Monday, September 11, 2023

हिंदुस्तानी गजल से मशहूर हुए दुष्यंत कुमार

 आज एक सिंतबर    हिंदी साहित्यकार −गजलकार दुष्यंत कुमार का जन्म दिन  है।  बिजनौर के राजपुर नवादा गांव में एक सिंतबर 1933 में जन्मे दुष्यंत कुमार का मात्र 43 वर्ष की आयु में 30 दिसंबर 1975 को भोपाल में  उनका निधन हुआ।

हिंदी साहित्यकार −गजलकार दुष्यंत कुमार   हिंदी गजल के लिए जाने जाते हैं। वे हिंदी गजल के लिए विख्यात है किंतु उन्हें यह ख्याति हिंदी गजलों के लिए नहीं ,

हिंदुस्तानी गजलों के लिए मिली। संसद से  सड़क तब मशहूर हुए उनके शेर हिंदुस्तानी हिंदी में हैं।  हिंदुस्तानी हिंदी में  उन्होंने सभी प्रचलित शब्दों को इस्तमाल किया। शब्दों को प्रचलित रूप में इस्तमाल किया।

वे अपनी पुस्तक “साए में धूप“ की भूमिका में खुद कहते हैं “ ग़ज़लों को भूमिका की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए; लेकिन,एक कैफ़ियत इनकी भाषा के बारे में ज़रूरी है। कुछ उर्दू—दाँ दोस्तों ने कुछ उर्दू शब्दों के प्रयोग पर एतराज़ किया है .उनका कहना है कि शब्द ‘शहर’ नहीं ‘शह्र’ होता है, ’वज़न’ नहीं ‘वज़्न’ होता है।
—कि मैं उर्दू नहीं जानता, लेकिन इन शब्दों का प्रयोग यहाँ अज्ञानतावश नहीं, जानबूझकर किया गया है।

यह कोई मुश्किल काम नहीं था कि ’शहर’ की जगह ‘नगर’ लिखकर इस दोष से मुक्ति पा लूँ,किंतु मैंने उर्दू शब्दों को उस रूप में इस्तेमाल किया है,जिस रूप में वे हिन्दी में

घुल−मिल गये हैं। उर्दू का ‘शह्र’ हिन्दी में ‘शहर’ लिखा और बोला जाता है ।ठीक उसी तरह जैसे हिन्दी का ‘ब्राह्मण’ उर्दू में ‘बिरहमन’ होगया है और ‘ॠतु’ ‘रुत’ हो गई है।
—कि उर्दू और हिन्दी अपने—अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के बीच आती हैं तो उनमें फ़र्क़ कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। मेरी नीयत और कोशिश यही रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज़्यादा से ज़्यादा क़रीब ला सकूँ। इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में लिखी गई हैं जिसे मैं बोलता हूँ।
—कि ग़ज़ल की विधा बहुत पुरानी,किंतु विधा है,जिसमें बड़े—बड़े उर्दू महारथियों ने काव्य—रचना की है।

हिन्दी में भी महाकवि निराला से लेकर आज के गीतकारों और नये कवियों तक अनेक कवियों ने इस विधा को आज़माया है।”
ग़ज़ल पर्शियन और अरबी  से उर्दू में आयी। ग़ज़ल का मतलब हैं औरतों  से अथवा औरतों के बारे में बातचीत करना। यह भी कहा जा सकता हैं कि ग़ज़ल का सर्वसाधारण अर्थ हैं माशूक से बातचीत का माध्यम। उर्दू के  साहित्यकार  स्वर्गीय रघुपति सहाय ‘फिराक’ गोरखपुरी  ने ग़ज़ल की  भावपूर्ण परिभाषा लिखी हैं।  कहते हैं कि, ‘जब कोई शिकारीजंगल में कुत्तों के साथ हिरन का

पीछा करता हैं और हिरन भागते −भागते किसी ऐसी झाड़ी में फंस जाता हैं जहां से वह निकल नहीं सकता,

उस समय उसके कंठ से एक दर्द भरी आवाज़ निकलती हैं। उसी करूण स्वर को ग़ज़ल कहते हैं। इसीलिये विवशता का दिव्यतम रूप में प्रगट होना, स्वर का करूणतम हो जाना ही ग़ज़ल का आदर्श हैं’।

दुष्यंत  की गजलों की खूबी है साधारण बोलचाल के शब्दों का प्रयोग,  हिंदी− उर्दू के घुले मिले शब्दों का प्रयोग । चुटीले व्यंग  उनकी गजल की खूबी है।वे व्यवस्था और समाज पर चोट करते हैं। ये ही उन्हें सीधे  आम आदमी के दिल तक ले जाती है। उनकी

ये शैली उन्हें अन्य कवियों से अलग और लोकप्रिय करती है।
आम आदमी और व्यवस्था पर चोट करने वाले उनके शेर, व्यवस्था पर चोट करते उनके शेर  सड़कों से  संसद गूंजतें है।1

शायद दुष्यंत कुमार अकेले ऐसे साहित्यकार होंगे , जिसके शेर सबसे ज्यादा बार संसद में पढ़े गए हों। सभाओं में नेताओं ने उनके शेर सुनाकर व्यवस्था पर चोट की हो।सरकार को जगाने और जनचेतना का कार्य किया हो।उन्होंने हिंदी गजल भी लिखी, पर वह इतनी प्रसिद्धि  नही पा सकी, जितनी हिंदुस्तानी हिंदी में लिखी  गजल लोकप्रिस हुईं।

उनके गुनगुनाए  जाने वाले उनके कुछ  हिंदुस्तानी हिंदी के शेर हैं−

−वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है, 
माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है। 

−रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया, 
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारों।−कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता ,
एक पत्थर तो तबीअ’त से उछालो यारों।

− यहां तो  सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसतें है,खुदा  जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा,
−गूँगे निकल पड़े हैं ज़बाँ की तलाश में ,
सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिए।−पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं,
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं  ।आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है ,
पत्थरों में चीख़ हरगिज़ कारगर होगी नहीं।
इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो,
धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं ।

−सिर से सीने में कभी पेट से पाँव में कभी ,
इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है ।

−ये   जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा,मै सज्दे में नही था, आपको धोखा  हुआ होगा।

−तुमने इस तालाब में रोहू पकड़ने के लिए,

छोटी—छोटी मछलियाँ चारा बनाकर फेंक दीं।

−हम ही खा लेते सुबह को भूख लगती है बहुत

तुमने बासी रोटियाँ नाहक उठा कर फेंक दीं।

गजलहो गई है पीर पर्वत  सी पिंघलनी चाहिए,अब हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

