Monday, July 29, 2024

कोंचिंग सैंटर में हुई छात्रों की मौत का जिम्मेदार कौन?

 

 

कोंचिंग सैंटर में हुई छात्रों की मौत का जिम्मेदार कौन?

अशोक मधुप

 

 

दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर स्थित राव आईएएस स्टडी (कोचिंग )  सेन्टर के बेसमेंट में अचानक बारिश का पानी घुस जाने से चार घंटे से अधिक समय तक फंसे रहने से तीन छात्रों की मौत हो गई.घटना के समय बेसमेंट के पुस्तकालय में 30−35 छात्र थे. पानी आते देख बाकी निकल गए. तीन फंसे  रह गए ,उनकी मौत हो गई.कोचिंग सेंटर के स्वामी और कार्डिनेटर को गिरफ्तार कर लिया गया है. इससे  पहले मुकर्जी नगर  दिल्ली के एक  कोचिंग सेंटर में  (15 जून 2023 ) को आग लग गई. छात्रों को कोचिंग सेंटर की खिड़की से निकलकर जान बचानी पड़ी. इस हादसे में 60 छात्र घायल भी हुए. कोंचिंग सैंटर में हादसे होना , प्रतिभागियों का आत्महत्या करना आज आम है.घटना  होती है. जांच के आदेश  होते  हैं किंतु  होता कुछ नही।कोंचिंग सैंटर चलाने  वाले भारी प्रभावशाली है. दूसरे  हमारी व्यवस्था पूरी तरह भ्रष्टाचार में डूबी है. पैसे के सामने इंसान की मौत की फाइले कूड़े  में चली जाती हैं, फिर एक नया हादसा  होता  है.फिर जांच  होती है,फिर फाइल कूड़े में चली जाती है.

राजेंद्र नगर के कोचिंग सैंटर में  मृतक छात्रों की पहचान तानिया सोनी, श्रेया यादव (दोनों की उम्र 25 वर्ष) और नवीन डेल्विन (28) के रूप में की गई है. तानिया तेलंगाना और श्रेया उत्तर प्रदेश की थीं, जबकि नवीन केरल के निवासी थे. वे सभी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। शनिवार को कई छात्र कोचिंग सेंटर की बेसमेंट में बनी लाइब्रेरी में थे कि अचानक सैलाब सा आया और उसमें तीन छात्रों की तड़पकर मौत हो गई.बताया जाता है कि बेसमेंट की परमीशन स्टोर के लिए थी,लाइब्रेरी के लिए नही.फिर भी लाइब्रेरी चल रही थी.  दिल्ली पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि पानी बेसमेंट तक कैसे पहुंचा, जिसका इस्तेमाल कोचिंग संस्थान लाइब्रेरी के तौर पर कर रहा था. प्रारंभिक जांच से पता चलता है कि बेसमेंट, जो जमीन से लगभग आठ फीट नीचे है, में एक लाइब्रेरी थी, जहां शनिवार शाम को कई छात्र मौजूद थे. सूत्रों के मुताबिक, भारी बारिश के बाद कोचिंग सेंटर का गेट बंद कर दिया गया . पानी को बिल्डिंग में प्रवेश करने से रोकने के लिए कोचिंग सेंटर के प्रवेश द्वार पर एक स्टील शेड लगाया गया है.पुलिस और अग्निशमन विभाग जांच कर रहे हैं कि बेसमेंट में पानी कैसे भरा .दिल्ली की मेयर शैली ओबेरॉय ने शहर के उन सभी कोचिंग सेंटरों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया जो इमारतों के बेसमेंट में चल रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे कोचिंग सेंटर भवन निर्माण उपनियमों का उल्लंघन हैं और मानदंडों के अनुरूप नहीं हैं. बताया जाता  है कि नगर निगम की मिलीभगत से राजेंद्र नगर में 95 प्रतिशत कोचिंग बेसमेंट में चल रहे हैं.

 लगभग एक साल  पहले दिल्ली  हाईकोर्ट    ने मुखर्जी नगर स्थित एक कोचिंग सेंटर में 15 जून 2023  गुरुवार को लगी आग की घटना का शुक्रवार को खुद से संज्ञान लिया­. कोर्ट ने दिल्ली सरकार, दिल्ली फायर सर्विस डिपार्टमेंट, दिल्ली पुलिस और एमसीडी को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा है. कोर्ट ने फायर सर्विस डिपार्टमेंट को निर्देश दिया कि वो ऐसे सभी संस्थानों में आग से बचाव के इंतजामों (फायर सेफ्टी ऑडिट) और उनके फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट की जांच करे. ये आदेश  दिल्ली  हाईकोर्ट ने 16 जून 2023 को दिए। जांच ये भी  होनी चाहिए कि कोर्ट के आदेश पर हुई जांच में क्या  हुआ? कहीं सब खानापूरी होकर ही तो  नही रह गई?  यदि उस समय सही से  जांच हो जाती। गलत रूप से चल रहे केंद्र बंद हो जाते तो  निश्चित रूप से ये हादसा नही होता।ये हादसा इस बात को चिल्ला− चिल्लाकर बता रहा है  कि ये जांच सही  नही हुई।

