Tuesday, August 6, 2024

बांग्लादेश के हालात से बहुत संतर्क रहना होगा

 

अशोक मधुप

 वरिष्ठ पत्रकार

 

बांग्लादेश में महीनों से सुलग रही आरक्षण और सरकार विरोधी चिंगारी सोमवार को भीषण आग के रूप में फूटी। 300 लोगों की मौत के बाद सेना भी उग्र भीड़ को संभाल नहीं पाई। नतीजतन करीब डेढ़ दशक से बांग्लादेश की सत्ता पर काबिज प्रधानमंत्री शेख हसीना को जान बचाकर देश से भागना पड़ा है।  शेख हसीना भागकर फिलहाल भारत आई हैं। सूत्रों का कहना है कि शेख हसीना लंदन जाने की तैयारी कर रही हैं। शेख हसीना ने इंग्लैंड की सरकार से शरण मांगी है।बांग्ला देश में हिंसक प्रदर्शन जारी है। अब प्रदर्शनकारियों ने देश के चीफ ऑफ जस्टिस के घर में घुसकर तोड़-फोड़ की है।  प्रदर्शनकारियों ने घर में मौजूद कार, फर्नीचर के साथ घर का सारा समान लूट ले गए हैं। प्रदर्शनकारियों ने सोमवार को ढाका में इंडिया कल्चर सेंटर पर हमला बोला। साथ ही काली व इस्कॉन समेत देशभर में कम से कम चार मंदिरों में भी तोड़फोड़ की गई है। बांग्ला देश के अल्प संख्यक डरे  और सहमें हैं। वहां क्या हालात बनेंगे? वहां  के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा कैसे होगी , इस पर भारत को नजर रखनी होगी। ये भी  देखना  है कि सरकार कैसी बनता है?  उसका भारत के प्रति नजरिया कैसा होगा? नई  सरकार कहीं इस्लामिक कट्टरवाद को बढ़ावा  तो नही देगी।उसका रूख  पाकिस्तान और चीन संमर्थक तो  नही होगा ? भारत को  अपने देश की सीमा को पूरी तरह बंद रखना  होगा, ताकि वहां के हालात से डरे नागरिक अपने भारत में न आ सकें।

1971 में बांग्लादेश को पाकिस्तान से आजादी दिलाने की लड़ाई में शामिल क्रांतिकारियों के परिवारों को सरकारी नौकरियों में दिए जा रहे आरक्षण को खत्म करने की मांग के साथ पिछले महीने विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ। बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण पर पहले ही अंतरिम रोक लगा दी थी। ऐसे में सवाल उठता है कि प्रदर्शनकारी आखिर फिर से इतने हिंसक होकर सड़कों पर क्यों उतर आए। असल में हिंसा की यह नई लहर तब शुरू हुई जब प्रदर्शनकारियों ने असहयोग का आह्वान किया। इसमें लोगों से कर या बिजली बिल का भुगतान न करने और रविवार को काम पर न आने का आग्रह किया गया। सोमवार को जब कार्यालय, बैंक और कारखाने खुले, तो प्रदर्शनकारियों ने लोगों को काम पर जाने से रोकना शुरू कर दिया। सेना ने प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए गोलियां चलानी शुरू कर दी। प्रदर्शनकारियों ने एक दिन पहले लगाए गए कर्फ्यू की परवाह किए बिना ढाका में प्रधानमंत्री आवास पर धावा बोल दिया।  प्रदर्शनकारियों ने ढाका के शाहबाग इलाके में स्थित एक प्रमुख सार्वजनिक अस्पताल बंगबंधु शेख मुजीब मेडिकल यूनिवर्सिटी पर हमला किया है। प्रदर्शनकारियों ने जगह-जगह सत्तारूढ़ पार्टी के कार्यालयों व वाहनों में भी आग लगा दी।

सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण पर रोक के बावजूद   प्रदर्शनकारी  प्रधानमंत्री शेख हसीना इस्तीफे पर अड़े रहे। 14 जुलाई को बतौर प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा था, स्वतंत्रता सेनानियों के पोते-पोतियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।। इस पर  प्रदर्शनकारियों ने कहा कि क्या आरक्षण का लाभ रजाकारों के पोते-पोतियों को मिलेगा। प्रदर्शनकारी छात्रों ने इस बयान के बाद, ‘तुई के, अमी के रजाकार, रजाकार’ के नारे लगाने शुरू कर दिए और हिंसा ज्यादा भड़क गई।


बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना द्वारा गठित रजाकार क्रूर अर्धसैनिक बल था। रजाकारों ने मुक्ति संग्राम में शामिल स्वतंत्रता सेनानियों और आम लोगों के खिलाफ अत्याचार किया। आज भी यह शब्द वहां अपमानजनक माना जाता है। इसका इस्तेमाल देशद्रोहियों और अत्याचारियों के लिए किया जाता है।

बांग्लादेश में उथल-पुथल व तख्तापलट का इतिहास 1975 से शुरू होता है।हसीना के पिता और देश के पहले  प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर रहमान की उनके परिवार के ज्यादातर सदस्यों की हत्या कर दी गई। जनरल जियाउर रहमान ने सत्ता पर कब्जा किया।1981 गेस्ट हाउस में घुसकर विद्रोहियों ने जियाउर रहमान की हत्या की। हालांकि, सेना का बड़ा तबका वफादार होने से तख्तापलट नाकाम रहा।1982 रहमान के उत्तराधिकारी अब्दुस सत्तार को हुसैन मुहम्मद इरशाद के नेतृत्व में सत्ता से बेदखल कर दिया गया। इरशाद राष्ट्रपति बन गए। 2007 सेना प्रमुख ने एक कार्यवाहक सरकार का समर्थन किया, जो 2009 तक सत्ता पर काबिज रही।2009 अर्धसैनिक बलों का विद्रोह.. में 70 लोगों की हत्या, इनमें से अधिकांश सैन्य अधिकारी थे।2012 सेना ने कहा, शरिया या इस्लामी कानून से प्रेरित तख्तापलट के प्रयास को विफल कर दिया है।

