Sunday, January 21, 2024

कुर्अतुल ऐन हैदर का भारत

  कुर्अतुल ऐन हैदर का भारत 

अशोक मधुप

कुर्अतुल ऐन हैदर उर्फ  एनी आपा पूरी दुनिया घूमीं पर मन भारत में ही रमा।आग का दरिया’ उनका सबसे चर्चित उपन्यास है। इसे आजादी के बाद लिखा जाने वाला सबसे बड़ा उपन्यास माना गया था। आग का दरिया एक ऐतिहासिक उपन्यास है। यह चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल से लेकर 1947 के बंटवारे तक भारत और पाकिस्तान की कहानी सुनाता है।उपन्यास के तीनों युग के पात्र गौतम और चंपा की एक ही इच्छा है काशी पंहुचना।  उनकी एक ही तमन्ना  है कि काशी उनके सपनों का  नगर बने। आनन्द  नगर बने।काश कुर्अतुल ऐन हैदर  या उनके उपन्यास  के    पात्र गौतम और चंपा  आज  जिंदा होते, वे आज काशी जाते  तो देखते प्रदेश और केंद्र सरकार  ने इस नगर को आज उनके सपनों का नगर बना दिया।

आज 20 जनवरी कुर्अतुल ऐन हैदर (एनी आपा) का जन्मदिन है। उन्होंने उर्दू और अंग्रेजी में लिखा। किंतु इससे पहले उन्होंने वेद, भाष्य, भारतीय दर्शन को पढ़ा ही नही गुना भी। उसे ही उन्होंने अपनी रचनाओं में जगह दी। उनके विश्व प्रसिद्ध उपन्यास आग के दरिया में तो पूरा भारत का जीवन दर्शन है। इसमें उन्होंने भारत की तीन हजार साल की तहजीब, रहन−सहन, कला, संस्कृति और दर्शन को उतारा।

आग का दरिया’ उनका सबसे चर्चित उपन्यास है। इसे आजादी के बाद लिखा जाने वाला सबसे बड़ा उपन्यास माना गया था। आग का दरिया एक ऐतिहासिक उपन्यास है। यह चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल से लेकर 1947 के बंटवारे तक भारत और पाकिस्तान की कहानी सुनाता है।

पुस्तक के अनुवादक नंद किशोर विक्रम कहते हैं कि आग का दरिया की कहानी बौद्ध धर्म के उत्थान और ब्राह्मणत्व पतन से शुरू होती है। ये तीन काल में विभाजित है, किंतु इसके पात्र गौतम, चंपा, हरिशंकर और निर्मला तीनों काल में मौजूद रहते हैं कहानी बौद्धमत और ब्राह्मणत्व के टकराव से शुरू, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के टकराव तक पंहुचती है। उपन्यास देश के विभाजन की त्रासदी पर समाप्त होता है। तीनों युग के पात्र गौतम और चंपा की एक ही इच्छा है काशी पंहुचना। उपन्यास के कुछ दृश्य

− लो चम्पावती तुमने उस दिन कहा था− तुम अपनी तलवार उतार फेंको ,तो तुम मुझे अपने साथ काशी ले चलोगी और मैं काशी पंहुच गया हूं। तुम कहां हो.. यहां तलवार की बात कहां थीं मैं वापिस बनारस जा रही हूं।

−− जानते हो मेरे पुरखों के शहर का क्या नाम है।..

शिवपुरी हां, आनन्द नगर। वह भी सचमुच एक न एक दिन आनन्द नगर बनेगा, मेरे सपनों का शहर। देश के सारे शहरों की तरह। इस देश को दुख या आनन्द का नगर बनाना मेरे हाथ में हैं। यह उपन्यास कुर्तुल एन हैदर ने 1959 में लिखकर पूरा किया। काश वो आज जिंदा होता जो कहतीं बनारस मेरे सपनों का नगर बन गया।

वह कहती हैं कि जब वह बनारस में पढ़ती थी तो कभी दो कौमों के सिद्धांत पर गौर नही किया। काशी की गलियां, शिवालय और घाट मेरे भी इतने ही थे, जितने मेरी दोस्त लीना भार्गव के। फिर क्या हुआ कि जब मैं बड़ी हुई तो मुझे पता चला कि इन शिवालयों पर मेरा कोई हक नहीं, क्योंकि मैं माथे पर बिंदी नही लगाती।

− श्रृष्टि के बाहर कोई ईश्वर नही है और ईश्वर के बाहर कोई श्रृष्टि नही है। सत्य और असत्य में कोई अंतर नहीं, लेकिन इनके ऊपर परम शून्य एक सत्य है।... मुझे इस सन्नाटे से डर लगता है। शून्य सन्नाटा, शून्यता, जो अंतिम सत्य है, जो शून्य की परिक्लना है।

पिछले तीन सौ साल में इस भक्ति मार्ग का एक खूबसूरत काफिला चल रहा था। इस काफिले में अजमेर के मोइनुद्दीन चिश्ती, एटा के अमीर खुसरों, दिल्ली के निजामुद्दीन, गुजरात के नरसिंह मेहता, वीर भूमि के चंडीदास, बिहार की मिथिलापुरी के विद्यादास, महाराष्ट्र के दर्जी नामदेव, प्रयाग के रामानन्द, दक्षिण के माधव और बल्लभ। बादशाहों, छत्रपति राजाओं के दरबारों और सेनापतियों की दुनिया से निकल कर कमाल ने देखा कि एक अलग दुनिया भी है। इसमें मजदूर, नाई, कामगार और कारीगर आबाद हैं। यहां पर गुदड़ीवालों, सूफी और संतों का शासन था।.. यहां प्रेम का राज था।

