Monday, February 5, 2024

देश का गौरव बढ़ाती खबरें

 

 देश  का गौरव बढ़ाती खबरें

अशोक  मधुप

मीडिया में कई  बार  खबरें आती हैं, मीडिया में कई बार ऐसी खबर आती हैं, जिन्हें पढ़कर या सुनकर गौरव महसूस होता है।ऐसी ही खबर पिछले दिनों लद्दाख सीमा से आई। लद्दाख के पूर्वी इलाके के स्थानीय चरवाहों और चीनी सैनिकों का एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें देखा जा सकता है कि चीनी (पीएलए) सैनिक लद्दाखी चारवाहों को वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास भेड़ चराने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन लद्दाखी उन्हें पूरी निडरता के साथ जवाब दे रहे हैं। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद स्थानीय चरवाहों ने इस क्षेत्र में जानवरों को चराना बंद कर दिया था। वीडियो में मौके पर लगभग तीन चीनी बख्तरबंद वाहन और कई सैनिक दिखाई दे रहे हैं। वाहन अलार्म बजाते हैं, जाहिर तौर पर चरवाहों को वहां से चले जाने का संकेत देते हैं, लेकिन लद्दाखी अपनी जिद पर अड़े हैं और पीएलए सैनिकों के साथ बहस करते नजर आ रहे हैं। चरवाहों का कहना है कि वे भारतीय क्षेत्र में मवेशी चरा रहे हैं। कुछ मौकों पर जब झगड़ा बढ़ जाता है तो कुछ चरवाहे पत्थर उठाते नजर आते हैं। लेकिन वीडियो में हिंसा भड़कती नहीं दिख रही है। वीडियो में दिख रहे चीनी सैनिक हथियारबंद नहीं हैं। चरवाहों के विरोध के बाद ची सैनक वापिस चले जातें हैं।  चुशूल के पार्षद कोंचोक स्टैनजिन ने स्थानीय चरवाहों द्वारा दिखाए गए प्रतिरोध की सराहना की और उनका समर्थन करने के लिए भारतीय सेना की प्रशंसा की। उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ''पूर्वी लद्दाख के सीमावर्ती क्षेत्रों में चरवाहों और खानाबदोशों को पैंगोंग के उत्तरी तट के साथ पारंपरिक चरागाहों में अपने अधिकारों का दावा करने की सुविधा प्रदान करने में भारतीय सेना द्वारा किए गए सकारात्मक प्रभाव को देखना खुशी की बात है। उन्होंने  कहा, 'मैं ऐसे मजबूत नागरिक-सैन्य संबंधों और सीमा क्षेत्र की आबादी के हितों की देखभाल के लिए भारतीय सेना को धन्यवाद देता हूं।'चुशूल पार्षद ने कहा कि भारतीय बलों के समर्थन के कारण चरवाहे चीनी सैनिकों का बहादुरी से सामना कर सके। उन्होंने कहा, "इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमारी सेनाएं पीएलए के साथ चराई संबंधी मुद्दों को सुलझाने में हमेशा नागरिकों के साथ हैं, यह सब उनके समर्थन के कारण ही है कि हमारे खानाबदोश पीएलए का बहादुरी से सामना कर सके।

एक जमाना था  कि  चीन के कहने पर भारत सरकार अपने  सैनिकों को आदेश देकर  अपने कब्जे  वाले क्षेत्र मे बनाए बंकर तुड़वा देती थी। सीमा क्षेत्र में यातायात और संचार के साधन चीन के दबाव के कारण पिछली सरकारों में  नही बढ़ाए जा सके थे ।2020 में चीन से विवाद के बाद हालात बदले हैं।सीमावर्ती क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रास्ते  ही नहीं बन रहे, हवाई सेवाओं का  विस्तार हो  रहा है।चीन सेना के सामने भारतीय सेना सीना  ताने खड़ी है।आधुनिक शस्त्र चीन की सीमा  पर तैनात किये गए हैं। 

पिछले दिनों   कनाडा ने आरोप लगाया था कि  उसके नागरिक हरदीप सिंह निज्जर की  भारत ने हत्या कराई। हरदीप सिंह निज्जर   भारत का  इनामी आंतकी था। यह विवाद चल ही रहा था कि अमेरिका भी   कहने  लगा कि  उसके नागरिक गुरपतवंत सिंह पन्नू  की हत्या कराने  की कोशिश हुई है। भारत ने इन दोनों घटनाओं का खंडन किया है। अमेरिका के आरोप की जांच कराने का आदेश किया गया है । इसी बीच   पाकिस्तान भी कहने लगा कि भारतीय गुप्तचर संगठन  उसके यहां  रहने वालों की हत्या करा रहे हैं।  बतातें चलें कि पिछले कुछ समय में पाकिस्तान में रह रहे भारत के कई  प्रसिद्ध  आतंकियों की हत्याएं हुई हैं।पाकिस्तान में  रह रहे  आतंकी डरे हुए  हैं।वे पाकिस्तान से लगातार अपनी सुरक्षा बढाने की मांग कर रहे हैं।  उन्हें खतरा  लग रहा है  कि भारत उनकी हत्या करा  सकता है।   भारत कहता रहा है  कि उसका इसमें कोई   हाथ नही किंतु दुनिया में जा रहा यह मैसेज बहुत अच्छा है  कि भारत अपने  दुश्मन को माफ करने वाला  नही है।चाहे वो कहीं जाकर छिप जाए।पहले यह धारणा इस्राइल की गुप्तचर संस्था मोसाद  के बारे में थी। मौसाद और इस्राइल के बारे में विख्यात था कि वह अपने  दुश्मन को माफ  करना  नही जानता। वह कहीं भी छिप जाए  उसका मरना  तय है।  दुनिया में भारत के बारे में भी अब ऐसी  धारणा वन रही है,बन रही है।  ये  बहुत अच्छा है।देश के दुश्मन के दिल में खौफ होना  ही चाहिए।