भारत की बड़ी कामयाबी है'जी20' शिखर सम्मलेन की सफलता

 भारत की बड़ी कामयाबी है'जी20' शिखर सम्मलेन  की सफलता

 शंकाओं  और आशकांओं  के बीच 'जी20' शिखर सम्मलेन  सफलता के साथ  संपन्न  हो गया। जी20 में 'नई दिल्ली डिक्लेरेशन' का स्वीकार होना, यह कूटनीतिक मोर्चे पर भारत की बड़ी जीत है।  जी 20 में सभी महाशक्तियां शामिल हैं। उनकी मौजूदगी में भारत द्वारा  सहमति का रास्ता निकालना भारत की  बड़ी कामयाबी है। अफ्रीकन यूनियन को जी20 में शामिल कराना भी भारत की बडी सफलता  है  ।अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और जापान ने भी 'एयू' को स्थायी सदस्य बनाने के मामले में बाधा खड़ी नहीं की।भारत की छवि खराब करने का प्रयास कर रहे आंतकवादी दिल्ली की सुदृढ  सुरक्षा देख कुछ नही कर पाए। मेट्रो  स्टेशन पर रात के अंधेरे में खालिस्तान के समर्थन में चोरी छिपे कुछ नारे ही लिखे  जा सके।  मुंबई  और दिल्ली  की संसद में घुंसकर हमला  करने  वाले  आतंकी अब ऐसी घटना  करने  की सोच भी  नही पा रहे।  शनिवार को 'जी20' शिखर सम्मलेन के पहले दिन जब 'नई दिल्ली डिक्लेरेशन' के स्वीकार होने की घोषणा हुई, तो सम्मेलन को कवर करने आए  सारे पत्रकार आश्चर्य चकित रह गए। एक− दो ने तो  यहां तक कह दिया  कि अब दूसरे दिन  के कायर्क्रम कवर के लिए रूकना बेकार है।  किसी को यह उम्मीद नही थी कि घोषणापत्र सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया जाएगा। जी20 घोषणापत्र   की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि इसके सभी 83 पैराग्राफ चीन और रूस के साथ 100 प्रतिशत सर्वसम्मति से पारित किए गए थे। यह पहली दफा था कि घोषणा में कोई नोट या अध्यक्ष का सारांश शामिल नहीं था।विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने पत्रकारों का बताया कि 'गत वर्ष  इंडोनेशिया में हुए सम्मेलन में अफ्रीकन यूनियन ने पीएम मोदी से आग्रह किया था कि उसे भी समूह का सदस्य बनाया जाए। इस पर पीएम मोदी ने उन्हें गारंटी दी थी कि वे अफ़्रीकन यूनियन को जी20 का सदस्य बनवाएंगे। अब पीएम मोदी ने वह गारंटी पूरी कर दी है। जानकारों का कहना है, 'एयू' को जी20 की स्थायी सदस्यता दिलाना आसान नहीं था। इस बाबत रूस और चीन का रूख कुछ अलग था। चीन को 'जी20' का विस्तार पसंद नहीं था। वजह, इससे ग्लोबल साउथ में उसका कद प्रभावित होता है। करीब एक दशक से चीन का फोकस ऐसे देशों पर रहा है जो अमेरिका, ब्रिटेन या भारत के ज्यादा करीब नहीं हैं। ऐसे देशों को चीन उन समूहों का सदस्य बनवाने की कोशिश कर रहा है, जो उसके प्रभाव में हैं। भारत ने यहीं पर कूटनीतिक दांव चला और एयू (अफ़्रीकन यूनियन )को जी20 का सदस्य बनवा दिया। चीन का प्रयास था कि वह अफ्रीकी संघ के देशों में भारी निवेश के माध्यम से अपने आर्थिक लक्ष्यों की पूर्ति करे।अब इन देशों के जी20 का सदस्य बनने पर  अब चीन उन देशों का शोषण करने की साजिश में सफल नहीं हो सकेगा। एयू के 55 देशों के प्राकृतिक संसाधन, चीन के प्रभाव में आने से बच जाएंगे। आंशका  थी कि रूस – यूक्रेन युद्ध के मुद्दे पर   सर्व सम्मत निर्णय  नही हो सकेगा। अमेरिका  और यूरोपियन देश  चाहेंगे,कि यूक्रेन   हमले के लिए रूस को जिम्मेदार माना  जाए। इसके लिए उसकी  निंदा की जाएं।रूस  और चीन का रूख  इसके विपरीत होगा। भारत भी नही चाहता  कि उसकी भूमि से उसके परंपरागत मित्र  के विरूद्ध कोई  निदां या उन्य कोई प्रस्ताव पारित न हो। भारत ने घोषणापत्र पर सर्व समर्थन बनाने के लिए पहल से ही काम शुरू  कर दिया था।   उसके राजनयिक इस पर सहमति बनाने में  लगे थे। साझा घोषणा पत्र पर सभी देशों की सहमति इसलिए खास है, क्योंकि नवंबर 2022 में इंडोनेशिया समिट में जारी घोषणा पत्र में रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर सदस्य देशों के बीच सहमति नहीं बन पाई थी। तब रूस और चीन ने अपने आप को युद्ध के बारे में की गई टिप्पणियों से अलग कर लिया था। तब घोषणा पत्र के साथ ही इन देशों की लिखित असहमति शामिल की गई थी।डिक्लेरेशन पास होने के बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था- सभी देशों ने नई दिल्ली घोषणा पत्र मंजूर किया। उन्होंने माना कि G20 राजनीतिक मुद्दों को डिस्कस करने का प्लेटफॉर्म नहीं है। लिहाजा अर्थव्यवस्था से जुड़े अहम मुद्दों को डिस्कस किया गया। 'नई दिल्ली डिक्लेरेशन' की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि इसके सभी 83 पैराग्राफ चीन और रूस के साथ 100 प्रतिशत सर्वसम्मति से पारित किए गए थे। यह पहली दफा था कि घोषणा में कोई नोट या अध्यक्ष का सारांश शामिल नहीं था।घोषणापत्र के नौवें पहरे में लिखा था, हम इस बात की पुष्टि करते हैं कि जी20, अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग के लिए एक प्रमुख मंच है। यह समूह भू-राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दों को हल करने का मंच नहीं है।हालाँकि हम स्वीकार करते हैं कि इन मुद्दों का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर महत्वपूर्ण परिणाम हो सकता है। भारत ने यह बात कह कर चीन और रूस, दोनों को संदेश दे दिया। हालांकि चीन का कहीं नाम नहीं लिया। 'नई दिल्ली डिक्लेरेशन' के 13वें पहरे में लिखा है, हम सभी राज्यों से क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता को, अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के मुताबिक, बनाए रखने की अपील करते हैं। मानवीय कानून, शांति और स्थिरता की रक्षा करने वाली बहुपक्षीय प्रणाली सहित अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों को बनाए रखने का आह्वान करते हैं। विभिन्न देशों के मध्य संघर्षों का शांतिपूर्ण समाधान और संकटों के हल के हल के लिए प्रयास करने के साथ ही कूटनीति और संवाद महत्वपूर्ण हैं। हम वैश्विक अर्थव्यवस्था पर युद्ध के प्रतिकूल प्रभाव को संबोधित करने के अपने प्रयास में एकजुट होंगे। यूक्रेन में व्यापक एवं न्यायसंगत और टिकाऊ शांति का समर्थन करने वाली सभी प्रासंगिक और रचनात्मक पहलों का स्वागत करेंगे। बशर्ते, ये सभी पहल, संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सभी उद्देश्यों और सिद्धांतों को कायम रखें। एक पृथ्वी, एक परिवार और एक भविष्य की भावना से राष्ट्रों के बीच शांतिपूर्ण, मैत्रीपूर्ण और अच्छे पड़ोसी संबंधों को बढ़ावा देना होगा। भारत ने ऐसा कर 'रूस और यूक्रेन' के लिए एक संदेश और जी20 का स्टैंड क्लीयर करदिया।  

