Sunday, May 18, 2025

आपरेशन सिंदूर से नुकसान तो चीन को हुआ

 


अशोक मधुप

वरिष्ठ पत्रकार

भारत के चार दिवसीय आपरेशन सिंदूर को लेकर हुए युद्ध  विराम की सबसे बड़ी बात यह है कि भारत और  पाकिस्तान दोनों अपनी −अपनी सफलता पर प्रसन्न है। दोनों जश्न  मना रहे हैं, किंतु इस युद्ध से सबसे  ज्यादा लाभ भारत को हुआ है, और सबसे  ज्यादा नुकसान युद्ध से दूर खड़े होकर तमाशा देख  रहे चीन को । भारत युद्ध में अपने शस्त्रों विशेषकर मिजाइलों  की गुणवत्ता और सटीकता को पूरी दुनिया में साबित करने में  कामयाब रहा।  इससे  भारत में बनी रक्षा प्रणालियों और हथियारों को लेकर माँग अब बढ़ेंगी। हालाकि   चीन युद्ध में शामिल नही था किंतु पाकिस्तान उसके अस्त्र −शस्त्रों के बल पर जंग के मैदान में था।चीन के बने  उपकरण पहले ही अपनी निम्न क्वालिटी के लिए प्रसिद्ध थे।इस युद्ध में  तो उनके  निराशाजनक प्रदर्शन ने और चीन के सामान की शाख मिट्टी में  मिला दी। चीन अब सफाई में भले ही यह कह रहा है कि उसके उपकरण सही हैं,  पाकिस्तानी सैनिकों पर  उन्हें चलाना नही आया। चीन अब कुछ भी सफाई ने किंतु कोई भी देश अब ये मानने को तैयार नही कि चीन के शस्त्र किसी काम के हैं।   इस चार दिनी युद्ध में सबसे ज्यादा नुकसान चीन को हुआ।चीन अब कुछ भी तर्क दे, कोई भी  दावा करे, अब कोई उसकी बात पर यकीन करने वाला  नही है।

 

पाकिस्तान वर्तमान में चीन के बनाए हुए HQ-16 और HQ-9 एयर डिफेन्स सिस्टम का इस्तेमाल करता है। HQ-9 जहाँ 125 किलोमीटर तो HQ-16 लगभग 50 किलोमीटर की रेंज वाला एयर डिफेन्स सिस्टम है। पाकिस्तान के लिए चीन ने इसमें बदलाव किए , इसके बावजूद  इसका कोई फायदा नहीं हुआ है।ये सिस्टम न तो भारत के द्रोण रोक सके और नही मिजाइल।यह एक भी भारतीय मिसाइल, ड्रोन या लोइटेरिंग म्युनिशन नहीं पकड़ पाए। भारत ने तो इन डिफेन्स सिस्टम को ही तबाह कर दिया। चीन ने पाकिस्तान को जेएफ−17 लड़ाकू विमान भी बेचा । पाकिस्तान को इसका भी कोई लाभ  न मिल सका।पाकिस्तान ने भारत पर हमले के लिए चीन में बने ड्रोन का भी इस्तेमाल किया था। रिपोर्ट्स बताती हैं कि पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ चीन के विंग लूँग और CH-II ड्रोन इस्तेमाल किए थे। इन्हें भी भारत ने सीमा पर ही मार गिराया है। इनमें से कोई भी ड्रोन भारत के किसी टार्गेट को हिट नहीं कर पाया।

हम जानते हैं कि चीन भारत का प्राकृतिक  शत्रु देश है । कितना भी कर लें वह भारत का मित्र नही हो सकता। वह  पाकिस्तान का मित्र देश है और आज पाकिसतान को शस्त्र देने वाला सबसे बड़ा आपूर्ति करता देश। इतना जानने के बावजूद   हम भारतवासी सस्ते के चक्कर में चीन का बना सामान धड़ल्ले से खरीदते हैं।कभी चीन से विवाद के समय ही हमारी  देशभक्ति जागती है,  वह भी कुछ दिन के लिए और  मात्र फेसबुक तक।यदि आधे भारतवासी ही एक साल के लिए चीन के बने सामान का बायकाट कर दें तो चीन घुटनों में  आ  जाए।कुछ साल के लिए कैलाश मानसरोवर यात्रा से मुंह मोड़कर देखिए।चीन रास्ते पर आ जाएगा।

 लगभग  50 के आसपास अरब देश हैं किंतु दो अरब देश  तुर्की और अज़रबैजान  ही  इस लड़ाई में पाकिस्तान के साथ पूरी ताकत के साथ खड़े नजर आए। इस लड़ाई में पाकिस्तान ने तुर्की में बने 40 से ज्यादा द्रोण का इस्तमाल किया, हालाकि ये सभी  रास्ते में मार दिए गए।

2024 में पर्यटन के लिए 2.75 लाख भारतीय तुर्की गए। 2024 में पर्यटन के लिए 2.5 लाख भारतीय अज़रबैजान के बाकू गए। 2022-2024 के दौरान अज़रबैजान में भारतीय पर्यटकों के आगमन में 68 प्रतिशत  की वृद्धि हुई, और अज़रबैजान में औसत प्रवास समय 4-6 दिन है। तुर्की में भारतीयों का औसत प्रवास 7-10 दिन है।कुल मिलाकर, भारतीय अज़रबैजान की अर्थव्यवस्था में सालाना 1,000-1,250 करोड़ रुपये का योगदान करते हैं। भारतीय तुर्की की अर्थव्यवस्था में सालाना 2,900-3,350 करोड़ रुपये का योगदान करते हैं। इस्तांबुल, कप्पाडोसिया और अंताल्या में भारतीयों की सबसे ज़्यादा दिलचस्पी है।विदेश में प्रति भारतीय पर्यटक का औसत खर्च प्रति यात्रा ए से सवा लाख रुपये है। चूंकि भारत का मध्यम वर्ग अतिरिक्त आय के साथ 40 करोड़ तक पहुंच गया है, इसलिए सोशल मीडिया और फिल्मों के माध्यम से लोकप्रियता उन्हें तुर्की और अजरबैजान की ओर आकर्षित कर रही है।भारत के कारण, तुर्की और अजरबैजान में 20,000 प्रत्यक्ष पर्यटन नौकरियों का सृजन हुआ। अप्रत्यक्ष नौकरियां 45,000-60,000 से अधिक हैं। पिछले चार वर्षों में तुर्की के आतिथ्य क्षेत्र में भारतीय निवेश में 35% की वृद्धि हुई है।

अपने दुश्मन देश को लाभ  पहुंचाना  बंद करने देखिए।सांप और सपोलिए  पालना बंद करिए। सब रास्ते पर आ जाएंगे।दुनिया भर के देशों में घूमने के लिए बहुत सी खूबसूरत जगह हैं, सिवाय इन दो देशों के।अगली बार, जब भी यात्रा की योजना बनाएँ, तो इन दो देशों को  छोड़ कर कही भी चले जाए, ये ज्यादा ठीक होगा।

इस चार दिन के भारत और पाकिस्तान के संघर्ष के बाद यह तै  हो गया कि  दुनिया में भारत के अपने शस्त्रों की विश्वसनीयता बढ़ी है।ब्रह्मोस्त्र  की तो  पहले   ही मांग होने लगी थी। अब और ज्यादा मांग आएगी।भारत का शस्त्रों का बाजार बढ़ेगा। निर्यात बढ़ेगा तो देश की अर्थ व्यवस्था  मजबूत होगी। रूस एस −500  बनाने की पहले ही तकनीक भारत को देने को तैयार है। रूस −भारत का विश्वसनीय मित्र है। भारत को चाहिए की समय की मांग को देखते हुए एस − 500 का निर्माण  अपने यहां शुरू कर दे।राफेल की तरह दुनिया की सबसे श्रेष्ठ  तकनीक खरीदे। अमेरिका  मात्र शस्त्रों का  सौदागर है। वह किसी देश का मित्र नही हो सकता। भारत को चाहिए कि अमेरिका का  बिल्कुल विश्वास न करें।इन चार दिनों के युद्ध में रूस और इस्राइल भारत के साथ खड़े  रहे। अब भारत को  समय की जरूरत के हिसाब से नए मित्र बनाने  होंगे। अपने को  मजबूत करना  होगा। तुर्की में भूकंप आने पर भारत 'ऑपरेशन दोस्त' शुरू किया।  इसके तहत तुर्की को मेडिकल सहायता भेजी गई। इस ऑपरेशन के तहत एनडीआरएफ की दो टीमें तुर्की भेजीं।इसमें   एक डॉग स्क्वॉड भी शामिल था।भारत की रेस्क्यू टीमों ने मलबे में दबे लोगों को खोजने, उन्हें बाहर निकालने में मदद की। ऑपरेशन दोस्त के तहत भारत ने छह विमान और  30 बिस्तरों वाला मोबाइल अस्पताल, मेडिकल सामग्री सहित सभी जरूरी सामान भिजवाए। तुर्किए में भारत का ऑपरेशन दोस्त 10 दिनों तक चला।  इसका बदले  तुर्की ने पाकिस्तान की किस तरह मदद की । किस  तह शस्त्र  भिजवाए,  यह हाल में पता चल गया।

अनुमान  लगाए जा रहे हैं कि चीन के हथियारों के भारत के खिलाफ फेल होने के बाद अब पाकिस्तान  अमेरिका और बाकी पश्चिमी देशों से हथियार खरीदने पर जोर लगाएगा। हालाँकि, उसकी आर्थिक स्थिति को ठीक नही किंतु यह एक हजार साल भी भारत से लड़ने का इरादा रखता है। भले ही उससे  दुनिया के आगे भीख मांगनी पड़े। झोली फैलनी पडे।

अमेरिका भारत के विरोध के बावजूद पहले भी पाकिस्तान को युद्ध सामग्री देता रहा है। भात के पुरजोर विरोध के बावजूद उसने पाकिस्तान को एफ −16 विमानों की खेप दी थी।अब चीन से पाकिस्तान का  मोहभंग होता देख  अमेरिका और मित्र देश  पाकिस्तान को अपने खेमें में लेने के लिए कार्य करेंगे।  

 

एक बात और भारत ने  पहली बार पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई में चीन से मिले हथियारों का नाम लिया है। भारत ने बताया कि पाकिस्तान ने इन हथियारों का इस्तेमाल भारतीय सेना पर हमला करने के लिए किया था। डीजीएओ एयर मार्शल एके भारती ने सबके सामने पाकिस्तान और चीन की इस सांठ-गांठ के सबूत दिखाए। ये काम तो बहुत पहले से होना  चाहिए था।वैसे  चीन पर इसका कोई असर होने वाला  नही है।  उसका ध्येय  अपना और अपनी सीमाओं का विस्तार करना है,  वह इसमें लगा है। चीन भारत को अपना सबसे प्रबल शत्रु मानता है,वह मानता रहेगा ।भारत अपने दुश्मनों की मदद करन में चीन का नाम ले या न लें को फर्क पड़ने वाला नही है।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Friday, May 9, 2025

कांटे को कांटे से ही निकालना बेहतर है

 कांटे को कांटे से ही निकालना बेहतर है

अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

पुराना  सिद्धांत है कि कांटा −कांटे से निकलता है तलवार या मिजाइल से नही। करना भी वही चाहिए।  सिद्धांत के विपरीत जाने में ज्यादा नुकसान की ज्यादा संभावना रहती है। पहलगाम में आतंकी हमले के बाद आज देश  गुस्से में  है। देश की जनता चाहती है कि हमला कराने वाले पाकिस्तान से भारत बदला ले। पाकिस्तान को तहस − नहस कर दे।  पाकिस्तान पर हमलाकर उसे  सबक सिखाए। सरकार भी ही चाहती है। इसके लिए  उसने सेना को  फ्रीहैंड दे दिया।  ऐसे  में देश की  जनता को चाहिए कि सरकार और सेना को सोचने, समझने और तैयारी करने का अवसर दे।  हमले की तैयारी  फुलप्रूफ हो कि  दुश्मन को ज्यादा से ज्यादा नुकसान हो।  हमले में अपने देश ,देश के   जवानों और सेना की कम से कम क्षति हो। हमले का बदला भी ले लिया जाए। 

 इतिहास गवाह है कि पहले भी हम अपना बहुत कम नुकसान कर दुश्मन का बड़ा नुकसान पहुंचा चुके हैं। इसके लिए पाकिस्तान में  बने आंतकियों के लांचिंग पैड दो बार तबाह ही नही किए, वहां मौजूद  आंतकियों का  खात्मा भी  दो बार पहले हो चुका है।भारतीय सेना के कमांडो ने 28 सितंबर 2016 की रात को गुलाम कश्मीर (पीओके ) में दाखिल होकर आतंकी कैंपों में सर्जिकल स्ट्राइक की। यह कार्रवाई गुलाम कश्मीर (पीओके ) के चार क्षेत्र भिंबर सेक्टर, तत्तापानी सेक्टर, लिपी सेक्टर व कैल सेक्टर में एक साथ हुई। पांच घंटे चली इस कार्रवाई में इन सेक्टरों में चल रहे छह आतंकी शिविर तबाह करने के साथ करीब 45 आतंकियों को मार गिराया गया। मिशन को अंजाम देकर सभी कमांडों सुरक्षित भारतीय क्षेत्र में लौट आए। अभियान में शामिल कमांडों की हेलमेट पर लगे विशेष कैमरों व ड्रोन की मदद से पूरे ऑपरेशन को कैद भी किया गया।14 फरवरी 2019 को जम्मू और कश्मीर के पुलवामा में जोरदार विस्फोट हुआ था। निशाने पर था CRPF के 78 वाहनों का काफिला। विस्फोट में 40 जवान शहीद हो गए थे। दो सप्ताह बाद 26 फरवरी 2019 को भारतीय वायुसेना के मिराज-2000 विमानों ने रात के अंधेरे में नियंत्रण रेखा यानी एसओसी  पार कर पाकिस्तान के पूर्वोत्तर इलाके खैबर पख्तूनख्वाह के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के ट्रेनिंग कैम्पों पर सर्जिकल स्ट्राइक की थी। भारत के तत्कालीन विदेश सचिव विजय गोखले ने कहा कि इस स्ट्राइक में बड़ी संख्या में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी, उनको प्रशिक्षण देने वाले, संगठन के बड़े कमांडर और फिदायीन हमलों के लिए तैयार हो रहे जिहादियों को खत्म कर दिया गया। अगले दिन पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की कोशिश की। भारत ने दावा किया कि डॉग-फाइट में भारतीय वायुसेना के मिग-21 ने पाकिस्तानी वायुसेना के एफ-16 को मार गिराया। पाकिस्तान ने भी मिग-21 को मार गिराया और विंग कमांडर अभिनंदन को गिरफ्तार कर लिया। हालांकि, दबाव में दो दिन बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।बदला  लेने की तैयारी ऐसी ही हो ।अपना कम से कम नुकसान हो और दुशमन का बहुत ज्यादा।

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान पर पांच तरफ से हमला बोला। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी घोषणा कर चुकें है कि इसका बदला  लिया जाएगा।  दुश्मन को माफ  नही किया जाएगा।  उसे कड़ी से कड़ी  सजा दी जाएगी। भारत सरकार  सिंधु जल संधि, अटारी सीमा और वीजा संबंधी सेवाएं बंद करने का फैसला कर चुकी है। पूरे विश्व  में पाकिस्तान का चरित्र  उजागर करने में भारत का विदेश मंत्रालय लगा है। भारत  दुनिया भर के देशों को इस बात के सबूत देने में लगा है कि पाकिस्तान भारत में आतंकवाद फैला रहा है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी कबूल कर चुके हैं कि पाकिस्तान तीन दशक से आतंकवाद बढ़ाने में लगा है। एक इंटरव्यू में आसिफ ने कहा था, “हम लगभग तीन दशकों से संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) और ब्रिटेन सहित पश्चिम के लिए आंतकवाद फैलाने का यह गंदा काम कर रहे हैं।”

इस सबके बीच अब सरकार ने पाकिस्तान पर सोशल स्ट्राइक कर हमला बोला है। भारत में पाकिस्तान के 16 यूटयूब चैनल बंद किए जा चुकें हैं।आसिफ के एक्स अकाउंट को बैन करने का यह कदम भारत द्वारा 16 पाकिस्तानी यूट्यूब चैनलों पर प्रतिबंध लगाने के ठीक एक दिन बाद उठाया गया। बैन किए गए पाकिस्तानी यूट्यूब चैनलों का सब्सक्राइबर बेस 63 मिलियन है।ये चैनल भड़काऊ और सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील सामग्री फैला रहे थे।ब्लॉक किए गए कुछ प्रमुख पाकिस्तानी यूट्यूब चैनलों में डॉन न्यूज, एआरवाई न्यूज, बोल न्यूज, जियो न्यूज, समा टीवी और जीएनएन शामिल हैं।

 हाल के पहलगांव में हुए  इस दुर्दांत हमले के बाद से भारत की जनता में आक्रोश है। साथ ही साथ पीएम मोदी और देश की तमाम राजनीतिक पार्टियां एक मंच पर आकर पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात कह रही है। इस हमले के कुछ ही दिन बात पीएम मोदी ने बिहार की धरती मधुबनी में एक जनसभा को संबोधित करते हुए पाकिस्तान के आकाओं और आतंकियों को ये खुले शब्दों में चेतावनी देती हुए कहा है, ‘आतंकियों को ऐसी सज़ा मिलेगी जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की होगी।सब बदला चाहते हैं किंतु  जोश मे होश  खोना ठीक नही।हमें ऐसा काम करना चाहिए कि हमारा नुकसान कम से कम हो और दुश्मन का ज्यादा से ज्यादा ।

उधर भारत सरकार ने इस घटना का बदला लेने के लिए सेना को फ्री हैंड  दे दिया है। प्रधानमंत्री मोदी की सेना को फ्री हैंड देने की घोषणा का मतलब है कि अब भारतीय सेना आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के लिए स्वतंत्र होगी। अब उसे इसके लिए किसी राजनैतिक से अनुमति की जरूरत नही होगी। 

सरकार ने जहां आंतकवाद को प्रश्य  देने वाले पाकिस्तान को नुकसान पहुंचाने के लिए सरकार  सिंधु जल संधि को स्थागित करने का फैसला लिया है।  ऐसे  ही और निर्णय भी हो सकतें हैं पाकिस्तान के परमाणु प्रतिष्ठानों  पर साइबर अटैक कराए जा सकते हैं। तो पाकिस्तान के विरूद्ध खड़े आतंकवादी समूहों की इसी तरह मदद की जा सकती है जैसे पाकिस्तान भारत के विरूद्ध करता है।सिंध और बलूचिस्तान के आजादी  के आंदोलन में लगे सशस्त्र   समूहों की मदद करके उन्हें मजबूत किया जा सकता है।  अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार पाकिस्तान से  नाराज है कि उसका भी फायदा उठाया जा सकता है। हालात इस तरह के पैदा किए  जा सकते है कि बिना  सैनिक कार्रवाई किए  पाकिस्तान को अपने घर में उलझा दिया जाए।  ऐसे हालात पैदाकर दिए जाएं कि उसके विभिन्न टुकड़े हो जाएं।

इस सब के बीच बड़ी खबर यह है कि आम कश्मीरी इस  हमले का विरोध कर रहा है।इस  हमले की कश्मीर की मशजिदों  से निंदा की गई।सबने एक  सुर में  कहा कि पाकिस्तान को इसका जवाब दिया जाना चाहिए। पिछले कुछ साल में कश्मीर में लौटी रौनक  से कश्मीर का कारोबार बहुत तेजी के साथ बढ़ा है।करीब 15 लाख टरिस्ट अब कश्मीर आने लगे  हैं।22 अप्रैल की आंतकवादी घटना ने कश्मीर के इस व्यापार को बड़ा धक्का दिया  है। ज्ञातव्य  है कि इस हमले में 26 सैलानियों की मौत हुई है।

पहलगाम में आंतकी हमले के बाद देश में गुस्सा है। देश की जनता चाहती है कि हमला कराने वाले पाकिस्तान से भारत बदला ले।  पाकिस्तान पर हमलाकर उसे  सबक सिखाए।  देश की जनात  इस समय  जोश में है किंतु जोश में हमें होश  नही खोना है। हमारी कोशिश ये हो कि बिना युद्ध के पाकिस्तान से बदला ले लिया लाए।उसे विभिन्न भाग में तोड़ दिया जाए। हमला करने वाले कही भी जाकर छुप जाए  इसे इस्राइल के गुप्तचर संगठन मौसाद की तर्ज पर वहीं जाकर मारा जाए।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

Tuesday, March 25, 2025

अंगदान बढ़ाने को एमपी का रास्ता अपनाएं


अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

मध्य प्रदेश सरकार ने अंगदान करने वालों को सम्मानित करने के साथ उनके परिवार को आयुष्मान भारत योजना का लाभ देने जा रही है। इसमें अंगदान करने वाले के परिवार को  प्रति वर्ष पांच लाख रुपये तक का निःशुल्क इलाज मिलेगा। जागरूकता बढ़ाने के लिए 18 लाख रुपये की डॉक्यूमेंट्री बनाई जा रही है। राज्य का स्टेट आर्गन एवं टिश्यू ट्रांसप्लांट पोर्टल भी तैयार हो रहा है। मध्य प्रदेश चिकित्सा विभाग के संचालक डॉ. एके श्रीवास्तव ने बताया कि शीघ्र ही इस संबंध में शासन स्तर पर निर्णय हो जाएगा। निश्चय ही यह निर्णय भारत की  महर्षि दधिचि की देहदान की परम्परा को आगे बढ़ाएगा।मध्य प्रदेश सरकार का यह निर्णय लोगों को अंगदान के लिए प्रेरित करेगा।वैसे जो कार्य मध्य प्रदेश सरकार करने जा रही है, उसे प्रत्येक प्रदेश को लागू करना चाहिए।अच्छा हो कि ये केंद्र की ओर से लागू हो।इस कार्य के लिए जागरूकता अभियान भी चलाने की जरूरत है। इसके लिए लोगों को प्रेरित करने के साथ प्रोत्साहित भी करना होगा।

भारत में प्रतिवर्ष पांच लाख से ज्यादा लोग वक्त पर अंग न मिलने से मौत का शिकार हो जाते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार

 इनमें से दो लाख के आसपास लोगों की  मौत लिवर नहीं मिलने की वजह से होती है।इन मरने वालो में अधिकतर वे लोग  

होतें हैं जो पैसा देकर अंग नही खरीद सकते। पैसे वाले तो  मन मांगा मोल देकर अंग खरीद लेते हैं।इसी कारण मानव अंगों 

के अवैध कारोबार को बढ़ावा मिलता है।भारत  में प्रतिवर्ष दस लाख व्यक्तियों में अंगदान करने वालों की संख्या 0.16 है। 

विकसित देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, नीदरलैंड और जर्मनी में यह संख्या 10 से 30 के मध्य है। हमारे देश में इस संख्या के कम 

होने के कारण हैं-सही जानकारी का अभाव, धार्मिक मान्यता, सांस्कृतिक भ्रांतियां और पूर्वाग्रह। कई देशों में अंगदान ऐच्छिक न 

होकर अनिवार्य है। भारत में ऐसा कर पाना संभव नहीं है, लेकिन जागरूकता पैदाकर इस संख्या को बढ़ाया जा सकता है।

लोगों में अंधविश्वास है कि यदि मृत व्यक्ति की आंखों को दान दिया जाता है तो उसे मरने के उपरांत स्वर्ग नहीं मिलता या अगले जन्म में वह आंख या उस अंग के बिना पैदा होगा, जबकि अंगों को शरीर से निकालने से परंपरागत अंत्येष्टि क्रिया या दफन क्रियाओं में कोई बाधा नहीं आती। इससे शरीर के रंग-रूप में भी कोई परिवर्तन नहीं होता।अपने अंगों को मृत प्राय: रोगियों को बहुमूल्य उपहार के रूप में दान देकर अपनी मृत्यु को जीवन समान सार्थक बनाया जा सकता है।

एक मृत व्यक्ति के अंगदान से नौ लोगों को नया जीवन मिल सकता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण प्रतीक्षा सूची में 1,04999 पुरुष, महिला और बच्चे आज भी इस इंतज़ार में हैं कि कोई अंगदान करेगा और वे अपना जीवन जी सकेंगे। , राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण प्रतीक्षा सूची में अकेले किडनी के जरूरतमंद  व्यक्ति ही 88551 है।भारत में प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ लाख मौतें सड़क हादसों से होती हैं। वर्ष 2022 में ही 168491 मौत हुईं। इसका मतलब औसतन हर रोज सड़कों पर 1000 से ज्यादा दुर्घटनाएं होती हैं और 400 से ज्यादा लोग दम तोड़ देते हैं।

