इस ब्लाँग पर दिए लेख लेखक की संपत्ति है। कृपया इनका प्रयोग करते समय ब्लाँग और लेखक का संदर्भ अवश्य दें।
Saturday, March 14, 2020
Thursday, January 30, 2020
रामकुमार वैद्य
जब भी बंसत आएगा, सदा याद आंएगे रामकुमार वैद्य
जन्म तिथि 20 फरवरी 1920
निधन 22 जुलाई 1992
फोटो
अशोक मधुप
बिजनौर ,जब भी बसंत या बसंतोसव का जिक्र होगा, तो बिजनौर के स्वर्गीय राम कुमार वैद्य को सदा याद किया जाएगा। बिजनौर में बसंत पर वह कई दिन कार्यक्रम कराते थे। बसंत से एक माह पूर्व से कार्यक्रम की तैयारी शुरू हो जाती थी।
बसंत के तीन दिवसीय कार्यक्रम के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे।अंतराष्ट्रीय स्तर का कवि सम्मेलन होता।खेल होते।वैद्य थे। अतःवनौषधि -प्रदर्शनी भी लगती। बच्चों के खेल होते थे। वे खुद वालीबॉल के खिलाड़ी थे। तो वालीबाल की स्पर्धा होनी ही थी।
उनके साथी प्रसिद्घ आर्य समाजी नेता जयनारायण अरूण बतातें हैं कि वैद्य जी के साथ नगर के गणमान्य व्यक्तियों की टीम भी एक माह पूर्व से इसकी तैयारी में लग जाती थी। ये याद करते हुए बतातें हैँ कि पत्रकार विश्वामित्र शर्मा देवीशरण शर्मा धामपुर, अभिमन्यु कुमार पाठक , आत्माराम शर्मा, त्रिलोकी नाथ खन्ना, आनन्द गुप्ता आन्नद भाई, शत्रुघ्न वर्मा, आदित्यनारायण मिश्रा ,अब्दुल वहाब,मुहम्मद अफसर आदि की टीम थी। आर्थिक मदद उदय कुमार विश्नोई और पंडित जुगल किशोर शर्मा आदि करते थे।
रामलीला मैदान में कार्यक्रम होते थे। पूरा मैदान पीली बंदरवाल से सजाया जाता था। वैद्य जी और उनकी टीम खुद पीले वस्त्र पहनती थी। कार्यक्रम के विजेताओं को पुरस्कार दिए जाते थे। वनौषधि प्रदर्शनी के साथ- साथ समाचार पत्रों की भी प्रदर्शनी लगाते थे।
जय नारायण अरूण जी बतातें हैं कि वैद्य जी बहु प्रतिभा धनी थे। आयुर्वेद के कई ग्रंथ कंठस्थ थे। वैद्य जी मूल रूप से पैजनियां , बिजनौर निवासी थे |। पत्रकार थे।"कण्व भूमि "नाम से अपना साप्ताहिक निकालते।दिल्ली से निकलने वाले नवभारत टाइम्स के लंबे समय तक बिजनौर जिला मुख्यालय पर रिपोर्टर थे। वालीबॉल के खिलाड़ी थे। सिविल लाइन्स में उनकी शंकर औषधालय नाम से दुकान थी।बाद में नजीबाबाद बस स्टेंड पर आ गए थे।उनकी सिविल लाइन की दुकान पर बड़ा बेटा हरीश बैठने लगा। वैद्य जी की अपनी फार्मेसी थी।
बिजनौर के लेखक शकील बिजनौरी बतातें हैं कि रावली में कण्वाश्रम की स्थापना के लिए उन्होंने बहुत कार्य किया। नई बस्ती निवासी श्री चंद्र शेखर शास्त्री और उन्होंने कण्वाश्रम समिति बनाई। इस समिति के नाम साठ बिघा भमि भी प्रशासन से अलाट कराई ।रावली के स्कूल प्रांगण में कण्वऋषि की प्रतिमा लगवाई।इसका उद्घाटन उन्होंने पूर्व रक्षमन्त्री जगजीवन राम से कराया था।