घटना  होती है. जांच के आदेश  होते हैं.ये ही आदेश  जांच अधिकारियों को   लूट का अधिकार दे देते हैं.इस आदेश के बाद जांच अधिकारी जाएंगे,  कोचिंग सैंटर में कमी निकालेंगे.नोटिस देंगे. अपना  सुविधा शुल्क वसूलेंगे और कुछ दिनों बाद सब फाइलों में  दबकर रह जाएगा. कुछ समय बाद फिर हादसा होगा, फिर जांच होंगी।फिर अधिकारियों को आपदा में अवसर मिलेंगे.फिर खेल होगा. सब ऐसे ही चलता रहेगा, जैसे चल रहा है। इस भ्रष्ट हो चुकी सरकारी मशीनरी के सुधरने की उम्मीद नहीं लगती।  कठोर अनुशासन लागू किये बिना  ये सुधरने वाली नहीं।जरूरत सरकारी तंत्र को सुधारने की है.
दरअस्ल मुकर्जी नगर
  हिंदी भाषी छात्रों और राजेंद्र नगर अंग्रेजी भाषी छात्रों  का सिविल सेवा की तैयारी करने के बड़े केंद्र  बन गया है।   यहां कई कोचिंग संस्थानों का घर है.हर वर्ष सिविल सर्विसेज की परीक्षा में सबसे ज्यादा अभ्यर्थी भी यहीं से चयनित होते हैं.
एक जानकारी के अनुसार यूपीएससी की सिविल सर्विसेज परीक्षा की तैयारी करने के लिए मुखर्जी नगर व आसपास के क्षेत्रों में प्रत्येक वर्ष करीब एक
 लाख छात्र तैयारियों के लिए पहुंचते है। मुखर्जी नगर इलाका अपने आप में मिनी भारत है। यही हालत राजेंद्र नगर की भी है. यहां हर वर्ष प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने के लिए उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, हरियाणा, कर्नाटक, उड़ीसा, पूर्वोत्तर राज्यों से भी छात्र पहुंचते हैं.मुखर्जी नगर और राजेंद्र नगर में में  यूपीएससी की सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाले महंगे से लेकर सस्ते कोचिंग भी मौजूद हैं. यही वजह है कि यहां पर आर्खिक रूप से कमजोर परिवार से आने वाले बच्चे भी अपनी तैयारी आसानी से कर लेते हैं.
मुखर्जी नगर और राजेंद्र नगर क रिहायशी इमारतों में व्यावसायिक गतिविधियां चलाने का गढ़ बन चुका है­­. बीते एक दशक में यहां
 कोचिंग सेंटरों की बाढ़ आ गई है. ज्यादातर घरों में या तो कोचिंग सेंटर चल रहे हैं या फिर लाइब्रेरी या पीजी बनाकर संपत्ति मालिक चांदी काट रहे हैं लेकिन नगर निगम को शुल्क देने में अब भी कतराते  हैं. इन संपत्तियों का व्यावसायिक उपयोग हो रहा है. ज्यादातर इमारतों को कोचिंग संस्थान में बदलने के लिए भवन उपनियमों का उल्लंघन किया गया है. तय मानकों को नजरअंदाज कर कमरों को हाल में तब्दील कर दिया गया है। इसके चलते कई इमारतें ढांचागत रूप से कमजोर भी हो गई हैं.
 यूपीएससी
, एसएससी आदि की तैयारी करने वाले छात्र कोचिंग संस्थान संचालकों की मनमानी के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाते . इन्हें क्लास में भेड़-बकरियों की तरह ठूस कर  पढ़ाया जाता है. 25 मई  2019 को गुजरात के सूरत के एक कोचिंग में आग लगने से 22 छात्र की मौत  के बाद  गुजरात सरकार ने अग्नि सुरक्षा निरीक्षण किए जाने तक गुजराज सरकार ने राज्य के सभी निजी कोचिंग केंद्रों को बंद करने का आदेश दिया. सरकार ने स्कूलों, कॉलेज, कोचिंग सेंटरों, अस्पतालों, शॉपिंग मॉल और अन्य व्यावसायिक भवनों के अग्नि सुरक्षा निरीक्षण का भी आदेश दिया. दिल्ली अग्निशमन सेवा ने दिल्ली के सभी कोचिंग सेंटरों का अग्नि सुरक्षा निरीक्षण करने का निर्णय लिया  था. उस समय भी आदेश हुए थे.जांच हुई. नियमों के विपरीत चलने वालों को नोटिस देकर कार्रवाई पूरी कर दी गई. लोगों से संबधित अधिकारियों का प्रसन्न कर दिया.  काम पहले ही तरह ही चलता रहा.इसमें भी  ऐसा ही होता लगता है।दरअस्ल इस तरह की बड़ी घटनाएं  संबधित अधिकारियों  की आय  का माध्यम बनते हैं.देखने में आया है कि  विभाग के अधिकारी निरीक्षण कर कमी  बता देते हैं।  नोटिस भेज देतें हैं.प्राय इन्होंने ही अग्निशमन सुरक्षा के उपकरण लगाने वालों से मेल−जोल कर रखा है। ये उपकरण  लगाने वाले विभागीय अधिकारियों के चहेते होते हैं तो काम मानक के अनुरूप नही करते। पूरा पैसा लेकर  भी काम पूरा नही करते।सब  पहले की तरह ही चलता  रहता है. ऐसे में हादसे होने पर जब तक व्यवस्था के लिए  जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई  नही होती , तब तक कुछ सुधरने वाला  नही है. जांच करानी चाहिए कि इसमें किस− किस विभाग के अधिकारी की गलती रही है. किसने जिम्मेदारी नही निभाई.जिम्मदारी तै होने वाले अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई भी होनी चाहिए,उनपर गैर इरादतन हत्या के मुकदमें दर्ज होने  चाहिएं,भले ही वह रिटायर हो गए हों. यह भी तै  होना  चाहिए कि 2019 की सूरत की  घटना के बाद हुई जांच में क्या हुआ था।इसके बिना कुछ होने वाला नही है.इस प्रकरण में तो नगर निगम् की लापरवाही सीधे− सीधे नजर आती है। बिना अनुमति बेसमेंट में चलते कोंचिग पर रोक लगाना उसकी जिम्मेदारी है।दूसरी नालों की  सफाई  उसीका कार्य  है। दोनो में लापरवाही हुई  है।  
अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) 