गंगा के किनारे−किनारे आम के बाग में छिपी खानाकहों में−− निर्वाण और फना की खोज में उसने योगियों और सूफियों को मराकबे (चिंतन) और समाधियों में खोए देखा।

..बगदाद का अबुल समद कमालुद्दीन पचास वर्ष इराक से भारत आया था, कोई दूसरा इंसान था। कोई भिन्न व्यक्ति था, जो बालों की लट और दाढ़ी बढ़ाए हाथ में इकतारा लिए वैष्णव गीत अलाप रहा था।

..और ये अवध के वासी हैं जो न कभी दुखी होते हैं, न दूसरों को दुखी करते हैं, जो हजारों सालों से घाघरा और गोमती के किनारे रहते आए हैं। रामचंद्र के समय में भी यहीं लोग थे, शुजाउद्दीन के समय में भी ये ही लोग जिंदा थे,ये किसान और जोगी, नागा गुसांईं धूनी रमाए बैठा था।

लेखिका हिंदुत्व की प्रशंसा करती हैं कहती हैं कि यहां हजारों देवी−देवता हैं। आप चाहे जिसे मानो या न मानो। किंतु इस्लाम में ऐसा नहीं है, वहां आपके लिए कोई आजादी नही दी गई है।

..विभाजन पर चंपा कहती है− कमाल। यहां से मुसलमानों के नहीं जाना चाहिए था। क्यों नहीं देखते कि ये तुम्हारा अपना वतन है।

इस उपन्यास की खास बात यह है कि पांच सौ से ज्यादा पेज होने पर भी आदमी एक पढ़ना शुरू करता है, तो पूरा करके ही उठता है। और फिर वह भारतीय वेद, दर्शन, कला संस्क़ृति के बारे में सोचता रहता है।

कुर्अतुल ऐन हैदर का जन्म 20 जनवरी 1927 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था। नहटौर के रहने वाले उनके पिता सज्जाद हैदर यलदरम कुर्अतुल ऐन हैदर के जन्म के समय अलीगढ़ विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार थे। पिता सज्जाद हैदर यलदरम खुद उर्दू के अच्छे लेखक थे। कुर्अतुल ऐन की मां नज़र ज़हरा भी उर्दू की लेखिका थी।

कुर्अतुल ऐन हैदर को लिखने का शौक और कला अपने परिवार से ही मिली। उन्होंने छह साल की उम्र से से लिखना शुरू किया। उनकी पहली कहानी ‘बी चुहिया’ बच्चों की पत्रिका फूल में छपी। 17-18 साल की उम्र में 1945 में उनका पहला कहानी संकलन ‘शीशे का घर’ छपा। बचपन में वह कहानियां लिखती थी फिर उपन्यास, लघु उपन्यास, सफरनामें लिखने लगी। कुर्तुल एन हैदर ने लिखा। पूरी उम्र लिखा। जमकर लिखा। निधन की तारीख 21 अगस्त 2007 तक वे लगातार लिखाती रहीं। कुर्अतुल ऐन की प्रारंभिक शिक्षा लालबाग, लखनऊ से हुई। दिल्ली के इंद्रप्रस्थ कॉलेज से भी अपनी शिक्षा हासिल की। पिता की मौत और देश के बंटवारे के बाद कुछ समय के लिए वह अपने भाई मुस्तफा के साथ पाकिस्तान चली गई। पाकिस्तान से आगे की पढ़ाई के लिए वे लंदन चली गईं। साहित्य लिखने के अलावा वहां उन्होंने अंग्रेजी में पत्रकारिता भी की। उन्होंने बीबीसी लंदन में काम किया।

1956 में जब वे भारत भ्रमण पर आईं तो उनके वालिद के गहरे दोस्त, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने उनसे पूछा कि क्या वे भारत आना चाहतीं हैं? कुर्रतुल ऐन हैदर के हामी भरने पर उन्होंने कोशिश की और उन्हें वे कामयाब हो गए।वे हिंदुस्तान आ गईं। विज़िटिंग प्रोफेसर के रूप में कैलिफोर्निया, शिकागो और एरीज़ोना विश्वविद्यालय से भी जुड़ी रहीं। काम के सिलसिले में उन्होंने खूब घूमना-फिरना किया। कुर्अतुल ऐन हैदर उर्दू में लिखती और अंग्रेज़ी में पत्रकारिता करती। उन्होंने लगभग बारह उपन्यास और ढेरों कहानियां लिखीं। उनकी प्रमुख कहानियां में ‘पतझड़ की आवाज, स्ट्रीट सिंगर ऑफ लखनऊ एंड अदर स्टोरीज, रोशनी की रफ्तार जैसी कहानियां शामिल हैं। उन्होंने हाउसिंग सोसायटी, आग का दरिया (1959), सफ़ीने- ग़मे दिल, आख़िरे- शब के हमसफर, कारे जहां दराज है जैसे उपन्यास भी लिखें। आख़िरे- शब के हमसफर के लिए इन्हें 1967 में साहित्य अकादमी और 1989 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें 1984 में पद्मश्री और 1989 में उन्हें पद्मभूषण से पुरस्कृत किया गया। कारे जहां दराज है, के तीन भाग में उनके अपने परिवार का एक हजार साल का इतिहास है।उन्होंने ता-उम्र विवाह नहीं किया. 21 अगस्त 2007 को, 80 वर्ष की उम्र में उन्होंने आखिरी सांस ली ।

- अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Wednesday, January 10, 2024

