Sunday, April 28, 2024

देश को संदेश देने में नाकाम रही विपक्ष की रांची रैली

 



अशोक मधुप

वरिष्ठ पत्रकार

विपक्षी दलों की रविवार को झारखंड की राजधानी रांची में  हुई  महारैली    देश को  कोई स्पष्ट  संदेश नही दे सकी। हालाकिं  इससे बड़ी  उम्मीद थी।उम्मीद  थीं कि राजनैतिक दल अपने  चुनाव घोषणा  पत्र अब तक  प्रस्तुत कर चुके  हैं।इस रैली में वे  काँमन मिनीमम कार्यक्रम जारी कर सकतें हैं किंतु ऐसा कुछ नही  हुआ।हर बार की तरह सिर्फ भाषण  तक ही सीमित रही रैली। 

झारखंड की राजधानी रांची में विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' ने 'उलगुलान न्याय महारैली' का नाम दिया गया है। इस दौरान मंच में बड़े-बड़े दिग्गज नेता मौजूद रहे। इसके साथ ही मंच पर दो खाली कुर्सियां रखी गईं। एक जेल में बंद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के लिए और दूसरी झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए। उनकी जगह केजरीवाल की पत्नी  नीता केजरीवाल और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन ने मंच साझा किया।भारी संख्या में लोग रैली में पहुंचे
रैली के दौरान भीड़ ने 'जेल का ताले टूटेंगे, हेमंत सोरेन छूटेंगे' और 'झारखंड झुकेगा नहीं' जैसे नारे लगाए। झारखंड की राजधानी का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के आसपास होने के बावजूद भारी संख्या में लोग रैली में शामिल हुए। चिलचिलाती गर्मी के बीच सभी रैली के समर्थन जुटे रहे। 'उलगुलान' शब्द, जिसका अर्थ क्रांति है। इसे आदिवासियों के अधिकारों के लिए अंग्रेजों के खिलाफ बिरसा मुंडा की लड़ाई के दौरान गढ़ा गया था।

हेमंत सोरेन को कथित भूमि धोखाधड़ी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 31 जनवरी की रात को गिरफ्तार किया था। इसी केंद्रीय एजेंसी ने 21 मार्च को अरविंद केजरीवाल को शराब नीति घोटाले से जुड़े मामले में गिरफ्तार भी किया था। हालांकि, झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष और आप सुप्रीमो के लिए कुर्सियां खाली रखी गई थीं, लेकिन उनकी पत्नियां कल्पना सोरेन और सुनीता केजरीवाल मंच पर बैठी थीं। कल्पना सोरेन और सुनीता केजरीवाल  का भाषण मुख्यतः  अपने  पतियों की गिरफ्तारी के विरोध में था। दोनों का दावा था कि उनके पतियों को केंद्र की मोदी सरकार  ने गलत ढंग से गिरफ्तार कराया  हुआ  है। केंद्र की मोदी सरकार विपक्ष की आवाज दबा देना चाहती है। इसके लिए सबको एकजुट होना  होगा।रैली में नेताओं  का यह भी   आरोप था कि  केंद्र में भाजपा फिर लौटी तो देश से लोकतंत्र  खत्म हो  जाएगा।  रैली में शामिल नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगातार झूठ बोलने, गारंटी के नाम पर लोगों को ठगने, लोकतंत्र को कमज़ोर करने और जुमलों के सहारे राजनीति करने के आरोप लगाए।नेताओं ने कहा कि देश में बेरोज़गारी चरम पर है और प्रधानमंत्री मोदी का हर साल दो करोड़ नौकरियों का वादा हवा में घूम रहा है.

देश में पहले चरण के मतदान के ठीक अगले दिन आयोजित उलगुलान न्याय महारैली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि पहले चरण के चुनाव में बीजेपी की हवा निकल गई है।उन्होंने कहा कि वे 400 पार की बात करते हैं लेकिन 180-190 सीटों से आगे नहीं जाने वाले. इसलिए, वोट देना ज़रूरी है।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा, “पहले चरण में ही उत्तर प्रदेश में इनकी हालत ख़राब हो गई है और जब यूपी इन्हें हटा सकता है, तो आप क्यों नहीं। यह देश मोदी की नहीं, संविधान की गारंटी चाहता है।”

 जबकि झारखंड में मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इस रैली को पूरी तरह फ्लॉप करार दिया है.

बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल नाथ शाहदेव ने कहा, “इनके मंच पर भ्रष्टाचार में शामिल नेताओं का जमावड़ा हुआ और ये भ्रष्टाचार उन्मूलन की बात करते हैं. यह हास्यास्पद है।”

प्रतुल नाथ शाहदेव ने कहा, “इनका दावा था कि रैली में पांच लाख लोग शामिल होंगे लेकिन आए बमुश्किल 10-15 हज़ार लोग। उनमें आपस में मारपीट हुई। ये लोग सिर्फ़ सत्ता में आने के लिए एक मंच पर आए थे। रैली में सिर्फ़ परिवारवादियों और भ्रष्टाचारियों की भागीदारी थी. इसलिए इसे सुपर फ़्लॉप कहा जाना चाहिए।”हालांकि उलगुलान न्याय महारैली में लोगों की खासी भागीदारी देखी गई. झारखंड के सुदूर इलाक़ों से लोग बसों, गाड़ियों और ट्रेनों से रांची पहुंचे।ऐसे लोगों को लाने के विशेष इंतज़ाम किए गए थे. रैली स्थल पर लोगों की भीड़ देर शाम तक जमी रही।

उलगुलान रैली में शामिल होने आई कार्यकर्ताओं की भीड़ में दो गुटों के बीच झड़प हो गयी। कुर्सियां भी तोड़ी गई।

ये मारपीट ,ये  हुडदंग कोई  अच्छा  संदेश  नही दे सकें।

उलगुलान रैली में शिबू सोरेन, बसंत सोरेन, कल्पना सोरेन, यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव, बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव, अरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल, पंजाब के सीएम भगवंत मान, आप सांसद संजय सिंह, शिवसेना सांसद प्रियंका चतुर्वेदी, नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख फारूक अब्दुल्ला और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल हुए।रैली में शामिल नहीं हुए राहुल गांधी।जानकारी के मुताबिक, कांग्रेस नेता राहुल गांधी की तबीयत अचानक खराब हो गई है। इस वजह से वे रैली में शामिल नहीं हुए।

सात चरणों में पूरे  होने  वाले  लोकसभा चुनाव का  पहला  चरण   पूरा हो गया।मतदाताओं ने प्रत्याशियों निर्णय इवीएम को  सौंप  दिया।दूसर चरण  का मतदान 26  अप्रैल  को  होना है।इतना सब होने  पर भी विपक्षी  28 दलों का गठबंधन  अब तक   न कोई  अपना  कॉमन प्रोग्राम प्रस्तुत  कर सका। न नही सभी दलों द्वारा सर्व सम्मत नेता   ही चुना गया।

दरअस्ल विपक्षी दलों का यह गठबंधन ,  उन दलों का भी गठबधंन कहां जा  सकता है, जो दल भाजपा के साथ  नही जा सके। अवसर नही मिला। इस विपक्षी  दलों के आई­.एन­.डी.आई.ए. गठबंधन  को खड़ा  करने में बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार का बड़ा योगदान रहा।ये सब  उन्ही की मेहनत से खड़ा  ह़ुआ। किंतु मौके की तलाश में  बैठे नितीश कुमार  अवसर मिलते ही इस गठबंधन से किनारा करके  बिहार में भाजपा के साथ गठबधंन कर लिया। भाजपा के साथ मिलकर अपनी सरकार  बनाली।इसी तरह पश्चिमी उत्तर  प्रदेश  के  राष्ट्रीय  लोकदल के जयंत  चौधरी ने किया।भाजपा से   बात पक्की होने  तक वे सपा  के अखिलेश यादव और कांग्रेस के नेताओं के साथ  थे। बात पक्की होते ही  उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन  कर लिया।28 दलों वाले  इस  एलायंस  में प्रायः  वह ही दल हैं  जिनकी अपने  प्रदेश में  सरकार  है।  प्रदेश में  सरकार  होने के कारण वह भाजपा  से गठबधंन नही कर पा रही।

चुनाव का एक चरण बीत गया।दूसारा 26 को   है।इसके  बाद पांच  चरण शेष  हैं।  लगता है कि ये  भी  जल्द ही  हो  जांएगे,  विपक्ष के 28 दलों के एलाइंस इंडिया'  का मिनिमम   कार्यक्रम तै  हुअ। ये  ब्ठकर कोई  ऐसा  एजेंडा भी  नही बना  पाए कि  बहुमत में आने  पर किस कार्यक्रम  पर वे  सरकार  चलांएगे। दूसरा  उनका संयुक्त प्रधानमंत्री कौन होगा¸ॽक्या कुछ प्रदेशों की तरह  तीन या छह− छह माह  में अब प्रधानमंत्री भी बदले  जांएगे।जो भी  हो  विपक्षी  गठबंधन इंडिया  का   जैसे अच्छा  नाम  मिली था,  वैसा कुछ आगे नही हुआ।उसने  निराश  ही किया। देश   का प्रतिनिधित्व  करने  वाले 28 दलों के गठबंधन से उम्मीद काफी ज्यादा  थीं, किंतु  वह एक पर भी  खरा  नही उतर सका। ये सारे दल अलग −अलग विचार और सिद्धांतों के मानने वाले हैं।ऐसे में एकजुट होने के लिए इनका काँमन ऐजेंडा  भी होना चाहिए।  ऐसा न होने पर  इनकी एकजुटता छलावा है।धोखा  है।    अब तो इनका का उददेश्य केंद्र की मोदी सरकार  की आलोचना करना   रह गया।आलोचनाएं भी सकारात्मक नही।नकारात्मक।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार  हैं)

Wednesday, February 28, 2024

छात्रों को नही मिली टयूशन से मुक्ति




केंद्र सरकार  ने  2020 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)  लागू कर  दी।  इसके हिसाब से पढाई में भी शुरू हो गई किंतु छात्र पर पढ़ाई का बोझ कम नही हुआ।स्कूल के बाद भी बच्चे का  तीन−चार  ट्यूशन पढ़ने पड़ते  हैं।बस्ते का बोझ भी  पहले जैसा ही है, वह भी कम नही हुआ।