 

Friday, June 28, 2024

कब सुधरेगी भारत की डाक व्यवस्था?



आजादी के 75 साल बाद भी भारत की डाक व्यवस्था में सुधार न होकर पतन ही हुआ।भारत में डाक  विभाग 250 साल से  पुराना  है। आज गांव −गांव तक इसकी ब्रांच हैं।पूरे भारत में 155531 डाकघर हैं।इतना  बडा  नेटवर्क होने के बाद भी यह सरकारी विभाग प्राइवेट कोरियर कंपनियों से प्रतिस्पर्धा में पिछड़ती जा रही है।

भारतीय डाक की सेवा  में सुधार हो, इसमें  न विभागीय अधिकारियों की रूचि है, न सरकार की।इसी का परिणाम है कि इसका अपने  व्यवसाय से  एकाधिकार टूटता जा रहा है। प्राइवेट कंपनी इसके व्यवसाय को कब्जाती जा रही हैं।

भारत में डाक सेवाओं की स्थापना 1774 में हुई।पहली बार भारतीय डाकघर को राष्ट्रीय महत्व के एक अलग संगठन के रूप में स्वीकार किया गया और उसे एक अक्टूबर 1854 को डाकघर महानिदेशक के सीधे नियंत्रण में सौंप दिया गया । भारतीय डाक व्यवस्था कई व्यवस्थाओं को जोड़कर बनी है । 650 से ज्यादा रजवाड़ों की डाक प्रणालियों, जिला डाक प्रणाली और जमींदारी डाक व्यवस्था को प्रमुख ब्रिटिश डाक व्यवस्था में शामिल किया गया था । इन टुकड़ों को इतनी खूबसूरती से जोड़ा गया है कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक संपूर्ण अखंडित संगठन है।

1766 में लार्ड क्लाइव ने देश में पहली डाक व्यवस्था स्थापित की थी । इसके बाद 1774 में वारेन हेस्ंटिग्ज़ ने इस व्यवस्था को और मजबूत किया । उन्होंने एक महा डाकपाल के अधीन कलकत्ता प्रधान डाकघर स्थापित किया । मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी में क्रमशः 1786 और 1793 में डाक व्यवस्था शुरू की गई । 1837 में डाक अधिनियम लागू किया गया ताकि तीनों प्रेसीडेन्सी में सभी डाक संगठनों को आपस में मिलाकर देशस्तर पर एक अखिल भारतीय डाक सेवा बनाई जा सके । 1854 में डाकघर अधिनियम के जरिए एक अक्टूबर 1854 को मौजूदा प्रशासनिक आधार पर भारतीय डाक घर को पूरी तरह सुधारा गया ।

