Saturday, June 20, 2026

बीस दिन में 500 करोड़ का बिजनेस अशोक मधुप

 

 


ashokmadhup@gmail.com

15 अगस्त बीत गया।प्रधानमंत्री का हर घर तिंरगा अभियान बड़ी  कामयाबी के साथ संपन्न हो गया। कामयाबी के साथ  संपन्न  ही नही हुआ, बल्कि  20− 25 दिन के  इस अभियान में देश  ने 500  करोड़ रूपये का  व्यवसाय किया। पर कुछ हैं  जो  प्रत्येक काम में खराबी निकालते हैं।  गलती ढ़ूंढते  है।  उनका काम ही कमी निकालना है।  व अच्छा  सोच  नही सकते। अच्छा देख नही सकते। सा ही इस अभियान के साथ  हुआ। पहले उनका कहना था कि इतने झंडे  एक साथ कैसे बनेंगे कैसे तैयार होंगेअब उनकी परेशानी है कि घरों पर फहराए झंडो का  क्या होगाउन्हें  संभाल कर कैसे   रखा जाएगा।इन्हें प्रत्येक कार्य में कमी निकालनी है, निकालेंगे।अब इन्हें कौन समझाए कि जाड़े खत्म होने पर हम जाड़ो में प्रयुक्त हुए कपड़े अगले  साल में इस्तेमाल करने के लिए क्या  संजोकर नहीं रख देते    क्या गर्मी के कपड़े  जाड़े  आने पर संदूक या अटैंची में नही चले  जाते। ये तो मात्र  एक झंडा है।

सारा  विपक्ष मिलकर नरेंद्र मोदी बनना   चाहता है। वह मोदी बनना चाहता है।  मोदी को समझना  नही चाहता।  मोदी को समझे और अच्छी  तरह जाने बिना  तो  नरेंद्र मोदी नही बना    जा सकता। पिछले  आठ साल के कार्यकाल में नरेंद्र मोदी ने लोगों में राष्ट्रीयता  की भावना बलवती की। देशभक्ति की भावना को मजबूत किया।उसी का परिणाम है नोटबंदी हो या  जीएसटी लागू करना,  लागू करते के समय ही कुछ शोर मचा।  उसके बाद सब  सामान्य हो गया।विपक्ष और निगेटिव सोचने  वालों ने बहुत हंगामा  काटा,  पर सब सामान्य  हो गया।अगली बार चुनाव में नोटबंदी से परेशान जनता और जीएसटी से पीड़ित व्यापारी ने नरेंद्र मोदी पर फिर विश्वास जताया।उन्हें बहुमत के साथ दूसरी बार भी  प्रधानमंत्री बनाया।   सा ही  कोराना  वैक्सीन के   तैयार होने पर हुआ। किसी ने वैक्सीन को मोदी −पानी बताया तो किसी ने उसे नुकसानदायक कहा।   देश के बड़े  गणितज्ञ कह रहे थे इतनी आबादी को  वैक्सीन कैसे  लगेगीइसमें तो बहुत साल लगेंगे। जबकि आज एक सिंतबर तक पूरे देश में दो अरब  12 करोड़ 52 लाख 83 हजार 253  वैकसीन के डोज  लग गए। कैसे इतना हो गया अब हो गया तो चुप्पी साधे हैं।

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  काफी समय से लोकल फार वोकल पर जोर दे रहे हैं। उनका ध्यान  इसी पर है। तिंरगा  अभियान को हम इसी से जोड़कर देखें।  पता चलेगा कि हर घर तिरंगा अभियान से देश भर में इस बार 30 करोड़ से अधिक राष्ट्रीय ध्वज की बिक्री हुई। लगभग 500 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ ।कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAT )ने कहा कि राष्ट्रभक्ति और स्व-रोजगार से जुड़े इस अभियान ने कोआपरेटिव व्यापार के लिए संभावनाएं खोल दी है। कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीसी भरतिया ने बताया कि देश के लोगों की तिरंगे की अभूतपूर्व मांग को पूरा करने के लिए लगभग 20 दिनों के रिकॉर्ड समय में 30 करोड़ से अधिक तिरंगे का निर्माण किया। इससे  लगभग  500 करोड़ का नया व्यवसाय हुआ। वह व्यवसाय जो  अब तक बहुत कम था।आलोचना  करने वाले इस अभियान के उज्जवल पक्ष का नही देख रहे।  ये  नहीं देख  रहे कि प्रधानमंत्री के  एक आह्वान पर एक झटके में पांच सौ करोड़ रूपये  का व्यवसाय  हो  गया।झंडा बनाने के काम में लोगों को कितना  लाभ  हुआ। कितने हाथों काकाम मिला। कितने घरों के बच्चों के खिलौने  और खरीदे गए।  इस घर−  घर झंडा अभियान से   पहले कोई  सोच भी नही सकता था कि झंडा बनाने का व्यवसाय इतना  बड़ा भी     हो सकता है।  क्या  इससे  पहले कभी  इस तरह का  आह्वान हुआ है।  पूर्व प्रधानमंत्री  लालबहादुर  शास्त्री ने पाकिस्तान संघर्ष के समय एक दिन अन्न  न खाने का  आह्वान  किया था।  इसका  इस तरह  का  असर जरूर दिखाई  दिया था।  उसके बाद नहीं।

