Sunday, July 3, 2022

नानौर के जंगल में है सीता मंदिर

 अशोक मधुप 

बिजनौर जनपदवासियों को यह पता भी  नही कि चांदपुर  बाष्टा क्षेत्र के नानौर के जंगल में  सीता मंदिर भी है। पुराने लोग कहते हैं कि सीता यहीं धरती में समाई थी।

इस मंदिर को , सीता मंदिर , सीता बनी और सीतामठ कई नाम से पुकारा जाता है।अब तो यह स्थान कुछ विकसित हो गया, किंतु अब से चालिस −पचास साल पहले यहां कुछ भी नही था। दिन में चरवाहे  पशु चराते और शाम को घार वापस हो जाते।




−−−−

बिजनौर जनपद के इतिहास पर आजतक कोई कार्य नहीं हुआ। जिला गजेटियर से अलग किसी ने कुछ नही किया। न कोई महत्वपूर्ण स्थल घूमा, नहीं कोई जानकारी करने की कोशिश की। इस बारे में कभी किसी जानकार से पूछा तो सबने कहा कि सर सैयद की किताब सरकशे  बिजनौर में जिले का इतिहास है। सच्चाई यह है कि सरकशे  बिजनौर सर सैयद की डायरी है। इसमें उन्होंने 1857 के विद्रोह के समय बिजनौर की तैनाती के दौरान की घटनांए  दर्ज की हैं। जनपद के इतिहास  और ऐतिहासिक स्थलों पर अभी  और खोज कार्य की जरूरत है −−−अशोक मधुप

−−−−−  


लेखक तीन −चार बार इस स्थान पर गया। अंतिम बार बिजनौर हलचल चैनल  चलाने के दौरान लेखक और उसके साथ आज के आज तक के जिला प्रभारी संजीव शर्मा  थे । हम  यहां कई घंटे रूके। लेखक ने हर बार महसूस किया कि मंदिर का द्वार छोटा  है किंतु गुंबद जितना ऊंचा है , गुंबद  उतना ऊंचा  मंदिर के अंदर से नजर नही आता। गुबंद में ऊपर चारों और एक निर्धारित ऊंचाई पर गोल −गोल रोशनदान बने थे।एक साईड में छोटा  द्वार भी है। लेखक ने पशु  चरा रहे लोगों से पूछा कि गुंबद में यह दरवाजा कैसा हैॽ क्या गुंबद खोखला है। उन्होंने हां कहा।गुंबद तक जाने का कोई रास्ता नही था।मेरे कहने पर श्री संजीव शर्मा मंदिर के किनारे की ईंट पकड़कर ऊपर चढ़ गए।मंदिर के कंगूरों से होते वे झुककर दरवाजे से अंदर चले गए।उन्होंने बताया कि ऊपर  कमरा  है। इसमें पांच− छह   आदमी आराम से रह सकतें हैं।छत में चारों ओर बने छेद रोशनी और हवा के   साथ − साथ चारों और देखने  और नजर रखने के लिए भी अच्छा  माध्यम थे। मंदिर के बीच में कोई मूर्ति आदि नहीं लगी थी।एक शिला थी। इस पर कुछ खुदा है। लगता था कि कोई शिलालेख हो।पास में एक कुआं भी था।  इसमें पेड़ उग आए थे। नीचे पुरानी मुगल काल की झामें की ईंट लगी थी। इनके ऊपर लखोरी ईं ट से चिनाई हुई थी। बाद में आज की ईंट से चिनाई  हुई है।  मंदिर भी ब्रिटिश  काल के पहले प्रयोग होने वाली लखौरी (छोटी) ईंट से बना था।

आसपास के लोग बताते हैं कि कभी यहां से होकर गंगा बहती थी। यहीं वाल्मीकि का आश्रम था। यहीं सीता जमीन में समाईं थी। जिला गजेटियर इसके बारे में ज्यादा कुछ नही कहता है।वह कहता है कि जनश्रुति है कि यहां  सीता भूमि में समाई थीं किंतु अनेक जगह के बारे में इस तरह की मान्यता है।

कुछ कहते हैं कि ये क्षेत्र कभी भूड़ का रेतीला जंगल था। जनपद के रेतीले जंगल में ही सीताबनी  नाम की घास  होती थी। बिजनौर जनपद के वन और वन्य संपदा के जानकार, भाकियू के वरिष्ठ नेता दिगंबर सिंह और पीतंबर सिंह ग्राम (बल्दिया), केलनपुर के भोपाल सिहं  दीवान जी आदि पुराने व्यक्ति  बताते हैं कि सीतावनी  तीन चार फिट लंबी घास होती थी। इसकी पत्ती पतली और लंबी होती थी।ये घर के आंगन में झाडू लगाने और पशुओं के नीचे बिछाने के काम आती थी।  वन संपदा के प्रसिद्ध  जानकार खान जफर सुलतान कहते हैं कि सीताबनी  घास में तीतर बहुत होती था। ये तीतर के छिपने के लिए सबसे बेहतर झाड़ी थी। वे कहते हैं कि इसमें हिरन भी होता था। जनपद से भूड़ खत्म हो गई तो ये घास भी गायब हो गई।

चांदपुर क्षेत्र के रहने वाले जनपद के इतिहास के बड़े जानकार प्रोफेसर खालिद अलवी कहते हैं कि चांदपुर के नानौर −दत्याना आदि  जंगल में  सीता बनी नामक झाड़ी ज्यादा होती थी। इसी की  वजह से इस स्थान को सीताबन कहा जाता  रहा होगा। हो सकता है कि सीतावन में बना मंदिर सीतामठ या  सीतावनी  या सीता  मंदिर  कहा  जाता रहा हो।     

मंदिर के  गुंबद का बना कमरा बताता है कि यह गुंबद उस समय के मंदिर में रहने वालों के लिए सुरक्षित जगह रही होगी। वे इसमें वन्य प्राणियों से भी  सुरक्षित होंते और एक दो हमलावर से भी।गुंबद के कमरे तक पंहुचने का  न  कोई  जीना है न स्पोर्ट। मंदिर के कंगूरों से होकर  कक्ष के द्वार तक जाया जा सकता है।द्वार से अंदर जाने का प्रयास करने वाला आदमी अंदर बैठे व्यक्ति के  आक्रमण का     