जय नारायण अरूण जी कहते हैं कि उनके निधन के बाद बंसतोत्सव पर कार्यक्रम होने बदं हो गए। कण्वभूमि अखबार जरूर कुछ साल तक चला। सांध्य दैनिक भी निकला। बाद में बंद हो गया।
अशोक मधुप
30 janvari Amar ujala .BIJNOR
30 janvari Amar ujala .BIJNOR
Friday, November 22, 2019
Monday, November 4, 2019
Sunday, October 20, 2019
Thursday, October 3, 2019
धामपुर में दिए भाषण से गांधी जी ने ला दी थी क्रांति
महात्मा गाॅधी और बिजनौर
अशोक मधुप
पूरे देश की तरह बिजनौर में भी आजादी को पाने के लिए जनता उतावली थी। युवाओं के दिलों में आजादी की लहरें हिलोंरे ले रहीं थी। युवा देश पर मर मिटने केे लिए उतावले थे। 18 57 के जनपद की कहानी से वे बहुत चौकस थे। प्रत्येक युवा फूॅक -फूॅक कर कदम रख रहा था।
1857 के आन्दोलन में जनपद के सभी राजाओं और राजघरों ने आपस में तय कर के नवाब महमूद को जिले की कमान अंग्रेजों से दिलाई थी। किंतु नवाब के एक सिपहसालार की करतूत से लड़ाई हिंदू और मुस्लिम में बॅट गई। दोनों पक्ष एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए। जनपद के हिंदू राजा अंग्रेजों के साथ हो गए।लगभग एक साल की आजादी के बाद जनपद को फिर से गुलामी का शिकार होना पड़ा।अब सब सचेत थे। अंग्रेजों के खिलाफ जनपद के सारे हिंदू मुस्लिम एक जुट थे। कांग्रेस और आर्य समाज उनमें देश भक्ति की भावना फूॅकने में लगे थे।ऐसे समय में महात्मा गाॅधी का जनपद में आगमन हुआ।
13 अक्तूबर 1929 के दिन विजय दशमी थी।इसी दिन महात्मा गाॅधी धामपुर पधारे। पूरे जनपद के आजादी के दीवाने विजय दशमी के पर्व का पूजन छोड़कर धामपुर पहुॅचे । महात्मा गाॅधी लगभग 11 बजे ट्रेन से धामपुर पहुॅचे ।उनका केएम कॉलेज में प्रवास था। वहीं सभा थी।स्टेशन पर ही भारी भीड़ थी । कार्यकर्ता किसी तरह स्टेशन मास्टर के कमरे से गाॅधी जी को निकाल कर केएम कॉलेज ले गए। रास्ते में भी महात्मा गाॅधीको देखने के लिए सड़क के दोनों ओर भारी भीड़ थी। गाॅधी जी जिंदाबाद के नारे गूॅज रहे थे।
प्रसिद्ध साम्यवादी चिंतक स्वर्गीय चरण सिंह सुमन ने अपनी पुस्तक "स्वतंत्रता संग्राम के स्तंभ" में इस कार्यक्रम का विस्तार से जिक्र किया है।उन्होंने लिखा है कि महात्मा गाॅधी को सुनने के लिए पाॅच हजार से ज्यादा महिलाएॅ सभा में पहुॅची थीं। उस समय के अखबारों की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा है कि गाॅधी जी को सुनने आने वालों की संख्या भी 15 हजार से ज्यादा थी। जबकि उस समय धामपुर की आबादी मात्र सात हजार ही थी। सभा का प्रबंध बहुत बढ़िया था। खुद महात्मा गाॅधी ने कार्यक्रम की प्रशंसा करते हुए कहा था कि यहाॅ की सभा का प्रबंध उत्तर प्रदेश के दौरे की सभी सभाओं से बढ़िया रहा।