1854 में डाक और तार दोनों ही विभाग अस्तित्व में आए। शुरू से ही दोनों विभाग जन कल्याण को ध्यान में रख कर चलाए गए । लाभ कमाना उद्देश्य नहीं था । 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध्द में सरकार ने फैसला किया कि विभाग को अपने खर्चे निकाल लेने चाहिए। उतना ही काफी होगा । 20वीं सदी में भी यही क्रम बना रहा । डाकघर और तार विभाग के क्रियाकलापों में एक साथ विकास होता रहा। 1914 के प्रथम विश्व युध्द की शुरूआत में दोनों विभागों को मिला दिया गया ।

भारतीय राज्यों के वित्तीय और राजनीतिक एकीकरण के चलते यह आवश्यक और अपरिहार्य हो गया कि भारत सरकार भारतीय राज्यों की डाक व्यवस्था को एक विस्तृत डाक व्यवस्था के अधीन लाए । ऐसे कई राज्य थे जिनके अपने जिला और स्वतंत्र डाक संगठन थे और उनके अपने डाक टिकट चलते थे । इन राज्यों के लैटर बाक्स हरे रंग में रंगे जाते थे ताकि वे भारतीय डाकघरों के लाल लैटर बाक्सों से अलग नज़र आएं ।

1908 में भारत के 652 देशी राज्यों में से 635 राज्यों ने भारतीय डाक घर में शामिल होना स्वीकार किया । केवल 15 राज्य बाहर रहे, जिनमें हैदराबाद, ग्वालियर, जयपुर और ट्रावनकोर प्रमुख हैं ।

1925 में डाक और तार विभाग का बड़े पैमाने पर पुनर्गठन किया गया । विभाग की वित्तीय स्थिति का जायजा लेने के लिए उसके खातों को दोबारा व्यवस्थित किया गया । उद्देश्य यह पता लगाना था कि विभाग करदाताओं पर कितना बोझ डाल रहा है या सरकार का राजस्व कितना बढा रहा है और इस दिशा में विभाग की चारों शाखाएं यानी डाक, तार, टेलीफोन और बेतार कितनी भूमिका निभा रहे हैं ।

भारतीय डाक सेवा का क्षेत्र चिट्ठियां बांटने और संचार का कारगर साधन बने रहने तक ही सीमित नहीं है । शुरूआती दिनों में डाकघर विभाग, डाक बंगलों और सरायों का रख रखाव भी करता था। 1830 से लगभग तीस सालों से भी ज्यादा तक यह विभाग यात्रियों के लिए सड़क यात्रा को भी सुविधाजनक बनाते थे । कोई भी यात्री एक निश्चित राशि के अग्रिम पर पालकी, नाव, घोड़े, घोड़ागाड़ी और डाक ले जाने वाली गाड़ी में अपनी जगह आरक्षित करवा सकता था । वह रास्ते में पड़ने वाली डाक चौकियों में आराम भी कर सकता था । यही डाक चौकियां बाद में डाक बंगला कहलाईं।19वीं सदी के आखिर में प्लेग की महामारी फैलने के दौरान, डाकघरों को कुनैन की गोलियों के पैकेट बेचने का काम भी सौंपा गया था ।

भारत संयुक्त परिवारों और छोटी आमदनी वाले लोगों का देश है, जहां लोगों को छोटी रकमों की सूरत में लाखों रूपए भेजने पड़ते हैं । रूपयों के लेन-देन का काम जिला मुख्यालयों में स्थित 321 सरकारी खजानों द्वारा किया जाता था । 1880 में मनी आर्डर के द्वारा छोटी रकमें भेजने का काम 5090 डाकघर वाली विस्तृत डाक एजेंसी को दिया गया और इस तरह जिला मुख्यालयों तक जाने और प्राप्तकर्ता द्वारा पहचान साबित करने की कठिनाइयां कम हो गईं ।1884 में उच्च पदों पर आसीन कर्मचारियों को छोड़कर देसी डाक कर्मचारियों के लिए डाक जीवन बीमा योजना शुरू की गई, क्योंकि भारत में काम करने वाली बीमा कंपनियां आम भारतीय निवासियों का बीमा करने से कतराती थीं ।

