Saturday, June 20, 2026

काबुलीवाला हमें माफ करना

 

17/08/2021

अशोक मधुप

काबुलीवाला माफ करना, हमने तो तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के दिन बहुत कुछ किया। तुम्हारे  मुल्क के लिए दुनिया ने अपनी तिजोरी खोल दी। जितना बन पड़ा तुम्हारे बच्चों और उनके भविष्य की बेहतरी और  विकास के काम लिया। तुम्हारे यहां बंदरगाह बनाए ।बांध  बनाए। हवाई अड्डे तैयार किए।संसद भवन बनाया। तुम्हारे बच्चे और बेटियों के भविष्य के लिए पूरी दुनिया ने बहुत कुछ किया।अपनी झोली का मुंह तुम्हारे परिवार की खुशहाली के लिए खोल दिये। दुनिया के लोगों से तुम्हारी बेटियों ,बेटों और परिवार की खुशहाली के सपने देखे।

अब ये सब कुछ तुम्हारे अपने अफगान के लोगों को ही रास न आये तो क्या किया जा सकता हैॽवे ही तुम्हारी बेटी,बहिन और बीवी को तालिबन की रखैल और लौंडी बनवाने पर आमादा हो तो हमारी या दुनिया की क्या गलतीॽ

तुम्हें तो अपनों ,परिवारजनों ,रिश्तेदार और पड़ोसियों से खतरा है। अपने घर और परिवार की  जिम्मेदारी तुमने जिन्हें सौंपी, जिन्हें आका माना, वही धोखा दे जाएं तो दुनिया क्या कर सकती  हैॽ तुमने जिन्हें अपना नुमाइंदा बनाया, जिन्हें अपना खुदा माना, संरक्षण स्वीकार किया,  वही दुश्मनों के  सामने से भाग खड़े हों ,हथियार डाल दें तो उसमें क्या हो सकता है।

प्रसिद्ध कवि रविंद्रनाथ टैगोर की एक कहानी है काबुलीवाला। काबुल  का रहने वाले एक पठान हिंदुस्तान में घूम -घूम कर मेवा बेचने का काम करता।है।  लेखक की छोटी बेटी से  वह घुल- मिल जाता है।लेखक की बेटी मिनी को बिल्कुल अपनी बेटी की तरह  प्यार करता है।एक मामले में वह जेल चला जाता है ।जब लौटता है तो लेखक की बेटी बड़ी हो चुकी है। उसकी  शादी है। अब उसे पता चलता है  कि  समय कितना आगे बढ़ गया। लेखक को वह बताता है कि उसकी बेटी भी मिनी के बराबर है, वह भी शादी लायक हो गयी होगी।लेखक उससे काबुल जाने को कहता है।उसके जेब खाली होने का जिक्र करने पर   लेखक बेटी की शादी के लिए एकत्र रुपये उसे देकर काबुल जाकर बेटी की शादी करने का आग्रह करता है। काबुलीवाले को धन देकर कहता है। अपने वतन जाओ और बेटी की शादी करो।

 हम अपने परिवार पर खर्च की जाने  वाली रकम अफगानिस्तान में लगाते हैं।   ये हमारी चिंता है।अफगानियों के लिए पूरी दुनिया की चिंता है।पर जब उसके परिवार की सुरक्षा के जिम्मेदार व्यक्ति लुटेरों से मिल जाएं तो कोई क्या करेॽजब उनके आका ही उनके परिवार की गर्दन कटने को दुश्मनों के सामने रख दें तो क्या किया जाएॽअपने घर की हिफाजत के लिए अपने आप लड़ना होता है,अपनों को लड़ना होता है,आसपास वालों को लड़ना होता है।कबीला लड़ता है,गांव लड़ता है, शहर लड़ता है,देश लड़ता है।दूसरे को क्या पड़ी है।वह कब तक तुम्हारा घर घेरे।तुम्हारे परिवार की सुरक्षा करे।माफ करना काबुलीवाला ,इसमें हमारी,दुनिया की या किसी और की खता नहीं।तुम्हारे अपने दोषी हैं।तुम्हारे अपने जिम्मेदार हैं।अपने परिवार बेटे,बेटियों, बहनों की हिफाजत तुम खुद नहीं करोगे, तुम नहीं लड़ोगे तो दूसरे  क्यों अपना खून बहाएं।लड़ना भी तुम्हें होगा।खून भी तुम्हे ही बहाना होगा क्योंकि परिवार तुम्हारा है।

अशोक मधुप

( लेखक  वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

  

 

 

 

एक छत के नीचे भी भारत −पाक −चीन के रिश्तों में जमी बर्फ नही पिंघली

 