स्पष्टतौर पर बांग्लादेश में सुलग रही हिंसा के केंद्र में आरक्षण है। बांग्लादेश की जनसंख्या17 करोड़ है और देश में लगभग 3.2 करोड़ युवा बेरोजगार हैं।1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में शामिल लोगों के वंशजों को मिल रहे आरक्षण को खत्म करने के लिए छात्र मांग कर रहे हैं। इसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में शामिल रहे लोगों के वंशजों को 30 फीसदी आरक्षण दिया जाता है। 10 फीसदी आरक्षण महिलाओं के लिए भी है।
 
अल्पसंख्यकों को धर्म के आधार पर पांच प्रतिशत व विकलांगों को एक फीसदी आरक्षण का प्रावधान है। पिछड़े जिलों में रहने वालों को 10 प्रतिशत  आरक्षण मिलता है।बांग्लादेश में बेरोजगारी से परेशान युवक इस आरक्षण का विरोध कर रहे हैं।

 बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वकार, हसीना के रिश्ते में बहनोई हैं।सेना प्रमुख जनरल वकार वहां  सबसे अहम चेहरा बनकर सामने आए हैं। उन्होंने ही शेख हसीना के देश छोड़कर जाने और इस्तीफे का एलान किया। 20 दिसंबर, 1985 को बांग्लादेश की सेना में शामिल हुए जनरल वकार की छवि एक बेहद अनुशासित अधिकारी की रही है। जानकारों का मानना है कि हसीना का बांग्लादेश छोड़कर जाना और वकार का कमान संभालना एक सोचा-समझा निर्णय है। शेख हसीना के देश छोडने के बाद देश के सेना प्रमुख ने कहा है कि वो सभी से बातचीत करके देश में अंतरिम सरकार बनवाएंगे!बांग्लादेश में तख्तापलट से पहले सत्तारूढ़ रही आवामी लीग पार्टी ने आरोप लगाया है कि देशव्यापी हिंसक प्रदर्शन के पीछे बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) का हाथ है। आवामी लीग के मुताबिक आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे की मांग दिखाती है कि विरोध-प्रदर्शनों के पीछे असल में छात्र नहीं, देश के मुख्य विपक्षी राजनीतिक दल- बीएनपी और प्रतिबंधित संगठन- जमात-ए-इस्लामी की रणनीति है। इनका मकसद किसी भी तरह से देश की सत्ता हासिल करना है।

बांग्लादेश में देशव्यापी आंदोलन के कारण राजनीतिक अस्थिरता का माहौल है। देश के राष्ट्रपति ने कहा है कि संसद भंग कर अंतरिम सरकार बनाई जाएगी। राष्ट्रपति ने   विपक्षी नेता खालिदा जिया को रिहा करने का आदेश दिया है। खालिदा जिया विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की प्रमुख हैं और 1991-96 और 2001-06 के दौरान दो बार प्रधानमंत्री रह चुकी हैं।राष्ट्रपति बोले- खालिदा जिया की रिहाई के बाद अंतरिम सरकार का गठन  होगा।

बांग्लादेश के प्रदर्शनकारी नेताओं ने सोमवार को छात्रों से यह सुनिश्चित करने का आह्वान किया कि प्रधानमंत्री शेख हसीना के पद से हटने के बाद देश में पैदा हुए हालात में किसी को भी लूटने का मौका न मिले, और उनसे अपनी मांगें होने तक शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का आग्रह किया।

बांग्लादेश में उथल-पुथल के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में सुरक्षा पर कैबिनेट समिति की बैठक हुई है। जिसमें विदेश मंत्री एस. जयशंकर प्रधानमंत्री मोदी के पड़ोसी देश के हालात पर जानकारी दी है।देखना  यह है कि बांग्ला देश में अब किसकी सरकार  बनती है।उसका भारत के प्रति रूख कैसा  होता  है?नई  सरकार  भारत समर्थक होगी या कट्टर इस्लाम का रास्ता स्वीकार कर पाकिस्तान को अपना आका मानेगी।हालाकि बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वकार शेख  हसीना के नजदीकी और रिश्ते में बहनोई लगतें हैं  ।उनसे उम्मीद है कि बांग्ला देश शेख  हसीना के पद चिंहों  पर चलेगा, किंतु वहां के राष्ट्रपति का रूख अभी  देखना होगा।उसी रूख के आधार पर भारत को  अपनी नई नीति बनानी होगी।

अशोक मधुप

( लेखक  वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Monday, July 29, 2024

पुस्तक समीक्षा नॉवल नौलखी कोठी हिंदी अनुवाद


अनुवादक : डा. रख्शंदा रूही मेहदी

समीक्षा : अशोक मधुप

 

अली अकबर नातिक़ का नौलखी कोठी विभाजन -पूर्व पंजाब में उर्दू में लिखा गया  उपन्यास है। इसकी कहानी  विलियम के इर्द-गिर्द घूमती है। ये उपन्यास एक बीते  समय की  कहानी  है।जो पुरानी यादों से भरी हुई है।

 

56 अध्यायों और 581  पेज के इस उर्दू उपन्यास का अनुवाद प्रसिद्ध  उर्दू  लेखिका और कहानीकार डा. रख्शंदा रूही मेंहदी ने किया है।

कहानी पंजाब की  पृष्ठ भूमि पर है। यह ब्रिटिश भारत में शुरू होती है। विभाजन से पहले के वर्षों में चलती है और उन्नीस-अस्सी के दशक के आसपास समाप्त होती है। उपन्यास  हमें इस जगह की जीवंत संस्कृति से रूबरू कराता है। पूरा ग्रामीण पंजाब क्षेत्र के हमारे सामने चित्रित  हो उठता है।

