Sunday, October 31, 2021

दुबई के साथ हुए कश्मीर में विकास के समझौते पर चुप्पी क्योंॽ 26 अक्तूबर 2021

 दुबई के साथ हुए कश्मीर में विकास के समझौते  पर चुप्पी क्योंॽ

अशोक मधुप

दुबई की सरकार  ने जम्मू −कश्मीर में विकास का बड़ा ढांचा तैयार करने का बहुत बड़ा  निर्णय लिया है। इसके लिए उसने जम्मू −कश्मीर सरकार से एमओयू( समझौता) किया है। चार दिन  पहले हुआ समझौता देश  और दुनिया के लिए बड़ी खबर था,  पर देश की राजनीति और अखबारी दुनिया में ये समाचार  दम तोड़ कर रह गया। हालत यह है कि इस बड़े कार्य के लिए देश की पीठ थप−थपाने वाले भारत के अखबार− पत्रकार और नेता चुप हैं, जबकि इस समझौते को लेकर पाकिस्तान में हलचल है।

जम्मू −कश्मीर के विपक्षी नेताओं से इस समझौते पर कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी। उनके लिए तो ये खबर पेट में दर्द करने वाली ज्यादा है।हाल में कांग्रेस सासंद राहुल गांधी ने जम्मू− कश्मीर में बाहरी व्यक्तियों की मौत पर नाराजगी जताई थी। उन्होंने ये भी कहा था कि अनुच्छेद 370 हटाने का क्या लाभ हुआॽ जब लाभ  हुआ तो उनकी बोलती बंद है।  

दुनिया के अधिकांश देश जम्मू− कश्मीर को  विवादास्पद क्षेत्र मानते रहे हैं।  पाकिस्तान जम्मू− कश्मीर विवाद को प्रत्येक मंच पर उठाकार भारत को बदनाम करने की कोशिश करता  रहा है।इस सबके बावजूद ये समझौता भारत सरकार की बड़ी उपलब्धि है।

जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने इस बारे में बताया कि दुबई सरकार और जम्मू-कश्मीर सरकार ने एक समझौता किया है।दुबई से समझौते में औद्योगिक पार्क, आईटी टावर, बहुउद्देश्यीय टावर, रसद केंद्र, एक मेडिकल कॉलेज और एक स्पेशलिटी हॉस्पिटल सहित बुनियादी ढांचे का निर्माण होना शामिल है।राज्यपाल ने  दुबई की ओर जम्मू-कश्मीर प्रशासन के साथ यह समझौता इस क्षेत्र में (केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद) किसी विदेशी सरकार की ओर से पहला निवेश समझौता है। यह समझौता आत्मानिर्भर जम्मू-कश्मीर बनाने की हमारी प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है।

केंद्रीय एवं वाणिज्य उद्योग मंत्रालय ने सोमवार को एक प्रेस रिलीज़ में बताया था कि इस समझौते के तहत दुबई की सरकार जम्मू-कश्मीर में रियल एस्टेट में निवेश करेगी, जिनमें इंडस्ट्रियल पार्क, आईटी टावर्स, मल्टीपर्पस टावर, लॉजिस्टिक्स, मेडिकल कॉलेज, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल शामिल हैं।ये तो नहीं बताया गया कि दुबई की सरकार  कितना निवेश करेगी।पर यदि वह यहां एक भी रूपया लगाता है तो ये देश की बड़ी उपलब्धि है। जबकि वह कश्मीर में करोड़ों डालर निवेश करने जा रहा है ।अनुच्छेद 370 हटने के बाद दुबई दुनिया का पहला देश है जो जम्मू कश्मीर के विकास में निवेश करने जा रहा है।ये समझौता ऐसे समय में हुआ है जब घाटी में आतंकियों ने मासूम नागरिकों, खासतौर पर गैर-मुस्लिमों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। 

