Friday, September 18, 2026

भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत है ब्रिक्स का साझा प्रस्ताव

  

 

 


अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

 बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण और विकासशील देशों की एकजुटता के इतिहास में एक अत्यंत मील का पत्थर सिद्ध हुआ है। इस सम्मेलन ने न केवल ब्रिक्स (ब्राजीलरूसभारतचीन और दक्षिण अफ्रीका) के आर्थिक एवं राजनीतिक महत्व को रेखांकित कियाबल्कि यह स्पष्ट संदेश भी दिया कि वैश्विक शासन व्यवस्था में अब 'ग्लोबल साउथकी आवाज को लंबे समय तक अनसुना नहीं किया जा सकता। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित पश्चिमी प्रभुत्व वाली वित्तीय और कूटनीतिक प्रणालियोंविशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं की एकाधिकारवादी नीतियों के उत्तर में दिल्ली सम्मेलन एक सशक्त प्रतिमान बनकर उभरा। भारत की मेजबानी में आयोजित ब्रिक्स (बीरिक्सशिखर सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच मतभेदों के बावजूद भारत ने एक साझा 'सर्वसम्मतिबनाने में सफलता हासिल की।  यह भारत की बड़ी  कूटनीतिक सफलता है कि तमाम भू-राजनीतिक  मतभेदों के बावजूद भारत सभी सदस्य देशों को 45 से अधिक पेजों वाले सर्वसम्मति 'नई दिल्ली घोषणापत्रपर सहमत करने में सफल रहा। इसमें आतंकवाद के सभी रूपों की कड़े शब्दों में निंदा की गई और आतंकवाद के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंसतथा उसकी फंडिंग रोकने का साझा संकल्प लिया गया। इससे पहले के सम्मेलन में संयुक्त घोषणा पत्र  जारी कराना एक कठिन काम था।

ब्रिक्स के सदस्य देशों के अपने-अपने रणनीतिक हितक्षेत्रीय प्राथमिकताएं और विदेश नीति संबंधी विचार  हैं। पश्चिम एशिया के मसले       पर यह विविधता और भी  साफ दिखाई देती है।  ईरान स्वयं संघर्ष में एक प्रमुख पक्ष है। उसके सऊदी अरब और यूएई के साथ सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर मतभेद हैं।  साझा बयान में न तो अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों का और न ही इसके बाद ईरान द्वारा फारस की खाड़ी के अपने पड़ोसी देशों पर किए गए हमलों का सीधे तौर पर जिक्र किया गया।  इसमें युद्ध के दौरान 'अधिकतम संयमबरतने की अपील की गई। इस साझा बयान में भारत ने यह दिखाया   कि कठिन भू-राजनीतिक परिस्थितियों में असहमतियों को अलग रखकर भी संवाद के रास्ते खुले रखे जा सकते हैं। ये साझा घोषणापत्र युद्ध खत्म नहीं करा फिर भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सहमति की दिशा में उठा हर कदम महत्व रखता है।

प्रस्ताव में  सदस्य देशों के बीच व्यापार में आने वाली शीर्ष 10 बड़ी रुकावटों को चिन्हित कर हटाने का लक्ष्य  रखा गया। हर साल 100 नए अंतरराष्ट्रीय स्टार्टअप्स का एक-दूसरे के बाजारों में विस्तार और कंपनियों के बीच 1,000 नई साझेदारियाँ बनाने की योजना और  शहरीकरण की चुनौतियों से निपटने और जलवायु-अनुकूल इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर सहमति बनी। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता घटानेस्थानीय मुद्राओं में सीमा-पार भुगतान को बढ़ावा देने तथा 'न्यू डेवलपमेंट बैंकके विस्तार पर प्रगति हुई। इस सम्मेलन में भारत के सफल 'डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर' (यूपीआईआधार मॉडल आदि) को ब्रिक्स देशों के साथ साझा करने पर मुहर लगी। इसके अलावाआर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआईको सुरक्षितपारदर्शी और ग्लोबल साउथ के हितों के अनुकूल बनाने के लिए साझा मानक तय करने पर बल दिया गया।

सम्मेलन के इतर भारत की  बड़ी उपलब्धि है वैश्विक नेताओं के साथ महत्वपूर्ण बातचीत । लंबे समय से चल रहे सीमा तनाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच सीधी बातचीत हुई। इसमें मतभेदों को विवाद में न बदलने और सीमा पर शांति बनाए रखने पर सहमति बनी। मोदी-शी जिनपिंग की मुलाकात से पहले बड़ा कदम  छह  साल बाद भारत-चीन के बीच सीधी फ्लाइट शुरू करना है। भारत-रूस के बीच  ऊर्जासमुद्री सुरक्षा और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने के लक्ष्य पर सहमति जताई गई।

सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों में तत्काल सुधार की मांग को मजबूती से दोहराया गयाताकि विकासशील देशों को वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रिया में उचित प्रतिनिधित्व मिल सके। भारत ने इस सम्मेलन के जरिए यह साबित किया कि वह वैश्विक गुटबाजी से दूर रहकर एक संतुलित और निष्पक्ष "आर्थिक और कूटनीतिक पुल" के रूप में काम करने की क्षमता रखता है।