सभा में जनपद की ओर से गाॅधी जी को 644 रुपये चार आना की थैली भेंट की गयी। विभिन्न संस्थाओं ने उन्हें सम्मान पत्र भी दिए। गाॅधी जी के भाषण के पश्चात उन्हें मिले मानपत्र उनकी इच्छानुसार नीलाम कर दिये गए। इनकी नीलमी से 46 रुपये प्राप्त हुए।महात्मा गाॅधी के अनुरोध पर उन्हें भेंट की गयी राशि में से दो सौ रूपये कांग्रेस संगठन को दे दिए गए ।शेष 400 रुपया खद्दर प्रचार के लिए चर्खा संघ को दे दिया गया।ज्ञातव्य है कि महात्मा गाॅधी चर्खा संघ के मैनेजर डा जसवंत सिंह के कहने पर धामपुर आए थे।
स्वागत सभा के मंत्री डी गाॅगुली ने गाॅधी जी के कार्यक्रम के लिए अपनी प्रकाशित रिपोर्ट में कहा है कि महात्मा गाॅधी के भाषण से जनपद के युवाओं में नई चेतना जागृत हुई। अनेक कार्यकर्ता अपना व्यवसाय और सरकारी नौकरी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए। इनमें गोविंद सहाय , चौधरी होरी सिंह,विशम्भर नाथ माहेश्वरी, राम निवास ,चोखे लाल,पंडित वाचस्पति, सोमदेव , चंद्र शेखर गोयल, लाला मुन्ना लाल ,मक्खन सिंह त्यागी,चौधरी चंदन सिंह आदि प्रमुख हैं।इन्होंने कांग्रेस का संदेश गाॅव गाॅव तक पहुॅचाया। ये ही आगे चलकर बड़ा आंदोलन बना।
अशोक मधुप
2 october 2019
अशोक मधुप
पूरे देश की तरह बिजनौर में भी आजादी को पाने के लिए जनता उतावली थी। युवाओं के दिलों में आजादी की लहरें हिलोंरे ले रहीं थी। युवा देश पर मर मिटने केे लिए उतावले थे। 18 57 के जनपद की कहानी से वे बहुत चौकस थे। प्रत्येक युवा फूॅक -फूॅक कर कदम रख रहा था।
1857 के आन्दोलन में जनपद के सभी राजाओं और राजघरों ने आपस में तय कर के नवाब महमूद को जिले की कमान अंग्रेजों से दिलाई थी। किंतु नवाब के एक सिपहसालार की करतूत से लड़ाई हिंदू और मुस्लिम में बॅट गई। दोनों पक्ष एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए। जनपद के हिंदू राजा अंग्रेजों के साथ हो गए।लगभग एक साल की आजादी के बाद जनपद को फिर से गुलामी का शिकार होना पड़ा।अब सब सचेत थे। अंग्रेजों के खिलाफ जनपद के सारे हिंदू मुस्लिम एक जुट थे। कांग्रेस और आर्य समाज उनमें देश भक्ति की भावना फूॅकने में लगे थे।ऐसे समय में महात्मा गाॅधी का जनपद में आगमन हुआ।
13 अक्तूबर 1929 के दिन विजय दशमी थी।इसी दिन महात्मा गाॅधी धामपुर पधारे। पूरे जनपद के आजादी के दीवाने विजय दशमी के पर्व का पूजन छोड़कर धामपुर पहुॅचे । महात्मा गाॅधी लगभग 11 बजे ट्रेन से धामपुर पहुॅचे ।उनका केएम कॉलेज में प्रवास था। वहीं सभा थी।स्टेशन पर ही भारी भीड़ थी । कार्यकर्ता किसी तरह स्टेशन मास्टर के कमरे से गाॅधी जी को निकाल कर केएम कॉलेज ले गए। रास्ते में भी महात्मा गाॅधीको देखने के लिए सड़क के दोनों ओर भारी भीड़ थी। गाॅधी जी जिंदाबाद के नारे गूॅज रहे थे।