मुझ  एक साधु का किस्सा  याद आता  है।  इसके आश्रम के पास का रहने वाला एक किसान उसके  पास आया।  बोला थोड़ी सी जमीन है। छह माह बाद बेटी की शादी है। प्रभु  कृपा करो।  साधु  ने कहा   समय है।  पूरी जमीन में  लौकी का बीज लगा दे। जब तैयार हो जाए तो बता देना।किसान ने एक दिन साधु को यह बताया कि  की लौकी की फसल तैयार है। उन्होंने भक्तों से कहा कि कल जब आश्रम आओं तो अपने  सामने की तोड़ी एक− एक  लौकी लेकर  आना ।  सा ही  हुआ किसान की सारी लौकी बिक गई।  भक्तों की लाई लौकी से  इस दिन आश्रम में सब्जी बनी। आश्रमवासी और भक्तों के लौकी खाने से किसान की मदद भी  हो गई। किसी को खबर भी  नही हुई।माना की मोदी साधु नही है।   सन्यासी नही है। किंतु  इनके एक जरा  से प्रयास ने देश को पांच सौ करोड़ का नया  बिजनेस दे दिया। बीस – पच्चीस दिन का  काम और 500  करोड़ का रिटर्न। इसके लिए  नए  संयत्र भी  नहीं लगाने पड़े। ये आलोचक देश के उत्पाद में  हुई  वृद्धि को ये नही देख रहे। जब कुछ बड़ा  होता  है तो   उसमें कुछ कमी भी  रह जाती है।ये कमी तो  हमारी हैं।  हम तिंरगा  अभियान को समझे नही। कहीं फहराता  झंडा रह गया तो  इसमें अभियान का क्या दोषॽ कहीं जमीन पर झंडा  गिरा और किसी ने नहीं उठाया तो  ये  अभियान की तो  गलती नहीं।  ये  तसे हमारी गलती है।

हां  इस अभियान से हम इतना   जरूर समझे कि देश में पिछले कुछ साल में पैदा हुआ राष्ट्र भक्ति का ज्वार अब उतरने वाला  नही है।   और इसे बनाए  रखने की जरूरत है।लोकल फार वोकल का असर ये है कि देश के नेतृत्व  ने कुछ नही कहा।  लोकल फार वोकल के प्रभाव के कारण गणेश  चतुर्थी  उत्सव के अवसर पर चीन से एक भी मूर्ति भारत में नहीं आई। कारोबारी संगठन कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट)  प्रवीण खंडेलवाल ने बताया कि एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष देशभर में भगवान गणेश की 20 करोड़ से ज्यादा मूर्तियां खरीदी जाती हैं इससे अनुमानित 300 करोड़ रुपये से ज्यादा का व्यापार होता है। पिछले दो साल से देशभर में गणपति की इको-फ्रेंडली मूर्तियों को स्थापित करने का चलन तेजी से बढ़ा है। इससे पहले चीन से बड़े पैमाने पर भगवान गणेश की प्लास्टर ऑफ पेरिस, स्टोन, मार्बल तथा अन्य सामानों से बनी मूर्तियों का आयात होता था। सस्ती होने के कारण चीन से इन प्रतिमाओं का आयात होता था, लेकिन पिछले दो साल में कैट के चीनी वस्तुओं के बहिष्कार अभियान के चलते चीन से भगवान गणेश की मूर्तियों का आयात बंद हो गया । इसकी जगह पर्यावरण के अनुकूल मूर्तियों को स्थापित करने का चलन बढ़ा है।देश का खुद का व्यापार बढ़ा  है।इको फ्रैंडली मूर्ति अपने यहां ही तैयार होकर  बिक रही हैं, इसे देखिए । जानिए और मानिए कि महात्मा गांधी का स्वदेशी का सपना तेजी से पूरा  हो  रहा है।इसीलिए कहा गया   है  कि  अच्छा  देखिए। अच्छा सोचिए। किसी कार्य का काला  पक्ष    मत देखिए।उसमें कुछ अच्छा भी  होगा। उसके उज्जवल पक्ष को  देखिए ,समझिए। जानिए।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 02/09/2022

 

 

 

 

काबुलीवाला हमें माफ करना

 

17/08/2021

अशोक मधुप

काबुलीवाला माफ करना, हमने तो तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के दिन बहुत कुछ किया। तुम्हारे  मुल्क के लिए दुनिया ने अपनी तिजोरी खोल दी। जितना बन पड़ा तुम्हारे बच्चों और उनके भविष्य की बेहतरी और  विकास के काम लिया। तुम्हारे यहां बंदरगाह बनाए ।बांध  बनाए। हवाई अड्डे तैयार किए।संसद भवन बनाया। तुम्हारे बच्चे और बेटियों के भविष्य के लिए पूरी दुनिया ने बहुत कुछ किया।अपनी झोली का मुंह तुम्हारे परिवार की खुशहाली के लिए खोल दिये। दुनिया के लोगों से तुम्हारी बेटियों ,बेटों और परिवार की खुशहाली के सपने देखे।