उन कठिन दिनों में देश के साथ-साथ डाक विभाग भी इसके असर से अछूता नहीं रहा । 1857 के बाद विभाग ने आगजनी और लूटमार का दौर देखा । एक उपडाकपाल और एक ओवरसियर की हत्या कर दी गई, एक रनर को घायल कर दिया गया और बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तर पश्चिमी सीमांत राज्यों के कई डाकघरों को लूट लिया गया । उत्तर पश्चिमी सीमांत राज्यों और अवध में सभी संचार लाइनों को बंद कर दिया गया था और हिंसा खत्म हो जाने के बाद भी साल भर तक कई डाकघरों को दोबारा नहीं खोला जा सका ।

लगभग पांच माह तक चलने वाली 1920 की डाक हड़तालों ने देश की डाक सेवा को पूरी तरह ठप्प कर दिया था । 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कई डाकघरों और लैटर बक्सों को जला दिया गया थाऔर डाक का आना-जाना बड़ी मुश्किल से हो पाता था। इसके कारण कई सेक्टरों में डाक सेवाएं गड़बड़ा गई थीं ।

पोस्ट कार्ड 1879 में चलाया गया जबकि वैल्यू पेएबल पार्सल (वीपीपी), पार्सल और बीमा पार्सल 1977 में शुरू किए गए। भारतीय पोस्टल आर्डर 1930 में शुरू हुआ । तेज डाक वितरण के लिए पोस्टल इंडेक्स नंबर (पिनकोड) 1972 में शुरू हुआ । तेजी से बदलते परिदृश्य और हालात को मद्दे नजर रखते हुए 1985 में डाक और दूरसंचार विभाग को अलग-अलग कर दिया गया । समय की बदलती आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर 1986 में स्पीड पोस्ट शुरू हुई ओर 1994 में मेट्रो#राजधानी#व्यापार चैनल, ईपीएस और वीसैट के माध्यम से मनी आर्डर भेजा जाना शुरू हुआ।

पिछले कई सालों में डाक वितरण के क्षेत्र में बहुत विकास हुआ है और यह डाकिए द्वारा चिट्ठी बांटने से स्पीड पोस्ट और स्पीड पोस्ट से ई-पोस्ट के युग में पहुंच गया है । भारतीय पोस्टल आर्डर 1930 में शुरू हुआ । तेज डाक वितरण के लिए पोस्टल इंडेक्स नंबर (पिनकोड) 1972 में शुरू हुआ । तेजी से बदलते परिदृश्य और हालात को मद्दे नजर रखते हुए 1985 में डाक और दूरसंचार विभाग को अलग-अलग कर दिया गया । समय की बदलती आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर 1986 में स्पीड पोस्ट शुरू हुई ओर 1994 में मेट्रो#राजधानी#व्यापार चैनल, ईपीएस और वीसैट के माध्यम से मनी आर्डर भेजा जाना शुरू किया गया ।

डाक व्यवस्था में डाकिए का बड़ा महत्व है। पुराने जमाने में हरेक डाकिए को ढोल बजाने वाला मिलता था जो जंगली रास्तों से गुजरते समय डाकिए की सहायता करता था । रात घिरने के बाद खतरनाक रास्तों से गुजरते समय डाकिए के साथ दो मशालची और दो तीरंदाज भी चलते थे। ऐसे कई किस्से मिलते हैं जिनमें डाकिए को शेर उठा ले गया या वह उफनती नदी में डूब गया या उसे जहरीले सांप ने काट लिया या वह चटटान फिसलने या मिटटी गिरने से दब गया या चोरों ने उसकी हत्या कर दी

 

 ब्रिटिश भारत के तत्कालीन गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने आम जनता के लिए पहली डाक सेवा शुरू की।यह सेवा उन  कबूतरों के लिए एक राहत के रूप में आई, जिन्हें पत्र देने में कई दिन और महीने लग जाते थे। डाक सेवाओं ने त्वरित वितरण को एक वास्तविकता बना दिया।पूरे देश में इसका नेटवर्क बना।  गांव −गांव तक  पोष्ट आफिस खुल गए।डाक सेवा के साथ−साथ  सरकार  की छोटी− छोटी बचत योजनांए भी  शुरू  हुईं।सयम की मांग को देखते  हुए  तार और फोन सेवा पर भी डाक तार विभाग का एकाधिकार  हो गया।  एक की  कंपनी होने के कारण प्रबंधक की परेशानी देखते  हुए 1985 में दूरसंचार सेवाएं  अलग कर दी गई।