 18/09/2024


अशोक मधुप

शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन एसोसिएशन के दो दिवसीय शिखर सम्मेलन में भाग लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत वापस लौट आए। वे सम्मेलन के एक हॉल में ,एक छत के नीचे चीन और पाकिस्तान के राषट्राध्यक्षों के  साथ मौजूद तो  रहे किंतु रिश्तों में जमी  बर्फ नहीं पिंघली। रिश्तों की  खटास में कोई कमी नहीं आई। आमने −सामने रहकर भी न आंखे मिली, न हाथ मिले।   न किसी ने एक दूसरे को   नमस्ते की ,न सुप्रभात कहा। एक संगठन के एक छत के नीचे  हुए कार्यक्रम में संगठन के आठ  सदस्य  देशों में से तीन  सदस्य देशों का   एक दूसरे से अपरिचित  बने  रहना, ये  बताता  है  कि इन तीनों देशों में   आपस में दूरी बहुत है।  रिश्ते बहुत खराब है । चीन और पाकिस्तान से दूरी बनाकर भारत और  उसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट  संकेत   दे दिया  कि भारत अब बदल गया है।  वह दूसरे देश  से  दबकर नही,नजर से  नजर मिलाकर  बात करता है।

 उज़्बेकिस्तान के  समरकंद में  शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन एसोसिएशन के दो दिवसीय शिखर सम्मेलन था। शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन एसोसिएशन (एससीओ) एक  आठ सदस्यीय सुरक्षा समूह है। इसमें चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजीकिस्तान, उज्बेकिस्तान, भारत और पाकिस्तान शामिल है।प्रधान मंत्री नरेंद्र  मोदी इसमें भाग  लेने के लिये गए।कार्यक्रम में शामिल भी  हुए।

पीएम नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग जब शंघाई सहयोग संगठन के मंच पर दिखे तो दूरिया भी साफ नजर आईं।सम्मेलन के फोटो सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  एक छोर पर खड़े हैं  तो पाकिस्तान  प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ दूसरे छोर पर।  चीन के राष्ट्रपति और मोदी के बीच में  शंघाई सहयोग संगठन के चार सदस्य खड़े  थे। गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच 2020 में हुई झड़प के बाद यह पहला मौका था, जब भारत  के प्रधान मंत्री और चीन के  राष्ट्रपति एक मंच पर आमने-सामने थे। लेकिन एक छत के नीचे की नजदीकी भी  दिलों की दूरियां  नहीं मिटा पाई और दोनों नेता औपचारिक मुलाकात से भी बचते दिखे।

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचने पर  उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शावकत मिर्जियोयेव ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया।  समरकंद के आसमान में रोशन होते  सतरंगी पटाखों के बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समरकंद पहुंचे थे। प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत करने खुद उज्बेकिस्तान के प्रधानमंत्री अब्दुल्ला अरिपोव एयरपोर्ट पहुंचे थे। इसके साथ ही भारतीय प्रतिनिधिमंडल के स्वागत में बॉलीवुड संगीत भी बजाया गया। उज्जबेकिस्तान में भारत का ये जोरदार स्वागत दूसरे दिन भी जारी रहा। जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचे तो उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शावकत मिर्जियोयेव ने तब भी गर्मजोशी से स्वागत किया। सम्मेलन की बैठक के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देशों को संबोधित किया। 

इस कार्यक्रम के दौरान पूरे समय प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी हिंदी में बोले।वह अंग्रेजी  में बोल सकते  थे, किंतु   उन्होंने  ऐसा नही किया। अब तक होता यह रहा है  कि देश  के नेताओं का इस तरह के  कार्यक्रम  में  अंग्रेजी प्रेम झलकने लगता  है।वे अपना  भाषण अंग्रेजी में देते  हैं। किंतु  प्रधानमंत्री  मोदी ने हिंदी  में बोलकर पूरी दुनिया  को संदेश  दिया। उन भारतीयों को भी संदेश दिया जो  राजनीति के लिए अंग्रेजी  का पक्ष   लेतें  हैं।  प्रधानमंत्री ने    हिंदी में  बोलकर बता दिया कि कोई कुछ भी  कहे ,भारत की स्वीकार्य भाषा,  मात्रभाषा  तो हिंदी ही है।

पीएम मोदी ने शुक्रवार को सुबह से दोपहर तक एससीओ के दो आधिकारिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। उनकी राष्ट्रपति पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति डा. इब्राहिम रईसी, तुर्की के राष्ट्रपति रिसेप तैयप एर्दोगेन और उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिरजियोएव के साथ द्विपक्षीय मुलाकात हुई। रूस के राष्ट्रपति पुतिन से  तो   निर्धारित समय  से ज्यादा देर तक बातचीत हुई।