इनमें सबसे पहले मस्तिष्क पूरी तरह से कार्य करना बंद कर देता है, ऐसा शरीर अंगदान के लिए उपयुक्त होता है। फिर भी बमुश्किल दो -तीन प्रतिशत  भाग्यशाली लोगों को नए अंग मिलते हैं।हृदय, फेफड़े, लिवर, किडनी, आंत, पैंक्रियाज ऐसे अंग हैं, जो मृत व्यक्ति के परिजनों  द्वारा दान किए जा सकते हैं। आंख का कॉर्निया, हड्‌डी, त्वचा, नस, मांसपेशियां, टेंडन, लिगामेंट, कार्टिलेज, हृदय वाल्व भी मृत्यु के बाद किसी अन्य व्यक्ति के काम आ सकते हैं। जीवित व्यक्ति एक पूरी किडनी व लिवर का कुछ हिस्सा दान में दे सकता है। शेष एक किडनी से दानदाता का जीवन व्यतीत हो सकता है । लिवर समय के साथ बढ़ जाता है और पुन: अपनी पुरानी अवस्था में लौट आता है इसलिए दाता को किसी प्रकार की कोई दिक़्क़त नहीं होती है।

भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीन एवं महान संस्कृति है। दान, धर्म एवं उच्च संस्कार प्राचीन काल से ही हमारे समाज में वरिष्ठ स्थान रखते रहे हैं। महर्षि दधीचि ने दान की पराकाष्ठा का उदाहरण समाज के समक्ष रखा। वह भारतीय संस्कृति के प्रथम अंगदानी कहे जाते हैं।  देवता और दानव में युद्ध  चल रहा था !दानव देवताओं पर भारी पड़ रहे थे। देवताओं को समझ नहीं आ रहा था कि युद्ध में कैसे विजय पाई जाए। इसके लिए वे   ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने सुझाव दिया कि महर्षि दधीचि की अस्थियों से बने अस्त्र से दानवों को पराजित  किया जा सकता है। देवता महर्षि दधीचि के पास गए। याचना की। महर्षि दधीचि द्वारा दी गई अस्थियों से बने वज्र से राक्षास ब्रजासुर का बद्ध हुआ।   दानव पराजित हुए।

0आर्यव्रत की हजारों साल पुरानी देहदान  और अंगदान की इस परंपरा में आज भी लोगों की रुचि नहीं है।  मुझे याद है कि लगभग 40 साल पहले उत्तर प्रदेश के बिजनौर के स्टेडियम में खेल प्रतियोगिता के दौरान भाला लगने से एक कर्मचारी घायल हो गया था। उसे खून की जरूरत थी।कहे जाने पर भी उसके परिवारजनों ने खून नहीं दिया था। उसकी मदद के लिए स्टेडियम के खिलाड़ी आगे आये। उनके रक्त देने से कर्मचारी की जान बची।अच्छा यह है कि अब रक्तदान के प्रति तो लोगों में जागरूकता बढ़ी है, किंतु  अंगदान के प्रति अभी  चेतना नही है।अंगदान के प्रेरित करने  वाले  चिकित्सकों की भी कमी है।यदि बड़े  और सरकारी अस्पताल के चिकित्सक मृतक के परिजनों को अंगदान के लिए प्रेरित करने  लगे तो बड़ा  काम हो सकता है।

हालांकि हेल्थ प्रोफेश्नल आमतौर पर अंगदान के विषय पर मृतक के परिजनों से बात करने में अटपटा महसूस करते हैं। नई दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ समीरन नंदी ने डीडब्लू को बताया, "डॉक्टर मृतक के अंगों को दान देने के बारे में पूछने से कतराते हैं. कोई इस बारे में प्रोत्साहन भी नहीं है और बदले की कार्रवाई का डर भी रहता है।"एक बात ओर अंगदान करने के इच्छुक लोग बढ़ भी जाएं तो सभी अस्पतालों में अंग प्रत्यारोपण से जुड़ी तमाम प्रक्रियाओं के लिए जरूरी साजो सामान या उपकरण  मौजूद नहीं हैं।

भारत में सिर्फ 250 अस्पताल ही नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (नोटो) से पंजीकृत हैं। ये संगठन देश के अंग प्रत्यारोपण कार्यक्रम का समन्वय करता है।यानी देश में प्रत्येक 43 लाख नागरिकों के लिए, तमाम सुविधाओं और उपकरणों वाला सिर्फ एक अस्पताल है. भारत के देहाती इलाकों में तो ट्रांसप्लांट सेंटर कमोबेश हैं भी नहीं।

अंगदान की प्रक्रिया बहुत लाभकर है पर जिस तेजी से बढ़नी चाहिए, उस तेजी से नहीं अंगदान के नाम पर आंख देना ही शुरू हुआ है।यह भी  न के बराबर।जबकि मानव कल्याण के लिये अंगदान का प्रचार प्रसार बहुत जरूरी है।रक्तदान में जरूर तेजी आई है।

प्रत्येक वर्ष तीन अगस्त को अंगदान दिवस मनाया जाता है।एक दिवस में इस महत्वपूर्ण कार्य की इतिश्री कर दी जाती है।जबकि प्रत्येक पल अंगदान के लिए प्रेरित करने की जरूरत है। अंगदान के लिए जनजागरण की जरूरत है। स्कूली शिक्षा  से छात्रों में जनजागरण के लिए जागरूकता  विकसित की जानी चाहिए। अन्य अभियानों की तरह अंगदान के  लिए भी अभियान चलाने की जरूरत है।इसके लिए विभिन्न   धर्मगुरूओं से संपर्क कर उनसे अनुरोध किया जाए कि वह अंगदान के लिए अपने समर्थकों को प्रेरित  करें।मध्य प्रदेश की तरह अंगदान करने वालों परिवारों के सममानित करने के साथ उन्हें प्रोत्साहित करने आयुष्मान योजना जैसी सरकारी योजना का लाभ दिलाने की भी जरूरत है।   

वैसे हाल में अंगदान के लिए कई अच्छे स्लोगन  सामने आए हैं।मरने के बाद भी यदि दुनिया की खूबसूरती देखते  रहना चाहते हों तो आंखे  दान करो।मरने के बाद भी दिल की धड़कन महसूस करनी हों, तो दिल दान करों।इस तरह के और रोचक नारे और स्लोगन बनाकर बढ़ियाकर प्रचार करने महर्षि  दधीचि की देहदान की परम्परा को ओर आगे बढ़ाया जा सकता है और ज्यादा लोगों की जान बचायी  जा सकती हैं।

अशोक मधुप

 (लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं)

Thursday, March 6, 2025

कुंभ समाप्त, अब चार धाम यात्रा की तैयारी कीजिए


 अशोक मधुप 

वरिष्ठ  पत्रकार

कुंभ यात्रा लगभाग बीत गई । इसके बाद 30 अप्रेल से चार धाम यात्रा शुरू हो जाएगी।श्रद्धालुओं का  जो काफिला कुंभ में दिखाई दिया ,ऐसा ही कमोबेश चार धाम यात्रा में नजर आने की आशा है ।कुंभ के सफल आयोजन की जिम्मेदारी जहां उत्तर प्रदेश सरकार और वहां के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की थी।ऐसी ही जिम्मेदारी चार धाम यात्रा में उत्तरांचल की सरकार और यहां के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की होगी।पुष्कर सिंह धामी इस श्रद्धालुओं के रेले को किस तरह नियंत्रित करते हैं। इस यात्रा

की किस तरह तैयारी करते है। इसकी योग्यता उन्हें प्रदर्शित करने का  अवसर आ रहा है। हालाकि उत्तरांचल में भाजपा की सरकार है।केंद्र उन्हें इस आयोजन में पूरी मदद करेगा ,हर संभव मदद करेगा, किंतु श्रद्धालुओं के रेले को तो उत्तरांचल सरकार को ही संभालना होगा।26 फरवरी को महाकुंभ का अंतिम स्नान था। शिवरात्रि तक 66 करोड 21 लाख श्रद्धालु स्नान कर चुके। अभी ये चलेगा।एक तरह से फरवरी के बाद भी कुछ समय ये चलेगा। आयोजन की समाप्ति तक एक अनुमान के अनुसार कुंभ स्नान करने वालों की संख्या 70 करोड़ के आंकड़े को पार कर जाएगी।