राम मंदिर के माध्यम से हिंदुओं को एकजुट करने का प्रयास


अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

इस समय  राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा उत्सव की तैयारी चल रहीं हैं।अयोध्या सज रहा है।पूरी दुनिया  इस भव्य आयोजन को निहारने का आतुर है।दुनिया भर में बसे हिंदुओं के लिए यह गौरव का पल है।मुस्लिम काल से अब तक उनके पूर्वक अब तक मंदिर टूटते देखते  आए  हैं।यह हिंदुओं की वह पीढ़ी है  जो विदेशी आक्रांता  द्वारा  अयोध्या में बनाई मश्जिद की जगह मंदिर बनता  देख  रही है। अयोध्या  को सजता निहार रही है।उसे  इंतजार है  उस पल का जब इस मंदिर का 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा  समारोह होगा।इस मंदिर निर्माण  और मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा  समारोह के माध्यम से  विश्व हिंदू परिषद,राष्री  य स्वयं सवेक संघ विश्व के हिंदुओं को  आपस में जोड़ने का प्रयास  कर रहे हैं।  उसका प्रयास  है कि छोटी −मोटी आस्थाओं में फंसे हिंदू राम के नाम पर एक हो।  अलग− अलग जाति और संप्रदाय में बंटे सब हिंदू भगवान राम को अपना आदर्श स्वीकारें। एकजुट रहें।

 आरएसएस और संघ से जुड़े संगठनों ने राम मंदिर के निर्माण को लेकर रामलला के प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम के लिए देशभर में 10 करोड़ से अधिक परिवारों को निमंत्रण देने की योजना बनाई है।  उनका  कहा कि हम भगवान श्रीराम के 14 वर्ष बाद अयोध्या लौटने की खुशी में दिवाली मनाते हैं।  आगामी 22 जनवरी को तो वह दूसरी दीपावली होगी, जब भगवान राम 500 वर्षों के बाद, भारत की स्वतंत्रता की अमृतवेला में अपने जन्म-स्थान पर लौटेंगे। इसलिए, यह आवश्यक है कि विश्व का समस्त हिन्दू समाज इस प्राण प्रतिष्ठा समारोह में प्रत्यक्ष शामिल हो।उनका  कहना है कि सब रामभक्तों को तो उसी दिन अयोध्या नहीं बुलाया जा सकता। इसलिए उनका आह्वान है कि विश्व भर के हिंदू अपने मोहल्ले या गांव के मंदिर को ही अयोध्या मानकर वहां एकत्र हों। वहां की परंपरानुसार पूजा-पाठ, आराधना व अनुष्ठान करें, पूज्य संतों द्वारा दिए गए विजय महामंत्र – “श्रीराम जय राम जय जय राम” का जाप करें तथा अयोध्या के भव्य-दिव्य कार्यक्रम के सीधे प्रसारण को साक्षात देखें। आरती में अपना स्वर मिलाएं। प्रसाद बांटें और इस ऐतिहासिक कार्यक्रम के प्रत्यक्षदर्शी बनकर आनंद मनाएं। विहिप कार्याध्यक्ष ने इस योजना के बारे में कहाकि  कि इसी महीने 5 नवंबर को श्रीराम मंदिर में पूजित अक्षत (पीले चावल) कलश लेकर संगठन की दृष्टि से बने 45 प्रांतों में भेजे जा चुके हैं। तीर्थ क्षेत्र न्यास के आह्वान पर इस अक्षत निमंत्रण को लेकर, विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता अन्य हिंदू संगठनों के साथ मिलकर, 15 जनवरी तक , देश के नगर ग्रामों में, हिंदू परिवारों तक जाएंगे। ऐसा ही कार्यक्रम विदेशों में रहने वाले हिंदुओं के लिए भी आयोजित किया गया है। प्रत्येक परिवार को इस निमंत्रण के साथ भगवान और उनके मंदिर का पूजा में रखने लायक एक चित्र और अन्य आवश्यक जानकारियां भी दी जा  रही है।उनका मानना है  कि अभी तक का आकलन है कि यह आयोजन विश्व भर में पांच लाख से अधिक मन्दिरों में अवश्य होगा और करोड़ों हिंदू इसमें शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि पिछले 100 वर्षों में इस तरह का इतना बड़ा आयोजन नहीं हुआ होगा। विहिप का कहना है  कि इस बार विहिप समाज के पास कुछ मांगने नहीं जा रहा है इसलिए इस कार्य में जुटी टोलियां या कार्यकर्ता कोई भी भेंट, दान या अन्य सामग्री स्वीकार नहीं करेंगे।

विहिप ने  यह भी कहा कि 1984 से चले मुक्ति अभियान में लाखों हिंदुओं की सहभागिता रही है। अनेक मुक्ति योद्धा बलिदान भी हुए हैं या अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनके भी परिवार, उनके स्वप्न की इस पूर्ति को देखना चाहते हैं। विहिप ने देश को 45 भागों में बांटकर प्रत्येक भाग के लिए 27 जनवरी से 22 फरवरी के बीच में उस भाग के लिए निश्चित दिन अयोध्या पधारने का निवेदन किया है। ऐसे लगभग एक लाख लोगों के दर्शनों की व्यवस्था की गई है।विहिप  ने यह भी आह्वान किया कि 22 जनवरी की पुण्यरात्रि को प्रत्येक हिंदू परिवार कम से कम पांच  दीपक अवश्य जलाए और उसके बाद किसी भी दिवस को सपरिवार, ईष्ट-मित्रों सहित अयोध्या दर्शन हेतु पधारें। विश्व हिंदू परिषद को विश्वास है कि भगवान राम का यह मंदिर विश्व में हिंदुओं में समरसता, एकत्व व आत्मगौरव का संचार करेगा और भारत को परम वैभव की ओर ले जाने के लिए एक राष्ट्र मंदिर बन कर उभरेगा।