सम्मेलन की बैठक के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देशों को पांच बड़े मंत्र दिए।दुनिया के महाबली देशों के मंच से पीएम मोदी ने बताया कि भारत किस प्रकार हर क्षेत्र में मजबूती से अपने पांव जमा रहा है। उन्होंने कहा कि  भारत को मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाना है। , 70 हजार स्टार्टअप वाला भारत इनोवेशन में सभी की सहायता करेगा, एससीओ के देशों के बीच सप्लाई चेन, ट्रांजिट बढ़ाना होगा, मोटे अनाज उपजाकर खाद्य संकट से निपटना होगा  और  एससीओ के सदस्य देश भी पारंपरिक इलाज शुरू करें।  प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग समिट में एक ही जगह, एक ही हॉल में तो मौजूद थे, लेकिन दोनों के बीच कोई भी बातचीत नहीं हुई। लेकिन शिखर सम्मेलन में जिनपिंग ने भारत की मेजबानी का समर्थन किया है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत को अगले साल एससीओ की मेजबानी करने के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि हम अगले साल भारत की अध्यक्षता का समर्थन करेंगे। उज्बेकिस्तान ने यहां आठ सदस्यीय शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की अध्यक्षता भारत को सौंपी।  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक विशेषता  है कि वह कार्यक्रम में  अपनी महत्ता बताना  जानते  हैं। उन्होंने अपनी भेंट में जहां रूस के राष्ट्रपति और यूक्रेन  का इस बात के लिए आभार व्यक्त किया कि रूस − यूक्रेन संकट के काल के  शुरू में जब हमारे हजारों छात्र यूक्रेन में फंसे थे।उनकी और यूक्रेन की मदद से हम उन्हें निकाल पाए।  वहीं मोदी ने पुतिन से यह कह कर पूरी दुनिया का दिल भी जीत लिया  कि आज का युग जंग का नहीं है। हमने फोन पर कई बार इस बारे में बात भी की है कि लोकतंत्र कूटनीति और संवाद से चलता है।पुतिन ने मोदी से कहा, 'मैं यूक्रेन से जंग पर आपकी स्थिति और आपकी चिंताओं से वाकिफ हूं। हम चाहते हैं कि यह सब जल्द से जल्द खत्म हो। हम आपको वहां क्या हो रहा है, इसकी जानकारी देते रहेंगे।  इस युद्ध को लेकर  अब तब रूस की आलोचना न करने के लिए अमेरिकन देशों की नाराजगी का  शिकार होते रहे प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने पुतिन   से   यह कह कर कि आजका समय  युद्ध का नही है,  अमेरिकन मीडिया   की प्रशंसा भी पा ली।  आज  अमेरिकन मिडिया  मोदी की तारीफ करते  नही अघा रही।

 चीन के राष्ट्रपति को कार्यक्रम में   नजर अंदाज कर भारत ने चीन को संदेश दिया कि पूर्वी लद्दाख से जुड़े वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर विवाद खत्म करने के लिए चीन को हालात पूरी तरह  सामान्य करने होंगे। लद्दाख  सीमा के छोटे से  भाग  से सेना हटाने से  द्विपक्षीय संबंध मधुर नहीं होंगे।  इस एससीओ सम्मेलन से पहले चीन ने जी-20 के समय की  मेजबानी का पांच साल पुराना दांव आजमाया था,  वह वहीं अब आजमाना चाहता था ।तब  चीन ने  सम्मेलन से ठीक पहले डोकलाम में महीनों से जारी विवाद को खत्म करने के लिए अपनी सेना पीछे हटाली थी।

 एक तरह से चीन की उस समय की  कूटनीति सफल रही थी। सम्मेलन  से  पहले जहां ये  चर्चाएं थी कि विवाद के हल हुए बिना प्रधानमंद्धी  चीन में होने वाले   इस सम्मेलन में भाग  लेने  नही जाएगें। चीन के सेना   हटाने के  बाद पीएम मोदी न सिर्फ जी-20 सम्मेलन में चीन जाकर  भाग  लिया, बल्कि जिनिपिंग के साथ अलग से द्विपक्षीय वार्ता भी की।

  लेकिन इस बार उसका यह दांव  नहीं चला।एससीओ बैठक से पहले भी चीन ने पुराना दांव चल कर भारत को साधने की कोशिश की। सूत्र कहते  हैं कि एलएसी के कुछ इलाकों से सेना हटाने के बाद चीन को उम्मीद थी कि वह फिर से भारत को साधने में कामयाब हो जाएगा। इसका अंदाजा इसीसे लगाया जा सकता है कि चीन ने अपनी ओर से मोदी-जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय वार्ता की तैयारी भी कर ली थी। चूंकि पीएम को चीनी राष्ट्रपति से नहीं मिलना था, इसलिए वह इस सम्मेलन में सबसे देरी से पहुंचे।  साथ  ही उन्होंने  चीन के राष्ट्रपति     को नजर अंदाज कर अपनी नाराजगी भी  स्पष्ट कर दी।
भारत  और   उसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यवहार ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब तक  चीन  नही सुधरेगा,भारत अपना रवैया नही बदलेगा।भारत चीन की दुखती रग पर हाथ रखता रहेगा। भारतीय बाजार में चीन के लिए मुश्किलें बनाण रहेगा, साथ ही  दक्षिण चीन सागर और ताइवान मामले में भारत चीन विरोधी देशों के साथ खड़ा रहेगा। आज  पाकिस्तान की आर्थिक हालत बहुत खराब  है।
वहां   मंहगाई  आसमान छू   रही है।दुनिया के देश उसको कर्ज देने और मदद करने को  तैयार नही हैं।  हाल में आई  बाढ़  ने   पूरी तरह से उसकी कमर तोड़  दी।ऐसे  में भारत  उसकी मदद कर सकता था, किंतु   उसने अभी तक  चुप्पी साध रखी है।भारत  चाहता है कि पाकिस्तान कशमीर से  दूरी बनाए और आंतकवाद को   खत्म करने की अपनी प्रतिबद्धता पूरी करके दिखाए।ऐसा न होने पर   वह   उसकी कोई  मदद नही करेगा।