अब ये सब कुछ तुम्हारे अपने अफगान के लोगों को ही रास न आये तो क्या किया जा सकता हैवे ही तुम्हारी बेटी,बहिन और बीवी को तालिबन की रखैल और लौंडी बनवाने पर आमादा हो तो हमारी या दुनिया की क्या गलती

तुम्हें तो अपनों ,परिवारजनों ,रिश्तेदार और पड़ोसियों से खतरा है। अपने घर और परिवार की  जिम्मेदारी तुमने जिन्हें सौंपी, जिन्हें आका माना, वही धोखा दे जाएं तो दुनिया क्या कर सकती  है तुमने जिन्हें अपना नुमाइंदा बनाया, जिन्हें अपना खुदा माना, संरक्षण स्वीकार किया,  वही दुश्मनों के  सामने से भाग खड़े हों ,हथियार डाल दें तो उसमें क्या हो सकता है।

प्रसिद्ध कवि रविंद्रनाथ टैगोर की एक कहानी है काबुलीवाला। काबुल  का रहने वाले एक पठान हिंदुस्तान में घूम -घूम कर मेवा बेचने का काम करता।है।  लेखक की छोटी बेटी से  वह घुल- मिल जाता है।लेखक की बेटी मिनी को बिल्कुल अपनी बेटी की तरह  प्यार करता है।एक मामले में वह जेल चला जाता है ।जब लौटता है तो लेखक की बेटी बड़ी हो चुकी है। उसकी  शादी है। अब उसे पता चलता है  कि  समय कितना आगे बढ़ गया। लेखक को वह बताता है कि उसकी बेटी भी मिनी के बराबर है, वह भी शादी लायक हो गयी होगी।लेखक उससे काबुल जाने को कहता है।उसके जेब खाली होने का जिक्र करने पर   लेखक बेटी की शादी के लिए एकत्र रुपये उसे देकर काबुल जाकर बेटी की शादी करने का आग्रह करता है। काबुलीवाले को धन देकर कहता है। अपने वतन जाओ और बेटी की शादी करो।

 हम अपने परिवार पर खर्च की जाने  वाली रकम अफगानिस्तान में लगाते हैं।   ये हमारी चिंता है।अफगानियों के लिए पूरी दुनिया की चिंता है।पर जब उसके परिवार की सुरक्षा के जिम्मेदार व्यक्ति लुटेरों से मिल जाएं तो कोई क्या करेजब उनके आका ही उनके परिवार की गर्दन कटने को दुश्मनों के सामने रख दें तो क्या किया जाएअपने घर की हिफाजत के लिए अपने आप लड़ना होता है,अपनों को लड़ना होता है,आसपास वालों को लड़ना होता है।कबीला लड़ता है,गांव लड़ता है, शहर लड़ता है,देश लड़ता है।दूसरे को क्या पड़ी है।वह कब तक तुम्हारा घर घेरे।तुम्हारे परिवार की सुरक्षा करे।माफ करना काबुलीवाला ,इसमें हमारी,दुनिया की या किसी और की खता नहीं।तुम्हारे अपने दोषी हैं।तुम्हारे अपने जिम्मेदार हैं।अपने परिवार बेटे,बेटियों, बहनों की हिफाजत तुम खुद नहीं करोगे, तुम नहीं लड़ोगे तो दूसरे  क्यों अपना खून बहाएं।लड़ना भी तुम्हें होगा।खून भी तुम्हे ही बहाना होगा क्योंकि परिवार तुम्हारा है।

अशोक मधुप

( लेखक  वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

  

 

 

 

एक छत के नीचे भी भारत −पाक −चीन के रिश्तों में जमी बर्फ नही पिंघली

 

 18/09/2024


अशोक मधुप

शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन एसोसिएशन के दो दिवसीय शिखर सम्मेलन में भाग लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत वापस लौट आए। वे सम्मेलन के एक हॉल में ,एक छत के नीचे चीन और पाकिस्तान के राषट्राध्यक्षों के  साथ मौजूद तो  रहे किंतु रिश्तों में जमी  बर्फ नहीं पिंघली। रिश्तों की  खटास में कोई कमी नहीं आई। आमने −सामने रहकर भी न आंखे मिली, न हाथ मिले।   न किसी ने एक दूसरे को   नमस्ते की ,न सुप्रभात कहा। एक संगठन के एक छत के नीचे  हुए कार्यक्रम में संगठन के आठ  सदस्य  देशों में से तीन  सदस्य देशों का   एक दूसरे से अपरिचित  बने  रहना, ये  बताता  है  कि इन तीनों देशों में   आपस में दूरी बहुत है।  रिश्ते बहुत खराब है । चीन और पाकिस्तान से दूरी बनाकर भारत और  उसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट  संकेत   दे दिया  कि भारत अब बदल गया है।  वह दूसरे देश  से  दबकर नही,नजर से  नजर मिलाकर  बात करता है।

 उज़्बेकिस्तान के  समरकंद में  शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन एसोसिएशन के दो दिवसीय शिखर सम्मेलन था। शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन एसोसिएशन (एससीओ) एक  आठ सदस्यीय सुरक्षा समूह है। इसमें चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजीकिस्तान, उज्बेकिस्तान, भारत और पाकिस्तान शामिल है।प्रधान मंत्री नरेंद्र  मोदी इसमें भाग  लेने के लिये गए।कार्यक्रम में शामिल भी  हुए।

