Tuesday, April 8, 2014

राज गोपाल सिंह नही रहें


राजगोपाल सिंह नहीं रहे। राजगोपाल  बिजनौरी कवि, गीतकार के साथ साथ एक बहुत अच्छे मित्र थे। मेरे कॉलेज के सखा। बी.ए में अध्ययन के दौरान उनसे परिचय हुआ। कई साल साथ रहा। उनका गला बहुत अच्छा था। बहुत शानदार गीत  गाते , रतजगे करते कब गीत लिखने लगे पता नहीं चला।
 दिल्ली  पुलिस में नौकरी मिलने के बाद फिर कभी संपर्क  नहीं हुआ। जीवन की व्यसतता में  बिजनौर आने पर वे कभी मिले नहीं। दिल्ली मैं   जाते बहुत बचता हूं। कभी इस सुदामा को जरूरत भी नहीं हुई।
हां गाहे -बगाहे उनकी कवितांए  दोहे पढ़ने को मिलते रहे। टीवी पर एक बार लालकिले से उन्हें कविता पाठ करते देख बहुत सुखद लगा। प्रत्येक कवि का सपना होता है  वह लाल किले में होने वाले कवि सम्मेलन में कविता पाठ करे। यह सपना उनका कई बार पूर्ण  हुआ।
आज सवेरे डा अजय जनमेजय के फोन से उनके निधन का पता चला। यह भी पता चला कि कई  माह से बीमार थे।  उनके परिवार जनों से उनकी खूब सेवा की।
बिजनौर के भाटान स्कूल से  राजकीय इंटर कॉलेज  के जाने वाले रास्ते पर उनका घर है। यहीं  उनका एक जुलाई  १९४७ में जन्म हुआ। बिजनौर की गलियों में खेलकूद कर बड़े हुए राजगोपाल सिंह बिजनौरी अब हमारे बीच नही रहे।
श्रद्धांजलि स्वरूप उनके कुछ दोहे  प्रस्तुत हैं-

बाबुल अब न होएगी,भाई बहन में जंग।
डोर  तोड़ अनजान पथ, उड़कर चली पतंग।
.........
बाबुल हमसे हो गई आखिर कैसी भूल,
क्रेता की हर शर्त जो, तूने करी कबूल।
.......
रोटी  रोजी में हुई  सारी उम्र तमाम,
कस्तूरी लम्हे हुए बिना मोल नीलाम।

धरती या किसान से,हुई किसी से चूक,
फसलों के बदले खेत में लहके है  बंदूक
..
 अदभुत है,  अनमोल है  महानगर की भोर,
रोज जगाए है  हमें कान फोड़ता शोर।
..
  राजगोपाल की  कुछ गजल

मैं रहूँ या न रहूँ, मेरा पता रह जाएगा
शाख़ पर यदि एक भी पत्ता हरा रह जाएगा

बो रहा हूँ बीज कुछ सम्वेदनाओं के यहाँ
ख़ुश्बुओं का इक अनोखा सिलसिला रह जाएगा

अपने गीतों को सियासत की ज़ुबां से दूर रख
पँखुरी के वक्ष में काँटा गड़ा रह जाएगा

मैं भी दरिया हूँ मगर सागर मेरी मन्ज़िल नहीं
मैं भी सागर हो गया तो मेरा क्या रह जाएगा

कल बिखर जाऊँगा हरसू, मैं भी शबनम की तरह
किरणें चुन लेंगी मुझे, जग खोजता रह जाएगा
...........

छीनकर पलकों से तेरे ख़्वाब तक ले जाएगा
एक झोंका याद के सारे वरक ले जाएगा

वक्त इक दरिया है इसके साथ बहना सीख लो
वरना ये तुमको बहाकर बेझिझक ले जाएगा

रास्ते चालाक थे देते रहे हमको फ़रेब
यह सुरग ले जाएगा और वो नरक ले जाएगा

दूल्हा बनकर हर ख़ुशी के द्वार आँसू एक दिन
आएगा और मांग भर, करके तिलक ले जाएगा

किसको था मालूम मौसम का मुसाफ़िर लूट कर
तितलियों से रंग, फूलों से महक ले जाएगा

...........
मौज-मस्ती के पल भी आएंगे
पेड़ होंगे तो फल भी आएंगे

आज की रात मुझको जी ले तू
चांद-तारे तो कल भी आएंगे

चाहतें दोस्ती की पैदा कर
रास्ते तो निकल भी आएंगे

आइने लाए जाएंगे जब तक
लोग चेहरे बदल भी आएंगे

अजनबी बादलों से क्या उम्मीद
आए तो ले के जल भी आएंगे

........
हमसे करते रहे दिल्लगी रात भर
नींद भी, ख़्वाब भी, आप भी रात भर

रात भर बादलों ने उड़ाई हँसी
छटपटाती रही इक नदी रात भर

ऐसा लगता है मौसम का रुख़ देखकर
बफ़र् शायद कहीं पर गिरी रात भर

फूल बनते ही कल जो बिखर जाएगी
याद आती रही वो कली रात भर

चांदनी पर ही सबने कहे शेÓर क्यों
सोचती ही रही तीरगी रात भर

......


राजगोपाल सिंह

चुप की बाँह मरोड़े कौन
सन्नाटे को तोड़े कौन

माना रेत में जल भी है
रेत की देह निचोड़े कौन

सागर सब हो जाएँ मगर
साथ नदी के दौड़े कौन

मुझको अपना बतलाकर
ग़म से रिश्ता जोड़े कौन

भ्रम हैं, ख़्वाब सलोने पर
नींद से नाता तोड़े कौन

...............
चढ़ते सूरज को लोग जल देंगे
जब ढलेगा तो मुड़ के चल देंगे

मोह के वृक्ष मत उगा ये तुझे
छाँव देंगे न मीठे फल देंगे

गंदले-गंदले ये ताल ही तो तुम्हें
मुस्कुराते हुए कँवल देंगे

तुम हमें नित नई व्यथा देना
हम तुम्हें रोज़ इक ग़ज़ल देंगे

चूम कर आपकी हथेली को
हस्त-रेखाएँ हम बदल देंगे
राजगोपाल के काव्य संग्रह चिराग से ली गई  रचनांए
अशोक मधुप





Sunday, March 9, 2014

मशहूर डायलॉग राइटर अख्तर उल ईमान की पुण्य तिथि नौ मार्च पर विशेष


मशहूर डायलॉग राइटर अख्तर उल ईमान की पुण्य तिथि पर विशेष

अख़्तर उल ईमान के डायलॉग ने कई फिल्मों में डाली जान
बिजनौर के राहूखेड़ी के रहने वाले थे अख्तर साहब

बिजनौर, ०८ मार्च

चुनाये सेठ जिनके घर शीशे के हो, वो दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते......, ये बच्चों के खेलने की चीज नहीं, हाथ में लग जाए तो खून निकल आता है। ७० के दशक में बनी फिल्म वक्त के इन डायलॉग ने अपने जमाने में खूब धूम मचाई। फिल्म वक्त ही नहीं बल्कि अपने दौर की रोटी, सोना चांदी, अपराध, हमराज, गुमराह, आदमी, दाग जैसी तमाम मशहूर फिल्मों में डायलॉग लिखने और फिल्म लहू पुकारेगा का निर्देशन करने वाले मरहूम अख़्तर-उल-ईमान बिजनौर जिले की वो शख्सियत हैं, जिन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में कामयाबी की बुलंदियों को छुआ और बिजनौर जिले का नाम भी रोशन किया।

अख़्तर-उल-ईमान बिजनौर जिले के छोटे से गांव राहूखेड़ी(नजीबाबाद) में १२ नवंबर १९१५ को सामान्य परिवार में जन्मे। इनके पिता फतेह मुहम्मद मदरसे में शिक्षक एवं पेश इमाम थे। बचपन में अख्तर साहब पेड़ नीचे बैठकर परिंदों की आवाज सुना करते थे। कम उम्र में ही शिक्षा के लिए अख्तर उल ईमान अपनी खाला के साथ दिल्ली चले गये। १९३४ में फतेहपुर मुस्लिम हाई स्कूल में दाखिला लिया और गुजारे के लिए ट्यूशन पढ़ाने लगे। यहीं से इन्होंने नज्म निगारी का आगाज किया। शुरू में स्कूल की मैग्जीन में छपते और पसंद किये जाते थे। हाई स्कूल पास करके दिल्ली में ही एग्ंलो अर्बिक कॉलेज(जाकिर हुसैन कालेज) में दाखिला लिया। इसी कालेज से संबद्ध एडल्ट शिक्षा के केंद्र में ये रात के समय पढ़ाते थे।

जनपद के प्रसिद्ध उर्दू विद्वान इकबाल सिद्दीकी के अनुसार अख्तर साहब इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए अलीगढ़ चले गये। अलीगढ़ में १९४४ में इन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से फारसी साहित्य में एमए किया। इसके बाद अख़्तर साहब ने मुंबई का रूख किया और फिल्म डायरेक्टर बीआर चोपड़ा के साथ काम करने लगे। यहीं से फिल्मी दुनिया में इनकी एंट्री दर्ज हुई। फिर क्या था, अख़्तर साहब लिखते गये और वालीवुड की दुनिया में नाम कमाते गये। सफलता के इस दौर में इन्होंने विजय, चोर पुलिस, दो मुसाफिर, चांदी सोना, जमीर, छत्तीस घंटे, रोटी, नया नशा, दाग, धुंध, दास्तान, जुल्म का उस्ताद, आदमी, हमराज, फूल और पत्थर, मेरा साया, यादे, गुमराह, अपराध, धर्मपुत्र, इस्तेफाक, आदमी और इंसान समेत लगभग सौ फिल्मों में डायलॉग लिखे। फिल्म वक्त, फूल और पत्थर एवं रोटी में लिखे डायलॉग काफी चर्चित रहे। धर्मवीर और वक्त के डालाग के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड मिला। फिल्म लहु पुकरेगा का निर्देशन भी किया, हालांकि यह फिल्म धूम नहीं मचा पाई। फिल्म डायलॉग लिखने के अलावा अख़्तर साहब ऊर्द नज्म के मशहूर शायर भी थे। इनके काव्य संकलन-गरदाब, यादें, तारीक सय्यारा, आबजू, सबरंग, बिन्ते-लम्हात, नया अहंग, सरो-सामां और ज़मीन-ज़मीन आदि काफी मशहूर रहे। काव्य संकलन गरदाब को पढ़कर मशहूर शायर फिराक़ गोरखपुरी ने कहा था कि.... ऐसा मालूम होता है शायर नागफनी निगल गया है। १९६० में काव्य संकलन बिन्ते-लम्हात को साहित्यिक एकाडमी का इनाम मिला। यूपी ऊर्दू एकादमी में ने भी इन्हें नवाजा। नया अहंग पर महाराष्ट्र ऊर्दू एकादमी का इनाम मिला। इसके बाद सरो सामान पर हिंदी साहित्य एकादमी ने इकबाल सम्मान से नवाजा। सरोसामान पर ही गालिब एकादमी दिल्ली और ऊर्दू एकादमी दिल्ली ने भी इनामात दिये.....। एक छोटी सी नज्म एक लड़का से ऊर्दू नज्मों की दुनिया में तहलका मचाने वाले मशहूर शायर अख्तर उल ईमान फिल्मी अदब की दुनिया की ८० बहारे देखने के बाद ०९ मार्च १९९६ में हृदय गति रूकने के कारण इस दुनिया से रूखसत हो गये। उन्हीं के शब्द-मेरे बोसीदा लिबादे में रहेगी न सकत, माहो साल और लगा दें नया पेवंद कहीं, जागते जागते थक जाऊंगा, सो जाऊंगा। उनके देहांत पर सभी प्रसिद्ध क़लमकारों ने कहा कि वो जदीद शायरी के कबीले के आखिरी सरदार थे। आइये हम सब आज अपने जिले की इस महान हस्ती को उनकी मशहूर नज्म के साथ फिर से याद करें।ं

इस भरे शहर में कोई ऐसा नहीं

जो मुझे राह चलते को पहचान ले

और आवाज दे, ओ बे ओ सर फिरे

दोनों एक दूसरे से लिपटकर रहे

गालियां दे, हसें, हाथापाई करें

घंटो एक दूसरे की सुनें और कहें

और इस नेक रूहों के बाजार में

मेरी ये क़ीमती बेबहा ज़िंदगी

एक दिन के लिए अपना रूख मोड़ दे।





फिल्म अभिनेता अमजद खान थें दामाद

बिजनौर। फिल्म अभिनेता अमजद खान से अख्तर उल ईमान की बड़ी बेटी शहला का विवाह हुआ था। शहला के अतिरिक्त दो बेटियां इस्मा और र$खशंदा, एक बेटा रामिश है। रामिश फिल्मों में काम करते हैं।

अशोक मधुप

Tuesday, January 14, 2014

मौसम टोपी का है


जुम्मन मियां आज सवेरे ही मेरे घर पर आ धमके। बोले, मियां सोचतां हूं कि फिर से टेलरिंग का खानदानी काम शुरू कर दूं। मैने हंसकर पूछा, ये नया शगल दिमाग में कहां से आ गया? वह बोले, यार केजरीवाल ऐंड पार्टी ने दिल्ली में क्या टोपी लगाई कि जैसे टोपी युग लौट आया। टोपी से परहेज करने वाले भाजपाई भी अब टोपी पहने नजर आने लगे हैं। इनके गुरु संघी तो पहले ही टोपी लगाते हैं। सपाई भी टोपी पहनते हैं। राजीव गांधी से बाद कांग्रेस में टोपी युग खत्म हो गया था। लगता है कि केजरीवाल ऐंड पार्टी की जीत को ये टोपी का करिश्मा मानकर फिर से टोपी पहनना शुरू न कर दें। ऐसे में मुझे टोपी बनाने के काम में कोई नुकसान नजर नहीं आता। थुक गटकते हुए उन्होंने फिर से कहना शुरू किया, अलग-अलग पार्टियों के लिए टोपी सिलना मुश्किल काम भी नहीं है। टोपी सिलो। आप की सफेद है ही। भाजपाइयों के लिए भगवा, सपा के लिए लाल और संघी के लिए काली रंगवा दो। बस! काम बहुत अच्छा है। हल्दी लगे न फिटकरी, रंग चोखा होय। टोपी पहनने और खरीदने वाले नेता छुटभैया तो होंगे नहीं, जो मोल-भाव करें। बड़े नेता होंगे, जो मांगो वह मिलेगा। दुकान अच्छी चलेगी। चुनाव के टाइम तो पौ-बारह रहेगी। जैसे केजरीवाल के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के दिन उनकी पार्टी के चुनाव निशान झाड़ू की दिल्ली में इतनी मांग हुई कि कई गुने दाम देने पर भी बाजार में टोटा पड़ गया। मैने कहा, भाई बहुत अच्छा है। आप टोपी पहनाने का तो काम करोगे। दूसरों को इज्जत बख्शोगे। वरना ये राजनेता दूसरों को टोपी पहनाते नहीं, उनकी टोपी उतारते हैं। सरे बाजार उछालते हैं। जहां कोई विरोधी आगे बढ़ा, लगे उसकी कमी निकालने। उनकी ही नहीं, उसके पूरे कुटुंब की जन्मकुंडली खोजी जाने लगती है। छांट-छांटकर आरोप लगाए जाने लगते हैं। यह भी नहीं सोचा जाता कि किसे क्या कह रहे हैं। कोई यह नहीं सोचता कि अगर तुम्हें दूसरा ऐसा कहे, तो कैसा लगेगा? इनका काम टोपी उछालना है, तो कुछ तो कहना ही है। कोई तो आरोप लगाना ही है। कब किसे वे डाकू मानसिंह या सुलताना का वंशज बता दें, नहीं कहा जा सकता। किसी विरोधी को हिटलर, नादिरशाह या मुहम्मद बिन तुगलक से जोड़ते इन्हें शर्म नहीं आएगी। बड़ी बेशर्मों की पंचायत है यह। अच्छा है, तुम इन गंदों को टोपी पहनाओगे। इनकी टोपी उतारोगे नहीं। अशोक मधुप Mera yah vyang Amar ujala me 14 janvari ko sampagkiye page par chapa hae

Tuesday, September 10, 2013

स्व.मौलवी अब्दुल लतीफ गांधी

मेरी यह स्टोरी आज १० सिंतबर के  अमर उजाला में छपी है। मूल स्टोरी इसके साथ में दी  गई  है


कभी दोनों संप्रदाय के लोग साथ मनाते थे त्योहार प्रसिद्ध राजनेता स्व.मौलवी अब्दुल लतीफ गांधी ने अपनी आत्म कथा में किया जिक्र कहा, होली पर दोस्तों ने पिला दी थी भांग
बिजनौर, आज मुजफ्फरनगर, सांप्रदायिक आग में जल रहा है। आसपास के कई जनपद सामाजिक उनमाद की चपेट में हैं। आजादी से पहले और बाद तक भी ये हालात नहीं थे। बिजनौर जनपद में दोनों समुदाय के लोग आपस में प्रेम से रहते थे। आजादी के बाद जनपद के पहले एमएलए और बाद में सांसद रहे स्व.मौलवी अब्दुल लतीफ गांधी ने इसका जिक्र अपनी आत्मकथा ' लतीफ की कहानी में किया है। स्व.मौलवी अब्दुल लतीफ जनपद के प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व राजनीतिज्ञ रहे। उनके व्यवहार के कारण उन्हें गांधी कहकर बुलाया जाने लगा। और अब्दुल लतीफ अब्दुल लतीफ गांधी बन गए। पंडित जवाहर लाल नेहरू से उनकी दोस्ती थी। वे पंडित नेहरू के साथ आजादी की जंग में देहरादून जेल में रहे। नेहरू जी के कहने पर १९४१ में बिजनौर के पालिकाध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दे दिया था। मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने स्व.मौलवी अब्दुल लतीफ गांधी ने उनको ख्वाजा बिजनौरी का खिताब दिया था। आजादी के बाद स्व. गांधी १९५२ में जनपद के पहले विधायक बने। १९५७ में वे सांसद बने। ६४ के बाद राजनीति से संन्यास ले लिया। अब्दुल लतीफ गांधी की हिंदुओं से खूब दोस्ती थी और वे हिंदू धर्म के त्योहारों में भी शिरकत करते थे। उन्होंने अपनी किताब लतीफ की कहानी में लिखा है - शिक्षा प्राप्त करने का समय भी कितना सुखद होता है। इसका वर्णन करना अत्याधिक कठिन है। होली का त्यौहार आता तो हम खुशी से पागल हो उठते। एक दूसरे के घर जाते, रंग और गुलाल से सब भीग जाते। संध्या के समय ----- टोलियां घर पर आती, देर तक वे नाचते और गाते रहते और अंत में वालिद साहब से दो रूपए तथा एक गुड़भेली लेकर प्रसन्नता से घर लौटते। ठीक इसी तरह से दीपावली का त्यौहार मनाते थे। राजकीय पाठशाला में सब विद्यार्थी एकत्रित हो जाते, दीपकों की पंक्ति सजाते और ऐसा सोचते मानो जन्नत की सारी खुशियां केवल हमारे ही लिये बनाई गई है। हमारे घर पर रोशनी का विशेष प्रबंध रहता था। सत्य बात तो यह है कि हमारे घर वालों का यह प्रयत्न रहता था कि सबसे अधिक सुंंदर प्रकाश उनके घर पर ही हो और होता भी यही था। मौलवी साहब के घर पर रोशनी देखने के लिए लगभग सभी आते थे। मुझे बचपन की एक घटना स्मरण हो आई है। होली का अवसर था। मेरे मित्रों ने जिनमें प्यारेकिशन सुखिया, मनमोहननाथ और मनोहरलाल गुप्ता प्रमुख थे। मुझे धोखे से भंग पिला दी। मेरा बुरा हाल था। कई दिन तक मैं घर बेहोश पड़ा रहा ,परंतु मेरे वालिद साहब ने मुझे और मेरे मित्रों को कुछ भी नहीं कहा। आज भी जब उन बातों को याद करता हूं तो मेरा हृदय दुख से भर जाता है। कहा गई वह सभ्यता और कहा तिरोहित हो गया वह स्नेह? काश वे पुरानी परम्परायें, सभ्यता, मेल मिलाप के रिश्ते फिर से इस देश में लौट आए। ठीक इसी प्रकार हिंदू मित्र ईद, बकरईद, शब्बरात त्यौहारों को हृदय से मनाते थे। पृथकता की भावना का जन्म राजनैतिक कार्यो का परिणाम हो सकता है। पर इस प्रवृत्ति ने सामाजिक शांति को प्राय: नष्ठ सा कर दिया है।