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत सभी राज्यों में लागू  कर दी।  अब कक्षा   एक  में एडमिशन की उम्र सीमा को लेकर जारी किया गया है।केंद्र द्वारा राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को लिखे पत्र में शिक्षा मंत्रालय (एमओई) के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग ने 2020 में एनईपी लॉन्च होने के बाद से कई बार जारी किए गए अपने निर्देशों को दोहराया है। इन निर्देशों में  कक्षा एक  में दाखिले के लिए बच्चे की उम्र कम से कम छह  वर्ष होनी चाहिए। इसी तरह का एक नोटिस पिछले साल भी जारी किया गया था.शिक्षा मंत्रालय की ओर से 15 फरवरी 2024 को जारी पत्र में कहा गया है कि नए शैक्षणिक सत्र 2024-25 के लिए जल्द ही एमडिशन प्रक्रिया शुरू होने वाली है। उम्मीद है कि राज्य/केंद्रशासित प्रदेश में अब ग्रेड- एक  में प्रवेश के लिए आयु 6+ कर दी गई है।मार्च 2022 में केंद्र ने लोकसभा को सूचित किया था कि 14 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश जैसे असम, गुजरात, पुडुचेरी, तेलंगाना, लद्दाख, आंध्र प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, उत्तराखंड, हरियाणा, गोवा, झारखंड, कर्नाटक और केरल में उन बच्चों के लिए एक  प्रवेश की अनुमति है, जिन्होंने छह वर्ष पूरे नहीं किए हैं।पूर्व में केंद्र ने कहा था कि एनईपी शर्त के साथ न्यूनतम आयु को संरेखित नहीं करने से विभिन्न राज्यों में शुद्ध नामांकन अनुपात की माप प्रभावित होती है। एनईपी 2020 की 5+3+3+4 स्कूल प्रणाली के अनुसार, पहले पांच वर्षों में तीन से छह वर्ष के आयु समूह के अनुरूप प्रीस्कूल के तीन वर्ष और छह से आठ वर्ष के आयु समूह के अनुरूप कक्षा 1 और 2 के दो वर्ष शामिल हैं.केंद्र ने जारी निर्देश में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कक्षा एक  में दाखिले के लिए न्यूनतम उम्र सीमा छह वर्ष अपनाने को कहा है।

केंद्र सरकार  नई शिक्षा नीति लागू करने के बाद भी छात्रों के   बस्ते का  बोझ कम नही कर सकी।कई  बच्चों के बस्ते का  बोझ  उनके खुद के वजन से ज्यादा होता है।जबकि ऐसा नही होना  चाहिए ।पीठ पर बोझ लदने से बच्चे का   मानसिक और शारीरिक विकास रूक  जाता है। शिक्षाविद और मनोवैज्ञानिक कई बार बस्तों के बोझ को लेकर चिंता  जारी कर चुके हैं। पर इस पर रोक  नही लगी।छात्र को होमवर्क देना तो  रोजमर्रा  का काम  है।  इसके लिए  उसे दो से  तीन घंटे  चाहिए।स्कूल में पांच घंटे के बाद  दो से तीन घंटे  उसे  होम वर्क करना  है।  इस तरह से छोटे स्तर से ही उस पर आठ नौ घंटे पढ़ाई का बोझ रहता है।यह उम्र  बच्चे के खेलने− कूदने  की है ताकि उसका समुचित शारीरिक और मानसिक   विकास हो। हमारी पोती अमेरिका में पढती है। कक्षा पांच तक  उसे कोई  किताब नही दी जाती। बस स्कूल में ही क्रिटीविटी सिखाई जाती है। कहानी की  पुस्तकें दो घर जाकर पढ़ने को दी जाती हैं ताकि बच्चे  की रीडिंग की आदत   बढ़े।बाकी कुछ नही।

दूसरा भारत का  कितना ही मंहगा स्कूल हो, कक्षा  पांच के बाद छात्र का  टयूशन  पढ़ना  उसकी मजबूरी है। घर आकर होमवर्क में दो −तीन घंटे लगाने के बाद प्रत्येक विषय के टयूशन के लिए उसे  एक घंटा देना ही होता  है। इस ट्यूशन में आने −जाने में भी समय लगता  है।पांच टयूशन  हुए तो  पांच घंटे टयूशन में लगेंगे।एक से दो घंटे आने−  जाने में ।इस तरह से  एक छात्र को  पांच घंटे स्कूल में , एक से दो घंटा  स्कूल से घर आने − जाने में, दो से तीन घंटे होमवर्क करने में, पांच घंटे टयूशन में  और दो घंटे के  आसपास  उसे टयूशन आने – जाने में लगते हैं। इस प्रकार  एक छात्र प्रतिदिन पढ़ाई पर 14 से  17 घंटे लगाता है।  इसके पास खेलने के लिए उसे एक मिनट  का भी समय नही।इसी भागदौड़ में वह बुरी तरह से थककर चकनाचूर हो  जाता है।इस शिक्षा ने बच्चे को पढ़ाई के नाम पर मशीन बनाकर  रख दिया।उससे  बच्चे का  मानसिक और शारीरिक विकास रूक गया। इसके लिए सोचने को न सरकार के पास  समय  है, न शिक्षाविद के पास।ये भी  हो सकता है कि पढाई कें घंटो में पांच− पांच मिनट कम करके एक नया परियड  बनाया जाए।उसमें छात्र को घर के लिए दिया  होमवर्क स्कूल में ही पूरा कराया  जाए।

