Tuesday, September 3, 2024

समय के पास भी नहीं कुछ सवालों का जवाब

 

 समय के पास भी नहीं कुछ सवालों का जवाब

अशोक मधुप

कुछ सवाल हैं ।मनमें आतें  हैं।उत्तर नही मिलता।इन सवालों का  जवाब न  इतिहास के पास है।न समय के पास।न मेरे पास  न आपके पास।पर सवाल तों हैं।

 हिंदू मान्यताओं के अनुसार, दीपावली के दिन ही भगवान राम 14 वर्षों के वनवास के बाद अपनी पत्नी सीता, भाई लक्ष्मण और अपने उत्साही भक्त हनुमान के साथ अयोध्या लौटे थे। यह अमावस्या की रात थी। अमावस्या की रात होने के कारण  काफी अंधेरा होता है। इसी वजह से उस दिन पूरे अयोध्या को दीपों और फूलों से श्री रामचंद्र के लिए सजाया गया था ।इसलिए   सजाया  गया था कि भगवान राम के आगमन में उन्हें कोई परेशानी न हो, तबसे लेकर आज तक इसे दीपों का त्योहार और अंधेरे पर प्रकाश की जीत के रूप में मनाया जाता है।कभी  अयोध्या में भगवान राम की विजय के बाद  आने पर दीप जले थे,  आज पूरी दुनिया के हिंदू परिवार में दीपावली पर दीप  जलते हैं।

उत्तर भारत का तो दीपावली  मुख्य  पर्व  है।

रावण से युद्ध के दौरान भगवान राम ने  अंगद का अपना  दूत बनाकर रावण के पास भेजा  था।भगवान राम चाहते थे। युद्ध   न हो  और  रावण  वैसे  ही उसे सीता को  सौंप दे।अंगद ने  रावण के दरबार में जाकर अपनी  बात रख  दी। अहंकारी रावण  यह मानने  को तैयार नही था,कि राम   उससे  ज्यादा शक्तिशाली हैं। वह अपनी शक्ति  का बखान  करने में लगा था। तब अंगद रावण  को सच्चाई  बताते कहता  है - सिंधु तरो उनको बनरा, तुसपै धनुरेख गई न तरी। बाँध्यो इ बाँधत सो न बँध्यो उन बारिधि बाँधि कै बाट करी। अजहूँ रघुनाथ-प्रताप की बात तुम्हैं दसकंठ न जानि परी। तेलनि तूलनि पूँछि जरी (जड़ी हुई, युक्त) न जरी ,गढ़, लंक जराई जरी।

वह कहता है  कि  उनका  बंदर  समुद्र पार कर लंका आ गया, और  तू  है कि तुझसे धनुष की लकीर ही पार न की गई।तू अपने बल का बखान करता है,  तुझसे तो उनका  बंदर ही बांध कर  नही रखा गया। वे भगवान राम समुद्र को लांघकर श्री लंका के द्वार तक  आ पंहुचे।अंगद कहता  है कि दशकंध  तुझे अब भी भगवान राम के प्रताप की बात  समझ में नही आई। तेरा  तेल लगा, कपड़ा  लगा।इसके बावजूद हनुमान  की पूंछ नही जली।उसने  तेरी  लंका को   जलाकर खाक कर दिया।

अंगद बार – बार रावण को   समझाना  चाहता  है किंतु वह अपने  और अपने सेनापतियों की ताकत का बखान  करता  है।  विवश  हो अंगद उसे  सीख  देने के  लिए अपना  पांव   यह कहकर रावण के दरबार में जमा देता है कि चल में  तेरे शूरवीरों की परीक्षा लेता  हूं। घोषणा  करता  हूं कि यदि तेरा  कोई भी सेनापति मेरा   पांव  जमीन से हिला  देगा तो मैं  सीता को हार जांऊगा  और भगवान राम   वापस  लौट जाएंगे। 

इसके बाद बारी −बारी से रावण के दरबारी शूरवीर आते  हैं। अंगद के पांव पर  जोर लागतें  हैं, किंतु पांव हिला  भी   नही पाते।महाबलि मेघनाथ भी   पांव  हिलाने के प्रयास में सफल हो जाता  है।रावण  के आने पर  अंगद   पांव हटा लेता है।

 रावण की सेना में एक से  एक− एक बलि,दैविक शक्ति  से प्राप्त  वीर थे।वे  किसी कारण से  पांव नही हटा पाए, किंतु यदि कोई भी   अंगद के   पांव को   हिला  देता ,तो  क्या  होताॽशर्त  हारने के बाद क्या अंगद   वापस भगवान राम के पास   जा पाता। भगवान राम ने तो  अंगद को कोई ऐसा आदेश दिया नही था। अंगद  ने  ही जोश  में  इस  तरह का निर्णय  लिया।  पराजित अंगद शर्म के कारण कहीं जा  छिपता ,  तो राम को  पता  भी  नही लगता  कि रावण  के दरबार में क्या  हुआ था।अंगद के   वापस  न   पहुंचने  पर राम और  अन्य मान लेते  कि हो  सकता है, गुस्से में रावण  ने  अंगद को   जान से मार दिया  होगा।