सीधे शिकार हो सकता है।यह भी हो सकता है कि यह स्थल गंगा पर नजर रखने के लिए प्रयोग होता हो। ऊपर गुंबद में बैठे व्यक्ति दिखाई भी नहीं पड़ते होंगे। मंदिर के बीच में लगी शिला को देखकर  लेखक को सदा लगा कि यह कोई शिला लेख  है।

अब मंदिर की देखरेख करने वालों मंदिर के पुराने अस्तित्व में काफी बदलाव कर दिया। मंदिर के बीच में शिवलिंग की स्थापना कर दी। शिलालेख साइड में लगवाई गई प्रतिमा के दीप या पूजन सामग्री प्रयोग करने के काम आने लगा।गुंबद के गोला छेद बंद कराकर द्वार  बड़ा कर  दिया गया। कुंए की  सफाई कर उसे  अब प्रयोग में लाया जाने लगा।

पर इस मदिर पर अभी खोज कार्य  होना चाहिए। पुरातत्व विभाग  को यहां आकर उसकी प्राचीनता और मंदिर में लगे  शिलालेख जैसे पत्थर की जांच करनी चाहिए।   

अशोक मधुप 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Monday, May 2, 2022

 

परशुराम  जंयती पर तीन मई  पर विशेष

गौरी शंकर सुकोमल जी ने लिखी 0





 परशुराम पर भगवान परशु रामायण

अशोक मधुप

आज भगवान परशुराम की जयंती  अक्षय तृतीया है। आज भगवान परशुराम का अवतरण दिवस है।दुनिया के सात अमर व्यक्तियों में भगवान परशुराम की भी गणना होती है।भगवान परशुराम पर भक्तों और श्रद्धालुओं द्वारा  सदियों से लिखा जा रहा है।सबने अपने – अपने   दृष्टिकोण से भगवान परशुराम को पढ़ा, देखा और लिया।

उत्तर प्रदेश के धामपुर नगर के तो विद्वान पंडित गौरी शंकर शर्मा सुकोमल ने भगवान परशुराम के जीवन चरित्र  पर पूरी परशु रामायण लिख दी। इस परशु रामायण की विशेष बात यह है कि ये गेय है। राधेश्याम कथा वाचक की रामायण की तर्ज पर लिखी ये रामायण गाई जा सकती है। गाई जाती है। गाई जा रही है।

 17 फरवरी 1943 में जन्में पंडित गौरी शंकर शर्मा सुकोमल बीए, साहित्य रत्न हैं। वे मूल  रूप से पत्रकार और  लेखक हैं। रंगमंच और कथावाचन से जुडे गौरीशंकर शर्मा जी के मन में

आया कि भगवान परशुराम पर तथ्यात्मक  रूप से  कुछ नही मिलता।ये  विचार आते ही उन्होंने भगवान परशुराम पर रामायण लिखने का निर्णय लिया। ये भगवान परशुराम पर मिले साहित्य के अध्ययन में लग गए।इस विषय पर उपलब्ध साहित्य का अध्ययन किया। तर्कना पर कसा। इस कार्य में कई  साल लग गए। दिन रात लगकर  जब विषय सामग्री एकत्र हुई तो प्रश्न था कि भाषा− शैली क्या हो। ये  रामायण  आम आदमी तक कैसे पंहुचे और लोकप्रिय हो ,गाई भी जा सके। इसके बाद इन्होंने विभिन्न धार्मिक ग्रन्थों का  अध्ययन किया।विद्वानों से विचार किया। बताया गया कि भगवान राम पर बहुत कुछ लिखा गया।किंतु राधे श्याम कथा वाचक की रामायण ज्यादा गेय है।निर्णय हुआ कि राधेश्याम शर्मा कथा वाचक की रामायण की त्तर्ज पर इसे लिखा जाए।इस पर  इन्होंने राधेश्याम शर्मा की रामायण के शिल्प को समझा। उसका मनन किया।

इसके बाद जो लिखना शुरू किया तो परशु रामायण को पूरी करके रूके। इस कार्य के लिए इन्होंने दिन −रात एक कर दिए।परशु रामायण  तो तैयार हो गई किंतु इसके प्रकाशन की समस्या आई । कहीं से भी मदद न मिलने पर सुकोमल जी निराश नही हुए।उन्होंने अपने संकल्प को पूरा करने के लिए अपनी गृहणी के जेवर भी बेच दिए।   

श्री गौरी शंकर सुकोमल जी स्वीकार करते हैं कि उन्होंने सामग्री संजोने और एकत्र करने में तीन−  चार साल लग गए। परशु रामायण  में अपनी  बात शीर्षक के अंतर्गत वह स्वीकार करते हैं कि मैं मूल रूप से कवि और साहित्यकार हूं फिर भी इसे कथावाचन के उद्देश्य से लिखने का प्रयास किया। इन्होंने  अपने ग्रन्थ का आधार बनाया डा. डी आर शर्मा के शोध ग्रन्थ भगवान परशुराम को । सुकोमल जी बताते हैं कि वह गद्य में है। उन्होंने अपनी पुस्तक का कथा  वाचन के हिसाब से गेय बनाया। अपनी कसौटी पर आए तर्क को शामिल किया।

कुल 12 संर्गो में विभक्त परशु रामाणय को को 224 शीर्षक में विभक्त किया गया है। यह परशु रामाणय 500 पृष्ठों  में है। 17 बार क्षत्रियों के विनाश की बात पर वह कहते है कि भगवान परशुराम ने ऐसे दुष्टों का संघार किया जो  आर्य  विरोधी थे। इसे गलत रूप में समाज में प्रचारित किया गया।

परशु रामायण के कुछ अंश−

महर्षि जमदग्नि के वध  का जब समाचार, चंहु और गया।

ऋषिगण, संबंधी, राजागण, सबके मन को झकझोर गया।

सब समझ गए, सब जान गए, इसमें कोई संदेह नहीं,

यह क्रूर कृत्य अर्जुन सुत का, इसमें कोई अंदेह नहीं।

मिल गया शोक संदेश तभी,आश्रम परशुराम लौट आए।

युवको की आर्य सेना भी, वह साथ− साथ लेते आए।−−−−

माता का ये रूदन सुन , बिलख उठे भ्रगुनाथ।

सांत्वना  भरे शब्द कुछ, बोले तक मुनि नाथ।

पृथ्वी पर जिसने जन्म लिया, वह निश्चय एक दिन मरता है।

जो जलता है, वह बुझता है, जो फलता है, वह झरता है।

हे माता क्यों अज्ञान युक्त, तुम रिश्तों का दम भरती हो1

जो नही शोक करने लायक, उसका क्यों गम करती हो।

कुछ चले गए इस दुनिया से, बाकी के भी सब फानी हैं।

दोनों पर जिनको शोक नहीं,बस वे ही सच्चे ज्ञानी हैं।

यह नही आत्मा नाशवान, एक अदभुत सुंदर ज्योति है।

वस्तु ये एक अनादि है, जो सबके अंदर होती है।

क्षण भंगुर है सुख−दुख सभी,जो  इस शरीर  पर आते हैं।

तुम सहन करो सब धीरज से,ये अपना चक्र चलाते हैं।

−−−

लाचार हो गया भ्रगुवंशी, भ्रगुकुल का गौरव रखना है।

मदमत्त हुए हैह्यवंशी,  इसका फल उनको चखना है।

  अब आर्य धरा पर ये श्रत्रप,  चैन नही ले पांएगे।

जो प्रजा विरोधी राजा हैं, सीधे यमलोक में जांएगे।

मैं शपथ पूर्वक कहता हूं, चुन− चुन दुष्टों को मारूंगा।

संस्थापन धर्म हेतु अब, राक्षस नरेश संहारूंगा।

पंडित  गौरी शंकर शर्मा सुकोमल जी लिखी परशु रामायण का अध्ययन करने वाले विद्वानों की राय है कि  ये परशु रामायण मात्र कथा काव्य नही है।ये एतिहासिक तथ्यों को विश्लेषण  हैं।

अशोक मधुप

(लेखक  वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

 

 

 

Sunday, May 1, 2022

आज भी गाईं जाती हैं शेवन बिजनौरी की कव्वाली,गीत, गजल और भजन

 30 अप्रेल के लिए


शेवन बिजनौरी के जन्म दिन पर 



आज भी गाईं जाती हैं शेवन बिजनौरी की कव्वाली,गीत, गजल और भजन

फोटो

अशोक मधुप 

आज शेवन  बिजनौरी का जन्म दिन है।आज वे हमारे बीच नही है किंतु उनकी लिखी कव्वाली, गीत, गजल और भजन आज भी लोग गाते और सुनते हैं। उनके लिखी कव्वाली,भजन,गजल और   गीत बहुत मशहूर हुए।

फैय्याज  अहमद उर्फ शेवन बिजनौरी का जन्म  बिजनौर के मुहल्ला मिर्दगान में 30 अप्रेल 1930 का हुआ।  फैय्याज अहमद उर्फ शेवन बिजनौरी के पिता बदर हुसैन कव्वाल थे।दादा नत्थू खां शिक्षक थे। शेवन बिजनौरी बचपन से अपने पिता के साथ रहते थे।  पिता की कव्वाल पार्टी में जाने के कारण इन्हें कव्वाली गायन के सारे हुनर आ गए। शायरी का शौक बचपन से  ही था।1952 में मदीना प्रेस के एक मुशायरे में जिगर मुरादाबादी आए। शेवन  बिजनौरी तभी उनके बाकायता शार्गीद बन गए। इसके बाद शेवन बिजनौरी की शायरी परवाज चढ़ने लगी। 1957 मे पिता का देहान्त होने के बाद  शेवन बिजनौरी अकेले रह गए। वे बिजनौर छोडकर मेरठ चले गए। वहां शायर शौरिश मुजफ्फरनगरी से बाकायदा शायरी की सलाह लेने लगे।उन्होंने अपनी  कव्वाली की पार्टी बना ली। शेवन बिजनौरी अपनी कव्वाल पार्टी को लेकर वे अहमदाबाद चले गए।अहमदाबाद में  उनका कामयाब प्रदर्शन रहा। उस समय वहां  इस्माइल आजाद,शंकर− शंभू,युसूफ आजाद आदि की प्रसिद्ध कव्वाल पार्टी थीं। शेवन बिजनौरी खुद ही गजल ,गीत शेर और कव्वाली लिखते और गाते थे,  इसलिए कोई भी दूसरी पार्टी मुकाबलों में उनसे जीतती नहीं थी। ये प्रोग्राम में हाथों−हाथ कव्वाली का जवाब लिखते  और गाते।  इनकी कव्वाली लोगों द्वारा गुनगुनाई और गाई  जाने लगीं।

1969−1970 में आपका नातियां जमाले मुहम्मद  दीवान  दिल्ली की रतन एंड कंपनी ने छापा।यह बहुत पंसद किया गया।आपके  कलाम की  हिलाले अरब, मुस्लिम के लाड़ले, कव्वाली मजमुआ आदि छोटी− मोटी लगभग 500 किताबें छपीं।1973 में गजलों का दीवान सैल−ए− रवां के नाम से छपा।एक दीवान प्रीत के धागे हिंदी में छपा।1980 में घूंघट की आड़ में दीदार अधूरा रहता है, प्रकाशित हुआ। इन सब से इनकी प्रसिद्धि आसमान पर पंहुच गई। घूंघट की आड़ में दीदार अधूरा रहता है, दीवान की इसी नाम की  कव्वाली घूंघट की आड़ में दीदार अधूरा  रहता है, को 1985 में बाबू लाल कव्वाल ने कैसिट सोनियों टोन कंपनी दिल्ली के लिए गाया। ये ही कव्वाली डाइरेक्टर नासिर हुसैन ने अपनी फिल्म हम हैं राही प्यार के में नदीम श्रवण के संगीत में गायक कुमार शानू और कविता कृष्ण मूर्ति ने गवाई।  ये कव्वाली इतनी हिट हुई कि 1993 में इसे फिल्म फेयर अवार्ड मिला। 1990 में टी सीरीज के लिए गुलाम अली म्यूजिक डाइरेक्टर के अलबम अफसाना में वो  मुझको छोड़के जाना  चाहता है,अनुराधा पौडवाल और सोनू निगम ने गाया। भारत के अलावा दूसरे मुल्कों के कव्वाल मेंहदी हसन,परवेज मेंहदी,नुसरत फतह अली खां  ने भी शेवन बिजनौरी को  गाया।        

 शेवन बिजनौरी के पुत्र प्रसिद्ध ढ़ोलक वादक आसिफ अक्काशी बतातें हैं कि उनके पिता की कव्वाली गजल और कलाम देश के अधिकांश मशहूर गायक और कव्वालों ने गाए।युसूफ  आजाद कव्वाल ने  उनकी कव्वाली सीने में मुहब्बत की रहती है, जलन बरसों, जानी बाबू कव्वाल मुंबई ने ऐ जाने तमन्ना जाने जिगर,अजीज नांजां मुंबई ने मुहब्बत का जमाना आ गया है,फिल्मी सिंगर अनुराधा पौडवाल ने  वह मुझको छोड़ जाना चाहता है,अनूप जलौटा ने भजन −पकड़े गए कृष्ण भगवान,अलताफ राजा ने तू मेरी जान है,राम शंकर ने कैसेट जलवा है जलवा, अलका याज्ञनिक ने फिल्म हम हैं राही प्यार के में घूंघट की आड़ में दिलवर का गाए।

आसिफ अक्काशी बतातें हैं कि 1999 में तबियत खराब होने के कारण उनके पिता शेवन बिजनौरी अपने घर  बिजनौर आ गए । 22 जून 2021 को उनका निधन हो गया।शेवन बिजनौरी की याद में उनके घर के सामने  वाले मार्ग का नाम उनके नाम  पर किया गया। 2016 से जिला कृषि और औद्योगिक प्रदर्शनी में 2016 से शेवन बिजनौरी नाइट का आयोजन किया जाता है।इसमें सूफी कव्वाली,गजल और फिल्मी गीत प्रस्तुत किए जाते हैं। 

शेवन बिजनोरी के बड़े बेटे मुहम्मद वामिक अक्काशी उर्फ  साजन  बाबू भी मशहूर कव्वाल  हुए।दूसरे बेटे आसिफ अक्कशी मशहूर तबला वादक हैं।इन्होंने लक्ष्मीकांत − प्यारे लाल और भूपेंद्र सिंह मैताली की टीम के कार्यक्रम में तबला बजाया।देश− विदेश में हुए कार्यक्रम में शामिल हुए। तीसरे बेटे मुहम्मद खालिद अक्काशी ब्यूटीशियन हैं। चौथे बेटे मुहम्मद आरिफ अक्काशी  प्रसिद्ध तबला वादक हैं।     

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

Wednesday, April 20, 2022

ये अनुभव अच्छा नहीं रहा

ये अनुभव अच्छा नहीं रहा
हाल में कर्नाटक एक कांफ्रेस में जाना पड़ा। कार्यक्रम था बंगलौर से120 किलो मीटर दूर नांगामंडला ताल्लुक के आदिचुनचुनगिरी मेडिकल कॉलेज में। व्यवस्था के लिए मेडिकल कॉलेज के छात्र- छात्रा लगे थे। पर कोई हिंदी में बात करने को तैयार नहीं था।हालाकि उनकी बातों से लगता था कि वे हिंदी जानते हैं। कार्यक्रम का उद्घाटन श्री आदि चुनचुनगिरी महासमस्थान मथ के स्वामी जी ने किया। स्वामी जी के आने के रास्ते में दोनों ओर प्राचीन काल के सैनिकों के वस्त्रों में बच्चों की फौज थी। ये दोनों और खड़े हवा में तलवार भांज रहे थे। लगता था जैैस युद्ध चल रहा हो। स्वामी के आगे साड़ी पहने नंगे पांव कुछ कन्यांए चल रही थीं। इनके हाथों में धारण थाल में कलश उसमें जल ,कलश के ऊपर नारियल और आम के पत्ते रखे थे। दो प्राचीन काल के राजा जैसे वस्त्र धारे व्यक्ति आपस में युद्ध करते चल रहे थे। एक ने लाल पीले रंग के शाही वस्त्र पहन रखे थे तो दूसरे ने हरें रंग के । स्वामी जी के हाल में प्रवेश कर जाने पर कन्यांए और दोनों योद्धा बाहर ही रह गए। ये कौन थे? काफी पूछने पर भी कोई कुछ नहीं बता सका। मठ के इतिहास और इस परंपरा के बारे में अंग्रेजी में भी पूछने पर कोई कुछ नहीं पता सका। कनोटका यूनियन के पदाधिकारियों को फुर्सत नहीं था। एक दो कोई मिला, पर वह भी कुछ नहीं मदद कर पाया। दिल्ली के एक साथी ने यह जरूर बताया कि ये आदि भैरव का स्थल है।
हमारा घूमने का क्या कार्यक्रम है, इसे भी कोई बताने वाला नहीं था। हमारी पांच मार्च की रात नौ बजे की फ्लाइट थी। हम मैसूर घूमना चाहते थे। मैसूर से बंगलौंर एयर पोर्ट पहुंचने में कितना समय लगेगा। क्या वाहन होगा ,कोई बताने को तैयार नहीं था। विवश हो हमनें बंगलौर लौटने का निर्णय लिया। एक बस चालक ने हमारी मदद की। उसने कहा कि केआरटीसी की बस कॉलेज गेट पर मिल जाएगी। उसे पकड़ लेना ,लगभग तीन घंटे में बंगलौर पंहुचा देगी।
इससे कुछ साल पहले कर्नाटक की ही तुमकुर की एक कांफ्रेस में जाने का अवसर मिला था। तीन दिन वहां रहे । तीनों दिन कन्नड़ में ही भाषण हुए।कहां गया कि सप्ताह के एक दिन हम कन्नड़ में ही बोलते हैं, अन्य भाषा में नहीं, किंतु अधिकतर वक्ता तीनों दिन कन्नड़ में ही बोले। भाई जिन दिनों आप हिंदी -अंग्रेजी में नही बोलते , जिन दिनों इन दोंनो भाषाओं में बात नहीं करते, उन दिनों कांफ्रेस ही क्यों रखते हो?इस बार तो एक वक्ता को बोलते देख के यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष के विक्रम राव ने टोक दिया । कहा कि यहां बड़ी सख्यां में हिंदी भाषी भी हैं,तुमकुर सम्मेलन में वे नहीं थे। अन्य यूनियन नेताओं को कोई चिंता नहीं थी।
खैर बाकी अगली कड़ी में
यहां आप स्वामी जी के आगे चलने वाले दोनों योद्धाओं और कलश लेकर चलने वाली कन्याओं के च‌ित्रों,युद्धरत बच्चों की सेना को को देख्रिए।