देश में स्कूल बढ़िया  बन रहे हैं। मोटी −मोटी फीस ली जा रही है। इसके बावजूद इनके भी छात्र टयूशन क्यों पढ़ रहे हैं। महंगे स्कूलों से तो अपेक्षा  की जाती है कि ये  विश्व स्तर की शिक्षा  दें।दरअस्ल देश की शिक्षा के प्राइवेट  सैक्टर में जाने के बाद कुकुरमुत्तों की तरह शिक्षण  संस्थांए   उग गईं।इन  अधिकाशं का  पढ़ाई−लिखाई से कोई लेना  देना  नही।  इनका उद्देश्य तो ऐन− केन प्रकरेण  अभिभावक से पैसा वसूलना  है।सबने  अपने कोर्स तै कर दिए। कहां से  खरीदने हैं ये तै कर दिया। स्कूल ड्रेस ही नही, जूते मौजे,बैल्ट तक स्कूल बेचने  लगे। वह भी   बाजार से कई  गुने मंहगे दामों पर।  कोई देखने  वाला  नही कोई सुनने  वाला  नही।देखने में आ रहा है कि कुछ अभिभावक बच्चे काआईएएस और आईपीएस बनाने की इच्छा और इरादा बच्चे  पर लाद देते  हैं। कक्षा दस के बाद उन्हें आए एस और आईपीएस की तैयारी की कोचिंग देने  वाले संस्थानों में भेज दिया जाता है।इन अभिभावकों के काफी बच्चे पढ़ाई का ये दबाव नही बर्दाश्त कर पाते । वे  डिपरशेन में  चले जाते हैं। कुछ आत्म हत्याएं तक कर लेते हैं।

ऐसे में  सरकार को समान शिक्षा नीति बनाने पर भी सोचना  होगा। ये भी सोचना  होगा कि अभिभावक अपने वार्ड को सरकारी स्कूल में भेजते गर्व महसूस करें। ये माने  की इनमें इनके बेटे – बेटी को प्राईवेट स्कूल से अच्छी शिक्षा मिलेगी।  

शिक्षाविद और सरकार को अपनी शिक्षा नीति में फिर से विचार करने की जरूरत है।जरूरत है ऐसी शिक्षा की जिसमें बच्चे  का समुचित विकास हो।छात्र पर बस्ते   का बोझ कम से कम हो। स्कूल से आने के बाद के घर पर बच्चे को ट्यूशन की जरूरत ही न महसूस हो। बच्चों को घर पर टयूशन पूरी तरह से बंद हों। माध्यमिक स्तर तक छात्र को ऐसी शिक्षा मिले कि स्कूल के बाद  उस पर पढ़ाई  का दबाव  न रहे।  वह आराम  से खेले −कूदे। हां  उसमें कोई हाबी खेल,  गायन, वादन, नृत्य आदि विकसित किया जाना  चाहिए।  एक चीज और स्कूली छात्रों को आत्म सुरक्षा भी इसी स्तर पर सिखा कर इतना निपुण  बना दिया जाए कि वह विपरीत हालात का  समय पड़ने पर मुकाबला कर सके।

 अशोक मधुप

  (लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं)

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Thursday, February 22, 2024

क्या ये पूरे देश के किसानों का आंदोलन है

 



क्या
 ये पूरे देश के किसानों का  आंदोलन है

अशोक मधुप

पंजाब और हरियाणा को  जोड़ने वाले शंभू बोर्डर पर 13 फरवरी से किसान जमा हैं।सरकार का कहना  है कि उन्हें  आगे नही जाने दिया जाएगा।ये  जाकर  दिल्ली का  आम जीवन प्रभावित करते  हैं। ये बजिद हैं कि हमें दिल्ली जाना  है।शंभू बॉर्डर में किसानों ने घमासान मचाया हुआ है। पुलिस बेरिकेडिंग्स को तहस-नहस कर दिया है। इसके चलते पुलिस ने कई आंदोलनकारियों को हिरासत में ले लिया है। कई बार झड़प  हो  चुकी ।  पुलिस को अश्रु गैस छोड़नी पड़ी। आंदोलनकारियों पर पैलेट गन भी  चलानी पड़ी। ये दिल्ली  आने को बजिद हैं।  कुछ जगह इन्होंने   पंजाब में हाइवे के टोल प्लाजा फ्री करा  दिए  हैं। पंजाब में ही रेलवे ट्रैक पर इनका धरना  भी कुछ  जगह जारी है। हालात ठीक नही हैं।  तीन कृषि कानून को वापिस लेने के लिए चले पिछले किसान आंदोलन की सफलता से किसान उत्साहित हैं और अग्रेसिव हैं। किंतु  सवाल यह है कि क्या ये  देश के किसानों का  आंदोलन है।  इसमें तो  पंजाब के भी  पूरे किसान संगठन शामिल नही हैं।

