछी हुई है।
बनाया हुआ है
हरा मखमली बिछोना।
लगता है कि हमारे बाद
यहाँ आकर कोई नही बैठा।
शायद यह दूब 
इतने साल बाद भी
कर रही है
तुम्हारे मेरे आकर
आमने सामने बैठने का इंतजार।
उसे शायद ये पता नहीं
कि यहाँ आकर 
बैठने वाला जोड़ा
अब कभी लौटकर नहीं आ आएगा।
मन भारी होने लगता है
इस जगह को देखकर।
ये यहाँ से हट कर
पूरे पार्क का चक्कर  लगता हूँ।
पार्क में चांदनी का वह 
पेड़ अब भी है
जिसके सफेद फूलों के 
कालीन पर हम बहुत बहुत देर 
बैठे रहते थे।
हरसिंगार का वह पेड़
अब भी वहीँ है,
जिसके नीचे हम बहुत देर 
खड़े रहते थे।
जिसके सफेद पीले फूल 
हमपर झरते रहते थे।
कई बार मैं जोर से हारसिंगार को हिलाता।
वह भी प्रसन्न हो अपने फूलों
की कर देता
हम पर बारिश।
पार्क बहुत बदल गया
लग गए फव्वारे
रंग बिरंगी लाइट।
सैकड़ों तरह के फूलों के
पौधे।
पर चांदनी ,हारसिंगार 
के पेड़ वहीं हैं।
हमारी बैठने की जगह
की झाड़ियां भी वहीं है।
किन्तु ये सब बूढ़े हो गए
मेरी तरह।
तुम कालेज के समय
जो बिछड़ी तो
फिर नही मिलीं।
शायद तुम भी तो
जो गइं होंगी बूढ़ी
झाड़ी ,इन दोनों दरख़्त
ओर मेरी तरह।
तुम्हारे चेहरे पर भी
उभर आईं होंगी झुर्रियां।
आखों पर लग गया होगा
चश्मा।
 बालो में उतर आई होगी 
चांदनी।
वास्तव में बहुत कुछ
 बदल गया ।
वक्त भी,चांदनी ओर हारसिंगार का पेड़
 तुम भी
ओर मैं खुद भी।
अशोक मधुप