भारत की मीडिया और नेता देश की उपलब्धि पर भले ही चुप हो पर पाकिस्तान में हलचल है। इस मुद्दे पर पाकिस्‍तान के पूर्व राजनयिक अब्‍दुल बासित ने इसको भारत की बड़ी जीत बताया है।  अब्‍दुल बासित पाकिस्‍तान के भारत में राजदूत रह चुके हैं।  बासित ने यहां तक कहा है कि इस एमओयू के साइन होने के बाद ये बात साफ होने लगी है कि अब कश्‍मीर का मुद्दा पाकिस्‍तान के हाथों से निकलता जा रहा हैउन्‍होंने कश्‍मीर मुद्दे के फिसलने को मौजूदा इमरान सरकार की कमजोरी बताया है। उन्‍होंने ये भी कहा कि नवाज शरीफ सरकार में भी कश्‍मीर के मुद्दे को कमजोर ही किया। बासित के मुताबिक दुबई और भारत के बीच हुए इस सहयोग के बाद निश्‍चित तौर पर ये भारत की बड़ी जीत है।

पाकिस्‍तान के राजनयिक के मुताबिक दुबई की इस्‍लामिक सहयोग संगठन में काफी अहम भूमिका है। इस नाते भी ये करार काफी अहमियत रखता है।बासित ने कहा है कि  अब ये हाल हो गया है कि एक मुस्लिम देश भारत के जम्मू− कश्मीर में निवेश के लिए एमओयू साइन कर रहा है। बासित ने ये भी कहा कि आने वाले दिनों में ये भी हो सकता है कि ईरान और यूएई जम्‍मू कश्‍मीर में अपने काउंसलेट खोल दें। उन्‍होंने कहा कि हाल के कुछ समय में पाकिस्‍तान को कश्‍मीर के मुद्दे पर मुंह की खानी पड़ी है। इस मुद्दे पर वो पूरी तरह से अलग-थलग पड़ चुका है।

छोटी−मोटी बात पर सरकार की आलोचना करने वाला आज देश का विपक्ष इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर चुप्पी साध जाए, मीडिया में खबर को जगह न मिले,  इस पर संपादकीय न लिखे जांए, तो यह आपकी सोच को बताता है।

 अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

Saturday, October 16, 2021

अमेरिका में भारतीय भी मनाते हैं हैलोवीन फेसबुक 31 अक्तूबर 2021

अमेरिका में भारतीय भी मनाते हैं हैलोवीन
अशोक मधुप
हेलोवीन ईसाइयों का त्योहार है पर अमेरिका में रहने वाले रहने वाले भारतीय भी इसे उत्साह से मनाते हैं।
हैलोवीन शब्द का इस्तेमाल पहली बार 16वीं शताब्दी में हुआ था। इसके बारे में बहुत सी अलग- अलग कहानी है।हर जगह की अपनी कहानी । माना जाता है कि किसान लोग बुरी आत्माओं से फसलों को बचाने के लिए भूतिया कपड़े पहनते हैं ताकि बुरी आत्माओं को डराकर भगाया जा सके। ऐसे में हेलोवीन ही वो दिन है जिस दिन किसान भूतिया कपड़े पहनकर आत्माओं को डराते हैं। यह भी मान्यता है कि 31 अक्टूबर का दिन फसल कटाई का आखिरी दिन होता है। ऐसे में पूर्वजों की आत्माएं फसल की कटाई में हाथ बंटाने के लिए आती हैं। अमेरिका में बसे भारतीय अपने भारतीय पर्व की तरह इस हैलोवीन डे को भी उत्साह के साथ मनाते हैं।
तीन साल पहले अक्टूबर माह में हम पति−पत्नी अमेरिका में थे।बेटा अंशुल कुमार वहां फ्लोरिडा राज्य के टेम्पा शहर में रहता है। ये पर्व मुख्य रूप से 31 अक्टूबर को मनाया जाता है। पर्व से एक सप्ताह पहले से लोगों के घरों के दरवाजे पर भूत और अस्थि पंजर के पोस्टर दिखाई देने लगे। कुछ ने अस्थि पंजर के डिजाइन घर के द्वार के पास लगा लिए । बेटा अंशुल भी एक ऐसा काले रंग का गुब्बारा लेकर आया। उसने गुब्बारा फुलाकर ऊपर अपने कमरे की बालकनी में लगा दिया। उसमें लाइट की भी व्यवस्था थी।लाइट के जलने पर यह जगमगाता भूत ही लग रहा था। वह
वॉलमार्ट से एक पैकेट भी लाया।इसमें से निकला धागा सा घर के बाहर पेड़ों की झाडियों फैला शुरू दिया। बताया कि पापा यहां ईसाई लोग 31 अक्टूबर को हेलोवीन डे मनाते हैं। वे यह मानते हैं इस दिन रात के समय भूत घूमते हैं। इसलिए दरवाजों के बाहर भूत की उपस्थिति जैसी चीजें तैयार की जाती है। पेड़ पौधों पर मकड़ियों के जाले लगा दिए जाते हैं, जिससे लगे कि यह खंडहर है और यहां भूत प्रेत रहते हैं। दरवाजों के बाहर भूत की तस्वीरें चिपका दी जाती है। मान्यता है कि इसे देख रात में घूमने निकले भूत दूर से ही वापिस चले जातें हैं।
30 की शाम में अंशुल ने मुझसे कहा कि पापा तैयार हो जाओ ।सोसाइटी के हेलोवीन फंक्शन में चलना है। मैं ,पत्नी निर्मल शर्मा,पोती अदिति अंशुल के साथ कार्यक्रम में चले गए। हॉल में अंधेरा हो रहा था। लाइटों की शेड चमक रहे थे। बच्चे भूत के कपड़े पहने हुए, भूत का डरावना मुखोटा लगाए हॉल में गोल-गोल घूमकर डांस कर रहे थे। काफी देर तक कार्यक्रम चला।
उसके बाद युवा और बड़े व्यक्तियों ने भूत बने बच्चों को टॉफी और चॉकलेट बांटी। सोसाइटी की ओर खाने की व्यवस्था थी। हमने खाना खाया और चले आए।
अगले दिन सोसायटी में रहने वाले भारतीय इस पर्व को मनाने वाले थे। दोपहर में भारतीय बच्चे और महिलाएं चेहरे पर तरह-तरह के मुखोटे लगाएं सोसाइटी में भारतीय परिवारों के घर गए। इन घरों पर आने वाले बच्चों को तोहफे में टॉफी और चॉकलेट दी गईं। युवक अपने− अपने आफिस गए थे, इसलिए वे कार्यक्रम से दूर रहे।
हमारा घर सोसाइटी के शुरुआत में पड़ता था। सोसाइटी के बैक साइड से भूत बने आए बच्चे और महिलाएं हमारे घर आईं। यहां बच्चों को चॉकलेट दिये गए। घर के बाहर सबने ग्रुप कराया और आगे बढ़ गए।
भूत बने भारतीय बच्चे मास्क लगाए खूब मनोरंजन कर रहे थे। एक दूसरे को डरा रहे थे । कुछ बच्चे आपस में मास्क बदलकर फोटो भी करा रहे थे।हेलोवीन में कद्दू की लालटेन बनाने की परंपरा है। सूखे कद्दू को खोखला करके उसमें डिजाइन से आदमी का चेहरा बनाया जाता है। कद्दू में छेद किए जाते हैं। इस कद्दू के बीच में रोशनी के लिए मोमबत्ती लगाई जाती है। इसे लेकर हेलोवीन की रात में लोग घूमते हैं। बाद में अपने दरवाजे पर टांग देते हैं।
इस त्योहार का प्रचार हुआ तो मांग के अनुरूप कद्दू की बनी लालटेन मिलनी बन्द हो गई। कद्दू की जगह प्लास्टिक की लालटेन ने ले ली है। भारतीय बच्चे भी अपने हाथों में लालटेन लिए हुए थे। पर इनमें रोशनी नही थी।बड़ों से मिलने टॉफी और चॉकलेट उसमें रखते जा रहे थे।
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Saturday, October 2, 2021

