Wednesday, October 2, 2024

सरंक्षित हों तीर्थस्थल की हिन्दू वंशावलियों की पंजिका


अशोक मधुप

वरिष्ठ पत्रकार

हिंदू तीर्थस्थल धार्मिक मान्यताओं  और पूजन अर्चन के लिए विख्यात है।इन सब कार्य को इन स्थलों के ब्राह्मण पंडित कराते  हैं। ये  ब्राह्मण पंडित पंडा कहे जाते  हैं।ये  पंडा  सदियों से एक कार्य करते और कराते  आ रहे हैं। ये  पंडा अपने पास आने वाले यजमान( भक्तों )के परिवार का इतिहास अपनी बहियों में संजोते जा रहें   हैं। ये काम सदियों से अनवरत रूप से  जारी है। ये हिन्दू वंशावलियों की पंजिकाएं  एतिहासिक धरोहर हैं। आज इनके संरक्षण की आवश्यक्ता है।इनके संजोकर रखने की जरूरत   है।

हिंदू   परिवारों को  इस बारे में बहुत कम यान के बराबर जानकारी है। उन्हें पता भी नही कि इन स्थानों पर उनके परिवार का इतिहास संग्रहित है। सदियों से बहियों में  ये रिकार्ड व्यापारी के खाते की तरह लिखकर रखा  जा रहा है। अधिकतर भारतीयों व वे परिवार जो विदेश में बस गए  उनको आज भी पता नहीं कि इन तीर्थस्थल की पंडो की   बहियों में उनके परिवार की वंशावली दर्ज है। हिन्दू परिवारों की पिछली कई पीढ़ियों की विस्तृत वंशावलियां  इन पंडा के पास संग्रहित हैं।ये पंडा  आने वाले यजमान से उसके परिवार की जानकारी नोट करने के बाद उसके हस्ताक्षर कराकर बही में अपने  पास रखते हैं। ये पंडा ये  बहियां अपनी आने वाली अपनी पीढ़ी को  सौंपते  जाते  हैं। ये  बहियां जिलों व गांवों के आधार पर वर्गीकृत की गयीं हैं।प्रत्येक जिले की पंजिका का विशिष्ट पंडित होता है। यहाँ तक कि भारत के विभाजन के उपरांत जो जिले व गाँव पाकिस्तान में रह गए व हिन्दू भारत आ गए उनकी भी वंशावलियां यहाँ हैं। कई स्थितियों में उन हिन्दुओं के वंशज अब सिख हैं, तो कई के मुस्लिम अपितु ईसाई भी हैं। किसी − किसी की  सात वंश या उससे भी ज्यादा की जानकारी पंडों के पास रखी इन वंशावली पंजिकाओं से होना साधारण सी बात है।

शताब्दियों पूर्व से  हिन्दू पूर्वजों ने हरिद्वार या किसी  पावन नगरी की यात्रा की1  तीर्थयात्रा के लिए या/  शव- दाह या स्वजनों के अस्थि व राख का गंगा जल में किया होगा तो वे संबद्ध  पंडा के पास गए होंगे। ये पंडा  इन आने वालों के रहने खाने तक की वयवस्था करते हैं1 इन पंडाओं ने अपनी पंजिका में  वंश- वृक्ष को संयुक्त परिवारों में हुए सभी विवाहों, जन्म व मृत्युओं के विवरण दर्ज किया हुआ हैं।वर्तमान में धार्मिक स्थल पर  जाने वाले भारतीय हक्के- बक्के रह जाते हैं जब वहां के पंडित उनसे उनके  अपने वंश- वृक्ष को नवीनीकृत कराने को कहते हैं।

आजकल जब संयुक्त हिदू परिवार का चलन ख़त्म हो गया है।  लोग एकल परिवारों को तरजीह दे रहे हैं,ये  पंडित चाहते हैं कि आगंतुक अपने फैले परिवारों के लोगों व अपने पुराने जिलों- गाँवों, दादा- दादी के नाम व परदादा- परदादी और विवाहों, जन्मों और मृत्यु, परिवारों में हुए  विवाह  आदि की पूरी जानकारी के साथ वहां आएं। आगंतुक परिवार के सदस्य को सभी जानकारी नवीनीकृत करने के उपरांत वंशावली पंजीका को भविष्य के पारिवारिक सदस्यों के लिए व प्रविष्टियों को प्रमाणित करने के लिए हस्ताक्षरित करना होता है। साथ आये मित्रों व अन्य पारिवारिक सदस्यों से भी साक्षी के तौर पर हस्ताक्षर करने की विनती की जा सकती है।