देश में दशकों के बाद सनातन  ने करवट ली है । वह अपने आस्था स्थलों की ओर बेतहाशा दौड़ रहा है।राम मंदिर के निर्मित होते ही सनातन का ऐसा उदय हुआ जैसा कभी 1000 वर्ष पहले हुआ करता होगा । कुंभ आने का प्रचार पहली बार भारत से बाहर निकल दुनिया के तमाम देशों के टीवी चैनल्स तक पंहुच गया । अनेक देशों की सरकारों को निमंत्रण पत्र देने भारत के राजदूत गए ।परिणाम स्वरूप, 60 करोड 21 लाख  श्रद्धालु शिवरात्रि तक कुंभ स्नान चुके हैं । काशी –अयोध्या− चित्रकूट  में जगह खाली नहीं थी । लोगों का जिस तरह प्रयागराज जाना लगातार चल रहा है उसे देखते हुए साफ हो जाता है कि कुंभ समापन तक  70 करोड़ श्रद्धालु संगम की डुबकी लगा चुके होंगे । इस रिकॉर्ड की  मिसाल पूरी दुनिया में कभी नहीं मिलेगी।

 ये महाकुंभ मार्च के प्रारंभ में  समाप्त हो जाएगा।इसके बाद शुरू होगी चारधाम यात्रा।चार धाम यात्रा के दो धाम   यमुनोत्री और गंगोत्री के पवित्र द्वार तीर्थयात्रियों के लिए अक्षय तृतीया के पवित्र दिन अर्थात 30 अप्रेल को खुलेंगे।यमुनोत्री और गंगोत्री के खुलने के कुछ ही दिनों बाद, मई के तीसरे या चौथे सप्ताह से अन्य दो मंदिर, केदारनाथ और बद्रीनाथ तीर्थयात्रियों से भर जाएँगे। जबकि, श्रद्धालु विजय दशमी के शुभ दिन बद्रीनाथ धाम को विदा करते हैं, उसके बाद दीपों के त्योहार दिवाली पर गंगोत्री धाम को बंद कर दिया जाता है और केदारनाथ और यमुनोत्री धाम एक साथ यम द्वितीया/भाई दूज पर बंद कर दिए जाते हैं।

चूंकि चारधाम यात्रा घड़ी की सुई की दिशा में चलती है, इसलिए पवित्र यात्रा यमुनोत्री से शुरू होती है। उसके बाद क्रमशः गंगोत्री और केदारनाथ से गुजरते हुए चार धाम की पवित्र यात्रा बद्रीनाथ पंहुचती है।

 इसमें को शक नही कि कुंभ यात्रियों का ये रेला, सनातन धर्म के श्रद्धालु दो माह मार्च और अप्रेल आराम करके अब चार धाम  यात्रा की ओर निकलेंगे। उत्तराखंड वासियों के लिए अतिथि भगवान होता है लेकिन यहां  ये कुम्भ जैसी भीड़ आई को कैसे संभालेगा, ये समय बताएगा।  से उत्तरांचल के बडी चुनौती होगा। श्रद्धालुओं को मुसीबत झेलनी पड़ सकती है। आज भी गर्मी के मौसम में कुछ साल से पहाड़ पूरी तरह पैक हो जाते हैं। लोगों को यहां न होटल में जगह मिलती है, न वाहन पार्किग को स्थान। यहां का भूगोल, मौसम और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी कई मोर्चे पर चुनौती पेश करती है। 2013 की केदारनाथ की दारुण आपदा को दुनिया  देख −सुन चुकी हैं।इस बार उत्तराखंड सरकार और शासन को भी अतिरिक्त सतर्कता बरतन होगी. चारधाम की यात्रा सबके लिए सुरक्षित और सुखद रहे,ये सरकार की जिम्मेदारी और भीड़ प्रबंधन पर निर्भेर करता है।

राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह से शुरू हुआ कुंभ से  उपजा  सनातन का जोश और आस्था आजकल हिंदू समाज में हिलोरे ले रही है।कुंभ  यात्रा के बावजूद  इस बार शिवरात्रि पर कांवड़ियों की संख्या पर प्रभाव नहीं पड़ा। कुछ ज्यादा ही रहे। कावंड लाने वालों में इस बार महिलाएं और युवती भी ज्यादा नजर आईं । कांवड़ सेवा शिविर  भी  पहले से काफी ज्यादा नजर आए।कांवड यात्रा के प्रत्येक सौ कदम पर अबकि बार शिविर लगे थे।  उनमें स्त्री −पुरूष मिलकर  सेवा कर रहे थे। कांवड यात्रा के मार्ग पर लोग कारों में फल और बिसलरी की पानी की बोलते भरे खड़े थे। वे आने वाले कांवड़ियों को फल और पानी की बोतल बांट रहे थे। लेखक का जनपद हरिद्वार से सटा है। यहां डाक कांवड़ और कलश की बंहगी में जल लाने का प्रचलन नही है, किंतु  इस बार डाक कांवड काफी संख्या में  दिखाई दी। कुंभ यात्रा और कावंड यात्रा का यह   सनातन का रेला आने वाली चार धाम यात्रा में भी   दीखने की पूरी उम्मीद है।  

उत्तरांचल सरकार  को देखना  है कि वह आने वाले चार धाम यात्रा के श्रद्धालुओं को कैसे संभालती है। अभी  उसके पास यात्रा की तैयारी के लिए दो माह का समय है। मेरठ−पोड़ी नेशनल हाई −वे को फोर  लेन करने का काम जारी है।उम्मीद है कि यात्रा की शुरूआत हरिद्वार और ऋषिकेश से कर उसकी वापसी पौड़ी मार्ग से होगी।ऐसा है तो  उसे इस मार्ग का तैयार कराने के लिए केंद्र को अभी से दबाव देना होगा।

राम मंदिर पारण प्रतिष्ठा के बाद देशवासी जिस तरह अपने तीर्थों की ओर दौड़ रहे हैं , उम्मीद है ऐसे ही श्रद्धालु चार धाम यात्रा में उमड़ेंगे। वे  चार धाम यात्रा के लिए सरकारी साधन  बस ,ट्रेन और  विमानों से आएंगे तो भारी तादाद में श्रद्धालु अपने वाहन और टैक्सियों से आएंगे।इन वाहनों कार, टैक्सियों और बसों को उत्तरांचल कैसे संभालेगा,  उसे देखना है।  प्रयागराज से तो इसलिए सब कुछ हो गया कि  वहां आयोजन प्लेन में था। उत्तरांचल में तो  सब कुछ पहाड़ों में है। वहां तो पार्किग भी प्राय सड़क किनारे ही होती है।इस सब का प्रबंधं कैसे हो,  इसकी व्यवस्था अभी से बनानी होगी। 

दरअस्ल पिछले कुछ सालों देश में संपन्नता  बढ़ी है।अब पंजाब,  हरियाणा और दिल्ली एनसीआर के युवक रविवार और शनिवार का अवकाश देख शुक्रवार की शाम पिकनिक के लिए पहाड़ की ओर निकल जाते हैं।इसलिए पिछले कुछ साल में इन अवकाश के दिनों विशेषकर गर्मियों के मौसम  में उत्तरांचल के होटल पूरी तरह भरे होतें हैं। सड़कों पर वाहनों का रेला होता है। पहाडों के होटल भरे होने और सड़कें पर जाम की खबर अखबारों की सुर्खियां  बनती रहती हैं। ये ही गर्मी का मौसम चार धाम यात्रा का है।ऐसे में उत्तराचल सरकार को प्रयास करना होगा कि ये सैलानी चार धाम यात्रा के स्थल गढ़वाल न आए।उन्हें कुमायूं और अन्य पर्वतीय प्रदेशों की और भेजना होगा। इसके लिए अभी से प्रचार करना  होगा। जनता को जागरूक करना होगा और माहौल बनाना  होगा। 

अभी चार धाम यात्रा में दो माह का समय है। इसी समय में उत्तरांचल सरकार को तैयारी करनी है।भीड़ नियंत्रण का प्लान बनाना है। यात्रा के श्रद्धालु  और उनके वाहन के पार्किग की अभी से प्लानिंग करनी होगी। ये दो माह उसके लिए  युद्धस्तर पर कार्य करने और व्यवस्था बनाने के लिए हैं।  कुंभ यात्री के दौरान दिल्ली में हुए हादसे से रेलवे को सीख लेनी होगी।उसे भी बड़ी प्लानिंग करनी होगी।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Sunday, March 2, 2025