अभी  कनाडा की सुरक्षा खुफिया एजेंसी की  एक रिपोर्ट आई है।इसमें आरोप लगाया गया कि  भारत उसके देश के होने वाले  चुनाव में हस्तक्षेप करना चाहता है। अपनी रिपोर्ट में एजेंसी ने  कहा कि कनाडा में होने वाले  चुनाव में भारत और चीन हस्तक्षेप कर सकता  है।कनाडाई मीडिया ग्लोबल न्यूज ने अपने ब्रीफिंग रिपोर्ट में कहा- यह पहली बार है जब कनाडा ने भारत पर चुनाव में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया है। चीन और रूस पर पहले से ही कनाडा की राजनीति में दखल देने के आरोप लग रहे थे।ये  आरोप  हैं।इनका लगना  अच्छा है।ऐसे आरोप लगते रहने चाहिए।दुनिया  और भारत के दुश्मनों के दिमाग में यह भय घुंस जाना चाहिए कि भारत का दुश्मन कही भी हो सुरक्षित नही है। दूसरा भय दुश्मन में यह होना चाहिए  की भारत अपने दुश्मन को माफ  नही करता।

पिछले  अक्टूबर से इस्राइल अपने  देश पर हमला करने वाले हुति आंतकवादियों के खिलाफ युद्ध छेड़े  है। इस मामले में न वह संयुक्त राष्ट्र  की मान रहा है,  न अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट  की।यही हाल अमेरिका का है। यह अपने दुश्मनों को कहीं भी माफ नही करता।अमेरिका  वर्ड  ट्रेड सैंटर पर हमला  कराने वाले ओसामा बिन लादेन को og  दस साल तक खोज करता  रहा।दस साल बाद लादेन उसके हाथ आया। और हत्या कर दी गई।अभी अमेरिकी सेना ने सीरिया और इराक़ में मिलाकर कुल 85 ठिकानों पर हमले किए गए हैं।अमेरिकी  सेंट्रल कमान ने कहा है कि इन हमलों में ईरान के इस्लामिक रेवल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के 'कुद्स फ़ोर्स' और उससे जुड़े मिलिशिया समूहों को निशाना बनाया गया है। इराक़ ने बताया है कि इन हमलों में कुल 16 लोगों की मौत हुई है और 25 लोग घायल हुए हैं।यह हमले अमेरिका ने  अपनी सेना  पर एक द्रोण  हमले के विरोध में किए।

क्या अमेरिका और इस्राइल के पास कोई  विशेष  पावर है। ऐसा नही है। वे मजबूत हैं। वे अपने दुश्मन को माफ करने को तैयार नही हैं। वह दूसरे देशों मे रह रहे अपने दुश्मनों को  मार डालते हैं और सब देखते रह जातें हैं। दरअस्ल आप  मजबूत बनिए। ताकतवर बनिए।दुनिया आप को सलाम करेगी।  कमजोर को सब दबाना चाहते हैं।मजबूत इच्छा  शक्ति वाले देश का कोई कुछ नही बिगाड़ पाता। रूस  से S-400 ट्रायम्फ  मिजाइलरोधक प्रणाली  लेते समय भी अमेरिका ने भारत को धमकाया था। रूस – यूक्रेन युद्ध के समय भी अमेरिका  और उसके मित्र देशों ने रूस से तेल लेने पर भारत को धमकी दी थी कि उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाएं  जाएंगे, किंतु  कुछ भी  नही हुआ। दरअस्ल इन देशों को अपने हथियार बेचने है।ये धमकी दे सकते  है,कर कुछ नही सकते। आज भारत ने अरब सागर में दस समुद्री युद्धपोत तैनात किए हुए हैं। ये अरब सागर से निकलने वाले दुनिया भर  के जहाजों को  समुद्री  लुटेरों से बचा रहे है। विपदा में पड़े  जहाजों की मदद कर रहे हैं। भारत  कोरोनो काल में दुनिया को वैक्सीन और अन्य उपकरण देकर अपना  लोहा  मनवाता  रहा है।आज भारत शक्तिशाली देश बनकर उभर रहा है।  उसकी ताकत और शक्ति का दुनिया लोहा मान रही है। ये ही होना चाहिए।ये भी होना चाहिए कि दुनिया जाने की भारत  अपने दुश्मन को माफ करने वाले और छोड़ने वाला नही हैं। एक बात और जब देश मजबूत होता है।देश की सेना मजबूत होती है।सुरक्षा  एजेंसियां  मजबूत होती हैं तो देश  का आम आदमी मजबूत होता है। सीमा पर रहने  वाले  मजबूत होते  हैं।  

अशोक  मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)  