अशोक मधुप

(लेखक  वरिष्ठ  पत्रकार हैं)  

 


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उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव चुनाव प्रचार से गायब हैं मुस्लिम मतदाता उनके नेता और मुद्दे

 06/02/2022


अशोक मधुप
उत्तर प्रदेश के  चुनावी जंगल में  इस बार हिंदुस्त्व  हावी है। भाजपा  हिंदू मतदाताओं का धुर्वीकरण में लगी है,  तो सपा सुप्रिमो  अखिलेख  यादव इस धुर्वीकरण को रोकने के प्रयास में  हैं। इस बार चुनावी दंगल से मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने की बात नहीं हो रही। चुनावी पटल से मुस्लिम मतदाता गायब है। मुस्लिम मददाताओं को रिझाने के लिए गैर भाजपाई  दलों के पास कोई महत्वपूर्ण मुस्लिम नेता भी नही हैं। गोल टोपी लगाकर चुनाव प्रचार करने वाले गायब हैं,तो मत देने की अपील करने वाले मश्जिदों के पेश इमाम  भी नजर नही आ रहे।चुनाव से मुस्लिमों के  मुद्दे गायब हैं। बसपा सुप्रिमो मायावती लगभग चुप्प हैं।

 प्रदेश  में पहले और दूसरे चरण का प्रचार चल रहा है।इसमें भाजपा के पास प्रचार के लिए एक मुस्लिम  चेहरा  केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी जरूर हैं।सपा के कभी आजम खां स्टार प्रचारक होते थे।  इस बार वह चुनाव मैदान में तो हैं किंतु प्रचारक में उनका कहीं नाम नहीं।  सपा ने तीस स्टार प्रचार के नाम की सूची जारी की है। इसमें सपा के  राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य जावेद अली खान का एक मात्र नाम है। ये नाम भी उत्तर प्रदेश के मददाताओं के लिए अनजाना और नया है।  

बसपा ने पहले चरण के प्रचार के  18 स्टार प्रचारक की सूची जारी की है इनमें मुनकाद अली  और समसुद्दीन राईन का ही नाम है।  मुनकाद अली जरूर बसपा का बड़ा नाम है।

 कांग्रेस के स्टार प्रचारकों की सूची में  पूर्व सांसद गुलाम नबी आजाद और सलमान खुर्शीद का नाम जरूर है , पर ये वह हैं  तो कांग्रेस के नेतृत्व के रवैये से नाराज है। वैसे भी  उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हालत कोई ज्यादा अच्छी नही है। लगता है कि वह सिर्फ वह  हाजरी   लगाने के लिए चुनाव लड़ रही है।वह और उसके प्रत्याशी कुछ करिश्मा कर सकेंगे, ऐसा नही लगता।

 बसपा और कांग्रेस और सपा दावा कर रहे  हैं कि उन्होंने ज्यादा मुस्लिम प्रत्याशियों का मैदान में उतारा है किंतु कोई  मुस्लिम के मुद्दे नही उठा रहा। ये मुस्लिम युवाओं के  रोजगार  और  शिक्षा आदि की बात पर चुप्प है। नागरिकता संशोधन कानून के  विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान प्रदेश के हजारों मुस्लिम युवाओं के विरूद्ध मुकदमें दर्ज हैं। मुस्लिम वोटों का दावा करने वाला कोई इन मुकदमों की वापसी की बात नहीं कर रहा।उनको डर है कि मुस्लिमों की बात की तो उनका बेस वोट भाजपा के साथ  जा सकता है।

बसपा ने ब्राह्णों की बात कर उनको मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका में ला  दिया, वरन अब तक कोई  उनकी ओर देखता भी  नहीं था।ये ही कारण  है कि सभी महत्वपूर्ण राजनैतिक दल ये बता रहे है कि उन्होंने कितने ब्राह्मण प्रत्याशी मैदान में उतारे।

सब दल चुनाव में मतदाताओं को अगड़े −पिछड़ों में बांटकर देख  रहे हैं। कोशिश भी है कि कोई समाज यह न कह सके कि उनकी उपेक्षा की गई है, जबकि भाजपा पूरे हिंदू वोटर को एक जुट करने की कोशिश कर रही है। अब तक उसका मुद्दा राम मदिंर, कांशी −वाराणसी का विकास रहा है। उसी को वह मुद्दा बनाकर हिंदू को एकजुट करना चाहती थी,अब उसने अपने इस अजेंडे में मथुरा को और शामिल कर दिया। उधर हाल ही में भाजपा के प्रदेश  प्रभारी अमित शाह ने कैराना का दौरा करके वहां हुए दंगों के घाव  कुरेद कर वोटर  को एकजुट करने की कोशिश  की।  वोटर को बताया कि उनकी सरकार  में दंगे नही हुए। जबकि सपा सरकार में ये आम था।    