पीएम नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग जब शंघाई सहयोग संगठन के मंच पर दिखे तो दूरिया भी साफ नजर आईं।सम्मेलन के फोटो सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  एक छोर पर खड़े हैं  तो पाकिस्तान  प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ दूसरे छोर पर।  चीन के राष्ट्रपति और मोदी के बीच में  शंघाई सहयोग संगठन के चार सदस्य खड़े  थे। गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच 2020 में हुई झड़प के बाद यह पहला मौका था, जब भारत  के प्रधान मंत्री और चीन के  राष्ट्रपति एक मंच पर आमने-सामने थे। लेकिन एक छत के नीचे की नजदीकी भी  दिलों की दूरियां  नहीं मिटा पाई और दोनों नेता औपचारिक मुलाकात से भी बचते दिखे।

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचने पर  उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शावकत मिर्जियोयेव ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया।  समरकंद के आसमान में रोशन होते  सतरंगी पटाखों के बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समरकंद पहुंचे थे। प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत करने खुद उज्बेकिस्तान के प्रधानमंत्री अब्दुल्ला अरिपोव एयरपोर्ट पहुंचे थे। इसके साथ ही भारतीय प्रतिनिधिमंडल के स्वागत में बॉलीवुड संगीत भी बजाया गया। उज्जबेकिस्तान में भारत का ये जोरदार स्वागत दूसरे दिन भी जारी रहा। जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचे तो उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शावकत मिर्जियोयेव ने तब भी गर्मजोशी से स्वागत किया। सम्मेलन की बैठक के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देशों को संबोधित किया। 

इस कार्यक्रम के दौरान पूरे समय प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी हिंदी में बोले।वह अंग्रेजी  में बोल सकते  थे, किंतु   उन्होंने  सा नही किया। अब तक होता यह रहा है  कि देश  के नेताओं का इस तरह के  कार्यक्रम  में  अंग्रेजी प्रेम झलकने लगता  है।वे अपना  भाषण अंग्रेजी में देते  हैं। किंतु  प्रधानमंत्री  मोदी ने हिंदी  में बोलकर पूरी दुनिया  को संदेश  दिया। उन भारतीयों को भी संदेश दिया जो  राजनीति के लिए अंग्रेजी  का पक्ष   लेतें  हैं।  प्रधानमंत्री ने    हिंदी में  बोलकर बता दिया कि कोई कुछ भी  कहे ,भारत की स्वीकार्य भाषा,  मात्रभाषा  तो हिंदी ही है।

पीएम मोदी ने शुक्रवार को सुबह से दोपहर तक एससीओ के दो आधिकारिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। उनकी राष्ट्रपति पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति डा. इब्राहिम रईसी, तुर्की के राष्ट्रपति रिसेप तैयप एर्दोगेन और उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिरजियोएव के साथ द्विपक्षीय मुलाकात हुई। रूस के राष्ट्रपति पुतिन से  तो   निर्धारित समय  से ज्यादा देर तक बातचीत हुई।

सम्मेलन की बैठक के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देशों को पांच बड़े मंत्र दिए।दुनिया के महाबली देशों के मंच से पीएम मोदी ने बताया कि भारत किस प्रकार हर क्षेत्र में मजबूती से अपने पांव जमा रहा है। उन्होंने कहा कि  भारत को मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाना है। , 70 हजार स्टार्टअप वाला भारत इनोवेशन में सभी की सहायता करेगा, एससीओ के देशों के बीच सप्लाई चेन, ट्रांजिट बढ़ाना होगा, मोटे अनाज उपजाकर खाद्य संकट से निपटना होगा  और  एससीओ के सदस्य देश भी पारंपरिक इलाज शुरू करें।  प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग समिट में एक ही जगह, एक ही हॉल में तो मौजूद थे, लेकिन दोनों के बीच कोई भी बातचीत नहीं हुई। लेकिन शिखर सम्मेलन में जिनपिंग ने भारत की मेजबानी का समर्थन किया है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत को अगले साल एससीओ की मेजबानी करने के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि हम अगले साल भारत की अध्यक्षता का समर्थन करेंगे। उज्बेकिस्तान ने यहां आठ सदस्यीय शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की अध्यक्षता भारत को सौंपी।  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक विशेषता  है कि वह कार्यक्रम में  अपनी महत्ता बताना  जानते  हैं। उन्होंने अपनी भेंट में जहां रूस के राष्ट्रपति और यूक्रेन  का इस बात के लिए आभार व्यक्त किया कि रूस − यूक्रेन संकट के काल के  शुरू में जब हमारे हजारों छात्र यूक्रेन में फंसे थे।उनकी और यूक्रेन की मदद से हम उन्हें निकाल पाए।  वहीं मोदी ने पुतिन से यह कह कर पूरी दुनिया का दिल भी जीत लिया  कि आज का युग जंग का नहीं है। हमने फोन पर कई बार इस बारे में बात भी की है कि लोकतंत्र कूटनीति और संवाद से चलता है।पुतिन ने मोदी से कहा, 'मैं यूक्रेन से जंग पर आपकी स्थिति और आपकी चिंताओं से वाकिफ हूं। हम चाहते हैं कि यह सब जल्द से जल्द खत्म हो। हम आपको वहां क्या हो रहा है, इसकी जानकारी देते रहेंगे।  इस युद्ध को लेकर  अब तब रूस की आलोचना न करने के लिए अमेरिकन देशों की नाराजगी का  शिकार होते रहे प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने पुतिन   से   यह कह कर कि आजका समय  युद्ध का नही है,  अमेरिकन मीडिया   की प्रशंसा भी पा ली।  आज  अमेरिकन मिडिया  मोदी की तारीफ करते  नही अघा रही।