एक अंगडाई लो सुस्ती त्यागो मित्र जागो


 एक अंगडाई लो सुस्ती त्यागो
मित्र जागो

तुम उदास हो, रो रही हो,
तुमने पति खोया है।
वक्त ने तुम्हारे जीवन में विष बीज बोया है।
जीवन पथ पर तुम्हें सहारा देने वाले,
अब वो मजबूत हाथ  नहीं रहे ।
45 साल साथ साथ  चलने वाले 
अब वह तुम्हारे साथ नहीं रहे।
अब तुम अकेली हो, परेशान हो,
उनको याद कर अपना 
आपा खो देती हो,
बात बात पर जब -तब रो देती हो,
तुम्हारी पीड़ा को वही जान सकता है,
जिसका जीवन संबल गया हो,
सहारा  खोया हो,
होठों की  मुस्कान गई हो,
मांग का  ‌सिंदूर छिना हो,
जीवन का हीरों गया हो,
जो जार जार रोया हो,
जिसने जीवन  का संबल खोया हो ।
एक बात बताओ,
क्या ऐसा पृथ्ची पर पहली बार हुआ है,
क्या इससे  पहले लोगों ने जीवन साथी
अपने ‌प्र‌िय को नहीं गवांया।
क्या यह दुख तुम पर ही पहली बार आया ।
तुम पर यह दुख आया, 
तुम रो रही हो,
उदास हो, जीवन से निराश हो।
किंतु यहां तो कोई भी अमर नहीं है,
जो आया है, उसे जाना है,
जाकर फिर नए रूप में   आना है।
ये  जीवन चक्र है, चलता ही रहेगा,
जो पृथ्वी पर आया,  वह किसी न किसी 
प्र‌िय की मृत्यु
का दुख, दर्द  जरूर सहेगा ।
किसी का भाई, जाएगा तो किसी का बेटा,
किसी की पत्नी विदा होगी तो किसी का प्रेमी।
और फिर  किसी -किसी के यहां 
बेटा आएगा तो किसी का भाई।
कहीं रोना होगा तो कहीं  गाना्, 
कहीं मातम ‌होंगे  तो कही खुशी।
यही तो है  जीवन चक्र  ,
समय का पहिंया।
आज वह गए हैं, कल कोई और जाएगा,
किसी न किसी द‌िन तुम्हारा 
और हमारा नंबर भी आएगा।
सबके नंबर लगे हैं,
डेट फिक्स है,
किसी की फोर है,
तो किसी की सिक्स है।
यह कर्म भूमि है,
जिसका जबतक कर्म बकाया है,
तब तक हर हाल में रहना है।
जीते जी नई खुशी पर आनन्द  मनाना है,
   ‌हर प्रिय के जाने का दुख उठाना है।
रावण बध के बाद राम को राज नहीं करना था,
कार्य समाप्ति पर वापिस जाना था,
महा भारत का कार्य  निपटाकर 
कृष्ण को भी प्राण गवांना था।
यहां सब कुछ एक क्रम में बंधा है, नियति नि‌श्च‌ित है,
काम समय निर्धारित हैं।
क्रम तै हैँ।
समय चक्र जारी है,
हां पति के निधन की पीड़ा 
तुम पर जरूर भारी है।
पर जीवन चक्र चलता रहता है,
किसी के खो जाने से नहीं रूकता।
कोई  भी पूर्ण  जीवन साथ नहीं चलता।
ये ट्रेन का सफर हो।
कोई कुछ देर  बाद 
अपनी यात्रा पूरी कर ट्रेन से उतर जाता है।
कोई   गंतव्य तक हमारे साथ जाता है।
पूरे समय कोई  साथ नहीं देता,
कोई हर वक्त ,हर पल साथ नहीं रहता।
अंधेरे में हमारी छाया भी 
हमारा साथ छोड़ देती है।
जीवन पथ में रोज साथी मिलते हैं,
रोज मौत  उन्हें हर लेती है।
 जो हुआ,उसे बिसराओ,
आओ कुछ नया करने
नए मित्र  बनाओ।
यहां जो तुम्हारा कार्य 
शेष है, उसे पहचानो।
 जीवन जीने के लिए
नए  संकल्प ठानो।
दुखद स्वपन भूलो,
मित्र समझो, जग जाओ,
तुम्हें अपने परिवार 
मित्रों के  लिए जीना है,
जीवन में पान करने को 
जाने अभी कितना विष शेष है,
जाने कितना  और 
हलाहल पीना है।
अपने शेष कार्य करने पर लग जाओ,
मित्र,
 जग जाओ।
एक अंगडाई लो सुस्ती त्यागो,
नया कार्य करने को
 पूरी ताकत से लग जाओ |
अशोक मधुप
बिजनोर 246701
  

होली

मदनोत्सव गया,
 रंगोंत्सव बीता,
 मानव वहीं खड़ा है।
 हर उत्सव से भी,
 जीवन संघर्ष बड़ा है।
 एक साल बाद फिर लौटेगा
 ये ही होली का पर्व,
 नए रंग,
नई पिचकारी,
 नया उल्लास,
 नया जोश लेकर।
 फिर वही हुल्लड़ होगा,
 वही उल्लास,
 वही मस्ती।
 नही होगा तो
वह पूरा एक साल
 जो बीत जाएगा।
 वो दिन जो
खत्म हो गए होंगे।
 वो सांसे जो चली गईं होंगी ।
 अशोक मधुप

Sunday, July 30, 2017

बिजनौर है जाहरवीर की ननसाल

बिजनौर है जाहरवीर की ननसाल

बिजनौर है जाहरवीर की ननसाल
हर साल लगता है रेहड़ ,गंज सहित कई जगह जाहरदीवान का मेला
लाखों श्रद्धालु जाहरवीर म्हाढ़ी पर चढ़ाते हैं निशान, प्रसाद
हिंदू व मुस्लिम दोनों संप्रदाय के लोग में माने जाते हैं जाहरवीर(जाहरपीर)