एनएच भी बनाइए, पेड़ भी बचाइए

 
अशोक मधुप
वरिष्ठ पत्रकार
केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद  देश में नेशनल हाई−वे  और एक्सप्रेस वे का निर्माण बड़ी तेजी के साथ शुरू हुआ।यह कार्य अनवरत जारी है। 2014-15 में जब केंद्र में भाजपा की सरकार बनी तो देश में कुल 97,830 किमी लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग थे। मार्च 2023 तक देश भर में अलग-अलग 145,155 किमी लंबे राजमार्ग हो चुके थे। ये कार्य निरंतर जारी है।राजमार्ग के साथ ही तेजी से जगह जगह स्टेट हाई वे और जिला मार्ग भी बन रहे हैं। इन मार्ग के  बनाने के लिए भारी संख्या  में सड़क के किनारे के पेड़ कट रहे हैं।कटने वालों पेड़ के  मुकाबले लगने वाले  वृक्षों की संख्या कम है।  सरकारी आंकड़े हैं कि लगने वाले वृक्षों लगभग 24 प्रतिशत मर जाते हैं।  ऐसे में आज जरूरत है कि किसी भी तरह का मार्ग बनाया जाए उसके किनारे के बड़े और पुरान पेड़ न काटें जांए  ।उन्हें दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया जाए ।
 लोक सभा में 22 जुलाई 2019 को दी गयी जानकारी में बताया गया था कि 2014 से 2019 के पांच साल के अंतराल में 1.09 करोड़ पेड़ काटने की अनुमति दी गई।सबसे ज्यादा अनुमति 2018 - 19 में 2691028 पेड़ काटने की दी गई। यह संख्या तो अनुमति लेकर काटे गए पेड़ों की है। मानना है कि इससे भी कई गुना पेड़ प्रति वर्ष बिना अनुमति लिए कट जाते हैं। ये काम उन अधिकारियों से मिलकर होता है, जो पेड़ों के कटान रोकने के लिए जिम्मेदार है। 13 दिसंबर 2021 को संसद में पेश किए गए एक लिखित जवाब के मुताबिक वित्त वर्ष 2016-17 से 2020-21 के बीच देश भर में वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत जितने पौधे लगाए गए थे, उसमें से 4.84 करोड़ पौधे खत्म हो गए.
उन्होंने दावा किया कि इन पांच वर्षों में कुल 20.81 करोड़ पौधे लगाए गए ।इसमें से 15.96 करोड़ पौधों को ही बचाया जा सका है। इस आधार पर यदि राष्ट्रीय औसत देखें तो प्रतिपूरक वनीकरण के तहत वन कटाई के बदले जितने पौधे लगाए जा रहे हैं, उसमें से 24 फीसदी पौधे तमाम कारणों से खत्म हो जाते हैं। एक पेड़ की कीमत  जानने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कमेटी की  रिपोर्ट के मुताबिक, किसी भी एक पेड़ की कीमत 74 हजार 500 रुपये प्रति सालाना हो सकती है । हर हर साल बीतने के साथ ही उसकी कीमत में ये राशि जुड़ जाती है।इस एक पेड़ की कीमत से हम अनुमान लाग सकते है कि प्रतिवर्ष लाखों पेड़ काट कर देश की कितनी बड़ी संपदा का हम दौहन कर रहे हैं।
व‌िकास के लिए जहां  पेड़ों का कटना जरूरी है वहीं समय की जरूरत कुछ और है । वनों का तेजी के साथ दोहन होने से पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। जलवायु  बदल रही है।सासों पर संकट बढ़ रहा है।पोल्यूशन बढ़ने के कारण आक्सीजन मिलना दुर्लभ होता जा रहा है।इसी से महानगरों में आदमी की आम आयू कम हो रही है।इसीलिए आज जरूरी हो गयाहै कि विकास के लिए पेड़ों को न काटा जाए।इन पेड़ों को काटने की जगह यदि इन्हें दूसरी खाली जगह पर ले जाकर लगाया जाए तो समस्या का निदान हो सकता है। कुछ जगह पर यह कार्य हुआ भी है। गाजियाबाद- दिल्ली  ऐलिवेटेड  रोड को बनाते समय 64 पेड़ उठाकर दूसरी जगह लगाए गए। उत्तराचंल में भी कईं साल पहले यह कार्य हुआ।इसके लिए हम यह कर सकतें हैं कि छोटे पेड़ काट दिए जाएं  किंतु बड़े पेड़ दूसरी जगह लगा दिए जाएं। पेड़ का लगाना बहुत सरल है। उसे देखरेख करना बड़ा करना बहुत ही कठिन है।
पेड़ों के दोहन में सरकारी नीति भी जिम्मेदार है। नियम है कि पेड़ के काटने के आवेदन के साथ -सा‌थ यह वायदा कराया जाता है कि आज कटे एक पेड़ की जगह दो पेड़ लगाएंगे । प्रति पेड़ काटने के लिए वन विभाग को दो सौ रुपया प्रति पेड़ सुरक्षा धन जमा करना होता है। पेड़ लगाकर वन अधिकारी को आप दिखा देंगे कि पेड़ लगा दिए तो सुरक्षा धन वापस हो जाएगा। आज के समय में दो सौ रुपये कोई मूल्य नहीं रखता । इसलिए कोई पेड़ लगाता नहीं। वन अधिकारी ये दो सौ रुपया सुरक्षा राशि जब्त कर लेते हैं। इस राशि से विभाग बरसात में वृक्षारोपण करता है। पेड़ लगवाने हैं तो हमें यह दो सौ की सुरक्षा राशि बढ़ाकर कम से कम पांच हजार करनी होगी। यह भी आदेश करना होगा कि दस साल से बड़े पेड़ कटेंगे नहीं। दूसरी जगह स्थानांतरित कर दिए जाएंगे।
एक बात और अवैध रुप से  पेड़ कटान  का दंड पांच हजार रुपया है। न पकड़े गए तो कुछ भी नहीं। पकड़े जाने पर वन अधिकारी खेल कर लेते हैँ। कटते सौ पेड़ हैं दिखाते दस है।इसी तरह से कम पेड़ की अनुमति लेकर ज्यादा पेड़ काटे जाने का प्रायः चलन है।किसान को  जरूरत के लिए अपनी भूमि से वृक्ष काटने की अनुमति हो किंतु अवैध रूप से पेड़ काटने पर एक पेड़ पर कम से कम 50 हजार रुपया जुर्माना और छह माह की सजा का प्राव‌िधान होना चाहिए।कोई भी सड़क या उद्योग का प्रोजेक्ट पास करने से पहले पूछा जाना चाहिए कितने पेड़ हैं?   दस साल से ज्यादा आयु के पेड़ की संख्या और उससे बड़े इन पेड़ों को किस जगह लगाया जाएगा इस योजना और बजट की जानकारी भी दें।  ऐसा करने  से हमको ज्यादा पेड़ नहीं लगाने पड़ेंगे। हमारी  भूमि भी  हरी  भरी रहेगी।
पर्यावरण के संरक्षण के लिए काम कर रहे जानकार बताते हैं कि पौधारोपण के नाम पर आमतौर पर सजावटी और विदेशी पौधे रोप दिए जाते हैं जो कम समय में बड़ा आकार ले लेते हैं लेकिन वे किसी भी दृष्टि से पर्यावरण के लिए लाभकारी नहीं होते। इस बात की निगरानी होनी चाहिए और साथ ही जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए कि काटे गए पेड़ों के स्थान पर ईमानदारी से पौधारोपण कर हरियाली को बरक़रार रखने की कवायद हो।पेड़ फलदार हों या परम्परागत भारतीय पेड़ लगे।पीपल ,वटवृक्ष,नीम,पिलखन,  साल, शीशम ,जामुन और आम जैसे वृक्ष प्रमुखता से लगाए जाएं।
अशोक मधुप
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Sunday, February 16, 2025