Wednesday, May 29, 2013

     नेक्सलाइड के साथ बाढ़ में एक दिन
आज देश के कई भाग  में नेक्सलाइड  का जोर है। हाल ही में छत्तिसगढ़ में इन्होंने कांग्रेस की यात्रा पर हमला करके दो दर्जन के आसपास व्यक्ति मार डाले। सन् 84 के आसपास का एक नक्सली के साथ बाढ़ में एक दिन का संस्मरण याद आ रहा है।
कालेज के समय से मैं मार्क्सवादी कम्युनिष्ट आं दोलन से जुड़ गया था।  इसी दौरान वामपंथी  आं दोलन की अलग अलग विचारधाराओं से परिचय हुआ।कुछ समय शिक्षण कर पूर्णकालिक पत्रकारिता से जुड़ गया।  लगभग 40 साल पूर्व अमर उजाला से जुड़ा। 80 के आसपास घर से समाचार भेजता था। एक दिन कुर्ता  पायजामा पहने कंधे पर थैला लटकाए एक साहब घर आंए। उन्होंने अपना नाम  अशोक कुमार और अपने को सीपीआईएमएल की प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बताया। सीपीआईएमएल भारत की कम्युनिष्ट पार्टी   मार्क्सवादी लेलिनवादी है। इसे ही नेक्सलाईड  पार्टी  कहतें हैं। मै  अपने घर पर एक नेक्सलाईड  को देख कर अचकचा गया। लगा कि इसके बैग में हैंड ग्रेनेट या स्टेनगन हो सकती है। मेरे दिमाग में नेक्सलाइड की यही छविथी। खेर कुछ देर मुझे सामान्य होने  में लगे। अशोक से बातचीत हुई। वह मेरे ही जनपद के रानीपुर गांव का रहने वाला है। बाद में उससे अच्छी दोस्ती हो गई। वह यदा - कदा आने लगा। अशोक मंडावर के गंगा खादर क्षेत्र में अपना संगठन बना रहा था। इसी दौरान गंगा में बाढ़ आ गई। गंगा बहुत तबाही कर रही थीं। अशोक ने कहा कि गंगा बहुत तबाही कर रही है। चलो बाढ़ घुमाता हूं। मुझे बाढ़ में  जाने का कोई  अनुभव नहीं था। तै हो गया कि अगले दिन सबेरे सात बजे मंडावर बस स्टैंड पर मिलेंगे। मुझे  ध्यान नहीं था,कि अगले दिन तीज का पर्व  है। पत्नी निर्मल से नौ  बजे तक आने को मैं कहकर कैमरा लेकर घर से निकल गया। अशोक मुझे मंडावर मिला।  उसके साथ बैलगाड़़ी में बैठकर गंगा के किनारे बसे गांव डैबलगढ़  पंहुच गया। यह गांव अंग्रेज कलेक्टर डैबल द्वारा बसाया गया ब्रिटीशकालीन गांव हैं।
यहां  नाश्ताकर हम नाव से बाढ़ देखने चल दिए। गंगा का जल पूरे उफान पर था। बड़े बडे़ पेड़ पहाड़ो  से  वहकर आ रहे थे। गंगा की धार की जोरदार आवाज से  ही डर लग रहा था। मुझे तैरना नहीं आता था। एक बार ज्योतिषी ने कहा था कि पानी से बचना। पानी में ले जाने वाले को अपना दुश्मन मानना। पानी में किसी के साथ नही जाना। गंगा की तेज उठती पटारों को देखकर मुझे डर लग रहा था। ऐसे में ज्योतिषी की बताई  इस बात के याद  आने पर मेरा डर और बढ़ गया। नाव में अशोक उसकी पार्टी  का स्टेट सेकेट्री और लगभग एक