नौलखी कोठी  में तीन कहानी एक साथ चलती हैं। विलियम इंग्लैंड से पढ़कर  आठ साल बाद भारत लौटता है। उसे जलालाबाद का सहायक आयुक्त नियुक्त किया जाता है।  विलियम रेगीस्तान बने जलालाबाद को हरा भरा–करने की कोशिश में लगता है किंतु  पंजाब के गांवों में मुसलमानों और सिखों के बीच के झगड़े उसके कार्य में व्यवधान पैदा करते हैं।वह ब्रिटिश प्रशासकों की भूमिका के दायरे में  कानून और व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश करता  है। पूर्वी पंजाब के जलालाबाद में सहायक आयुक्त के रूप में काम करने के दौरान  वह अपने दादा द्वारा बनवाए गए बंगले, नौलखी कोठी में बसने  का सपना देखता था। विलियम को कठोर आयुक्त हैली द्वारा चेतावनी दी जाती है कि स्थानीय लोगों के प्रति उसका व्यवहार और नरमी हिंदुस्तान में रहने वाले किसी भी ब्रिटिश अधिकारी के लिए अच्छी नहीं है। उनसे कहा गया कि वे शासक और शासित के बीच दूरी बनाए रखें तथा न्याय करते समय स्वयं को गलत करने वाले और अन्याय का शिकार हुए व्यक्ति से दूर रखें।

जलालाबाद में चार साल तक तैनात रहने के दौरान विलियम ने कई क्रांतिकारी कदम उठाए। उन्होंने इतनी लगन से काम किया कि वे इस इलाके की सूरत ही बदल देने में कामयाब हो गए। शिक्षा का स्तर पंजाब की सभी तहसीलों  से कहीं आगे निकल गया था । उन्होंने एक नई नहर और कई अन्य छोटी-छोटी धाराएँ भी बनवाईं। इसके परिणामस्वरूप, तहसील में पानी की भरपूर आपूर्ति होने लगी और गेहूँ, चावल और मक्के की फ़सलें भरपूर मात्रा में पैदा होने लगीं।लोगों के चेहरों पर एक सामान्य खुशहाली दिखने लगी। कई उतार-चढ़ावों के बाद, बार-बार तबादलों के बाद और युद्ध छिड़ जाने के बाद, उन्हें एहसास हुआ कि एक बड़ी साज़िश चल रही थी जिसमें हिंदू, मुसलमान और अंग्रेज़ सभी ने मिलकर उनके खिलाफ़ हाथ मिला लिया था। उपन्यास के अंत में अपनी पूर्व ब्रिटिश शान और शक्ति से वंचित होकर नौलखी कोठी में एकाकी जीवन जी रहा है।  उसकी पत्नी और बच्चे उसे छोड़कर इंग्लैंड वापस चले गए। लेकिन जल्द ही उसे उस जगह से भी निकाल दिया गया । वह पास की एक नहरी कोठी  में रहने  लया, और अंत में वह एक कंगाल और लावारिस की तरह मर गया।

विलियम गाँव की मस्जिद के मुख्य इमाम करामत अली को स्कूल में छोटे बच्चों को उर्दू− फारसी पढाने के लिए  40 रूपये  माहवार तन्खवाह पर मास्टर रख देता है। इससे  पहले कयायत  मुश्किल से अपना गुजाराकर पाता था।गाँव के गरीब लोग जो मुश्किल से अपना गुजारा कर पाते थे, उन्हें वेतन नहीं दे पाते थे, बल्कि उन्हें रोज़ाना रोटियाँ देते थे। धीरे− धीरे  मौलवी की किस्मत चमकती है। धीरे-धीरे उनका बेटा फ़ज़ल दीन एक परिपक्व और समझदार सरकारी बाबू बन जाता है  । गवर्नर हाउस में दो साल काम करने के बाद फ़ज़ल दीन के पास अपनी ज़मीन खरीदने और घर बनाने के लिए काफ़ी पैसे थे। विभाजन के बाद फ़ज़ल दीन का काम काफ़ी बढ़ गया और फ़र्जी संपत्ति के दस्तावेज़ तैयार करने के लिए पर्याप्त साधन होने के कारण वह भ्रष्टाचार में फंस गया और उसने काफ़ी धन इकट्ठा कर लिया।

 

कहानी में सबसे महत्वपूर्ण पहलू मुसलमानों और सिखों के बीच निरंतर दुश्मनी है।  शेर हैदर क्षेत्र का जमींदार था, उसे सरदार सौदा सिंह और उसके आदमियों ने सरे आम मार डाला शेर हैदर के बेटे गुलाम हैदर को उसकी प्रजा और रिश्तेदारों ने नया उत्तराधिकारी बनाया। दो प्रतिद्वंद्वी धार्मिक समूहों के बीच हुई कई घटनाओं, लूटपाट और लड़ाई के बाद, उनकी किस्मत में उतार-चढ़ाव आते रहे जबकि आम ग्रामीण पीड़ित होते रहे। हत्या का आरोपी सिख नेता अभी भी आज़ाद था । गुलाम हैदर खुलेआम हथियारों के साथ घूमकर अपनी वीरता दिखाई।सिख नेता के साथ  उसके साथियों का भी कत्ल कर दिया। दस साल फरार रहा।इस दौरान फांसी की सजा हो गई किंतु मुस्लिम लीग के नेता क़ाईदे आजम जिन्ना की शिफारिश  ने उसकी फांसी ही माफ नही हुई,अपितु जब्त की गई  सारी संपत्ति उसे  वापिस मिल गई।

इस उपन्यास में लेखक  कथानक को पूरे उपन्यास में इतनी शानदार ढंग से पिरोया है, उसके साथ न्याय करना मुश्किल है। विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश शासकों के सामने आई समस्याएं, भारत छोड़ो आंदोलन के साथ देश में बदलते समीकरण, स्वतंत्र पाकिस्तान के लिए जिन्ना की नीति, मुस्लिम लीग की भूमिका, हिंदुस्तान छोड़कर अंग्रेजों का चुपचाप पलायन, विभाजन का विचार जिसने चुपचाप आबादी को चीरना शुरू कर दिया था, विभाजन की आधिकारिक घोषणा के बाद शरणार्थियों का प्रवाह, पलायन - इन सभी का भी कथा में विस्तृत उल्लेख है।