गांधी जयंती पर मेरा लेख

 प्रभासाक्षी में मेरा स्तम्भ।इसी लेख को सनशाइन न्यूज पोर्टल और घमासान.काम पोर्टल ने भी चलाया।आभार सम्पादक जी।


 

स्तंभ

गांधीजी के जमाने का नहीं, बहुत पुराना है शांति और अहिंसा का संदेश

अशोक मधुप Oct 02, 2021 10:13

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गांधीजी के जमाने का नहीं, बहुत पुराना है शांति और अहिंसा का संदेश

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स्तंभ

शांति अहिंसा का संदेश महात्मा गांधी का संदेश नहीं था। यह भारत का युगों-युगों का संदेश है। उन्होंने भारत के प्राचीन शान्ति और अहिंसा के आदेश को आगे बढ़ाया। प्रारंभ से भारतवासी शांति और अहिंसा के पुजारी रहे हैं। उन्होंने कभी अपनी ओर से युद्ध नहीं छेड़ा।

आज गांधी जयन्ती है। महात्मा गांधी का जन्मदिन। वही महात्मा गांधी, जिनका देश को आजादी दिलाने में बड़ा योगदान माना जाता है। आजादी के इस आंदोलन के साथ उन्होंने शांति और अहिंसा का संदेश दिया। कोशिश की कि अंग्रेज अहिँसा की शक्ति को पहचानें। अंग्रेज जो खुद ईसाई थे। वे प्रभु यीशु के अनुयायी थे। प्रभु यीशु जो अपने शत्रुओं को भी क्षमा करने की बात करते थे। अपने को नुकसान पहुंचाने वालों को माफ करने में जिनका यकीन था।


शांति अहिंसा का संदेश महात्मा गांधी का संदेश नहीं था। यह भारत का युगों-युगों का संदेश है। उन्होंने भारत के प्राचीन शान्ति और अहिंसा के आदेश को आगे बढ़ाया। प्रारंभ से भारतवासी शांति और अहिंसा के पुजारी रहे हैं। उन्होंने कभी अपनी ओर से युद्ध नहीं छेड़ा। अपने आप तलवार नही उठाई। उनकी कोशिश रही कि सब शांति से निपट जाए। पर जब सामने वाले ने शांति और अहिंसा को मानने वाले की कायरता समझी तो मजबूरी में उन्हें युद्ध करना पड़ा। महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी दोनों का युग एक था। दोनों युद्ध के विपरीत थे। दोनों ने शांति की बात की। ऐसा नहीं है कि यह भगवान बुद्ध और भगवान महावीर के समय में हुआ हो। ये तो आदि काल से चला आया है। यह तो आर्यवृत की संस्कृति है। विरासत है।

महाभारत काल में भी कौरव पांडव के बीच युद्ध ना हो, इसके लिए बार-बार प्रयास हुए। युद्ध टालने के लिए समझौते के प्रस्ताव लेकर दूत गए। महाभारत काल में तो भगवान श्रीकृष्ण पांडव के दूत बनकर स्वयं कौरवों के पास पहुंचे। किसी भी प्रस्ताव पर तैयार न होने पर उन्होंने दुर्योधन से पांडवों को सिर्फ पांच गांव देने का ही प्रस्ताव किया। इस प्रस्ताव को स्वीकार न करने के बाद ही पांडवों को युद्ध का निर्णय लेना पड़ा। कौरवों ने भगवान श्रीकृष्ण का पांच गांव देने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया होता तो महाभारत जैसा विनाशकारी युद्ध ना होता। एक ही परिवार वाले एक दूसरे के खून के प्यासे ना बनते। महाभारत काल में अनगिनत महाबली योद्धा थे। ये सब कुरुक्षेत्र के मैदान की भेंट चढ़ गए। यदि दुर्योधन ने शान्ति का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया होता तो कुरुक्षेत्र के मैदान में लाशों के ढेर न लगते। और सब शांति के साथ में निपट गया होता। एक महाविनाश बच जाता।