दर्जन  गांव वाले सवार थे। नाव खेवकों को गंगा की धार को पार करना था। अतः  वे नाव को खींचकर धार  से ऊपर की साइड में ले गये। ऐसी गजह देखकर की जहां से नाव पानी में वह कर दूसरी साइड में सही जगह जाकर लगे। उन्होंने नाव धार में डाल दी। वे तेजी से चपू जलाकर नाव को दूसरी साइड में ले जाने की कोशिश कर रहे थे। नाव के दोंनो  किनारों के बीच में बीच में छेद करके मोटे रस्से बांधे गए थे। इन रस्सों में चपू फंसे थे। खेवक इन्हीं रस्सों में चपू चलाकर नाव नियंत्रित कर रहे थे।नाव धार के बीच पंहुची थी कि चप्पू केा  रोकने  वाली एक साइड की रस्सी टूट गईं। चप्पू के रस्सी के फंदे से बाहर होते ही नाव दूसरी साइड को वह चलीं। नाविकों का कंट्रोल नाव से खत्म हो गया। नाव में बैठे एक युवक ने टूटी रस्सी
को चपू के चारों ओर घुमाया छेद में टूटा सिरा निकाला और उसे कसकर पकड़कर बैठ गया। उसने ये काम  बहुत जल्दी किया। खेवक ने तेजी से चप्पू चलाना प्रारंभ कर दिया  और नाव अपने गंतव्य की ओर  चलने लगी। यहां से हम गंगा के बीच बने खेरपुर ,खादर ,लाडपुर लतीफपुर  और  इंछावाला आदि गांव में पंहंुचे। यहां के रहने वालों ने गंगा की बाढ़ को देख परिवार मुजफ्फर नगर जनपद के शुक्र्रताल नामक स्थान पर पहुंचा  दिए थे। शुक्रताल प्रसि़द्ध धार्मिक स्थल हैं। यहंा बहुत  सारी धर्मशालाएं हैं, इनमें इनके परिवार रूके थे। पानी को देख उन्होंने काफी पशु खोल दिए थे । कुछ पशु थे तो वह घुटनों तक पानी में खडे़ थे। हालाकि ग्राम वालों ने गांव और घरों के बाहर के  किनारे मिट् टी और पत्थर लगाकर पानी रोकने के लिए उपाए किए थे फिर भी घरों में देा फुट तक पानी भरा था। बुग्गी के उपर चूल्हे रखकर खाना बनाने की व्यवस्था की हुई थी। लोगों से बात कर फोटो खंीच हम यहां से लौट लिए। पानी में जोक थी।  ये आसपास के खेतों के किनारे की छोटी छोटी झाड़ियों पर थी और तिड़क कर नाव में आ जाती थी। मुझे  इनसे बचाने को नाव के बीच में बैठाया हुआ था । इसके बावजूद डर लग रहा था। जोंक एक छोटा कीड़ा होता है। यह आदमी और पशु के शरीर पर लगकर उसका खून चूंसता  हैं। छोटा सा यह कीट  खून पीकर काफी बड़ा हो जाता है। नाम में सवार एक दो गाव वालों को यह लगी। उन्होंने जोक को पकड़ा खंीचकर छुडाया और पानी में फेंक दिया। खींचने में जोक लगने की जगह से खून भी निकलने लगा। हमें शाम हो गई थी किंतु नाव नदी में लाने के लिए स्थान नही मिल रहा था। नदी में  उसी स्थल पर नाव डाली जाती हैं,  जहां नदी और खेत का स्तर बराबर होता है। यहंा खेत नदी से काफी उचाई  पर था। ढाग ढूढते अंधेंरा हो गया।  