Thursday, February 1, 2024

नीतीश ने पाला बदलकर विपक्षी एकता की जड़ें हिला दीं


अशोक मधुप

आखिर बिहार में  नीतीश  और उनके जदयू  ने विपक्ष के गठबंधन आई­.एन­.डी.आई.ए. से अपना  नाता  तोड लिया। नीतीश कुमार विपक्षी दलों के गठबंधन इंडिया अलायंस के सूत्रधार रहे हैं। उन्होंने ही भाजपा के विरूद्ध विपक्ष को एकजुट करने की शुरूआत की।एक दूसरे के धूर विरोधी दलों को एक साथ  बैठाया, ऐसे में उनके पलटी मार देने से इस गठबंधन को लेकर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। नीतीश  को  बिहार का पलटू राम कहा  जाता  है, पलटू राम इस बार पलटीमार कर विपक्ष की एकता की जड़े ही हिंला  गए।उनके भाजपा  के साथ जाने से जनता में साफ  संदेश गया कि ये एका सिद्धांत का नही स्वार्थ  का  था। नीतीश  का प्रयास विपक्ष का  प्रधानमंत्री पद का उम्मीवार बनने का था।उसमें असफल होने और अपने प्रदेश में हुए घटनाक्रम के कारण वे अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए भाजपा के साथ  चले गए।  

नीतीश कुमार ने खुद विपक्षी दलों को एकजुट करने में पिछले कई माह काफ़ी मेहनत की थी। उन्होंने शुरुआत में ऐसे दलों को कांग्रेस के साथ बिठाने में कामयाबी हासिल की जो राहुल गांधी और उनकी पार्टी को लेकर सवाल उठाते रहे थे।नीतीश कुमार पश्चिम बंगाल में सरकार चला रहीं ममता बनर्जी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव को साथ लाने में कामयाब रहे। पटना में गठबंधन की पहली बैठक कराने को भी उनकी कामयाबी माना गया। दूसरी बैठक के बाद से ही नीतीश कुमार के असहज होनी की चर्चा शुरू हो गई। तब कांग्रेस फ़्रंट फ़ुट पर आती दिखी ।  रिपोर्टों में दावा किया गया कि गठबंधन संयोजक न बनाए जाने से वो नाखुश हैं।विपक्षी गठबंधन का नाम इंडिया रखने को लेकर भी मीडिया रिपोर्टों में कहा गया कि नीतीश कुमार ने शिकायत की थी कि उनसे सलाह नहीं ली गई।  उनका मानना था  कि इंडिया में एनडीए आता है,  इसलिए ये नाम न रखा जाए, कितुं उनकी नही सुनी गई। हालांकि,  नीतीश कुमार ने अपनी नाराजगी की  रिपोर्टों को खारिज कर दिया था।

रविवार को बीजेपी के अगुवाई वाले गठबंधन एनडीए के साथ जाने का फैसला करने के बाद खुद नीतीश कुमार ने अपनी असहजता को साफ़ बयां किया कि ‘कुछ ठीक नहीं चल रहा था।  दरअस्ल यह चाहते थे कि उन्हें गठबंधन का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाए, किंतु

19 दिसंबर को हुई इंडिया गठबंधन की बैठक कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए सुझाए जाने पर उन्होंने कोई  प्रतिक्रिया तो नही दी  किंतु उनका गठबंधन  से मन उचटने लगा। उन्हें लगने लगा कि कांग्रेस विपक्षी गठबंधन पर हावी होना  चाहती है। राहुल की भारत न्याय   यात्रा ने  इस  विद्रोह में  आग में घी का काम किया। कायदे ये यात्रा उन प्रदेशों में निकलनी चाहिए थी,  जहां कांग्रेस की सरकार हैं।  बिपक्षी दलों के   सरकार वाले प्रदेश में स्थानीय  दल की मर्जी से  उसे  साथ लेकर ये यात्रा की जानी चाहिए थी।किंतु ऐसा  नही हुआ। बंगाल में यात्रा पह़ुंचने पर ममता  बनर्जी  को लगा कि उन्हें कमजोर  करने के लिए उनके प्रदेश से यात्रा निकाली  जा रही है। जरा−जरासी बात पर नाराज होने वाली ममता  इस यात्रा के बंगाल में आते ही उछल गईं। उन्हें लगा कि राह़ुल और कांग्रेस  इसके माध्यम से उन्हें कमजोर करना  चाहती है। सो उन्होंने बंगाल में अकेले अपने बूते  पर पूरे प्रदेश में  चुनाव लडने की घोषणा कर दी।यात्रा बिहार में भी आनी थी।          

 

 बिहार में  नीतीश  को अपने   सहयोगी रहे लालू यादव के रवैये से  लगा कि वह उनकी पार्टी में तोड़फोड़  करना  चाहते हैं। दरअस्ल  नीतीश  कुमार के इस पलट के पीछे  उनकी पार्टी में चल रही राजनीति  थी।  नीतीश  कुमार को पिछले महीने इसकी भनक तब लगी जब पार्टी के कुछ विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर मीटिंग की थी। इसके साथ ही नीशीथ ने तेजी दिखाते हुए ललन सिंह को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटा दिया था तथा खुद पार्टी के अधयक्ष बन गए थे।तभी से कयास लगाए जा रहे थे कि उनकी पार्टी में सब कुछ सही नही चल रहा है और उनके और  लालू यादव के रास्ते अलग होने  वालें हैं। लालू यादव  नीतीश  पर दबाव दिए थे कि वे  तेजस्वी को मुख्य मंत्री बनाए।नीतीश कुमार ने रविवार को बिहार के महागठबंधन से अलग होकर बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए का हाथ थाम लिया। दोनों ने मिलकर सरकार बना  ली। शपथ भी हो गई। ये भी तै  हो गया कि जदयू और भाजपा  मिलकर बिहार में लोकसभा चुनाव लड़ेंगे।

बीजेपी  का प्रयास था कि वह विपक्ष की एकता  तोड़ सके, सो वह उसमें कामयाब हो गई।उसने बड़ा  सोच समझकर ये निर्णय लिया।  भाजपा को  नीतीश  के साथ लेने से लोकसभा चुनाव में  बिहार में फायदा ही होगा नुकसान नही।दूसरे विपक्ष में टूट करके वह   इस टूट का फायदा उठाने में लग गई  है।  उसने प्रचार शुरू कर दिया कि ये स्वार्थ का गठबंधन है। बिहार में सत्ता परिवर्तन के तुरंत बाद बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि ‘इंडी अलायंस’ सैद्धांतिक रूप से असफल हो चुका है।नड्डा ने पत्रकारों से कहा, “हम पहले भी कह चुके हैं कि इंडिया अलायंस अवित्र, ग़ैरवैज्ञानिक है और यह ज्य़ादा दिन तक नहीं चलेगा. और भारत जोड़ो यात्रा जो बेनतीजा समाप्त हुई और अभी की इनकी अन्याय यात्रा और भारत तोड़ो यात्रा और इंडी अलांयस है, यह सैद्धांतिक तौर पर विफल हो चुका है.”ये माना जाता है कि उनका संकेत विपक्षी गठबंधन में उनकी भूमिका को लेकर असमंजस की ओर था।

 नीतीश  के निर्णय  से पहले  ही टीएमटी भी बंगाल में अकेला  चलो की राह पर   निकल  गई। पंजाब में आप कह ही चुकी है कि वह वहां अकेले  चुनाव लड़ेगी। उत्तर प्रदेश में अखिलेश कांग्रेस को 11 सीट से ज्यादा देने  को तैयार नही।  

 नीतीश कुमार के रुख को एकजुट होने में लगे सभी विपक्षी दल आश्चर्य में हैं। कांग्रेस अब भी असमंजस में दिख रही है। कांग्रेस के जयराम रमेश ने कहा, ‘जिस इंडिया गठबंधन के लिए 23 जून को नीतीश कुमार जी ने विपक्ष की 18 पार्टी को निमंत्रण दिया था, जिसकी पटना में बैठक हुई, फिर जुलाई में बंगलुरु में बैठक हुई, उसके बाद अगस्त में मुंबई में बैठक हुई और तीनों बैठकों में नीतीश जी का बड़ा योगदान रहा. तो हम मान कर चल रहे थे कि वो बीजेपी के खिलाफ लड़ेंगे।

दरअस्ल गैर सिद्धांत की एकजुटता  में ऐसा ही होता है। यह एकता सिद्धांत को लेकर नही थी। स्वार्थ की एकता थी। मतलब का  संबंध था। सब इसलिए एक हुए थे ,कि लोक सभा चुनाव में भाजपा को हराना है,  इसलिए ये टूटना ही था।टूटने लगा। इससे  पहले भी   जब− जब ऐसी एकता हुई है तब – तब स्वार्थ के कारण  यह टूटी है। इंदिरा गांधी को हराने के लिए हुआ एका  हो या राजीव गांधी को सत्ता से बाहर रखने के लिए किया गया  गठबंधन ।सब की परिणाम सदा टूटना  और बंटना  रही है।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 −−−−

 

 

Sunday, January 21, 2024

कुर्अतुल ऐन हैदर का भारत

  कुर्अतुल ऐन हैदर का भारत 

अशोक मधुप

कुर्अतुल ऐन हैदर उर्फ  एनी आपा पूरी दुनिया घूमीं पर मन भारत में ही रमा।आग का दरिया’ उनका सबसे चर्चित उपन्यास है। इसे आजादी के बाद लिखा जाने वाला सबसे बड़ा उपन्यास माना गया था। आग का दरिया एक ऐतिहासिक उपन्यास है। यह चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल से लेकर 1947 के बंटवारे तक भारत और पाकिस्तान की कहानी सुनाता है।उपन्यास के तीनों युग के पात्र गौतम और चंपा की एक ही इच्छा है काशी पंहुचना।  उनकी एक ही तमन्ना  है कि काशी उनके सपनों का  नगर बने। आनन्द  नगर बने।काश कुर्अतुल ऐन हैदर  या उनके उपन्यास  के    पात्र गौतम और चंपा  आज  जिंदा होते, वे आज काशी जाते  तो देखते प्रदेश और केंद्र सरकार  ने इस नगर को आज उनके सपनों का नगर बना दिया।

आज 20 जनवरी कुर्अतुल ऐन हैदर (एनी आपा) का जन्मदिन है। उन्होंने उर्दू और अंग्रेजी में लिखा। किंतु इससे पहले उन्होंने वेद, भाष्य, भारतीय दर्शन को पढ़ा ही नही गुना भी। उसे ही उन्होंने अपनी रचनाओं में जगह दी। उनके विश्व प्रसिद्ध उपन्यास आग के दरिया में तो पूरा भारत का जीवन दर्शन है। इसमें उन्होंने भारत की तीन हजार साल की तहजीब, रहन−सहन, कला, संस्कृति और दर्शन को उतारा।

आग का दरिया’ उनका सबसे चर्चित उपन्यास है। इसे आजादी के बाद लिखा जाने वाला सबसे बड़ा उपन्यास माना गया था। आग का दरिया एक ऐतिहासिक उपन्यास है। यह चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल से लेकर 1947 के बंटवारे तक भारत और पाकिस्तान की कहानी सुनाता है।

पुस्तक के अनुवादक नंद किशोर विक्रम कहते हैं कि आग का दरिया की कहानी बौद्ध धर्म के उत्थान और ब्राह्मणत्व पतन से शुरू होती है। ये तीन काल में विभाजित है, किंतु इसके पात्र गौतम, चंपा, हरिशंकर और निर्मला तीनों काल में मौजूद रहते हैं कहानी बौद्धमत और ब्राह्मणत्व के टकराव से शुरू, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के टकराव तक पंहुचती है। उपन्यास देश के विभाजन की त्रासदी पर समाप्त होता है। तीनों युग के पात्र गौतम और चंपा की एक ही इच्छा है काशी पंहुचना। उपन्यास के कुछ दृश्य

− लो चम्पावती तुमने उस दिन कहा था− तुम अपनी तलवार उतार फेंको ,तो तुम मुझे अपने साथ काशी ले चलोगी और मैं काशी पंहुच गया हूं। तुम कहां हो.. यहां तलवार की बात कहां थीं मैं वापिस बनारस जा रही हूं।

−− जानते हो मेरे पुरखों के शहर का क्या नाम है।..

शिवपुरी हां, आनन्द नगर। वह भी सचमुच एक न एक दिन आनन्द नगर बनेगा, मेरे सपनों का शहर। देश के सारे शहरों की तरह। इस देश को दुख या आनन्द का नगर बनाना मेरे हाथ में हैं। यह उपन्यास कुर्तुल एन हैदर ने 1959 में लिखकर पूरा किया। काश वो आज जिंदा होता जो कहतीं बनारस मेरे सपनों का नगर बन गया।

वह कहती हैं कि जब वह बनारस में पढ़ती थी तो कभी दो कौमों के सिद्धांत पर गौर नही किया। काशी की गलियां, शिवालय और घाट मेरे भी इतने ही थे, जितने मेरी दोस्त लीना भार्गव के। फिर क्या हुआ कि जब मैं बड़ी हुई तो मुझे पता चला कि इन शिवालयों पर मेरा कोई हक नहीं, क्योंकि मैं माथे पर बिंदी नही लगाती।

− श्रृष्टि के बाहर कोई ईश्वर नही है और ईश्वर के बाहर कोई श्रृष्टि नही है। सत्य और असत्य में कोई अंतर नहीं, लेकिन इनके ऊपर परम शून्य एक सत्य है।... मुझे इस सन्नाटे से डर लगता है। शून्य सन्नाटा, शून्यता, जो अंतिम सत्य है, जो शून्य की परिक्लना है।

पिछले तीन सौ साल में इस भक्ति मार्ग का एक खूबसूरत काफिला चल रहा था। इस काफिले में अजमेर के मोइनुद्दीन चिश्ती, एटा के अमीर खुसरों, दिल्ली के निजामुद्दीन, गुजरात के नरसिंह मेहता, वीर भूमि के चंडीदास, बिहार की मिथिलापुरी के विद्यादास, महाराष्ट्र के दर्जी नामदेव, प्रयाग के रामानन्द, दक्षिण के माधव और बल्लभ। बादशाहों, छत्रपति राजाओं के दरबारों और सेनापतियों की दुनिया से निकल कर कमाल ने देखा कि एक अलग दुनिया भी है। इसमें मजदूर, नाई, कामगार और कारीगर आबाद हैं। यहां पर गुदड़ीवालों, सूफी और संतों का शासन था।.. यहां प्रेम का राज था।

गंगा के किनारे−किनारे आम के बाग में छिपी खानाकहों में−− निर्वाण और फना की खोज में उसने योगियों और सूफियों को मराकबे (चिंतन) और समाधियों में खोए देखा।

..बगदाद का अबुल समद कमालुद्दीन पचास वर्ष इराक से भारत आया था, कोई दूसरा इंसान था। कोई भिन्न व्यक्ति था, जो बालों की लट और दाढ़ी बढ़ाए हाथ में इकतारा लिए वैष्णव गीत अलाप रहा था।

..और ये अवध के वासी हैं जो न कभी दुखी होते हैं, न दूसरों को दुखी करते हैं, जो हजारों सालों से घाघरा और गोमती के किनारे रहते आए हैं। रामचंद्र के समय में भी यहीं लोग थे, शुजाउद्दीन के समय में भी ये ही लोग जिंदा थे,ये किसान और जोगी, नागा गुसांईं धूनी रमाए बैठा था।

लेखिका हिंदुत्व की प्रशंसा करती हैं कहती हैं कि यहां हजारों देवी−देवता हैं। आप चाहे जिसे मानो या न मानो। किंतु इस्लाम में ऐसा नहीं है, वहां आपके लिए कोई आजादी नही दी गई है।