विपक्ष जानता है कि प्रदेश का मुसलमान मतदाता भाजपा को  पसंद नही करता। वह भाजपा को हराने वाले दल को एकजुट होकर वोट करेगा।उसलिए उसकी कोशिश तो है कि उसे मुस्लिम वोट मिले, पर वह खुलकर उनके पक्ष में घोषणाएं नही कर रहा, वायदे नहीं कर रहा, सभी  दलों को डर यह है कि ऐसा करने से कहीं उनका बेस हिंदू वोट न भाग  जाए।

सपा का प्रयास है कि मुस्लिम , यादव और पिछड़ों को जोड़ा जाए।

चुनाव की घोषणा से पहले जहां भाजपा रैली करने ,सपा यात्रा  निकालने में लगी थी, वहीं बसपा  चुपचाप प्रत्याशी घोषित कर रही थी।

भाजपा –सपा गठबंधन के दलों से सीटों के बंटवारें के हल निकलने में लगी थी,और बसपा के प्रत्याशी चुनाव संपर्क में लग गए थे।  दलित उसका बेस वोट हैं ही ,उसने  प्रत्याशी को मुस्लिम वोटर को संपर्क के  लिए लगाया। जब तक सपा और कांग्रेस के प्रत्याशी तै  हुए तब तक बसपा के प्रत्याशी काफी संपर्क कर चुके थे। 

बसपा का  प्रयास है  कि दलित –मुसलिम  ब्राह्मण   उसे मिल जाए।  इसका वह लाभ  ले सकती है।

 भाजपा  हिंदुत्व के बूते पर चुनावी समर फतह करने में हैं। उसने अयोध्या काशी के बाद अपने अजेंडे में मथुरा को शामिल करके अपने इरादे साफ कर दिए हैं।विपक्ष के पास इसकी कोई काट नहीं लग रही।  हिंदू धर्म प्रचारक और जागरण मंडली राम मंदिर बनाने  वालों को वोट देने की अपील करती घूम रही हैं।आँल इंडियां मजलिस ए  इत्तेहादुल मुस्लिमान के असदुद्दीन औवेसी भी अपने उम्मीदवारों को लेकर चुनाव मैदान  में हैं। उन्होंने पार्टी के प्रत्याशी भी मैदान में उतारे हैं किंतु वह मुस्लिमों को अपने से जोड़ पांएगे, ऐसा अभी नही लगता।

सपा−रालोद गठबंधन किसानों की बात कर पश्चिम उत्तर प्रदेश के जाट मतदाताओं को रिझाने के प्रयास में है, वह किसान की बात कर रहा है,  उनके मुद्दे  उठा रहा है।अभी चुनावी समर शुरू हुआ है। सभी दल राजनीति की शतरंज पर अपनी – अपनी चाल  चल रहे हैं।सब दल दूसरे को हराने के लिए गोटी चल रहे हैं। अभी शुरूआत है, क्या होगा, कहा नही जा सकता।

 

अशोक मधुप

(लेखक  वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

 

 

उत्तर प्रदेश के किन्नरों को मजम्मा जोगाठी बनाने की तैयारी

 19/11/2021


अशोक मधुप

प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर प्रदेश में  किन्नर कल्याण बोर्ड गठित कर उसके लिए किन्नर सदस्य नामित किए  हैं। सरकार चाहें तो किन्नर समाज को प्रदेश के अंचलों और आदिवासी लोक नृत्य सिखाकर प्रदेश की लुप्त होती कला को जीवित कर सकती है।प्रदेश के कई किन्नर इन कलाओं का सीखकर पद्म पुरस्कार पाने वाले मजम्मा जोगाठी की तरह  सम्मान प्राप्त  कर सकतें हैं।

उत्तर प्रदेश में किन्नर कल्याण बोर्ड का गठन का उद्देश्य समाज के विकास की मुख्यधारा से वंचित किन्नरों को आगे लाने की जद्दोजहद है ।सरकार ने सोनम चिश्ती   को इस बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाया है।उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा दिया है। गठित किन्नर कल्याण बोर्ड में इनके अलावा चार किन्नर सदस्य पद के लिए प्रयागराज की कौशल्या नन्द गिरी उर्फ टीना मां, गोरखपुर की किरन बाबा, जौनपुर की मधु उर्फ काजल व कासगंज की मोहम्मद  आरिफ पूजा किन्नर शामिल हैं।उत्तर प्रदेश  सरकार के आदेश में कहा गया है कि बोर्ड किन्नरों की आवश्यकताओं, मुद्दों व समस्याओं पर काम करते हुए नीति व संस्थागत सुधारों के लिए सरकार को सुझाव देगा। बोर्ड के अध्यक्ष समाज कल्याण मंत्री होंगे।जबकि मुख्यमंत्री द्वारा नामित किन्नर उपाध्यक्ष होगा। समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव संयोजक होंगे। किन्नर संबंधी विभाग के अधिकारियों के अनावा पांच किन्नर व एनजीओ के प्रतिनिधियों को मंत्री नामित करेंगे। गैर-आधिकारिक सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्षों होगा। बोर्ड का सदस्य सचिव, निदेशक समाज कल्याण होगा। बोर्ड को तीन महीने में बैठक करना जरूरी होगा। विभागीय प्रमुख सचिव के रविन्द्र नायक ने बताया कि सभी के नामित होते ही बोर्ड की बैठक होगी।बोर्ड का काम किन्नर नीति को विभागों में लागू करने के साथ ही किन्नरों का शैक्षिक, सामाजिक व आर्थिक विकास करने, समानता व समता के लिए दिशा-निर्देश जारी कर उनका क्रियान्वयन कराने तथा जिला स्तरीय समिति या किन्नर सहायता इकाई के प्रकरणों पर निर्णय करना होगा।

