Saturday, June 6, 2009

लो फ़िर हाजिर हूँ










बड़े बेटे की शादी और

आँख में परेशानी के कारण पिछले कुछ माह से नेट पर न आने के लिए अफ़सोस हे ! सोचता था कि आँखों के ओपरेशन के बाद ही ब्लॉग पर लिखूंगा .किंतु डॉक्टर द्वारा तीन माह एसे ही दवा डाल कर काम चलाने की बात कहने पर सोचा कि एसे ही शुरू किया जाय, सो केमरा लेकर निकल पड़ा,। बेटा अमेरिका में है 1 .शादी के समय वहा से मेरे लिय कैनन का कैमरा लाया था !उससे खीचे सूर्यास्त के दो फोटो यहाँ पेस्ट क़र रहा हूँ !बताई दो तीन दिन में पुराने ढर्रे पर आ जाऊंगा !तब खूब बाते और लिखा पढ़ी होगी!

Sunday, February 15, 2009

पत्रकारिता का एक रूप यह भी

मै छोटे से जिला मुख्यालय बिजनौर से हूं। पत्रकारिता की बात आती है तों नए आने वालों पर गर्व कम परहोता है,अफसोस ज्यादा के आचरण पर।
यहां जिला पंचायत की अध्यक्ष रूचिवीरा होती थीं। पिछले दिनों उनके विरूद्ध अविश्वास प्रस्ताव आया। अपर जिला जज की मौजूदगी में प्रस्ताव पर विचार हुआ।दो तिहाई मत से प्रस्ताव पारित हो गया। रूचिवीरा पद से हटा दी गई। यह मामला कोर्ट में विचाराधीन है।
श्री मती रूचिवीरा को अपना पक्ष मजबूत करने के लिए कुछ एेसे पत्रकारों की जरूरत थी ,जो यह बयान हल्फी दे सकें कि उनके सामने इस प्रस्ताव पर विचार के पूरे घटनाक्रम की वीडियोग्राफी हुई ,जबकि विडियोग्राफी हुई नही थी, जिला प्रशासन पहले ही कह चुका है कि वीडियोग्राफी नही हुई।अफसोस की बात है कि १२ से ज्यादा पत्रकारों ने बयान हल्फी लगाकर कहा कि उनके सामने वीडियों ग्राफी हुई है।पत्रकारों का काम पक्ष विपक्ष में कोर्ट में बयान देना नही है। इसके लिए रूचिवीरा के विरोधी कह रहे है कि इसके लिए प्रति पत्रकार १० से २० हजार रूपये तक का भुगतान हुआ।मीडिया में भी इस कार्रवाई ठीक नही मानी जा रही।बयान हल्फी जिसतरह लगाए गए वह सही नियत नही बताते ।बयान हल्फी देने वालों में कुछ चैनल एवं एक राष्ट्रीय देनिक का एक प़त्रकार भी शामिल रहां।
सीना फुलाने की बात यह है कि इन बिकने वालों में दो दैनिक अमर उजाला एवं जागरण के प़त्रकार नही हैं।

Monday, January 26, 2009

चिकित्सा व्यवसाय में ह्रदयहीनता


चिकित्सा को बहुत जिम्मेदारी का पेशा बताया गया है किंतु आजकल इसमे मानवीयता एवं हृदयहीनता ज्यादा आ गई है। मेरा शहर बहुत छोटा है,यहां सरकारी अस्पताल में चिकित्सक नही, प्राईवेट रात को नर्सिंग होम नही खोलते। पूर्व राज्यमंत्री स्वामी आेमवेश उपचार न मिलने के कारण उसी हालत में मेरठ ले जाए गए! यही हादसा एक आैर मरीज के साथ हुआ ।परिजन रात भर लिए घूमते रहे एंव उन्हें उपचार न मिला ! परिणामस्वरूप मौत हो गई। झालू की एक युवती को चिकित्सक तो मिला किंतु रविवार का दिन होने के कारण कोई लेब खुली नही मिली । मजबूरन मरीज को मेरठ ले जाना पड़ा।
मेरठ के हालात बिजनौर से भी ज्यादा खराब है। मेरे बड़े साले साहब की तबियत खराब हुई। उन्हें मेरठ के जाने माने अस्पताल जंसवंत राय में भर्ती कराया गया।चिकित्सक सबेरे आठ बजे देखकर क्रिकेट मैच खेलने गए तो रात आठ बजे तक भी नही लौटे।इसी बीच उनकी मौत हो गई। पता चला कि चिकित्सकों का कहीं क्रिकेट मैच था।इस अस्पताल में रात से अगले दिन तक मौजूद रहा मेरा बेटा कहता है कि पूरे दिन कोई चिकित्सक मरीज को देखने नहीं आया।
कई साल पहले मेरी पत्नी की बडी़ बहिन का आल इंडिया मैडिकल इंस्टीटयूट में ब्रेन ट्यूमर का आपरेशान हुआ। वार्ड में आने पर उल्टी होनी शुरू हुई। मरीज के साथ मौजूद मेरी पत्नी ने जाकर स्टाफ को बताया तो उन्होंने एक सिरप लिख दिया। कह दिया कि एक साइड को मुंह कर लिटा दें।शाम तक कोई देखने नही आया। पूछे जाने पर किसी ने यह भी नही बताया कि सिरप कैसे दिया जाएगा। दिन भर उन्हें उल्टी होती रहीं एवं फेफडो़ में जाती रहीं। बाद मे कई दिन बेंटिलेटर पर रखा पर वे बच नही सकीं ।चिकितसा जगत में यह क्या हो गया। कहां गया चिकित्सक का समर्पण, कहां गई सवेंदनांए,कहां चली गई मानवता।