Friday, March 11, 2022

हरसुख लाल लोहिया

अशोक मधुप किसी के यहां बेटी की शादी हो। बारात घर पर आई हुई हो, ऐसी हालत में क्या कोई बारात के लिए तैयार खाना किसी अनजान व्यक्तियों को खिला सकता है। कल्पना भी नहीं होती, किंतु एक भामाशाह ने ऐसा किया। 1857 की क्रांति के समय उनके शहर से अंग्रेज फोज के विद्रोही जवान की टुकड़ी जा रही था।उन्हें पता चला। घर से भागकर शहर के बाहर सड़क पर पंहुचे।इन जवानों को रोका । अपने साथ घर चल कर भोजन करने का आग्रह किया।उन सबको सम्मान के साथ अपनी हवेली लिवा लाए। बारातियों को समझा कर खाना खाने से रोका। कहा−यह आजादी के दीवाने हैं। पता नही कब से इन्हें अच्छा भोजन नही मिला।आप भोजन बाद में खा लेना। पहले इन्हें खा लेने दो। अब तो सब व्यवस्थाएं सरलता से हो जाती हैं। एक बात 1857 की उस समय की है ,जब शादी व्याह के लिए एक −एक छोटा मोटा सामान सब परिवार को एकत्र करना पड़ता था ।ये घटना है उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद के धामपुर नगर की। 1857 की क्रांति के समय उत्तर प्रदेश के धामपुर (बिजनौर)के सेठ हरसुख राय लोहिया हुए हैं।इस जंग ए आजादी के दौरान इनकी बेटी की शादी थी।बारात आई हुई थी।इनकी हवेली में बारात के खाने का प्रबंध था।शानदार व्यवस्था थी।तरह- तरह के भोजन औऱ मिठाई बनी थीं। इन्हें पता चला कि अंग्रेज सेना के भारतीय जवानों का एक दल विद्रोह करके रुड़की से बरेली जा रहा है। शहर से गुजर रहे आजादी के मस्तानों को इन्होंने हाथ जोड़कर रोक लिया।अपनी हवेली ले आये।सबसे कहा- भोजन करो।पता नही कबसे ठीक से खाना नहीं मिला होगा।बारातियों को भी हाथ जोड़ें।कहा -कुछ देर रुक जाए।इनके बाद आप जीम लेना। ये नजारा देख बाराती भी क्रांतिकारी जवानों की सेवा में लग गये। कोई दाल परोसने लगा।कोई चावल। कोई मिठाई देने में लग गया।सूचना पर शहरवासी भागकर इनकी हवेली आने लगे। वह भी ये नजारा देखकर भाव विभोर हो गए। वे सब भी इन क्रांतिकारियों की सेवा श्रुवा में लग गए।शहरवासी भी जवानों के लिए अपने घर से कुछ न कुछ लेकर आये।काफी राशन एकत्र करके इन्हें सौंपा।ताकि इन्हें रास्ते में भोजन की कमी न रहे। इन वीरों का बारात से बड़ा स्वागत हुआ।क्या नजारा होगा। ऐसे देशभक्त भामाशाह हरसुख राय लोहिया को आज धामपुर में कोई जानता भी।धामपुर में पूरा लोहियों का मुहल्ला है लोहियान। किसी को कुछ पता नहीं।हो सकता है अंग्रेजों ने पूरे परिवार का कत्ल कर दिया हो। 1857 की क्रांति के समय बिजनौर में तैनात रहे सदर अमीन सर सैयद ने उस समय की घटनाओं की डायरी लिखी। नाम दिया सरकशे बिजनौर। वे कहते हैं कि सैपर्स एंड माइनर्स की एक कंपनी के तीन सौ जवान विद्रोही हो गए।इन्हें सहारनपुर में कमांडर-इन-चीफ के शिविर में शामिल होने के लिए भेजा गया था, पर ये रुड़की लौट आई। वहां से बरेली के लिए चले। 20 मई को इन्होंने नजीबाबाद में नवाब महमूद को बागवत के लिए तैयार किया।खुद बरेली के लिए निकल गए। विभिन्न सूत्रों से मिल रही सूचनाओं से नगीना प्रशासन सचेत था। तहसील कार्यालय का दरवाजा बंद था, लेकिन खिड़की खुली रह गई। अचानक तीन सिपाही खिड़की के रास्ते तहसील कार्यालय में घुसे । तहसीलदार से सामान की मांग की। इसी दौरान कई अन्य जवानों ने तहसील कार्यालय में घुसकर तहसीलदार को संगीनों से घेर लिया। उसे जबरदस्ती दरबार की इमारत में ले गए। उन्होंने बंदूक की बटमार कर संदूक तोड़ दिए और खजाने को लूटने के लिए ताला तोड़ दिया। इस दौरान तहसीलदार व पुलिस उपायुक्त एक घर में छिपने के लिए फरार हो गए। जब सिपाही उनके पीछे आए, तो वे थोड़े समय के लिए शहर से चले गए। बादमें वे दूसरे रास्ते से दूसरे स्थान पर छिपने के लिए वापस आ गए। उन्होंने कलेक्टर को रिपोर्ट भेजी है। तहसीलदार के प्रभाव को लूटने और बाजार में तोड़फोड़ करने के लिए शहर के कई शरारती सैनिकों में शामिल हो गए थे। इन्होंने एक बहुत धनी व्यक्ति भगीरथ को भी लूट लिया। । इन्होंने तहसील में खजाने में जमा 10344 रूपये और 14 आना लूट लिए। नगीना के बाद सैपर एंड माइनर कंपनी के सोल्जर्स धामपुर पंहुचे।उसकी खबर पहले धामपुर पहुंच चुकी थी। तहसीलदार ने अपना कार्यालय बंद कर दिया था, जबकि उसके आदमी अंदर अलर्ट पर थे। सर सैयद कहतें हैं कि गनीमत यह भी रही कि आज ही के दिन हर सुख राय लोहिया के घर लड़की की बारात आई हुई थी। उसने बारात के लिए तैयार खाना उत्तम मिठाइयाँ इन जवानों को बड़े प्यार से खिलाईं। । नगरवासियों ने उन्हें राशन भी दिया। सैनिकों ने वहां कोई परेशानी नहीं की और मुरादाबाद के लिए रवाना हो गए। सर सैयद ने यह नही लिखा कि अंग्रेजों ने वापास जनपद पर कब्जा करने के बाद हरसुख लाला लोहिया पर क्या कार्र्वाई की। जबकि विद्रोही जवानों को भोजन कराना बड़ा अपराध था। धामपुर के रहने वालों ने भी इस महान आत्मा का पता लगाने का प्रयास नही किया कि उनका क्या हुआॽ हो सकता है कि अग्रेज ने इन्हें फांसी दे दी हो। अंग्रेज के जिले पर कब्जा होने के बाद सरकारी जुल्म के डर से ये ही शहर छोड़कर चले गए हों। अशोक मधुप (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Thursday, March 10, 2022