प्रसिद्ध साम्यवादी चिंतक स्वर्गीय चरण सिंह सुमन ने अपनी पुस्तक "स्वतंत्रता संग्राम के स्तंभ" में इस कार्यक्रम का विस्तार से जिक्र किया है।उन्होंने लिखा है कि महात्मा गाॅधी को सुनने के लिए पाॅच हजार से ज्यादा महिलाएॅ सभा में पहुॅची थीं। उस समय के अखबारों की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा है कि गाॅधी जी को सुनने आने वालों की संख्या भी 15 हजार से ज्यादा थी। जबकि उस समय धामपुर की आबादी मात्र सात हजार ही थी। सभा का प्रबंध बहुत बढ़िया था। खुद महात्मा गाॅधी ने कार्यक्रम की प्रशंसा करते हुए कहा था कि यहाॅ की सभा का प्रबंध उत्तर प्रदेश के दौरे की सभी सभाओं से बढ़िया रहा।सभा में जनपद की ओर से गाॅधी जी को 644 रुपये चार आना की थैली भेंट की गयी। विभिन्न संस्थाओं ने उन्हें सम्मान पत्र भी दिए। गाॅधी जी के भाषण के पश्चात उन्हें मिले मानपत्र उनकी इच्छानुसार नीलाम कर दिये गए। इनकी नीलमी से 46 रुपये प्राप्त हुए।महात्मा गाॅधी के अनुरोध पर उन्हें भेंट की गयी राशि में से दो सौ रूपये कांग्रेस संगठन को दे दिए गए ।शेष 400 रुपया खद्दर प्रचार के लिए चर्खा संघ को दे दिया गया।ज्ञातव्य है कि महात्मा गाॅधी चर्खा संघ के मैनेजर डा जसवंत सिंह के कहने पर धामपुर आए थे।
स्वागत सभा के मंत्री डी गाॅगुली ने गाॅधी जी के कार्यक्रम के लिए अपनी प्रकाशित रिपोर्ट में कहा है कि महात्मा गाॅधी के भाषण से जनपद के युवाओं में नई चेतना जागृत हुई। अनेक कार्यकर्ता अपना व्यवसाय और सरकारी नौकरी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए। इनमें गोविंद सहाय , चौधरी होरी सिंह,विशम्भर नाथ माहेश्वरी, राम निवास ,चोखे लाल,पंडित वाचस्पति, सोमदेव , चंद्र शेखर गोयल, लाला मुन्ना लाल ,मक्खन सिंह त्यागी,चौधरी चंदन सिंह आदि प्रमुख हैं।इन्होंने कांग्रेस का संदेश गाॅव गाॅव तक पहुॅचाया। ये ही आगे चलकर बड़ा आंदोलन बना।
अशोक मधुप
2 october 2019
जेल गए और गांधी हो गए लतीफ
आजादी के आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी 19 अक्तूबर 1929 को विजय दशमी
के दिन धामपुर आए। जनपद ही नहीं , जनपद के आसपास के लोगों में भी वह
आजादी के आंदोलन की चिंगारी फूंक गए। जनपद के आजादी के आंदोलन के एक सिपाही
अबदुल लतीफ को जेल प्रवास के दौरान उनके साथी रहे पंडित जवाहर लाला
नेहरू ने उन्हें गांधी कहना शुरू कर दिया। और वे गांधी के नाम से
प्रसिद्घ हो गए। पैजनिंया के क्रांतिकारी शिवचरण सिंह त्यागी ने तो बापू के
मुस्लिम बने पुत्र हीरा लाल को वापिस हिंदू धर्म में लाने का काम
किया।
अब्दुल लतीफ गांधी
फोटो
पुलिस की नौकरी से त्यागपत्र देकर आजादी की कूदने वाले बिजनौर के अब्दुल लतीफ के अब्दुल लतीफ गांधी बनने की भी रोचक कहानी है।