इस दौरान डाक मक्खी निकलने लगीं। यह बहुत खतरनाक काले रंग की मोटी मक्खी होती है।  इसके काटने से बड़े पशु तक के शरीर से खून निकलने लगता हैं।डाक मंक्खी और जोक के डर से मै सहमा और सुकड़ा बैठा था।  चांदनी रात थीं, ऐसे में नाव का सफर बहुत सुहाना और सुखद था। पर गहरे पानी में डूबने जोक और डाक मक्खी के काटने के डर ने सब कुछ गड़बड़ कर रखा था। घर की भी चिंता हो आई थी।  सबेरे के नौ  बजे तक आने को कह आया था । अब रात के आठ बजने को हैं, त्योहार का दिन होने के कारण निर्मल परेशान, मेरे इंतजार में बिना खाए पिए बैठी होगी। रात नौ  बजे गंाव में आकर पड़े । जल्दी जल्दी पेट भरा। घर की चिंता दी। मैने खाना खाकर गांव वालों से कहां कि मुझे मंडावर पंहुचा दें किसी ट्रक आदि से बिजनौर पंहुच जाउंगा, किंतु  उन्हांेने मनाकर दिया । कहा रास्ते में बदमाश लगते हैं। अब जाना ठीक नहीं। घर की चिंता में ढंग से नींद भी नहीं आई।   इस समय फोन होते नहीं थे, जो घर सूचित किया जा  सके।
सबेरे जल्दी उठकर मंडावर से पहली बस पकड़कर बिजनौर पंहुचा। घर पर निर्मल का रोते बुरा हाल था। उसने बताया कि वह अभी साथी  कुलदीप सिंह के यहां  गई थी। उनसे एक पी को कहलवाया है। एस पी ने पूछा किसके साथ गए है, तो उन्होंने बताया कि एक नेक्सलाइड अशोक है, उसके साथ है। ंएसपी भी बहुत नाराज हुए। मैने एसपी को फोन किया।  एसपी होशियार सिंह बलवारिया मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे। मैने उन्हें बताया कि मैं आ गया हूं, वह बहुत नाराज हुए। कहा नेक्सलाईड  के साथ जाना ठीक नहीं । कई दिन लगे निर्मल का गुस्सा शांत होने में । उनका गुस्सा इस बात को लेकर था,कि त्योहार के दिन क्यों गए। हमारा त्योहार खराब हुआ। बनाया खाना भी बेकार रहां।
अशोक मधुप

Monday, May 27, 2013

याद रही एक पुरानी कविता 

चीन ने भारत पर १९६२ में हमला किया था । में उस समय कक्षा छह का छात्र था । दिल्ली के नव भारत टाइम्स और हिंदी हिंदुस्तान बिजनोंर में आते थे। वीर अर्जुन के नरेन्द्र का बहुत ही प्रसिद्ध अख़बार था । झालू में छतरी वाले कुए के सामने दुमंजले पर कुछ  युवकों ने मिलकर लाइब्रेरी खोली थी । मै वहां जाकर अख़बार पढता था । उसी समय चीन के हमले पर किसी अख़बार में छपी ये कविता मैं आज तक नहीं भूला ।  
भारत माँ के वीर अंश हम नहीं किसी से डरते हैं ,
ओ गद्दारों तुमसे तो  क्या यम से भी लड़ सकतें हैं ।
भाई तुमको माना  हमने , इसी लिए सह् गए सभी,
और पडोसी अपना जान खडग उठाया नहीं कभी ,
अब जागे हैं सिंह सभी ,खून तुम्हारा पीने को ,
साँस तभी लेगें जब तुमको ,एक ना छोड़ें जीने को ।