इसी के अनुपालन में विहप और  संघ के कार्यकर्ता ढोलक घंटे और घडियाल बजाते, राम भजन गाते घर −घर जा  रहे हैं।उन्हें राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा  समारोह के निमंत्रण के लिए पीले चावल और निमंत्रण पत्रक भेंट कर रहे हैं।  उनसे कह रहे है कि 22 जनवरी को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा  के लिए  अपने घर और आसपास के मंदिर को संजाए।  दीप  जलांए। दीपावली मनांए। राम मंदिर प्राण  प्रतिष्ठा समारोह का लाइव प्रसारण देखें। इन कार्यकर्ताओं को आदेश है कि यह कार्य वाल्मीकि , दलित और आदिवासी बस्ती से प्रांरभ करें। प्रत्येक हिंदू  के घर जाए।  उन्हें आमंत्रण  दें। ऐसा ही हो  रहा है।

भगवान राम ने  उत्तर से दक्षिण तक पूरे देश को एक जुट करने  का बड़ा   कार्य किया था।  सीताहरण के बाद उत्तर से लेकर दक्षिण तक के सर्व समाज को अपने  साथ जोड़ा था। दक्षिण के आदिवासी,वनवासी ,पिछड़े गुफाओं में रहने वाले  भील   आदि को  अपने  साथ लिया था। उन्होंने देश को एकीकरण के लिए बड़ा  काम किया किंतु कुछ हिंदुओं के  के प्रयास  से वह आगे नही चला।  हमने राम के साथ युद्ध के साथी रहे आदिवासी, वनवासी ,भील और अन्यों का बंदर, भालू कहकर उपहास उड़ाया। उन्हें समानता और बराबरी का दर्जा नही दिया। काश भगवान राम का मन्तव्य  समझकर उसे आगे बढ़ाया गया होता तो  देश उत्तर दक्षिण, में ना बंटा होता।

उस पुरानी गलती को विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अब दूर करने  में लगा  हैं।  राम मंदिर के  लिए सभी  ने बलिदान दिया  है, चाहे वह सिख हो, जैन हो या बौद्ध,  वाल्मिकी हो या दलित। भगवान राम सभी हिंदुओं के आदर्श और पूज्य रहे हैं।  सबके मन मे  उनके लिए आस्थाएं हैं। विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ  इन आस्थाओं को उभार कर हिंदू  समाज को एकजुट कर रहा है। उन्हें एक मंच  पर ला रहा है।

ढांचा  गिरने के बाद से  बहुत ने राम मदिर निर्माण के लिए  सकल्प लिए थे। कोई  नंगे पांव  रह रहा था तो किसी ने अपने  बाल नही कटाए थे।झारखंड की एक महिला तभी से मौनवृत पर हैं। बहुतों के अपने वृत और अपने− अपने संकल्प है।  अब  सबके वृत औंर संकल्प पूरे  होने का  दिन नजदीक है। ऐसे में सब प्रसन्न हैं। 22 जनवरी को राम मंदिर  प्राण प्रतिष्ठा के बाद वह सब अपने− अपने  संक्ल्प को विदा कहेंगे।

राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के लिए पूरी  दुनिया में उत्साह है। अमेरिका के टाइम्स स्कवायर में राम मंदिर  के प्राण  प्रतिष्ठा समारोह  के लाइव प्रसारण की व्यवस्था की गई है।अमेरिकी समुदाय के हिंदुओं   ने राम मंदिर के लिए हयूटन में कार रैली निकाली। पूरी दुनिया के हिंदुओं में उत्साह का माहौल है। सब राम मंदिर से जुड़े नजर आ रहे हैं। आज राम और हनुमान को  जानने की लोगों में इतनी  उत्सुकता  है कि हिंदुओं की धार्मिक पुस्तक छापने वाली गीता प्रेस इतनी पुस्तक नही छाप पा रहा , जितनी  मांग है राम चरित्र मानस की तीन माह में 5.27 लाख प्रति विभिन्न भाषांओं में छपी। हनुमान चालिसा की 13.50  लाख  प्रतियां छपी। सब बिक गईं। मामूली प्रतियों ही  बची है।आरती संग्रह की तीन लाख प्रतियों की मांग है। गीता  प्रेस  मांग के अनुरूप पुस्तके नही छाप पा रहा।  उसने हाथ खड़े कर दिए। 

प्रदेश सरकारें  इस अवसर को और भव्य  बनाने में लगी हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश में में 22 जनवरी को शिक्षण संस्थाएं और   शराब की दुकान बंद करने के निर्देश  दे दिए हैं।  इसी तरह के निर्देश और जगह भी  होने की सूचनांए  हैं। अयोध्या  आकर राम जन्म भूमि के दर्शन का हिंदुओं में भारी  उत्साह है।22 के लिए पहले ही होटल और धर्मशालाएं बुक हो गए थे,किंतु 22 को वीवीआईपी के आगमन को और उनकी सुरक्षा को  देखते हुए ये  रिजर्वेशन कैंसिल कर दिए गए हैं।उम्मीद है कि 22 को 100  से ज्यादा विमान अयोध्या  आएंगे।अयोध्या दुनिया भर के हिंदुओं का जल्दी ही भव्य  तीर्थ बनेगा, ऐसी उम्मीद है।उम्मीद है कि यहां बना अंतरराष्ट्रीय  एयरपोर्ट जल्द ही विश्व के व्यस्ततम एयरपोर्ट में शामिल हो  जाएगा। ये भी  उम्मीद है कि विहिप और राष्ट्रीय स्वयं  सेवक संघ सभी  हिंदुओं को राम  मंदिर और राम आस्था  से जोड़ने में सफल हो  जाएंगे।  


अशोक मधुप


( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं)

Thursday, January 4, 2024

अब ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं प्रवासी भारतीय


Wednesday, December 27, 2023

कुश्ती को बहुत नुकसान पंहुचाया कुश्ती संघ के विवाद ने

 