 चीन के राष्ट्रपति को कार्यक्रम में   नजर अंदाज कर भारत ने चीन को संदेश दिया कि पूर्वी लद्दाख से जुड़े वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर विवाद खत्म करने के लिए चीन को हालात पूरी तरह  सामान्य करने होंगे। लद्दाख  सीमा के छोटे से  भाग  से सेना हटाने से  द्विपक्षीय संबंध मधुर नहीं होंगे।  इस एससीओ सम्मेलन से पहले चीन ने जी-20 के समय की  मेजबानी का पांच साल पुराना दांव आजमाया था,  वह वहीं अब आजमाना चाहता था तब  चीन ने  सम्मेलन से ठीक पहले डोकलाम में महीनों से जारी विवाद को खत्म करने के लिए अपनी सेना पीछे हटाली थी।

 एक तरह से चीन की उस समय की  कूटनीति सफल रही थी। सम्मेलन  से  पहले जहां ये  चर्चाएं थी कि विवाद के हल हुए बिना प्रधानमंद्धी  चीन में होने वाले   इस सम्मेलन में भाग  लेने  नही जाएगें। चीन के सेना   हटाने के  बाद पीएम मोदी न सिर्फ जी-20 सम्मेलन में चीन जाकर  भाग  लिया, बल्कि जिनिपिंग के साथ अलग से द्विपक्षीय वार्ता भी की।

  लेकिन इस बार उसका यह दांव  नहीं चला।एससीओ बैठक से पहले भी चीन ने पुराना दांव चल कर भारत को साधने की कोशिश की। सूत्र कहते  हैं कि एलएसी के कुछ इलाकों से सेना हटाने के बाद चीन को उम्मीद थी कि वह फिर से भारत को साधने में कामयाब हो जाएगा। इसका अंदाजा इसीसे लगाया जा सकता है कि चीन ने अपनी ओर से मोदी-जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय वार्ता की तैयारी भी कर ली थी। चूंकि पीएम को चीनी राष्ट्रपति से नहीं मिलना था, इसलिए वह इस सम्मेलन में सबसे देरी से पहुंचे।  साथ  ही उन्होंने  चीन के राष्ट्रपति     को नजर अंदाज कर अपनी नाराजगी भी  स्पष्ट कर दी।
भारत  और   उसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यवहार ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब तक  चीन  नही सुधरेगा,भारत अपना रवैया नही बदलेगा।भारत चीन की दुखती रग पर हाथ रखता रहेगा। भारतीय बाजार में चीन के लिए मुश्किलें बनाण रहेगा, साथ ही  दक्षिण चीन सागर और ताइवान मामले में भारत चीन विरोधी देशों के साथ खड़ा रहेगा। आज  पाकिस्तान की आर्थिक हालत बहुत खराब  है।
वहां   मंहगाई  आसमान छू   रही है।दुनिया के देश उसको कर्ज देने और मदद करने को  तैयार नही हैं।  हाल में आई  बाढ़  ने   पूरी तरह से उसकी कमर तोड़  दी।से  में भारत  उसकी मदद कर सकता था, किंतु   उसने अभी तक  चुप्पी साध रखी है।भारत  चाहता है कि पाकिस्तान कशमीर से  दूरी बनाए और आंतकवाद को   खत्म करने की अपनी प्रतिबद्धता पूरी करके दिखाए।सा न होने पर   वह   उसकी कोई  मदद नही करेगा।

अशोक मधुप

(लेखक  वरिष्ठ  पत्रकार हैं)  

 


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उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव चुनाव प्रचार से गायब हैं मुस्लिम मतदाता उनके नेता और मुद्दे

 06/02/2022


अशोक मधुप
उत्तर प्रदेश के  चुनावी जंगल में  इस बार हिंदुस्त्व  हावी है। भाजपा  हिंदू मतदाताओं का धुर्वीकरण में लगी है,  तो सपा सुप्रिमो  अखिलेख  यादव इस धुर्वीकरण को रोकने के प्रयास में  हैं। इस बार चुनावी दंगल से मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने की बात नहीं हो रही। चुनावी पटल से मुस्लिम मतदाता गायब है। मुस्लिम मददाताओं को रिझाने के लिए गैर भाजपाई  दलों के पास कोई महत्वपूर्ण मुस्लिम नेता भी नही हैं। गोल टोपी लगाकर चुनाव प्रचार करने वाले गायब हैं,तो मत देने की अपील करने वाले मश्जिदों के पेश इमाम  भी नजर नही आ रहे।चुनाव से मुस्लिमों के  मुद्दे गायब हैं। बसपा सुप्रिमो मायावती लगभग चुप्प हैं।