दिल्ली शिखर सम्मेलन  ने यह साबित किया कि ब्रिक्स अब केवल एक विचार-विमर्श का मंच या बयानों तक सीमित रहने वाला समूह नहीं रहाबल्कि यह संस्थागत ढांचा तैयार करने में सक्षम एक ठोस आर्थिक ब्लॉक बन चुका है। इसके अतिरिक्तदेशों के वित्तीय संकट से निपटने के लिए आकस्मिक रिजर्व व्यवस्था पर चर्चा ने सदस्य राष्ट्रों को वैश्विक बाजार के उतार-चढ़ाव से एक सुरक्षा कवच प्रदान करने का प्रयास किया।

व्यापारिक दृष्टिकोण से दिल्ली सम्मेलन में एक अत्यंत दूरदर्शी निर्णय यह लिया गया कि सदस्य देश आपस में अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देंगे। अंतर-ब्रिक्स व्यापार में अमेरिकी डॉलर और यूरो पर निर्भरता कम करने के इस प्रयास का मुख्य उद्देश्य क्रेडिट सुविधाओं को आसान बनाना और विनिमय दरों के जोखिमों को कम करना था। पश्चिमी वित्तीय आधिपत्य और प्रतिबंधों की राजनीति के आलोक में यह पहल वैश्विक अर्थव्यवस्था के विकेंद्रीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम मानी गई। इसके साथ हीव्यापार मंत्रियों के स्तर पर हुए समझौतों ने यह सुनिश्चित किया कि सदस्य देशों के बीच मालसेवाओं और निवेश का प्रवाह सुचारू रूप से हो सके।

यदि दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन का विश्लेषण किया जाएतो इसके बहुआयामी सकारात्मक परिणामों के साथ-साथ कई ऐसे अंतर्विरोध और सीमाएं भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं जो इस संगठन की दक्षता को चुनौती देती हैं। सबसे बड़ा अंतर्विरोध ब्रिक्स के दो सबसे बड़े सदस्योंभारत और चीनके बीच मौजूद रणनीतिक और सीमा संबंधी अविश्वास है। दिल्ली सम्मेलन के मंच पर जहां दोनों देशों के नेतृत्व ने आर्थिक सहयोग पर सकारात्मक प्रतिबद्धता दिखाईवहीं परदे के पीछे सीमा विवादक्षेत्रीय आधिपत्य की होड़ और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन का आक्रामक रुख एक अनसुलझी चुनौती बना रहा।

शासन प्रणालियों और विचारधाराओं का अंतर भी इस सम्मेलन की एक बड़ी सीमा के रूप में रेखांकित हुआ। भारत और ब्राजील जहां जीवंत लोकतांत्रिक देश हैंवहीं चीन और रूस में एकदलीय अथवा सत्तावादी शासन संरचनाएं हैं। इस वैचारिक भिन्नता के कारण अंतरराष्ट्रीय कानूनोंमानवाधिकारों और वैश्विक नीतियों पर ब्रिक्स का एक एकीकृत दृष्टिकोण बना पाना बेहद जटिल हो जाता है। पश्चिमी देश किसी भू-राजनीतिक संकट पर प्रतिबंध लगाते हैंतो रूस और चीन का रुख स्पष्ट रूप से पश्चिम-विरोधी होता हैजबकि भारत और ब्राजील एक 'गैर-पश्चिमीलेकिन 'पश्चिम-विरोधी नहींका संतुलन पसंद करते हैं। दिल्ली सम्मेलन में भारत की कूटनीति की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उसने इस सम्मेलन को किसी सीधे पश्चिम-विरोधी मोर्चे में तब्दील होने से रोका और इसे विकास केंद्रित बनाए रखा।

जलवायु परिवर्तनऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा जैसे वैश्विक मुद्दों पर भी दिल्ली सम्मेलन में व्यापक मंथन हुआ। सम्मेलन ने यह स्पष्ट किया कि जलवायु परिवर्तन के ऐतिहासिक उत्तरदायित्व के लिए विकसित देशों को धन और तकनीक हस्तांतरण की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। इसके साथ हीस्वास्थ्य क्षेत्र में अनुसंधान और महामारी जैसी आपदाओं से निपटने के लिए साझा तंत्र बनाने पर भी सहमति व्यक्त की गई

दिल्ली सम्मेलन ने भारत के वैश्विक कद को बढ़ाने में अभूतपूर्व योगदान दिया। भारत ने खुद को एक ऐसे जिम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी के रूप में प्रस्तुत किया जो एक तरफ पश्चिमी गुटों के साथ मजबूत संबंध रख सकता हैतो दूसरी तरफ रूसचीन और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ मिलकर नए वैश्विक समीकरण भी गढ़ सकता है। भारत की यह 'बहु-संलग्नतानीति दिल्ली सम्मेलन में पूरी तरह सफल दिखाई दीजहां उसने पश्चिमी शक्तियों को नाराज किए बिना विकासशील देशों का सशक्त नेतृत्व किया।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं) 

 

 

No comments: