Saturday, July 16, 2022

देश से दूर मरने वालों क्रातिकारियों की कौन सोचे? 19 गस्त 2023 राष्ट्रदूत रायपुर मध्य प्रदेश

देश से दूर मरने  वालों क्रातिकारियों की  कौन सोचे?

अशोक मधुप  

प्रधानमंत्री ने लाल किले से देश के शहीदों का स्मरण किया।  उन्हें श्रद्धा सुमन भेंट किए।देश की भावी योजनांए बताईं किंतु उन क्रांतिकारियों के अवशेष भारत लाने की बात नही की जो देश से बहुत दूर  शहीद हुए।देश में उनके स्मारक बनाने पर भी कोई  बात नही हुई।

भारत के कई वीर और क्रांतिकारी देश के लिए लड़ते देश  से दूर शहीद हुए । आजादी के 75 साल बीतने पर भी हम  उनके अवशेष ,उनकी देह देश में लाकर सम्मान के साथ उनका  अंतिम संस्कार नही कर सके।  उनकी समाधि भी नही बना सके। दिल्ली के अंतिम बाहशाह का यह शेर सभी पर  उपयुक्त बैठता है − कितना है बदनसीब 'ज़फर' दफ्न के लिए,दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में।

1857 क्रांति में शामिल रहे सैनिक अलम बेग की खोपड़ी ब्रिटेन से भारत आई है। अब उसकी जांच होगी और परिजनों का पता लगाकर अंतिम संस्कार के लिए उन्हें सौंपी जाएगी। अजनाला हत्याकांड से बचकर निकले अलम बेग की खोपड़ी लंदन के एक पब में रखी थी।कानपुर में उनकी हत्या करके अंग्रेज अधिकारी ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया को वार ट्रॉफी के रूप में भेंट करने के लिए सिर ले गए थे। इसके बाद खोपड़ी को एक पब की शोभा बढ़ाने के लिए रखा गया। खोपड़ी कब और किन प्रयासों से भारत लाई गई, इसका कोई जिक्र नहीं। सूत्रों का दावा है कि इसी साल खोपड़ी भारत लाई गई है।अलम बेग की खोपड़ी तो भारत आ गई किंतु अनेक  वीर ऐसे हैं, जिनके अवशेष  भारत आने का बर्षों  इंतजार कर रहे हैं।

1857 के आजादी के आंदोलन का नेतृत्व करने वाले दिल्ली के अंतिम बादशाह बहादुर शाह जफर को अंग्रेज गिरफ्तार कर रंगून ले गई। वहीं अंग्रेज  की गिरफ्त और भूखमरी के से हालात में उनकी मौत हुई। ऐसा कहा जाता है कि बहादुरशाह जफर मृत्यु के बाद दिल्ली के महरौली में कुतुबुद्दीन बख्तियार की दरगाह के पास दफन होना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए दो गज जगह की भी निशानदेही कर रखी थी।बर्मा में अंग्रेजों की कैद में ही सात  नवंबर, 1862 को सुबह बहादुर शाह जफर की मौत हो गई। उन्हें उसी दिन जेल के पास ही श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफना दिया गया। इतना ही नहीं उनकी कब्र के चारों ओर बांस की बाड़ लगा दी गई और कब्र को पत्तों से ढंक दिया गया ।  सबसे पहले आजादी के पुरोधा सुभाष  चंद्र बोस उनकी मजार पर गए।वहीं से देश के नाम संबोधन किया।पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी उनके दरगाह पर गए । उन्होंने अंतिम मुगल बादशाह को श्रद्धांजलि दी। इसके बाद, वह दिल्ली के लिए रवाना हो गए। इनसे  पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी जब 2012 में इस साउथ-ईस्ट एशियाई देश का दौरा किया था, तो वह इस मजार पर गए थे।  दो दो प्रधानमंत्री बहादुर शाह जफर के मजार पर गए पर किसी ने उनकी इच्छा दिल्ली के महरौली में कुतुबुद्दीन बख्तियार की दरगाह के पास दफन होने की पूरी करनी गंवारा नही की। जबकि बहादुर शाह जफर ने तो अपनी कब्र के  के लिए दो गज जगह की भी निशानदेही कर रखी थी।

उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले का लाल जनरल बख्त खान किसी को याद नहीं। 1857 में दिल्ली से लेकर पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने वाले इस वीर को मौत भी मिली तो वतन से बहुत दूर। वहां जहां इसकी कुर्बानी को कोई याद करने वाला भी नहीं।

बख्तखान का जन्म बिजनौर जनपद के  नजीबाबाद में हुआ था। बख्तखान रोहिल्ला पठान नजीबुदौला के भाई अब्दुल्ला खान के बेटे थे। 1817 के आसपास वे ईस्ट इंडिया कम्पनी में भर्ती हुए। पहले अफगान युद्ध में वे बहुत ही बहादुरी के साथ लड़े। उनकी बहादुरी देख उन्हें सूबेदार बना दिया गया। 40 वर्षों तक बंगाल में घुड़सवारी करके और पहले एंग्लो-अफगान युद्ध को देखकर जनरल बख्त खान ने काफी अनुभव लिया । मेरठ में सैनिक विद्रोह के समय वे बरेली में तैनात थे । अपने आध्यात्मिक गुरू सरफराज अली के कहने पर वह आजादी की लड़ाई में शामिल हुए। मई खत्म होते –होते बख्तखान एक क्रांतिकारी बन गए। बरेली में शुरूआती अव्यवस्था, लूटमार के बाद बख्त खान को क्रांतिकारियों का नेता घोषित किया।

बरेली में विद्रोह करके एक जुलाई को बख्त खान अपनी फौज और चार हजार मुस्लिम लड़ाकों के साथ दिल्ली पंहुचे। इसी समय बहादुर शाह जफर को देश का सम्राट घोषित किया गया। सम्राट के बड़े बेटे मिर्जा मुगल को मुख्य जनरल का खिताब दिया गया। बख्त खान को सम्राट शाह जफर ने उन्हें सेना के वास्तविक अधिकार और साहेब ए आलम बहादुर (लॉर्ड गवर्नर जनरल)  का खिताब दिया।
इसके बाद बख्त खान के नेतृत्व में लंबी जंग लड़ी गई। बख्त खान ने बहादुर शाह जफर को सुरक्षा प्रदान की। दिल्ली को अच्छा प्रशासन देने की कोशिश की। लेकिन दूसरे स्थान से आए सैनिक और राजपरिवार तथा दरबार के कुछ व्यक्तियों के षडयंत्र के आगे कोई बस न चला।अंग्रेजों की षडयंत्र के तहत 20 सितंबर 1857 को अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर रंगून जेल भेज दिया।
बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार के बाद बख्त खान ने दिल्ली छोड़ दी । वह लखनऊ और शाहजहांपुर में विद्रोही बलों में शामिल हो अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ते रहे। अंतिम दिनों में बख्त खान स्वात घाटी में बस गए । 13 मई 1859 को गंभीर रूप से घायल हो गए। बख्त खान को वर्तमान पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में दफनाया गया।

किसी देशवासी ने नही सोचा कि उनके शव को भारत वापस लाया जाए। उनको सम्मान के साथ  दफनाकर भव्य स्मारक बनाया जाए। पाकिस्तान में बख्त खान के नमापर फिल्में बनी किंतु भारत में उनके नाम परकुछ नही हुआ।

 क्रांतिकारी शहीद उधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर 1899 को पंजाब प्रांत के संगरूर जिले के  सुनाम  गाँव में एक सिख परिवार में हुआ था। सन 1901 में उधमसिंह की माता और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। उधमसिंह के बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्तासिंह था, जिन्हें अनाथालय में क्रमश: उधमसिंह और साधुसिंह के रूप में नए नाम मिले। इतिहासकार मालती मलिक के अनुसार उधमसिंह देश में सर्वधर्म सम्भाव के प्रतीक थे और इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर 'राम मोहम्मद सिंह आजाद' रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतीक है।

 1917 में उनके बड़े भाई के देहांत के बाद1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शमिल हो गए। उधमसिंह १३ अप्रैल १९१९ को घटित जालियाँवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे। इस घटना से वीर उधमसिंह तिलमिला गए और उन्होंने जलियाँवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओ'डायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली। अपने इस ध्येय को अंजाम देने के लिए उधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा की। सन् 1934 में उधम सिंह लंदन पहुँचे और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपना ध्येय को पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीद ली। भारत के यह वीर क्रांतिकारी, माइकल ओ'डायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगे।

उधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 1940 में मिला। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी. यहां माइकल ओ'डायर भी वक्ताओं में से एक था. उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुँच गए. अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली. इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके.

बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ'डायर पर गोलियां दाग दीं. दो गोलियां माइकल ओ'डायर को लगीं ,इससे उसकी तत्काल मौत हो गई. उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी. उन पर मुकदमा चला। चार  जून 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई।

   पूर्व मुख्य मंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सुनाम में शहीद की याद में बने म्यूजियम और पार्क का उद्घाटन किया। यहां ऊधम सिंह से जुड़ी यादों को संजोकर रखा गया है।

म्यूजियम में शहीद ऊधम सिंह से संबंधित वो तमाम चीजें रखी गई हैं जो आने वाली पीढ़ियों को उनके देशभक्ति के जज्बे की याद दिलाएंगी। यहां ऊधम सिंह की वो फोटो भी लगाई गई है जिसमें ब्रिटिश सरकार के अफसर उन्हें हथकड़ी लगाकर ले जा रहे हैं और ऊधम सिंह मुस्कुरा रहे हैं। म्यूजियम में शहीद ऊधम सिंह का अस्थि कलश भी रखा गया है। ऊधम सिंह को लंदन में फांसी दिए जाने के बाद यह अस्थि कलश 31 साल तक वहीं पड़ा था और बाद में इसे पंजाब लाया गया।उधम सिंह की डायरी और पिस्तौल हम आज तक लंदन से नही मंगा  सके । न ही कोई प्रयास  हुआ।

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक साल पहले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर उनके नाम के द्वीप पर (On Netaji Subhash Chandra Bose Island) बनने वाले नेताजी को समर्पित राष्ट्रीय स्मारक के मॉडल  का अनावरण किया  । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को पराक्रम दिवस के अवसर पर देश के महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस को श्रद्धांजलि देते हुए भारत के इतिहास में उनके अद्वितीय योगदान को याद किया।

इसके बावजूद किसी को जापान से उनकी अस्थि  लाने की याद नही आई। 1960 के उस प्रस्ताव की किसी को याद नहीं। दूसरी लोकसभा का शीतकालीन सत्र चल रहा था। दो  दिसंबर 1960 को निचले सदन में एक प्रस्ताव रखा गया कि जापान के रेंकोजी मंदिर से नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की अस्थियों को भारत लाया जाए। नेताजी की अस्थियों के लिए दिल्ली के लालकिले का सामने एक भव्य स्मारक बनाने की भी बात थी उसमें। भारतीय संसद में और संसद के बाहर, पूरे देश में यह मुद्दा गरम था। मांग हो रही थी कि अगर सरकार मानती है कि रेंकोजी मंदिर में जो अस्थि-अवशेष नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के हैं, तो उन्हें भारत मंगवा लेना चाहिए।
संसद के इस प्रस्ताव के संबंध में उसी दिन दो दिसंबर 1960 को नेहरूजी ने डॉ. बिधान चन्द्र रॉय को एक पत्र लिखा। बिधान चन्द्र रॉय तब पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री थे। नेहरूजी का वह पत्र गोपनीय था। उसमें नेहरूजी ने लिखा कि नेताजी की अस्थियों को भारत लाने की कोशिश भारत सरकार तभी करेगी, जब नेताजी का परिवार उसके लिए पहल करे। यह बात तो समझ में आती है। लेकिन, इसी पत्र में वह नेताजी के लिए लालकिले के सामने स्मारक का प्रस्ताव ठुकरा देते हैं। नेहरू लिखते हैं, ‘मैं नहीं सोचता हूं कि उस तरह की चीज यानी नेताजी का स्मारक लालकिले के सामने बन सकता है’। नेहरूजी को ऐसा क्यों लगता था, यह तो उन्हें ही पता होगा, लेकिन उनका यह कहना कि वैसी चीज (नेताजी का स्मारक) लालक़िले के सामने नहीं बन सकती, यह तो समझ से परे है।   

नेहरू  जी नही चाहते थे, स्मारक नही बना,सुभाष च्रद बोस के नाम पर दीप का नाम रखकर समर्पित राष्ट्रीय स्मारक  बन गया  किंतु  जापान के मंदिर में रखी सुभाष  चंद बोस की अस्थियां आज भी इस इंतजार में हैं  कि उनका  देश उन्हें वापस लेकर आए।

प्रसिद्ध चौहान  राजा पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गोरी के बीच   तराइन की दूसरी लड़ाई 1192 में हुई।  तराइन के पहले युद्ध में परास्त होने वाले एवं बिना दंड छोडदिए गए मुहम्मद गौरी की विजय हुई।जनश्रुति के अनुसार मुहम्मद गौरी पृथवीराज चौहान को गरफतार कर गजनी लेगया। पृथ्वीराज रासो  का दावा है कि पृथ्वीराज को एक कैदी के रूप में ग़ज़नी ले जाया गया और अंधा कर दिया गया। यह सुनकर   उनके मित्र कवि चंद बरदाई ने गज़नी की यात्रा की और मोहम्मद ग़ोरी को चकमा दिया जिसमें पृथ्वीराज ने मोहम्मद की आवाज़ की दिशा में तीर चलाया और उसे मार डाला। कुछ ही समय बाद, पृथ्वीराज और चंद बरदाई ने एक दूसरे को मार डाला।

इतिहासकार राजा पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु  के बारे में अलग− अलग  बाते कहते  हैं।  उनकी मौत की सच्चाई  आज तक पतानही चली।उनका अंतिम संस्कार कहां हुआ यह भी पता  नहीं।

 दस्यू रही फूलन देवी के हत्यारे शेर सिंह राणा  एक वीडियो क्‍लिप जारी करके अंतिम हिन्‍दू सम्राट पृथ्‍वीराज चौहान की समाधि ढूँढकर उनकी अस्थियाँ भारत लेकर आने की कोशिश का दावा किया। शेर सिंह  राणा के दावे और उसके द्वारा लाई गई अस्थियों की किसी ने जांच कराना गवांरा नही की।  आज तक किसी ने यह पता  लगाना  गवांरा  नही किया कि गजनी में पृथवीराज चौहान की कब्र है , या नहीं।

अशोक मधुप

(लेखक  वरिष्ठ  पत्रकार है)

 











Sunday, July 3, 2022

नानौर के जंगल में है सीता मंदिर

 अशोक मधुप 

बिजनौर जनपदवासियों को यह पता भी  नही कि चांदपुर  बाष्टा क्षेत्र के नानौर के जंगल में  सीता मंदिर भी है। पुराने लोग कहते हैं कि सीता यहीं धरती में समाई थी।

इस मंदिर को , सीता मंदिर , सीता बनी और सीतामठ कई नाम से पुकारा जाता है।अब तो यह स्थान कुछ विकसित हो गया, किंतु अब से चालिस −पचास साल पहले यहां कुछ भी नही था। दिन में चरवाहे  पशु चराते और शाम को घार वापस हो जाते।




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बिजनौर जनपद के इतिहास पर आजतक कोई कार्य नहीं हुआ। जिला गजेटियर से अलग किसी ने कुछ नही किया। न कोई महत्वपूर्ण स्थल घूमा, नहीं कोई जानकारी करने की कोशिश की। इस बारे में कभी किसी जानकार से पूछा तो सबने कहा कि सर सैयद की किताब सरकशे  बिजनौर में जिले का इतिहास है। सच्चाई यह है कि सरकशे  बिजनौर सर सैयद की डायरी है। इसमें उन्होंने 1857 के विद्रोह के समय बिजनौर की तैनाती के दौरान की घटनांए  दर्ज की हैं। जनपद के इतिहास  और ऐतिहासिक स्थलों पर अभी  और खोज कार्य की जरूरत है −−−अशोक मधुप

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लेखक तीन −चार बार इस स्थान पर गया। अंतिम बार बिजनौर हलचल चैनल  चलाने के दौरान लेखक और उसके साथ आज के आज तक के जिला प्रभारी संजीव शर्मा  थे । हम  यहां कई घंटे रूके। लेखक ने हर बार महसूस किया कि मंदिर का द्वार छोटा  है किंतु गुंबद जितना ऊंचा है , गुंबद  उतना ऊंचा  मंदिर के अंदर से नजर नही आता। गुबंद में ऊपर चारों और एक निर्धारित ऊंचाई पर गोल −गोल रोशनदान बने थे।एक साईड में छोटा  द्वार भी है। लेखक ने पशु  चरा रहे लोगों से पूछा कि गुंबद में यह दरवाजा कैसा हैॽ क्या गुंबद खोखला है। उन्होंने हां कहा।गुंबद तक जाने का कोई रास्ता नही था।मेरे कहने पर श्री संजीव शर्मा मंदिर के किनारे की ईंट पकड़कर ऊपर चढ़ गए।मंदिर के कंगूरों से होते वे झुककर दरवाजे से अंदर चले गए।उन्होंने बताया कि ऊपर  कमरा  है। इसमें पांच− छह   आदमी आराम से रह सकतें हैं।छत में चारों ओर बने छेद रोशनी और हवा के   साथ − साथ चारों और देखने  और नजर रखने के लिए भी अच्छा  माध्यम थे। मंदिर के बीच में कोई मूर्ति आदि नहीं लगी थी।एक शिला थी। इस पर कुछ खुदा है। लगता था कि कोई शिलालेख हो।पास में एक कुआं भी था।  इसमें पेड़ उग आए थे। नीचे पुरानी मुगल काल की झामें की ईंट लगी थी। इनके ऊपर लखोरी ईं ट से चिनाई हुई थी। बाद में आज की ईंट से चिनाई  हुई है।  मंदिर भी ब्रिटिश  काल के पहले प्रयोग होने वाली लखौरी (छोटी) ईंट से बना था।

आसपास के लोग बताते हैं कि कभी यहां से होकर गंगा बहती थी। यहीं वाल्मीकि का आश्रम था। यहीं सीता जमीन में समाईं थी। जिला गजेटियर इसके बारे में ज्यादा कुछ नही कहता है।वह कहता है कि जनश्रुति है कि यहां  सीता भूमि में समाई थीं किंतु अनेक जगह के बारे में इस तरह की मान्यता है।

कुछ कहते हैं कि ये क्षेत्र कभी भूड़ का रेतीला जंगल था। जनपद के रेतीले जंगल में ही सीताबनी  नाम की घास  होती थी। बिजनौर जनपद के वन और वन्य संपदा के जानकार, भाकियू के वरिष्ठ नेता दिगंबर सिंह और पीतंबर सिंह ग्राम (बल्दिया), केलनपुर के भोपाल सिहं  दीवान जी आदि पुराने व्यक्ति  बताते हैं कि सीतावनी  तीन चार फिट लंबी घास होती थी। इसकी पत्ती पतली और लंबी होती थी।ये घर के आंगन में झाडू लगाने और पशुओं के नीचे बिछाने के काम आती थी।  वन संपदा के प्रसिद्ध  जानकार खान जफर सुलतान कहते हैं कि सीताबनी  घास में तीतर बहुत होती था। ये तीतर के छिपने के लिए सबसे बेहतर झाड़ी थी। वे कहते हैं कि इसमें हिरन भी होता था। जनपद से भूड़ खत्म हो गई तो ये घास भी गायब हो गई।

चांदपुर क्षेत्र के रहने वाले जनपद के इतिहास के बड़े जानकार प्रोफेसर खालिद अलवी कहते हैं कि चांदपुर के नानौर −दत्याना आदि  जंगल में  सीता बनी नामक झाड़ी ज्यादा होती थी। इसी की  वजह से इस स्थान को सीताबन कहा जाता  रहा होगा। हो सकता है कि सीतावन में बना मंदिर सीतामठ या  सीतावनी  या सीता  मंदिर  कहा  जाता रहा हो।     

मंदिर के  गुंबद का बना कमरा बताता है कि यह गुंबद उस समय के मंदिर में रहने वालों के लिए सुरक्षित जगह रही होगी। वे इसमें वन्य प्राणियों से भी  सुरक्षित होंते और एक दो हमलावर से भी।गुंबद के कमरे तक पंहुचने का  न  कोई  जीना है न स्पोर्ट। मंदिर के कंगूरों से होकर  कक्ष के द्वार तक जाया जा सकता है।द्वार से अंदर जाने का प्रयास करने वाला आदमी अंदर बैठे व्यक्ति के  आक्रमण का     

सीधे शिकार हो सकता है।यह भी हो सकता है कि यह स्थल गंगा पर नजर रखने के लिए प्रयोग होता हो। ऊपर गुंबद में बैठे व्यक्ति दिखाई भी नहीं पड़ते होंगे। मंदिर के बीच में लगी शिला को देखकर  लेखक को सदा लगा कि यह कोई शिला लेख  है।

अब मंदिर की देखरेख करने वालों मंदिर के पुराने अस्तित्व में काफी बदलाव कर दिया। मंदिर के बीच में शिवलिंग की स्थापना कर दी। शिलालेख साइड में लगवाई गई प्रतिमा के दीप या पूजन सामग्री प्रयोग करने के काम आने लगा।गुंबद के गोला छेद बंद कराकर द्वार  बड़ा कर  दिया गया। कुंए की  सफाई कर उसे  अब प्रयोग में लाया जाने लगा।

पर इस मदिर पर अभी खोज कार्य  होना चाहिए। पुरातत्व विभाग  को यहां आकर उसकी प्राचीनता और मंदिर में लगे  शिलालेख जैसे पत्थर की जांच करनी चाहिए।   

अशोक मधुप 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Monday, May 2, 2022

 

परशुराम  जंयती पर तीन मई  पर विशेष

गौरी शंकर सुकोमल जी ने लिखी 0





 परशुराम पर भगवान परशु रामायण

अशोक मधुप

आज भगवान परशुराम की जयंती  अक्षय तृतीया है। आज भगवान परशुराम का अवतरण दिवस है।दुनिया के सात अमर व्यक्तियों में भगवान परशुराम की भी गणना होती है।भगवान परशुराम पर भक्तों और श्रद्धालुओं द्वारा  सदियों से लिखा जा रहा है।सबने अपने – अपने   दृष्टिकोण से भगवान परशुराम को पढ़ा, देखा और लिया।

उत्तर प्रदेश के धामपुर नगर के तो विद्वान पंडित गौरी शंकर शर्मा सुकोमल ने भगवान परशुराम के जीवन चरित्र  पर पूरी परशु रामायण लिख दी। इस परशु रामायण की विशेष बात यह है कि ये गेय है। राधेश्याम कथा वाचक की रामायण की तर्ज पर लिखी ये रामायण गाई जा सकती है। गाई जाती है। गाई जा रही है।

 17 फरवरी 1943 में जन्में पंडित गौरी शंकर शर्मा सुकोमल बीए, साहित्य रत्न हैं। वे मूल  रूप से पत्रकार और  लेखक हैं। रंगमंच और कथावाचन से जुडे गौरीशंकर शर्मा जी के मन में

आया कि भगवान परशुराम पर तथ्यात्मक  रूप से  कुछ नही मिलता।ये  विचार आते ही उन्होंने भगवान परशुराम पर रामायण लिखने का निर्णय लिया। ये भगवान परशुराम पर मिले साहित्य के अध्ययन में लग गए।इस विषय पर उपलब्ध साहित्य का अध्ययन किया। तर्कना पर कसा। इस कार्य में कई  साल लग गए। दिन रात लगकर  जब विषय सामग्री एकत्र हुई तो प्रश्न था कि भाषा− शैली क्या हो। ये  रामायण  आम आदमी तक कैसे पंहुचे और लोकप्रिय हो ,गाई भी जा सके। इसके बाद इन्होंने विभिन्न धार्मिक ग्रन्थों का  अध्ययन किया।विद्वानों से विचार किया। बताया गया कि भगवान राम पर बहुत कुछ लिखा गया।किंतु राधे श्याम कथा वाचक की रामायण ज्यादा गेय है।निर्णय हुआ कि राधेश्याम शर्मा कथा वाचक की रामायण की त्तर्ज पर इसे लिखा जाए।इस पर  इन्होंने राधेश्याम शर्मा की रामायण के शिल्प को समझा। उसका मनन किया।

इसके बाद जो लिखना शुरू किया तो परशु रामायण को पूरी करके रूके। इस कार्य के लिए इन्होंने दिन −रात एक कर दिए।परशु रामायण  तो तैयार हो गई किंतु इसके प्रकाशन की समस्या आई । कहीं से भी मदद न मिलने पर सुकोमल जी निराश नही हुए।उन्होंने अपने संकल्प को पूरा करने के लिए अपनी गृहणी के जेवर भी बेच दिए।   

श्री गौरी शंकर सुकोमल जी स्वीकार करते हैं कि उन्होंने सामग्री संजोने और एकत्र करने में तीन−  चार साल लग गए। परशु रामायण  में अपनी  बात शीर्षक के अंतर्गत वह स्वीकार करते हैं कि मैं मूल रूप से कवि और साहित्यकार हूं फिर भी इसे कथावाचन के उद्देश्य से लिखने का प्रयास किया। इन्होंने  अपने ग्रन्थ का आधार बनाया डा. डी आर शर्मा के शोध ग्रन्थ भगवान परशुराम को । सुकोमल जी बताते हैं कि वह गद्य में है। उन्होंने अपनी पुस्तक का कथा  वाचन के हिसाब से गेय बनाया। अपनी कसौटी पर आए तर्क को शामिल किया।

कुल 12 संर्गो में विभक्त परशु रामाणय को को 224 शीर्षक में विभक्त किया गया है। यह परशु रामाणय 500 पृष्ठों  में है। 17 बार क्षत्रियों के विनाश की बात पर वह कहते है कि भगवान परशुराम ने ऐसे दुष्टों का संघार किया जो  आर्य  विरोधी थे। इसे गलत रूप में समाज में प्रचारित किया गया।

परशु रामायण के कुछ अंश−

महर्षि जमदग्नि के वध  का जब समाचार, चंहु और गया।

ऋषिगण, संबंधी, राजागण, सबके मन को झकझोर गया।

सब समझ गए, सब जान गए, इसमें कोई संदेह नहीं,

यह क्रूर कृत्य अर्जुन सुत का, इसमें कोई अंदेह नहीं।

मिल गया शोक संदेश तभी,आश्रम परशुराम लौट आए।

युवको की आर्य सेना भी, वह साथ− साथ लेते आए।−−−−

माता का ये रूदन सुन , बिलख उठे भ्रगुनाथ।

सांत्वना  भरे शब्द कुछ, बोले तक मुनि नाथ।

पृथ्वी पर जिसने जन्म लिया, वह निश्चय एक दिन मरता है।

जो जलता है, वह बुझता है, जो फलता है, वह झरता है।

हे माता क्यों अज्ञान युक्त, तुम रिश्तों का दम भरती हो1

जो नही शोक करने लायक, उसका क्यों गम करती हो।

कुछ चले गए इस दुनिया से, बाकी के भी सब फानी हैं।

दोनों पर जिनको शोक नहीं,बस वे ही सच्चे ज्ञानी हैं।

यह नही आत्मा नाशवान, एक अदभुत सुंदर ज्योति है।

वस्तु ये एक अनादि है, जो सबके अंदर होती है।

क्षण भंगुर है सुख−दुख सभी,जो  इस शरीर  पर आते हैं।

तुम सहन करो सब धीरज से,ये अपना चक्र चलाते हैं।

−−−

लाचार हो गया भ्रगुवंशी, भ्रगुकुल का गौरव रखना है।

मदमत्त हुए हैह्यवंशी,  इसका फल उनको चखना है।

  अब आर्य धरा पर ये श्रत्रप,  चैन नही ले पांएगे।

जो प्रजा विरोधी राजा हैं, सीधे यमलोक में जांएगे।

मैं शपथ पूर्वक कहता हूं, चुन− चुन दुष्टों को मारूंगा।

संस्थापन धर्म हेतु अब, राक्षस नरेश संहारूंगा।

पंडित  गौरी शंकर शर्मा सुकोमल जी लिखी परशु रामायण का अध्ययन करने वाले विद्वानों की राय है कि  ये परशु रामायण मात्र कथा काव्य नही है।ये एतिहासिक तथ्यों को विश्लेषण  हैं।

अशोक मधुप

(लेखक  वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

 

 

 

Sunday, May 1, 2022

आज भी गाईं जाती हैं शेवन बिजनौरी की कव्वाली,गीत, गजल और भजन

 30 अप्रेल के लिए


शेवन बिजनौरी के जन्म दिन पर 



आज भी गाईं जाती हैं शेवन बिजनौरी की कव्वाली,गीत, गजल और भजन

फोटो

अशोक मधुप 

आज शेवन  बिजनौरी का जन्म दिन है।आज वे हमारे बीच नही है किंतु उनकी लिखी कव्वाली, गीत, गजल और भजन आज भी लोग गाते और सुनते हैं। उनके लिखी कव्वाली,भजन,गजल और   गीत बहुत मशहूर हुए।

फैय्याज  अहमद उर्फ शेवन बिजनौरी का जन्म  बिजनौर के मुहल्ला मिर्दगान में 30 अप्रेल 1930 का हुआ।  फैय्याज अहमद उर्फ शेवन बिजनौरी के पिता बदर हुसैन कव्वाल थे।दादा नत्थू खां शिक्षक थे। शेवन बिजनौरी बचपन से अपने पिता के साथ रहते थे।  पिता की कव्वाल पार्टी में जाने के कारण इन्हें कव्वाली गायन के सारे हुनर आ गए। शायरी का शौक बचपन से  ही था।1952 में मदीना प्रेस के एक मुशायरे में जिगर मुरादाबादी आए। शेवन  बिजनौरी तभी उनके बाकायता शार्गीद बन गए। इसके बाद शेवन बिजनौरी की शायरी परवाज चढ़ने लगी। 1957 मे पिता का देहान्त होने के बाद  शेवन बिजनौरी अकेले रह गए। वे बिजनौर छोडकर मेरठ चले गए। वहां शायर शौरिश मुजफ्फरनगरी से बाकायदा शायरी की सलाह लेने लगे।उन्होंने अपनी  कव्वाली की पार्टी बना ली। शेवन बिजनौरी अपनी कव्वाल पार्टी को लेकर वे अहमदाबाद चले गए।अहमदाबाद में  उनका कामयाब प्रदर्शन रहा। उस समय वहां  इस्माइल आजाद,शंकर− शंभू,युसूफ आजाद आदि की प्रसिद्ध कव्वाल पार्टी थीं। शेवन बिजनौरी खुद ही गजल ,गीत शेर और कव्वाली लिखते और गाते थे,  इसलिए कोई भी दूसरी पार्टी मुकाबलों में उनसे जीतती नहीं थी। ये प्रोग्राम में हाथों−हाथ कव्वाली का जवाब लिखते  और गाते।  इनकी कव्वाली लोगों द्वारा गुनगुनाई और गाई  जाने लगीं।

1969−1970 में आपका नातियां जमाले मुहम्मद  दीवान  दिल्ली की रतन एंड कंपनी ने छापा।यह बहुत पंसद किया गया।आपके  कलाम की  हिलाले अरब, मुस्लिम के लाड़ले, कव्वाली मजमुआ आदि छोटी− मोटी लगभग 500 किताबें छपीं।1973 में गजलों का दीवान सैल−ए− रवां के नाम से छपा।एक दीवान प्रीत के धागे हिंदी में छपा।1980 में घूंघट की आड़ में दीदार अधूरा रहता है, प्रकाशित हुआ। इन सब से इनकी प्रसिद्धि आसमान पर पंहुच गई। घूंघट की आड़ में दीदार अधूरा रहता है, दीवान की इसी नाम की  कव्वाली घूंघट की आड़ में दीदार अधूरा  रहता है, को 1985 में बाबू लाल कव्वाल ने कैसिट सोनियों टोन कंपनी दिल्ली के लिए गाया। ये ही कव्वाली डाइरेक्टर नासिर हुसैन ने अपनी फिल्म हम हैं राही प्यार के में नदीम श्रवण के संगीत में गायक कुमार शानू और कविता कृष्ण मूर्ति ने गवाई।  ये कव्वाली इतनी हिट हुई कि 1993 में इसे फिल्म फेयर अवार्ड मिला। 1990 में टी सीरीज के लिए गुलाम अली म्यूजिक डाइरेक्टर के अलबम अफसाना में वो  मुझको छोड़के जाना  चाहता है,अनुराधा पौडवाल और सोनू निगम ने गाया। भारत के अलावा दूसरे मुल्कों के कव्वाल मेंहदी हसन,परवेज मेंहदी,नुसरत फतह अली खां  ने भी शेवन बिजनौरी को  गाया।        

 शेवन बिजनौरी के पुत्र प्रसिद्ध ढ़ोलक वादक आसिफ अक्काशी बतातें हैं कि उनके पिता की कव्वाली गजल और कलाम देश के अधिकांश मशहूर गायक और कव्वालों ने गाए।युसूफ  आजाद कव्वाल ने  उनकी कव्वाली सीने में मुहब्बत की रहती है, जलन बरसों, जानी बाबू कव्वाल मुंबई ने ऐ जाने तमन्ना जाने जिगर,अजीज नांजां मुंबई ने मुहब्बत का जमाना आ गया है,फिल्मी सिंगर अनुराधा पौडवाल ने  वह मुझको छोड़ जाना चाहता है,अनूप जलौटा ने भजन −पकड़े गए कृष्ण भगवान,अलताफ राजा ने तू मेरी जान है,राम शंकर ने कैसेट जलवा है जलवा, अलका याज्ञनिक ने फिल्म हम हैं राही प्यार के में घूंघट की आड़ में दिलवर का गाए।

आसिफ अक्काशी बतातें हैं कि 1999 में तबियत खराब होने के कारण उनके पिता शेवन बिजनौरी अपने घर  बिजनौर आ गए । 22 जून 2021 को उनका निधन हो गया।शेवन बिजनौरी की याद में उनके घर के सामने  वाले मार्ग का नाम उनके नाम  पर किया गया। 2016 से जिला कृषि और औद्योगिक प्रदर्शनी में 2016 से शेवन बिजनौरी नाइट का आयोजन किया जाता है।इसमें सूफी कव्वाली,गजल और फिल्मी गीत प्रस्तुत किए जाते हैं। 