जिलों में डीएम की अध्यक्षता में भी 13 सदस्यीय समिति होगी। इसकी प्रतिमाह बैठक होगी। इसमें अधिकारियों के अलावा डीएम द्वारा नामित मनोवैज्ञानिक व किन्नर समुदाय के दो प्रतिनिधि सदस्य और जिला समाज कल्याण अधिकारी सदस्य सचिव होंगे। यह भी कहा गया है कि किन्नरों को पहचान पत्र मिलेंगे। किन्नरों को मनोवैज्ञानिक परामर्श के लिए केंद्र भी बनेंगे।

 किन्नर समाज अब तक  बिल्कुल उपेक्षित हैं। समाज उन्हें स्वीकार करने को तैयार नहीं है। लोगबाग इनसे बात करते बचते हैं।किन्नरों का भी रवैया ठीक नहीं ।वह त्योहारों के नाम पर व्यापारियों से, दुकानदारों से कई बार जबरदस्ती वसूली करते हैं। बस और ट्रेन में हंगामा करते हैं ।परिवार में बच्चा होने और शादी के बाद दुल्हन के परिवार में तो उनकी उद्दंडता देखते बनती है। मनमानी राशि मांगते हैं।न देने पर हुड़दंग करते हैं। परिवार अपनी बेज्जती से बचने  के लिए, अपनी इज्जत बचाने के लिए इनकी नग्नता और गुंडई को देख कर चुप हो जाते हैं। हालात न होने पर भी इन्हें मनमानी रकम देते हैं। कई बार तो वे परिवार उधार भी उठाते हैं।देहात में तो इनके श्राप देने का भी आतंक है।कुछ लोग कहते हैंकि ये नए विवाहित जोड़े और शिशु को आशीर्वाद देते हैं। मांगी रकम न दिए जाने पर के श्राप भी देते हैं।इनका श्राप दिया जाना ठीक नहीं।

सर्वाच्च न्यायालय के आदेश पर  गठित इस बोर्ड के गठन से  किन्नरों की समस्याओं पर विचार हो सकेगा ।उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा में लाने, समाज के विकास कार्यों में लगाने का कार्य किया जाएगा। उनकी समस्याओं पर विचार होगा। उन्हें बताया जाना चाहिए  कि उनका रवैया समाज में उन्हें घृणा का पात्र बनाता है यदि वे थोड़ी सरलता− उदारता का प्रयोग करें समाज में उनकी छवि निखर सकती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इनकी संख्या डेढ़ लाख बताई गई है।जबकि वास्तव में काफी ज्यादा है।क्योंकि ये अपना परिचय बताना नहीं चाहते।

सरकार की योजना किन्नरों को परिचय कार्ड जारी करने की है।इससे किन्नरों को बहुत लाभ मिलेगा ।नकली किन्नरों की गतिविधियों को रोका जा सकेगा।कुछ व्यक्ति नकली किन्नर बनकर वसूली करते हैं।इससे नकली और असली किन्नरों में झगड़े होते हैं।मारपीट होती है।कई बार कत्ल हो जाते हैं।परिचय पत्र मिलने के बाद नकली किन्नरों की वसूली बन्द हो सकेगी।

अगर इनकी समस्या को समझा जाता,इन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का काम होता तो इनके व्यवहार में बड़ा परिवर्तन होता।इनके साथ समाज को भी इनके बारे में जागरूक किया जाता। तो देश के हालत बिल्कुल अलग होते।ये भी समाज का जिम्मेदार हिस्सा होते।वैसे आज कई किन्नर समाजहित के लिए काम कर रहे हैं।बिजनौर के एक किन्नर ने अपने पास से पैसा लगाकर एक गरीब परिवार की लड़की की शादी की है।  अब समाज कल्याण के कार्य सरकार कराने लगी।पहले सेठ,सम्पन्न ओर जमीदार ये कार्य करते थे।आजादी के पूर्व में बने कई कुएं ऐसे हैं जो क्षेत्र है किन्नर (हिजड़ों )ने बनवाए।पुराने लोग बताते भी हैं।ये कुएं हिजड़े का कुआं के नाम से प्रसिद्ध भी है।