ऐसे ही भगवान राम ने महाबली रावण के पास शांति का प्रस्ताव भेजा। सीता का पता लगाने के नाम पर पहले हनुमान श्रीलंका गए। रावण को समझाया। ना मानने पर लंका जलाकर यह भी बता दिया कि भगवान राम की सेना का एक ही वीर श्रीलंका को जला सकता है तो श्रीराम और उनकी सेना तो उनका महाविनाश करने में भी पूरी तरह सक्षम है। पर रावण नहीं माना। इसके बाद भी युद्ध की शुरुआत से पूर्व भगवान राम ने रावण के पास अंगद को शांति का प्रस्ताव लेकर भेजा। भगवान राम चाहते थे कि किसी तरह रावण को सद्बुद्धि आ जाए। वह माता सीता को ससम्मान वापस कर दे और महाविनाश बच जाए। अंगद ने भरपूर कोशिश की। सब प्रकार से महाबली रावण को समझाना चाहा। हठी स्वभाव के कारण शांति का प्रस्ताव स्वीकार न करने पर भगवान राम और रावण का महा भीषण युद्ध हुआ। दोनों पक्षों को क्षति तो हुई पर श्रीलंका के मेघनाथ और कुंभकरण जैसे महाबली इस युद्ध की भेंट चढ़ गये। एक राक्षस संस्कृति इस विनाश की भेंट चढ़ गई।


-अशोक मधुप

Monday, August 23, 2021

नजीबाबाद के चौधरी अमन सिंह की जमीन में बना गुरूकुल विश्वविद्यालय

विश्वविद्यालय केम्पस में मुंशी अमन सिंह के
नाम पर
                   पर बना अमनचौक





