Friday, January 21, 2022

कुरतुल एन हैदर का नहटौर

 जन्मदिन  पर विशेष 

कुरतुल एन हैदर का नहटौर

सूरदास का पद उधो मोही ब्रज बिसरे नाही ,उर्दू की प्रसिद्ध लेखिका कुर्तुलेन हैदर पर बिल्कुल सही बैठता है। ऐनी  आपा के नाम से प्रसिद्ध कुर्तुल एन हैदर पूरी दुनिया घूमी। लंदन रहीं।देश के बंटवारे के बाद  पाकिस्तान चली गईं।वहां भी रही पर उनका मन हिंदुस्तान और उसके बिजनौर जिले के कस्बे नहटौर में भटकता रहा।

मुंबई रही या नोयड़ा उनके दिल से नहटौर एक पल  के लिए भी नहीं गया।उन्होंने अपने नाविल कारे जहां दराज है ,में अपने परिवार का एक हजार साल का इतिहास संजोया है। तीन भाग में छपे इस विशाल उपन्यास में वह बताती हैं कि कैसे उनके पूर्वज एक हजार साल पहले नहटौर आकर बसे।वह इसमें अपने घर उसके आगे की झील, मुहल्ले का जिक्र करती है।नहटौर के बागात के किस्से कहतीं हैं।  

वह कहती हैं कि 1962 की बरसात में मुहल्ला सादात सैदरी नहटौर के वीरान खंडहर, पुश्तैनी मकान  बारिश की झड़ी में धड़ाधड़ गिरते जा रहे थे। दो सौ बरस पुराने बड़े दरबार नहटौर का  दूसरा फाटक गिरा और झील के किनारे खड़ी  बूढ़ी पिलखन बारिश और हवाओं की भेंट चढ़ गई। 

कुरतुलेन कहती हैं कि नहटौर वाले नहटौर को छोटा दिल्ली कहते थे।आइना अकबरी में अल्लामा अबुलफजल फरमाते हैं कि इलाके के जागीरदार युद्ध के समय मुगल फौज के सेनापति को छह सौ अस्सी घुड़सवार और एक हजार चार सौ  पैदल सिपाही देते थे। नहटौर वाले दानिशमंदान−ए नहटौर ( नहटौर के बुद्धिमान) कहलाते थे।

नहटौर से एक मील फासले पर कुर्तुलेन के परिवार की खानदानी जागीर सिंकदरपुर में इनके परिवार का कब्रिस्तान है। इनके परिवारवालों की अधिकतर कब्र इसी कब्रिस्तान में मौजूद हैं।   

उनके नजदीकी रहे नहटौर के पत्रकार एम. असलम  सिद्दीकी कहते हैं कि एनी आपा 

को नहटौर के बहुत लगाव था। जब  उन्हें ज्ञानपीठ अवार्ड दिया गया  तो   दूरदर्शन  ने  उनका इंटरव्यू करना  चाहा। इन्टरव्यू के लिए एनी आपा की शर्त थी कि इन्टरव्यू नहटौर में होगा।मजबूरन दूरदर्शन की टीम नहटौर आई और उनका इंटरव्यू किया।  एम. असलम कहते हैं कि इन्टरव्यू लेने वाली टीम झुंझलाती थी कि ये बारीक सी नदी ( गांगन )में क्या खोजती हैं। कभी गांगन के किनारे इंटरव्यू कराती हैं तो कभी गांगन में झांकते हुए। कभी अपने पुश्तैनी मकान के खंडहर में रिकार्डिंग कराती हैं।कभी खानदानी कब्रिस्तान में ।

एम. असलम बताते हैं कि एनी आपा

की तमन्ना थी कि उन्हें मरने के बाद नहटौर के खानदानी कब्रिस्तान में दफनाया जाए किंतु उनके देखरेख करने वालों ने उनकी  इस ख्वाइश  पर ध्यान नही दिया। उन्हें दिल्ली के जामिया कब्रिस्तान में दफनाया गया।

एम .असलम कहते हैं कि  एनी आपा ने कहा था कि उनकी मौत को खामोश रखा जाए। किसी को न बताया जाए। उनके भाई और भाई का परिवार पाकिस्तान में रहता है,  उसे भी उनकी मौत की जानकारी नही दी गई।

 कुरतुलेन हैदर ने  कारे जहां दराज में मसनवे माडे नामा नामक चैप्टर  में कहा है कि मुहल्ला सादात हैदरी  नहटौर में दरबारे उज्जाम का एक महल खड़ा  है। 1857 में इसमें 12 टोपी वालों ने आजाद सरकार कायम की थी। ..यह बारह टोपी सरकार  12 माह कार्यरत रहीं।इसने इस अवधि में गांव से मालगुजारी वसूली।इस कोठी के मैदान में अदालत लगती। बाहर से केथ के पेड़ तक एक मोटा रस्सा लटका दिया था।बारह टोपी वाले जिसे चाहते  उसे फिंरगी का जासूस बताकर फांसी दे देते।इस बारह टोपी सरकार  का बड़ा आंतक था। उधर  शेरकोट का माड़े खां आ गया।इससे यहां हिंदू −मुस्लिम फसाद हुए।

अंग्रेज फौज के आने की सूचना के समय नवाब महमूद खां के कमांडर माडे खां इस समय 12 टोपी सरकार के मेहमान थे। पिलखनों के नीच फौज के लिए खाना बनाने वाली देग खड़क रहीं थीं।

कुर्तुलेन हैदर कहती हैं कि इस समय आबपाशी के लिए नहर बनने का काम चल रहा था। नहटौर की भी गांगन नदी  से नहर निकाली गई।नहटौर धामपुर मार्ग पर पुल बनाने के लिए  उसका ढांचा  बनाया गया था। ये काम अधूरा था कि गदर शुरू  हो गया। गांगन किनारे पुल बनाने के लिए ईंट का बड़ा ढेर लगा था। माडे खां वह सारी ईंट मुहल्ला सादात उठवा लाया। उसने मुहल्ले के चारों और किलेबंदी की। एक अदद तोप मेन गेट  पर  तैनात कर दी।