अशोक मधुप
बिजनौर]देश भर में गोगा जाहरवीर उर्फ जाहरपीर के करोड़ों भक्त हैं। सावन में हरियाली तीज से भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की नवमी तक देश भर में गोगा जाहरवीर उर्फ जाहरपीर इनकी म्हाढी पर श्रद्धालु आकर निशान चढ़ाते और पूजन अर्चन करते हैं। गोगा हिंदुओं में जाहरवीर है तो मुस्लिमों में जाहरपीर । दोनों संप्रदाय में इनकी बड़ी मान्यता है। यह बात कम ही लोग जानते हैं कि राजस्थान में जन्मे गोगा उर्फ जाहरवीर की ननसाल बिजनौर जनपद के रेहड़ गांव में है। इनकी मां बाछल जनपद में जहां जहां गई, वहां वहां आज मेले लगते हैं। जाहरवीर के नाना का नाम राजा कोरापाल सिंह था। गर्भावस्था में काफी समय गोगा जाहरवीर की मां बाछल अपने पिता के घर रेहड़ में रहीं।
रेहड़ के राजा कुंवरपाल की बिटिया बाछल और कांछल का विवाह राजस्थान के चुरू जिले के ददरेजा गांव में राजा जेवर सिंह व उनके भाई राजकुमार नेबर सिंह से हुआ। जाहरवीर के इतिहास के जानकारों के अनुसार जाहरवीर की मां बाछल ने पुत्र प्राप्ति के लिए गुरू गोरखनाथ की लंबे समय तक पूजा की। गोरखनाथ ने उन्हेें झोली से गूगल नामक औषधि निकालकर दी । कहा कि जिन्हें बच्चा न होता हो उन्हें यह औषधि खिला देना। रानी बाछल से थोड़ा-थोड़ा गूगल अपनी पंडितानी, बांदी और अपनी घोड़ी को देकर बचा काफी भाग खुद खा लिया। उनके द्वारा आशीर्वाद स्वरूप दी गुगल नामकी औषधि के खाने से जन्मे बच्चे का नाम गूगल से गोगा हो गया। वैसे रानी ने अपने बेटे का नाम जाहरवीर रखा। पंडितानी ने अपने बेटे का नाम नरसिंह पांडे और बांदी के बेटे का नाम भज्जू कोतवाल पड़ा। घोड़ी के नीले रंग का बछेड़ा हुआ। गोगा की मौसी के भी गुरू गोरखनाथ के आशीर्वाद से दो बच्चे हुए। ये सब साथ साथ खेलकर बड़े हुए। बाछल ने जाहरवीर को वंश परपंरा के अनुसार शस्त्र कला सिखाई और विद्वान बनाया। जाहरवीर नीले घोड़े पर चढ़कर निकलता और सबके साथ मिल जुलकर रहता। गुरू गोरखनाथ के ददरेजा आने पर जाहरवीर ने गुरू की सेवा की और फिर उन्हीं के साथ उनकी जमात में निकल गए। गुरू के साथ वह काबुल, गजनी, इरान, अफगानिस्तान आदि देशों में घूमे। उनके उपदेश हिंदू मुस्लिम एकता पर आधारित होते थे। भाषा के कारण वे मुस्लिमों में जाहरपीर हो गए। जाहरपीर का नीला घोड़ा और हाथ का निशान उनकी पहचान बन गए।
मां बाछल द्वारा किसी बात पर इन्हें घर न आने की शपथ दी गई थी, किंतु ये पत्नी से मिलने छिपकर महल आते। श्रावण मास की हरियाली तीज के अवसर पर मां के द्वारा देख लिए जाने और पीछा किए जाने पर हनुमानगढ़ के निर्जन स्थान में अपने घोड़े समेत जमीन में समा गए। उस दिन भाद्रपद के कृष्णपक्ष की नवमी थी ।तभी से देश के कोने कोने से आज तक प्रति वर्ष लाखों श्रृद्धालु राजस्थान के ददरेवा में स्थित जाहरवीर के महल एवं गोगामेढ़ी नामक स्थान पर उनकी म्हाढ़ी पर प्रसाद चढ़ाकर मन्नतें मांगते है। देश भर में जहां जहां जाहरवीर गए। वहां उनकी म्हाढ़ी बन गई। इन स्थान पर प्रत्येक वर्ष हरयाली तीज से शुरू होकर भाद्रपद के कृष्णपक्ष की नवमी तक जाहरवीर के विशाल मेले लगते हैं।
