Tuesday, January 25, 2011

राष्ट्रीय मतदाता दिवस

आज राष्ट्रीय मतदाता दिवस है। चुनाव आयोग के निर्देश पर देख भर में रैली निकालकार और इेंेश्तहार पोष्टर आदि के द्वारा मतदाताओं को जागरूक करने का अभियान चलाया जाएगा। मतदाताओं को शपथ दिलाई जाएगी कि वह जागरूक हों और निर्भिक होकर देश के विकास के लिए योगदान करें।
देश का लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता का महत्वपूर्ण स्थान है। उसके मत के द्वारा प्रदेश और केंद्र की सरकार बनती है। वही आम आदमी को विधान सभा और संसद का सदस्य बनाकर प्रदेश और केंद्र के सर्वोच्च सदन में बैठाता है।
विधायक और सांसद बनाने का उसका अभिप्रायः यह है कि वह जाकर अपने क्षेत्र के विकास की योजना बनवा कर उनका लाभ मतदाता तक पंहुचना सकें। क्षेत्र में शिक्षा ,स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर पैदा कराने के लिए काम करें। गांव गांव तक स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था कराना और सड़कों का जाल बिछाना भी, बिजली की उपलब्धता उनके कार्य क्षेत्र का हिस्सा है। उसके यह कार्य भी है कि वे व्यवस्था बनवाएं कि उनके क्षेत्र में ठंड ,भूख और उपचार के अभाव में किसी की मौत न हो। इसके लिए शासन ने
विधायक और सांसद निधि की व्यवस्था भी की। हुआ इसका उल्टा, जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि अपने को सरकार समझ बैठे और क्षेत्र के विकास एवं नागरिकों के विकास की जगह अपना पेट भरने और परिवार , रिश्तेदार नाती पोती का विकास कराने उनकी बेरोजगारी मिटाने में लग गए। विधायक और सांसद निधि उनके अपने लिए प्रयुक्त होने लगी। अधिकांश नेताओं ने स्कूल खोल लिए और
विधायक और संसद निधि से उनका विकास करने लगे। क्षेत्र के विकास की प्राथमिकता गौण हो गई। अपने और अपने परिवार का विकास आगे आ गया। क्योंकि नेता ने मान लिया कि अब पांच साल तक वह कहीं जाने वाला नहीं है। इसके बाद का पता नही अतः जितना अपना विकास संभव हो कर लिया जाए। संविधान बनाते समय हमने यह नहीं सोचा कि यदि हमारा जनप्रतिनिधि नाकारा निकल जाए या अपराध में लग जाए, जन विरोधी काम करने लगे तो उसे वापस बुलाया जा सकें। यदि यह व्यवस्था होती तो आज जितनी गंदगी राजनीति में आई है, इतनी शायद न आ पाती। देश में फैले भ्रष्टाचार भाई भतीजावाद से आज आम आदमी निराश हुआ है। बेइमानी रिश्वत खोरी के आगे उसकी समस्यांए नजर अंदाज हो रही हैं। सड़के बिल्डिंग पुल बनते बाद में है,टूट पहले जाते हैं। गुंडो बेइमानों मवालियों के सत्ताधारियों से गठजोड़ और अपनी सही समस्या का निदान न होते देख उसने वर्तमान हालात को अपनी नियति समझ लिया और निराश होकर घर बैठना बेहतर समझा। वह देखता है कि चुनाव होने से कोई फर्क नहीं पड़ना। सांपनाथ की जगह नागनाथ को ले लेनी है। बेरोजगारी भ्रष्टाचार ऐसे ही बने रहेंगे जैसे है। तो फिर क्यों वोट डाला जाए।
आज देश का आम नागरिक अपनी समस्या से जूझ रहा है और वोट देने को वह फालतू का काम मानता है। यही नहीं उच्च सेवाओं नौकरियों एंव उद्योगों में कार्य करने वाले वोअ डालने के दिन को घर में रहकर आराम करने के दिन के रूप में मनाना जयादा बेहतर समझते हैं। ये सम रहे है कि इनके वोट देने से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है।
ऐसे निराशा के माहौल में इन प्रकार के आयोजन एक सरकारी आयोजन ही बनकर रह जाते हैं। आम आदमी की भागीदारी नही हो पाती।
अशोक मधुप

1 comment:

योगेन्द्र पाल said...

सर आप लिख तो बहुत अच्छा रहे हैं, पर आपकी पोस्ट पर कोई कमेन्ट नहीं है और वो इसलिए क्यूंकि लोग आपके ब्लॉग को नहीं पढ़ रहे हैं.

और पढ़ इसलिए नहीं रहे हैं क्यूंकि उनको आपके ब्लॉग के बारे में जानकारी नहीं है, आपने अपने ब्लॉग को किसी भी एग्रीगेटर में जमा नहीं किया है|

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