Wednesday, December 31, 2008

नव वर्ष पर सबको हार्दिक शुभकांमनाए! यह वर्ष सबके जीवन में सुख समृद्धि एवं सुयश लेकर आए।

Monday, December 22, 2008

नेताओं की मौत पर राष्ट्रध्वज तिरगें का झुकाया जाना क्या उचित है

पंतजलि योग पीठ हरिद्वार में आयोजित कवि सम्मेलन का आज आस्था चैनल पर प्रसारण हो रहा था ।इस कवि सम्मेलन के एक कवि की कविता ने मुझे बहुत प्रभावित किया। कवि का नाम एवं कविता तो याद नही किंतु उसका भाव यह है कि आज देश में नेताओं के मरने पर राष्ट्रीय ध्वज तिंरगें को झुकाने का प्रचलन है। नेताओं के मरने पर इसे झुकाना आम हो गया है।
कवि का कहना था कि हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिंरगा देश के गौरव, सम्मान एवं उसकी स्मिता का प्रतीक हैं। यह देश की शान है। इसे फहराने की खातिर देश के सैंकड़ों क्रांतिकारियों ने अपने प्राण न्यौछावर किए। उन्होंने हंसते - हंसते सीने पर गोली खाकर प्राण न्योछावर कर दिए किंतु तिंरगे को झुकने नही दिया।देश के जवान भी तिंरगे के सम्मान की खातिर अपने प्राण दे देते हैं।
राष्ट्रध्वज तिंरगा देश के सम्मान का प्रतीक हैं। देश सबसे बडा़ है, नेताओं से भी ।नेता देश एवं तिंरगे से बडे़ नही हैं। ऍसे में उनकी मौत पर राष्ट्रीयध्वज झुकाया जाना उचित नहीं ।वह इसे राष्टी्यध्वज ही नही पूरे देश का अपमान मानतें हैं।
इस विषय पर आपकी क्या राय है।

हम भी आंतकवादी होते जा रहे हैं

हो सकता है कि आपको मेरी बात अजीब या अटपटी लगे किंतु है सहीं । हममें भी कुछ आंतकवादियों के गुण आते जा रहे हैं । हम अपनी मांग मनवाने के लिए दूसरों का अपहरण नही कर रहे। अपने बच्चों को दांव पर लगाने लगे हैं। आतंकवादी अब तक विमान ,ट्रेन या बस के यात्रियों का अपहरण करके सरकार पर दबाव डाल कर अपनी मांग मनवाते रहे है। ये हथियार अब हम प्रयोग करने लगे हैं। अपनी मांगों को मनवाने के लिए हम अपने बच्चों का जीवन दांव पर लगा रहे हैं।

भारत सहित दुनिया के कई देशों में बच्चों में वायरस से आने वाली शारीरिक विकलांगता दूर करने के लिए पोलियो अभियान चलाया हुआ है। भारत को भी पोलियो मुक्त करने के लिए अभियान चला हुआ हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की और से चलने वाले इस अभियान पर हमारी सरकार खरबों रूपया व्यय कर चुकी हैं। यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि वायरसजनित बीमारी से देश का कोई बच्चा विकलांग न हो पाए। सरकार का ये अभियान आपके एवं हमारे बच्चों के लिए है किंतु हम अब यह मान बैठे हैं कि पोलियो की दवा पिलाना सरकार की मजबूरी है। पहले सरकार बूथों पर आने वाले बच्चों को दवाई पिलाती थी। क्योकि सारे बच्चे बूथ तक नही आ पाते , इसलिए सरकार ने यह किया कि पोलियो कर्मी एक सप्ताह तक लोगों के घर जाकर उनके बच्चों को दवा पिलांएगे।

हमारे बच्चो को विकलांगता से बचाने के लिए सरकार की कोशिश ,जद्दोजहद को हमने उसकी मजबूरी समझ लिया। हम समझने लगे कि इसमें सरकार की कोई मजबूरी है, जो इस प्रकार बार बार अभियान चला रही है। सरकार के प्रयास को हमने उसकी मजबूरी मान उसे ब्लैक मेल करना शुरू कर दिया। जग ह-जगह से समाचार आने लगे है कि गांव वाले किसी न किसी मांग को लेकर अड़ जाते है एवं दबाव देते है कि जब तक उनकी मांग पूरी नही होगी, वह बच्चों को दवा नही पिलांएगें। मेरे जनपद के एक गावं में आज दो घंटे तक बच्चों को इसलिए पोलियो ड्राप नही दी गई कि वहां का बिजली का ट्रांसफार्मर खराब था एवं बदला नही जा रहा था। गांव वालों के दबाव पर बिजली कर्मी आए आश्वासन दिया । उसके बाद ही बच्चों को दवा पिलाई गई।

कया यह ब्लैकमेल करना नही हैं। दवा न पीने से किसके बच्चे प्रभावित होंगे। क्या पोलियो की बीमारी को खत्म करने की सराकर की ही जिम्मेदारी हैं। ट्रांसफार्मर बदलवाने के लिए भूख हडताल या किसी अन्य प्रकार का कोई आंदोलन शुरू किया जा सकता थां। अपने बच्चो की कीमत पर तो यह सौदा नही होना चाहिए ।बच्चों को आगे करके इस प्रकार मांग मनवाना मेरी राय में तो ठीक नही हैं । अपने बच्चों कों दाव पर लगाकर कोई मांग पूरी करना ठीक नही हैं ।

Wednesday, December 17, 2008

बेटों से कम नही बेटिंया







युग बदल गया हैं। कभी लड़के लड़कियों में फर्क समझा जाता था किंतु अब ऐसा नही है। बेटी भी बेटों से कम नही है।यहां आज कुछ ऐसा ही हुआ।


मेरे पड़ौस में एक सेवानिवृत अवर अभिंयता रहते हैं किशन खन्ना । उम्र होगी ६५ साल ।पति पत्नी बहुत मस्त। बहुत मिलनसार। इनके चार बेटिंया। चारों बेटियों की उन्होंने शादी कर दी। रात किशन खन्ना की तबियत खराब हुईं। दो बार पहले हार्ट अटेक हो चुका था। ठीक से उपचार न मिलने पर रात में उनका निधन हो गया। मुहल्ले वाले परेशान थे कि अंतिम संस्कार कौन करेगा। सबसे छोटी लड़की इनके पास आई हुई थी! एक और लड़की की शहर में ही शादी हुई थी। वह तथा गाजियाबाद वाली आ चुकी थी! चौथी सबसे बड़ी लड़की नही आई थी।


बिजनौर जैसे छोटे शहर में कोई सोच भी नही सकता था। कि गाजियाबाद में रहने वाली बेटी मुक्ता ने पिता के अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया। उसने घर पर पिता का पिंडदान किया। तीनों बहने नंगे पांव शव यात्रा में साथ नहीं । गंगा बैराज पर गईं। वही चौथी भी आ गई। मुक्ता ने पिता की चिता को आग दी आैर कपाल क्रिया सहित सभी रस्म अदा की। गंगा बैराज पर कई शवों का अंतिम संस्कार चल रहा था ,उनके साथ आए व्यक्ति एक युवती को अंतिम संस्कार की क्रिया करते देख आश्चर्यचकित थे। शहरों में तो लड़कियां यह कार्य करने लगी है किंतु बिजनौर जैसे छोटे शहर के लिए यह सब नया था किंतु मुझे यह देखकर अच्छा लगा कि इन बेटियों ने साबित कर दिया कि वे बेटों से कम नही हैं ।