..विभाजन पर चंपा कहती है− कमाल। यहां से मुसलमानों के नहीं जाना चाहिए था। क्यों नहीं देखते कि ये तुम्हारा अपना वतन है।

इस उपन्यास की खास बात यह है कि पांच सौ से ज्यादा पेज होने पर भी आदमी एक पढ़ना शुरू करता है, तो पूरा करके ही उठता है। और फिर वह भारतीय वेद, दर्शन, कला संस्क़ृति के बारे में सोचता रहता है।

कुर्अतुल ऐन हैदर का जन्म 20 जनवरी 1927 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था। नहटौर के रहने वाले उनके पिता सज्जाद हैदर यलदरम कुर्अतुल ऐन हैदर के जन्म के समय अलीगढ़ विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार थे। पिता सज्जाद हैदर यलदरम खुद उर्दू के अच्छे लेखक थे। कुर्अतुल ऐन की मां नज़र ज़हरा भी उर्दू की लेखिका थी।

कुर्अतुल ऐन हैदर को लिखने का शौक और कला अपने परिवार से ही मिली। उन्होंने छह साल की उम्र से से लिखना शुरू किया। उनकी पहली कहानी ‘बी चुहिया’ बच्चों की पत्रिका फूल में छपी। 17-18 साल की उम्र में 1945 में उनका पहला कहानी संकलन ‘शीशे का घर’ छपा। बचपन में वह कहानियां लिखती थी फिर उपन्यास, लघु उपन्यास, सफरनामें लिखने लगी। कुर्तुल एन हैदर ने लिखा। पूरी उम्र लिखा। जमकर लिखा। निधन की तारीख 21 अगस्त 2007 तक वे लगातार लिखाती रहीं। कुर्अतुल ऐन की प्रारंभिक शिक्षा लालबाग, लखनऊ से हुई। दिल्ली के इंद्रप्रस्थ कॉलेज से भी अपनी शिक्षा हासिल की। पिता की मौत और देश के बंटवारे के बाद कुछ समय के लिए वह अपने भाई मुस्तफा के साथ पाकिस्तान चली गई। पाकिस्तान से आगे की पढ़ाई के लिए वे लंदन चली गईं। साहित्य लिखने के अलावा वहां उन्होंने अंग्रेजी में पत्रकारिता भी की। उन्होंने बीबीसी लंदन में काम किया।

1956 में जब वे भारत भ्रमण पर आईं तो उनके वालिद के गहरे दोस्त, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने उनसे पूछा कि क्या वे भारत आना चाहतीं हैं? कुर्रतुल ऐन हैदर के हामी भरने पर उन्होंने कोशिश की और उन्हें वे कामयाब हो गए।वे हिंदुस्तान आ गईं। विज़िटिंग प्रोफेसर के रूप में कैलिफोर्निया, शिकागो और एरीज़ोना विश्वविद्यालय से भी जुड़ी रहीं। काम के सिलसिले में उन्होंने खूब घूमना-फिरना किया। कुर्अतुल ऐन हैदर उर्दू में लिखती और अंग्रेज़ी में पत्रकारिता करती। उन्होंने लगभग बारह उपन्यास और ढेरों कहानियां लिखीं। उनकी प्रमुख कहानियां में ‘पतझड़ की आवाज, स्ट्रीट सिंगर ऑफ लखनऊ एंड अदर स्टोरीज, रोशनी की रफ्तार जैसी कहानियां शामिल हैं। उन्होंने हाउसिंग सोसायटी, आग का दरिया (1959), सफ़ीने- ग़मे दिल, आख़िरे- शब के हमसफर, कारे जहां दराज है जैसे उपन्यास भी लिखें। आख़िरे- शब के हमसफर के लिए इन्हें 1967 में साहित्य अकादमी और 1989 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें 1984 में पद्मश्री और 1989 में उन्हें पद्मभूषण से पुरस्कृत किया गया। कारे जहां दराज है, के तीन भाग में उनके अपने परिवार का एक हजार साल का इतिहास है।उन्होंने ता-उम्र विवाह नहीं किया. 21 अगस्त 2007 को, 80 वर्ष की उम्र में उन्होंने आखिरी सांस ली ।

- अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Wednesday, January 10, 2024

राम मंदिर के माध्यम से हिंदुओं को एकजुट करने का प्रयास


अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

इस समय  राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा उत्सव की तैयारी चल रहीं हैं।अयोध्या सज रहा है।पूरी दुनिया  इस भव्य आयोजन को निहारने का आतुर है।दुनिया भर में बसे हिंदुओं के लिए यह गौरव का पल है।मुस्लिम काल से अब तक उनके पूर्वक अब तक मंदिर टूटते देखते  आए  हैं।यह हिंदुओं की वह पीढ़ी है  जो विदेशी आक्रांता  द्वारा  अयोध्या में बनाई मश्जिद की जगह मंदिर बनता  देख  रही है। अयोध्या  को सजता निहार रही है।उसे  इंतजार है  उस पल का जब इस मंदिर का 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा  समारोह होगा।इस मंदिर निर्माण  और मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा  समारोह के माध्यम से  विश्व हिंदू परिषद,राष्री  य स्वयं सवेक संघ विश्व के हिंदुओं को  आपस में जोड़ने का प्रयास  कर रहे हैं।  उसका प्रयास  है कि छोटी −मोटी आस्थाओं में फंसे हिंदू राम के नाम पर एक हो।  अलग− अलग जाति और संप्रदाय में बंटे सब हिंदू भगवान राम को अपना आदर्श स्वीकारें। एकजुट रहें।

 आरएसएस और संघ से जुड़े संगठनों ने राम मंदिर के निर्माण को लेकर रामलला के प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम के लिए देशभर में 10 करोड़ से अधिक परिवारों को निमंत्रण देने की योजना बनाई है।  उनका  कहा कि हम भगवान श्रीराम के 14 वर्ष बाद अयोध्या लौटने की खुशी में दिवाली मनाते हैं।  आगामी 22 जनवरी को तो वह दूसरी दीपावली होगी, जब भगवान राम 500 वर्षों के बाद, भारत की स्वतंत्रता की अमृतवेला में अपने जन्म-स्थान पर लौटेंगे। इसलिए, यह आवश्यक है कि विश्व का समस्त हिन्दू समाज इस प्राण प्रतिष्ठा समारोह में प्रत्यक्ष शामिल हो।उनका  कहना है कि सब रामभक्तों को तो उसी दिन अयोध्या नहीं बुलाया जा सकता। इसलिए उनका आह्वान है कि विश्व भर के हिंदू अपने मोहल्ले या गांव के मंदिर को ही अयोध्या मानकर वहां एकत्र हों। वहां की परंपरानुसार पूजा-पाठ, आराधना व अनुष्ठान करें, पूज्य संतों द्वारा दिए गए विजय महामंत्र – “श्रीराम जय राम जय जय राम” का जाप करें तथा अयोध्या के भव्य-दिव्य कार्यक्रम के सीधे प्रसारण को साक्षात देखें। आरती में अपना स्वर मिलाएं। प्रसाद बांटें और इस ऐतिहासिक कार्यक्रम के प्रत्यक्षदर्शी बनकर आनंद मनाएं। विहिप कार्याध्यक्ष ने इस योजना के बारे में कहाकि  कि इसी महीने 5 नवंबर को श्रीराम मंदिर में पूजित अक्षत (पीले चावल) कलश लेकर संगठन की दृष्टि से बने 45 प्रांतों में भेजे जा चुके हैं। तीर्थ क्षेत्र न्यास के आह्वान पर इस अक्षत निमंत्रण को लेकर, विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता अन्य हिंदू संगठनों के साथ मिलकर, 15 जनवरी तक , देश के नगर ग्रामों में, हिंदू परिवारों तक जाएंगे। ऐसा ही कार्यक्रम विदेशों में रहने वाले हिंदुओं के लिए भी आयोजित किया गया है। प्रत्येक परिवार को इस निमंत्रण के साथ भगवान और उनके मंदिर का पूजा में रखने लायक एक चित्र और अन्य आवश्यक जानकारियां भी दी जा  रही है।उनका मानना है  कि अभी तक का आकलन है कि यह आयोजन विश्व भर में पांच लाख से अधिक मन्दिरों में अवश्य होगा और करोड़ों हिंदू इसमें शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि पिछले 100 वर्षों में इस तरह का इतना बड़ा आयोजन नहीं हुआ होगा। विहिप का कहना है  कि इस बार विहिप समाज के पास कुछ मांगने नहीं जा रहा है इसलिए इस कार्य में जुटी टोलियां या कार्यकर्ता कोई भी भेंट, दान या अन्य सामग्री स्वीकार नहीं करेंगे।

विहिप ने  यह भी कहा कि 1984 से चले मुक्ति अभियान में लाखों हिंदुओं की सहभागिता रही है। अनेक मुक्ति योद्धा बलिदान भी हुए हैं या अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनके भी परिवार, उनके स्वप्न की इस पूर्ति को देखना चाहते हैं। विहिप ने देश को 45 भागों में बांटकर प्रत्येक भाग के लिए 27 जनवरी से 22 फरवरी के बीच में उस भाग के लिए निश्चित दिन अयोध्या पधारने का निवेदन किया है। ऐसे लगभग एक लाख लोगों के दर्शनों की व्यवस्था की गई है।विहिप  ने यह भी आह्वान किया कि 22 जनवरी की पुण्यरात्रि को प्रत्येक हिंदू परिवार कम से कम पांच  दीपक अवश्य जलाए और उसके बाद किसी भी दिवस को सपरिवार, ईष्ट-मित्रों सहित अयोध्या दर्शन हेतु पधारें। विश्व हिंदू परिषद को विश्वास है कि भगवान राम का यह मंदिर विश्व में हिंदुओं में समरसता, एकत्व व आत्मगौरव का संचार करेगा और भारत को परम वैभव की ओर ले जाने के लिए एक राष्ट्र मंदिर बन कर उभरेगा।

इसी के अनुपालन में विहप और  संघ के कार्यकर्ता ढोलक घंटे और घडियाल बजाते, राम भजन गाते घर −घर जा  रहे हैं।उन्हें राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा  समारोह के निमंत्रण के लिए पीले चावल और निमंत्रण पत्रक भेंट कर रहे हैं।  उनसे कह रहे है कि 22 जनवरी को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा  के लिए  अपने घर और आसपास के मंदिर को संजाए।  दीप  जलांए। दीपावली मनांए। राम मंदिर प्राण  प्रतिष्ठा समारोह का लाइव प्रसारण देखें। इन कार्यकर्ताओं को आदेश है कि यह कार्य वाल्मीकि , दलित और आदिवासी बस्ती से प्रांरभ करें। प्रत्येक हिंदू  के घर जाए।  उन्हें आमंत्रण  दें। ऐसा ही हो  रहा है।