सरकार  किन्नर कल्याण बोर्ड के माध्यम से किन्नरों को प्रदेश  की क्षेत्रीय नृत्य और  नाट्य कला,प्रदेश में बसने वाली जनजातियों के नृत्य सिखाकर इन कलाओं से जोड़ने का बड़ा काम कर सकती  है।इन्ही कलाओं में भनेड़ा(बिजनौर) के नक्काल,अरब से भारत आई और बिजनौर के चांदपुर ,अमरोहा और रामपुर जनपद में गाई  जाने वाली चाहरबैत को इनसे गवाकर जिंदा और रोचक बनाया जा सकता है।  चाहरबैत पुरूषों द्वारा ढप ( एक तरह का साज )पर गाई जाने वाली कला है। यदि  इसे  महिलाओं के परिधान में किन्नर गांए तो ये कला ज्यादा रूचिकर और लोकप्रिय होगी ।

ऐसे ही 'अगरही'( पूर्वांचल के आदिवासियों का एक प्रमुख नृत्य )पूर्वांचल के देवरिया, गोरखपुर और बलिया जिलों में 'गोड़उ' नृत्य, अहीर (वीरों की संस्कृति ) की कला, नृत्य  सिखाकर इनसे मंचित कराए जा सकतें हैं।कुछ समय पूर्व सांरगी वादक जगह− जगह दिखाई देते थे, यदि कुछ जीवित सांरगी वादकों से इन्हें शिक्षा  दिलाई  जाए  तो किन्नर के माध्यम से प्रदेश सरकार  प्रदेश की समाप्त होगी क्षेत्रीय, आदिवासी और परम्परागत कला को जीवित किया  जा सकता है । किन्नर  मजम्मा ने तो अपने  आप लोक कला  सीखकर पद्म पुरस्कार पाया। अगर सरकारी स्तर से प्रदेश के किन्नरों के साथ ईमानदारी से मेहनत की गई तो प्रदेश देश को किन्नर मजम्मा जैसे कई प्रसिद्ध कलाकार दे सकेगा।

अशोक मधुप  

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

जीवन एक रंग अनेक पुस्तक समीक्षा

 

14/06/2022


लेखक स्वर्गीय द्वारिका दत्त उत्सुक

 

संतान  कई बार ऐसा काम कर देते हैं जो  इतिहास बन जाता है, ऐसा ही कवि स्वर्गीय द्वारिकादत्त उत्सुक जी के साथ हुआ।उनके निधन के बाद उनके पुत्रों ने उनके कागज खोजे तो उसमें बहुत सारी कविताएं  हाथ लगी। उन्होंने जीवन के रंग अनेक नाम से उनकी कविताओं का संकलन छपवाया। यदि यह संकलन न छपता तो उत्सुक जी की रचनाओं की उत्कृटता का पता भी न चलता। उनके तीन पुत्रों पुत्र डा देवेश शर्मा, डा दिनेश शर्मा और डा राकेश  शर्मा का यह प्रयास प्रशंसनीय है।

    पंजाब के साहित्य जगत में उत्सुक जी के नाम से प्रसिद्ध  द्वारिकादत्त जी का जन्म 15 मार्च 1927 को गुरदासपुर में हुआ । 11 माह की आयु में ही माता –पिता को खो देने के बाद आपका लालन – पालन दादा−दादी ने किया।

आप की प्रारंभिक शिक्षा डीएवी स्कूल अमृतसर और लाहौर में हुई ।पंजाब विश्वविद्यालय से आपने  1954 में हिंदी और 1963 में संस्कृत में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की ।1957 में उन्होंने डिग्री कॉलेज अमृतसर में हिंदी प्रवक्ता के रूप में काम शुरू कर दिया । 1987 में  डीवी कॉलेज अमृतसर से हिंदी प्रवक्ता के रूप में रिटायर हुए ।आपको साहित्य  से बड़ा प्रेम था ।आप रात −रात भर जाकर कविताएं लिखते ह। उन्होंने कविता  और गीत 1950 के दशक में लिखने शुरू किए। कुछ चलचित्रों की गीत और संवाद भी लिखे ।वे रेडियो −दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले कवि सम्मेलन में भाग लेते थे1 अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हुई। आपकी कविताओं में प्रेम , स्नेह, प्रणय  बेबसी ,विडंबना कर्तव्य बोध आदि बहुत कुछ है।

वे कहते हैं  − आज कांचनमृग सभी को छल रहा है,/पनपति लंका, प्रवंचित  जल रहा है।पाप क्या है, पूण्य क्या है, क्या कहूं मैं,/फूल हैं सब बांझ,कांटा फल रहा है।/खोट के कारण चलन जिनका नही था/धूम से सिक्का वही अब चल रहा है।

कवि अपने को मरूस्थल का मृग मानता है। कहता है− मरूस्थल में किसी मृग सा भटकता  मैं,लक्ष्य मुझसे भागता है दूर,जैसे लक्ष्य मृग हो, मैं बधिक हूं।और भटकन और टूटन, सोचता हूं,खोज किसकी कर रहा हूं ॽ।

घास और बरगद नामक कविता में कवि भीड़ को घास मानता है। कहता है।घास एक भीड़ है, जो सिर तान कर भी ,ऊपर नहीं उठ पाती। वह या तो  चरी जाती है, या पांव तले रौंदी  जाती है।फिर भी वह ढीठ , धरती को पकड़े , खिल खिलाती रहती है।/बरगद का पेड़ नन्हें पक्षियों की भीड़ को /अपने कांधों पर बिठाता है,पशुओं और मनुष्यों को अपनी छाया में सहलाता है।