समय बदला अंतरराष्ट्रीय शिपिंग.डीएचएल ने 1969 में पहली अंतरराष्ट्रीय कूरियर कंपनी के रूप में एक भव्य प्रवेश किया, और कई अन्य ने इसका अनुसरण किया। इनका उद्देश्य बिना किसी देरी के सुविधाजनक वितरण सेवाएं प्रदान करना था।2020 तक, ब्लू डार्ट भारत में अग्रणी कूरियर कंपनी बन गई। प्रौद्योगिकी की प्रगति के साथ, माल की डिलीवरी तेज और तेज हो गई है। जबकि समय के साथ कूरियर सेवाओं का उन्नयन हुआ है, लोग अभी भी आवश्यक दस्तावेज भेजने के लिए डाक सेवाओं पर भरोसा करते हैं।किंतु समय  ज्यादा लेने डाक विभाग के कर्मचारियों की लापरवाही और सेवा में रूचि न लेने के कारण भारतीय डाक सेवा में लोगों का रूझान कम होना शुरू हो गया।ये सही है कि डाक सेवाएं  सस्ती और कूरियर सेवाएं मंहगी हैं। किंतु  आज भारतीय समाज में  पैसा बढ़ा  है तो डाक भेजने वाले के लिए  सस्ती और मंहगी में ज्यादा फर्क नही रह गया।  वह जल्दी से जल्दी अपनी डाक गंतव्य पर पंहुचाना चाहता है।

ऐसे में भारतीय डाक सेवा पिछड़ती जा  रही हैं।डाक विभाग ने अपनी स्पीड पोस्ट सेवा शुरू की।नाम से लगता  है कि डाक की अन्य सेवाओं से ये तेज होगी किंतु  ऐसा नही है।  बिजनौर उत्तर प्रदेश से राजकोट गुजरात में स्पीड पोस्ट  पंहुचने में नौ  दिन लगते हैं,  जबकि कोरियर चार से पांच   दिन में आ जाता  है। दिल्ली से राजकोट स्पीड पोस्ट  पांच दिन लेती है।  कूरियर कंपनी ब्लू डांर्ट राजकोट का पैकेट  दूसरे  दिन दिल्ली में डिलीवर कर देती है। बेटे का  जन्म दिन था।  पहले दिन शाम छह बजे बिजनौर से मैने बंगलौर के लिए मिठाई का पैकेट कोरियर किया। ये पैकेट अगले  दिन शाम  पांच बजे बेटे को कंपनी में मिल गया।डाक से ऐसा कभी नी हो सकता।

हालाकि कोरियर कंपनी  का नेटवर्क अभी शहरों तक ही सीमित है। डाक सेवा गांव− गांव तक फैली होने के कारण अपनी सुविधा  गांव  तक दे रही है।गांव  तक सेवा देने में उसका एकाधिकार है किंतु  जैसे−जैसे कोरियर कंपनियों का विस्तार होता जाएगा,  वह गांव  तक अपनी एकाधिकार  जमा लेंगी।डाक तार कर्मचारी कहते  है कि विभाग के अधिकारी और मंत्रियों को सेवा के सुधार में रूचि नही है।पुराने  सोफ्टवेयर चला रखे हैं।  नए यातायात के साधन बढ़ने को ध्यान में रखते हुए ये  नई योजनांए, नए रूट नही बनाते।  कोरियर कंपनी प्रदेश की सरकारी बस सेवा से  अपने पैकेट भेजती हैं।  डाक विभाग ऐसा  क्यों नही कर पाता।बिजनौर से गाजियाबाद सीधे रूट  है। किंतु  डाक विभाग  आरएमएस से  डाक भेजता है। सीधे  गाजियाबाद और दिल्ली  डाक कुछ घंटे में पंहुच  सकती है किंतु आरएमएस से भेजे जाने के कारण ये तीन दिन में  गाजियाबाद पहुंचती है। पहले  डाक बिजनौर अरणमएस से   नजीबाबाद जाएगी। वहां  से पैकेट बन मुरादाबाद। तीसरे  दिन मुरादाबाद से  गाजियाबाद पहुंचेगी।इन व्यवस्था में बहुत सुधार किया जा सकता है

लगता तो नही किंतु  विभाग के कमर्चारी आरोप लगाते रह हैं कि विभाग के उच्च अधिकारी मंत्री इस तरह से योजनाएं बनाते  है कि डाक विंलब से पंहुचे और कुरियर कंपनी को लाभ हो ।डाक विभाग  का कोरियर कंपनी की तरह अपनी  प्रीमियर सेवा शुरू करनी होगी। आज ग्राहक चाहता है कि उसकी डाक जल्दी  पहुंचे। भले ही उसे  ज्यादा भुगतान करना  पड़े। सरकारी तंत्र  अपनी डाक के लिए अभी तक भारतीय डाक पर निर्भर हैं किंतु  विभागीय कर्मचारियों की लापरवाही से कब तक ऐसा होता रहेगा, ये  सोचना  पड़ेगा।      

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

Monday, June 10, 2024

देखना है गठबंधन के कितने दबाव में काम करते हैं नरेंद्र मोदी?