कुर्तुलेन हैदर कहती हैं कि जंगे आजादी का जो हुआ सो हुआ किंतु बाकी ईंट कुछ आजादी के मतवालों ने  उठा लीं ।इनसे एक −दो के घर बन गए।

 एनी आपा कहती हैं कि 1767 में गंगा  पार से सिखों ने नहटौर  तक हमला किया। लूटमार की। संभल के अमीर खां लूटमार के  इरादे से फौज के साथ 1805 में नहटौर आया।एक रात और एक दिन नहटौर रूका। यह घटना मुहम्मद खानी और मार खानी गर्दी कहलाई।कस्बे के लोग खून खराबे के डर से इधर −उधर बिखर गए। खेत – खलियान और जंगलों में जा छिपे।अमीर खां के सिपाही जिस समय लूटमार करते मोहल्ला सादात की ओर आ रहे थे,उस समय उनके परिवार के इमाम बक्श  अपनी बीवी और  बच्चों  के साथ मुबारिजुल्लाह खां के मकबरे में जा छिपे। यही रात में इनकी बीवी ने एक लड़के को जन्म दिया।

कारे जहां  दराज है ,में लेखिका कहती है कि हमारी तरफ शिया सुन्नी में ज्यादा भिन्नता  नहीं है। खुद हमारी बिरादरी के नहटौर के कुछ घराने  शियाओं के हैं, इनमें आपस में शादियां  होती हैं।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

[8:42 pm, 19/01/2022] Ashok Ji: परिचय

[8:42 pm, 19/01/2022] Ashok Ji: कुर्अतुल ऐन हैदर का जन्म 20 जनवरी 1927 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था। नहटौर के रहने वाले उनके पिता सज्जाद हैदर यलदरम कुर्अतुल ऐन हैदर के जन्म के समय  अलीगढ़ विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार थे।पिता सज्जाद हैदर यलदरम खुद उर्दू के अच्छे लेखक थे । कुर्अतुल ऐन  की मां नज़र ज़हरा भी उर्दू की लेखिका थी।

 कुर्अतुल ऐन हैदर को लिखने का शौक और कला अपने परिवार से ही मिली। उन्होंने छह साल की उम्र से से  लिखना शुरू किया। उनकी पहली कहानी ‘बी चुहिया’ बच्चों की पत्रिका फूल में छपी । 17-18 साल की उम्र में 1945 में उनका पहला कहानी संकलन ‘शीशे का घर’ छपा।  बचपन में वह कहानियां लिखती थी फिर उपन्यास, लघु उपन्यास, सफरनामें लिखने लगी ।कुर्तुल एन हैदर ने लिखा।  पूरी उम्र  लिखा।जमकर लिखा।निधन की तारीख 21 अगस्त 2007 तक वे लगातार लिखाती रहीं।कुर्अतुल ऐन की प्रारंभिक शिक्षा लालबाग, लखनऊ से हुई। दिल्ली के इंद्रप्रस्थ कॉलेज से भी अपनी शिक्षा हासिल की। पिता की मौत और देश के बंटवारे के बाद कुछ समय के लिए वह अपने भाई मुस्तफा के साथ पाकिस्तान चली गई । पाकिस्तान से  आगे की पढ़ाई के लिए वे लंदन चली गईं। साहित्य लिखने के अलावा वहां  उन्होंने अंग्रेजी में पत्रकारिता भी की। उन्होंने बीबीसी लंदन में काम किया। बाद में वे हिंदुस्तान आ गईं। विज़िटिंग प्रोफेसर के रूप में कैलिफोर्निया, शिकागो और एरीज़ोना विश्वविद्यालय से भी जुड़ी रहीं। काम के सिलसिले में उन्होंने खूब घूमना-फिरना किया। 

कुर्अतुल ऐन हैदर उर्दू में लिखती और अंग्रेज़ी में पत्रकारिता करती । उन्होंने लगभग बारह उपन्यास और ढेरों कहानियां लिखीं। उनकी प्रमुख कहानियां में ‘पतझड़ की आवाज, स्ट्रीट सिंगर ऑफ लखनऊ एंड अदर स्टोरीज, रोशनी की रफ्तार जैसी कहानियां शामिल हैं। उन्होंने हाउसिंग सोसायटी, आग का दरिया (1959), सफ़ीने- ग़मे दिल, आख़िरे- शब के हमसफर, कारे जहां दराज है जैसे उपन्यास भी लिखें।आख़िरे- शब के हमसफर  के लिए इन्हें 1967 में साहित्य अकादमी  और 1989 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।  साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें  1984 में पद्मश्री और  1989 में उन्हें पद्मभूषण से पुरस्कृत किया गया। कारे जहां दराज है,तीन भाग में उनके अपने परिवार का एक हजार साल का इतिहास है।

अशोक मधुप

(लेखक  वरिष्ठ पत्रकार हैं)

20 जनवरी के चिंंगारी में प्रकाशित

Saturday, January 8, 2022

नये साल पर दोहे एक मुक्तक

 लो ये भी बीता सखे,चलो पुराना साल।

जो बीता अब क्या करें,उसपर सोच मलाल।

: नया साल जब आएगा , देखेंगे उस ठौर।
अभी अभी है तो सखे, इसी साल का दौर।

-चलो विदा देते तुम्हें!,रही साल भर जंग।
खट्टी मीठी याद तो,सदा रहेंगी संग।
-तुमने तो सपने किए,कईं मेरे साकार।
नफरत तो कम ही मिली, बहुत मिला पर प्यार।
– कई विदा हमसे हुए, कई जुड़े हैं संग।
नफरत पर जीती सदा,प्रेम- प्यार की जंग।