अली अकबर नातिक़ की अनूठी कथा शैली और डा. रख्शंदा रूही मेहदी का अनुवाद जो उर्दू कहानी के करीब रहता है और क्षेत्रीय बोली के साथ उर्दू के स्वाद को बनाए रखता है। उपन्यास सरल भाषा –शैली में होने के बहतु ही रोचक और पठनीय है।पूरे उपन्यास में पात्रों और घटनाओं का बहुत विस्तृत विवरण पाठक पर एक शानदार दृश्य प्रभाव पैदा करता है। नातिक़ ने अध्यायों को इस तरह से जोड़कर कहानी के कुशलता से पिरोया है कि उपन्यास पढ़ते वे हमारी आँखों के सामने नजर आते हैं। उपन्यास की मोटाई को देखकर एक बार  डर लगता है किंतु जब पढ़ना शुरू  हो  जाता है  तो  पाठक उसे खत्म करके ही रूकता है। उपन्यास पाठक को पूरे समय  अपने  से जोड़े  रखता है और   उसे  कहीं बोर नही होने देता ।

 

शीर्षक: नौलखी कोठी (उर्दू उपन्यास)

 

लेखक: अली अकबर नातिक़

अनुवादक : डा. रख्शंदा रूही मेहदी

प्रकाशक : रेख्ता पब्लिकेशन नोयडा, उत्तर प्रदेश

समीक्षक: अशोक मधुप

कोंचिंग सैंटर में हुई छात्रों की मौत का जिम्मेदार कौन?

 

 

कोंचिंग सैंटर में हुई छात्रों की मौत का जिम्मेदार कौन?

अशोक मधुप

 

 

दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर स्थित राव आईएएस स्टडी (कोचिंग )  सेन्टर के बेसमेंट में अचानक बारिश का पानी घुस जाने से चार घंटे से अधिक समय तक फंसे रहने से तीन छात्रों की मौत हो गई.घटना के समय बेसमेंट के पुस्तकालय में 30−35 छात्र थे. पानी आते देख बाकी निकल गए. तीन फंसे  रह गए ,उनकी मौत हो गई.कोचिंग सेंटर के स्वामी और कार्डिनेटर को गिरफ्तार कर लिया गया है. इससे  पहले मुकर्जी नगर  दिल्ली के एक  कोचिंग सेंटर में  (15 जून 2023 ) को आग लग गई. छात्रों को कोचिंग सेंटर की खिड़की से निकलकर जान बचानी पड़ी. इस हादसे में 60 छात्र घायल भी हुए. कोंचिंग सैंटर में हादसे होना , प्रतिभागियों का आत्महत्या करना आज आम है.घटना  होती है. जांच के आदेश  होते  हैं किंतु  होता कुछ नही।कोंचिंग सैंटर चलाने  वाले भारी प्रभावशाली है. दूसरे  हमारी व्यवस्था पूरी तरह भ्रष्टाचार में डूबी है. पैसे के सामने इंसान की मौत की फाइले कूड़े  में चली जाती हैं, फिर एक नया हादसा  होता  है.फिर जांच  होती है,फिर फाइल कूड़े में चली जाती है.

राजेंद्र नगर के कोचिंग सैंटर में  मृतक छात्रों की पहचान तानिया सोनी, श्रेया यादव (दोनों की उम्र 25 वर्ष) और नवीन डेल्विन (28) के रूप में की गई है. तानिया तेलंगाना और श्रेया उत्तर प्रदेश की थीं, जबकि नवीन केरल के निवासी थे. वे सभी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। शनिवार को कई छात्र कोचिंग सेंटर की बेसमेंट में बनी लाइब्रेरी में थे कि अचानक सैलाब सा आया और उसमें तीन छात्रों की तड़पकर मौत हो गई.बताया जाता है कि बेसमेंट की परमीशन स्टोर के लिए थी,लाइब्रेरी के लिए नही.फिर भी लाइब्रेरी चल रही थी.  दिल्ली पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि पानी बेसमेंट तक कैसे पहुंचा, जिसका इस्तेमाल कोचिंग संस्थान लाइब्रेरी के तौर पर कर रहा था. प्रारंभिक जांच से पता चलता है कि बेसमेंट, जो जमीन से लगभग आठ फीट नीचे है, में एक लाइब्रेरी थी, जहां शनिवार शाम को कई छात्र मौजूद थे. सूत्रों के मुताबिक, भारी बारिश के बाद कोचिंग सेंटर का गेट बंद कर दिया गया . पानी को बिल्डिंग में प्रवेश करने से रोकने के लिए कोचिंग सेंटर के प्रवेश द्वार पर एक स्टील शेड लगाया गया है.पुलिस और अग्निशमन विभाग जांच कर रहे हैं कि बेसमेंट में पानी कैसे भरा .दिल्ली की मेयर शैली ओबेरॉय ने शहर के उन सभी कोचिंग सेंटरों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया जो इमारतों के बेसमेंट में चल रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे कोचिंग सेंटर भवन निर्माण उपनियमों का उल्लंघन हैं और मानदंडों के अनुरूप नहीं हैं. बताया जाता  है कि नगर निगम की मिलीभगत से राजेंद्र नगर में 95 प्रतिशत कोचिंग बेसमेंट में चल रहे हैं.