यदि किसी तरह शर्म और अपमान भूल अंगद  राम के पास  चला  जाता तो क्या  राम उसकी कही  बात मान   लेते।  उनका  तो   शर्त लगाने का  आदेश  था  नही,फिर  शर्त लगाना तो  अंगद की गलती थी, राम की नहीं।क्या वह सीता  को छोड़कर  वापस लौट जाते। लौटकर कहां जाते।क्या पत्नी को  गवांकर वे  अयोध्या   वापस   लौट पाते।क्या पत्नी गवांकर लौटने  पर उनका   वैसे  ही स्वागत  होता,  जैसे  लकां  विजेता होने  पर   उनका  हुआ है।   

विश्व के दो  महान युद्ध हुए। लगभग  सात   हजार साल पहले राम  और  रावण का युद्ध   हुआ।इसके बाद लगभग  पांच    हजार साल पहले  महाभारत हुआ।अंगद की तरह से भगवान कृष्ण भी हस्तिनापुर दरबार में सुलह का लगभग प्रस्ताव   लेकर गए थे।सुलह का कोई  रास्ता न  निकल  उन्होंने धृतराष्ट्र  से  कहा कि आधा शासन नही दे सकते  तो   पांच  गांव ही दे दें। इस पर दुर्योधन ने कहा था कि मैं सुईं  की नोक के बराबर भी भूमि नहीं दूंगा।यदि दुर्योधन पांच  गांव देने की बात स्वीकार कर लेता तो  क्या पांडव कृष्ण के इस प्रस्ताव   पर सहमत होते। क्योंकि उन्होंने तो कृष्ण  को आधा  राज लेने तक के प्रस्ताव पर  सहमति दी थी।ये सवाल  बार− बार मन में आते  हैं और अनुतरित  रह जाते  हैं।सवाल का  जवाब  तो समय ही देता।और अब तो  वह बहुत  आगे निकल गया।

दुनिया के दो महायुद्ध  हुए।  एक  राम −  रावण  युद्ध  दूसरा महा भारत। दोनों के काल में दो हजार साल के आसपास का  अंतर है किंतु दोनों की घटनाओं में काफी समानता  है।

रामायणकाल की मुख्य पात्र  सीता थी। वह मौन रहने वाली बहुत ही  सहनशील थीं। जबकि महाभारत काल की द्रोपदी  वाचाल थी।उसने अपने महल को  देखने  आए दुर्याधन को अंधे  का अंधा  कहकर आग में घी डालने का काम किया  था। सीता और द्रोपदी दोनों  ने बहुत सहन किया।अंतर यह है कि एक ने मौन रहकर और एक ने बोलते हुए सहन किया l दौपदी वाचाल है और सीता मौन हैं l द्रोपदी कृष्णा है सीता श्वेता है।द्रोपदी अग्नि से प्रकट हुई हैं इसलिए उनके व्यक्तित्व में अग्नि सी दाहकता है ।सीता में तितिक्षा है ।पृथ्वी की सहनशीलता और मौन रहकर सहन करना सीता का गुण है।

दोनों के लिए  स्वयंबर  हुए। भगवान राम को

स्वंयवर में  धनुष तोड़ना पड़ा। अर्जुन को बाण चढ़ाना मछली की आंख बेंधनी पड़ी।पिता के आदेश पर राम को  14 वर्ष के  लिए वनवास भोगना  पड़ा  और  जुए में हारने पर पांडव का 12 साल का  वनवास जाना   पड़ा।  11 साल के वनवास के साथ  एक साल का इसमें अज्ञात  वास भी शामिल था।

दोनों बार दूसरे पक्ष को समझाने के  लिए  शांति दूत भेजे  गए। दूत इस  तरह के व्यक्ति   चुने गए कि वह अपने व्यवहार से  अपने पक्ष  की शक्ति बताकर दूसरे पक्ष को नैतिक रूप से कमजोर कर सके।उनका  मौरल डाउन  कर सके। सीता की खोज में गए  हनुमान ने सीता  माता  को भगवान राम का संदेश देने के  बाद अपनी भूख  शांत करने के नाम पर अशोक वाटिका को  उजाड़  दिया।पकड़ने के लिए आए रावण के छोटे पुत्र  अक्षय कुमार को मार डाला।अक्षय कुमार की दरबार में पंहुची मौत की सूचना  पर मेघनाथ ने कहा  कि अक्षय  तो  मेरे बराबर बलशाली था। उसे कैसे  मारा  जा सकता  है।बाद में रावण के कहने पर मेघनाथ  बानर को पकडने  गए।  रावण ने आदेश दिया था कि  उत्पाती  बानर को  पकड़कर लाना।युद्ध हुआ। मेघनाथ  के ब्रह्मास्त्र  से  हनुमान बेहोश हो गए।  वह हनुमान को  बांध कर रावण के सामने ले  आया।

रावण अक्षय  कुमार के बद्ध से बहुत उत्तेजित था।   वह  हनुमान को  मारना  चाहता  था किंतु छोटे  भाई विभीक्षण ने रावण को सुझाया कि आप  नीतिवान है। नीति के अनुसार दूत  का वद्ध उचित नही, आप इसे कोई  दूसरा दंड  दे।  इस पर पूंछ जलाना तै  हुआ। हनुमान की पूंछ पर रूई, कपड़ा और  अन्य ज्वलनशील सामग्री बांध तेल डालकर आग लगा दी। पूंछ में आग लगते ही  हनुमान ने  बंधन  तोड़  डाले।लंका के भवनों पर चढ़ उन्हें  जलाना  शुरू कर दिया।इससे   लंका के राक्षस और रावण  के महाबलि में संदेश  गया कि जब एक बंदर इतनी बरबादी कर सकता है, तो  राम की पूरी सेना से  पार भी   पाना संभव न होगा।अंगद