 प्रदेश  में पहले और दूसरे चरण का प्रचार चल रहा है।इसमें भाजपा के पास प्रचार के लिए एक मुस्लिम  चेहरा  केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी जरूर हैं।सपा के कभी आजम खां स्टार प्रचारक होते थे।  इस बार वह चुनाव मैदान में तो हैं किंतु प्रचारक में उनका कहीं नाम नहीं।  सपा ने तीस स्टार प्रचार के नाम की सूची जारी की है। इसमें सपा के  राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य जावेद अली खान का एक मात्र नाम है। ये नाम भी उत्तर प्रदेश के मददाताओं के लिए अनजाना और नया है।  

बसपा ने पहले चरण के प्रचार के  18 स्टार प्रचारक की सूची जारी की है इनमें मुनकाद अली  और समसुद्दीन राईन का ही नाम है।  मुनकाद अली जरूर बसपा का बड़ा नाम है।

 कांग्रेस के स्टार प्रचारकों की सूची में  पूर्व सांसद गुलाम नबी आजाद और सलमान खुर्शीद का नाम जरूर है , पर ये वह हैं  तो कांग्रेस के नेतृत्व के रवैये से नाराज है। वैसे भी  उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हालत कोई ज्यादा अच्छी नही है। लगता है कि वह सिर्फ वह  हाजरी   लगाने के लिए चुनाव लड़ रही है।वह और उसके प्रत्याशी कुछ करिश्मा कर सकेंगे, सा नही लगता।

 बसपा और कांग्रेस और सपा दावा कर रहे  हैं कि उन्होंने ज्यादा मुस्लिम प्रत्याशियों का मैदान में उतारा है किंतु कोई  मुस्लिम के मुद्दे नही उठा रहा। ये मुस्लिम युवाओं के  रोजगार  और  शिक्षा आदि की बात पर चुप्प है। नागरिकता संशोधन कानून के  विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान प्रदेश के हजारों मुस्लिम युवाओं के विरूद्ध मुकदमें दर्ज हैं। मुस्लिम वोटों का दावा करने वाला कोई इन मुकदमों की वापसी की बात नहीं कर रहा।उनको डर है कि मुस्लिमों की बात की तो उनका बेस वोट भाजपा के साथ  जा सकता है।

बसपा ने ब्राह्णों की बात कर उनको मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका में ला  दिया, वरन अब तक कोई  उनकी ओर देखता भी  नहीं था।ये ही कारण  है कि सभी महत्वपूर्ण राजनैतिक दल ये बता रहे है कि उन्होंने कितने ब्राह्मण प्रत्याशी मैदान में उतारे।

सब दल चुनाव में मतदाताओं को अगड़े −पिछड़ों में बांटकर देख  रहे हैं। कोशिश भी है कि कोई समाज यह न कह सके कि उनकी उपेक्षा की गई है, जबकि भाजपा पूरे हिंदू वोटर को एक जुट करने की कोशिश कर रही है। अब तक उसका मुद्दा राम मदिंर, कांशी −वाराणसी का विकास रहा है। उसी को वह मुद्दा बनाकर हिंदू को एकजुट करना चाहती थी,अब उसने अपने इस अजेंडे में मथुरा को और शामिल कर दिया। उधर हाल ही में भाजपा के प्रदेश  प्रभारी अमित शाह ने कैराना का दौरा करके वहां हुए दंगों के घाव  कुरेद कर वोटर  को एकजुट करने की कोशिश  की।  वोटर को बताया कि उनकी सरकार  में दंगे नही हुए। जबकि सपा सरकार में ये आम था।    

विपक्ष जानता है कि प्रदेश का मुसलमान मतदाता भाजपा को  पसंद नही करता। वह भाजपा को हराने वाले दल को एकजुट होकर वोट करेगा।उसलिए उसकी कोशिश तो है कि उसे मुस्लिम वोट मिले, पर वह खुलकर उनके पक्ष में घोषणाएं नही कर रहा, वायदे नहीं कर रहा, सभी  दलों को डर यह है कि सा करने से कहीं उनका बेस हिंदू वोट न भाग  जाए।

सपा का प्रयास है कि मुस्लिम , यादव और पिछड़ों को जोड़ा जाए।

चुनाव की घोषणा से पहले जहां भाजपा रैली करने ,सपा यात्रा  निकालने में लगी थी, वहीं बसपा  चुपचाप प्रत्याशी घोषित कर रही थी।

भाजपा –सपा गठबंधन के दलों से सीटों के बंटवारें के हल निकलने में लगी थी,और बसपा के प्रत्याशी चुनाव संपर्क में लग गए थे।  दलित उसका बेस वोट हैं ही ,उसने  प्रत्याशी को मुस्लिम वोटर को संपर्क के  लिए लगाया। जब तक सपा और कांग्रेस के प्रत्याशी तै  हुए तब तक बसपा के प्रत्याशी काफी संपर्क कर चुके थे। 

बसपा का  प्रयास है  कि दलित –मुसलिम  ब्राह्मण   उसे मिल जाए।  इसका वह लाभ  ले सकती है।