अशोक मधुप

वरिष्ठ पत्रकार

पिछले लगभग  एक साल के भारतीय  कुश्ती संघ के विवाद ने  कुश्ती को बहुत नुकसान पहुंचाया।यह नुकसान दीख नही रहा किंतु इसकी भारपायी के लिए बड़ा  प्रयास करना होगा।खेल मंत्रालय ने नवनिर्वाचित भारतीय कुश्ती संघ को निलंबित कर इस खेल को  बचाने के लिए बड़ा संदेश दिया है। खेल मंत्रालय ने भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन (आईओए) से फेडरेशन का कामकाज चलाने के लिए एक तदर्थ समिति बनाने को कहा है।खेल मंत्रालय ने भारतीय कुश्ती संघ का संचालन राष्ट्रीय खेल विकास संहिता में दिए राष्ट्रीय खेल फडरेशन के कामकाज की तरह करना सुनिश्चित करने को कहा गया है।यह व्यवस्था अगले आदेश तक जारी रहेगी।

भारतीय कुश्ती संघ के बीते गुरुवार को चुनाव कराए गए थे। इसमें संघ के पूर्व प्रमुख और बीजेपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह के करीबी संजय सिंह अध्यक्ष चुने गए थे।चुने जाते ही संघ के नवनिर्वाचित अध्यक्ष संजय सिंह के अंडर-15 और अंडर-18 का ट्रायल गोण्डा के नंदिनी नगर में आयोजित कराने की घोषणा की थी। यह क्षेत्र सांसद बृजभूषण शरण सिंह  का  गृह जनपद है। वर्तमान में सांसद बृजभूषण शरण सिंह के बेटे यहां से विधायक हैं।सरकार ने इस ट्रायल को  ही रद्द कर दिया है। इस चुनाव का अंतरराष्ट्रीय पहलवान विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया ने विरोध किया था। बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ पहलवानों की इस लड़ाई में ये तीनों पहलवान प्रमुख रूप से शामिल थे. कुछ महिला पहलवानों ने बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ यौन शोषण के आरोप लगाए थे।संजय सिंह के चुनाव के बाद ओलंपिक पदक विजेता पहलवान साक्षी मलिक ने कुश्ती से संन्यास लेने की घोषणा की थी। वहीं बजरंग पूनिया ने अपना 'पद्मश्री' लौटा दिया था।हरियाणा के पैरा एथलीट वीरेंद्र सिंह ने पद्म श्री लौटाने का एलान किया  था।

दरअस्ल इस चुनाव को रद्द करने का कारण सरकार का सांसद बृजभूषण शरण सिंह को झटका  देना था ।  इनके बेटे  और नजदीकियों ने अंडर-15 और अंडर-18 का ट्रायल गोण्डा के नंदिनी नगर में आयोजित कराने की घोषणा के बाद  क्षेत्र में बड़े  हार्डिंग लगवाए थे कि दबदबा तो है, दबदबा रहेगा...ये भगवान की देन है। ये वही पोस्टर हैं जिनका प्रदर्शन सांसद के विधायक बेटे प्रतीक भूषण शरण सिंह ने भी खुलेआम किया था।   चुनाव के रद्द होने के बाद गाड़ियों से भी 'दबदबा' वाले स्टीकर  और चौराहों  पर लगे हार्डिंग भी हटा दिए गए।चुनाव के बाद  नए अध्यक्ष  की  अंडर-15 और अंडर-18 का ट्रायल गोण्डा के नंदिनी नगर में आयोजित कराने की घोषणा और ये  पोस्टर  सांसद बृजभूषण शरण सिंह और उनके नजदीकियों के इरादे बताने के लिए काफी था। वरन स्टेडियम तो पूरे देश में बने हैं। कहीं और भी ट्रायल  हो सकते थे।  ये ट्रायल गोण्डा के नंदिनी नगर में ट्रायल कर विरोध  करने वाले पहलवानों को अपना प्रभाव और दबदबा  बताना चाहते थे।इससे बडी बात क्या होगी कि इन ट्रायल की तारीख तै करते  समय एसोसिएशन के सचिव की सहमति भी नहीं ली गई । न उन्हें ट्रायल की तारीख तै  होने  की जानकारी है।  जबकि एसोससिएशन के संविधान के अनुसार ये होना  चाहिए था। एसासिएशन के नवनिर्वाचित प्रधान सचिव प्रेम चंद लोचब ने इस निर्णय पर आपत्ति जताते हुए भारतीय ओलिंपिक संघ को पत्र लिख कर बताया था कि सचिव की जानकारी के बिना ये निर्णय लिए गए हैं जबकि कुश्ती संघ का संविधान कहता है कि सचिव की अनुपस्थिति में न तो निर्णय लिए जा सकते हैं और न ही कोई और अधिकारी इन निर्णयों की जानकारी प्रसारित कर सकता है।

छह माह से ज्यादा पहले   पहलवानों के विरोध के बाद भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह को कुश्ती संघ के अध्यक्ष के पद से हटा दिया था। नवनिर्वाचित भारतीय कुश्ती संघ के निलंबन के बाद बृजभूषण शरण सिंह ने कहा था कि अब उनका कुश्ती से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि कुश्ती को लेकर क्या करना है, इसका फैसला नए चुए गए पदाधिकारियों को करना है। उन्होंने कहा  कि उनके पास कई और भी काम हैं। उन्होंने कहा कि वो इस खेल की राजनीति से दूर रहेंगे।ये घोषणा  उन्होंने भाजपा के अध्यक्ष जेपी नडडा से मिलने के बाद की। लगता है कि पार्टी अध्यक्ष जेपी नडडा ने  उन्हें समझा  दिया  कि टिकट बचाना  है  तो कुश्ती से  दूर रहें। हालाकि उन्होंने  कह  दिया कि कुश्ती से उनका कोई  लेना – देना  नही है  जबकि सच्चाई  यह है   पद से हटने के छह माह बाद भी कुश्ती संघ का कार्यालय  उनके घर पर चल रहा है।