 लगभग एक साल  पहले दिल्ली  हाईकोर्ट    ने मुखर्जी नगर स्थित एक कोचिंग सेंटर में 15 जून 2023  गुरुवार को लगी आग की घटना का शुक्रवार को खुद से संज्ञान लिया­. कोर्ट ने दिल्ली सरकार, दिल्ली फायर सर्विस डिपार्टमेंट, दिल्ली पुलिस और एमसीडी को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा है. कोर्ट ने फायर सर्विस डिपार्टमेंट को निर्देश दिया कि वो ऐसे सभी संस्थानों में आग से बचाव के इंतजामों (फायर सेफ्टी ऑडिट) और उनके फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट की जांच करे. ये आदेश  दिल्ली  हाईकोर्ट ने 16 जून 2023 को दिए। जांच ये भी  होनी चाहिए कि कोर्ट के आदेश पर हुई जांच में क्या  हुआ? कहीं सब खानापूरी होकर ही तो  नही रह गई?  यदि उस समय सही से  जांच हो जाती। गलत रूप से चल रहे केंद्र बंद हो जाते तो  निश्चित रूप से ये हादसा नही होता।ये हादसा इस बात को चिल्ला− चिल्लाकर बता रहा है  कि ये जांच सही  नही हुई।

घटना  होती है. जांच के आदेश  होते हैं.ये ही आदेश  जांच अधिकारियों को   लूट का अधिकार दे देते हैं.इस आदेश के बाद जांच अधिकारी जाएंगे,  कोचिंग सैंटर में कमी निकालेंगे.नोटिस देंगे. अपना  सुविधा शुल्क वसूलेंगे और कुछ दिनों बाद सब फाइलों में  दबकर रह जाएगा. कुछ समय बाद फिर हादसा होगा, फिर जांच होंगी।फिर अधिकारियों को आपदा में अवसर मिलेंगे.फिर खेल होगा. सब ऐसे ही चलता रहेगा, जैसे चल रहा है। इस भ्रष्ट हो चुकी सरकारी मशीनरी के सुधरने की उम्मीद नहीं लगती।  कठोर अनुशासन लागू किये बिना  ये सुधरने वाली नहीं।जरूरत सरकारी तंत्र को सुधारने की है.
दरअस्ल मुकर्जी नगर
  हिंदी भाषी छात्रों और राजेंद्र नगर अंग्रेजी भाषी छात्रों  का सिविल सेवा की तैयारी करने के बड़े केंद्र  बन गया है।   यहां कई कोचिंग संस्थानों का घर है.हर वर्ष सिविल सर्विसेज की परीक्षा में सबसे ज्यादा अभ्यर्थी भी यहीं से चयनित होते हैं.
एक जानकारी के अनुसार यूपीएससी की सिविल सर्विसेज परीक्षा की तैयारी करने के लिए मुखर्जी नगर व आसपास के क्षेत्रों में प्रत्येक वर्ष करीब एक
 लाख छात्र तैयारियों के लिए पहुंचते है। मुखर्जी नगर इलाका अपने आप में मिनी भारत है। यही हालत राजेंद्र नगर की भी है. यहां हर वर्ष प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने के लिए उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, हरियाणा, कर्नाटक, उड़ीसा, पूर्वोत्तर राज्यों से भी छात्र पहुंचते हैं.मुखर्जी नगर और राजेंद्र नगर में में  यूपीएससी की सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाले महंगे से लेकर सस्ते कोचिंग भी मौजूद हैं. यही वजह है कि यहां पर आर्खिक रूप से कमजोर परिवार से आने वाले बच्चे भी अपनी तैयारी आसानी से कर लेते हैं.
मुखर्जी नगर और राजेंद्र नगर क रिहायशी इमारतों में व्यावसायिक गतिविधियां चलाने का गढ़ बन चुका है­­. बीते एक दशक में यहां
 कोचिंग सेंटरों की बाढ़ आ गई है. ज्यादातर घरों में या तो कोचिंग सेंटर चल रहे हैं या फिर लाइब्रेरी या पीजी बनाकर संपत्ति मालिक चांदी काट रहे हैं लेकिन नगर निगम को शुल्क देने में अब भी कतराते  हैं. इन संपत्तियों का व्यावसायिक उपयोग हो रहा है. ज्यादातर इमारतों को कोचिंग संस्थान में बदलने के लिए भवन उपनियमों का उल्लंघन किया गया है. तय मानकों को नजरअंदाज कर कमरों को हाल में तब्दील कर दिया गया है। इसके चलते कई इमारतें ढांचागत रूप से कमजोर भी हो गई हैं.
 यूपीएससी
, एसएससी आदि की तैयारी करने वाले छात्र कोचिंग संस्थान संचालकों की मनमानी के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाते . इन्हें क्लास में भेड़-बकरियों की तरह ठूस कर  पढ़ाया जाता है. 25 मई  2019 को गुजरात के सूरत के एक कोचिंग में आग लगने से 22 छात्र की मौत  के बाद  गुजरात सरकार ने अग्नि सुरक्षा निरीक्षण किए जाने तक गुजराज सरकार ने राज्य के सभी निजी कोचिंग केंद्रों को बंद करने का आदेश दिया. सरकार ने स्कूलों, कॉलेज, कोचिंग सेंटरों, अस्पतालों, शॉपिंग मॉल और अन्य व्यावसायिक भवनों के अग्नि सुरक्षा निरीक्षण का भी आदेश दिया. दिल्ली अग्निशमन सेवा ने दिल्ली के सभी कोचिंग सेंटरों का अग्नि सुरक्षा निरीक्षण करने का निर्णय लिया  था. उस समय भी आदेश हुए थे.जांच हुई. नियमों के विपरीत चलने वालों को नोटिस देकर कार्रवाई पूरी कर दी गई. लोगों से संबधित अधिकारियों का प्रसन्न कर दिया.  काम पहले ही तरह ही चलता रहा.इसमें भी  ऐसा ही होता लगता है।दरअस्ल इस तरह की बड़ी घटनाएं  संबधित अधिकारियों  की आय  का माध्यम बनते हैं.देखने में आया है कि  विभाग के अधिकारी निरीक्षण कर कमी  बता देते हैं।  नोटिस भेज देतें हैं.प्राय इन्होंने ही अग्निशमन सुरक्षा के उपकरण लगाने वालों से मेल−जोल कर रखा है। ये उपकरण  लगाने वाले विभागीय अधिकारियों के चहेते होते हैं तो काम मानक के अनुरूप नही करते। पूरा पैसा लेकर  भी काम पूरा नही करते।सब  पहले की तरह ही चलता  रहता है. ऐसे में हादसे होने पर जब तक व्यवस्था के लिए  जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई  नही होती , तब तक कुछ सुधरने वाला  नही है. जांच करानी चाहिए कि इसमें किस− किस विभाग के अधिकारी की गलती रही है. किसने जिम्मेदारी नही निभाई.जिम्मदारी तै होने वाले अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई भी होनी चाहिए,उनपर गैर इरादतन हत्या के मुकदमें दर्ज होने  चाहिएं,भले ही वह रिटायर हो गए हों. यह भी तै  होना  चाहिए कि 2019 की सूरत की  घटना के बाद हुई जांच में क्या हुआ था।इसके बिना कुछ होने वाला नही है.इस प्रकरण में तो नगर निगम् की लापरवाही सीधे− सीधे नजर आती है। बिना अनुमति बेसमेंट में चलते कोंचिग पर रोक लगाना उसकी जिम्मेदारी है।दूसरी नालों की  सफाई  उसीका कार्य  है। दोनो में लापरवाही हुई  है।  
अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) 