इस आंदोलन को  देखकर ऐसा लग नहीं रहा कि किसान वापस जाएंगे। इस बार किसान अपनी अलग-अलग मांगों को लेकर अड़े हुए हैं।इनकी मांग हैं, किसान नेता न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर कानून बनाए ,किसानों ने दिल्ली मोर्चा के दौरान केंद्र सरकार की ओर से जिन मांगों को पूरा करने का भरोसा दिया गया था ,उन्हें तुरंत पूरा करे, साल 2021-22 के किसान आंदोलन में जिन किसानों पर मुकदमें दर्ज किए गए थे, उन्हें रद्द करने किया  जाए,पिछले आंदोलन में जिन किसानों की मौत हुई थी, उनके परिवार को मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए,लखीमपुर खीरी हिंसा के पीड़ितों को केंद्र सरकार न्याय दे और परिवार के एक सदस्य को नौकरी दें,सभी  किसान और खेतिहर मजदूरों का कर्जा माफ हो ,60 साल से ऊपर के किसान, मजदूरों  को 10 हजार रुपये पेंशन मिले,कृषि व दुग्ध उत्पादों, फलों, सब्जियों और मांस पर आयात शुल्क कम करने के लिए भत्ता बढ़ाया जाए, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाए,कीटनाशक, बीज और उर्वरक अधिनियम में संशोधन करके कपास सहित सभी फसलों के बीजों की गुणवत्ता में सुधारी जाए  आदि ।

आंदोलनकारी किसान नेताओं से  केंद्र सरकार तीन दौर की इनसे बातकर चुकी किंतु समस्या  का हल नही निकल रहा। पंजाब में किसानों के  40 संगठन हैं। इस बार के इस आंदोलन में  32 संगठन शामिल है।  एक बड़ा  सवाल यह है कि क्या से सिंधु  बार्डर  पर जमें किसान पूरे देश के किसानों का  प्रतिनिधित्व करते हैं। क्या इन्हें आम नागिरकों का  जीवन प्रभावित करने का  अधिकार है?इस आंदोलन को भी साल 2021 के आंदोलन से ही जोड़कर देखा जा रहा है, लेकिन इस बार के आंदोलन को सभी किसान संगठनों का समर्थन हासिल नहीं है।इस आंदोलन की बात यह है कि ये आंदोलन संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले नहीं हो रहा। पंजाब के भी सभी  किसान संगठनों का ये आंदोलन नही है।हरियाणा के एक अन्य प्रमुख किसान नेता, बीकेयू चढूनी समूह के प्रमुख गुरनाम सिंह चढूनी ने  बताया कि उन्हें 'दिल्ली चलो मार्च' और चंडीगढ़ में सरकार के प्रतिनिधियों के साथ होने वाली बैठकों में आमंत्रित नहीं किया गया। उन्होंने कहा, 'एमएसपी पर कानून बनाने की कोई जरूरत नहीं है, केंद्र सरकार का लिखित आश्वासन ही काफी है'। पूर्ववर्ती संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल रहे कुछ बड़े किसान नेताओं को यह भी संदेह है कि 'दिल्ली चलो मार्च' अप्रत्यक्ष रूप से पंजाब सरकार द्वारा  प्रायोजित है, क्योंकि उसे मूंग के लिए एमएसपी जैसे चुनावी वादों को पूरा करने में विफल रहने के कारण किसानों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है।हरियाणा सरकार द्वारा पंजाब सरकार पर आरोप लगाए गए हैं कि पंजाब ने उन प्रदर्शनकारियों को नहीं रोका जो बिना किसी बाधा का सामना किए बड़ी संख्या में शंभू और खनौरी सीमाओं तक पहुंचने में कामयाब रहे।बीकेयू के राकेश टिकैत  का भी मानना ​​है कि मौजूदा विरोध प्रदर्शन में कुछ कट्टरपंथी तत्व शामिल हो रहे हैं ! बातचीत में, राकेश टिकैत ने कहा कि वर्तमान आंदोलन में भाग लेने वाले कई नेता सतलज-यमुना लिंक नहर जैसे मुद्दों को उठाना चाहते हैं, जो पंजाब और हरियाणा के किसानों के बीच दरार पैदा कर सकते हैं. इसी तरह, कुछ लोग सांप्रदायिक मतभेद भी पैदा करना चाहते हैं. इसलिए, हम उनके आंदोलन में नहीं शामिल हैं, लेकिन हम उन उन्हें मुद्दा-आधारित समर्थन प्रदान कर रहेंगे। राकेश टिकैट ने सिसौली की बैठक के बाद कहा कि 21 फरवरी को जिला मुख्यालयों पर ट्रैक्टरों के साथ प्रदर्शन  होगा। राकेश टिकैट ने कहा कि पंजाब में तीन मोर्चे हैं जिनमें से एक मोर्चा आंदोलन कर रहा है। यह संयुक्त किसान मोर्चा का आह्वान नहीं था और ना किसी से बात हुई थी लेकिन हम किसानों के साथ हैं। किसानों पर अत्याचार होगा तो हम चुप नहीं रहेंगे।कभी  किसानों के  देश का बडा केंद्र  सिसौली था, किसानों की मांग और समस्याओं को  लेकर यहां से मांग उठती थी।  आंदोलन के  निर्णय भी सिसौली से ही होते थे, अब ये  सब पंजाब में  चला गया। वहां आंदोलन की बात चलती है तो  समर्थन देना अब सिसौली की  मजबूरी हो  जाती है।