प्रयागराज की मस्जिदों में कुंभ यात्रियों को ठहरना नहीं बना अखबारों की लीड


अशोक मधुप
वरिष्ठ पत्रकार
अयोध्या में चल रहा महाकुंभ पूरी दुनिया आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. दुनिया के लोग इसके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहते हैं.ज्यादा से ज्यादा समझना चाहतें हैं. सबकी समझ में यह नही आ रहा कि कुंभ में करोड़ों तीर्थ यात्री क्यों अपने आप मात्र एक स्नान के लिए परेशानी झेलने, जान जोखिम में डालने के लिए चले आतें हैं. आसपास के श्रद्धालु आएं तब भी माना जा सकता है किंतु ये  तो पूरे भारत से आ रहे हैं.  इस मेले के लिए विदेशों में बसे भारतीयों में तो आकर्षण है ही,काफी दूसरे संप्रदाय और धर्म वाले भी रूचि रखते हैं.   सरकारी आंकड़ों के अनुसार तो अब तक इस मेले में 38 करोड़ से ज्यादा लोग आकर स्नान कर चुके हैं. पूजन कर चुके हैं. ये सब  पूर्ण लाभ कमा रहे हैं. सरकार का मानना है कि इस महाकुंभ में आने वालों की संख्या 40 करोड़ से ज्यादा हो सकती है.
महाकुंभ में उत्तर दक्षिण, पूरब पश्चिम के भेद को खत्म कर दिया. मेले में स्नान के लिए आने वाले आर्य भी हैं तो द्रविड़ भी हैं. सवर्ण भी आए तो दलितों ने भी आकर स्नान किया. पिछड़ी  जाति वालों  ने भी आकर त्रिवेणी स्नानकर पुण्य लाभ  अर्जित किया. कहीं कोई भेदभाव नहीं.कहीं कोई छुआछूत  नहीं. कोई विद्वेष नही. स्नान के समय दलित सवर्ण और पंडित का हाथ पकड़कर कहीं सहारा देता दिखाई दिया, तो  कहीं सवर्ण दलित की मदद करता नजर आया.कुंभ की श्रद्धा ने, सनातन की आस्था ने सब भेद−भाव  समाप्त कर दिया. भंडारे में सब एक ही पंक्ति  में बैठकर खाना खाते नजर आए.कुंभ को देखकर, कुंभ के श्रद्धालुओं को देखकर कोई ये नही मान सकता था कि जाति –पातिं,  छुआ −छूत और ऊंच −नीच में बंटा सनातन समाज  आपस में ऐसे भी मिलकर रह सकता है। यहां के लिए मौजू तो नही किंतु अल्लामा इक़बाल का  ये शेर फिट बैठता है− एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद व अयाज़, न कोई बंदा रहा और ना कोई बंदा नवाज़'.

 
इस महाकुंभ  में अधिकतर आने वाले तीर्थ यात्री भारत से तो थे ही, दुनिया भर के देशों से भी आए. अंग्रेज आये तो सिखों ने भी पूर्ण लाभ कमाया. मुस्लिम भी इस मेले में  शामिल होने के लिए पहुंचे. इस मेले में  आने वाली न अलग धर्म  से थे, नहीं जाति से. वे सब  सनातनी थे. ये सब वे थे, जिनकी सनातन धर्म ,सनातन मान्यताओं में आस्था है.
कुम्भ मेले में आने वाले को सुविधा और आराम उपलब्ध कराने में अयोध्यावासियों ने कोई कसर नही छोड़ी। उन्होंने होम स्टे के नाम पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को अपने घरों में टिकाया. भोजन कराया. परिवार के सदस्यों की तरह रखा. अयोध्या  के मुसलमान ने भी पूरी शक्ति और लग्न से इन कुंभ यात्रियों का स्वागत किया. सम्मान किया. उन्होंने श्रद्धालुओं के लिए गाइड का काम किया. उन्हें घाट तक पहुंचाने के लिए रास्ते बताएं. वाहन उपलब्ध कराये.इससे बड़ी बात क्या होगी कि प्रयागराज के  मुसलमानों ने श्रद्धालुओं की भारी संख्या देखते हुए अपनी मस्जिदों के दरवाजे इन सनातनी श्रद्धालुओं   के लिए खोल दिए. नमाज पढ़ने के लिए बिछाए सफ हटाकर श्रद्धालुओं के बिस्तर लगा दिए.मंस्जिदों में उनके आराम के लिए गद्दे बिछाए गए. ओढने के लिए कंबल का इंतजाम किया गया.नमाजियों के लिए की गई व्यवस्था कुंभ यात्रियों के लिए उपलब्ध करा दी गई. कुंभ यात्रियों के मस्जिदों में ठहरने के कारण इस दौरान मुसलमानों ने नवाज घर पर ही पढ़ना अच्छा समझा.इतना ही नहीं  मुस्लिम समाज ने मिलकर कुंभ यात्रियों के लिए भोजन की व्यवस्था की. लंगर चलाये. उन्होंने यह भी ध्यान रखा कि ये कुंभ की यात्री हैं ,इसलिए भोजन शुद्ध और सात्विक हो।ये तब हुआ जबकि कुंभ क्षेत्र में मुस्लिम का प्रवेश वर्जित था.
मेले में इतना सब हुआ, किंतु यहां प्रदर्शित किये किए गए सांप्रदायिक सौहार्द की खबरे नहीं बनी. बनी तो अंदर के पेज में दब कर रह गई. होना यह चाहिए था की ये खबरें मुख्य पृष्ठों  पर आतीं .मुख्य पृष्ठों के लीड बनती. लगता यह है कि हमारा मीडिया भी  कम्युनल हो गया. उसकी रुचि ऐसी खबरों में नहीं है.उसकी रूचि सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ाने  वाली खबरों में नही है. अगर थूक लगाकर खाना बनाने की खबर होती  तो वह   अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर प्रमुखता से  सजती. फलों पर थूक लगाकर स्टीकर चिपकाने की खबर भी, अखबारों के पहले पन्नों में ही प्रमुखता से जगह पातीं.दरअसल आज की मीडिया को चटपटी खबरें चाहिएं. उसे सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारा की खबरों से कोई लेना-देना नहीं है. 

चार धाम यात्रा हो या केदारनाथ यात्रा  सभी जगह मुसलिम श्रृद्धालुओं की सहायता करते मिलते है. हालाकिं ये सेवा के लिए पैसा लेतें है किंतु कहीं श्रद्धालुओं  को घोड़े उपलब्ध कराते हैं तो कहीं अपनी पीठपर लाद कर उन्हें दर्शन के लिए ले जाते हैं.लेखक को द्वारिका और सोमनाथ में मंदिर घुमाने वाले दोनों आटों के चालक मुस्लिम थे, किंतु  उनकी जानकारी स्थानीय हिंदुओं से ज्यादा थी.आटो चलाने के दौरान उनसे बातचीत में पता चलता था कि वे शानदार गाइड भी हैं.एक −एक स्थान के बारे में विस्तार से हमें बता भी रहे थे.हम भारतीयों के धर्म भले ही अलग हों कितुं संस्कृति एक ही है.जरूरत पड़ने पर सब अपना प्रेम और भाईचारा प्रदर्शित करते और एक दूसरे की मदद करते रहतें हैं.