उन्होंने कविता −गीत के साथ गजल भी लिखीं।एक गजल− एक सपना बिखर गया अपना,यों लगा कोई मर गया अपना/जलती दोपहर साथ कौन चले, जब कि साया भी डर गया अपना।

मनुष्य जीवित है, में उन्होंने जीवन की परिभाषा रचते बिलकुल नए प्रतीक लिए। वे कहतें हैं− सोहनी की तरह नदी तैर कर,पार से आती हुई बंशी की तान,या किसी गीत के धीमे− धीमें स्वर, या कांसे सी खनकती हुई  हंसी। ये सब निशानी हैं इस बात की कि मनुष्य अभी जीवित है।उसने तन के लिए मन को भले ही गिरवीं रख दिया हो,परतुं उसे बेचा नही है।

महानगर और बसंत पर उनके प्रतीक ,  उपमान पढ़ते ही बनते हैं− कवि कहता है−अंगड़ाई लेते हुए नटखट दिन, सिमटती हुई शर्मीली रातें/कैलेंडर के बेहरूपिए पन्ने/ कहते हैं बसंत आ गया है। किंतु मैं कैसे मान लूं− न कोयल की कूक,न बौर की भीनी महक,न पवन में मस्ती, न मन में आह्लाद/ मैं कैसे मान लूं, बसंत आ गया है।−−−− यहां बसंत की संगिनी सुगंध  सैंट की शीशियों में बंद है।क्रीम और पाउडर के डिब्बों में बंद है/जब चाहो बाजार से खरीद लो,घुटन भरा मन और बंद कमरे में महक लो।

इस सभ्य महानगर में , एक गवांर और

अजनबी बसंत का क्या कामॽ

उत्सुक जी के गीत तो लाजवाब हैं− इक काया कि खातिर मैंने/ पूजा सा मन बेच दिया,इससे बढ़कर क्या लाचारी/ जब अपनापन बेच दिया।घुटन,निराशा , पहले से थी/नए ताप,कुछ और बढ़े,/लगता है अंगारे  लेकर, मैंने चंदन बेच दिया।रोम− रोम अपनी काया का,कांटो जैसा चुभता है/किस बबूल की खातिर मैंने अपना मधुबन बेच दिया1 इच्छा और अनिच्छा के शिशु खेंले अपने खेल कहां/जबकि पिता ने  लाचारी में ,घर का आंगन बेच दिया।

लेखक के अलग तरह के प्रतीक हैं। अलग तरह के सवाल। ये प्रतीक और ये सवाल एक एक पंक्ति कों पढ़ने, उसे समझने और महसूस करने को मजबूर कर देतें हैं−

मैं तुमसे नही, तुम्हारे पांव से पूछता हूं,यू लड़खड़ाते हुए/ भूल भुलैया में कब तक भटकते रहोंगेॽकब आएगी तुम्मे दृढता/कि तुम अंगारों या हिमानियों को/ लांघकर कब अपने लक्ष्य तक पंहुचोंगेॽ−−−मैं  तुमसे नहीं/तुम्हारी आंखों से पूछना चाहता हूं/गांधारी की पट्टी कब  उतरेगीॽकब तक प्रकाश को नकारोगी तुम ॽओ अंधकार में डूबी आखों, कब देखोगी अपने घाव।

  इसी कविता में कवि देश की जनता से सवाल करता है−मैं तुमसे नही/ तुम्हारें हाथों से पूछना चाहता हूं/ कब तक उठाए रहोगे पराए झंडेॽकब तक जकड़े रहोगे हथकड़ियों में , ये हथकड़ी , तुम्हें घाव पर मरहम भी नहीं लगाने देंगीॽ

कवि के प्रेम के गीत भी लाजवाब हैं− मैं किसी के प्यार का अब तो पुजारी हो गया हूं,मैं किसी के द्वार का अब तो भिखारी हो गया हूं।बन चुका हूं हिरन सी आंखों का मैं खुद ही शिकार,उल्टे दुनिया कह रही है, मैं शिकारी हो चुका हूं।   

कविता संग्रह जीवन एक रंग अनेक में एक से एक बढ़कर 211 कविता , गीत और गजल   हैं।सब अलग तरह के गीत, अनछुई की कवितांए,कोमलांगी से प्रतीक हैं। अभिज्ञान शाकुंतलम् में राजा  दुष्यंत शकुंतला को देखकर कहते हैं − यह एक ऐसा फूल है, जिसे किसी ने  सूंघा नहीं,ये ऐसा नव पल्लव है जिस पर किसी के नाखून की खंरोंच के निशान नहीं लगे, ऐसा रत्न है जिसमें अभी छेद नही किया गया,और ऐसा मधु है जिसका स्वाद किसी ने नही चखा। 

ऐसा ही इस संग्रह के साथ है।एक एक रखना लाजवाब, अलग तरह की ।इस संग्रह के प्रकाशक डा दिनेश शर्मा क्रास रोड देहरादून ,उत्तरांचल हैं।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)