आपरेशन गंगा और सीनियर सिटीजन का अहसास

−−−−−− यूक्रेन में फंसे छात्रों में 18400 आसपास भारतीय छात्र अब तक स्वदेश वापिस आ गए। उम्मीद है कि वहां बचे बाकी भारतीय छात्र भी जल्दी ही वापिस आ जाएंगे।भारत ने यूक्रेन में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों को वापिस लाने के अभियान को आपरेशन गंगा नाम दिया। यूक्रेन से भारतीयों को निकालने के अभियान की मानीटरिंग स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की। उन्होंने इसमें केंद्र के चार मंत्रियों को लगाया गया। यूक्रेन की सीमा से सटे चार देश और 19 हजार के आसपास भारतीय छात्रों को सुरक्षित निकालना देश के सामने एक बड़ी चुनौती थी । इन मंत्रियों को इन चार अलग− अलग देशों में भेजा गया ताकि वह वहां की सरकार से समन्वय बनाकर सही से आपरेशन को कामयाब कर सकें। इन सबकी मेहनत , मिला −जुला प्रयास रंग लाया। 22 फरवरी, 2022 को अभियान प्रारंभ हुआ। अब तक 18400 के लगभग छात्र यूक्रेन से लाए गए। इस अभियान में वायुसेना को भी लगाया गया। सूमी में फंसे 680 वे छात्र भी बसों से लेकर सीमा तक ले आये गए जो वीडियो जारी कर उन्हें न निकालने के लिए भारतीय दुतावास को जिम्मेदार बता रहे थे। वह कह रहे थे कि उन्हें कुछ हो गया तो यूक्रेन का भारतीय दूतावास जिम्मेदार होगा।इसी दूतावास ने उन्हें निकालने की जिम्मेदारी उठाई , जिसे ये कोस रहे थे। वैसे तो यूक्रेन में कई देशों के नागरिक फंसे हैं ,लेकिन अपने लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए भारत ने दुनिया का सबसे तेज ऑपरेशन चलाया।अपने नागरिक और वहां फंसे छात्रों को बाहर निकाला। आपरेशन की कामयाबी यह है कि युद्ध के बीच ये छात्र सुरक्षित देश लौटे। एक छात्र का ही जान गवांनी पड़ी। इस अभियान की खास बात यह रहीं कि युद्धरत रूस और यूक्रेन ने तिरंगा लगी बसों को सेफ पैसेज दिया गया। खबर तो यहां तक आई कि भारतीयों की सुरक्षित निकासी के लिए रूसी सेना की तरफ से छह घंटे हमले भी रोक दिए गए थे। इस अभियान की खास बात यह है कि भारत सरकार ऑपरेशन का पूरा खर्च खुद वहन कर रही है। छात्रों को यूक्रेन से निकालकर लाने, दूसरे सीमावर्ती देश में उनके रहने और खाने आदि की व्यवस्था करना सरल काम नही था, किंतु केंद्र सरकार के दृढ़ संकल्प के कारण यह हो सका। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि यूक्रेन में फंसे एक− ए छात्र को निकालकर लाया जाएगा। एक छात्र के भी यूक्रेन में रहने तक आपरेशन जारी रहेगा। इस आपरेशन और भारत सरकार की कार्रवाई की पूरी दुनिया में तारीफ हो रही है। पर यूक्रेन में पढ़ने गए छात्र और उनके अभिभावकों के बयान पीड़ादायक रहे। एक छात्रा की मांग थी कि उसे मुंबई से दिल्ली अपने पैसे से आना पड़ा। सरकार यह पैसा उसे दे, क्योंकि यह छात्रों को निशुल्क लाने का दावाकर रही है। एक अभिभावक ने कहा कि उसने 50 लाख रूपये कर्ज लेकर बेटे को पढ़ने भेजा था, अब क्या होगा। उनका मन्तव्य रहा कि सरकार यह पैसा भी उसे दे। किसी की शर्त थी, कि वह भारत आएगा तो अपने पालतू कुत्ते के साथ तो किसी की जिद थी कि उसे अपनी पालतू बिल्ली लेकर प्लेन में नहीं आने दिया जा रहा। आज सुबह मैं रोज की तरह घूमने पार्क में पहुंचा तो वहां कुछ सीनियर सिटीजन में रोज की तरह जोरदार बहस चल रही थी। आज का बहस का मुद्दा भारत सरकार का आपरेशन गंगा ही था।एक का कहना था कि भारत के नागरिक हैं , विपरीत परिस्थिति में उन्हें वापस लाने की जिम्मेदारी देश ही है, किंतु देश उनके आने और आने की व्यवस्था का खर्च क्यों उठाए। ये छात्र वहां समाज सेवा करने नहीं गए थे। वहां से लौटकर भी समाज सेवा नहीं करेंगे। योग्य भी नही थे। योग्य होते तो देश के मेडिकल काँलेजों में प्रवेश मिल जाता। मां बाप ने पैसे के बल पर उन्हें यूक्रेन डाक्टर बनाने भेजा था।अब वहां से उल्टी −सीधी डाक्टरी पढ़कर अपना अस्पताल चलांएगे।मरीज देखने की मोटी फीस लेंगे। अपने मोटे कमीशन के लिए उल्टे −सीधे टैस्ट करांएगे । दवाई भी कमीशन वाली लिखेंगे। जिस तरह से बस चलेगा मरीज के परिवार को लूटेंगे।इनपर क्यों सरकारी पैसा लुटाया जा रहा हैॽ एक का कहना था कि ये पैसा देश के टैक्स पैयर ( टैक्स देने वाले नागरिक )का है। सरकार का नही कि खैरात बांट दे । ये कहीं और देश की जरूरत पर लगाया जा सकता था । एक अन्य की राय थी कि आज चीन के आक्रामक रूख को देखते हुए सेना के संसाधान बढाने,उसे आधुनिक शास्त्रों की खरीद पर खर्च होना चाहिए था।फालतू के लिए टैक्सदाताओं की खून पसीने की कमाई का खरबों रूपया इन पर बर्बाद कर दिया। एक ने कहा कि यह तो जीवन के खतरे हैं। चुरू का एक व्यापारी छह माह पूर्व आठ लाख रूपये लेकर यूक्रेन गया था। युद्ध के हालात में सब छोड़कर भागना पडा, फिर तो सरकार उसके भी नुकसान की भरपाई करे।एक अन्य ने यूक्रेन से भारत लौटी उसे बेटी के अभिभावकों की प्रशंसा की जिन्होंने बेटी के भारत आने पर उसके के किराये के 32 हजार रूपया प्रधानमंत्री और मुख्य मंत्री कोष में जमाकर दिया। बहस में शामिल सबने इस बिटिया के अभिभावकों की प्रशंसा की। उनके लिए ताली बजाईं।कहा कि अन्य छात्र− छात्राओं के अभिभावकों को इस तरह की जिम्मेदारी का परिचय देना चाहिए। एक व्यक्ति ने इसी को लेकर वायरल हो रहा एक युवती का वीडियो सबको सुनाया।इसमें भी कुछ ऐसा ही है कहा गया जो आज बहस में कहा जा रहा था।सबने इस वीडियो की तारीफ की। सबने इन छात्र और अभिभावकों के रवैये की आलोचना की ।मांग की कि सरकार इन छात्रों पर व्यय हुआ पैसा इनके परिवार से वसूल करें। देर होती देख मैंने बहस बीच में ही छोड़ खिसकना बेहतर समझा।वैसे इन सीनियर सिटीजन की बात मुझे तो सही सी लगी,आप क्या महसूस करते हैं ये आप पर निर्भर हैॽ अशोक मधुप (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) %%% ये मेरा लेखा10 मार्च् के देश रोजाना और 9 मार्च के प्रभासाक्षाी ने प्रकाशाित किया।