 

 देखना है गठबंधन के कितने  दबाव में काम करते हैं नरेंद्र मोदी?

अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

रविवार शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरे कार्यकाल की शपथ ली।।उनके नेतृत्व में  राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन  राजग ने देश की सत्ता संभाल ली। प्रधानमंत्री के साथ ही 72 मंत्रियों ने भी मंत्रीपद की शपथ ली। हालांकि अभी मंत्रियों के विभागों का बंटवारा होना बाकी है, किंतु टीम में पुराने साथियों को जगह मिलना  बताता है कि सब नरेंद्र मोदी की  योजना के अनुसार हो  रहा है। उन्हें अपनी टीम पर पूरा भरोसा और विश्वास है। हालाकि  2024 के इस आम चुनाव में भाजपा को बहुमत नहीं मिला है और उसे सत्ता में बने रहने के लिए एनडीए की सहयोगी पार्टियों के समर्थन की जरूरत होगी। अब तक ठसक से सत्ता चलाने वाले नरेंद्र मोदी  को गठबंधन के घटक दलों की सुननी और माननी होगी।वैसे शपथ ग्रहण की रात में भारत ने टी20 विश्व कप 2024 में इतिहास रच दिया है। पाकिस्तान के खिलाफ जीत के साथ ही टीम इंडिया ने कई रिकॉर्ड बना दिए।  यह जीत एक तरह से नई  सरकार का स्वागत ही मानी जाएगी।

चुनाव से पूर्व ही  नरेंद्र मोदी अपना अजेंडा बताते  रहे हैं किंतु  इस बार उनके सामने कई और भी चुनौतियां  होगी। नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण के  समय जम्मू में  आंतकियों ने श्रद्धालुओं की बस  हमला कर मोदी की नई  सरकार के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज  कर दी है।सरकार पहले ही आंतकवाद से मजबूती से जूझ  रही है। उसे आंतकवाद की जड़े खत्म करने के लिए इस कार्यकाल में काम करना  होगा। पाक अधिकृत कश्मीर में बैठे आंतकियों के आकाओं के  खात्मे के लिए भी  उसे लगना होगा।हालाकि पाकिस्तान में ये काम चल रहा है। काफी समस ये  वहां  रह रहे भारत विरोधी आंतकियों को चुन− चुन कर कत्ल किया  जा  रहा है।   

 लोकसभा चुनाव के पहले ही भाजपा ने यह साफ कर दिया था कि मोदी सरकार 3.0 में यूनिफॉर्म सिविल कोड कोर एजेंडे में शामिल होगा। उत्तराखंड में भाजपा सरकार पहले ही इसे लागू कर चुकी है। ऐसे में माना जा रहा था कि केंद्र की सत्ता वापस में लौटने के बाद भाजपा प्राथमिकता के साथ इसे आगे बढ़ाएगी। लेकिन अब सहयोगी दल भाजपा के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं। नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू भाजपा पर इस निर्णय को वापस लेने पर दबाव बना सकते है। भाजपा के एजेंडे में वन नेशन, वन इलेक्शन भी शामिल हैं। इस संबंध में बनी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी हैं। 47 राजनीतिक दलों में से 32 दल तैयार हैं। एनडीए गठबंधन में इस बार जदयू और टीडीपी की भूमिका अहम है। ऐसे में वे भाजपा के इस एजेंडे पर भी रोड़ा बन सकते हैं।
तीसरे कार्यकाल में केंद्र सरकार की प्रमुख स्वास्थ्य बीमा योजना आयुष्मान भारत का विस्तार भी  शामिल है।। नरेंद्र मोदी चुनावी कार्यक्रमों में यह कहते रहे हैं कि तीसरे कार्यकाल में बड़े फैसलों के लिए 'मोदी की गारंटी' पूरी की जाएगी। चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए मोदी ने भविष्य के लिए अपने विजन को रेखांकित किया था। मोदी ने आयुष्मान भारत के तहत प्रदान की जाने वाली मुफ्त स्वास्थ्य सेवा तक अभूतपूर्व पहुंच पर जोर दिया। भाजपा के 2024 के घोषणापत्र में आयुष्मान भारत के कवरेज को 70 वर्ष से अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों और ट्रांसजेंडर समुदाय को शामिल करने के लिए आगे बढ़ाने का भी वादा किया गया है।इस एजेंडे को  लागू  करने में गठबधंन को कोई  आपत्ति नही होगा और यह सरलता से लागू हो  जाएगा।  

 चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सिपहसालार कहते घूमते  रहे हैं कि सरकार  बनी तो  पाक अधिकृत कश्मीर पर भारत का   कब्जा होगा। शहरी निकाय मंत्री कमल गुप्ता हरियाणा के रोहतक में व्यापारियों द्वारा आयोजित अभिनंदन समारोह में कहा कि  कि आने वाले दो-तीन साल में किसी भी क्षण पाक अधिकृत कश्मीर भारत में शामिल हो सकता है। विदेश मंत्री जयशंकर ने भी एक बयान में पीओके को लेकर भारत के दावे को दोहराया था। सेरामपुर पश्चिम बंगाल में एक रैली को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि  पाक अधिकृत कश्मीर भारत का है और हम उसे लेकर रहेंगे ।योगी आदित्यनाथ तो सबसे आगे बढ़ गए। चुनाव के बाद के मोदी जी को तीसरे कार्यकाल पर बोलते हुए योगी आदित्यनाथ ने पाकिस्तान को निशाने पर लेते हुए कहा कि आज पाकिस्तान के लिए पीओके को भी बचाना मुश्किल हो रहा है. उन्होंने कहा कि मोदी जी को तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने दीजिए, अगले छह महीने के अंदर 'पाक अधिकृत कश्मीर' भारत का हिस्सा होगा। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि हमें 400 सीट इसलिए चाहिए ताकि पीओके ले सकें। भाजपा के सिपहसालार की पाक अधिकृत कश्मीर पर चुनाव प्रचार के दौरान कब्जे की बात करते रहे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर चुप्पी साधे रखी।किंतु कांग्रेस के  मणिशंकर अय्यर, और जम्मू −कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री  फारुख अब्दुल्ला के ये कहा कि  भाजपायी पाक अधिकृत कश्मीर पर कब्जे की बात कर रहे हैं।  पाकिस्तान ने चूड़ी  नही पहन रखी। पाकिस्तान के पास एटम बम है। अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मसले पर चुप्पी साधे थे।किंतु पाकिस्तान ने चूडी नही पहन रखीं, पर उन्होंने जरूर कहा कि कांग्रेसी और कुछ विपक्षी नेता कह रहे हैं कि पाकिस्तान ने चूड़ी   नही पहन रखीं तो  उसे  पहना दी जाएंगी।  प्रधानमंत्री के इस कथन से साफ होता है  कि  उनके सिपहसालारों के पाक अधिकृत कश्मीर  पर कब्जे की घोषणा उनकी अपनी नही है। यह कहीं केंद्रीय  नेतृत्व में पक  रहा है और नई सरकार   बनने पर  वह इस पर कार्रवाई  कर सकता है।

इतना  सब होने के बावजूद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मोदी सरकार पर  देशभर में जातिगत जनगणना कराने को लेकर दबाव बना सकते है। क्योंकि बिहार में पिछड़ी जातियों के अलावा दलित और मुस्लिम मतदाताओं का अच्छा खासा प्रभाव है। नीतीश अपने राज्य बिहार में इस जनगणना को करवा चुके है। वे लंबे समय से देश में इसे करवाने की डिमांड कर रहे है। क्योंकि अन्य विपक्षी दल चाहे वह कांग्रेस हो या फिर आरजेडी दोनों ही इस जातिगत जनगणना की मांग कर रही है।हालाकि भाजपा इसके विरूद्ध है।नीतीश कुमार वर्षों से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मांग कर रहे है। भाजपा में शामिल होने के पहले भी नीतीश ने केंद्र सरकार से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की थी। उन्होंने इस मांग को लेकर बिहार में अभियान चलाने की बात भी कही थी। इसके अलावा चंद्रबाबू नायडू भी आंध्र के लिए स्पेशल पैकेज की मांग कर सकते है। ये दोनों नेता अब अपनी इन मांगों को लेकर मोदी सरकार पर दबाव रहेगा। वैसे मोदी ऐसे  दबाव से निपटना बखूबी जानते हैं। महाराष्ट्र की शिवसेना को गठबंधन में लेकर ये  दबाव कम किया जा सकता। चुनाव से पूर्व विपक्षी गठबंधन  से जैसे  नितीश कुमार पल्टी मार कर भाजपा के साथ आ  गए,  ऐसे ही विपक्ष में बैठे कई  दल भाग सकतें हैं।  बस  इशारे की जरूरत है।   मोदी पुराने राजनयिक  हैं। कब किस हालात से  कैसे  जूझना  है, वह जानते हैं। उम्मीद है कि वह अपनी सूझबूझ से सरकार  को सरलता से  पांच साल चलाते रहेंगे।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)