अब्दुल लतीफ गांधी पुलिस में सब इंस्पेक्टर थे। नौकरी के दौरान देश आजाद कराने और कांग्रेस पार्टी केेे लोगों से इन्के संबध बन गए। उनकी सुहानुभूति आजादी के लिए आंदोलन करने वालों से होने लगी। वे इन्हें चंदा देने लगे। गुप्तचरों की सूचनाएं उनके अधिकारियों को आने लगी।इनका परिवार बहुत संपन्न परिवार था। पिता के संबधों के कारण सरकार ने इन्हें नौकरी से नहीं निकाला।किंतु तबादले करने शुरू कर दिए। इन्होंने अपने पिता मौलाना अब्हुल हई से नौकरी छोडने की इव्छा जाहिर की।परिवार नहीं चाहता था। किंतु उन्होंने नौकरी से त्याग पत्र दे दिया। वे आजादी के आंदोलनमें कूद पड़़े। आजादी के लिए चल रहे आंदोलन में वे कई बार जेल भी गए। जेल में उन्हें मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और पंडित जवाहर लाल नेहरू से साथ काफी समय रहना पड़ा।एक ही कोठरी में इन्हें लंबे समय तक रखा गया।
अब्दुल लतीफ गांधी के पोते बिजनौर नगर पालिका के पूर्व चेयरमैन फरीद अहमद बतातें हैं कि मौलाना आजाद उनके दादा अब्दुल लतीफ को ख्वाजा बिजनौरी कहते थे। पंडित नेहरू उन्हें महात्मा गांधी कहकर पुकारते थे।
ख्वाजा बिजनौरी नाम तो ज्यादा नही चला किंतु समर्थन और मिलने वाले उन्हें गांधी कहने लगे। यहां नाम चल पड़ा और वे अब्दुल लतीफ गांधी हो गए। सब उन्हें पयार से गांधी जी कहते।वे बताते हैं कि उनके दादा उत्तर प्रदेश में दो बार एमएलए और एक बार एम पी भी रहे। अबदुल लतीफ ग्राधी बहुत ही लोकप्रिय थ।
फरीद अहमद बताते है कि गांधी जी ने स्वंय उनके दादा जी को चरखा दिया था। वह उनके परिवार की लंबे समय तक धरोहर रहा। बांद में उसे गांधी संग्रहालय को दे दिया गया।
शिवचरण त्यागी ने तो गांधी जी के पुत्र को हिंदू धर्म में वापसी कराई
फोटो
पैजनियां के शिव चरण सिंह त्यागी ने तो इस्लाम ग्रहण कर चुके महात्मी गांधी के पुत्र को हिंदू धर्म में लाने के लिए काम किया।
शिवचरण सिंह त्यागी के नवासे प्रसिद्घ साहित्यकार भोला नाथ त्यागी बतातें हैं कि उनके नाना के देशके बड़े बड़़े क्रातिकारियों से बहुत ही अच्छे संबध थे। आजादी के आदेेलन में कई प्रसिद्घ क्रांतिकारी उनके गांव पैजनिया में आकर काफी- काफी समय रूके। आजादी के बाद उन्होंने कोई सरकारी सुविधा आजीवन ग्रहण नहीं की।
महात्मा गांधी के पुत्र हीरालाल कुछ लोगों के प्रभाव में आकर मुस्लिम बन गए थे।महात्मा गांधी की पत्नी कस्तूरबा और उस समय के देश के बडे़े उद्योगपति जमना लाला बजाज के कहने पर शिवचरण त्यागी ने हीरालाल से संपर्क किया। उन्हें अपने संपर्क में लिया। उनका मस्तिष्क बदला। प्रयास कामयाब हुआ। कामयाब हुए हीरा लाला वापिस हिंदु धर्म में आ गए किंतु यह ज्यादा न चला। हीरा लाल फिर अपने पुराने रास्ते पर चले गए।
अशोक मधुप
३ अक्टूबर २०१९ में अमर उजाला में छपा मेरा लेख
अब्दुल लतीफ गांधी
फोटो
पुलिस की नौकरी से त्यागपत्र देकर आजादी की कूदने वाले बिजनौर के अब्दुल लतीफ के अब्दुल लतीफ गांधी बनने की भी रोचक कहानी है।