– नया साल शुभ हो शुभे, शुभ हों सारे काम।
खूब तुम्हे ख्याति मिले, जग में होवे नाम।

-: अभी चुनौती हैं नयी, नए साल के साथ।
सतत सफर चलता रहे,कृपा करें रघुनाथ ।

रोते हंसते कट गया,जीवन का ये दौर।
नया साल लाये सखे, खुशहाली की भोर।

 

मुक्तक

जो नहीं मिला उसकी, आस लिए बैठे हैं।
इच्छाओं की पुटलियाॅ, पास लिए बैठे हैं।
मेरे साथ मेरों के भी, हों सपन सभी पूरे,
नए साल! तुझसे नए ,विश्वास लिए बैठे हैं।
अशोक मधुप

 संभलो , रूको , फिर से डराने लगा कोराना

 कोरोना फिर कहर बरपाने लगा है। तेजी से  बढ़ते केस चिंताजनक हैं।लॉकडाउन के डर से मुंबई में बिहार और उत्तर भारत के मजदूर ने पलायन शुरू  दिया है। अन्य जगह भी लोगों के मन में भय है। इतना सब होने पर भी  भीड़ नही रूक रही। बाजार , बस स्टेशन सार्वजनिक जगह पर हालत बहुत  खराब  है।

देश भर में शुक्रवार को  एक लाख 37 हजार 24 केस सामने आए हैं।शुक्रवार को 344 लोगों की मौत हुई है।  महाराष्ट्र में एक बार फिर सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं। राज्य में आज कोरोना के 40,925 नए मरीज मिले हैं। 20 लोगों की मौत हुई है। यहां ओमिक्रॉन के भी मामले बढ़कर 876 हो गए हैं।

दिल्ली में शुक्रवार को  17,335 नए केस सामने आए हैं। मुंबई में लगातार दूसरे दिन 20 हजार केस मिले।मुंबई में आज छह लोगों की मौत हुई है।

−उत्तर प्रदेश में कोरोना के केस तेजी से डबल हो रहे हैं। 24 घंटे में शुक्रवार को राज्य में कोविड के 4,228 नए मामले सामने आए हैं। यह आंकड़े 229 दिन बाद आए हैं। इससे पहले 23 मई को 4715 केस मिले थे। लखनऊ में भाजपा के प्रदेश मुख्यालय में कोरोना फैल गया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री शिव प्रताप शुक्ला, महामंत्री गोविंद नारायण शुक्ला समेत 12 लोग पॉजिटिव मिले हैं। इसके बाद आज कुछ नेताओं की होने वाली जॉइनिंग को टाल दिया गया।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और भाजपा सांसद मनोज तिवारी कोरोना पॉजिटिव पाये गये हैं।  इलाहाबाद हाईकोर्ट के चार जज में कोराना मिला है।शुक्रवार को दिल्ली के लोकनायक अस्पताल में 20 स्वास्थ्य कर्मचारी कोरोना संक्रमण की चपेट में आए हैं। अमृतसर के गुरु रामदास अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट शुक्रवार को इटली से आई फ्लाइट के  300 में से 190 यात्री संक्रमित पाए गए हैं।ये संख्या बढ़ भी सकती है क्योंकि अभी कई पैंसेंजर की रिपोर्ट आनी शेष  है।गुरूवार को आई फलाईट के 179 यात्रियों में 125 कोरोना पाजिटिव मिले थे।

  दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में कुछ दिनों के भीतर ही कोविड की जांच रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। कोविड की जांच करने वाली प्रमुख टेस्टिंग लैब का कहना है कि भारत में पिछले सात दिनों में कोविड की जांच में 60 फीसदी तक की तेजी देखी गई है। इतनी जांच पिछले साल कोरोना की दूसरी लहर की पीक के दौरान हुई थीं।डब्लूएचओ के चीफ टेड्रोस गेब्रेयेसस ने गुरुवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए दुनिया को चेताया है कि ओमिक्रॉन की वजह से दुनिया भर में लोगों की जान जा रही है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

ये आ रही सूचनाएं आने वाली हालत की गंभीरता बता रही हैं।

राज्य सरकार  हालात से जुझने के प्रयास कर रही हैं। पर वह मिले धन का सदुपयोग नहीं कर रहीं। केंद्र ने उन्हें संसाधन जुटाने  के लिए,कोरोना से लड़ने के लिए अगस्त में फंड जारी किया।यूपी को इस फंड से 939.94 करोड़ जारी हो चुके हैं ,लेकिन सरकार केवल 87.05 करोड़ यानी 9.26 प्रतिशत ही खर्च कर पाई। इसी प्रकार उत्तराखंड सरकार 6.28 प्रतिशत, राजस्थान 4.80 प्रतिशत, जम्मू-कश्मीर 2.44 प्रतिशत, हिमाचल प्रदेश 9.94 प्रतिशत, महाराष्ट्र 0.32 असम 0.38 प्रतिशत पैसा ही खर्च कर पाए। मिले धन का संसाधान जुटाने में उपयोग किया जा सकता था  किंतु नहीं किया गया।काश  इस राशि का  इन राज्यों ने सदुपयोग किया होता  तो कोरोना से  और ज्यादा प्रभावी लड़ाई  लड़ी जा सकती थी।

अस्पतालों में आक्सीजन युक्त बैड बढाए जा सकते थे। तीसरी लहर सिर पर आ गई है। अब तक शेर मचता था कि अपदासे लड़ने के लिए उनके पास धन नही हैं, दुर्भाग्य कहिए कि अब प्रदेशों के पास धन है पर राज्य उन्हें प्रयोग नही कर रहे। फिर भी अब भी समय है, सब मिलकर हालात समझे और कोरोना से बचाव के नियम का पालन करें।अच्छा यह रहा कि कोराना की दूसरी लहर  में बड़ी संख्या में समाजसेवी संगठन आगे आए।उन्होंने हालात से लड़ने में समाज की बहुत मदद की । दवा, आक्सीजन,बैड और भोजन आदि की व्यवस्था की।  

बढ़ते केस से लगता यह है कि वैक्सीन लगवाने वाले अधिकतर ये समझ चुकें हैं, कि अब हमें कुछ नही होगा। हमें सुरक्षा पालन करने की कोई जरूरत नही है,जबकि वैक्सीन फुलप्रूफ नही हैं। यह कोरोना से लड़ने के लिए शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता ही मजबूत करता है। ऐसे हालात में हमें आत्मनियंत्रण करना होगा। देखने में आया है कि हम भारतीय स्वतः अनुशासन का पालन नही करते।  हम सख्ती के आदि हो गए हैं।  हालात को नियंत्रित करना है तो कोरोना प्रोटोकाल का पालन न करने वालों पर सरकार  को सख्ती करनी होगी।

बिगड़ती हालत देखते हुए कई  जगह पर स्कूल काँलेज बंद कर दिए गए हैं। दिल्ली में वीकेंड कर्फ्यू  लागू कर दिया गया है। किंतु देहात में कोरोना के बचाव के लिए ज्यादा तैयारी नहीं की गईं। यहां आंगनबाड़ी, आशा  और एएनएम से काम लेने  का प्रयास हो रहा है किंतु दूसरे फेज में ये सारी व्यवस्था भंग हो गई थी। उस समय गांव के  नीम हकीम काम आए।  इनके चिकित्सा करने पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगाई हुई है। इसके बावजूद ये स्वास्थ्य विभाग की कृपा पर धड़ल्ले से कार्यरत हैं।कोरोना के प्रथम पेज में एक झोला छाप के द्वारा कई व्यक्तियों को कोरोना देने के बाद डीएम बिजनौर ने कार्रवार्ई की तो अकेली चांदपुर तहसील में दो सौ के आसपास ये कार्यरत मिले। कुछ ऐसे भी थे जो छापे पड़ते ही दुकान बंद कर भाग गए।  कानून से हमें इन्हें नही बंद कर सकते। स्वास्थय विभाग का हमने कमाई का एक साधन और सौंप दिया। आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ता ट्रेंड नहीं है। हम  उनसे काम ले सकते है तो इन अपजींकृत देहाती चिकित्सा कर्मी को कुछ समय की ट्रेंनिग देकर इस लड़ाई में क्यों नही इस्तमाल करते।  समाजसेवी संगठन का अभी से आगे लाने उन्हें प्रेरित करने की जरूरत है।

 

अशोक मधुप

 

 

 

Friday, December 31, 2021

विश्व पर्यटन दिवस पर विशेष: संभावनाएं अपार... बस जाग जाए सरकार तो पर्यटन विकास पकड़े रफ्तार

 विश्व पर्यटन दिवस पर विशेष: संभावनाएं अपार... बस जाग जाए सरकार तो पर्यटन विकास पकड़े रफ्तार

अशोक मधुप, अमर उजाला, बिजनौर Published by: कपिल kapil Updated Sat, 26 Sep 2020 01:20 PM IST

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सैंद्वार का में पर्यटन विभाग द्वारा कराए गए विकास कार्यो का बोर्ड। - फोटो : अमर उजाला

महाभारत सर्किट में बिजनौर जनपद शामिल तो हुआ लेकिन पर्यटन की दृष्टि से कोई लाभ नहीं हुआ। महाभारत काल के तीन स्थलों के सुंदरीकरण के नाम पर लाखों रुपया लगा किंतु प्रचार न होने के कारण पर्यटक नहीं आ पाए। निर्माण में मानक का पालन न होने के कारण सब कुछ जल्दी ही खत्म हो गया।

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सैंद्वार का में पर्यटन विभाग द्वारा बनाया गया मुख्य द्वार। - फोटो : अमर उजाला

बिजनौर जनपद के डॉ. ओम प्रकाश पर्यटन सचिव होते थे। उनके समय में केंद्र सरकार ने महाभारत सर्किट बनाया। इसके तहत पर्यटन के बढ़ाने के लिए महाभारत से जुड़े स्थलों को सजाया-संवारा जाना था, ताकि इन स्थलों तक पर्यटक आ सकें और पर्यटन उद्योग का विकास हो। महाभारत काल के जनपद में कई स्थान हैं। 

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बिजनौर के ग्राम बरमपुर में स्थित द्रौपदी मंदिर। - फोटो : अमर उजाला

विदुर कुटी, सैंद्वार और बरमपुर में द्रोपदी मंदिर और सरोवर का इसके लिए चयन हुआ था। 2007-2008 में इनका विकास कराया गया। इस कार्य पर लगभग 50 लाख रुपया व्यय हुआ। लेकिन निर्माण कार्य बढ़िया नहीं हुआ, इसमें मानक का पालन नहीं हुआ। धन लगाकर काम निपटा दिया गया। मरम्मत, देखरेख और इनके प्रचार-प्रसार के लिए कुछ नहीं किया। प्रचार प्रसार न होने से पर्यटक नहीं जुड़ पाए। सरकार का महाभारत सर्किट से पर्यटक उद्देश्य सफल नहीं हुआ। 

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बिजनौर के गंज में स्थित विदुर कुटी। - फोटो : अमर उजाला