द्वारा रावण  के दरबार में पांव  जमाना  भी   इसी तरह का  संदेश  देना था।रावण  के दरबार  का कोई  भी   सेनापति और वीर उनका  पांव  नही उठा पाया।महाबलि मेघनाथ भी   पांव उठाने के  प्रयास में  विफल  रहा। रावण के पांव उठाने के लिए आने पर अंगद ने  यह कहकर ही अपना  पांव पीछे कर लिया था कि मेरे पांव में  गिरने से कोई  लाभ  नही होगा, गिरना  है तो भगवान राम के पांव में जाकर गिरकर अपनी गलती के  लिए क्षमा मांगिए।

महाभारत में हस्तिनापुर दरबार में सुलह का प्रस्ताव लेकर गए कृष्ण  के सामने भी कुछ ऐसा ही    हुआ।दुर्योधन के उत्तेजित  होने और कृष्ण के बंदी बनाने के  आदेश पर भगवान कृष्ण  को  अपना   विशाल रूप दिखाना पड़ा।

अशोक मधुप

(लेखक  वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

संपादक  जी,

कुछ प्रश्न  हैं  जिनका  उत्तर न  इतिहास के पास  है  न समय के।दीपावली का  पर्व भगवान राम के श्रीलंका   विजय कर लौटने की खुशी में   मनाया  जाता  है। प्रश्न यह  है कि सुलह  का प्रस्ताव   लेकर  राम के दरबार में गया  अंगद रावण के सेनापतियों की परीक्षा लेने के लिए अपना पांव रावण  के दरबार में यह कहकर जमा  देता है कि यदि कोई तेरा वीर मेरे  पांव  को हिला  देगा तो मैं  सीता माता  को हार जाऊंगा। भगवान राम लौट जाएंगे।  रावण में दरबार में एक से एक बलि,शक्तिशाली और दैविक क्षमता संपन्न शूरवीर थे।यदि इनमें कोई भी   अंगद का  पांव  हिला देता,  तो  क्या भगवान राम बिना सीता  को लिए वापस आ जातेॽइन्हीं सवालों  पर ये लेख प्रेषित है। आशा है पसंद आएगा।

सादर

अशोक मधुप

व्हाटसएप नंबर 942215678,9675899803

Wednesday, August 28, 2024

आरक्षण खत्म करने की बात कौन करेगा?

आरक्षण खत्म करने की बात कौन करेगा?

अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार 

दलित और पिछड़े युवाओं के उत्थान के लिए लाया गया  आरक्षण अब सत्ता में पहुंचने माध्यम बनता जा रहा है। अलग −अलग राज्य में राजनैतिक दल जहां आरक्षण को  अपने  हिसाब से अदल − बदल रहे हैं, वही प्राइवेट सैक्टर में भी आरक्षण  लागू करने की कोशिश हो  रही है। कुछ राज्यों ने अपने यहां ये आरक्षण लागू किया पर वहां के हाईकोर्ट ने उसे  अवैध बताते  हुए रोक लगा दी, पर ये कोशिश  जगह –जगह जारी है। 

सर्वोच्च न्यायालय की सात न्यायधीश की संविधान पीठ आरक्षण में क्रीमीलेयर लागू करने की बात की तो  विपक्ष ने राजनैतिक लाभ उठाने के लिए इसका विरोध शुरू कर दिया। हालाकि प्रधानमंत्र नरेंद्र मोदी आश्वस्त कर चुके हैं कि आरक्षण में क्रीमीलेयर लागू नही होगा ,इसके बावजूद आरक्षण  समर्थक राजनैतिक दलों ने इसके विरूद्ध  आंदोलनरत हैं। अभी वे भारत बंद का आह्वान कर ही चुके हैं। इससे  पहले  कर्नाटक में प्राइवेट नौकरी में स्थानीय के लिए शत प्रतिशत आरक्षण को लागू करने पर खड़ा  हो गया। हालाकि प्रदेश कैबनेट में पांस किया गया ये कानून विरोध को देखते हुए ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है, पर खत्म नहीं किया गया। मुख्यमंत्री ने कहा है कि अगली केबनेट की बैठक में इसपर फिर विचार होगा।   

 हाल के लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण के आते –आते प्रचार आरक्षण पर आकर सिमट गया। भाजपा नेता  अपने भाषणों में दावा कर रहे है कि हम देश में मुस्लिम आरक्षण लागू नही होने देंगे।खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सभाओं में मुस्लिम आरक्षण पर चिंता जाहिर कर   रहे हैं। वह कह रहे हैं कि सत्ता में आते ही इंडिया गठबंधन  दलित और पिछडों का आरक्षण काटकर  मुस्लिमों को दे देगा।वे देश  का विभाजन करवा देंगे।इस पर कुछ बड़े नेता तो  चुप्पी साधे है किंतु समाजवादी पार्टी के सांसद एसटी हसन ने एक बयान में कहा है कि इंडिया गठबधंन के सत्ता में आते ही संविधान में संशोधन कर मुस्लिमों को  सरकारी सेवाओं में आरक्षण  दिया जाएगा। 