भारत की जी20 अध्यक्षता की विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा ने जमकर तारीफ की है। बांगा ने कहा कि भारत ने जी20 की अध्यक्षता में दुनिया के लिए एक नया आयाम तय किया है। उन्होंने इस बात की भी सराहना की कि भारत ने जी20 घोषणापत्र पर सभी देशों की आम सहमति आसानी से बना ली।एक न्यूज एजेंसी  से बात करते हुए बंगा ने इस बात पर जोर दिया कि चुनौतियां हमेशा मौजूद रहेंगी, लेकिन भारत ने आम सहमति बनाकर दुनिया को रास्ता दिखाया है। बंगा ने कहा कि हर देश अपना फायदा देखता है, लेकिन मैंने इस सम्मेलन में जो मूड देखा, उससे मैं आशावादी हूं। विश्व बैंक अध्यक्ष ने कहा कि यहां हर देश अपने राष्ट्रीय हितों का ध्यान तो दे रहा था, लेकिन दूसरे के विचारों को भी सुन रहा था। जी20 शिखर सम्मेलन में बारे में ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने शनिवार को 'जी20' की बैठक को सफल करार दिया है। दोनों राष्ट्रों के बीच व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (सीईसीए) को लेकर सार्थक नीति बनी है। गत मई में पीएम मोदी, ऑस्ट्रेलिया गए थे। तब भी दोनों देशों ने 'निवेश' की संभावनाएं तलाशी थी। 

भारत-मध्य पूर्व-यूरोप शिपिंग और रेलवे कनेक्टिविटी कॉरिडोर की घोषणा को एक बड़ी बात करार देते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा, अगले दशक में, भागीदार देश निम्न-मध्यम आय वाले देशों में बुनियादी ढांचे की कमी को दूर करेंगे। बाइडेन ने कहा, मैं प्रधानमंत्री मोदी को धन्यवाद देना चाहता हूं। एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य, यही इस जी20 शिखर सम्मेलन का फोकस है। पार्टनरशिप फॉर ग्लोबल इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड इन्वेस्टमेंट (पीजीआईआई) और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा, भारत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, यूरोपीय संघ, फ्रांस, इटली, जर्मनी व संयुक्त राज्य अमेरिका से जुड़े कनेक्टिविटी एवं बुनियादी ढांचे के विकास में सहयोग पर एक ऐतिहासिक पहल है। 

सउदी अरब के क्राउन प्रिंस सलमान ने इकानॉमिक कॉरिडोर की पहल के लिए इसके लिए काम करने वालों को धन्यवाद दिया।यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष, प्रेसीडेंट उर्सुला वॉन डेर लेन ने कहा, अर्थव्यवस्थाओं के इन्फ्रास्ट्रक्चर में इनवेस्टमेंट मिडिल इनकम वाले देशों की जरूरत है। इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकॉनामिक कॉरिडोर, ऐतिहासिक है। यह इंडिया, अरेबियन गल्फ और यूरोप के बीच सीधा संपर्क बनाने वाला है। इसके चलते भारत और यूरोप के बीच व्यापार में 40 प्रतिशत की तेजी आएगी। यह महाद्वीपों और सभ्यताओं के बीच ग्रीन एंड डिजिटल ब्रिज होगा। ट्रांस अफ्रीकन कॉरिडोर, यह घोषणा भी बड़े स्तर पर इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश की पहल है। इसका लाभ सभी सदस्यों को होगा। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा, ये एक बहुत महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट है। सभी सदस्य देश, लंबी अवधि के लिए निवेश करने के प्रतिबद्ध हैं। जर्मनी के चांसलर ओलाफ शोल्ज ने भी इसे एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट करार दिया है। इसमें जर्मनी 3500 मिलियन यूरो का वर्ल्ड बैंक के साथ अतिरिक्त निवेश करेगा। 

पीएम मोदी ने समुद्र में केबल के डिजाइन, निर्माण, बिछाने और रखरखाव में क्वाड की सामूहिक विशेषज्ञता का लाभ उठाने के लिए 'केबल संचार-संपर्क और सहनीयता के लिए साझेदारी पर बल दिया था। राजनेताओं ने भारत-प्रशांत क्षेत्र में विकास के बारे में महत्वपूर्ण बातचीत की। एक मुक्त, खुले और समावेशी भारत-प्रशांत क्षेत्र के प्रति अपने दृष्टिकोण के तहत, इन नेताओं ने संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांतों को बनाए रखने के महत्व को दोहराया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा- हमें चुनौतीपूर्ण समय में अध्यक्षता मिली। G20 का साझा घोषणा पत्र 37 पेज का है। इसमें 83 पैराग्राफ हैं। यहां मुख्य प्रस्तावों यह हैं−सभी देश सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल पर काम करेंगे। भारत की पहल पर वन फ्यूचर अलायंस बनाया जाएगा।प्रस्ताव में कहा गया है कि सभी देशों को यूएन चार्टर के नियमों के मुताबिक काम करना चाहिए।बायो फ्यूल अलायंस बनाया जाएगा। इसके फाउंडिंग मेंबर भारत, अमेरिका और ब्राजील होंगे।एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य पर जोर दिया जाएगा।मल्टीलेट्रल डेवलपमेंट बैंकिंग को मजबूती दी जाएगी।ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं पर फोकस किया जाएगा।क्रिप्टोकरेंसी पर ग्लोबल पॉलिसी बनाई जाएगी।कर्ज को लेकर बेहतर व्यवस्था बनाने पर भारत ने कॉमन फ्रेमवर्क बनवाने की बात पर जोर दिया है।ग्रीन और लो कार्बन एनर्जी टेक्नोलॉजी पर काम किया जाएगा।सभी देशों ने आतंकवाद के हर रूप की आलोचना की है। चांद के  दक्षिण ध्रुव पर   कामयाब  लैंडिग और भारत का अंतरिक्ष यान के  कामयाबी के साथ  प्रेक्षण के बाद जी20  शिखर सम्मेलन की सफलता भारत की बड़ी कामयाबी है।कभी  सांप और सपेरों का देश कहलाने वाला भारत आज दुनिया के चंद प्रमुख देशों की लाइन में आकर खड़ा  हो गया है। पहले नारा दिया गया था इंडियन  एंड डॉग्स  आर नाट अलाउट।  आज सब बदल गया।आज भारत दुनिया  का नेतृत्व करने की हालत में है। इस भारत की बडी कामयाबी कहा जाएगा कि भारत द्वारा कही बात अब दुनिया में  गंभीरता के साथ सुनी जाती है।