     मुंशी अमन सिंह के नाम पर 
     बना अमन गेट









नजीबाबाद के चौधरी अमन सिंह की जमीन में बना गुरूकुल विश्वविद्यालय गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार देश का जाना मना विश्वविद्यालय है। उसकी स्थापना 1902 में स्वामी श्रद्धानंद जी हरिद्वार से उत्तर में कांगड़ी गांव में तबके बिजनौर जनपद में की। आज इसका केम्पस हरिद्वार से चार किलोमीटर दूर दक्षिण में है।इसके तीन संभाग है। मुख्य केम्पस हरिद्वार( केवल पुरुषों के लिए है )। 2,कन्या गुरुकुल महाविद्यालय हरिद्वार/ केवल कन्याओं के लिए है -कन्या गुरुकुल महाविद्यालय देहरादून- केवल कन्याओं के लिए आज इसमें हजारों छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं इसका अपना बहुत बड़ा संकाय है किंतु यह भी नहीं जानते किसके लिए बिजनौर जनपद के नजीबाबाद के रहने वाले चौधरी अमन सिंह ने अपना 1200 बीघा जमीन का कागड़ी गांव और अपने पास एकत्र सम्पूर्ण राशि ₹11000 इसकी स्थापना के समय इस विद्यालय को दान की थी। मुंशी अमन सिंह की जगह हरिद्वार से सटे पहाड़ियों में स्थित कांगड़ी गांव में है । ऐसी ही जगह पहाड़ियों में महात्मा मुंशीराम का अपना गुरुकुल बनाने का सपना था। कांगडी उस समय बिजनौरं जनपद में होती थी। अब हरिद्वार जिला बनने के बाद यह हरिद्वार में चला गया। 19वीं शताब्दी में भारत में दो प्रकार की शिक्षापद्धतियाँ प्रचलित थीं। पहली पद्धति ब्रिटिश सरकार द्वारा अपने शासन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विकसित की गई सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों की प्रणाली थी और दूसरी संस्कृत, व्याकरण, दर्शन आदि भारतीय वाङ्मय की विभिन्न विद्याओं को प्राचीन परंपरागत विधि से अध्ययन करने की पाठशाला पद्धति। अत: सरकारी शिक्षा पद्धति में भारतीय वाङ्मय की घोर उपेक्षा करते हुए अंग्रेजी तथा पाश्चात्य साहित्य और ज्ञान विज्ञान के अध्ययन पर बल दिया गया। इस शिक्षा पद्धति का प्रधान उद्देश्य मेकाले के शब्दों में 'भारतीयों का एक ऐसा समूह पैदा करना था, जो रंग तथा रक्त की दृष्टि से तो भारतीय हो, परंतु रुचि, मति और अचार-विचार की दृष्टि से अंग्रेज हो'। इसलिए यह शिक्षापद्धति भारत के राष्ट्रीय और धार्मिक आदर्शों के प्रतिकूल थी। दूसरी शिक्षा प्रणाली, पंडितमंडली में प्रचलित पाठशाला पद्धति थी। इसमें यद्यपि भारतीय वाङ्मय का अध्ययन कराया जाता था, तथापि उसमें नवीन तथा वर्तमान समय के लिए आवश्यक ज्ञान विज्ञान की घोर उपेक्षा थी। उस समय देश की बड़ी आवश्यकता पौरस्त्य एवं पाश्चात्य ज्ञान विज्ञान का समन्वयय करते हुए दोनों शिक्षा पद्धतियों के उत्कृष्ठ तत्वों के सामंजस्य द्वारा एक राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली का विकास करना था। इस महत्वपूर्ण कार्य का संपन्न करने में गुरुकुल काँगड़ी ने बड़ा सहयोग दिया। गुरुकुल के संस्थापक महात्मा मुंशीराम पिछली शताब्दी के भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण में असाधारण महत्व रखने वाले आर्यसमाज के प्रवर्तक महर्षि दयानंद (1824-1883 ई.) के सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'सत्यार्थ प्रकाश' में प्रतिपादित शिक्षा संबंधी विचारों से बड़े प्रभावित हुए। उन्होंने 1897 में अपने पत्र 'सद्धर्म प्रचारक' द्वारा गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के पुनरुद्वार का प्रबल आन्दोलन आरम्भ किया। 30 अक्टूबर 1898 को उन्होंने इसकी विस्तृत योजना रखी। नवंबर, 1898 ई. में पंजाब के आर्य समाजों के केंद्रीय संगठन आर्य प्रतिनिधि सभा ने गुरुकुल खोलने का प्रस्ताव स्वीकार किया । महात्मा मुंशीराम ने यह प्रतिज्ञा की कि वे इस कार्य के लिए, जब तक 30,000 रुपया एकत्र नहीं कर लेंगे, तब तक अपने घर में पैर नहीं रखेंगे। तत्कालीन परिस्थितियों में इस दुस्साध्य कार्य को अपने अनवरत उद्योग और अविचल निष्ठा से उन्होंने आठ मास में पूरा कर लिया। 16 मई 1900 को पंजाब के गुजराँवाला स्थान पर एक वैदिक पाठशाला के साथ गुरुकुल की स्थापना कर दी गई। किन्तु महात्मा मुंशीराम को यह स्थान उपयुक्त प्रतीत नहीं हुआ। वे शुक्ल यजुर्वेद के एक मंत्र (26.15) उपह्वरे गिरीणां संगमे च नदीनां धिया विप्रो अजायत के अनुसार नदी और पर्वत के निकट कोई स्थान चाहते थे। इसी समय नजीबाबाद के धर्मनिष्ठ रईस मुंशी अमनसिंह जी ने इस कार्य के लिए महात्मा मुंशीराम जी को 1,200 बीघे का अपना कांगड़ी ग्राम दान दिया। हिमालय की उपत्यका में गंगा के तट पर सघन रमणीक वनों से घिरी कांगड़ी की भूमि गुरुकुल के लिए आदर्श थी। अत: यहाँ घने जंगल साफ कर कुछ छप्पर बनाए गए और होली के दिन सोमवार, 4 मार्च 1902 को गुरुकुल गुजराँवाला से कांगड़ी लाया गया। गुरुकुल का आरम्भ 34 विद्यार्थियों के साथ कुछ फूस की झोपड़ियों में किया गया। पंजाब की आर्य जनता के उदार दान और सहयोग से इसका विकास तीव्र गति से होने लगा। 1907 ई. में इसका महाविद्यालय विभाग आरंभ हुआ। 1912 ई. में गुरुकुल कांगड़ी से शिक्षा समाप्त कर निकलने वाले स्नातकों का पहला दीक्षान्त समारोह हुआ। सन १९१६ में गुरुकुल काँगड़ी फार्मेसी की स्थापना हुई। आरम्भ से ही सरकार के प्रभाव से सर्वथा स्वतंत्र होने के कारण ब्रिटिश सरकार गुरुकुल कांगड़ी को चिरकाल तक राजद्रोही संस्था समझती रही। 1917 ई. में वायसराय लार्ड चेम्ज़फ़ोर्ड के गुरुकुल आगमन के बाद इस संदेह का निवारण हुआ। 1921 ई. में आर्य प्रतिनिधि सभा ने इसका विस्तार करने के लिए वेद, आयुर्वेद, कृषि और साधारण (आर्ट्‌स) महाविद्यालय बनाने का निश्चय किया। 1923 ई. में महाविद्यालय की शिक्षा और परीक्षा विषयक व्यवस्था के लिए एक शिक्षापटल बनाया गया।… 24 सितंबर 1924 ई. को गुरुकुल पर भीषण दैवी विपत्ति आई। गंगा की असाधारण बाढ़ ने गंगातट पर बनी इमारतों को भयंकर क्षति पहुँचाई। भविष्य में बाढ़ के प्रकोप से सुरक्षा के लिए एक मई 1930 ई. को गुरुकुल गंगा के पूर्वी तट से हटाकर पश्चिमी तट पर गंगा की नहर पर हरिद्वार के समीप वर्तमान स्थान में लाया गया। 1935 ई. में इसका प्रबन्ध करने के लिए आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाब के अंतर्गत एक पृथक विद्यासभा का संगठन हुआ। अमन सिंह को सम्मान देने के लिए विश्व विद्यालय केम्पस में इनके नाम से अमन चौक बना हुआ है। विश्व विद्यालय का प्रवेश द्वार भी इनके नाम पर है।उसका नाम अमन द्वार है।अशोक मधुप