अब्दुल लतीफ गांधी पुलिस में सब इंस्पेक्टर थे। नौकरी के दौरान देश आजाद कराने और कांग्रेस पार्टी केेे लोगों से इन्के संबध बन गए। उनकी सुहानुभूति आजादी के लिए आंदोलन करने वालों से होने लगी। वे इन्हें चंदा देने लगे। गुप्तचरों की सूचनाएं उनके अधिकारियों को आने लगी।इनका परिवार बहुत संपन्न परिवार था। पिता के संबधों के कारण सरकार ने इन्हें नौकरी से नहीं निकाला।किंतु तबादले करने शुरू कर दिए। इन्होंने अपने पिता मौलाना अब्हुल हई से नौकरी छोडने की इव्छा जाहिर की।परिवार नहीं चाहता था। किंतु उन्होंने नौकरी से त्याग पत्र दे दिया। वे आजादी के आंदोलनमें कूद पड़़े। आजादी के लिए चल रहे आंदोलन में वे कई बार जेल भी गए। जेल में उन्हें मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और पंडित जवाहर लाल नेहरू से साथ काफी समय रहना पड़ा।एक ही कोठरी में इन्हें लंबे समय तक रखा गया।
अब्दुल लतीफ गांधी के पोते बिजनौर नगर पालिका के पूर्व चेयरमैन फरीद अहमद बतातें हैं कि मौलाना आजाद उनके दादा अब्दुल लतीफ को ख्वाजा बिजनौरी कहते थे। पंडित नेहरू उन्हें महात्मा गांधी कहकर पुकारते थे।
ख्वाजा बिजनौरी नाम तो ज्यादा नही चला किंतु समर्थन और मिलने वाले उन्हें गांधी कहने लगे। यहां नाम चल पड़ा और वे अब्दुल लतीफ गांधी हो गए। सब उन्हें पयार से गांधी जी कहते।वे बताते हैं कि उनके दादा उत्तर प्रदेश में दो बार एमएलए और एक बार एम पी भी रहे। अबदुल लतीफ ग्राधी बहुत ही लोकप्रिय थ।
फरीद अहमद बताते है कि गांधी जी ने स्वंय उनके दादा जी को चरखा दिया था। वह उनके परिवार की लंबे समय तक धरोहर रहा। बांद में उसे गांधी संग्रहालय को दे दिया गया।
शिवचरण त्यागी ने तो गांधी जी के पुत्र को हिंदू धर्म में वापसी कराई
फोटो
पैजनियां के शिव चरण सिंह त्यागी ने तो इस्लाम ग्रहण कर चुके महात्मी गांधी के पुत्र को हिंदू धर्म में लाने के लिए काम किया।
शिवचरण सिंह त्यागी के नवासे प्रसिद्घ साहित्यकार भोला नाथ त्यागी बतातें हैं कि उनके नाना के देशके बड़े बड़़े क्रातिकारियों से बहुत ही अच्छे संबध थे। आजादी के आदेेलन में कई प्रसिद्घ क्रांतिकारी उनके गांव पैजनिया में आकर काफी- काफी समय रूके। आजादी के बाद उन्होंने कोई सरकारी सुविधा आजीवन ग्रहण नहीं की।
महात्मा गांधी के पुत्र हीरालाल कुछ लोगों के प्रभाव में आकर मुस्लिम बन गए थे।महात्मा गांधी की पत्नी कस्तूरबा और उस समय के देश के बडे़े उद्योगपति जमना लाला बजाज के कहने पर शिवचरण त्यागी ने हीरालाल से संपर्क किया। उन्हें अपने संपर्क में लिया। उनका मस्तिष्क बदला। प्रयास कामयाब हुआ। कामयाब हुए हीरा लाला वापिस हिंदु धर्म में आ गए किंतु यह ज्यादा न चला। हीरा लाल फिर अपने पुराने रास्ते पर चले गए।
अशोक मधुप
३ अक्टूबर २०१९ में अमर उजाला में छपा मेरा लेख
Subscribe to:
Posts (Atom)