शीतला माता मंदिर और मोरध्वज किला है खास

जनपद के इतिहास के जानकार वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप भटनागर कहते हैं कि जनपद में महाभारत काल के बिजनौर का शीतला माता का मंदिर क्षेत्र और मोरध्वज का किला है। इनके विकास पर कुछ काम नहीं हुआ। जबकि यहां महाभारत काल के नगर के अवशेष मिलते हैं। जिन स्थल का विकास हुआ, सुंदरीकरण हुआ, उनका प्रचार-प्रचार नहीं हुआ। उन्हें पर्यटन के नक्शे पर ले जाने का कार्य नहीं हुआ। इसीलिए ये योजना कामयाब नहीं हो सकी। पर्यटन की दृष्टि से बिजनौर में अनेक स्थान हैं। यदि सही ढंग से इनका विकास कराया जाए तो जनपद के विकास को पांव लग सकते हैं।

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सैंद्वारका में पार्क हुआ खस्ताहाल। - फोटो : अमर उजाला

सैंद्वार में था गुरु द्रोणाचार्य का आश्रम

जनपद के इतिहासकार शकील बिजनौरी कहते हैं कि सैंद्वार गुरु द्रोणाचार्य का आश्रम था। विदुर कुटी महात्मा विदुर की कुटिया थी। मान्यता है कि पांडव के स्वर्गारोहण को जाते समय द्रोपदी थक कर यहीं गिर गई थीं। जानकार विकास कुमार अग्रवाल का कहना है कि विदुर कुटी को विकसित करना है तो गंगा तक श्रद्धालुओं के जाने की व्यवस्था करनी होगी।


Read more: https://www.amarujala.com/photo-gallery/uttar-pradesh/meerut/world-tourism-day-2020-work-is-pending-for-the-development-of-tourism-in-bijnor-district

हिंदुस्तानी गजल से मशहूर हुए दुष्यंत कुमार

हिंदुस्तानी गजल से मशहूर हुए  दुष्यंत कुमार

अशोक मधुप

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आज 30 दिसंबर   हिंदी साहित्यकार −गजलकार दुष्यंत कुमार की पुण्यतिथि है।  बिजनौर के राजपुर नवादा गांव में एक सिंतबर 1933 में जन्मे दुष्यंत कुमार का मात्र 43 वर्ष की आयु में 30 दिसंबर 1975 को भोपाल में  उनका निधन हुआ।

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हिंदी साहित्यकार −गजलकार दुष्यंत कुमार   हिंदी गजल के लिए जाने जाते हैं। वे हिंदी गजल के लिए विख्यात है किंतु  उन्हें यह ख्याति हिंदी गजलों के लिए नहीं , हिंदुस्तानी गजलों के लिए मिली। संसद से  सड़क तब मशहूर हुए उनके शेर हिंदुस्तानी हिंदी में हैं।  हिंदुस्तानी हिंदी में  उन्होंने सभी प्रचलित शब्दों को इस्तमाल किया। शब्दों को प्रचलित रूप में इस्तमाल किया।

वे अपनी पुस्तक साए में धूप की भूमिका में खुद कहते हैं “ ग़ज़लों को भूमिका की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए; लेकिन,एक कैफ़ियत इनकी भाषा के बारे में ज़रूरी है। कुछ उर्दू—दाँ दोस्तों ने कुछ उर्दू शब्दों के प्रयोग पर एतराज़ किया है .उनका कहना है कि शब्द ‘शहर’ नहीं ‘शह्र’ होता है, ’वज़न’ नहीं ‘वज़्न’ होता है।
—कि मैं उर्दू नहीं जानता, लेकिन इन शब्दों का प्रयोग यहाँ अज्ञानतावश नहीं, जानबूझकर किया गया है। यह कोई मुश्किल काम नहीं था कि ’शहर’ की जगह ‘नगर’ लिखकर इस दोष से मुक्ति पा लूँ,किंतु मैंने उर्दू शब्दों को उस रूप में इस्तेमाल किया है,जिस रूप में वे हिन्दी में घुल−मिल गये हैं। उर्दू का ‘शह्र’ हिन्दी में ‘शहर’ लिखा और बोला जाता है ।ठीक उसी तरह जैसे हिन्दी का ‘ब्राह्मण’ उर्दू में ‘बिरहमन’ हो गया है और ‘ॠतु’ ‘रुत’ हो गई है।
—कि उर्दू और हिन्दी अपने—अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के बीच आती हैं तो उनमें फ़र्क़ कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। मेरी नीयत और कोशिश यही रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज़्यादा से ज़्यादा क़रीब ला सकूँ। इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में लिखी गई हैं जिसे मैं बोलता हूँ।
—कि ग़ज़ल की विधा बहुत पुरानी,किंतु विधा है,जिसमें बड़े—बड़े उर्दू महारथियों ने काव्य—रचना की है। हिन्दी में भी महाकवि निराला से लेकर आज के गीतकारों और नये कवियों तक अनेक कवियों ने इस विधा को आज़माया है।”
ग़ज़ल पर्शियन और अरबी  से उर्दू में आयी। ग़ज़ल का मतलब हैं औरतों से अथवा औरतों के बारे में बातचीत करना। यह भी कहा जा सकता हैं कि ग़ज़ल का सर्वसाधारण अर्थ हैं माशूक से बातचीत का माध्यम। उर्दू के  साहित्यकार  स्वर्गीय रघुपति सहाय ‘फिराक’ गोरखपुरी  ने ग़ज़ल की  भावपूर्ण परिभाषा लिखी हैं।  कहते हैं कि, ‘जब कोई शिकारी जंगल में कुत्तों के साथ हिरन का पीछा करता हैं और हिरन भागते भागते किसी ऐसी झाड़ी में फंस जाता हैं जहां से वह निकल नहीं सकता, उस समय उसके कंठ से एक दर्द भरी आवाज़ निकलती हैं। उसी करूण स्वर को ग़ज़ल कहते हैं। इसीलिये विवशता का दिव्यतम रूप में प्रगट होना, स्वर का करूणतम हो जाना ही ग़ज़ल का आदर्श हैं’।