Wednesday, February 2, 2022

कनाड़ा के ट्रक चालक और भारत के किसान आंदोलन की समानता


कनाडा के ट्रक चालक और दिल्ली के किसान आंदोलन में काफी कुछ एक जैसा ही है। ये  ट्रक चालक अपने – अपने ट्रक लेकर कनाडा की राजधानी ओटावा आए हैं। भारत में किसान अपने ट्रेक्टर लेकर दिल्ली पर चढ़ने के इरादे से आए थे। किसान भी लंबे समय रूकने के लिए खाने −पीने का सामान लेकर आए और एक साल रूके। ये ट्रक चालक  भी रूकने की तैयारी के साथ आए हैं। 

कनाडा में पचास हजार के आसपास ट्रक चालकों ने  प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो  का निवास शनिवार को घेर  लिया। वे अपने ट्रक साथ लिए हुए है। ये ट्रक चालक अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन  कर रहे हैं।  नारे लगा रहे हैं। वाहनों के हाँर्न बजा रहे हैं।ये लंबे समय के  प्रवास के इरादे से खाने −पीने का सामान लेकर राजधानी आए हैं।  हालत इतनी खराब है कि   राजधानी ओटावा के चारों और सत्तर मील तक   जाम लगा हुआ है। शहरवासी परेशान है।  ट्रक  चालकों ने अपने करीब 70 किमी लंबे काफिले को 'फ्रीडम कान्वॉइ' नाम दिया है। ट्रक वाले कनाडा के झंडे के साथ 'आजादी' की मांग वाले झंडे लहरा रहे हैं। वे पीएम ट्रूडो के खिलाफ जमकर नारेबाजी कर रहे हैं।  आंदोलन को हजारों अन्य प्रदर्शनकारियों का भी साथ मिल रहा है।सड़कों पर हजारों की संख्या में बड़े-बड़े ट्रकों की आवाजें लगातार सुनाई दे रही हैं । ये  ड्राइवर ट्रकों के  हॉर्न लगातार बजाकर सरकार का विरोध कर रहे हैं। वे संसद के पास पहुंच गए हैं।हालत इतनी खराब  है कि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो  और उनके  परिवार ने   भारी विरोध प्रदर्शन की वजह से देश की राजधानी स्थित अपने आवास को छोड़ दिया है। वे किसी गुप्त स्थान पर जाकर छिप गए हैं।

 ये ट्रक चालक कोरोना वैक्सीन जनादेश और अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिबंधों को समाप्त करने का  विरोध कर रहे हैं।  बताया जा रहा है कि यह एक जगह पर ट्रकों का दुनिया का सबसे बड़ा जमावड़ा है। खबरें के मुताबिक पूरे कनाडा से करीब एक सप्‍ताह की लंबी यात्रा करने के बाद ये विशालकाय ट्रक राजधानी ओटावा पहुंचे हैं। प्रदर्शन के आयोजकों ने जोर देकर कहा है कि यह आंदोलन शांतिपूर्ण होगा ,पर  इतनी भीड़ के सामने पुलिस लाचार नजर आ रही है।पुलिस ने कहा है कि वे इस संकट के लिए तैयार नहीं हैं।
 ट्रक चालकों में गुस्सा इस बात का भी है कि कुछ दिन पहले कनाडाई पीएम ने एक  बयान में ट्रक वालों को 'महत्व नहीं रखने वाले अल्पसंख्यक' करार दिया था। पीएम ट्रूडो ने कहा है कि ट्रक वाले विज्ञान के विरोधी हैं। वे न केवल खुद के लिए बल्कि कनाडा के अन्य लोगों के लिए खतरा बनते जा रहे हैं।शहर में स्थिति गंभीर हो गई है। आलम यह है कि ओटावा जाने वाले रास्ते पर ट्रकों की 70 किमी तक लंबी कतार लग गई है जिसके कारण अन्य यात्रियों को भी आने-जाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