 

Friday, June 28, 2024

कब सुधरेगी भारत की डाक व्यवस्था?



आजादी के 75 साल बाद भी भारत की डाक व्यवस्था में सुधार न होकर पतन ही हुआ।भारत में डाक  विभाग 250 साल से  पुराना  है। आज गांव −गांव तक इसकी ब्रांच हैं।पूरे भारत में 155531 डाकघर हैं।इतना  बडा  नेटवर्क होने के बाद भी यह सरकारी विभाग प्राइवेट कोरियर कंपनियों से प्रतिस्पर्धा में पिछड़ती जा रही है।

भारतीय डाक की सेवा  में सुधार हो, इसमें  न विभागीय अधिकारियों की रूचि है, न सरकार की।इसी का परिणाम है कि इसका अपने  व्यवसाय से  एकाधिकार टूटता जा रहा है। प्राइवेट कंपनी इसके व्यवसाय को कब्जाती जा रही हैं।

भारत में डाक सेवाओं की स्थापना 1774 में हुई।पहली बार भारतीय डाकघर को राष्ट्रीय महत्व के एक अलग संगठन के रूप में स्वीकार किया गया और उसे एक अक्टूबर 1854 को डाकघर महानिदेशक के सीधे नियंत्रण में सौंप दिया गया । भारतीय डाक व्यवस्था कई व्यवस्थाओं को जोड़कर बनी है । 650 से ज्यादा रजवाड़ों की डाक प्रणालियों, जिला डाक प्रणाली और जमींदारी डाक व्यवस्था को प्रमुख ब्रिटिश डाक व्यवस्था में शामिल किया गया था । इन टुकड़ों को इतनी खूबसूरती से जोड़ा गया है कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक संपूर्ण अखंडित संगठन है।

1766 में लार्ड क्लाइव ने देश में पहली डाक व्यवस्था स्थापित की थी । इसके बाद 1774 में वारेन हेस्ंटिग्ज़ ने इस व्यवस्था को और मजबूत किया । उन्होंने एक महा डाकपाल के अधीन कलकत्ता प्रधान डाकघर स्थापित किया । मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी में क्रमशः 1786 और 1793 में डाक व्यवस्था शुरू की गई । 1837 में डाक अधिनियम लागू किया गया ताकि तीनों प्रेसीडेन्सी में सभी डाक संगठनों को आपस में मिलाकर देशस्तर पर एक अखिल भारतीय डाक सेवा बनाई जा सके । 1854 में डाकघर अधिनियम के जरिए एक अक्टूबर 1854 को मौजूदा प्रशासनिक आधार पर भारतीय डाक घर को पूरी तरह सुधारा गया ।

1854 में डाक और तार दोनों ही विभाग अस्तित्व में आए। शुरू से ही दोनों विभाग जन कल्याण को ध्यान में रख कर चलाए गए । लाभ कमाना उद्देश्य नहीं था । 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध्द में सरकार ने फैसला किया कि विभाग को अपने खर्चे निकाल लेने चाहिए। उतना ही काफी होगा । 20वीं सदी में भी यही क्रम बना रहा । डाकघर और तार विभाग के क्रियाकलापों में एक साथ विकास होता रहा। 1914 के प्रथम विश्व युध्द की शुरूआत में दोनों विभागों को मिला दिया गया ।

भारतीय राज्यों के वित्तीय और राजनीतिक एकीकरण के चलते यह आवश्यक और अपरिहार्य हो गया कि भारत सरकार भारतीय राज्यों की डाक व्यवस्था को एक विस्तृत डाक व्यवस्था के अधीन लाए । ऐसे कई राज्य थे जिनके अपने जिला और स्वतंत्र डाक संगठन थे और उनके अपने डाक टिकट चलते थे । इन राज्यों के लैटर बाक्स हरे रंग में रंगे जाते थे ताकि वे भारतीय डाकघरों के लाल लैटर बाक्सों से अलग नज़र आएं ।

1908 में भारत के 652 देशी राज्यों में से 635 राज्यों ने भारतीय डाक घर में शामिल होना स्वीकार किया । केवल 15 राज्य बाहर रहे, जिनमें हैदराबाद, ग्वालियर, जयपुर और ट्रावनकोर प्रमुख हैं ।