शेवन बिजनोरी के बड़े बेटे मुहम्मद वामिक अक्काशी उर्फ  साजन  बाबू भी मशहूर कव्वाल  हुए।दूसरे बेटे आसिफ अक्कशी मशहूर तबला वादक हैं।इन्होंने लक्ष्मीकांत − प्यारे लाल और भूपेंद्र सिंह मैताली की टीम के कार्यक्रम में तबला बजाया।देश− विदेश में हुए कार्यक्रम में शामिल हुए। तीसरे बेटे मुहम्मद खालिद अक्काशी ब्यूटीशियन हैं। चौथे बेटे मुहम्मद आरिफ अक्काशी  प्रसिद्ध तबला वादक हैं।     

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

Wednesday, April 20, 2022

ये अनुभव अच्छा नहीं रहा

ये अनुभव अच्छा नहीं रहा
हाल में कर्नाटक एक कांफ्रेस में जाना पड़ा। कार्यक्रम था बंगलौर से120 किलो मीटर दूर नांगामंडला ताल्लुक के आदिचुनचुनगिरी मेडिकल कॉलेज में। व्यवस्था के लिए मेडिकल कॉलेज के छात्र- छात्रा लगे थे। पर कोई हिंदी में बात करने को तैयार नहीं था।हालाकि उनकी बातों से लगता था कि वे हिंदी जानते हैं। कार्यक्रम का उद्घाटन श्री आदि चुनचुनगिरी महासमस्थान मथ के स्वामी जी ने किया। स्वामी जी के आने के रास्ते में दोनों ओर प्राचीन काल के सैनिकों के वस्त्रों में बच्चों की फौज थी। ये दोनों और खड़े हवा में तलवार भांज रहे थे। लगता था जैैस युद्ध चल रहा हो। स्वामी के आगे साड़ी पहने नंगे पांव कुछ कन्यांए चल रही थीं। इनके हाथों में धारण थाल में कलश उसमें जल ,कलश के ऊपर नारियल और आम के पत्ते रखे थे। दो प्राचीन काल के राजा जैसे वस्त्र धारे व्यक्ति आपस में युद्ध करते चल रहे थे। एक ने लाल पीले रंग के शाही वस्त्र पहन रखे थे तो दूसरे ने हरें रंग के । स्वामी जी के हाल में प्रवेश कर जाने पर कन्यांए और दोनों योद्धा बाहर ही रह गए। ये कौन थे? काफी पूछने पर भी कोई कुछ नहीं बता सका। मठ के इतिहास और इस परंपरा के बारे में अंग्रेजी में भी पूछने पर कोई कुछ नहीं पता सका। कनोटका यूनियन के पदाधिकारियों को फुर्सत नहीं था। एक दो कोई मिला, पर वह भी कुछ नहीं मदद कर पाया। दिल्ली के एक साथी ने यह जरूर बताया कि ये आदि भैरव का स्थल है।
हमारा घूमने का क्या कार्यक्रम है, इसे भी कोई बताने वाला नहीं था। हमारी पांच मार्च की रात नौ बजे की फ्लाइट थी। हम मैसूर घूमना चाहते थे। मैसूर से बंगलौंर एयर पोर्ट पहुंचने में कितना समय लगेगा। क्या वाहन होगा ,कोई बताने को तैयार नहीं था। विवश हो हमनें बंगलौर लौटने का निर्णय लिया। एक बस चालक ने हमारी मदद की। उसने कहा कि केआरटीसी की बस कॉलेज गेट पर मिल जाएगी। उसे पकड़ लेना ,लगभग तीन घंटे में बंगलौर पंहुचा देगी।
इससे कुछ साल पहले कर्नाटक की ही तुमकुर की एक कांफ्रेस में जाने का अवसर मिला था। तीन दिन वहां रहे । तीनों दिन कन्नड़ में ही भाषण हुए।कहां गया कि सप्ताह के एक दिन हम कन्नड़ में ही बोलते हैं, अन्य भाषा में नहीं, किंतु अधिकतर वक्ता तीनों दिन कन्नड़ में ही बोले। भाई जिन दिनों आप हिंदी -अंग्रेजी में नही बोलते , जिन दिनों इन दोंनो भाषाओं में बात नहीं करते, उन दिनों कांफ्रेस ही क्यों रखते हो?इस बार तो एक वक्ता को बोलते देख के यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष के विक्रम राव ने टोक दिया । कहा कि यहां बड़ी सख्यां में हिंदी भाषी भी हैं,तुमकुर सम्मेलन में वे नहीं थे। अन्य यूनियन नेताओं को कोई चिंता नहीं थी।
खैर बाकी अगली कड़ी में
यहां आप स्वामी जी के आगे चलने वाले दोनों योद्धाओं और कलश लेकर चलने वाली कन्याओं के च‌ित्रों,युद्धरत बच्चों की सेना को को देख्रिए।