लगता है कि कनाडा सरकार ने इस आंदोलन को गंभीरता से  नही लिया।एक सप्ताह पूर्व चले आंदोलनकारियों  के ट्रक राजधानी से पूर्व रोकने की व्यवस्था नही की गई।  आंदोलन की गंभीरता नही समझी गई। काश सरकार पहले से सचेत होती तो हालात इतन खराब न होते।


अभी एक साल पूर्व भारत में भी ऐसा ही प्रदर्शन हुआ था। पंजाब − हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान दिल्ली के रास्तों पर धरना  देकर बैठ गए थे। वे इस धरने के लिए अपने वाहन ट्रेक्टर आदि साथ लाए थे। लंबे समय रूकने के लिए उन्होंने यहां तंबू लगाए। स्टेज बनाई।   खाने पीने की सारी व्यवस्थाएं की।  उनकी सेवा के लिए समाजसेवी संगठन उतर  आए। उन्होंने आंदोलन स्थलों पर जनसुविधांए  उपलब्ध करांई। चिकित्सा शिविर शुरू हो गए। भोजन के लिए भंडारें और लंगर शुरू हो गए। ये आंदोलन करीब एक साल चला।  जब दिल्ली आंदोलन से जूझ रहा था ,उस  समय  केनेडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो    इन किसानों का समर्थन कर रहे थे। किसान दिल्ली का आवागमन तो  पूरी तरह नही रोक सके ,  पर  इनके धरना स्थल से पहले से दिल्ली आने वालों को लंबा रास्ता तैकर आना पड़ा।  काफी परेशानी उठानी पड़ी।

किसानों ने कई बार दिल्ली में प्रवेश की कोशिश की किंतु सरकार ने अनुमति नही दी। रास्तों पर बाढ़ लगादी।इस आंदोलन के दौरान लालकिले जैसी कुछ अप्रिय घटनांए भी हुईं।      हालत यह हुई कि केंद्र को किसानों की मांग माननी पड़ीं । तीनों कृषि कानून  वापिस लेने पड़े । तीनों कृषि कानून  वापसी की घोषणा  खुद प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्र के नाम संबोधन में करनी पड़ी थी। । कनाडा के इस आंदोलन के हालात  बता रहे हैं कि वहां के हालात किसान आंदोलन से ज्यादा खतरनाक  हैं। भारत सरकार ने किसानों को दिल्ली  बार्डर से आगे नही आना दिया था, जबकि कनाड़ा में ये आंदोलनकारी शहर में दाखिल होकर संसद के पास पंहुच गए हैं। हालत इतने खराब हैं कि वहां के प्रधान मंत्री   को परिवार सहित किसी गुप्त स्थान पर जाकर छिपना पड़ा है।

कनेड़ा और दिल्ली के  आंदोलन से सीख लेने की बात यह है कि अब दुनिया को अब ऐसी योजना  बनानी होगी कि आगे से राजधानी का घेराव  न हो। क्योंकि सरकार को झुकाने के इरादे से ऐसे आंदोलन आगे भी होंगे। अन्य देश में भी होंगे।  कोई भी संगठन किसी भी देश के केंद्र की राजधानी के मार्ग  कभी भी रोक सकता है।  राजधानी की आवाजाही बदं कर रसद आदि का आपूर्ति बंद कर सरकारों को मांग मानने को मजबूर कर सकता है। इसलिए केंद्र की राजधानी के विकेंद्रीयकरण पर भी विचार किया जाना चाहिए। देश की राजधानी उसके कार्यालय एक शहर में न बनाकर अलग −अलग जगहों पर बनाए  जाएं।

 महाभारत  में समझौते के लिए कौरवों के पास कृष्ण गए थे। उन्होंने मांग की थी कि पांडव को पांच  गांव दे दिए जांए।  उन्होंने गांव के नाम भी बताए थे। इस प्रस्ताव को  दुर्योधन ने यह कह कर अस्वीकार कर दिया था कि ये  पांच गांव मेरी राजधानी के चारों और हैं। आप जब चाहोंगे तक  मेरे राज्य के रास्ते बदं कर दोगे । मुझे बिना लड़े ही हथियार डालने पर मजबूर कर दोगे। ऐसा ही प्राचीन काल में सुरक्षा के लिए बने किलों के साथ होता था। दुश्मन किले के आपूर्ति के रास्ते बंद कर देता था। मजबूरन बड़े से बड़े मजबूत किले के राजा को शस्त्र डालने पड़ते थे।युद्ध की स्थिति में भी दुश्मन देश हमला करके  एक बार में एक जगह स्थित राजधानी का सब कुछ खत्म कर सकता है। इस  सबको  रोकने के लिए राजधानी के विकेंद्रीकरण पर सोचना होगा। सोचना होगा कि ऐसे आंदोलन में व्यवस्थाएं ठप्प  न हो जांए।

वैसे भी दिल्ली अब राजधानी के लिए उपयुक्त नही लगती । क्योंकि ये देश के बीच में स्थित नहीं हैं। दिल्ली  जब राजधानी बनी थी। अब पाकिस्तान नहीं था। तिब्बत भारत का हिस्सा था। नेपाल भारत का छोटा भाई जैसा था । अब उसकी चीन के साथ नजदीकियां बढ़ रही हैं।  इन सब हालात को

 देखते  हुए  राजधानी के  लिए नए सिरे से विचार करना होगा।

अमेरिका दो बार अपनी राजधानी बदल चुका है। हालात को समझ

ते हुए हमेंं भी राजधानी बनाने के लिए नई  जगह तलाशनी होगी।

अशोक मधुप

(लेखक  वरिष्ठ पत्रकार हैं)