 भाजपा  हिंदुत्व के बूते पर चुनावी समर फतह करने में हैं। उसने अयोध्या काशी के बाद अपने अजेंडे में मथुरा को शामिल करके अपने इरादे साफ कर दिए हैं।विपक्ष के पास इसकी कोई काट नहीं लग रही।  हिंदू धर्म प्रचारक और जागरण मंडली राम मंदिर बनाने  वालों को वोट देने की अपील करती घूम रही हैं।आँल इंडियां मजलिस ए  इत्तेहादुल मुस्लिमान के असदुद्दीन औवेसी भी अपने उम्मीदवारों को लेकर चुनाव मैदान  में हैं। उन्होंने पार्टी के प्रत्याशी भी मैदान में उतारे हैं किंतु वह मुस्लिमों को अपने से जोड़ पांएगे, सा अभी नही लगता।

सपा−रालोद गठबंधन किसानों की बात कर पश्चिम उत्तर प्रदेश के जाट मतदाताओं को रिझाने के प्रयास में है, वह किसान की बात कर रहा है,  उनके मुद्दे  उठा रहा है।अभी चुनावी समर शुरू हुआ है। सभी दल राजनीति की शतरंज पर अपनी – अपनी चाल  चल रहे हैं।सब दल दूसरे को हराने के लिए गोटी चल रहे हैं। अभी शुरूआत है, क्या होगा, कहा नही जा सकता।

 

अशोक मधुप

(लेखक  वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

 

 

उत्तर प्रदेश के किन्नरों को मजम्मा जोगाठी बनाने की तैयारी

 19/11/2021


अशोक मधुप

प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर प्रदेश में  किन्नर कल्याण बोर्ड गठित कर उसके लिए किन्नर सदस्य नामित किए  हैं। सरकार चाहें तो किन्नर समाज को प्रदेश के अंचलों और आदिवासी लोक नृत्य सिखाकर प्रदेश की लुप्त होती कला को जीवित कर सकती है।प्रदेश के कई किन्नर इन कलाओं का सीखकर पद्म पुरस्कार पाने वाले मजम्मा जोगाठी की तरह  सम्मान प्राप्त  कर सकतें हैं।

उत्तर प्रदेश में किन्नर कल्याण बोर्ड का गठन का उद्देश्य समाज के विकास की मुख्यधारा से वंचित किन्नरों को आगे लाने की जद्दोजहद है ।सरकार ने सोनम चिश्ती   को इस बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाया है।उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा दिया है। गठित किन्नर कल्याण बोर्ड में इनके अलावा चार किन्नर सदस्य पद के लिए प्रयागराज की कौशल्या नन्द गिरी उर्फ टीना मां, गोरखपुर की किरन बाबा, जौनपुर की मधु उर्फ काजल व कासगंज की मोहम्मद  आरिफ पूजा किन्नर शामिल हैं।उत्तर प्रदेश  सरकार के आदेश में कहा गया है कि बोर्ड किन्नरों की आवश्यकताओं, मुद्दों व समस्याओं पर काम करते हुए नीति व संस्थागत सुधारों के लिए सरकार को सुझाव देगा। बोर्ड के अध्यक्ष समाज कल्याण मंत्री होंगे।जबकि मुख्यमंत्री द्वारा नामित किन्नर उपाध्यक्ष होगा। समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव संयोजक होंगे। किन्नर संबंधी विभाग के अधिकारियों के अनावा पांच किन्नर व एनजीओ के प्रतिनिधियों को मंत्री नामित करेंगे। गैर-आधिकारिक सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्षों होगा। बोर्ड का सदस्य सचिव, निदेशक समाज कल्याण होगा। बोर्ड को तीन महीने में बैठक करना जरूरी होगा। विभागीय प्रमुख सचिव के रविन्द्र नायक ने बताया कि सभी के नामित होते ही बोर्ड की बैठक होगी।बोर्ड का काम किन्नर नीति को विभागों में लागू करने के साथ ही किन्नरों का शैक्षिक, सामाजिक व आर्थिक विकास करने, समानता व समता के लिए दिशा-निर्देश जारी कर उनका क्रियान्वयन कराने तथा जिला स्तरीय समिति या किन्नर सहायता इकाई के प्रकरणों पर निर्णय करना होगा।

जिलों में डीएम की अध्यक्षता में भी 13 सदस्यीय समिति होगी इसकी प्रतिमाह बैठक होगी। इसमें अधिकारियों के अलावा डीएम द्वारा नामित मनोवैज्ञानिक व किन्नर समुदाय के दो प्रतिनिधि सदस्य और जिला समाज कल्याण अधिकारी सदस्य सचिव होंगे। यह भी कहा गया है कि किन्नरों को पहचान पत्र मिलेंगे। किन्नरों को मनोवैज्ञानिक परामर्श के लिए केंद्र भी बनेंगे।