अशोक मधुप

Sunday, September 3, 2023

बिजनौर के इतिहास से गायब हैं क्रांति की मशाल जलाने वाले

 बिजनौर के इतिहास से गायब हैं क्रांति  की मशाल जलाने वाले

अशोक मधुप

बिजनौर जनपद में 1857 की क्राति में  प्रथम आहूति देने वाले जेल के राम स्वरूप जमादार को कोई जानता  भी नहीं।पूरे देश में शुरू हुई 1857 की क्रांति दस मई को मेरठ से  शुरू हुई।नौ मई 1857 को चर्बी लगी कारतूस का इस्तेमाल करने से मना करने वाले 85 सिपाहियों का कोर्ट मार्शल कर मेरठ की विक्टोरिया पार्क स्थित जेल में बंद कर दिया था। सैनिकों पर हुई इस कार्रवाई और अपमान ने क्रांति को जन्म दे दिया। 10 मई को शाम होते-होते अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह भड़क उठा। आम जनता और पुलिस ने जहां सदर बाजार में मोर्चा संभाला। उधर उसी समय 11वीं व 20वीं पैदल सेना के भारतीय सिपाही परेड ग्राउंड (अब रेस कोर्स) में इकट्ठे हुए और वहीं से अंग्रेजी सिपाहियों और अफसरों पर हमला बोल दिया। पहली गोली 20वीं पैदल सेना के सिपाही ने 11वीं पैदल सेना के सीओ कर्नल जार्ज फिनिश को रेस कोर्स के मुख्य द्वार पर मारी थी। इस बीच थर्ड कैवेलरी के जवान अश्वों पर सवार होकर अपने उन 85 सिपाहियों को बंदी मुक्त कराने विक्टोरिया पार्क स्थित जेल पहुंच गए, जिन्हें कोर्ट मार्शल के तहत सजा दी गई थी। इस तरह से रात होते-होते क्रांति पूरे शहर में फैल गई और सभी परतापुर के पास गांव रिठानी में एकजुट हुए और दिल्ली की ओर कूच कर गए। अंग्रेजों के खिलाफ मेरठ से शुरू हुए इस विद्रोह की आग पूरे देश में फैल गई। सर सैयद अपनी पुस्तक सरकशे जिला बिजनौर में बिजनौर में  1857 के पूरे घटनाक्रम का तारीख अनुसार वर्णन करते हैं।वह 1857 के  विद्रोह के समय बिजनौर में सदर अमीन थे।  उनकी यह पुस्तक उनकी डायरी है। इसमें उन्होंने तरीख अनुसार घटनांए दर्ज की   हैं।

वे सरकशे जिला बिजनौर में कहते हैं कि मेरठ की दस तारीख के विद्रोह की सूचना 12 मई में बिजनौर पंहुची।पर कोई विशेष घटना नही हुई। 16 मई को बिजनौर थाने के अंतर्गत आने वाले झाल और उलेढ़ा  गांव के बीच देवीदास बजाज को लूट लिया गया। मेरठ की क्रांति की सूचना मिलते ही अधिकारियों हर हालत से निपटने के  लिए तैयारी शुरू कर दी थीं1 20 मई को सेपर और माइनर कंपनी के 300 जवान विद्रोह कर नजीबाबाद पंहुचे। वहां वे नवाब महमूद से मिले। वे  चाहते थे कि नवाब उन्हें संरक्षण दं किंतु नवाब ने ने उन्हें बिजनौर जाकर उत्पात करनेके  के लिए कहा। किंतु ये नगीना  पंहुच गए और वहां लूटमार की।तहसील में रखा खजाना  लूट लिया।

धामपुर के रईस हरसुख लाल  लोहिया की बेटी की बारात आई हुई थी।उसके लिए बढ़िया खाना और मिठाई बन रही थीं।हरसुख लाल लोहिया जी नगीना से मुरादाबाद जा रहे इन विद्रोही जवानों का अपने घर ले आए।  सबको पेटभर कर खाना और मिठाई खिलाईं। ये देख धामपुर के लोग भी एकत्र हो गए।  जिससे जो बन पड़ा, देकर इन जवानों की मदद की।   

इधर बिजनौर के जेल के जमादार रामस्वरूप ने जेल का दरवाजा खोल दिया।लगभग एक बजे के आसपास अधिकारियों को जेल से फायर की आवाज सुनाई दी।अधिकारी जवानों के साथ  जेल की और भागे। इन्हें डर था कि जेल से निकले बदमाश स्थानीय शरारती लोगों को लेकर लूटमार न शुरू कर दें। किंतु ये बदमाश  जेल से निकल कर जंगल की और भाग  लिए।अधिकारियों ने इनका पीछा किया।  गोली लगने से कई  कैदी मारे गए और घायल हुए।इस समय नदियां उफान पर भी। कुछ भागते कैदी लहपी नदी के बहाव में  बह गए।

लहपी नदी मंडावली और रावली क्षेत्र में  बहने वाली गंगा की एक सहयोगी नदी थी।अब यह लुप्त हो गई। कुछ पुराने लोग ही  इसके बारे में    

जानते हैं। काफी कैदी पकड़ लिए गए।पकड़े जाने वालों को जेल में लाकर बंद कर दिया गया।

सर सैयद अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि नवाब महमूद ने विद्रोही सेपर  और माइनर कंपनी के जवानों से बिजनौर जाकर हंगामा करने का कहा था, किंतु वे  बिजनौर न आकर नगीना धामपुर होते मुरादाबाद  चले गए1पहले लगा कि शायद रामस्वरूप ने स्थानीय  बदमाशों के हमले के डर से जेल का फाटक खेल दिया।किंतु हो सकता है कि इसे इन विद्रोही जवानों के बिजनौर आने की सूचना मिल गई हो,यह रामस्वरूप  भी इसी सैनिक कंपनी का जमादार था।इसलिए उसने ऐसा किया हो। सर सैयद  लिखते हैं कि नवाब महमूद को 6−7 जून की रात में जिले का चार्ज देकर अंग्रेज अधिकारी अपने परिवार के साथ  रूडकी चले गए।जिले का चार्ज मिलने के बाद से नवाब के दरबार में रामस्वरूप का सम्मान बहुत ही बढ़ गया।उनकी अदालत में उसकी रोज आवाजाही होने लगी।नवाब महमूद को जिले की बागडोर मिलने के बाद रामस्वरूप हवलदार ने नवाब के लिए सैनिकों की भर्ती शुरू कर दी।

रामस्वरूप ने अपने द्वारा भर्ती किये गए सिपाही बिजनौर में बांके राय के घर के आसपास तैनात कर दिए गए।बाद में रामस्वरूप ने इन्हें बहुत प्रताड़ित किया।उनके भाई बिहारी लाल को परेशान किया तथा कुछ रूपया भी वसूला।

सर सैयद की डायरी में रामस्वरूप  जमादार का एक दो जगह और जिक्र है।इसके बाद से वह गायब है।

इतिहास के जानकारों और खोज करने वाले आजादी के इन नायकों का पता करने का कोई प्रयास नही किया।किसी ने यह जानना गंवारा नहीं किया कि रामस्वरूप कौन था। कहां का रहने वाला था।  इसके परिवार में  कौन −कौन था।राम स्वरूप का क्या हुआ।इतना महत्वपूर्ण व्यक्ति इतिहास की अंधेरी गलियों में  गायब हो गया। 

जिले में अंग्रेज जब दुबारा  आया तो  उनसे जमकर जुल्म किया।नवाब महमूद के साथी के संदेह में जाने कितनों को सरेराह गोलियों से भून दिया गया।फांसी भी  दीं गईं।कितने लोग मरे , इस बारे में सर सैयद चुप हैं।रामस्वरूप का क्या हुआ,वह नही बताते।

जानी मानी लेखिका कुरतुल एन हैदर अपनी किताब कारे जहां दराज है ,में कहती हैं कि आजादी की जंग के असफल होने के बाद 27 हजार मुसलमानों को फांसी हुई। शेष को काले पानी की सजा हुई। जिला बिजनौर के बागियों की एक लाख तिरेसठ हजार एकड़ जमीन सरकार के हक में जब्त हुई।जब्त जमीन का बड़ा हिस्सा वफादर चौधरियों को अता किया गया।शेरकोट और हल्दौर के चौधरी साहेबान को राजा की उपाधि दी गई।ताजपुर  के चौधरी साहब का अमीर खां  पिंडारी के विरूद्ध सरकार की मदद करने में राय बहादुर की उपाधि से नवाजा  गया।सैयदों की साढ़े 15 हजार एकड़  जमीन सरकारी हक में जब्त हुई।दिल्ली की आजादी की लड़ाई में शामिल हुए मीर अहमद अली की जान बक्श दी गई किंतु उनकी पुशतैनी जमीन भी इस जब्त खुदा जमीन के साथ जब्त कर ली गई।  

वे कहती हैं कि 1857 की क्रांति के बाद जब बागियों की मिलकियतें जब्त हुईं तो चांदपुर के रहने वाले मीर सादिक अली और मीर रूस्तम अली रईसों का इलाका बगावत के जुर्म में सरकार ने जब्त कर लिया। यह इलाका सरकार ने सैयद अहमद (सरकशे बिजनौर के लेखक) को देना  चाहा किंतु उन्होंने लेने से मनाकर दिया।   1857  की आजादी की लड़ाई के बारे में जो कुछ सर सैयद से छूटा,  उसे कुरतुल एन हैदर ने अपनी पुस्तक में दर्ज किया। किंतु फिर भी सब कुछ अधूरा  सा है। जो कुछ है, वह न के बराबर।

अशोक मधुप





Wednesday, August 10, 2022

आजादी के अमृत महोत्सव से गायब है पूण्य भूमि बिजनौर


बिजनौर के आजादी के अमृत महोत्सव पर चिंगारी सांध्य में मेरा लेख-
आजादी के अमृत महोत्सव से गायब है पूण्य भूमि बिजनौर
अशोक मधुप
हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। क्रांतिकारियों का स्मरण कर रहे हैं, किंतु उन जगह की किसी को याद नहीं, जहां क्रांतिकारियों को फांसी दी गई थी। उनके शहीद स्थल किसी को याद नहीं।इन शहीदस्थल पर जाकर श्रद्धासुमन अर्पित करने का किसी को ख्याल नहीं।गुलामी के प्रतीक स्थानों के नाम बदलने की आजतक किसी ने नहीं सोची। बिजनौर का मुहल्ला पामरगंज अंग्रेज डिप्टी कलेक्टर का नाम बसा है। इसका नाम बदलकर जिले के किसी क्रांतिकारी के नाम पर हो सकता है।
1857 की क्रांति की सबसे बड़ी गवाह बिजनौर जिलाधिकारी की पुरानी कोठी है।यहीं अंग्रेज कलेक्टर अलेक्जेंडर शेक्सपीयर ने छह –सात जून की रात में नजीबाबाद के नवाब महमूद को जिले का कार्य सौंपा था। इसके बाद जिले के अंग्रेज अधिकारी और उनके परिवार रूड़की के लिए रवाना हो गए।एक साल बाद जब अंग्रेज सेना के बूते फिर जिले में काबिज हुआ तो उसने बेइंतहां जुल्म किए। दिल्ली की सेना के कमांडर इन चीफ गवर्नर जनरल बख्त खान की पैदायश स्थल नजीबाबाद के नजीबुद्दौला के परिवार का महल में हुई थी। अंग्रेजों ने जनपद में दुबारा काबू आते ही इस महल को बारूद से तहस−नहस कर दिया था। अब तो महल के नाम पर यह मुहल्ला महल सराय है। महल के अगले भाग में पुलिस थाना बन गया। इस महल का गेट और कुछ हिस्सा ही शेष बचा है, बाकी कहीं−कहीं कोई टूटी फूटी दीवार दिखाई देती है। पत्थरगढ़ के किले को भी तोप से उड़ा दिया।
इसके बाद बिजनौर आकर अंग्रेजों ने बिजनौर कलेक्ट्रट के वट वृक्ष पर क्रांतिकारियों को फांसी दीं।पुराने लोग बताते आए हैं कि जनता में भय पैदा करने के लिए यहां कई−कई दिन इन क्रांतिकारियों के शव लटके रहे। इस वट वृक्ष को वकीलों के चैंबर बनाने के लिए प्रशासन ने 2012 में कटवा दिया।इसकी साइड का एक वट अभी भी मौजूद है।इस जगह पर प्रशासन की ओर से कोई कार्यक्रम नहीं होता।
बिजनौर शहर का मंडी पामर गंज भी एक ऐसी ही पूण्य भूमि है। मंडी पामर गंज बिजनौर शहर की अनाज मंडी हैं। यहीं क्रांतिकारियों को सामूहिक फांसी दी गई।1857 में जनपद में तैनात रहे डिप्टी कलेक्टर जार्ज पामर के नाम पर इसका नाम रखा गया था। आज भी ये ही नाम चल रहा है किसी ने इस मुहल्ले का नाम बदलने का प्रयास नही किया। न किसी भाजपाई को इसके नाम बदलने की याद आई।हमें आजादी मिले लगभग 75 साल हो गए पर ये गुलामी की तख्ती अभी भी हमारे गले में लटकी है। यहां इन शहीदों की याद में कोई कार्यक्रम तो क्या होता किसी ने इसका नाम बदलने की आवाज नहीं उठाई ।
धामपुर के भामाशाह हरसुखराय लोहिया को खोजना भी किसी ने गंवारा नही किया।किसी ने उस महान आत्मा का पता करना भी गवांरा नही किया। किसी ने उनकी और उनके परिवार की खोज नही की। यह भी जानना गवांरा नही किया कि धामपुर के इस भामाशाह का क्याॽ
बरेली से मुरादाबाद जा रहे ब्रिटिश सेना के विद्रोही जवान रूड़की से विद्रोह कर बरेली जा रहे थे। इसी दिन धामपुर के रईस हरसुखराय लोहिया की बेटी की बारात आई हुई थी। उसके लिए उनकी कोठी पर खाना बन रहा था।
हरसुख राय लोहिया ने इन क्रांतिकारी जवानों को रोक लिया। बुलाकर अपने आवास पर ले गए। बारात के लिए तैयार किया गया भोजन इन्हें खिला दिया।कहा जाता है कि इस पूण्य कार्य में बारातियों का भी बड़ा सहयोग रहा।
सर सैयद अपनी पुस्तक सरकशे बिजनौर में इस घटना का जिक्र करते हुए कहते हैं कि हरसुख राय लोहिया से जवानों को शानदार भोजन और मिठाई खिलाई। उनके और धामपुरवासियों के व्यवहार से प्रसन्न इन जवानों ने धामपुर में कोई लूटपाट नहीं की। ये प्रसन्न होकर आगे गए।जबकि नगीना में इन्होंने तहसील से सरकारी खजाना और वहां के सपंन्न लोगों से लूटमार की थी।धामपुर में हरसुख राय लोहिया की स्मृति और सम्मान में कोई कार्यक्रम नही होता।
1943 में अंग्रेज भारत छोड़ो आदोलन के दौरान बापू महात्मा गांधी नगीना और धामपुर आए। उनकी यहां बड़ी सभांए हुई।पैजनियां में काकोरी कांड के फरार क्रांतिकारियों ने काफी दिन गुप्त प्रवास किया। नूरपुर में थाने पर तिंरगा फहराने का प्रयास करते आंदोलनकारियों पर पुलिस ने गाली चलाई ।
जिला सूचना विभाग की पुस्तक ‘स्वतंत्रता संग्राम के सैनिक’ के अनुसार 16 अगस्त 1942 को नूरपुर क्षेत्र के कार्यकर्ताओं ने अलग-अलग गांवों से जुलूस निकाला ।पुलिस ने फीना वाले जुलूस को नूरपुर से बाहर तितर −बितर करने की कोशिश की और लाठी चार्ज कर किया। जुलूस थोड़ा पीछे हट गया लेकिन थोड़ी देर बाद पूरा जुलूस नूरपुर धामपुर वाली पक्की सड़क पर थाने के पास जमा हो गया। जुलूस में दस से 15 हजार लोग थे । उनके हाथों में तिरंगे झंडे थे। सभी का उद्देश्य थाने पर शांतिपूर्वक तिरंगा लहराना था। दरोगा नूरपुर की जनता व आसपास के मुखिया चौकीदारों को साथ लेकर जुलूस को पीछे धकेलने की कोशिश की। भीड़ थाने पर झंडा फहराना चाहती थी। इससे अफरा तफरी मच गई। पुलिस ने भीड़ पर गोलियां बरसा दीं। तीन आदमी गोली लगने से गिर गए। गुनियापुर के परवीन सिंह गोली लगने से वहीं शहीद हो गए। रिक्खी सिंह ने जेल अस्पताल में आकर दम तोड़ा। मुंशीराम के पैर में गोली लगी। पुलिस ने उन्हें जेल में बंद कर दिया। फायरिंग के बाद जुलूस तितर −बितर हो गया और पुलिस का आतंक मच गया। पुलिस ने गांवों में लूट और लोगों से मारपीट शुरू कर दी। प्रदर्शन के मामले में 32 लोग गिरफ्तार किए गए। इन पर छह हजार रुपये सामूहिक जुर्माना हुआ और छह छह साल की कैद हुई। सेशन कोर्ट में अपील में 16 लोगों को बरी कर दिया गया और बाकी को दो दो साल की सजा हुई। बाद में केस हाईकोर्ट गया। इस बारे में उन्होंने अपने निर्णय में लिखा कि उनकी भुगती हुई सजा ही काफी है। 24 अप्रैल 1944 को सभी को रिहा कर दिया गया।
आजादी के बाद नूरपुर में इस घटना की स्मृति में शहीद स्मारक बना। घटना के दिन हर साल 16 अगस्त को यहां मेला लगता है।श्रद्धालू शहीद स्मारक पर आकर दीप जलाते और श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। प्रशासन की ओर से श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जाता है।पास के गांव पैजनियां में कई प्रसिद्ध क्रांतिकारियों के अज्ञातवास स्थल पर भी स्मारक बना है।

आजादी के अमृत महोत्सव का मुख्य कार्यक्रम जिलाधिकारी की कोठी के प्रांगण में होना चाहिए। पामरगंज का नाम बदला जाना चाहिए। कलेक्ट्रेट और पामरगंज में शाहीद स्मारक बनने चाहिए। उनकी स्मृति में कार्यक्रम आयोजित होने चाहिए। नजीबाबाद में थाने की जगह जनरल बख्त खान और अन्य क्रातिकारियों की याद में शहीद स्मारक बनना चाहिए।
अशोक मधुप
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)












सात अगस्त चिंगारी सांध्य






Saturday, July 16, 2022

देश से दूर मरने वालों क्रातिकारियों की कौन सोचे? 19 गस्त 2023 राष्ट्रदूत रायपुर मध्य प्रदेश

देश से दूर मरने  वालों क्रातिकारियों की  कौन सोचे?

अशोक मधुप  

प्रधानमंत्री ने लाल किले से देश के शहीदों का स्मरण किया।  उन्हें श्रद्धा सुमन भेंट किए।देश की भावी योजनांए बताईं किंतु उन क्रांतिकारियों के अवशेष भारत लाने की बात नही की जो देश से बहुत दूर  शहीद हुए।देश में उनके स्मारक बनाने पर भी कोई  बात नही हुई।

भारत के कई वीर और क्रांतिकारी देश के लिए लड़ते देश  से दूर शहीद हुए । आजादी के 75 साल बीतने पर भी हम  उनके अवशेष ,उनकी देह देश में लाकर सम्मान के साथ उनका  अंतिम संस्कार नही कर सके।  उनकी समाधि भी नही बना सके। दिल्ली के अंतिम बाहशाह का यह शेर सभी पर  उपयुक्त बैठता है − कितना है बदनसीब 'ज़फर' दफ्न के लिए,दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में।

1857 क्रांति में शामिल रहे सैनिक अलम बेग की खोपड़ी ब्रिटेन से भारत आई है। अब उसकी जांच होगी और परिजनों का पता लगाकर अंतिम संस्कार के लिए उन्हें सौंपी जाएगी। अजनाला हत्याकांड से बचकर निकले अलम बेग की खोपड़ी लंदन के एक पब में रखी थी।कानपुर में उनकी हत्या करके अंग्रेज अधिकारी ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया को वार ट्रॉफी के रूप में भेंट करने के लिए सिर ले गए थे। इसके बाद खोपड़ी को एक पब की शोभा बढ़ाने के लिए रखा गया। खोपड़ी कब और किन प्रयासों से भारत लाई गई, इसका कोई जिक्र नहीं। सूत्रों का दावा है कि इसी साल खोपड़ी भारत लाई गई है।अलम बेग की खोपड़ी तो भारत आ गई किंतु अनेक  वीर ऐसे हैं, जिनके अवशेष  भारत आने का बर्षों  इंतजार कर रहे हैं।

1857 के आजादी के आंदोलन का नेतृत्व करने वाले दिल्ली के अंतिम बादशाह बहादुर शाह जफर को अंग्रेज गिरफ्तार कर रंगून ले गई। वहीं अंग्रेज  की गिरफ्त और भूखमरी के से हालात में उनकी मौत हुई। ऐसा कहा जाता है कि बहादुरशाह जफर मृत्यु के बाद दिल्ली के महरौली में कुतुबुद्दीन बख्तियार की दरगाह के पास दफन होना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए दो गज जगह की भी निशानदेही कर रखी थी।बर्मा में अंग्रेजों की कैद में ही सात  नवंबर, 1862 को सुबह बहादुर शाह जफर की मौत हो गई। उन्हें उसी दिन जेल के पास ही श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफना दिया गया। इतना ही नहीं उनकी कब्र के चारों ओर बांस की बाड़ लगा दी गई और कब्र को पत्तों से ढंक दिया गया ।  सबसे पहले आजादी के पुरोधा सुभाष  चंद्र बोस उनकी मजार पर गए।वहीं से देश के नाम संबोधन किया।पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी उनके दरगाह पर गए । उन्होंने अंतिम मुगल बादशाह को श्रद्धांजलि दी। इसके बाद, वह दिल्ली के लिए रवाना हो गए। इनसे  पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी जब 2012 में इस साउथ-ईस्ट एशियाई देश का दौरा किया था, तो वह इस मजार पर गए थे।  दो दो प्रधानमंत्री बहादुर शाह जफर के मजार पर गए पर किसी ने उनकी इच्छा दिल्ली के महरौली में कुतुबुद्दीन बख्तियार की दरगाह के पास दफन होने की पूरी करनी गंवारा नही की। जबकि बहादुर शाह जफर ने तो अपनी कब्र के  के लिए दो गज जगह की भी निशानदेही कर रखी थी।

उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले का लाल जनरल बख्त खान किसी को याद नहीं। 1857 में दिल्ली से लेकर पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने वाले इस वीर को मौत भी मिली तो वतन से बहुत दूर। वहां जहां इसकी कुर्बानी को कोई याद करने वाला भी नहीं।

बख्तखान का जन्म बिजनौर जनपद के  नजीबाबाद में हुआ था। बख्तखान रोहिल्ला पठान नजीबुदौला के भाई अब्दुल्ला खान के बेटे थे। 1817 के आसपास वे ईस्ट इंडिया कम्पनी में भर्ती हुए। पहले अफगान युद्ध में वे बहुत ही बहादुरी के साथ लड़े। उनकी बहादुरी देख उन्हें सूबेदार बना दिया गया। 40 वर्षों तक बंगाल में घुड़सवारी करके और पहले एंग्लो-अफगान युद्ध को देखकर जनरल बख्त खान ने काफी अनुभव लिया । मेरठ में सैनिक विद्रोह के समय वे बरेली में तैनात थे । अपने आध्यात्मिक गुरू सरफराज अली के कहने पर वह आजादी की लड़ाई में शामिल हुए। मई खत्म होते –होते बख्तखान एक क्रांतिकारी बन गए। बरेली में शुरूआती अव्यवस्था, लूटमार के बाद बख्त खान को क्रांतिकारियों का नेता घोषित किया।

बरेली में विद्रोह करके एक जुलाई को बख्त खान अपनी फौज और चार हजार मुस्लिम लड़ाकों के साथ दिल्ली पंहुचे। इसी समय बहादुर शाह जफर को देश का सम्राट घोषित किया गया। सम्राट के बड़े बेटे मिर्जा मुगल को मुख्य जनरल का खिताब दिया गया। बख्त खान को सम्राट शाह जफर ने उन्हें सेना के वास्तविक अधिकार और साहेब ए आलम बहादुर (लॉर्ड गवर्नर जनरल)  का खिताब दिया।
इसके बाद बख्त खान के नेतृत्व में लंबी जंग लड़ी गई। बख्त खान ने बहादुर शाह जफर को सुरक्षा प्रदान की। दिल्ली को अच्छा प्रशासन देने की कोशिश की। लेकिन दूसरे स्थान से आए सैनिक और राजपरिवार तथा दरबार के कुछ व्यक्तियों के षडयंत्र के आगे कोई बस न चला।अंग्रेजों की षडयंत्र के तहत 20 सितंबर 1857 को अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर रंगून जेल भेज दिया।
बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार के बाद बख्त खान ने दिल्ली छोड़ दी । वह लखनऊ और शाहजहांपुर में विद्रोही बलों में शामिल हो अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ते रहे। अंतिम दिनों में बख्त खान स्वात घाटी में बस गए । 13 मई 1859 को गंभीर रूप से घायल हो गए। बख्त खान को वर्तमान पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में दफनाया गया।

किसी देशवासी ने नही सोचा कि उनके शव को भारत वापस लाया जाए। उनको सम्मान के साथ  दफनाकर भव्य स्मारक बनाया जाए। पाकिस्तान में बख्त खान के नमापर फिल्में बनी किंतु भारत में उनके नाम परकुछ नही हुआ।

 क्रांतिकारी शहीद उधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर 1899 को पंजाब प्रांत के संगरूर जिले के  सुनाम  गाँव में एक सिख परिवार में हुआ था। सन 1901 में उधमसिंह की माता और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। उधमसिंह के बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्तासिंह था, जिन्हें अनाथालय में क्रमश: उधमसिंह और साधुसिंह के रूप में नए नाम मिले। इतिहासकार मालती मलिक के अनुसार उधमसिंह देश में सर्वधर्म सम्भाव के प्रतीक थे और इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर 'राम मोहम्मद सिंह आजाद' रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतीक है।

 1917 में उनके बड़े भाई के देहांत के बाद1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शमिल हो गए। उधमसिंह १३ अप्रैल १९१९ को घटित जालियाँवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे। इस घटना से वीर उधमसिंह तिलमिला गए और उन्होंने जलियाँवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओ'डायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली। अपने इस ध्येय को अंजाम देने के लिए उधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा की। सन् 1934 में उधम सिंह लंदन पहुँचे और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपना ध्येय को पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीद ली। भारत के यह वीर क्रांतिकारी, माइकल ओ'डायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगे।

उधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 1940 में मिला। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी. यहां माइकल ओ'डायर भी वक्ताओं में से एक था. उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुँच गए. अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली. इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके.

बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ'डायर पर गोलियां दाग दीं. दो गोलियां माइकल ओ'डायर को लगीं ,इससे उसकी तत्काल मौत हो गई. उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी. उन पर मुकदमा चला। चार  जून 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई।

   पूर्व मुख्य मंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सुनाम में शहीद की याद में बने म्यूजियम और पार्क का उद्घाटन किया। यहां ऊधम सिंह से जुड़ी यादों को संजोकर रखा गया है।

म्यूजियम में शहीद ऊधम सिंह से संबंधित वो तमाम चीजें रखी गई हैं जो आने वाली पीढ़ियों को उनके देशभक्ति के जज्बे की याद दिलाएंगी। यहां ऊधम सिंह की वो फोटो भी लगाई गई है जिसमें ब्रिटिश सरकार के अफसर उन्हें हथकड़ी लगाकर ले जा रहे हैं और ऊधम सिंह मुस्कुरा रहे हैं। म्यूजियम में शहीद ऊधम सिंह का अस्थि कलश भी रखा गया है। ऊधम सिंह को लंदन में फांसी दिए जाने के बाद यह अस्थि कलश 31 साल तक वहीं पड़ा था और बाद में इसे पंजाब लाया गया।उधम सिंह की डायरी और पिस्तौल हम आज तक लंदन से नही मंगा  सके । न ही कोई प्रयास  हुआ।

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक साल पहले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर उनके नाम के द्वीप पर (On Netaji Subhash Chandra Bose Island) बनने वाले नेताजी को समर्पित राष्ट्रीय स्मारक के मॉडल  का अनावरण किया  । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को पराक्रम दिवस के अवसर पर देश के महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस को श्रद्धांजलि देते हुए भारत के इतिहास में उनके अद्वितीय योगदान को याद किया।

इसके बावजूद किसी को जापान से उनकी अस्थि  लाने की याद नही आई। 1960 के उस प्रस्ताव की किसी को याद नहीं। दूसरी लोकसभा का शीतकालीन सत्र चल रहा था। दो  दिसंबर 1960 को निचले सदन में एक प्रस्ताव रखा गया कि जापान के रेंकोजी मंदिर से नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की अस्थियों को भारत लाया जाए। नेताजी की अस्थियों के लिए दिल्ली के लालकिले का सामने एक भव्य स्मारक बनाने की भी बात थी उसमें। भारतीय संसद में और संसद के बाहर, पूरे देश में यह मुद्दा गरम था। मांग हो रही थी कि अगर सरकार मानती है कि रेंकोजी मंदिर में जो अस्थि-अवशेष नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के हैं, तो उन्हें भारत मंगवा लेना चाहिए।
संसद के इस प्रस्ताव के संबंध में उसी दिन दो दिसंबर 1960 को नेहरूजी ने डॉ. बिधान चन्द्र रॉय को एक पत्र लिखा। बिधान चन्द्र रॉय तब पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री थे। नेहरूजी का वह पत्र गोपनीय था। उसमें नेहरूजी ने लिखा कि नेताजी की अस्थियों को भारत लाने की कोशिश भारत सरकार तभी करेगी, जब नेताजी का परिवार उसके लिए पहल करे। यह बात तो समझ में आती है। लेकिन, इसी पत्र में वह नेताजी के लिए लालकिले के सामने स्मारक का प्रस्ताव ठुकरा देते हैं। नेहरू लिखते हैं, ‘मैं नहीं सोचता हूं कि उस तरह की चीज यानी नेताजी का स्मारक लालकिले के सामने बन सकता है’। नेहरूजी को ऐसा क्यों लगता था, यह तो उन्हें ही पता होगा, लेकिन उनका यह कहना कि वैसी चीज (नेताजी का स्मारक) लालक़िले के सामने नहीं बन सकती, यह तो समझ से परे है।   

नेहरू  जी नही चाहते थे, स्मारक नही बना,सुभाष च्रद बोस के नाम पर दीप का नाम रखकर समर्पित राष्ट्रीय स्मारक  बन गया  किंतु  जापान के मंदिर में रखी सुभाष  चंद बोस की अस्थियां आज भी इस इंतजार में हैं  कि उनका  देश उन्हें वापस लेकर आए।

प्रसिद्ध चौहान  राजा पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गोरी के बीच   तराइन की दूसरी लड़ाई 1192 में हुई।  तराइन के पहले युद्ध में परास्त होने वाले एवं बिना दंड छोडदिए गए मुहम्मद गौरी की विजय हुई।जनश्रुति के अनुसार मुहम्मद गौरी पृथवीराज चौहान को गरफतार कर गजनी लेगया। पृथ्वीराज रासो  का दावा है कि पृथ्वीराज को एक कैदी के रूप में ग़ज़नी ले जाया गया और अंधा कर दिया गया। यह सुनकर   उनके मित्र कवि चंद बरदाई ने गज़नी की यात्रा की और मोहम्मद ग़ोरी को चकमा दिया जिसमें पृथ्वीराज ने मोहम्मद की आवाज़ की दिशा में तीर चलाया और उसे मार डाला। कुछ ही समय बाद, पृथ्वीराज और चंद बरदाई ने एक दूसरे को मार डाला।

इतिहासकार राजा पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु  के बारे में अलग− अलग  बाते कहते  हैं।  उनकी मौत की सच्चाई  आज तक पतानही चली।उनका अंतिम संस्कार कहां हुआ यह भी पता  नहीं।

 दस्यू रही फूलन देवी के हत्यारे शेर सिंह राणा  एक वीडियो क्‍लिप जारी करके अंतिम हिन्‍दू सम्राट पृथ्‍वीराज चौहान की समाधि ढूँढकर उनकी अस्थियाँ भारत लेकर आने की कोशिश का दावा किया। शेर सिंह  राणा के दावे और उसके द्वारा लाई गई अस्थियों की किसी ने जांच कराना गवांरा नही की।  आज तक किसी ने यह पता  लगाना  गवांरा  नही किया कि गजनी में पृथवीराज चौहान की कब्र है , या नहीं।

अशोक मधुप

(लेखक  वरिष्ठ  पत्रकार है)