इन तीर्थ स्थल के पुरोहितों के पास देश और दुनिया भर के यजमानों का दशकों पुराना लिखित रिकॉर्ड वंशावली के रूप में मौजूद है। किसी यजमान के आने पर चंद मिनटों में ही संबंधित पुरोहित कंप्यूटर से भी तेज गति से वंशावली देखकर उनके पूर्वजों की जानकारी दे देते हैं। पितृ पक्ष के दौरान इन तीर्थ स्थल पर  आने वाले लोग अपने तीर्थ पुरोहितों के पास आकर वंशावली में अपने वंश के बारे में जरूर जानते हैं। ये पंडे  जनपद के  हसाब से  हैं। तीर्थ स्थल में पहने वालों को  पता है कि किस जनपद के पंडा  कौन हैं। किसी दूसरे के  यजमान को कोई अन्य पंडा  खुद क्रिया− कर्म  नही कराता। संबधित जिले के पंडा के पास उसे  भेज देता है।   

शताब्दियों से  हो रहा ये लेखन भोज पत्रों और ताम्र पत्रों के बाद   अब कागज की बहियों पर शुरू किया गया। तीर्थ पुरोहितों के पास सैकड़ों वर्ष पुरानी बहियां आज भी सुरक्षित हैं। तीर्थ पुरोहितों की बहियों में देश भर के राजाओं, महाराजाओं, साधु, संतों, राजनेताओं एवं आम लोगों के परिवारों के वंश लेखन बहियों में मौजूद हैं। अकेले हरिद्वार में 30 हजार से अधिक की संख्या में वंशावली की बहियां सुरक्षित और संरक्षित हैं। इन बहियों में लेखन करने के लिए अलग स्याही तैयार करके तीर्थ पुरोहित वही लेखन करते हैं, जो काफी वर्षों तक सुरक्षित रहती है। इन वंशावलियों में जातियों, गोत्रों, उपगोत्रों का भी जिक्र रहता है। सबसे अहम बात इन बहियों में देखने को मिलती हैं कि तीर्थ पुरोहितों ने लेखन को भेदभाव से दूर रखा है। जहां राजाओं, महाराजाओं की वंशावलियां जिस क्रम में अंकित हैं, उसी क्रम में तीर्थ नगरी में पहुंचने वाले अन्य श्रद्धालुओं की हैं। विभिन्न राजवंशों की मुद्रांए, हस्त लेखन, दान पत्र, अंगूठे और पंजों के निशान बहियों में मौजूद हैं। यहां की वंशावलियों में देश की कई रियासतों के राजाओं के आने के उल्लेख दर्ज हैं।

अक्तूबर २००७ में हमें इंडियन वर्किग  जर्नलिस्ट की एक कांफ्रेस में बद्रीनाथ जाने का अवसर मिला। मेरे साथ गए मेरे दोस्त नरेंद्र मारवाड़ी भी थे। हम मारवाड़ी के साथ  बद्रीनाथ में,अजमेर के  महावर  वालों की धर्मशाला में चले गए। ये मारवाड़ी के परिवारवालों की धर्मशाला हैं1वहां पंडित जी से बात की।वंशानुक्रम के बारे में बताया।  बात करते-करते पंडित जी ने अपनी बही खोलकर उनके गोत्र का विवरण खोला तो पता चला कि मारवाड़ी के पिता जी 41वर्ष पूर्व यहां यात्रा को आए थे। यात्रा को आने के बाद हुए उनके दो बच्चों का विवरण दर्ज नहीं थे। पंडित जी  ने बही देखकर   बताया कि  ९३ साल पूर्व उनके दादा जी बद्रीनाथ आए थे। दोनों के आने की तिथि तक वही में दर्ज थी। उनके हस्ताक्षर भी बही में मौजूद थे। मित्र को अपने बाबा का नाम ज्ञात था। यहां बही से उन्होंने अपने बाबा के पिता उनके भाई, बाबा के दादा और उनके भाईयों आदि का विवरण नोट किया। पंडित जी ने अपनी वही में मित्र से अपने और उनके बच्चे, भाई और भाइयों के बच्चों की जानकारी नोट की। नीचे तारीख, माह,सन डालकर हस्ताक्षर कराए।