मान्यता है कि गर्भावस्था में रेहड़ में राजा कोरापाल के महल में जहॉ पर मां बाछल रही थी, वहॉ पर महल के नष्ट हो जाने के बाद जाहरवीर गोगा जी की म्हाढ़ी बना दी गई। यहॉ प्रत्येक वर्ष भाद्रपद की नवमी को हजारों श्रृद्धालु प्रसाद चढ़ाकर अपना सुखी वैवाहिक जीवन शुरू करते है। बिजनौर के पास गंज, फीना और गुहावर में भी इस अवधि में मेले लगते हैं। किंवदंति है कि जिस दंपति को संतान सुख नहीं मिलता उन्हें जाहरवीर गोगा जी की म्हाढ़ी पर सच्चे मन से मुराद मांगने पर संतान सुख अवश्य प्राप्त होता है।यह भी कहा जाता है कि गोगा पीर ने गर्भ में रहने के दौरान मां बाछल से कहा कि वह गंज में जाकर जात दे। बाछल ने यहां आकर जात दी।ये भी मान्यता है कि म्हाढ़‌ी पर आकर प्रसाद चढ़ाने से सांप नहीं काटता। घर में सांप का वास नहीं होता।एक मुगल राजा की महारानी को सांप के काटने के बाद यहां की म्हाढ़ी पर लाया गया था।
गंज के मेले की विशेषता है कि श्रृद्घालु आकर पहले गंगा स्नान करते हैैं। उसके बाद म्हाढ़ी पर प्रसाद या झंडी चढ़ाते हैं।यहां प्रसाद चढ़ाकर लगभग पांच किलो मीटर दूर नौलखा जातें हैं। नौलखा एक पुराना किला है। इसमें सैयद शुजात अली के मजार पर प्रसाद और झाड़ू चढ़ाते हैं। यहां मुर्गा भी चढ़ाया जाता है।काफी श्रद्घालु मजार पर पहले प्रसाद चढ़ाते बाद में म्हाढ़ी पर आते हैँ।
यह भी मान्यता है कि इस मौसम में सांप का प्रकोप ज्यादा होता है। इसलिए सांप के काटने के बचाव के इरादे से भी भक्त इनकी माढ़ी पर प्रसाद चढ़ाने आते हैं। जात देने वाले बच्चे या व्यक्ति को मोटे खादी के पीले कपड़े पहनाए जाते हैं। जात देने वाले के हाथ में जाहरदीवान का झंड़ा होता है और गर्मी से उसे राहत देने के लिए परिवार के सदस्य पंखों से हवा करते चलते हैं।
मजार पर प्रसाद चढ़ाने के बारे में लगभग 85 वर्षीय जहानाबाद निवासी रिटायर अध्यापक मोहम्मद अब्दुल वासे ने बताया पुराने बुजुर्ग बताते थे कि बाबा गोरखनाथ ने पहली धूनी यहीं लगाई थी और जाहर दीवान का पहला पड़ाव भी यहीं स्थान था l मुगल शासक की बेगम को सर्प ने डस लिया था । इसका उपचार बाबा जाहर दीवान ने किया था ।इससे खुश होकर मुगल शासक ने यह रियासत बाबा जाहर दीवान को उपहार में दे दी थी ।यही वजह है कि आज भी लोग नौलखा बाग या किला पर प्रसाद चढ़ाने आते हैं।
गंज निवासी राजेश्वर प्रसाद कौशिक 85 वर्ष ने बताया कि जहारवीर गोगा की यात्रा का प्रथम पड़ाव जहानाबाद स्थित नौलखा बाग में होने के कारण श्रद्धालु नौलखा बाग में भी प्रसाद चढ़ाकर मन्नत मांगते हैं।गंज निवासी लगभग 82 वर्षीय पूर्व फौजी सत्यपाल पाराशर भी यहीं बतातें हैं। उनके पूर्वज इस बात को बताते हैं कि मुगल बादशाह शाहजहां की पत्नी को सर्प ने डस लिया था l वही मुगल शासक के सैनिकों ने बताया कि एक साधु स्वभाव का महाराज( वर्तमान में जहानाबाद) गंगा किनारे अपनी यात्रा के दौरान विश्राम किए हुए हैं । यहां रानी को लाया गया ।रानी का इलाज कर उनके प्राणों की रक्षा कीl इससे खुश होकर राजा ने पूरी रियासत उपहार स्वरूप बाबा जाहर दीवान को दे दी थी l इसीलिए लोग नौलखा पर प्रसाद चढ़ाते हैं इस मेले में जात-पात को भूलकर हिंदू-मुस्लिम दोनों लोग प्रसाद चढ़ाते हैं।
झंडे के साथ पीले वस्त्र पहनकर पंखे से हवा करते हुए चलते हैं भक्त
गंज की म्हाढ़ी के पुजारी श्रवण कुमार उपाध्याय का कहना है कि वे पूर्वजों से सुनते आ रहे हैं। गोगा पीर ने गर्भ में रहने के दौरान मां बाछल से कहा कि वह गंज में जाकर जात दे। बाछल ने यहां आकर जात दी। तब से यहां मेला लगता है। यहां दिल्ली राजस्थान ,उत्तरांचल पूरब आ‌दि से बड़ी संख्या में श्रद्घालु आते हैं।यहां आकर परिवार बच्चे की कामना के लिए प्रसाद तो चढ़ाते ही हैं। बच्चा होने पर वे उसकी जात देने आतें हैं। जात देने वाले बच्चे या बड़े घर पर पूजा अर्चन कर पीले या सफेद कपड़े पहन कर चलता है। परिवार भी प्रायःऐसे ही कपड़े पहनता है। इन कपड़ों पर हल्दी से हाथों के पंजे की छाप लाई जाती है। जात देने वाले के हाथ में लाल रंग के कपड़े लगी झंडी होती है। दूसरे हाथ में हवा करने वाला पंखा होता है। पंखा प्रायः परिवार के सभी सदस्य लिए होते हैं।ये पंखे से एक दूसरे को , रास्ते में मिलने वालों को हवा करते चलतें ‌ हैं। पंखे से हवा करना सेवा भाव में आता है। यहां माढ़ी पर आकर झंडी के कपड़ में प्रसाद और श्रद्घा के अनुसार रकम बांध कर चढ़ाते हैं। इस झंडी के साथ दी पंखा भी यहीं चढ़ा दिया जाता है। मजार पर चढ़ती है झाडू मुर्गा और प्रसाद
मजार के फकीर नूर शाह का कहना है कि मजार पर झाडू, प्रसाद चढाया जाता है। कुछ मुर्गा भी चढ़ातें हैँ। मान्यता है कि मजार पर झाड़ू चढ़ाने से शरीर पर यदि कहीं मस्सा हो तो मजार की धूल लगाने से वह मस्सा रात में ही गायब हो जाता है। पिछली पांच पीढ़ियों से नौलक्खा मजार का चढ़ावा हम लोग ही लेते हैं l साफ-सफाई और पुताई हम ही करते हैं।
90 वर्षीय गंज निवासी विमल शरण अग्रवाल जी का कहना है कि जब से मैंने होश संभाला है तब से ही इस मेले का आयोजन होते देख रहा हूं ।वही दूर दराज से आए श्रद्धालु अपनी मन्नत को पूरा होने पर पीले वस्त्र पहनकर नंगे पांव आते हैं l
लगभग 94 वर्षीय गंज निवासी सत्येंद्र शरण ने बताया कि आज से 70 वर्ष पूर्व तक यातायात का साधन न होने से श्रद्धालुगण पैदल वह बैलगाड़ी से मेले में प्रसाद चढ़ाने आते थे l हाथ में पंखे लिए लोगों की सेवा करते हुए इस मेले में आते l इस मेले की सबसे बड़ी खूबी है कि बिना जाती भाव के सभी धर्मों के लोग श्रद्धा पूर्वक प्रसाद चढ़ाते हैं । पहले 12 महीने गंगा घाट पर ही गंगा बहती थी l श्रद्धालु स्नान करके प्रसाद चढ़ाते थे l अब स्नान को दो किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।

अशोक मधुप

29 july 2017   में प्रकाशित  मेरा लेख