1925 में डाक और तार विभाग का बड़े पैमाने पर पुनर्गठन किया गया । विभाग की वित्तीय स्थिति का जायजा लेने के लिए उसके खातों को दोबारा व्यवस्थित किया गया । उद्देश्य यह पता लगाना था कि विभाग करदाताओं पर कितना बोझ डाल रहा है या सरकार का राजस्व कितना बढा रहा है और इस दिशा में विभाग की चारों शाखाएं यानी डाक, तार, टेलीफोन और बेतार कितनी भूमिका निभा रहे हैं ।

भारतीय डाक सेवा का क्षेत्र चिट्ठियां बांटने और संचार का कारगर साधन बने रहने तक ही सीमित नहीं है । शुरूआती दिनों में डाकघर विभाग, डाक बंगलों और सरायों का रख रखाव भी करता था। 1830 से लगभग तीस सालों से भी ज्यादा तक यह विभाग यात्रियों के लिए सड़क यात्रा को भी सुविधाजनक बनाते थे । कोई भी यात्री एक निश्चित राशि के अग्रिम पर पालकी, नाव, घोड़े, घोड़ागाड़ी और डाक ले जाने वाली गाड़ी में अपनी जगह आरक्षित करवा सकता था । वह रास्ते में पड़ने वाली डाक चौकियों में आराम भी कर सकता था । यही डाक चौकियां बाद में डाक बंगला कहलाईं।19वीं सदी के आखिर में प्लेग की महामारी फैलने के दौरान, डाकघरों को कुनैन की गोलियों के पैकेट बेचने का काम भी सौंपा गया था ।

भारत संयुक्त परिवारों और छोटी आमदनी वाले लोगों का देश है, जहां लोगों को छोटी रकमों की सूरत में लाखों रूपए भेजने पड़ते हैं । रूपयों के लेन-देन का काम जिला मुख्यालयों में स्थित 321 सरकारी खजानों द्वारा किया जाता था । 1880 में मनी आर्डर के द्वारा छोटी रकमें भेजने का काम 5090 डाकघर वाली विस्तृत डाक एजेंसी को दिया गया और इस तरह जिला मुख्यालयों तक जाने और प्राप्तकर्ता द्वारा पहचान साबित करने की कठिनाइयां कम हो गईं ।1884 में उच्च पदों पर आसीन कर्मचारियों को छोड़कर देसी डाक कर्मचारियों के लिए डाक जीवन बीमा योजना शुरू की गई, क्योंकि भारत में काम करने वाली बीमा कंपनियां आम भारतीय निवासियों का बीमा करने से कतराती थीं ।

उन कठिन दिनों में देश के साथ-साथ डाक विभाग भी इसके असर से अछूता नहीं रहा । 1857 के बाद विभाग ने आगजनी और लूटमार का दौर देखा । एक उपडाकपाल और एक ओवरसियर की हत्या कर दी गई, एक रनर को घायल कर दिया गया और बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तर पश्चिमी सीमांत राज्यों के कई डाकघरों को लूट लिया गया । उत्तर पश्चिमी सीमांत राज्यों और अवध में सभी संचार लाइनों को बंद कर दिया गया था और हिंसा खत्म हो जाने के बाद भी साल भर तक कई डाकघरों को दोबारा नहीं खोला जा सका ।

लगभग पांच माह तक चलने वाली 1920 की डाक हड़तालों ने देश की डाक सेवा को पूरी तरह ठप्प कर दिया था । 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कई डाकघरों और लैटर बक्सों को जला दिया गया थाऔर डाक का आना-जाना बड़ी मुश्किल से हो पाता था। इसके कारण कई सेक्टरों में डाक सेवाएं गड़बड़ा गई थीं ।

पोस्ट कार्ड 1879 में चलाया गया जबकि वैल्यू पेएबल पार्सल (वीपीपी), पार्सल और बीमा पार्सल 1977 में शुरू किए गए। भारतीय पोस्टल आर्डर 1930 में शुरू हुआ । तेज डाक वितरण के लिए पोस्टल इंडेक्स नंबर (पिनकोड) 1972 में शुरू हुआ । तेजी से बदलते परिदृश्य और हालात को मद्दे नजर रखते हुए 1985 में डाक और दूरसंचार विभाग को अलग-अलग कर दिया गया । समय की बदलती आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर 1986 में स्पीड पोस्ट शुरू हुई ओर 1994 में मेट्रो#राजधानी#व्यापार चैनल, ईपीएस और वीसैट के माध्यम से मनी आर्डर भेजा जाना शुरू हुआ।

पिछले कई सालों में डाक वितरण के क्षेत्र में बहुत विकास हुआ है और यह डाकिए द्वारा चिट्ठी बांटने से स्पीड पोस्ट और स्पीड पोस्ट से ई-पोस्ट के युग में पहुंच गया है । भारतीय पोस्टल आर्डर 1930 में शुरू हुआ । तेज डाक वितरण के लिए पोस्टल इंडेक्स नंबर (पिनकोड) 1972 में शुरू हुआ । तेजी से बदलते परिदृश्य और हालात को मद्दे नजर रखते हुए 1985 में डाक और दूरसंचार विभाग को अलग-अलग कर दिया गया । समय की बदलती आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर 1986 में स्पीड पोस्ट शुरू हुई ओर 1994 में मेट्रो#राजधानी#व्यापार चैनल, ईपीएस और वीसैट के माध्यम से मनी आर्डर भेजा जाना शुरू किया गया ।

डाक व्यवस्था में डाकिए का बड़ा महत्व है। पुराने जमाने में हरेक डाकिए को ढोल बजाने वाला मिलता था जो जंगली रास्तों से गुजरते समय डाकिए की सहायता करता था । रात घिरने के बाद खतरनाक रास्तों से गुजरते समय डाकिए के साथ दो मशालची और दो तीरंदाज भी चलते थे। ऐसे कई किस्से मिलते हैं जिनमें डाकिए को शेर उठा ले गया या वह उफनती नदी में डूब गया या उसे जहरीले सांप ने काट लिया या वह चटटान फिसलने या मिटटी गिरने से दब गया या चोरों ने उसकी हत्या कर दी