सदियों से  चले  आ रहा इतिहास को  संजोकर रखना  एक दुरूह कार्य है।इस कार्य को ये पंडे  सुगमता से पीड़ियों से करते  चले  आ रहे  हैं। आज    इस  इतिहास को संजोने  और संरक्षण की जरूरत है। अच्छा  रहे कि इनका  कंप्यूटरीकरण  हो  जाए। बहियों को लेमिनेट करके भी  संरक्षित किया  जा सकता है। कैसे भी हो , ये  होना चाहिए, नही तो  समय के साथ ये  गलता और खराब होता  चला जाएगा।। ये काम इनके व्यक्तिगत स्तर से संभव नही। सरकार को अपने स्तर से कराना  होगा, तभी ये संभव हो  पाएगा।

 

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Tuesday, September 17, 2024

चीन पर कभी यकीन नही किया जा सकता

 

चीन पर कभी यकीन नही किया  जा  सकता

अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

लगातार चार साल से चले  आ रहे भारत चीन के बीच तनाव के कम होने के संकेत हैं।  भारत और चीन के द्विपक्षीय संबंधों को लेकर हाल में घटनाक्रम  बहुत तेजी से घटा है। चीन भारत सीमा से सेना का पीछे हटना  बहुत अच्छा  है किंतु चीन की बात पर आंख मुंदकर यकीन नही किया जा सकता। समझौते करने के बाद अपनी बात से मुकरना उसकी आदत रही है। धोखा  देना  चीन का चरित्र है। उसपर पूरी तरह से नजर रखनी होगी। उसकी चाल के अनुरूप हमें अपना  व्यवहार  और तैयारी करना होंगी।

भारत चीन सीमा विवाद के सुलझने के संकेत गुरुवार को ही सेंट पीटर्सबर्ग में ब्रिक्स एनएसए लेवल की समिट के साइडलाइन्स पर हुई उस बैठक के दौरान ही दिख गए थे जो एनएसए अजित डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई थी। भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से बैठक के बाद जारी प्रेस नोट में इस बात का जिक्र था कि दोनों देशों ने बचे हुए क्षेत्रों में भी पूर्ण डिसएंगेजमेंट की दिशा में काम करने को लेकर सहमति जताई है। जानकार मानते हैं कि गतिरोध दूर करने करने की दिशा में ले जाने की प्रक्रिया एकाएक नहीं होती। इसके लिए बैकग्राउंड में काम होता रहता है ।

ओआरएफ में फेलो और चीन मामलों के जानकार कल्पित मणकिकर कहते हैं कि ' ऐसा एक लंबी प्रक्रिया के तहत होता है। दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और दोनों देशों के विदेश मंत्री लगातार मुलाकात करते आ रहे हैं। पिछले चार सालों से बॉर्डर मुद्दों को सुलझाने को लेकर कोशिशें लगातार हो रही है। सेना के कमांडर स्तर पर बातें अलग से होती रही हैं।भारत और चीन दोनों की ओर से इस तरह की कोशिशें की जा रही थी। हालांकि अब जो दिख रहा है, उसके मद्देनजर इस तरह की कोशिशें क्या दिशा लेंगी, इसे लेकर अभी वेट एंड वॉच की स्थिति में ही रहा जा सकता है। बॉर्डर पर आए गतिरोध के मद्देनजर विदेश मंत्रियों और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की बैठकें किए जाने का एक मैकेनिज्म तैयार किया गया है।

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पूर्वी लद्दाख में सीमा मुद्दे पर गुरुवार को कहा कि सैनिकों की वापसी से संबंधित मुद्दे लगभग 75 प्रतिशत तक सुलझ गए हैं लेकिन बड़ा मुद्दा सीमा पर बढ़ते सैन्यीकरण का है। जिनेवा में थिंकटैंक के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि जून 2020 में गलवन घाटी में हुए टकराव ने भारत-चीन संबंधों को समग्र रूप से प्रभावित किया।

जयशंकर ने कहा कि विवादित मुद्दों का समाधान ढूंढ़ने के लिए दोनों पक्षों में बातचीत चल रही है। हमने कुछ प्रगति की है। मोटे तौर पर सैनिकों की वापसी संबंधी करीब तीन-चौथाई मुद्दों का हल निकाल लिया गया है। लेकिन इससे भी बड़ा मुद्दा यह है कि हम दोनों ने अपनी सेनाओं को एक-दूसरे के करीब ला दिया है और इस लिहाज से सीमा का सैन्यीकरण हो रहा है।

सूत्रों का  कहना  है कि भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच पूर्वी लद्दाख में कुछ टकराव वाले बिंदुओं पर गतिरोध बना हुआ है। भारत कहता रहा है कि सेना  के पूर्व स्थान पर पहुंचे  बिना सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति नहीं होगी, चीन के साथ संबंध सामान्य नहीं हो सकते। जयशंकर ने कहा कि 2020 में जो कुछ हुआ, वह कुछ कारणों से कई समझौतों का उल्लंघन था जो अभी भी हमारे लिए पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं। चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर बहुत बड़ी संख्या में सैनिकों को तैनात किया और स्वाभाविक रूप से जवाबी तौर पर हमने भी अपने सैनिकों को भेजा।

2020 की झड़प के बाद से दोनों देश सीमा पर बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए भी प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, जिसे वास्तविक नियंत्रण रेखा के रूप में भी जाना जाता है। भारत द्वारा उच्च ऊंचाई वाले हवाई अड्डे तक एक नई सड़क का निर्माण चीनी सैनिकों के साथ 2020 में होने वाली घातक झड़प के मुख्य कारणों में से एक माना जा रहा है ।

इस बार चीनी सेना के सीमा से पीछे हटने का कारण चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के सदस्य वांग काबयान भी है। उन्होने इस बात पर जोर दिया कि अशांत विश्व का सामना करते हुए, दो प्राचीन पूर्वी सभ्यताओं और उभरते विकासशील देशों के रूप में चीन और भारत को स्वतंत्रता पर दृढ़ रहना चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि एकता और सहयोग का चयन करना चाहिए तथा एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाने से बचना चाहिए। वांग ने उम्मीद जताई कि दोनों पक्ष व्यावहारिक दृष्टिकोण के जरिए अपने मतभेदों को उचित ढंग से हल करेंगे और एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करने का उचित तरीका ढूंढेंगे । चीन-भारत संबंधों को स्वस्थ, स्थिर और सतत विकास के रास्ते पर वापस लाएंगे।

 

इतना सब हो रहा है पर जरूरी यह है कि दोनों का मई 2020 की यथास्थिति  पर वापस लौटना ही समाधान है। निश्चित रूप से पीछे हटना समाधान नहीं है। यदि निश्चित रूप से समाधान के रास्ते पर चले तो भारत नुकसान में  ही रहेगा। इन सब को देखकर भारत को चलना होगा। मई 2020 की स्थिति पर चीन सहमत होगा, ऐसा नही लगता।

 

 

सीमा  विवाद के चार साल के दौरान समाचार आए की चीन सीमा पर नए हवाई  अड्डे−सैनिक छावनी उनके लिए बंकर बना रहा है। अपने   सीमा से सटे क्षेत्र में गांव विकसित कर  रहा  है।भारतीय क्षेत्र के स्थानों क नाम  बदल रहा है।हालाकि विवाद की अवधि में भारत ने भी  सीमा पर सुरक्षा ढांचा विकसित किया है।नए एयरबेस तैयार कर रहा है। ठंडे स्थानों में रहने के लिए सैनिकों को प्रशिक्षित करने के साथ ही उनके लिए बर्फ के दौरान भी  रहने के लिए  सौलर से गर्म करने  वाले   उनके टैंट बना  रहा है।  इस प्रक्रिया  को भारत का और तेज करना  होगा।  सीमा रेखा के सटाकर गांव विकसित करने होंगे तोकि चीन की गतिविधि पर नजर रखी जा सके।एक तरह से चीन की प्रत्येक कार्रवाई का उत्तर उसके कदम ही से आगे बढकर देना  होगा।

एक बात और  चीन कभी का काबू में आ गया होगा, काश हम भारतीय सही अर्थ में देशभक्त होते।मई 2020 में चीन से विवाद होने पर भारतीयों की फेसबुक पर बड़ी देशभक्ति  दिखाई दी। लगाकि अब भारत में चीन का बना सामान नही आएगा। दीपावली पर व्यापारियों के आंकड़े भी आए कि चीन से बना  कोई सामान नही मंगाया गया। जबकि आंकड़े  इसके विपरीत हैं।आर्थिक शोध संस्थान ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई)   के अनुसार वित्त वर्ष 2023-24 में भारत और चीन के बीच कुल 118.4 अरब डॉलर का व्यापार हुआ। वहीं, अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार 118.3 अरब डॉलर रहा। 2021-22 और 2022-23 में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार अमेरिका रहा था। अब चीन है।अमेरिका से हम अस्त्र− शस्त्र  जैसे  महंगे सामान लेते हैं। इसलिए वहां से आयात जयादा होना चाहिए था।  चीन जानता  है कि भारतीय और भारतीय व्यापारी सस्ते के लालच में उसका ही माल खरीदेंगे। इसलिए वह हठधर्मी पर है,यदि चीन का  आयात दस प्रतिशत भी घट  गया  होता तो चीन कभी का भारत के आगे झुककर समझौता करने को मजबूर हो   जाता।   

Wednesday, September 11, 2024

अच्छी पहल है सीमाओं से सेना की वापसी

 अच्छी पहल है सीमाओं से सेना की वापसी

अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

 

 

भारत चीन दोनों ने दावा किया है कि पूर्वी लद्दाख सेक्टर के डेमचोक और देपसांग में दो टकराव बिंदुओं पर भारत और चीन के सैनिकों की वापसी शुरू हो गई है। रक्षा अधिकारियों ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच हुए समझौतों के अनुसार, भारतीय सैनिकों ने संबंधित क्षेत्रों में पीछे के स्थानों पर अपने उपकरण वापस खींचना शुरू कर दिया है।ऐसा होने से पिछले चार साल से अधिक समय से चल रहा सैन्य गतिरोध समाप्त हो गया है। चीन ने भी ऐसा ही दावा किया है।सीमा से सेना की वापसी एक अच्छी पहल  है। इससे विवाद वाले देशों  में शांति होती है।विकास होता है। अब तक तनाव के दौरान सीमा और  सेना पर किया जा रहा व्यय देश के विकास पर खर्च  होगा। इतना  सब होने  पर भी चीन के रवैये को देखकर उस पर यकीन नही किया जा सकता।  उसके बहुत सावधान रहने की जरूरत है। सीमा  पर विकास  कार्य लगातार चलाए रखने होंगे । सीमा तक सेना के अवागमन को सरल करने की प्रक्रिया  चलती रहनी चाहिए।  सीमा क्षेत्र में सूचना  तंत्र विकसित करने का  कार्य  लगातार चलना  चाहिए ।

24 अक्टूबर को नई दिल्ली में एक कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि  भारत और चीन दोनों देश समान और पारस्परिक सुरक्षा के सिद्धांतों के आधार पर “जमीनी स्थिति” बहाल करने के लिए आम सहमति पर पहुंच गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इसमें “पारंपरिक क्षेत्रों में गश्त और चराई” की बहाली शामिल है। रक्षा मंत्री ने संबंधों में प्रगति का श्रेय “निरंतर बातचीत में संलग्न होने की शक्ति को दिया, क्योंकि जल्द या बाद में, समाधान निकलेगा।”

बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के मौके पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की और पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर गश्त व्यवस्था पर दोनों देशों के बीच हुए समझौते का स्वागत किया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखना दोनों देशों की प्राथमिकता बनी रहनी चाहिए और आपसी विश्वास द्विपक्षीय संबंधों का आधार बना रहना चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत-चीन संबंध न केवल दोनों देशों के लोगों के लिए बल्कि वैश्विक शांति, स्थिरता और प्रगति के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। वहीं विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने 22 अक्टूबर को नई दिल्ली में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि भारत ने चीन के साथ गश्त व्यवस्था पर एक समझौता किया है, जिससे वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर स्थिति मई 2020 से पहले जैसी हो जाएगी।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर पेट्रोलिंग (गश्त) को लेकर हुए समझौता का श्रेय भारतीय सेना और कूटनीति को दिया। पूर्वी लद्दाख में देपसांग और डेमचोक क्षेत्रों में दोनों देशों की सेनाओं के बीच शुक्रवार को डिसएंगेजमेंट (सैनिक वापसी) की प्रक्रिया शुरू हुई, जो 29 अक्टूबर तक पूरी हो जाएगी। इसके बाद 30-31 अक्टूबर से गश्त फिर से शुरू की जाएगी।

पुणे में छात्रों के साथ संवाद करते हुए जयशंकर ने कहा कि संबंधों के सामान्य होने में अभी समय लगेगा, क्योंकि विश्वास और सहयोग को दोबारा स्थापित करना लंबी प्रक्रिया है। विदेश मंत्री ने बताया कि हाल ही में रूस के कजान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक में यह निर्णय लिया गया कि दोनों देशों के विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बैठक करेंगे और आगे की रणनीति पर विचार करेंगे।