कुश्ती संघ को निलंबित किए जाने के बाद आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले अनुभवी पहलवान बजरंग पूनिया ने कहा, ''यह सही निर्णय लिया गया है। जो हमारी बहन-बेटियों के साथ अत्याचार हो रहा है उसके खिलाफ संबंधित लोगों को पूरी तरह से हटाया जाना चाहिए। हमारे ऊपर कई इल्जाम लगाए गए। राजनीति की गई। जब हम पदक जीतते हैं तो देश के होते हैं। हम खिलाड़ी कभी भी जात-पात नहीं देखते। एक साथ एक थाली में खाते हैं। हम अपने तिरंगे के लिए खून-पसीना बहाते हैं।वहीं इस पर ओलंपिक पदक विजेता साक्षी मलिक ने कहा है कि यह उनका (बृजभूषण सिंह) राजनीतिक एजेंडा है, उस पर उन्हें कुछ नहीं कहना है।साक्षी ने कहा कि उनकी 'लड़ाई सरकार से नहीं बल्कि एक व्यक्ति से है.'। कुश्ती खिलाड़ी विनेश फोगाट ने एक निजी चैनल से बात करते हुए कहा, "ये अच्छी ख़बर है. हम चाहेंगे कि इस पद पर कोई महिला आनी चाहिए ताकि ये संदेश जाए कि महिलाएं आगे बढ़ें. जो भी हो कोई अच्छा आदमी आना चाहिए."।

पिछले एक साल से चले आ रहे कुश्ती संघ  के विवाद ने कुश्ती का बहुत नुकसान पहुंचाया  है। कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण सिंह  पर महिला   पहलवानों के आरोप  लगने के बाद से ही सरकार को उन्हें हटा देना चाहिए था, किंतु  ऐसा नही हुआ। इसका परिणाम यह है कि आज अभिभावक खेल में अपनी बेटी का भेजते कई बार सोचेंगे।वे पहले ही अपनी बेटी की सुरक्षा और सम्मान को लेकर चिंतित रहते हैं,  इस प्रकरण  ने उनकी चिंता और बढ़ायी है। अब वे बेटी को खेल  विशेषकर कुश्ती में भेजते कई बार सोंचेंगे।सरकार ने नए  चुनाव का भले ही रद्द कर दिया  हो किंतु लंबे समय से कुश्ती संघ में दबदबा कायम रखे बृजभूषण सिंह  और उनके नजदीकी चुप नही बैठने  वालें नही हैं।वे सरकार के इस निर्णय  के विरूद्ध  कोर्ट  जांएगे।इनका प्रयास होगा कि कुश्ती संघ उनके हाथ से न जा पाए।

सरकार  ने नए चुनाव को रद्द करके यह संदेश देने का प्रयास किया है कि निश्चित रूप से कुश्ती संघ को नियमों का पालन करना होगा और किसी तरह की कोई कोताही बरतने से परहेज़ रखना होगा।खेल संघ से राजनैतिक लोगों को दूर रखने के  लिए सरकार को  काम करना  चाहिए।खिलाड़ी भी  यदि राजनीति में आ जाए तो उसे भी खेल संघ से बाहर ही रखा जाना चाहिए। सुपरिम कार्ट भी खेल संघों में राजनैतिक दख्ल को लेकर चिंता  जता चुका है। किंतु हुआ कुछ नही।खेल संघे में खिलाडी होने  चाहिए।वे खेल और खिलाड़ी को  ज्यादा समझते हैं।  राजनेता नहीं।मंत्रालय को बेपटरी हुए कुश्ती संघ को पटरी पर लाने उसमें खिलाडियों और पहलवानों का विश्वास जमाने को  बहुत कुछ करना होगा। संघ में खिलाड़ी लाने होंगे। अच्छा रहे कि कुश्ती सघ की गरिमा बचाने  और बेटी की सुरक्षा की चिंता करते परिवारजनों को आश्वास्त करने के लिए  कुश्ती संघ का अध्यक्ष किसी महिला खिलाड़ी को बनाए।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

Monday, December 18, 2023

केरल के राज्यपाल पर हमला ?







अशोक मधुप


वरिष्ठ  पत्रकार


केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने आरोप लगाया है कि बीते सोमवार को मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने उन्हें शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाने की साजिश रची।आरोप है कि एयरपोर्ट जाते समय सत्तारूढ़ सीपीएम की छात्र शाखा, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के कुछ सदस्यों ने  राज्यपाल के वाहन को टक्कर   मारी। कार के शीशे  पर प्रहार किए।यह घटना सोमवार को तब हुई जब राज्यपाल नई दिल्ली जाने के लिए तिरुवनंतपुरम अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर जा रहे थे। स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया ने उन पर काले झंडे लहराए और तीन स्थानों पर उनकी कार को रोकने की कोशिश की।एक जगह   गवर्नर  कार से बाहर निकले तो  प्रदर्शनकारी भाग लिए। गवर्नर खान ने दिल्ली में मीडिया से कहा कि मुख्यमंत्री विजयन की संलिप्तता के बूते उन्हें शारीरिक नुकसान पहुंचाने के लिए एक ठोस प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह घटना कोई हादसा नहीं थी, बल्कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने के लिए  जानबूझकर ऐसा किया गया। खान ने कहा, " मैं तीन बार प्रदर्शनकारियों के बीच आया और ध्यान देने वाली बात यह है कि इन प्रदर्शनकारियों को पुलिस जीपों में लाया गया था और घटना के बाद उन्हें इन जीपों में वापस ले जाया गया।उन्होंने कहा, ''सरकार मुझे डराने के लिए ऐसा कर रही है, लेकिन मैं डरने वाला नहीं हूं। राज्‍यपाल  का यह आरोप बहुत गंभीर है,क्योंकि राज्‍य के मुख्‍यमंत्री पर साजि‍श रचने का आरोप है, इसलिए केंद्र  सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहि‍ए। उन्हें राज्यपाल के आरोप की किसी केंद्रीय  एजेंसी से या केंद्रीय आयोग से जांच करानी चाहिए। साथ ही राज्यपाल को अपने  स्तर से अतिरिक्त सुरक्षा देनी होगी ताकि आगे से  ऐसा न हो।