भगवान राम ने  उत्तर से दक्षिण तक पूरे देश को एक जुट करने  का बड़ा   कार्य किया था।  सीताहरण के बाद उत्तर से लेकर दक्षिण तक के सर्व समाज को अपने  साथ जोड़ा था। दक्षिण के आदिवासी,वनवासी ,पिछड़े गुफाओं में रहने वाले  भील   आदि को  अपने  साथ लिया था। उन्होंने देश को एकीकरण के लिए बड़ा  काम किया किंतु कुछ हिंदुओं के  के प्रयास  से वह आगे नही चला।  हमने राम के साथ युद्ध के साथी रहे आदिवासी, वनवासी ,भील और अन्यों का बंदर, भालू कहकर उपहास उड़ाया। उन्हें समानता और बराबरी का दर्जा नही दिया। काश भगवान राम का मन्तव्य  समझकर उसे आगे बढ़ाया गया होता तो  देश उत्तर दक्षिण, में ना बंटा होता।

उस पुरानी गलती को विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अब दूर करने  में लगा  हैं।  राम मंदिर के  लिए सभी  ने बलिदान दिया  है, चाहे वह सिख हो, जैन हो या बौद्ध,  वाल्मिकी हो या दलित। भगवान राम सभी हिंदुओं के आदर्श और पूज्य रहे हैं।  सबके मन मे  उनके लिए आस्थाएं हैं। विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ  इन आस्थाओं को उभार कर हिंदू  समाज को एकजुट कर रहा है। उन्हें एक मंच  पर ला रहा है।

ढांचा  गिरने के बाद से  बहुत ने राम मदिर निर्माण के लिए  सकल्प लिए थे। कोई  नंगे पांव  रह रहा था तो किसी ने अपने  बाल नही कटाए थे।झारखंड की एक महिला तभी से मौनवृत पर हैं। बहुतों के अपने वृत और अपने− अपने संकल्प है।  अब  सबके वृत औंर संकल्प पूरे  होने का  दिन नजदीक है। ऐसे में सब प्रसन्न हैं। 22 जनवरी को राम मंदिर  प्राण प्रतिष्ठा के बाद वह सब अपने− अपने  संक्ल्प को विदा कहेंगे।

राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के लिए पूरी  दुनिया में उत्साह है। अमेरिका के टाइम्स स्कवायर में राम मंदिर  के प्राण  प्रतिष्ठा समारोह  के लाइव प्रसारण की व्यवस्था की गई है।अमेरिकी समुदाय के हिंदुओं   ने राम मंदिर के लिए हयूटन में कार रैली निकाली। पूरी दुनिया के हिंदुओं में उत्साह का माहौल है। सब राम मंदिर से जुड़े नजर आ रहे हैं। आज राम और हनुमान को  जानने की लोगों में इतनी  उत्सुकता  है कि हिंदुओं की धार्मिक पुस्तक छापने वाली गीता प्रेस इतनी पुस्तक नही छाप पा रहा , जितनी  मांग है राम चरित्र मानस की तीन माह में 5.27 लाख प्रति विभिन्न भाषांओं में छपी। हनुमान चालिसा की 13.50  लाख  प्रतियां छपी। सब बिक गईं। मामूली प्रतियों ही  बची है।आरती संग्रह की तीन लाख प्रतियों की मांग है। गीता  प्रेस  मांग के अनुरूप पुस्तके नही छाप पा रहा।  उसने हाथ खड़े कर दिए। 

प्रदेश सरकारें  इस अवसर को और भव्य  बनाने में लगी हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश में में 22 जनवरी को शिक्षण संस्थाएं और   शराब की दुकान बंद करने के निर्देश  दे दिए हैं।  इसी तरह के निर्देश और जगह भी  होने की सूचनांए  हैं। अयोध्या  आकर राम जन्म भूमि के दर्शन का हिंदुओं में भारी  उत्साह है।22 के लिए पहले ही होटल और धर्मशालाएं बुक हो गए थे,किंतु 22 को वीवीआईपी के आगमन को और उनकी सुरक्षा को  देखते हुए ये  रिजर्वेशन कैंसिल कर दिए गए हैं।उम्मीद है कि 22 को 100  से ज्यादा विमान अयोध्या  आएंगे।अयोध्या दुनिया भर के हिंदुओं का जल्दी ही भव्य  तीर्थ बनेगा, ऐसी उम्मीद है।उम्मीद है कि यहां बना अंतरराष्ट्रीय  एयरपोर्ट जल्द ही विश्व के व्यस्ततम एयरपोर्ट में शामिल हो  जाएगा। ये भी  उम्मीद है कि विहिप और राष्ट्रीय स्वयं  सेवक संघ सभी  हिंदुओं को राम  मंदिर और राम आस्था  से जोड़ने में सफल हो  जाएंगे।  


अशोक मधुप


( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं)

Thursday, January 4, 2024

अब ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं प्रवासी भारतीय