मणिपुर का राष्ट्रपति शासन पार्टी की टूट रोकने में सहायक होगा



भाजपा ने मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगवा कर राज्य की पार्टी में पैदा हुए अंतर विरोध पर, पार्टी मेंविद्रोह के हालात को पूरी तरह से खत्म कर दिया। पार्टी के कई दिग्गजों द्वारा मुख्यमंत्री बनने के देखे जा रहे सपनों को तोड़ दिया। भाजपा ने पार्टी गठबंधन के कुछ दलों द्वारा विरोध की आवाज उठाने को भी एक तरह से चुप कर दिया। इसके साथ ही उसने मणिपुर की कानून व्यवस्था की समस्या के निदान का रास्ता अपने हाथ में ले लिया। इस निदान के लिए मणिपुर में चल रही राजनीति और तोड़फोड़ को विराम लग जाएगा। एक बात और है, लगता यह है कि  यहां की कानून व्यवस्था की हालत के सामने भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व कीपार्टी सरकार बनाने में रुचि नहीं रख रहा, उसकी रुचि समस्या के निदान में है आनहीं होगा ।उसे मणिपुर में शांति स्थापित करने के लिए पूरी शक्ति और प्रयास करने होंगे।
मणिपुर में भाजपा के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह  ने रविवार को  त्यागपत्र देकर पार्टी की टूटन तो बचाली, किंतु भाजपा के लिए नए मुख्यमंत्री का  चयन बड़ा  कठिन होगा,  उससे ज्यादा कठिन होगा वहां बने नए मुख्य मंत्री को सत्ता संभालकर वहां के हालात को  सही करना। राज्य की बिगडी कानून व्यवस्था को सुधारना उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। लगभग दो साल से  राज्य में  फैली हिंसा पर नियंत्रण पाना उसके सामने दातों चने चबाने जैसा होगा।  
मणिपुर की सीमा म्यांमार से लगीहै।आरोप लगते रहे हैं कि चीन यहां के आतंकवादी संगठन , यहां  के आदिवासी को पहले से ही भड़काता रहा है।मणिपुर में विवाद और जातिय संघर्ष की शुरूआत का कारण मणिपुर उच्च न्यायालय का 19 अप्रैल 2023 का आदेश रहा। इस आदेश में  राज्य के बहुसंख्यक मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिया गया था। हाई कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया था कि वह 10 साल पुरानी सिफारिश को लागू करे जिसमें गैर-जनजाति मैतेई समुदाय को जनजाति में शामिल करने की बात कही गई थी। इस आदेश के बाद राज्य में मैतेई समुदाय और कुकी समुदाय के बीच विवाद शुरू हो गया और धीरे-धीरे यह हिंसक रूप लेने लगा।
मणिपुर में 16 जिले हैं, लेकिन, पूरा राज्य दो हिस्सों में बंटा हुआ है।पहला इंफाल घाटी, दूसरा पहाड़ी जिले। इंफाल घाटी मैतेई बहुल इलाका है. वहीं,पहाड़ी जिलों में नागा और कुकी जनजातियों का वर्चस्व है। विशेष तौर पर चार पहाड़ी जिलों में कुकी समुदाय के लोगों का राज है। मणिपुर की आबादी लगभग 28 लाख है. इसमें मैतेई समुदाय के लोग लगभग 53 फीस दी हैं।मणिपुर के भूमि क्षेत्र का लगभग 10% हिस्सा इन्हीं लोगों के कब्जे में हैं।वहीं, कुकी समुदाय की राज्य में कुल आबादी30 फीसदी हैं. इसी समुदाय के द्वारा मैतेई समुदाय को आरक्षण देने का विरोध किया जाता रहा है। इसके पीछे इनकी दलील यह है कि अगर मैतेई समुदाय को आरक्षण मिलता है तो वे सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में दाखिले से वंचित हो जाएंगे। मैतेई लोग अधिकांश आरक्षण हथिया लेंगे। ज्ञातव्य है कि मैतेई समुदाय के द्वारा करीब 10 साल से राज्य सरकार से आरक्षण की मांग की जा रही है। मांग के पक्ष में फैसला नहीं आने के बाद मैतेई जनजाति कमेटी ने कोर्ट का रुख किया। कोर्ट ने इस मांग को लेकर राज्य सरकार से केंद्र से सिफारिश करने की बात कही है। 
इस सिफारिश के बाद ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन मणिपुर ने विरोध जताना शुरू कर दिया।इस आदेश के बाद राज्य में मैतेई समुदाय और कुकी समुदाय के बीच विवाद शुरू हो गया और धीरे-धीरे यह हिंसक रूप लेने लगा।मैतेई को एसटी का दर्जा दिए जाने के हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ आदिवासी छात्र संघ के तीन  और चार मई 2023 'एकजुटता मार्च'के दौरान इंफाल और कुकी बहुलजिलों में हिंसा भड़क उठी। मणिपुर सरकार ने अगले पांच दिनों के लिए पूरे राज्य में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को निलंबित कर दिया और आठ जिलों में कर्फ्यू लगा दिया।इंफाल में 4मई 2023 को भाजपा विधायक वुंगजागिन वाल्टे पर भीड़ ने हमला किया। इस दौरान करीब नौ हजार लोगों को हिंसा वाले क्षेत्र से निकाला गया। मणिपुर में जातीय हिंसा बढ़ने के वहां सेना को तैनात किया गया।राज्यपाल ने बढ़ती हिंसा के बीच देखते ही गोली मारने का आदेश जारी किए।हालत इतने खराब हुए कि आठ  मई 2023 को मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने बताया कि  कि,राज्य में जातीय संघर्षों में60निर्दोष लोगों की जान चली गई। 200 से अधिक घायल हो गए। इस जातीय हिंसा के कारण 35 हजार लोग बेघर हो गए। हिंसा में लगभग 1700 घर जला दिए गए,और पुलिस शस्त्रागार से 1041हथियार और 7460 राउंड गोला-बारूद लूट लिया गया।केंद्र सरकार ने मणिपुर में हिंसा की जांच के लिए गुवाहाटी हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस अजय लांबा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया। दस जून2023 को केंद्र ने विभिन्न जातीय समूहों के बीच शांति स्थापित करने के लिए मणिपुर के राज्यपाल और एन बीरेन सिंह के नेतृत्व में 51सदस्यीय शांति समिति का गठन किया।14 जून 2023 और 15 जून 2023 को मणिपुर की एक मात्र महिला मंत्री नेम्फा किपगेन के इंफाल स्थित सरकारी आवास में आग लगा दी गई। 15जून 2023 मेंमणिपुर में फैली जातीय हिंसा की आग के कारण राज्य की कानून-व्यवस्था की स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई। हिंसा की आग में विदेश राज्य मंत्री आरके रंजन का आवास भी जलकर खाक हो गया।हालत इतने खराब हुए कि मणिपुर में हथियारबंद भीड़ ने भाजपा नेताओं के घरों और कार्यालयों को निशाना बनाया। इंफाल में भाजपा मंडल कार्यालय को जला दिया गया. हालांकि,समय रहते सेना और रैपिड एक्शनफोर्स ने भाजपा कार्यालयों और पार्टी के मणिपुर प्रमुख और एक राज्य मंत्री के घर में आग लगाने के कई प्रयासों को विफल कर दिया. वहीं, 24 जून 2023 को भीड़ ने इंफाल पूर्वी जिलेके कांगला सांगोमसांग में मणिपुर के कैबिनेट मंत्री एल सुसिंड्रो के गोदाम और फार्महाउस को जला दिया।  चार  अगस्त 2023 को मणिपुरकी भीड़ ने आईआरबी (मणिपुर के बिष्णुपुर में द्वितीय भारत रिजर्व बटालियन (आईआरबी)मुख्यालय) से एलएमजी,मोर्टार,ग्रेनेड लूटे। 500 की भीड़ ने शस्त्रागार कोनिशाना बनाया और 298राइफलें,एसएलआर और एलएमजी के साथमोर्टार,ग्रेनेड और 16हजार से अधिक राउंड मिक्सडगोला-बारूद लूट कर फरार हो गए।
हालाकि न्यायालय ने अपने आदेश पर आरक्षण पर रोक लगा दी ,किंतु हालात उसके बाद भी सामान्य नही हुए।प्रदेश सरकार के नियआत्रण मेंहालत न देख मणिपुर कांग्रेस ने घोषणा की कि वह 10फरवरी को बीरेन सिंह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाएगी।  मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने नौ फरवरी 2025को राज्य में जातीय हिंसा भड़कने के करीब पौने दो साल बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया।नवंबर 2024 तक मणिपुर की जातीय हिंसा में 258 लोगों की जान जा चुकी है। राज्य को 60 हजार से ज्यादा लोगों को विस्थापित करना पड़ा।
खास बात यह रही कि 60 सदस्यीय मणिपुर विधानसभा में कई भाजपा विधायक अब सीएम बीरेन सिंह के कामकाज का खुलकर विरोध कर रहे हैं।वर्तमानमें 60 सदस्यीय सदन में सत्तारूढ़ भाजपा के 37विधायक हैं। हालांकि,बिरेन सिंह की चिंता तब शुरू हुई जबपिछले साल 19नवंबर को मुख्यमंत्री द्वारा बुलाई गई बैठक में कई विधायक शामिल नहीं हुए। छह विधायकों वाली एनपीपी जो भाजपा की सहयोगी थी,उसने पहले ही बीरेन सिंह से नाराजगी जताते हुए समर्थन वापस ले लिया है।दिलचस्प बात यह है कि एनपीपी प्रमुख और मेघालय के सीएम कोनराड के संगमा ने भी अपनी पार्टी के समर्थन के लिए पूर्व शर्त के रूप में बीरेन के प्रतिस्थापन की मांग की है।राज्य में शांति स्थापित करने में बीरेन सिंह सरकार की विफलता पर 10 कुकी विधायकों ने अपनी नाराजगी जाहिर की है,जिनमें से सात भाजपा के हैं।
अब बीरेन सिंह के त्यागपत्र के बाद राज्य के खराब हालात में भाजपा के लिए सर्व सम्मति  से मुख्यमंत्री का नाम तै करना बड़ा   चुनौती पूर्ण था। पार्टी के बड़े-बड़े छत्रप मुख्यमंत्री बनने के सपने देख रहे थे। प्रदेश पार्टी में गुटबन्दी कर रहे थे। तोड़फोड़ में लगे थे।राष्ट्रपति शासन लगने के बाद लगता है कि अब ये सब समाप्त हो जायेगा।अब केंद्र को यहां की समस्या का निदान करना सरल होगा।यहां के हालात से निपटना आसान होगा।

-अशोक मधुप
(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)