देश को आजाद हुए 75 साल से ज्यादा हो गए।आजादी के बाद दलित समाज को विकास की धारा में शामिल करने के लिए  दस साल के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी।आज ये आरक्षण राजनेताओं को सत्ता में पंहुचने का  माध़्यम नजर आने लगा है,  वे इसे बढ़ाने की बात कर रहे हैं।खत्म करने की नहीं। किसी को यह सोचने की फुरसत नही कि आरक्षण की मार से बचने के लिए देश के प्रतिभाशाली युवा आज विदेशों में जाकर शिक्षा ले रहे है। शिक्षा पूरी कर वहीं नौकरी या व्यवसाय  कर चुने गए देश के विकास में योगदान कर रहे हैं।भारत के बाहरर जाकर बसी भारत की मेधा से प्रभावित  होते देश के विकास पर किसी को सोचने का समय नहीं ।

प्राइवेट सेक्टर की नौकरियों में आरक्षण को लेकर कर्नाटक सरकार ने यूटर्न ले लिया है। सरकार ने पहले सी और डी कैटेगरी की प्राइवेट नौकरियों में स्थानीय लोगों को आरक्षण देने की बात कही थी। फिलहाल, आरक्षण के उस फैसले पर रोक लगा दी गई है। कैबिनेट ने फैसला स्थगित कर दिया है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने प्राइवेट सेक्टर में कन्नड़ लोगों को 100 फीसदी आरक्षण देने को लेकर सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट की थी। अपनी इस पोस्ट में उन्होंने कहा, हम कन्नड़ समर्थक सरकार हैं।सरकार के इस फैसले का चौतरफा विरोध होने पर इस पर रोक लगा दी गई। सरकार का कहना है कि इस बिल पर वह पुनर्विचार करेगी. देश में यह पहला ऐसा मामला नहीं है। 

कर्नाटक से पहले प्राइवेट सेक्टर में स्थानीय लोगों को आरक्षण देने के लिए आंध्र प्रदेश और हरियाणा में कोशिश की गई थी. वहीं, मध्य प्रदेश में भी सरकार ने ऐसा ही कहा था, लेकिन यह कोशिश रंग नहीं ला पाई थी। 2019 में आंध्र प्रदेश में पहली बार ऐसा कोई कानून बना था जहां 75 प्रतिशत स्थानीय लोगों को प्राइवेट नौकरियों में आरक्षण देने की बात कही गई थी। पर हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था। फिलहाल, ये मामला सुप्रीम कोर्ट में है।

महाराष्ट्र  में  2019 में शिवसेना-कांग्रेस और एनसीपी के गठबंधन की सरकार बनने के बाद प्राइवेट नौकरियों में स्थानीयों को 80 प्रतिशत  नौकरियां देने का प्रस्ताव लाया गया था। सरकार सरकार इसे विधानसभा में भी लाना चाहती थी। लेकिन इसे लाया नहीं गया।कर्नाटक में कई बार प्राइवेट जॉब में कन्नड़ों के लिए आरक्षण तय करने की कोशिश हो चुकी है। सिद्धारमैया सरकार में ये तीसरी बार है जब ऐसी कोशिश हो रही है। इससे पहले 2014 और 2017 में भी सरकार कोशिश कर चुकी है। वहीं अक्टूबर 2020 में येदियुरप्पा की अगुवाई में बीजेपी सरकार ने प्राइवेट नौकरियों में ग्रुप सी  और डी में 75  प्रतिशत  आरक्षण स्थानीयों को देने का ऐलान किया था। हालांकि, ये लागू नहीं हो सका था।

हरियाणा  में  2020 में तब की मनोहर लाल खट्टर की सरकार ने प्राइवेट नौकरियों में स्थानीयों को 75 प्रतिशत  आरक्षण देने के लिए कानून पास किया था। हाईकोर्ट ने पिछले साल नवंबर में इस कानून को रद्द कर दिया।झारखंड  में  दिसंबर 2023 में हेमंत सोरेन की सरकार ने सरकारी नौकरियों की ग्रुप तीन और चार  में स्थानीयों को 100 प्रतिशत  आरक्षण देने के मकसद से बिल पास किया था। ये बिल विधानसभा में पास हो गया था, लेकिन गवर्नर ने इसे लौटा दिया था।

आज के हालात का निष्कर्ष ये  है कि प्रत्येक दल आरक्षण की सीढ़ी से सत्ता में  पंहुचने के प्रयास में लगा है। उसे  उससे  वास्ता नही कि आरक्षण की जद में आने वाली प्रतिभांए इसे  लेकर क्या  सोचती हैं?

2012  में केंद्र सरकार प्रमोशन में आरक्षण का बिल ला चुकी है। संसद में बिल रखे जाने के दौरान एक सांसद द्वारा  मंत्री से छीन कर बिल की प्रति फाड़ दिए जाने के कारण ये अटक गया। नही तो प्रमोशन में भी आरक्षण लागे हो चुका होता।     

अब क्रीमीलेयर तै करने के बारे में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान  पीठ के आंदेश को वे ही ठेंगा दिखाने को तैयार हैं जो अब तक इससे  लाभ  लेते  रहे हैं। आरक्षण का लाभ  उठा चुके उच्च स्थिति में  पंहुचने वाले ही विकास की धारा से वंचित अपनी जाति  वालों के  लिए आरक्षण का लाभ छोड़ने को तैयार नही हैं।

आज हालत यह है कि सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ आदेश करे या कोई  अन्य  मांग हो, आरक्षण को कम करने को कोई  राजनैतिक  दल छोड़ने को तैयार नही। कोई  इसके खत्म करने की बात नही कर रहा।सब बढ़ाने की बात कर रहे हैं।आरक्षण के दायरे से बाहर की जाति और उसे युवा ये सब देख रहे हैं। अभी हाल में यूपीएससी में लेटरल एंट्री को लेकर हुए बवाल ने बाद सरकार ने 45 पदों पर लेटरल एंट्री का प्रस्ताव वापस लेना पड़ा। विपक्ष का कहना था कि सरकार आरक्षण खत्म करने की कोशिश कर रही है। विपक्ष आरोप  लगा रहा है, सरकार अपनी छवि बचाने को बार −बार पीछे हटती जा रही है। ऐसे में आरक्षण  से बाहर रह रही युवा पीढ़ी के भविष्य की किसी को चिंता  नहीं।आरक्षण समर्थक कोई नेता और राजनैतिक दल ये नही सोच रहा कि ये आरक्षण से बाहर रहे युवा   उनके बारे में क्या विचार और सोच  बना रहे हैं?  


Tuesday, August 6, 2024

बांग्लादेश के हालात से बहुत संतर्क रहना होगा

 

अशोक मधुप

 वरिष्ठ पत्रकार

 

बांग्लादेश में महीनों से सुलग रही आरक्षण और सरकार विरोधी चिंगारी सोमवार को भीषण आग के रूप में फूटी। 300 लोगों की मौत के बाद सेना भी उग्र भीड़ को संभाल नहीं पाई। नतीजतन करीब डेढ़ दशक से बांग्लादेश की सत्ता पर काबिज प्रधानमंत्री शेख हसीना को जान बचाकर देश से भागना पड़ा है।  शेख हसीना भागकर फिलहाल भारत आई हैं। सूत्रों का कहना है कि शेख हसीना लंदन जाने की तैयारी कर रही हैं। शेख हसीना ने इंग्लैंड की सरकार से शरण मांगी है।बांग्ला देश में हिंसक प्रदर्शन जारी है। अब प्रदर्शनकारियों ने देश के चीफ ऑफ जस्टिस के घर में घुसकर तोड़-फोड़ की है।  प्रदर्शनकारियों ने घर में मौजूद कार, फर्नीचर के साथ घर का सारा समान लूट ले गए हैं। प्रदर्शनकारियों ने सोमवार को ढाका में इंडिया कल्चर सेंटर पर हमला बोला। साथ ही काली व इस्कॉन समेत देशभर में कम से कम चार मंदिरों में भी तोड़फोड़ की गई है। बांग्ला देश के अल्प संख्यक डरे  और सहमें हैं। वहां क्या हालात बनेंगे? वहां  के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा कैसे होगी , इस पर भारत को नजर रखनी होगी। ये भी  देखना  है कि सरकार कैसी बनता है?  उसका भारत के प्रति नजरिया कैसा होगा? नई  सरकार कहीं इस्लामिक कट्टरवाद को बढ़ावा  तो नही देगी।उसका रूख  पाकिस्तान और चीन संमर्थक तो  नही होगा ? भारत को  अपने देश की सीमा को पूरी तरह बंद रखना  होगा, ताकि वहां के हालात से डरे नागरिक अपने भारत में न आ सकें।

1971 में बांग्लादेश को पाकिस्तान से आजादी दिलाने की लड़ाई में शामिल क्रांतिकारियों के परिवारों को सरकारी नौकरियों में दिए जा रहे आरक्षण को खत्म करने की मांग के साथ पिछले महीने विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ। बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण पर पहले ही अंतरिम रोक लगा दी थी। ऐसे में सवाल उठता है कि प्रदर्शनकारी आखिर फिर से इतने हिंसक होकर सड़कों पर क्यों उतर आए। असल में हिंसा की यह नई लहर तब शुरू हुई जब प्रदर्शनकारियों ने असहयोग का आह्वान किया। इसमें लोगों से कर या बिजली बिल का भुगतान न करने और रविवार को काम पर न आने का आग्रह किया गया। सोमवार को जब कार्यालय, बैंक और कारखाने खुले, तो प्रदर्शनकारियों ने लोगों को काम पर जाने से रोकना शुरू कर दिया। सेना ने प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए गोलियां चलानी शुरू कर दी। प्रदर्शनकारियों ने एक दिन पहले लगाए गए कर्फ्यू की परवाह किए बिना ढाका में प्रधानमंत्री आवास पर धावा बोल दिया।  प्रदर्शनकारियों ने ढाका के शाहबाग इलाके में स्थित एक प्रमुख सार्वजनिक अस्पताल बंगबंधु शेख मुजीब मेडिकल यूनिवर्सिटी पर हमला किया है। प्रदर्शनकारियों ने जगह-जगह सत्तारूढ़ पार्टी के कार्यालयों व वाहनों में भी आग लगा दी।

सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण पर रोक के बावजूद   प्रदर्शनकारी  प्रधानमंत्री शेख हसीना इस्तीफे पर अड़े रहे। 14 जुलाई को बतौर प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा था, स्वतंत्रता सेनानियों के पोते-पोतियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।। इस पर  प्रदर्शनकारियों ने कहा कि क्या आरक्षण का लाभ रजाकारों के पोते-पोतियों को मिलेगा। प्रदर्शनकारी छात्रों ने इस बयान के बाद, ‘तुई के, अमी के रजाकार, रजाकार’ के नारे लगाने शुरू कर दिए और हिंसा ज्यादा भड़क गई।


बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना द्वारा गठित रजाकार क्रूर अर्धसैनिक बल था। रजाकारों ने मुक्ति संग्राम में शामिल स्वतंत्रता सेनानियों और आम लोगों के खिलाफ अत्याचार किया। आज भी यह शब्द वहां अपमानजनक माना जाता है। इसका इस्तेमाल देशद्रोहियों और अत्याचारियों के लिए किया जाता है।

बांग्लादेश में उथल-पुथल व तख्तापलट का इतिहास 1975 से शुरू होता है।हसीना के पिता और देश के पहले  प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर रहमान की उनके परिवार के ज्यादातर सदस्यों की हत्या कर दी गई। जनरल जियाउर रहमान ने सत्ता पर कब्जा किया।1981 गेस्ट हाउस में घुसकर विद्रोहियों ने जियाउर रहमान की हत्या की। हालांकि, सेना का बड़ा तबका वफादार होने से तख्तापलट नाकाम रहा।1982 रहमान के उत्तराधिकारी अब्दुस सत्तार को हुसैन मुहम्मद इरशाद के नेतृत्व में सत्ता से बेदखल कर दिया गया। इरशाद राष्ट्रपति बन गए। 2007 सेना प्रमुख ने एक कार्यवाहक सरकार का समर्थन किया, जो 2009 तक सत्ता पर काबिज रही।2009 अर्धसैनिक बलों का विद्रोह.. में 70 लोगों की हत्या, इनमें से अधिकांश सैन्य अधिकारी थे।2012 सेना ने कहा, शरिया या इस्लामी कानून से प्रेरित तख्तापलट के प्रयास को विफल कर दिया है।

स्पष्टतौर पर बांग्लादेश में सुलग रही हिंसा के केंद्र में आरक्षण है। बांग्लादेश की जनसंख्या17 करोड़ है और देश में लगभग 3.2 करोड़ युवा बेरोजगार हैं।1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में शामिल लोगों के वंशजों को मिल रहे आरक्षण को खत्म करने के लिए छात्र मांग कर रहे हैं। इसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में शामिल रहे लोगों के वंशजों को 30 फीसदी आरक्षण दिया जाता है। 10 फीसदी आरक्षण महिलाओं के लिए भी है।
 
अल्पसंख्यकों को धर्म के आधार पर पांच प्रतिशत व विकलांगों को एक फीसदी आरक्षण का प्रावधान है। पिछड़े जिलों में रहने वालों को 10 प्रतिशत  आरक्षण मिलता है।बांग्लादेश में बेरोजगारी से परेशान युवक इस आरक्षण का विरोध कर रहे हैं।

 बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वकार, हसीना के रिश्ते में बहनोई हैं।सेना प्रमुख जनरल वकार वहां  सबसे अहम चेहरा बनकर सामने आए हैं। उन्होंने ही शेख हसीना के देश छोड़कर जाने और इस्तीफे का एलान किया। 20 दिसंबर, 1985 को बांग्लादेश की सेना में शामिल हुए जनरल वकार की छवि एक बेहद अनुशासित अधिकारी की रही है। जानकारों का मानना है कि हसीना का बांग्लादेश छोड़कर जाना और वकार का कमान संभालना एक सोचा-समझा निर्णय है। शेख हसीना के देश छोडने के बाद देश के सेना प्रमुख ने कहा है कि वो सभी से बातचीत करके देश में अंतरिम सरकार बनवाएंगे!बांग्लादेश में तख्तापलट से पहले सत्तारूढ़ रही आवामी लीग पार्टी ने आरोप लगाया है कि देशव्यापी हिंसक प्रदर्शन के पीछे बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) का हाथ है। आवामी लीग के मुताबिक आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे की मांग दिखाती है कि विरोध-प्रदर्शनों के पीछे असल में छात्र नहीं, देश के मुख्य विपक्षी राजनीतिक दल- बीएनपी और प्रतिबंधित संगठन- जमात-ए-इस्लामी की रणनीति है। इनका मकसद किसी भी तरह से देश की सत्ता हासिल करना है।

बांग्लादेश में देशव्यापी आंदोलन के कारण राजनीतिक अस्थिरता का माहौल है। देश के राष्ट्रपति ने कहा है कि संसद भंग कर अंतरिम सरकार बनाई जाएगी। राष्ट्रपति ने   विपक्षी नेता खालिदा जिया को रिहा करने का आदेश दिया है। खालिदा जिया विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की प्रमुख हैं और 1991-96 और 2001-06 के दौरान दो बार प्रधानमंत्री रह चुकी हैं।राष्ट्रपति बोले- खालिदा जिया की रिहाई के बाद अंतरिम सरकार का गठन  होगा।