जयशंकर ने कहा, "अगर आज हम उस मुकाम पर पहुंचे हैं, जहां हम हैं...तो इसका एक कारण यह है कि हमने अपनी जमीन पर डटे रहने और अपनी बात रखने के लिए बहुत दृढ़ प्रयास किया। सेना देश की रक्षा के लिए बहुत ही अकल्पनीय परिस्थितियों में (एलएसी पर) मौजूद थी, और सेना ने अपना काम किया और कूटनीति ने अपना काम किया।" उन्होंने यह भी बताया कि भारत अब पिछले एक दशक की तुलना में पांच गुना अधिक संसाधन लगा रहा है, जिससे सेना को प्रभावी ढंग से तैनात किया जा सका है।

ओआरएफ में फेलो और चीन मामलों के जानकार कल्पित मणकिकर कहते हैं कि ' ऐसा एक लंबी प्रक्रिया के तहत होता है। दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और दोनों देशों के विदेश मंत्री लगातार मुलाकात करते आ रहे हैं। पिछले चार सालों से बॉर्डर मुद्दों को सुलझाने को लेकर कोशिशें लगातार हो रही है। सेना के कमांडर स्तर पर बातें अलग से होती रही हैं।भारत और चीन दोनों की ओर से इस तरह की कोशिशें की जा रही थी। हालांकि अब जो दिख रहा है, उसके मद्देनजर इस तरह की कोशिशें क्या दिशा लेंगी, इसे लेकर अभी वेट एंड वॉच की स्थिति में ही रहा जा सकता है।

2020 की झड़प के बाद से दोनों देश सीमा पर बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए भी प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, जिसे वास्तविक नियंत्रण रेखा के रूप में भी जाना जाता है। भारत द्वारा उच्च ऊंचाई वाले हवाई अड्डे तक एक नई सड़क का निर्माण चीनी सैनिकों के साथ 2020 में होने वाली घातक झड़प के मुख्य कारणों में से एक माना जा रहा है । अच्छा यह है कि दोनों देश  मई 2020 की यथास्थिति  पर वापस लौटने पर सहमत ही नही हुए,  इस प्रक्रिया के लिए कार्य भी शुरू हो गया।

सीमा  विवाद के चार साल के दौरान समाचार आए की चीन सीमा पर नए हवाई  अड्डे−सैनिक छावनी उनके लिए बंकर बना रहा है। अपने   सीमा से सटे क्षेत्र में गांव विकसित कर  रहा  है।भारतीय क्षेत्र के स्थानों क नाम  बदल रहा है।हालाकि विवाद की अवधि में भारत ने भी  सीमा पर सुरक्षा ढांचा विकसित किया है।नए एयरबेस तैयार कर रहा है। ठंडे स्थानों में रहने के लिए सैनिकों को प्रशिक्षित करने के साथ ही उनके लिए बर्फ के दौरान भी  रहने के लिए  सौलर से गर्म करने  वाले   उनके टैंट बना  रहा है।  इस प्रक्रिया  को भारत का और तेज करना  होगा।  सीमा रेखा के सटाकर गांव विकसित करने होंगे तोकि चीन की गतिविधि पर नजर रखी जा सके।एक तरह से चीन की प्रत्येक कार्रवाई का उत्तर उसके कदम ही से आगे बढकर देना  होगा।

एक बात  और  सेना की वापसी के बावजूद सीमा क्षेत्र  का विकास कार्य अनवरत चलता रहना चाहिए।। सीमा  पर विकास  कार्य लगातार चलाए रखने होंगे । सीमा तक सेना के अवागमन को सरल करने की प्रक्रिया  चलती रहनी चाहिए।  सीमा क्षेत्र में सूचना  तंत्र विकसित करने का  कार्य  लगातार चलना  चाहिए । सीमा क्षेत्र के गांव वालों को इसके लिए शिक्षित किया  जाना  चाहिए कि वे दुषमन देश की गतिविधि पर नजर रखें।अपने क्षेत्र में तैनात अधिकारियों और सेना को छोटी –बड़ी सब सूचना  दें।

    अशोक मधुप

 ( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

आम कश्मीरी की सोच बतांएगे विधान सभा चुनाव


अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

जम्मू-कश्मीर विधानसभा लिए 18 सितंबर से  एक अक्टूबर 2024 तक  तीन  चरणों में  चुनाव होने हैं ।नतीजे आठ अक्टूबर 2024 को घोषित किए जाएंगे। इन चुनाव के परिणाम बताएंगे कि कश्मीर की जनता क्या  चाहती है। आर्टिकल  370  हटने के बाद जम्मू – कश्मीर में बडी तादाद में विकास  हुआ। शांति लौटी। रोज की होने  वाली पत्थरबाजी से  जम्मू− कश्मीर की  मुक्ति  मिली।  सिनेमा हाल खुल गए। पर्यटक आने लगे। मुहर्रम के जुलूस निकलने लगे। कश्मीर में  बहुत कुछ बदल गया है,इसके बावजूद देखना  यह है कि कश्मीर का मतदाता क्या  इस विकास को पसंद  करता है,या उसे मजहबी कट्टरता ही मंजूर है।   