लोकसभा चुनाव से पहले प्रस्‍तावित किसान आंदोलन को बेहद ही अहम माना जा रहा है।  इन  पंजाब के आंदोलनकारी किसान  ने मानकर आए  हैं, कि चुनाव सिर  पर हैं, ऐसे  में दबाव देकर वह अपनी मांग पूरी करा सकतें हैं।  असल में तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्‍ली की सीमाओं पर 13 महीने तक चले आंदोलन पर केंद्र सरकार  ने तीनों कृषि कानूनों को वापस ले लिया था।इससे  वह उत्साहित हैं और सोचे बैठें हैं कि वह दबाव देकर सरकार  से अपनी मांग पूरी करा  लेंगे। हालाकि संयुक्त  किसान मोर्चा ने 16 फरवरी के  भारत बंद का आह्वान करके देख  लिया, कि पंजाब  में ही   उसके बंद का असर हुआ,  बाकी सब जगह सामान्य  रहा।

दरअस्ल सरकार भी किसानों को प्रसन्न करने के लिए उल्टे –सीधे  निर्णय लेती रहती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी 2019 में किसान सम्मान निधि की शुरूआत  की। इसके तहत किसान को  साल में छह हजार रूपया अर्थात महीने का 500 रूपया किसान को दिया  जाता  है।  इसे  देने की क्या जरूरत थी। आज के मंहगाई  के युग में इस 500 रूपये की राशि से  क्या होता  है?  इस  निर्णय से मोदी सरकार ने  केंद्र पर करोड़ो रूपये प्रतिवर्ष   का  बोझ बढ़ा दिया। ये निर्णय ऐसा  है  कि आगे आने वाली  सरकारें किसानों को प्रसन्न करने के लिए उस सम्मान निधि की राशि बढ़ाएंगी ही, कम नही कर पांएगी।  समाज में और भी  वर्ग हैं । सबसे  बड़ा वर्ग  व्यापारी है। वह सरकार को लगातार टैक्स  देता है।सरकार उसे  क्या देता है। यही  हाल  आयकरदाता का है। पत्रकारों के लिए  कभी सरकारी स्तर से कुछ नही हुआ।  जब आप खुद किसानों को सम्मान निधि के नाम पर धन बांटने   लगोगे तो  फिर तो  वह आगे चलकर उल्टी साधी मांग करेंगे ही ।  किसान को किसान क्रेडिट कार्ड दिया हुआ है। इस पर चार प्रतिशत पर कर्ज दिया  जा सकता  है। सहकारी समिति तो डेढ  प्रतिशत पर कर्ज देने लगी। पिछली कुछ सरकारों  ने किसानों के कर्ज माफ किए हैं।  बिजली बिल माफ  किए हैं तो अब तो  ये मांग  होनी स्वाभाविक है। किसान नेता  कहते  हैं कि सरकार व्यापारियों के कर्ज माफ  करती रही है। व्यापारी को कोई कर्ज वैसे ही नही देता। दी  गई  राशि से  ज्यादा मूल्य की सपत्ति रहन रखता है।  कुछ बड़े व्यापारी जो देश से बाहर भाग  गए ,उनकी  भी देश में मौजूद संपत्ति सरकार  जब्त करने में लगी है।

कल  रविवार में केंद्र के तीन  मंत्रियों की आंदोलनकारी किसान  नेताओं से बात हुई।केंद्र सरकार धान और गेंहू के अलावा  मसूर,उड़द, मक्का और कपास पर भी न्यूनतम मूल्य देने को  तैयार हो गई  है किंतु  इसके लिए किसानों को  एनसीसीएफ,नेफेड और सीसीआई से  पांच  साल के लिए अनुबंध  करना होगा। किसान नेताओं ने सरकार के फैसले पर विचार करने का  निर्णय लिया है।किसान नेता  21 फरवरी से   पहले  सरकार  को जवाब देंगे।इस दौरान आंदोलन जारी रहेगा।उम्मीद  है कि पिछली बार वाला   अडियल रूख किसान नेता  नही अपनाएंगे।  समस्या का  समाधान निकल आएगा। पर सरकार  को यह तो  सोचना  ही पड़ेगा कि देश में  किसान ही अकेला  उत्पादक नही है।और भी  हैं। व्यापारी भी हैं, वे भी  उत्पादक हैं। घाटे में आने पर  उनके भी प्रतिष्ठान बंद  हो  जाते  हैं। व्यापारी से  तो  बिजली की दर और ज्यादा  वसूली जाती है।उनके लिए भी   सरकार को   सोचना और करना चाहिए।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