 किन्नर समाज अब तक  बिल्कुल उपेक्षित हैं। समाज उन्हें स्वीकार करने को तैयार नहीं है। लोगबाग इनसे बात करते बचते हैं।किन्नरों का भी रवैया ठीक नहीं ।वह त्योहारों के नाम पर व्यापारियों से, दुकानदारों से कई बार जबरदस्ती वसूली करते हैं। बस और ट्रेन में हंगामा करते हैं ।परिवार में बच्चा होने और शादी के बाद दुल्हन के परिवार में तो उनकी उद्दंडता देखते बनती है। मनमानी राशि मांगते हैं।न देने पर हुड़दंग करते हैं। परिवार अपनी बेज्जती से बचने  के लिए, अपनी इज्जत बचाने के लिए इनकी नग्नता और गुंडई को देख कर चुप हो जाते हैं। हालात न होने पर भी इन्हें मनमानी रकम देते हैं। कई बार तो वे परिवार उधार भी उठाते हैं।देहात में तो इनके श्राप देने का भी आतंक है।कुछ लोग कहते हैंकि ये नए विवाहित जोड़े और शिशु को आशीर्वाद देते हैं। मांगी रकम न दिए जाने पर के श्राप भी देते हैं।इनका श्राप दिया जाना ठीक नहीं।

सर्वाच्च न्यायालय के आदेश पर  गठित इस बोर्ड के गठन से  किन्नरों की समस्याओं पर विचार हो सकेगा ।उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा में लाने, समाज के विकास कार्यों में लगाने का कार्य किया जाएगा। उनकी समस्याओं पर विचार होगा। उन्हें बताया जाना चाहिए  कि उनका रवैया समाज में उन्हें घृणा का पात्र बनाता है यदि वे थोड़ी सरलता− उदारता का प्रयोग करें समाज में उनकी छवि निखर सकती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इनकी संख्या डेढ़ लाख बताई गई है।जबकि वास्तव में काफी ज्यादा है।क्योंकि ये अपना परिचय बताना नहीं चाहते।

सरकार की योजना किन्नरों को परिचय कार्ड जारी करने की है।इससे किन्नरों को बहुत लाभ मिलेगा ।नकली किन्नरों की गतिविधियों को रोका जा सकेगा।कुछ व्यक्ति नकली किन्नर बनकर वसूली करते हैं।इससे नकली और असली किन्नरों में झगड़े होते हैं।मारपीट होती है।कई बार कत्ल हो जाते हैं।परिचय पत्र मिलने के बाद नकली किन्नरों की वसूली बन्द हो सकेगी।

अगर इनकी समस्या को समझा जाता,इन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का काम होता तो इनके व्यवहार में बड़ा परिवर्तन होता।इनके साथ समाज को भी इनके बारे में जागरूक किया जाता। तो देश के हालत बिल्कुल अलग होते।ये भी समाज का जिम्मेदार हिस्सा होते।वैसे आज कई किन्नर समाजहित के लिए काम कर रहे हैं।बिजनौर के एक किन्नर ने अपने पास से पैसा लगाकर एक गरीब परिवार की लड़की की शादी की है।  अब समाज कल्याण के कार्य सरकार कराने लगी।पहले सेठ,सम्पन्न ओर जमीदार ये कार्य करते थे।आजादी के पूर्व में बने कई कुएं ऐसे हैं जो क्षेत्र है किन्नर (हिजड़ों )ने बनवाए।पुराने लोग बताते भी हैं।ये कुएं हिजड़े का कुआं के नाम से प्रसिद्ध भी है।

सरकार  किन्नर कल्याण बोर्ड के माध्यम से किन्नरों को प्रदेश  की क्षेत्रीय नृत्य और  नाट्य कला,प्रदेश में बसने वाली जनजातियों के नृत्य सिखाकर इन कलाओं से जोड़ने का बड़ा काम कर सकती  है।इन्ही कलाओं में भनेड़ा(बिजनौर) के नक्काल,अरब से भारत आई और बिजनौर के चांदपुर ,अमरोहा और रामपुर जनपद में गाई  जाने वाली चाहरबैत को इनसे गवाकर जिंदा और रोचक बनाया जा सकता है।  चाहरबैत पुरूषों द्वारा ढप ( एक तरह का साज )पर गाई जाने वाली कला है। यदि  इसे  महिलाओं के परिधान में किन्नर गांए तो ये कला ज्यादा रूचिकर और लोकप्रिय होगी ।

से ही 'अगरही'( पूर्वांचल के आदिवासियों का एक प्रमुख नृत्य )पूर्वांचल के देवरियागोरखपुर और बलिया जिलों में 'गोड़उ' नृत्य, अहीर (वीरों की संस्कृति ) की कला, नृत्य  सिखाकर इनसे मंचित कराए जा सकतें हैं।कुछ समय पूर्व सांरगी वादक जगह− जगह दिखाई देते थे, यदि कुछ जीवित सांरगी वादकों से इन्हें शिक्षा  दिलाई  जाए  तो किन्नर के माध्यम से प्रदेश सरकार  प्रदेश की समाप्त होगी क्षेत्रीय, आदिवासी और परम्परागत कला को जीवित किया  जा सकता है । किन्नर  मजम्मा ने तो अपने  आप लोक कला  सीखकर पद्म पुरस्कार पाया। अगर सरकारी स्तर से प्रदेश के किन्नरों के साथ ईमानदारी से मेहनत की गई तो प्रदेश देश को किन्नर मजम्मा जैसे कई प्रसिद्ध कलाकार दे सकेगा।

अशोक मधुप  

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)