जम्मू-कश्मीर में कुल 114 विधानसभा सीटें हैं लेकिन राज्य में विधानसभा सीटों के डिलीमिटेशन के बाद चुनाव केवल 90 सीटों पर ही होंगे।  इसकी भी वजह है कि   24 सीटें पीओके यानि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लिए हैं। राजनीतिक और प्रशासनिक परिवर्तनों के कारण इनमें से केवल 90 सीटों के लिए चुनाव होना तय है।वर्ष 2019 में जब जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 के जरिए जब आर्टिकल 370 को हटाया गया तो राज्य में चुनावी सीटों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने के लिए परिसीमन प्रक्रिया शुरू की। मार्च 2020 में एक परिसीमन आयोग की स्थापना की गई। इसकी अंतिम रिपोर्ट मई 2022 में जारी की गई। इस रिपोर्ट ने विधानसभा सीटों की संख्या 107 से बढ़ाकर 114 कर दी।  इसमें छह सीटें जम्मू और एक  कश्मीर में बढ़ी है।114 सीटों में 24 सीटें पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के क्षेत्रों के लिए आरक्षित हैं, इसका अर्थ है कि उन पर चुनाव नहीं लड़ा जा सकता है. इसलिए, चुनाव के लिए उपलब्ध सीटों की प्रभावी संख्या 90 है. जम्मू संभाग में 43 और कश्मीर संभाग में 47. राज्य का विशेष दर्जा खत्म होने के बाद यहां पहली बार विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं।

राज्य में पिछले विधानसभा चुनाव दस साल पहले नवंबर-दिसंबर 2014 में हुए थे ।चुनाव के बाद, जम्मू और कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन ने राज्य सरकार बनाई

1 इसमें मुफ्ती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री बने. मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद का सात जनवरी 2016 को निधन हो गया।  राज्यपाल शासन लगा पर  कम समय के लिए लगा। फिर महबूबा मुफ्ती ने वहां मुख्यमंत्रेी पद के लिए रूप में शपथ ली1 पिछली राज्य सरकार से जून 2018 में भाजपा ने पीडीपी के नेतृत्व वाली सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू हो गया। नवंबर 2018 में, जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्य पाल मलिक ने राज्य विधानसभा भंग कर दी। 20 दिसंबर 2018 को राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।

भाजपा की ओर से  हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव  के लिए आज अपना घोषणापत्र जारी किया। इसमें  आतंकवाद के सफाए और हिंदू मंदिरों और धार्मिक स्थलों के पुनर्निर्माण से लेकर कश्मीरी पंडितों की सुरक्षित वापसी और पुनर्वास तक, भाजपा ने  कई प्रमुख वादे किए हैं। अमित शाह ने कहा कि यह क्षेत्र में विकास, सुरक्षा और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए पार्टी के वादों और योजनाओं के अनुरूप है।

नए जम्मू और कश्मीर' के लिए 25 वादों में से, भाजपा ने 'जम्मू और कश्मीर को राष्ट्र के विकास और प्रगति में अग्रणी बनाने' के लिए आतंकवाद और अलगाववाद को खत्म करने की कसम खाई। कांग्रेस-नेशनल कॉन्फ्रेंस गठबंधन ने जम्मू-कश्मीर को फिर से राज्य का दर्जा देने और अनुच्छेद 370 को हटाने से पहले की राजनीतिक स्थिति बहाल करने का भी वादा किया है। इस बीच नेशनल कॉन्फ्रेंस ने शंकराचार्य पहाड़ी का नाम बदलकर तख्त-ए-सुलेमान और हरि पर्वत का नाम बदलकर कोह-ए-मरान करने की बात कही है। इसे कश्मीर की मुस्लिम बहुल आबादी की भावनाओं को भुनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