 

 ब्रिटिश भारत के तत्कालीन गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने आम जनता के लिए पहली डाक सेवा शुरू की।यह सेवा उन  कबूतरों के लिए एक राहत के रूप में आई, जिन्हें पत्र देने में कई दिन और महीने लग जाते थे। डाक सेवाओं ने त्वरित वितरण को एक वास्तविकता बना दिया।पूरे देश में इसका नेटवर्क बना।  गांव −गांव तक  पोष्ट आफिस खुल गए।डाक सेवा के साथ−साथ  सरकार  की छोटी− छोटी बचत योजनांए भी  शुरू  हुईं।सयम की मांग को देखते  हुए  तार और फोन सेवा पर भी डाक तार विभाग का एकाधिकार  हो गया।  एक की  कंपनी होने के कारण प्रबंधक की परेशानी देखते  हुए 1985 में दूरसंचार सेवाएं  अलग कर दी गई।

समय बदला अंतरराष्ट्रीय शिपिंग.डीएचएल ने 1969 में पहली अंतरराष्ट्रीय कूरियर कंपनी के रूप में एक भव्य प्रवेश किया, और कई अन्य ने इसका अनुसरण किया। इनका उद्देश्य बिना किसी देरी के सुविधाजनक वितरण सेवाएं प्रदान करना था।2020 तक, ब्लू डार्ट भारत में अग्रणी कूरियर कंपनी बन गई। प्रौद्योगिकी की प्रगति के साथ, माल की डिलीवरी तेज और तेज हो गई है। जबकि समय के साथ कूरियर सेवाओं का उन्नयन हुआ है, लोग अभी भी आवश्यक दस्तावेज भेजने के लिए डाक सेवाओं पर भरोसा करते हैं।किंतु समय  ज्यादा लेने डाक विभाग के कर्मचारियों की लापरवाही और सेवा में रूचि न लेने के कारण भारतीय डाक सेवा में लोगों का रूझान कम होना शुरू हो गया।ये सही है कि डाक सेवाएं  सस्ती और कूरियर सेवाएं मंहगी हैं। किंतु  आज भारतीय समाज में  पैसा बढ़ा  है तो डाक भेजने वाले के लिए  सस्ती और मंहगी में ज्यादा फर्क नही रह गया।  वह जल्दी से जल्दी अपनी डाक गंतव्य पर पंहुचाना चाहता है।

ऐसे में भारतीय डाक सेवा पिछड़ती जा  रही हैं।डाक विभाग ने अपनी स्पीड पोस्ट सेवा शुरू की।नाम से लगता  है कि डाक की अन्य सेवाओं से ये तेज होगी किंतु  ऐसा नही है।  बिजनौर उत्तर प्रदेश से राजकोट गुजरात में स्पीड पोस्ट  पंहुचने में नौ  दिन लगते हैं,  जबकि कोरियर चार से पांच   दिन में आ जाता  है। दिल्ली से राजकोट स्पीड पोस्ट  पांच दिन लेती है।  कूरियर कंपनी ब्लू डांर्ट राजकोट का पैकेट  दूसरे  दिन दिल्ली में डिलीवर कर देती है। बेटे का  जन्म दिन था।  पहले दिन शाम छह बजे बिजनौर से मैने बंगलौर के लिए मिठाई का पैकेट कोरियर किया। ये पैकेट अगले  दिन शाम  पांच बजे बेटे को कंपनी में मिल गया।डाक से ऐसा कभी नी हो सकता।

हालाकि कोरियर कंपनी  का नेटवर्क अभी शहरों तक ही सीमित है। डाक सेवा गांव− गांव तक फैली होने के कारण अपनी सुविधा  गांव  तक दे रही है।गांव  तक सेवा देने में उसका एकाधिकार है किंतु  जैसे−जैसे कोरियर कंपनियों का विस्तार होता जाएगा,  वह गांव  तक अपनी एकाधिकार  जमा लेंगी।डाक तार कर्मचारी कहते  है कि विभाग के अधिकारी और मंत्रियों को सेवा के सुधार में रूचि नही है।पुराने  सोफ्टवेयर चला रखे हैं।  नए यातायात के साधन बढ़ने को ध्यान में रखते हुए ये  नई योजनांए, नए रूट नही बनाते।  कोरियर कंपनी प्रदेश की सरकारी बस सेवा से  अपने पैकेट भेजती हैं।  डाक विभाग ऐसा  क्यों नही कर पाता।बिजनौर से गाजियाबाद सीधे रूट  है। किंतु  डाक विभाग  आरएमएस से  डाक भेजता है। सीधे  गाजियाबाद और दिल्ली  डाक कुछ घंटे में पंहुच  सकती है किंतु आरएमएस से भेजे जाने के कारण ये तीन दिन में  गाजियाबाद पहुंचती है। पहले  डाक बिजनौर अरणमएस से   नजीबाबाद जाएगी। वहां  से पैकेट बन मुरादाबाद। तीसरे  दिन मुरादाबाद से  गाजियाबाद पहुंचेगी।इन व्यवस्था में बहुत सुधार किया जा सकता है

लगता तो नही किंतु  विभाग के कमर्चारी आरोप लगाते रह हैं कि विभाग के उच्च अधिकारी मंत्री इस तरह से योजनाएं बनाते  है कि डाक विंलब से पंहुचे और कुरियर कंपनी को लाभ हो ।डाक विभाग  का कोरियर कंपनी की तरह अपनी  प्रीमियर सेवा शुरू करनी होगी। आज ग्राहक चाहता है कि उसकी डाक जल्दी  पहुंचे। भले ही उसे  ज्यादा भुगतान करना  पड़े। सरकारी तंत्र  अपनी डाक के लिए अभी तक भारतीय डाक पर निर्भर हैं किंतु  विभागीय कर्मचारियों की लापरवाही से कब तक ऐसा होता रहेगा, ये  सोचना  पड़ेगा।      

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)