Monday, February 12, 2024

एक भारत रत्न ने बदली पश्चिम यूपी की राजनीति

 एक भारत रत्न ने बदली पश्चिम यूपी की राजनीति

अशोक  मधुप

कल  तक विपक्ष  आई­.एन­.डी.आई.ए. बनाकर  एकजुट दिखाते हुए  दिल्ली फतह करने की तैयारी में था। अब भाजपा के बिहार के बाद यूपी में किए खेल में विपक्ष के सारे समीकरण बिगड़ गए। भाजपा की इस गुगली में  विपक्ष धराशाही हो गया।बिहार का अभी नितीश कुमार  का भाजपा से गठबंधन का मामला  ठंडा  नही पड़ा था कि   भाजपा  ने   किसान नेता चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न दे  दिया।इस एक भारत रत्न  से भाजपा पश्चिम उत्तर प्रदेश  की राजनीति का नक्शा  बदलने में कामयाब हो गई।इस भारत रत्न ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में विपक्षी एकता की पूरी तरह से जड़े हीं हिलाकर रख दीं।इस भारत रत्न से जहां भाजपा को सीधे  लाभ मिलेगा, वहीं विपक्ष को भारी नुकसान होगा। पश्चिम उत्तर प्रदेश के जाटों की   केंद्र में  जाट  आरक्षण की मांग को  नुकसान होगा।

पिछले काफी समय से  पश्चिम उत्तर प्रदेश का जाटों    का काफी तबका भाजपा से जुड़ गया  था। मुजफ्फर नगर के दंगे ने इसे  और एकजुट किया। राम मंदिर के नाम पर तो ये  ध्रुवीकरण और हुआ।रालोद का  परंपरागत  वोट ही   उसके पास बचा था।  इस भारत रत्न के बाद भाजपा−रालोद गठबधंन से यह वोट  भाजपा को लाभ

ही पंहुचाएगा ।

अब तक का राजनैतिक दृश्य  कह रहा है कि उत्तर प्रदेश में  बसपा और सपा का गठबंधन नही होगा।  बसपा सुप्रिमो सुश्री मायावती इसकी कई  बार घोषणा कर चुकी हैं।सपा  पश्चिम में रालोद के साथ मिलकर भाजपा के सम्मुख मैदान में उतरने की तैयारी में थीं।सीट भी तै हो गईं थीं कि कौन किस सीट पर चुनाव लड़ेगा,पर ये  राजनीति है। इसमें अगले पल क्या हो जाए  , कुछ नही कहा जा सकता। और ये हो गया। किसान नेता चौधरी चरणसिंह को भारत रत्न मिलने के बाद रालोद का भाजपा के साथ जाना  सरल हो गया। रालोद के भाजपा के साथ जाने से पश्चिम उत्तर प्रदेश के पूरे ही समीकरण   बदल गए। तै  हो गया कि पश्चिम का भाजपा – रालोद में बंटा  18 प्रतिशत जाट वोट सीधा अब रालोद −भाजपा गठबंधन को जाएगा। सपा अब यहां कोई  करिश्मा नही दिखा पाएगी।

 सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कांग्रेस  से गठबंधन से पहले इंकार कर दिया है। बाद में रालोद के साथ रहने के दौरान उन्होंने  यूपी में कांग्रेस को सिर्फ  11 सीट देने की घोषणा की थी, अब बदले में हालात में रालोद के भाजपा के साथ जाने के बाद वे क्या करेंगे,  यह समय ही बताएगा। अब तक कांग्रेस के सामने हेकड़ी दिखा रहे सपा सुप्रिमों अखिलेख  का चुनावी समीकरण औरं गठबंधन कांग्रेस से अपनी शर्त पर होगा  या कांग्रेस की ,यह अभी नही कहा  जाकता, किंतु यह तै है  कि  अब तक का उसका कांग्रेस  के प्रति कठोर रवैया जरूर मुलायम होगा।

पिछले विधान सभा  चुनाव में पश्चिम उत्तर प्रदेश ने सपा− रालोद गठबधंन के  जाट-मुस्लिम समीकरण के बावजूद बीजेपी ने कुल 136 विधानसभा सीटों में से 94 सीटों पर कब्जा किया था। पश्चिमी यूपी की 22 जाट बहुल सीटों पर बीजेपी  ने विजय हासिल की थी। पश्चिम यूपी में करीब 18 प्रतिशत जाट आबादी है, जो सीधे चुनाव पर असर डालती है. यानी जाट समुदाय का एकमुश्त वोट पश्चिमी यूपी में किसी भी दल की हार-जीत तय करता  है।2019 के चुनाव में जाटलैंड की सात सीटों पर बीजेपी को हार मिली थी. बीजेपी को मुजफ्फरनगर, मेरठ समेत तीन सीटों पर काफी कम अंतर से जीत मिली थी। आरएलडी के भाजपा नीत गठबधंन एडीए के साथ आने से यहां बीजेपी की जीत की राह आसान हो जाएगी।