Sunday, August 22, 2021

अलीगढ़ का शराब कांड व्यवस्था जन्य है

अलीगढ़ का शराब कांड व्यवस्था जन्य है अशोक मधुप अलीगढ़ में जहरीली शराब पीने से मरने वालों की संख्या 80 से ज्यादा हो गर्इ।एक साल में उत्तर प्रदेश में विषाक्त शराब पीने से 150 के आसपास मौत हुर्इं हैं। ये एक बड़ी संख्या है। 2008 से 2020 तक के 12 साल में नकली और मिलावटी शराब पीने से 452 व्यक्ति मरे हैं।ये सरकारी आंकड़े हैं। मौत तो इससे काफी ज्यादा बतार्इ जा रही हैं। अलीगढ़ में शराब से हुर्इ मौत अलग हैं।ये घटना बिल्कुल अलग है।ये गांव में देहात में बन और बिक रही शराब से मौत होने की घटना नहीं है।यह मौत उस शराब से हुर्इ है, जो सरकारी ठेकों से बेची जा रही है।अब तक शराब से मौत सस्ती के चक्कर में गांव की बनी कच्ची शराब से होती थीं।ठेकों की शराब मंहगी होती हैं। सरकार को इससे काफी टैक्स मिलता है।सरकार के देख रेख में ये ठेके चलते हैं। गरीब नसेड़ी −सस्ती के चक्कर में गांव की बनी शराब खरीद कर प्रयोग करता है। गांव− देहात में शराब बनाने वालों को इनके बनाने की जानकारी ज्यादा नहीं होती। न उनके पास शराब की तेजी नापने के उपकरण होते हैं। इसीलिए उसके कर्इ बार परिणाम गलत आते हैं। ये ही मौत का कारण बनते हैं किंतु इस बार की घटना इससे अलग है। मरने वालों ने इस बार शराब सरकारी ठेके से खरीदी। उन ठेकों से जिनकी गुणावत्ता और सही माल की आपूर्ति के लिए पूरा प्रशासनिक अमला है। पुलिस और प्रशासन की तो संयुक्त जिम्मेदारी है ही। दो सौ ग्राम का 42 डिगरी का (पव्वा ) शराब की बोलत फैक्ट्री से नौ −सवा नौ रुपये के आसपास चलती है। ये ठेकेदार को 66.70 रुपये की मिलती है। इस प्रकार ये पव्वा कहलाने वाली दो सौ ग्राम शराब पर सरकार 56 रुपये के आसपास टैक्स लेती है। 13 रुपये के आसपास लाइसैंसी अपना खर्च लेकर ग्राहक को 80 रुपये के आसपास बेचते हैं। 56 रुपये के टैक्स के बाद सरकार का लाइसैंस शुल्क आदि भी होता है। दस रुपये की शराब पर लाइसैंस शुल्क और टैक्स लगभग 58− 60 के आसपास पड़ता है। दस रुपये की शराब 80 रुपये में खरीदने वाला ग्राहक समझता है कि उसे सही शराब मिल रही है। ऐसे में ठेके से जहरीली शराब मिल रही है तो प्रदेश की मशीनरी जिम्मेदार है। प्रदेश की व्यवस्था दोषी है। इसकी जिम्मेदारी इन सबकी है।ठेकों से बिकने वाली शराब की गुणावत्ता के लिए प्रदेश में अलग से पूरा आबकारी विभाग है। इस विभाग के अधिकारी जिम्मेदार हैं।आबकारी विभाग के वे सिपाही जिम्मेदार हैं जो वर्षों से एक ही जगह जमे हैं। इन विभागीय अधिकारियों −कर्मचारियों पर मरने वालों की हत्या के मुकदमें चलने चाहिए। सरकार ठेकों से बिकने वाली शराब से मोटा टैक्स लेती है। प्रति बोतल टैक्स निर्धारित है। इसलिए उसकी भी जिम्मेदारी बनती है। मरने वाले के परिवार को मुआवजा दे। जहरीली शराब पीने से मौत होती रहती हैं। मौत होने पर शोर मचता है। कुछ अधिकारियों पर कार्रवार्इ का चाबुक चलता है। कुछ दिन बाद सब ठीक हो जाता है। अधिकारी बहाल हो जाते हैं। कुछ दिन बाद फिर नया कांड हो जाता है।ये अलग तरह की घटना है। इसमें हुर्इ मौत व्यवस्था जन्य हैं।इन्हें क्षमा नहीं किया जा सकता। अलीगढ़ में तैनात आबकरी विभाग का अमला इन मौत के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है। इन पर हत्या के मुकदमें दर्ज होने चाहिए। साथ ही मृतकों के परिवार को दिया जाने वाला मुआवजा इनके वेतन से वसूला जाना चाहिए। इस प्रकरण में इतनी कठोर कार्रवार्इ होनी चाहिए कि आगे से कोर्इ ऐसा करने का दुस्साहस न कर सके। अशोक मधुप