दुष्यंत  की गजलों की खूबी है साधारण बोलचाल के शब्दों का प्रयोग,  हिंदी− उर्दू के घुले मिले शब्दों का प्रयोग । चुटीले व्यंग  उनकी गजल की खूबी है।वे व्यवस्था और समाज पर चोट करते हैं।  ये ही उन्हें सीधे  आम आदमी के दिल तक ले जाती है। उनकी ये शैली उन्हें अन्य कवियों से अलग और लोकप्रिय करती है।
आम आदमी और व्यवस्था पर चोट करने वाले उनके शेर, व्यवस्था पर चोट करते उनके शेर  सड़कों से  संसद गूंजतें है। शायद दुष्यंत कुमार अकेले ऐसे साहित्यकार होंगे , जिसके शेर सबसे ज्यादा बार संसद में पढ़े गए हों। सभाओं में नेताओं ने उनके शेर सुनाकर व्यवस्था पर चोट की हो।सरकार को जगाने और जनचेतना का कार्य किया हो।उन्होंने हिंदी गजल भी लिखी, पर वह इतनी प्रसिद्धि  नही पा सकी, जितनी हिंदुस्तानी हिंदी में लिखी  गजल लोकप्रिस हुईं।

उनके गुनगुनाए  जाने वाले उनके कुछ  हिंदुस्तानी हिंदी के शेर हैं−

−वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है, 
माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है। 

−रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया, 
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारों।−कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता ,
एक पत्थर तो तबीअ’त से उछालो यारों।

− यहां तो  सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसतें है,खुदा  जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा,
−गूँगे निकल पड़े हैं ज़बाँ की तलाश में ,
सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिए।−पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं,
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं  ।आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है ,
पत्थरों में चीख़ हरगिज़ कारगर होगी नहीं।
इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो,
धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं ।

−सिर से सीने में कभी पेट से पाँव में कभी ,
इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है ।

−मत कहो आकाश में कोहरा घना है,ये किसी की व्यक्तगत आलोचना है।  −ये   जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा,मै सज्दे में नही था, आपको धोखा  हुआ होगा।

−तुमने इस तालाब में रोहू पकड़ने के लिए,

छोटी—छोटी मछलियाँ चारा बनाकर फेंक दीं।

−हम ही खा लेते सुबह को भूख लगती है बहुत

तुमने बासी रोटियाँ नाहक उठा कर फेंक दीं।

 गजलहो गई है पीर पर्वत  सी पिंघलनी चाहिए,अब हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए। अशोक मधुप(


30 ddicember 2012 prabhasakshi 

Thursday, December 23, 2021

स्वामी श्रद्धानन्द और बिजनौर

 

                                                           स्वामी श्रद्धानन्द और बिजनौर



स्वामी श्रद्धानंद का नाम उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद से जोड़ा जाता रहा है। इतिहासकार बिजनौर जनपद के प्रसिद्ध व्यक्तियों का जिक्र करते स्वामी श्रद्धानंद का नाम लेते है किंतु बिजनौर से उनका क्या वास्ता थाॽ यह नहीं बता पाते। जबकि बिजनौर ने स्वामी श्रद्धानंद के सपने को पंख दिए। 

स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती भारत के शिक्षाविद, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा आर्यसमाज के सन्यासी थे। इन्होंने स्वामी दयानन्द सरस्वती की शिक्षाओं का प्रसार किया। गुरूकुल विश्वविद्यालय ज्वालापुर उन्ही की देन है।


स्वामी श्रद्धानन्द का जन्म 22 फ़रवरी सन् 1856 को पंजाब  के जालन्धर जिले के तलवान ग्राम में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता, लाला नानक चन्द, ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा शासित यूनाइटेड प्रोविन्स (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में पुलिस अधिकारी थे। उनके बचपन का नाम वृहस्पति और मुंशीराम था। किन्तु मुन्शीराम सरल होने के कारण अधिक प्रचलित हुआ।

पिता का ट्रान्सफर अलग-अलग स्थानों पर होने के कारण उनकी आरम्भिक शिक्षा अच्छी प्रकार नहीं हो सकी। एक बार आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती वैदिक-धर्म के प्रचारार्थ बरेली पहुंचे। पुलिस अधिकारी नानकचन्द अपने पुत्र मुंशीराम को साथ लेकर स्वामी दयानन्द का प्रवचन सुनने पहुँचे। स्वामी दयानन्द जी के तर्कों और आशीर्वाद ने मुंशीराम को दृढ़ ईश्वर विश्वासी तथा वैदिक धर्म का अनन्य भक्त बना दिया।

उनका विवाह शिवा देवी के साथ हुआ था। आपकी 35 वर्ष में शिवा देवी स्वर्ग सिधारीं। उस समय उनके दो पुत्र और दो पुत्रियां थीं। सन् 1917 में उन्होने संन्यास धारण कर लिया और स्वामी श्रद्धानन्द के नाम से विख्यात हुए।

महर्षि दयानंद (1824-1883 ई.) के सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'सत्यार्थ प्रकाश' में प्रतिपादित शिक्षा संबंधी विचारों से बड़े प्रभावित हुए। उन्होंने 1897 में अपने पत्र 'सद्धर्म प्रचारक' द्वारा गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के पुनरुद्वार का प्रबल आन्दोलन आरम्भ किया। 30 अक्टूबर 1898 को उन्होंने इसकी विस्तृत योजना रखी। नवंबर, 1898 ई. में पंजाब के आर्य समाजों के केंद्रीय संगठन आर्य प्रतिनिधि सभा ने गुरुकुल खोलने का प्रस्ताव स्वीकार किया। महात्मा मुंशीराम ने यह प्रतिज्ञा की कि वे इस कार्य के लिए, जब तक 30 हजार रुपया एकत्र नहीं कर लेंगे, तब तक अपने घर में पैर नहीं रखेंगे। तत्कालीन परिस्थितियों में इस दुस्साध्य कार्य को अपने अनवरत उद्योग और  निष्ठा से उन्होंने आठ मास में पूरा कर लिया। 16 मई 1900 को पंजाब के गुजराँवाला स्थान पर एक वैदिक पाठशाला के साथ गुरुकुल की स्थापना कर दी गई। किन्तु महात्मा मुंशीराम को यह स्थान उपयुक्त प्रतीत नहीं हुआ। वे शुक्ल यजुर्वेद के एक मंत्र (26.15) उपह्वरे गिरीणां संगमे च नदीनां धिया विप्रो अजायत के अनुसार नदी और पर्वत के निकट कोई स्थान चाहते थे।