2009 के लोकसभा चुनाव में आरएलडी ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। किसान आंदोलन के बाद उपजे किसान आक्रोश को कम करने के लिए भाजपा ने यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में भी  रालोद प्रमुख जयंत को साधने की कोशिश की थी, लेकिन वे उन्हें जोड़ने  में कामयाब नहीं हो पाई। लोकसभा चुनाव में अपने मिशन को पूरा करने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी की जरूरत भाजपा को महसूस हो रही थी। चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न दिए जाने के बाद  अब यह खेला पूरा हो    गया।

यहां लोकसभा की 27 सीटें हैं। 2019 के चुनाव में भाजपा ने 19 सीटों पर जीत दर्ज की। वहीं, सपा- बसपा महागठबंधन को आठ सीटों पर जीत मिली थी। पश्चिमी यूपी की चार सीटों पर सपा और चार पर बसपा उम्मीदवारों को जीत मिली।हालांकि, रालोद को इस चुनाव में कोई सीट नहीं मिल सकी। जाट समाज ने भी रालोद का साथ नहीं दिया। 2014 के बाद 2019 में भी आरएलडी को निराशा ही हाथ आई थी। जाट समाज के दिग्गज नेता अजित सिंह और जयंत चौधरी भी सपा- बसपा गठबंधन के साथ रहने के बाद भी अपनी सीट नहीं बचा पाए थे। एनडीए के साथ आने से आरएलडी की उम्मीदें बढ़ती दिख रही हैं। फायदा भाजपा को भी होना तय माना जा रहा है किंतु  ये भी निश्चित है कि इस गठबंधन से शून्य पर पंहुची रालोद को भी संजीवनी मिलेगी।पश्चिमी यूपी की 27 लोकसभा सीटों का गणित भाजपा- आरएलडी गठबंधन के बाद बदलना तय माना जा रहा है। जयंत चौधरी की स्वीकार्यता हिंदू और मुस्लिम दोनों समाज में है। चौधरी चरण सिंह ने किसानों के बीच अपनी राजनीति शुरू की थी। इसमें धर्म कहीं नहीं था। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद धार्मिक आधार पर मतों का विभाजन हुआ। इसने पश्चिमी यूपी की राजनीति को बदलकर रख दिया। जाट समाज का एक बडा हिस्सा भाजपा के पाले में आया। हालांकि, 2020 के किसान आंदोलन के बाद एक बार फिर किसान एकजुट होने लगे हैं। यूपी चुनाव 2022 में सपा- आरएलडी गठबंधन का पश्चिमी यूपी में प्रभाव कुछ इसी प्रकार की स्थिति को दिखाता है। ऐसे में भाजपा के साथ आरएलडी के आने के बाद विपक्षी गठबंधन रनर  की भूमिका में ही सिमट जाएगा।

एक बात और भाजपा के साथ गठबंधन से रालोद  की इज्जत भी बच जाएगी।  राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा के बाद हिंदू वोट का  भाजपा के पक्ष में  बुरी तरह धुर्वीकरण  हुआ है। ऐसे में   हो सकता था कि सपा− गठबंधन में  चुनाव लड़ने से पश्चिम में रालोद का  सूपड़ा ही साफ हो जाता। पिछले लोकसभा चुनाव में भी  उसे कुछ नही मिला था।इस भारत रत्न से भाजपा  राजस्थान के उन जाटों की   भी  नाराजगी कम करने का काम  करेगी, जो  काफी समय  से वहां आरक्षण की मांग कर रहे हैं।

चौधरी चरणसिंह को भारत रत्न मिलने  के बाद केंद्र में जाटों के  आरक्षण की  मांग करने वालों के सुर भी बदले हैं।  ये कहते हैं कि चौधरी चरणसिंह को भारत रत्न मिलना बहुत बड़ा कार्य है।जाट आरक्षण  और गन्ना मूल्य तो छोटे – मोटे मामले  हैं। ये तो  चलते ही रहते हैं। चलते रहेंगे। य

पश्चिम के  भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश  टिकैत का राजनीति   से पहले से ही प्रत्यक्ष रूप से  वास्ता नही। वह तो  जब तक किसानों की बात कर रहे हैं तब तक पश्चिम उत्तर प्रदेश के जाट  उनके साथ हैं, राजनीति में आते  ही उनका प्रभाव खत्म हो  जाता है। वह और उनके पिता स्वर्गीय  महेंद्र सिंह टिकैत राजनीति में  उतरकर देख चुके हैं।

पूरब में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी  के प्रमुख  ओम प्रकाश  राजभर का अपना प्रभाव है।पिछले चुनाव में सपा में रहकर चुनाव लड़े थे।अब तो वह काफी समय से  भाजपा के भजन गाते घूम रहें हैं। इस तरह से अब उत्तर प्रदेश का  चुनावी परिदृश्य बिलकुल साफ हो  गया  है।मुस्लिम यादब समीकरण के बूते सत्ता के रास्ते तक पहुंचती रही सपा का यादव वोट राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा  कार्यक्रम के बाद सपा के पास कितना बचा रहेगा,  ये  चुनाव के बाद ही साफ होगा। इतना जरूर कहा  जा सकता है, कि अब यादव वोट भी  भाजपा की ओर जाने  लगा है।      

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)