बांग्लादेश के प्रदर्शनकारी नेताओं ने सोमवार को छात्रों से यह सुनिश्चित करने का आह्वान किया कि प्रधानमंत्री शेख हसीना के पद से हटने के बाद देश में पैदा हुए हालात में किसी को भी लूटने का मौका न मिले, और उनसे अपनी मांगें होने तक शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का आग्रह किया।

बांग्लादेश में उथल-पुथल के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में सुरक्षा पर कैबिनेट समिति की बैठक हुई है। जिसमें विदेश मंत्री एस. जयशंकर प्रधानमंत्री मोदी के पड़ोसी देश के हालात पर जानकारी दी है।देखना  यह है कि बांग्ला देश में अब किसकी सरकार  बनती है।उसका भारत के प्रति रूख कैसा  होता  है?नई  सरकार  भारत समर्थक होगी या कट्टर इस्लाम का रास्ता स्वीकार कर पाकिस्तान को अपना आका मानेगी।हालाकि बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वकार शेख  हसीना के नजदीकी और रिश्ते में बहनोई लगतें हैं  ।उनसे उम्मीद है कि बांग्ला देश शेख  हसीना के पद चिंहों  पर चलेगा, किंतु वहां के राष्ट्रपति का रूख अभी  देखना होगा।उसी रूख के आधार पर भारत को  अपनी नई नीति बनानी होगी।

अशोक मधुप

( लेखक  वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Monday, July 29, 2024

पुस्तक समीक्षा नॉवल नौलखी कोठी हिंदी अनुवाद


अनुवादक : डा. रख्शंदा रूही मेहदी

समीक्षा : अशोक मधुप

 

अली अकबर नातिक़ का नौलखी कोठी विभाजन -पूर्व पंजाब में उर्दू में लिखा गया  उपन्यास है। इसकी कहानी  विलियम के इर्द-गिर्द घूमती है। ये उपन्यास एक बीते  समय की  कहानी  है।जो पुरानी यादों से भरी हुई है।

 

56 अध्यायों और 581  पेज के इस उर्दू उपन्यास का अनुवाद प्रसिद्ध  उर्दू  लेखिका और कहानीकार डा. रख्शंदा रूही मेंहदी ने किया है।

कहानी पंजाब की  पृष्ठ भूमि पर है। यह ब्रिटिश भारत में शुरू होती है। विभाजन से पहले के वर्षों में चलती है और उन्नीस-अस्सी के दशक के आसपास समाप्त होती है। उपन्यास  हमें इस जगह की जीवंत संस्कृति से रूबरू कराता है। पूरा ग्रामीण पंजाब क्षेत्र के हमारे सामने चित्रित  हो उठता है।

नौलखी कोठी  में तीन कहानी एक साथ चलती हैं। विलियम इंग्लैंड से पढ़कर  आठ साल बाद भारत लौटता है। उसे जलालाबाद का सहायक आयुक्त नियुक्त किया जाता है।  विलियम रेगीस्तान बने जलालाबाद को हरा भरा–करने की कोशिश में लगता है किंतु  पंजाब के गांवों में मुसलमानों और सिखों के बीच के झगड़े उसके कार्य में व्यवधान पैदा करते हैं।वह ब्रिटिश प्रशासकों की भूमिका के दायरे में  कानून और व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश करता  है। पूर्वी पंजाब के जलालाबाद में सहायक आयुक्त के रूप में काम करने के दौरान  वह अपने दादा द्वारा बनवाए गए बंगले, नौलखी कोठी में बसने  का सपना देखता था। विलियम को कठोर आयुक्त हैली द्वारा चेतावनी दी जाती है कि स्थानीय लोगों के प्रति उसका व्यवहार और नरमी हिंदुस्तान में रहने वाले किसी भी ब्रिटिश अधिकारी के लिए अच्छी नहीं है। उनसे कहा गया कि वे शासक और शासित के बीच दूरी बनाए रखें तथा न्याय करते समय स्वयं को गलत करने वाले और अन्याय का शिकार हुए व्यक्ति से दूर रखें।

जलालाबाद में चार साल तक तैनात रहने के दौरान विलियम ने कई क्रांतिकारी कदम उठाए। उन्होंने इतनी लगन से काम किया कि वे इस इलाके की सूरत ही बदल देने में कामयाब हो गए। शिक्षा का स्तर पंजाब की सभी तहसीलों  से कहीं आगे निकल गया था । उन्होंने एक नई नहर और कई अन्य छोटी-छोटी धाराएँ भी बनवाईं। इसके परिणामस्वरूप, तहसील में पानी की भरपूर आपूर्ति होने लगी और गेहूँ, चावल और मक्के की फ़सलें भरपूर मात्रा में पैदा होने लगीं।लोगों के चेहरों पर एक सामान्य खुशहाली दिखने लगी। कई उतार-चढ़ावों के बाद, बार-बार तबादलों के बाद और युद्ध छिड़ जाने के बाद, उन्हें एहसास हुआ कि एक बड़ी साज़िश चल रही थी जिसमें हिंदू, मुसलमान और अंग्रेज़ सभी ने मिलकर उनके खिलाफ़ हाथ मिला लिया था। उपन्यास के अंत में अपनी पूर्व ब्रिटिश शान और शक्ति से वंचित होकर नौलखी कोठी में एकाकी जीवन जी रहा है।  उसकी पत्नी और बच्चे उसे छोड़कर इंग्लैंड वापस चले गए। लेकिन जल्द ही उसे उस जगह से भी निकाल दिया गया । वह पास की एक नहरी कोठी  में रहने  लया, और अंत में वह एक कंगाल और लावारिस की तरह मर गया।

विलियम गाँव की मस्जिद के मुख्य इमाम करामत अली को स्कूल में छोटे बच्चों को उर्दू− फारसी पढाने के लिए  40 रूपये  माहवार तन्खवाह पर मास्टर रख देता है। इससे  पहले कयायत  मुश्किल से अपना गुजाराकर पाता था।गाँव के गरीब लोग जो मुश्किल से अपना गुजारा कर पाते थे, उन्हें वेतन नहीं दे पाते थे, बल्कि उन्हें रोज़ाना रोटियाँ देते थे। धीरे− धीरे  मौलवी की किस्मत चमकती है। धीरे-धीरे उनका बेटा फ़ज़ल दीन एक परिपक्व और समझदार सरकारी बाबू बन जाता है  । गवर्नर हाउस में दो साल काम करने के बाद फ़ज़ल दीन के पास अपनी ज़मीन खरीदने और घर बनाने के लिए काफ़ी पैसे थे। विभाजन के बाद फ़ज़ल दीन का काम काफ़ी बढ़ गया और फ़र्जी संपत्ति के दस्तावेज़ तैयार करने के लिए पर्याप्त साधन होने के कारण वह भ्रष्टाचार में फंस गया और उसने काफ़ी धन इकट्ठा कर लिया।

 

कहानी में सबसे महत्वपूर्ण पहलू मुसलमानों और सिखों के बीच निरंतर दुश्मनी है।  शेर हैदर क्षेत्र का जमींदार था, उसे सरदार सौदा सिंह और उसके आदमियों ने सरे आम मार डाला शेर हैदर के बेटे गुलाम हैदर को उसकी प्रजा और रिश्तेदारों ने नया उत्तराधिकारी बनाया। दो प्रतिद्वंद्वी धार्मिक समूहों के बीच हुई कई घटनाओं, लूटपाट और लड़ाई के बाद, उनकी किस्मत में उतार-चढ़ाव आते रहे जबकि आम ग्रामीण पीड़ित होते रहे। हत्या का आरोपी सिख नेता अभी भी आज़ाद था । गुलाम हैदर खुलेआम हथियारों के साथ घूमकर अपनी वीरता दिखाई।सिख नेता के साथ  उसके साथियों का भी कत्ल कर दिया। दस साल फरार रहा।इस दौरान फांसी की सजा हो गई किंतु मुस्लिम लीग के नेता क़ाईदे आजम जिन्ना की शिफारिश  ने उसकी फांसी ही माफ नही हुई,अपितु जब्त की गई  सारी संपत्ति उसे  वापिस मिल गई।

इस उपन्यास में लेखक  कथानक को पूरे उपन्यास में इतनी शानदार ढंग से पिरोया है, उसके साथ न्याय करना मुश्किल है। विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश शासकों के सामने आई समस्याएं, भारत छोड़ो आंदोलन के साथ देश में बदलते समीकरण, स्वतंत्र पाकिस्तान के लिए जिन्ना की नीति, मुस्लिम लीग की भूमिका, हिंदुस्तान छोड़कर अंग्रेजों का चुपचाप पलायन, विभाजन का विचार जिसने चुपचाप आबादी को चीरना शुरू कर दिया था, विभाजन की आधिकारिक घोषणा के बाद शरणार्थियों का प्रवाह, पलायन - इन सभी का भी कथा में विस्तृत उल्लेख है।

अली अकबर नातिक़ की अनूठी कथा शैली और डा. रख्शंदा रूही मेहदी का अनुवाद जो उर्दू कहानी के करीब रहता है और क्षेत्रीय बोली के साथ उर्दू के स्वाद को बनाए रखता है। उपन्यास सरल भाषा –शैली में होने के बहतु ही रोचक और पठनीय है।पूरे उपन्यास में पात्रों और घटनाओं का बहुत विस्तृत विवरण पाठक पर एक शानदार दृश्य प्रभाव पैदा करता है। नातिक़ ने अध्यायों को इस तरह से जोड़कर कहानी के कुशलता से पिरोया है कि उपन्यास पढ़ते वे हमारी आँखों के सामने नजर आते हैं। उपन्यास की मोटाई को देखकर एक बार  डर लगता है किंतु जब पढ़ना शुरू  हो  जाता है  तो  पाठक उसे खत्म करके ही रूकता है। उपन्यास पाठक को पूरे समय  अपने  से जोड़े  रखता है और   उसे  कहीं बोर नही होने देता ।

 

शीर्षक: नौलखी कोठी (उर्दू उपन्यास)

 

लेखक: अली अकबर नातिक़

अनुवादक : डा. रख्शंदा रूही मेहदी

प्रकाशक : रेख्ता पब्लिकेशन नोयडा, उत्तर प्रदेश

समीक्षक: अशोक मधुप