जम्मू-कश्मीर के चुनाव के विभिन्न दलों के स्थानीय नेता तो चुनाव प्रचार में उतर ही चुके हैं1  बड़ी पार्टियों के राष्ट्रीय नेताओं की भी सभांए शुरू हो गई हैं1 जनसंपर्क अभियान चल रहा है। रोड शो निकाले जा रहे हैं1 घर-घर जाकर नेता लोगों से वोट मांग रहे हैं।इस बार का विधानसभा चुनाव इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि कश्मीर घाटी में परिवारवादी दलों के दिन अब खत्म  नजर आ रहे हैं। पिछले पांच वर्षों में जम्मू-कश्मीर के बुनियादी ढांचे का इस तरह विकास किया गया है कि पिछले दिनों  श्रीनगर में जी-20 देशों की बैठक शांतिपूर्वक संपन्न हुई। इस साल अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर मुख्य कार्यक्रम भी श्रीनगर में ही आयोजित किया गया। इसमें स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाग लिया।

हालात तो ये बता रहे हैं कि कश्मीर बदल रहा है किंतु जम्मू-कश्मीर की बारामुला सीट लोकसभा सीट से  आतंकवादियों को फंडिग करने के आरोप में जेल में बंद निर्दलीय उम्मीदवार अब्दुल रशीद शेख़ की जीत कुछ और ही इशारा कर रही है।उन्होंने जेल में रहते हुए जम्मू कश्मीर नेशनल कॉन्फ़्रेंस उमर अब्दुल्ला को दो लाख से भी ज़्यादा वोटों से शिकस्त दी है1बारामुला सीट पर रशीद को चार लाख 72 हज़ार वोट मिले जबकि उमर अब्दुल्ला को दो लाख 68 हज़ार वोट मिले1 तीसरे स्थान पर रहे जम्मू-कश्मीर पीपल्स कॉन्फ़्रेंस के सज्जाद लोन।उन्हें एक लाख 73 हज़ार वोट मिले।अब्दुल रशीद शेख़ के स्थानीय समर्थक अब्दुल माजिद इस जीत पर बीबीसी से कहते हैं कि साल 2019 के बाद जो कुछ भी कश्मीर में हुआ, इंजीनियर रशीद की जीत उसी बात का जवाब है।उनका कहना था कि कश्मीर के युवाओं ने जिस तरह इंजीनियर रशीद का समर्थन किया है, वो इस बात को दर्शाता है कि नई पीढ़ी नए चेहरों को ढूंढ रही है और पारंपरिक राजनीति से तंग आ चुकी हैं।इंजीनियर रशीद को 'आतंकवाद की फ़ंडिंग' के आरोप में यूएपीए के तहत साल 2019 में गिरफ़्तार किया गया था और इस समय वो दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद हैं।रशीद अवामी इत्तेहाद पार्टी के संस्थापकों में से एक हैं1 2019 में भी उन्होंने बारामुला से पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था और तीसरे नंबर पर रहे थे1इस बार उन्होंने बतौर स्वतंत्र उम्मीदवार चुनाव लड़ा था1जेल जाने से पहले इंजीनियर रशीद शांतिपूर्ण तरीक़े से कश्मीर समस्या को हल करने की वकालत करते रहे हैं।इंजीनियर रशीद जम्मू कश्मीर से संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने के सख़्त ख़िलाफ़ थे और इस मुद्दे को लेकर वह सड़कों पर भी उतरे थे1 उन्होंने इसके विरोध में  कई धरने भी दिए हैं।सरकार का दावा है कि 370 हटाने के बाद कश्मीर विकास कि राह पर आगे बढ़ रहा है और जम्मू -कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा भी बार -बार 'नए कश्मीर' की बात कर रहे हैं1लेकिन कश्मीर में कुछ लोग इसे 'जबरन ख़ामोशी' भी कहते हैं। उनका आरोप है कि किसी को खुलकर बात करने नहीं दी जाती है।

इंजीनियर रशीद को  चुनाव प्रचार के  लिए जमानत मिल गई है।देखिए क्या  होता है। अमेरिका और मित्र देशों ने 20 साल अफगानिस्तान को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए जमकर निवेश किया था, किंतु एक झटके में वह इस्लाम के रास्ते पर चला गया। यही डर है। अभी तो कश्मीर में फौज है। देखना यह है कि बिना  फौज के भी कश्मीर का रूख  ये ही रहता है,या वह फिर पुराने आतंकवाद के रास्ते पर लौटता है। हालाकि हम भारतीय आशावादी है। आशा करते हैं कि सब ठीक होगा।कश्मीरी नागरिक और युवा नए कश्मीर,  विकसित कश्मीर को स्वीकार कर विकास का रास्ता अपनाएगें।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)