इसी समय बिजनौर के रईस मुंशी अमनसिंह जी ने इस कार्य के लिए महात्मा मुंशीराम जी को 1,200 बीघे का अपना कांगड़ी ग्राम और 11 हजार रुपये दान दिया। हिमालय की उपत्यका में गंगा के तट पर सघन रमणीक वनों से घिरी कांगड़ी की भूमि गुरुकुल के लिए आदर्श थी। अत: यहाँ घने जंगल साफ कर कुछ छप्पर बनाए गए। होली के दिन सोमवार, चार मार्च 1902 को गुरुकुल गुजराँवाला से कांगड़ी लाया गया। 

गुरुकुल का आरम्भ 34 विद्यार्थियों के साथ कुछ फूंस की झोपड़ियों में किया गया। पंजाब की आर्य जनता के उदार दान और सहयोग से इसका विकास तेजी से होने लगा। 1907 में महाविद्यालय विभाग आरंभ हुआ। 1912 में गुरुकुल कांगड़ी से शिक्षा समाप्त कर निकलने वाले स्नातकों का पहला दीक्षान्त समारोह हुआ। सन 1916 में गुरुकुल काँगड़ी फार्मेसी की स्थापना हुई। 1921 में आर्य प्रतिनिधि सभा ने इसका विस्तार करने के लिए वेद, आयुर्वेद, कृषि और साधारण (आर्ट्‌स) महाविद्यालय बनाने का निश्चय किया। 1923 में महाविद्यालय की शिक्षा और परीक्षा विषयक व्यवस्था के लिए एक शिक्षापटल बनाया गया।

24 सितंबर 1924 को गुरुकुल पर भीषण दैवी विपत्ति आई। गंगा की असाधारण बाढ़ ने गंगातट पर बनी इमारतों को भयंकर क्षति पहुँचाई। भविष्य में बाढ़ के प्रकोप से सुरक्षा के लिए एक मई 1930 को गुरुकुल गंगा के पूर्वी तट से हटाकर पश्चिमी तट पर गंगा की नहर पर हरिद्वार के समीप वर्तमान स्थान में लाया गया।

गुरूकुल की स्थापना 1902 से लगातार  मुंशीराम उर्फ स्वामी श्रद्धानंद कांगडी में रहते थे। कांगडी आज हरिद्वार जनपद का भाग है पर उस समय बिजनौर में ही था। कांगडी में रहने के कारण स्वामी श्रंद्धानंद को बिजनौरवासी उन्हें बिजनौर का मानते हैं। 

राजनैतिक व सामाजिक जीवन:


उनका राजनैतिक जीवन रोलेट एक्ट का विरोध करते हुए एक स्वतन्त्रता सेनानी के रूप में प्रारम्भ हुआ। अच्छी-खासी वकालत की कमाई छोड़कर स्वामीजी ने ”दैनिक विजय” नामक समाचार-पत्र में ”छाती पर पिस्तौल” नामक क्रान्तिकारी लेख लिखे। स्वामी जी महात्मा गांधी के सत्याग्रह से प्रभावित थे। जालियांवाला बाग हत्याकाण्ड तथा रोलेट एक्ट का विरोध वे हिंसा से करने में कोई बुराई नहीं समझते थे। स्वामीजी ने 13 अप्रैल 1917 को संन्यास ग्रहण किया, तो वे स्वामी श्रद्धानन्द बन गये। आर्यसमाज के सिद्धान्तों का समर्थक होने के कारण उन्होंने इसका बड़ी तेजी से प्रचार-प्रसार किया। वे नरम दल के समर्थक होते हुए भी ब्रिटिश उदारता के समर्थक नहीं थे। उन्होने अछूतोद्धार और धर्म में वापसी ने लिए बड़ा योगदान किया। 23 दिसम्बर 1926 को चांदनी चौक, दिल्ली में उनके निवास पर एक व्यक्ति ने गोली मारकर हत्या कर दी। 


 - अशोक मधुप


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

मेरा ये लेख 23 दिसंबर के प्रभासाक्षी, शनसाइन न्यूज, सांध्य दैनिक चिंगारी नवभारत टाइम्स रीडर ब्लाँग  समेत कई अखबार और पोर्टल ने छापा है




Sunday, November 7, 2021

कांगडी गुरूकुल को अपनी समपूर्ण भूमिदान करने वाले लाला मुंशी अमन सिंह



 

लाला मुंशी अमन सिंह

गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्वालय को अपना सर्वस्व दान करने वाले मुंशी अमन सिंह का जन्म सन 1863 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर नगर के समृद्ध वैश्य परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम लाला शिवलाल रईस था। उस समय अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने के लिए सर्वत्र व्यवस्था न थी।

गुरूकुल विश्वविद्यालय को अपना सर्वस्व दान करने वाले भामाशाह मुंशी अमन सिंह रईस को कोई आज जानता भी नहीं। विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए इन्होंने अपना सर्वस्व दान कर दिया। गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय प्रांगण में इनके नाम पर अमन चौक है। विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वार का नाम भी उनके नाम पर अमन द्वार रखा हुआ है। प्रथम स्थापना स्थल और अमर सिंह की जमीदारी का नाम कांगडी  विश्वविद्यालय के नाम के साथ लगा है। आज 28 जनवरी इस भामाशाह की पुण्यतिथि है। 


गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्वालय को अपना सर्वस्व दान करने वाले मुंशी अमन सिंह का जन्म सन 1863 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर नगर के समृद्ध वैश्य परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम लाला शिवलाल रईस था। उस समय अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने के लिए सर्वत्र व्यवस्था न थी।

बिजनौर मंडल आर्य समाज के इतिहास के अनुसार इसीलिए मुंशी अमन सिंह केवल साधारण गणित, भूगोल आदि की शिक्षा के साथ−साथ केवल उर्दू और फारसी का ही अध्ययन कर सके। इस समय देश में प्रायः बाल विवाह का प्रचलन था। इसलिए छोटी अवस्था में ही आपका विवाह जनपद के जलालाबाद कस्बे के प्रसिद्ध रईस सूरजभान की बहन ईश्वरी देवी से हुआ। जलालाबाद उस समय परगने का मुख्य स्थान था। लेखक प्रायः 90 वर्ष पूर्व लिखी पुस्तक में लेखक लिखते हैं उस समय सन् 1926 में जलालाबाद उजड़ता जा रहा था। यहां के निवासी नजीबाबाद जाकर बस रहे थे। लगता है कि मुंशी अमन सिंह ससुराल में रहते थे। ये भी नजीबाबाद जा बसे। इसलिए इन्हें बिजनौरवासी नही अपितु नजीबाबाद के निवासी के रूप में जाना गया।

मुंशी अमन सिंह शुरू से ही पतले−दुबले और कमजोर थे। साथ ही इन्हें 22−23 साल की उम्र के श्वास रोग (दमा) हो गया। श्वास रोग से आप जीवन भर भारी कष्ट में रहे। औषधि के सेवन से भी कोई विशेष लाभ न हुआ। कांगड़ी गुरूकुल के विशाल क्षेत्र और स्वच्छ वायु मंडल में निवास से दमा दबा जरूर रहा। आपके कोई संतान नही थी। आप श्वांस के गंभीर रोगी थे। दमें का दौरा पड़ने पर आपकी हालत बहुत खराब हो जाती थी। प्राण त्याग की हर समय आशंका बनी रहती थी। आपने सोचा कि अपनी सारी भू−सम्पत्ति अपने जीते जी दान कर दी जाए, ताकि विवाद न पैदा हो। आपने नजीबाबाद आर्य समाज के प्रधान पंडित बालमुकुंद आदि की सम्मति से महात्मा मुंशीराम (बाद में बने स्वामी श्रद्धानंद) को गुरूकुल की स्थापना के लिए अपनी सारी संपत्ति दान देने का निर्णय लिया। महात्मा मुंशीराम उस समय गुरूकुल की तलाश के लिए भूमि की तलाश कर रहे थे।

चौधरी अमन सिंह ने अपना 1200 बीघा जमीन का कांगड़ी गांव और अपने पास एकत्र सम्पूर्ण राशि ₹11000 इसकी स्थापना के समय इस गुरूकुल विद्यालय को दान की थी। चौधरी अमन सिंह की जमीन में बना गुरूकुल विश्वविद्यालय गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय कनखल (हरिद्वार) देश का जाना माना विश्वविद्यालय है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना 1902 में मुंशी राम (स्वामी श्रद्धानंद) ने हरिद्वार से उत्तर में कांगड़ी गांव तबके बिजनौर जनपद में की। आज इसका केम्पस हरिद्वार से चार किलोमीटर दूर दक्षिण में है।

कांगड़ी के घने जंगल साफ कर कुछ छप्पर बनाए गए और होली के दिन सोमवार, चार मार्च 1902 को गुरुकुल गुजराँवाला से कांगड़ी लाया गया। गुरुकुल का आरम्भ 34 विद्यार्थियों के साथ कुछ फूस की झोपड़ियों में किया गया। 1907 में इसका महाविद्यालय विभाग आरंभ हुआ। 1912 में गुरुकुल कांगड़ी से शिक्षा समाप्त कर निकलने वाले स्नातकों का पहला दीक्षान्त समारोह हुआ। 24 सितंबर 1924 को गुरुकुल पर भीषण दैवी विपत्ति आई। गंगा की असाधारण बाढ़ ने गंगातट पर बनी इमारतों को भयंकर क्षति पहुँचाई। भविष्य में बाढ़ के प्रकोप से सुरक्षा के लिए एक मई 1930 को गुरुकुल कांगड़ी गंगा के पूर्वी तट से हटाकर पश्चिमी तट पर गंगा की नहर पर हरिद्वार के समीप वर्तमान स्थान में लाया गया। 1935 में इसका प्रबन्ध करने के लिए आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाब के अंतर्गत एक पृथक विद्यासभा का संगठन हुआ।

मुंशी अमन सिंह शुरू से ही दमा से ये परेशान थे ही। दमा का कानपुर में एक रिश्तेदार के यहां रहकर उपचार करा रहे थे। 28 जनवरी 1926 में कानपुर में ही उपचार के दौरान इनका निधन हुआ। पत्नी ने इनका वहीं अंतिम संस्कार कर दिया। 

अमन सिंह द्वारा दान की भूमि विश्वविद्यालय के अधीन है। अमन सिंह को सम्मान देने के लिए विश्वविद्यालय कैम्पस में इनके नाम से अमन चौक बना हुआ है। विश्वविद्यालय का प्रवेश द्वार भी इनके नाम पर है। उसका नाम अमन द्वार है। अमन सिंह के दान दिए गांव का नाम कांगड़ी आज भी गुरूकुल के नाम से जुड़ा है।

-अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

28 जनवरी 2022 के प्रभासाक्षी में मेरा लेख