राज्यपाल और मुख्यमंत्री और राज्य सरकारों के बीच  विवाद नया नही हैं।मुख्यमंत्री  और  सरकार  चाहतीं है कि वे राज्य को अपनी मर्जी  से  चलाएं। जो चाहें करें।राज्यपाल संविधान  के अनुरूप कार्य करने को कहते हैं। अपने  पद के मद मुख्यमंत्री ये बर्दाश्त  करने को तैयार नही होते की कोई उनके काम में अडंगा लगाए। यही टकराव का  बड़ा  कारण  है। यदि मुख्यमंत्री ये समझ लें।  अपनी सीमा  जानलें तो कोई  विरोध न हो।  हालाकि कई  जगह राज्यपाल भी मनमानी पर उतरें हैं।  वह विधान सभा द्वारा पारित प्रस्ताव स्वीकृति की प्रतीक्षा में कई− कई  माह से  रोके हैं।  इस पर सर्वोच्च  न्यायालय भी   कई बार नाराजगी जता चुका है। 


केरल सरकार  द्वारा  कन्नूर विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति   की गई।  जब की इस नियुक्ति का अधिकार  राज्यपाल का  है।  सुप्रीम कोर्ट ने 30 नवम्बर 2023 मुख्यमंत्री द्वारा की   कन्नूर विश्व विद्यालय के राज्यपाल की नियुक्ति को   अनाचार तथा अवैध दख्ल  का दोषी करार दिया । कार्ट ने निर्णय में यहां तक  कहा गया कि मुख्यमंत्री ने कानून का  मजाक  उड़ाया है। प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और जेबी पारदीवाला और मनोज मिश्रा समेत तीन जजों की  खण्डपीठ ने कुलपति गोपीनाथ रवींद्रन की नियुक्ति को अवैध बताया तथा निरस्त कर दिया।निर्णय में कहा गया कि  निर्देशानुसार  राज्यपाल ही विश्वविद्यालय का कुलाधिपति होता है। यहां सुप्रीम कोर्ट ने कहा भी कि राज्य शिक्षा मंत्री  आर बिन्दु का परामर्श कुलाधिपति पर अनिवार्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में केरल राजभवन की वह विज्ञाप्ति का भी उल्लेख किया जिसमें राज्यपाल ने लिखा था : ''श्री रवींद्रन की नियुक्ति का निर्णय स्वयं मुख्यमंत्री तथा उनकी उच्च शिक्षा मंत्री श्रीमती आर बिन्दु ने किया था।'' राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा भी था कि पिनराई विजयन राजभवन आये थे और कन्नूर विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति का अनुरोध किया था। बिन्दु भी दो बार लिखकर आग्रह कर चुकी हैं। अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में ''राज्य के अनुचित हस्तक्षेप'' के आधार पर डा. गोपीनाथ रवींद्रन को वीसी के  रूप में फिर से नियुक्त करने वाली 23 नवम्बर, 2021 की अधिसूचना को रद्द कर दिया था।  अदालत ने कन्नूर विश्ववि‌द्यालय की स्वायत्तता पर जोर देते हुए कहा कि कन्नूर विश्ववि‌द्यालय अधिनियम 1996 और यूजीसी क़ानून संस्थान को राज्य सरकार के हस्तक्षेप से बचाने के लिए बनाए गए थे। इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि चांसलर,  विश्वविद्यालय में एक महत्वपूर्ण भूमिका रखता है और वह  स्वतंत्र रूप से कार्य करता है। वह  अपनी विवेकाधीन शक्तियों के प्रयोग में राज्य सरकार की सलाह से बाध्य नहीं है।


सर्वोच्च  न्यायालय के इस आदेश के बाद राज्यपाल ने  प्रदेश सरकार  द्वारा अन्य विश्वविद्यालयों में नियुक्त कुलपति की नियुक्ति भी निरस्त कर दी। इतना ही नहीं केरल उच्च न्यायालय ने भी  केरल यूनिवर्सिटी ऑफ फिशरीज एंड ओशियन स्टडीज के कुलपति के रूप में डॉ रिजी जॉन की नियुक्ति को रद्द कर दिया। अदालत ने नियुक्ति को अवैध करार देते हुए कहा कि इस प्रक्रिया में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा निर्धारित दिशा निर्देशों का उल्लंघन किया गया। यूजीसी शिक्षा मंत्रालय के तहत एक वैधानिक निकाय है जो देश भर में उच्च शिक्षा संस्थानों के कामकाज की देखरेख करता है।


लगता  है कि केरल के मुख्मंत्री और  सत्ताधारी वामपंथी  दल इस सब से नाराज है। विश्वविद्यालयों में  उनके सदस्य  कुलपति नहीं बन पा रहे,इससे  वे गुस्से में हैं। वे  इसके लिए राज्यपाल आरिफ मुहम्मद खां  को जिम्मेदार मानते हैं।उनका आरोप  है कि राज्यपाल विश्वविद्यालयों का भगवाकरण  कर रहे हैं। इसीका वह विरोध कर रहे है। राज्यपाल को काले झंडे दिखा रहे हैं।


केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के काफिले पर राजधानी तिरुवनंतपुरम में कम्युनिस्ट छात्र संगठन ‘स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया’ के हमले के बारे में हमले  से पहले राज्य खुफिया विभाग राज्यपाल ने तीन चेतावनियाँ जारी की थीं।ये चेतावनियाँ 24 घंटे के अंतराल में जारी की गई थी। इसमें काले झंडे वाले प्रदर्शन और राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के खिलाफ संभावित हमले की चेतावनी दी गई। यही नहीं, सोमवार 11 दिसंबर, 2023 दोपहर को जारी आखिरी रिपोर्ट में विरोध प्रदर्शन के संभावित जगहों का भी जिक्र किया गया। स्टेट इंटेलिजेंस ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया गया था कि राज्यपाल को अतिरिक्त सुरक्षा दी जानी चाहिए, लेकिन पुलिस के आला अधिकारियों ने इसे नजरअंदाज कर दिया था।इसके अलावा, खुफिया विभाग को पता चला कि राज्यपाल का ट्रैवल रूट शहर के पुलिस आयुक्त को गुप्त रखने के निर्देश दिए गए थे। खुफिया विभाग का दावा है कि पुलिस एसोसिएशन के लीडर ने इसे सोमवार सुबह एसएफआई (SFI)को लीक कर दिया  । पहली खुफिया रिपोर्ट में सोमवार को सिफारिश की गई कि राज्यपाल के लिए हवाई अड्डे तक जाने के लिए नियमित रास्ते के इतर एक और रास्ता भी तय किया जाना चाहिए। रविवार शाम को सिटी पुलिस कमिश्नर ने इसे गुप्त रखने के लिए ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारियों को वायरलेस संदेश भेजा था।सोमवार सुबह दूसरी इंटेलिजेंस रिपोर्ट में विरोध तेज होने की तरफ भी इशारा किया गया था। दोपहर में दी गई तीसरी रिपोर्ट में खुफिया एजेंसी ने यह भी बताया था कि पलायम अंडरपास और पेट्टा सहित तीन जगहों पर विरोध प्रदर्शन की संभावना हैं। इसके साथ ही यह सुझाव दिया गया कि राज्यपाल की सुरक्षा चाक-चौबंद रखने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया जाना चाहिए। खुफिया विभाग का कहना है कि पुलिस अधिकारियों ने रिपोर्ट के मुताबिक न कोई सावधानी बरती और न ही अतिरिक्त सुरक्षा उपाय किए।


इस प्रकरण में कांग्रेस नेता शशि थरूर ने केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान की कार पर एसएफआई के कार्यकर्ताओं के कथित हमले को लेकर मंगलवार को राज्य की एलडीएफ नीत सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि कम्युनिस्ट शासन में पुलिस सत्तारूढ़ दल की ज्यादतियों में सहभागी बनी हुई है।केरल के तिरुवनंतपुरम से सांसद ने कहा, ‘‘कम्युनिस्ट शासन के तहत पुलिस अराजकता की एजेंट रही है, सत्तारूढ़ पार्टी की सबसे भीषण ज्यादतियों में शामिल रही है। उन्होंने राज्यपाल पर हमले की अनुमति दी, जबकि मुख्यमंत्री के खिलाफ शांतिपूर्ण छात्र प्रदर्शनकारियों के साथ दुर्व्यवहार की अनुमति दी। शर्मनाक।’’केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री वी. मुरलीधरन ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि केरल में कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई है।


उधर गवर्नर आरिफ मुहम्मद खान ने सार्वजनिक तौर से ऐलान किया कि राज्य में कानून-व्यवस्था के हालात खराब हो गए हैं। राज्यपाल  आरिफ मुहम्मद खान ने कहा,“वे नाराज हैं क्योंकि मुख्य सचिव द्वारा केरल उच्च न्यायालय के समक्ष एक हलफनामे में वित्तीय स्थिति के बारे में बताए जाने के बाद, मैंने इस पर एक रिपोर्ट मांगी है। मुख्यमंत्री को यह कहते हुए सुना गया कि सरकार को राज्यपाल द्वारा पूछे गए सभी सवालों का जवाब देने की जरूरत नहीं है। किसी सीएम ने कभी ऐसी बात नहीं कही। खान का कहना  है कि ,“केरल में, संवैधानिक मशीनरी का पतन शुरू हो गया है।


गवर्नर के विरूद्ध  प्रदर्शन ,गवर्नर के विरूद्ध प्रदर्शन हमलावरों का उनकी कार तक पंहुचना ,गवर्नर की  कार रोकना  और कार के शीशे पीटना गंभीरतम मामला है।गवर्नर यह भी कहते हैं कि हमलावर पुलिस की गाड़ियों  से आए  उनकी कार को रोका। उनके कार से उतरने  पर पुलिस के वाहनों से भाग  गए। यह भी  सूचनाएं  हैं कि राज्यपाल के रूट की जानकारी एक पुलिस एसोसिएशन के पदाधिकारी से प्रदर्शनकारियों का पहुंची ।  वैकल्पिक मार्ग से जाने  की सलाह पर भी ध्यान नही दिया गया ।केंद्र को चाहिए कि पूरे मामले का गंभीरता से ले। गवर्नर आरिफ मुहम्मद खान की सुरक्षा  सुनिश्चित करे।  इस पूरे प्रकरण की केंद्रीय न्यायिक आयोग  से जांच कराए।आयोग से  एक माह में रिपोर्ट  से और आयोग द्वारा दिए सुझाव पर  कार्र्वाई  सुनिश्चित करे।  राज्यपाल की सुरक्षा की चूक के जिम्मेदार पर भी कठोर  कार्रवाई  हो।   


अशोक मधुप


(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं)