Wednesday, August 5, 2020

जब सलूजा पर हुआ हमला ।उनपर ही दर्ज हुआ हत्या का मुकदमा

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -6
जब सलूजा पर हुआ हमला ।उनपर ही दर्ज हुआ हत्या का मुकदमा

11 मार्च 19 94 । बिजनौर सूचना आई कि धामपुर में अमर उजाला के पत्रकार महेंद्र सलूजा के खिलाफ धारा 302 में मुकदमा दर्ज हुआ है। कुछ लोगों से सलूजा को हमला कर घायल कर दिया है।मैँ और वरिष्ठ साथी जनसत्ता संवाददाता ओपी गुप्ता जी टैक्सी कर धामपुर पंहुच गए। यहां के के शर्मा इंस्पैक्टर थे। के के शर्मा अलग तरह के पुलिस अधिकारी रहे। ऐसे अधिकारी जो बड़े - बड़े अधिकारी के दबाव के आगे भी नहीं झुके। वे दंगा रोकने के स्पेशलिस्ट थे। संभल दंगों के लिए मशहूर था। वे संभल में छह साल तैनात रहे। जबकि तीन साल से ज्यादा पुलिस अधिकारी का एक स्थान पर तैनाती का नियम नहीं था।के के शर्मा हमारे बहुत नजदीक थे। सलूजा धामपुर ‌थाने में ही मिले। डीएम अशोक कुमार चतुर्थ और कप्तान निरंजन लाल भी मौजूद थे। पता लगा कि एक दलित युवक को कहीं से सांप मिल गया था। युवक नसेड़ी था।वह उससे खेल रहा था। जैतरा के पास तालाब में उसे एक और सांप मिल गया। वह उससे भी खेलने लगा । तालाब में मिला सांप जहरीला था। उसने एक दो जगह काट लिया । पर ध्यान नहीं दिया। सलूजा को पता चला । वे मौके पर गए। फोटो खींचे। इसी दौरान थाने के दरोगा रविंद्र कुमार भी दो सिपाही के साथ मौके पर आ गए।उन्होंने समझाया। युवक की समझ में नहीं आया। काफी भीड़ एकत्र थी। सांप से खेलते युवक की मौत हो गई। युवक के परिजनों को लोगों ने चढ़ा दिया। यहां कि अखबार वाले फोटो खींचकर ले गए हैं । ये अखबार में छापेंगे। तो तुम फंस जाओंगे। महेंद्र सलूजा सरदार हैं। सरल हैं। दिन रात सड़क पर घूमने वाले कबीर परम्परा के पत्रकार।युवक के परिवार जनों से सलूजा को पकड़ लिया। उसे बुरी तरह मारा- पीटा। पकड़ कर थाने ले आए। सलूजा, दरोगा रविद्र स‌िंह थाने के दो सिपाही सहित कई लोगों ‌के खिलाफ आई पीसी की धारा 147, 302, 323 के अंतर्गत मुकदमा लिखाया कि इन्होंने षडयंत्र कर उनके परिवार जन को मारा। वह सांप से खेल रहा था। तालाब में दूसरा जहरीला सांप दिखाई दिया। इन्होंने एक राय की। दरोगा रविंद्र कुमार ने सांप को लाठी से उठाया। युवक के गले में डाल दिया। कहा खेल । इससे खेल। ये सांप जहरीला था। इसके काटने से सांप से खेलने वाले की मौत हो गई।प्रदेश में बसपा की सरकार थी। लगभग एक सप्ताह बाद मुख्यमंत्री मायावती जी को बिजनौर आना था। अतः दलित नेताओं ने पीड़ित परिवार को चढ़ा दिया। डटे रहना। इसकी पत्नी को सरकारी नौकरी भी मिलेगी । मुआवजा भी। हम पंहुचे । बात हुई। डीएम अशोक कुमार ने कहा कि मरने वाले की पत्नी को नौकरी दिलाई जाएगी। हमने कहा कि हमारे पत्रकार सलूजा पर हमला हुआ है। उसे क्या मिलेगा? डीएम ने कहा कि पांच हजार रुपये दिए जाएंगे।हम सलूजा केे इलाज के लिए बिजनौर को लेकर चलने लगे । एसपी निरंजन लाल ने कहा कि उपचार करा कर भिजवा देना। मैंने कहा कि हम माने की सलूजा मुलजिम है? इस पर इंस्पैक्टर के के शर्मा ने कहा कि कोई जरुरत नहीं। सलूजा मुलजिम नहीं हैं। आप जहां चाहें ले जांए। जहां रखे। निरंजन लाल अलग तरह के अधिकारी थे। पर के के शर्मा के सामने वे कुछ नहीं बोले।हम सलूजा  केे इलाज के लिए बिजनौर को लेकर चलने लगे । एसपी निरंजन लाल ने कहा कि उपचार करा कर भिजवा देना। मैंने कहा कि हम माने कि सलूजा मुलजिम है?  इस पर इंस्पैक्टर के के  शर्मा  ने कहा कि कोई जरुरत नहीं। सलूजा   मुलजिम नहीं हैं। आप जहां चाहें ले जाएॅ।  जहां रखे। निरंजन लाल  अलग तरह के अधिकारी थे। पर के के शर्मा के सामने वे कुछ नहीं बोले।
हम सलूजा को बिजनौर ले आए। जिला अस्पताल में भर्ती  करा दिया।अगले दिन डीएम  अशोक कुमार को अस्पताल ले जाकर सलूजा  को पांच  हजार रुपये  दिलाए। रुपये  देते फोटो  खिंचाया। कुलदीप सिंह ने कहा कि ये फोटो अखबार में छपना चाह‌‌िए ताकि लगे कि ये मुलजिम नहीं हैं। हमने  फोटो छपने भेज दिया।
डेस्क् को फोन कर कहा । तो उन्होंने कहा कि भदोरिया जी को बता दो। भदोरिया जी प्रदेश प्रभारी होते थे।उनसे फोटो छापने का अनुरोध  किया।
सुबह फोटो अखबार में नही था। मैने डैक्स के साथी से पूछा ।  उसने कहा क‌ि  पेेज पर लग चुका था। आपके फोन करने पर आलोक भदौरिया जी ने रुकवा दिया। मैने एडमिन के साथी राजीव  धीरज से बात की । धीरज  स्योहारा से हैं। स्योहारा में मेरे अधीन अमर उजाला के रिपोर्टर होते थे। फिर मेरठ चले गए। मैने उन्हें किस्सा सुनाया और कहा -  इस्तीफा भेज रहा हूॅ । उन्होंने कहा कि राजेंद्र ‌त्रिपाठी जी को बता दो। आज के अमर उजाला मेरठ के संपादक राजेंद्र त्रिपाठी उस समय क्राइम रिपोर्टर होते थे।  देर से सोए होंगे। मैंने उन्हें  फोन कर स्थ‌िति बता दी। कहा कि टैक्सी से इस्तीफा भेज रहा हूं।
अतुल जी के रहने के टाइम में मैं  नाराज होकर साल में एक -दो बार इस्तीफा भेज देता था। वह बुलाकर मना लेते थे।
दुपहर एक  बजे  अतुल जी का फोन आया। लोगों को सोने भी नहीं देते । मेरठ आइये।
मैँ  और साथी कुलदीप सिंह अखबार की टैक्सी से मेरठ  चले गए। उन्होंने हमारी आराम से बात सुनी।आलोक भदोरिया को  बुलाया। फोटो न छापने का कारण पूछा। उनसे कहा कि जिले में बैठकर ब्यूरो प्रमुख को वहां के हालात से काम करने पड़ते है। इसलिए  उनकी सुनिए। उसी के हिसाब से काम करिए। फोटो   सुबह के अखबार  में छप  जाना चाह‌िए।और इस तरह वह फोटो छप गया।
मुख्यमंत्री मायावती बिजनौर  आयीं। चलीं गईं। इस प्रकरण का जिक्र भी नहीं हुआ। 11 मार्च  1994 को दर्ज  मुकदमा एक माह बाद 12अप्रेल 94 को खत्म हो गया।  सलूजा पर हमले की आशंका को देख एसपी ने उन्हें तीन -तीन माह के लिए एक एक सशस्त्र गार्ड  दिया। तीन माह के बाद मंडलायुक्त की संस्तुति से इनके पास तीन ‌माह और गार्ड रहा।
सलूजा फक्कड़ रहे । शुरू से लेकर । अब भी ऐसे ही हैं। गार्ड रहा। कोई  वाहन तो था नहीं। सलूजा जी दिन भर साइकिल पर लिए घूमते। कभी सलूजा साइकिल चलाते । कभी गार्ड।।सलूजा जी आज अमर उजाला में नहीं हैं,पर सरलता वैसी ही है।अशोक मधुप

Sunday, August 2, 2020

जब मेरे विरूद्ध दर्ज हुआ सेना में विद्रोह फैलाने का मामला


जब मेरे विरूद्ध दर्ज हुआ  सेना में विद्रोह फैलाने का मामला---5


स्वर्ण मंदिर पर सेना ने धावा बोलकर आतंकवादियों को मार दिया था। काफी को  गिरफ्तार कर लिया था।आपरेशन हो  चुका था। इसे लेकर देश के सिखों में बहुत गुस्सा था। शाम के समय बिजनौर पुलिस कंट्रोल से मेेसेज  आया कि कोडिया छावनी से एक ट्रक में नौ  सिख जवान भागे हैं। उस समय आज के 'स्वतंत्र आवाज पोर्टल' के संपादक दिनेश शर्मा  यहां उत्तर भारत टाइम्स में कार्यरत थे। उन्हें यह मैसेज हाथ  लगा। उन्होंने उत्तर भारत टाइम्स के लिए  खबर की। मैंने अमर उजाला में भेज दी।उत्तर भारत टाइम्स ,बिजनौर लोकल तक  सीमित था।  उसपर कुछ फर्क  नही पड़ा।  

उस समय बरेली का अमर उजाला बिजनौर आता था। यह खबर सुबह के अमर उजाला  अखबार में छप गई। इससे अगले दिन खबर छपी कि कोडिया छावनी के कमांडिग आफिसर  ने मेरे (अशोक मधुप) और अमर  उजाला के संपादक- प्रकाशक स्वामी के  विरुद्ध सेना में विद्रोह करने का मुकदमा दर्ज  करा दिया है। बरेली से आदरणीय अत़ुल जी का  अखबार की टैक्सी  से पत्र आ गया कि कृपया देख लें। क्या मामला है?

मै  और साथी  कुलदीप सिंह एडवोकेट कोटद्वार चले गए। वहां अमर उजाला के रिपोर्टर पी डी कुकशाल साहब मिले। बहुत घबराए हुए थे। बोले जल्दी भाग जाओ । कोडिया छावनी के कमांडिग आफिसर को आपका पता चल  गया तो  जाने आपके साथ क्या करे।

हम  उनके साथ चाय की दुकान पर बैठ गए। चाय पीते हुए बात होने लगी।उन्होंने बताया कि आपकी खबर पढ़कर लगभग 10 बजे मैंने  छावनी फोन किया ,कमांडिग अफसर   से बात की। वह गाली देकर बोला कहाॅ  है ?मैं तो सुबह से  तेरी तलाश में हूं। मैने कहा - मैं  11 बजे आपके पास आ रहा हूँ। जाने से पहले आफिस गया । पता चला कि सुबह से फौज की गाड़ियाॅ मुझे  खोजती घूम रही हैं।

उन्होंने बताया कि मै  11 बजे छावनी पहुंचा। कमांडिग आफिसर  मुझे गाली दे, सो दे। एक घंटे तक वह बिफरा रहा। एक घंटा होने पर मैंने कहा - साहब  पानी पिलवाओ। आप भी पानी पियो।  दोनों ने पानी  पिया। वह कुछ ठंडा हुआ तो मैंने कहा -वह अखबार दिखाओ जिसमें खबर है। उन्होंने अखबार दिया। मैने खबर पढ़कर उन्हें सुनाया। खबर में था कि बिजनौर से हमारे संवाददाता अशोक मधुप  ने खबर दी है कि कोडिया छावनी से एक ट्रक में सवार नौ  जवान बिजनौर साइड को भागे हैं। उन्हें रोका  जाए।

उन्होंने बताया कि खबर आराम से पढ़ने के बाद  उसका गुस्सा शांत हुआ। इससे पहले वह  मुझे  गाली दे  रहा था। खबर पढ़ने के बाद  उसने आपको खूब गलियाया।

कुकशाल साहब से  हमने ऐसा प्रदर्शित किया कि हम डर गए हैं। तुरंत बिजनौर जा रहे हैँ। उनसे अलग होकर हम थाने पहुॅच गए। आईओ से मिले। आईओ का नाम याद नहीं। पर बहुत ही बढ़‌िया  और अच्छा पुलिस अधिकारी था।  उसने हमें चाय पिलाई। कहा कि इनका जवान भागने का वायरलैस तो हमारे यहां भी रिकार्ड है। उनकी राय थी कि जवान भागे । इन्होंने उनके भागने का वायरलैस किया। किंतु  रास्ते की जानकारी न होने के कारण वे पकड़ लिए गए। इन्होंने बाद में मामला दबा लिया।

उन्होंने आश्वस्त किया कि एक सप्ताह में मामला खत्म हो जाएगा। आईओ तीन -चार दिन बाद कमांडिग  आफिसर  के पास गए।उनसे कहा कि वे बिजनौर अशोक मधुप के पास गए थे। उन्होंने बताया कि यहां पुलिस कंट्रोल को कोडिया छावनी से  वायरलैस आया था। वे मुझे  लेकर पुलिस कंट्रोल गए। यहां रिकार्ड में दर्ज  आपका वायरलैस मैसेज मुझे दिखवाया।

बताएं  अब  क्या करना है ? केस आगे बढ़ता है तो  आपके ‌ख‌िलाफ  जाएगा।  कमांडिग अधिकारी का अब तक गुस्सा शांत हो चुका था। उन्हें लगा कि मामला आगे बढ़ा तो उनके विरूद्ध जाएगा  । सो  कहा छोड़ो। मामला खत्म करो। और इस तरह मामला खत्म हो गया। एक सप्ताह भी नहीं लगा।


अशोक मधुप
     

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी 4

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी 4

जब देहरादून प्रशासन ने मुझ पर लगानी चाही एनएसए---

कौन? कब? , यहाँ पर काम आ जाता है, कुछ पता नहीं चलता। हम सोच भी नहीं सकते कि ऐसा भी हो सकता है। ऐसा मेरे साथ तो कईं बार हुआ। कवि मनोज अबोध मेरे छोटे भाई की तरह से हैं। उनकी पत्रकारिता में रुचि शुरू से ही रही है। उत्तर भारत टाइम्स में काम करने के दौरान उनकी ,पोस्ट आफिस में नौकरी लग गई। सरकारी नौकरी के बाद भी उनका मन पत्रकारिता में रमा रहा। अपना शौक पूरा करने के लिए मनोज ने 'मंथन फीचर' नाम से फीवर सर्विस शुरू की। संपादक अपनी पत्नी इंदु भारद्वाज को बनाया।उसने मुझ से एक लेख मांगा। उस समय उत्तरांचल आंदोलन जोरों पर था। समय की मांग देखते हुए मैने इस आंदोलन के समर्थन में एक लेख लिख दिया। मनोज ने उसे संपादित किया। समाचार पत्रों को भेज दिया। उसने भेजी प्रति मुझे दिखाई। मैंने देखा कि उसमें एक वाक्य गलत हो गया है । यह वाक्य पहाड़ के रहने वालों के लिए भारी आपत्ति जनक था।मैंने उसे गलती से अवगत कराया। मनोज ने जब तक संशोधन भेजा तब तक विश्व मानव सहारनपुर में लेख छप चुका था।

लेख छपने के बाद पहाड़ के रहने वालों में गुस्सा होना स्वभाविक था। सो अगले दिन अखबार लेकर गई विश्व मानव की टैक्सी और अखबार को देहरादून में जला दिया गया। मेरे और विश्वमानव के खिलाफ प्रदर्शन हुए। विश्वमानव सहारनपुर के संपादक और मेरी गिरफ्तारी की मांग को लेकर आंदोलन हुए। दोनों पर रासुका लगाने की मांग हुई।

मेरे खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की सूचना देहरादून अमर उजाला से मेरठ आयी। मेरठ में उस समय डेस्क पर मेरे छोटे भाई जैसे सुभाष गुप्ता कार्यरत थे। उन्होंने वह सूचना टैक्सी से मुझे भिजवा दी। चिंता होना स्वभाव‌िक था।उस समय एच के बलवारिया बिजनौर में एसपी थे। के के सिह डीएम ।

हमारी मित्र मंडली के एक साथी हैं। हुकम सिंह । पेशे से वकील हैं। कचहरी में बैठते हैं। मिलना कम होता है। पर होता रहता है। वे बलवारिया साहब के कैंप आफिस पर किसी काम से गए थे। बलवारिया साहब किसी काम में व्यस्त थे। स्टेनो ने उन्हें अपने पास बैठा लिया। इसी दौरान घंटी बजी। अर्दली ने स्टेनो से कहा साहब बुला रहे हैं। स्टेनो बलवारिया साहब के कक्ष में चले गए। हुकम सिंह ने स्टेनो की मेज पर नजर दौड़ाई तो स्टेनो की मेज पर डीएम देहरादून का ,बिजनौर के डीएम और एस पी के नाम वायरलैस मैसेज पड़ा दिखा। इस मैसेज में मुझे एनएसए में निरूद्ध् करने का अनुरोध किया गया था। हुकम सिंह धीरे से इस पत्र की नकल कर लाए। उन्होंने ये नकल हमारे पत्रकार साथी वीरेश बल को दी। वीरेश बल ने मुझे बताया ।मैं, वीरेश बल, शिव कुमार शर्मा राजेंद्र पाल सिंह कश्पय साहब के पास गए।

राजेंद्र पाल सिंह उस समय दैनिक उत्तर भारत टाइम्स के संपादक थे। बिजनौर मुख्यालय पर पीटीआई सहित कईं अंग्रेजी दैनिक के रिपोर्टर भी थे। एक तरह सेहमारे अभिभावक थे।उनसे बातचीत हुई। तय हुआ कि डीएम और एसपी से मिला जाए।हम लोग डीएम के के सिंह से मिले। मदद की बात की। केके सिंह प्रमोशन ने डीएम बने थे। देहरादून के डीएम सीधे आईएएस थे। के के सिंह ने साफ मनाकर दिया । कहा कि वहां के डीएम ने लिखकर भेजा है। मैं इसमें कुछ भी मदद नहीं कर सकता।

हम सब बलवारिया साहब से मिले। उनसे हम लोगों की उठ -बैठ ठीक थी। उन्होंने मेरे से कहा कि एनएसए लगना आपके लाभ में है। आप गिरफ्तार होते ही हीरो बन जाओगे। देश भर में प्रदर्शन होंगे। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री निवास तक शोर मचेगा। दो तीन दिन में छूट जाओगे,पर मैं आपको हीरो नहीं बनने दूंगा। मैंने डीएम और एसपी देहरादून से कह दिया है कि हमारे यहां अशोक मधुप की इमेज बहुत अच्छी है। उनके किसी समाचार लेख से यहां कभी कोई विवाद नहीं हुआ। आपके यहां हुआ है। आप एनएसए का वारंट बनाकर भेज दें। मैँ तामीज करा दूंगा। मेरे यहां कुछ नहीं है, इसलिए अपने यहां से वारंट नही बनाऊंगा। उन्होंने कहा कि मैने बता दिया है कि पत्रकार का मामला है, एक दिन बाद ही देश भर में हंगामा मचेगा। आप करोगे आप झेलोगे।

पत्नी निर्मल भी मानसिक रूप से तैयार हो गईं।उन्होंने मुझे समझाया जो होगा।देखा जाएगा।चिंता मत करो ।हम जॉब में हैं।परेशानी वहाँ होती है।जहाँ अन्य आय का स्रोत न हो। मैं भी मानसिक रूप से तैयार होगया।सोचा जेल में आराम से पढ़ा लिखा जाएगा।चिंतन होगा।

पर समय इसके लिए तैयार नहीं था।

एनएसए टल गई। पर पता लगा कि मेरे और संपादक विश्व मानव सहारनपुर के विरूद्ध 295ए में देहरादून में मुकदमा दर्ज है।समाज में साम्प्रदायिक भावना भड़काने का। विश्वमानव की ओर से भी उसकी टैक्सी में आग लगाने , नुकसान होने आदि का मुकदमा दर्ज कराया गया था ।देहरादून वाला मुकदमा भी सहारनपुर भेज दिया गया ।

सहारनपुर में सुंदर लाल मुयाल एडीएम होते ‌थे। पहले ये बिजनौर भी डीडीओ और एडीएम रह गए थे। वर्धमान कॉलेज के विज्ञान विभाग के प्रवक्ता ओ पी गुप्ता जी जनसत्ता के संवादादाता हैं। गुप्ता जी की अधिकारियों के साथ न‌िकटता जग जाहिर थी। सुंदर लाल मुुयाल जी से भी उनकी घनिष्ठता थी। मैँ और ओपी गुप्ता जी दोनों सहारनपुर गए। विश्वमानव पहुंचे तो वहां बढ़ापुर के साथी शराफत हुसैन मिले। उन्होंने अपने साहित्य संपादक से मिलवाया। साहित्य संपादक का नाम अब याद नहीं। उन्होंने कहा कि आपका लेख बिल्कुल सही था। उसमें कुछ गलत नहीं था। वे गढ़वाल का गजेटियर पेश कर सकते हैं।

खैर! कुछ देर वहां रुके। शराफत बाहर तक छोड़ने आए।यहां से हम मुयाल साहब के पास गए। उहोंने केस के आईओ को बुला रखा था। आईओ ने कहा कि क्रास केस है। खत्म करने के आदेश हैं। मुयाल साहब ने कहा कि आज ही खत्म कर के एफआर की प्रति शाम तक मुझे पहुंचा दें। एक दो-दिन बाद उन्होंने एफआर की प्रति हमें भिजवादी । इस तरह इस प्रकरण का समापन हुआ। बहुत तनाव रहा।पर सुभाष गुप्ता जी,हुक्म सिंह जी,वीरेश बल जी, ओपी गुप्ता जी सुन्दर लाल मुयाल जी इस प्रकरण को निपटाने में बहुत मददगार रहे।

 


Tuesday, July 28, 2020

पत्रकारिता की भूली बिसरी कहानी -3

पत्रकारिता की भूली बिसरी कहानी -3

बिजनौर में रामलीला मैदान में भाजपा के व‌रिष्ठ नेता अटल विहारी बाजपेयी जी की सभा थी। उस दिन अचानक रेहड़ के पत्रकार साथी अशोक कुमार शर्मा  आ गए। बोले- पुलिस के एक दरोगा को  मकान किराए पर दे दिया था। उसका तबादला हो गया किंतु वह मकान खाली नहीं कर रहा।

मैंने पूरी बात सुनी। उन्हें सभास्थल पर अपने साथ ले गया।  मुझे  उम्मीद थी कि वहां एसपी साहब मिलेंगे।पुलिस अधीक्षक उस समय दिलीप त्रिवेदी जी ही  थे।  वह कार्यक्रम स्थल पर बाहर ही मिल गए। मैंने अशोक शर्मा  जी को उनसे मिलवाया। उन्होंने समस्या सुनी। कहा कि एक सप्ताह में मकान खाली हो जाएगा। एक सप्ताह की बात सुनकर मुझे आश्चर्य  हुआ।
इसपर उन्होंने कहा कि कल बरेली में आईजी की मी‌ट‌िंग है। मुझे उसमें जाना  है। आई जी साहब से कहकर इस दरोगा का  बरेली जनपद में तबादला करा दूंगा। आर्डर आने के बाद तुरंत उसे रिलीव कर   दिया जाए्गा।ऐसे में वह स्वतः मकान खाली कर जाएगा। या करा दिया जाएगा। ऐसा ही हुआ भी।

ऐसा ही मकान का एक मामला मेरे मित्र रज्जी खन्ना उर्फ  राजकिशोर खन्ना का फंसा। स्वर्गीय रज्जी खन्ना की मुख्य डाक घर के सामने  जोली टीवी नाम से  दुकान थी। जैन मंदिर के पास डाक्टर दीपक के क्लिनिक के ऊपर का एक पोर्शन खाली था। पुलिस के एक हैड कांस्टेबिल ने  इसे किराए के लिए मांगा। रज्जी खन्ना ने उस समय के हिसाब से  किराया काफी ज्यादा,  पांच हजार रुपये के आसपास प्रतिमाह बताया। सही राशि मुझे अब याद नहीं। वह मकान में आकर रहने लगा। एक म‌हीना बीता ।दो महीने बीते। उसने रज्जी खन्ना को किराया नहीं  दिया। किराया मांगा  तो बोला कि मै  तुम्हारे मुहल्ले  की सुरक्षा कर रहा हूं। तुम खुद मुझे  इसके लिए 20 हजार रूपये महीना दो।  मामला चलता रहा। उसका अम्हेड़ा चौकी केे लिए तबादला हो गया। वह अपना सामान तो ले गया किंतु मकान से ताला नही खोल कर गया। रज्जी खन्ना से कह गया कि मेरी बंदूक रखी है। ताला मत तोड़ लेना।

यह सुन रज्जी खन्ना हक्के - बक्के रह  गए। वे थे  तुनक मिजाज। भ्रष्टाचार विरोधी एक संगठन भी चलाते थे। जरा जरा सी बात पर गुुस्सा आ जाता था।उन्होंने आव देखा न ताव ।  इस घटना का इश्तहार छपवाया। शहर में बंटवा दिया। एसपी को भी दे आए। मामला नहीं ‌निपटा। हमारे पत्रकार साथी शिवकुमार जी  उनके पास बैठते थे। शिवकुमार जी ने यह कहानी मुझे बताई। हल्दौर के थानाध्यक्ष बल्ले सिंह हमारे मित्र थे।अम्हेड़ा चौकी उनके अधीन थी।वे जब भी बिजनौर आते थे  तो मुझसे  जरूर मिलते  थे। मैने समस्या उन्हें बताई। उन्होंने कहा कि मामला निपट जाएगा। एक दो दिन बाद उन्होंने उस दीवान से लेकर मकान की चाबी मुझे भिजवा दी। तब मैंने कहा - रज्जी भाई मकान देते समय देख तो लेते कि लेने वाले की हालत किराया देने की है भी या नहीं।  मकान ऐसे ही ,बिना सोचे समझे किसी को भी किराये पर देना उचित नहीं है । फालतू के लफड़े लेते हो।

Monday, July 27, 2020

प्रदीप जैन पर हमला

पत्रकारिता की भूली बिसरी कथाएं -2
--प्रदीप जैन पर हमला
वर्ष 1995 । मैं श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के पांडिचेरी सम्मेलन में भाग लेने परिवार सहित गया था। 25 दिन के अवकाश पर निकला था । सफर में पता चला कि नगीना के हमारे साथी पत्रकार प्रदीप जैन को पुलिस ने पकड़ लिया है। पूरे शहर में पिटाई करते हुए जुलूस भी निकाला गया । तमंचे के साथ उनकी गिरफ्तारी दिखा दी गयी है।प्रदीप जैन नगीने की अपनी ठसक के लिए मशहूर थे ।सम्मान बहुत था। यद‌ि कहीं प्रशासन उन्हें ले जाता तो एसडीएम की गाड़ी में प्रदीप जैन अकेले जाते। एसडीएम सीओ की गाड़ी में होते। नगीना में प्रदीप ने अलग तरह की पत्रकारिता पैदा की।अलग हटकर पत्रकारिता की।
इंस्पेक्टर की वहां के लाटरी माफियाओं उठ-बैठ थी।ये माफिया प्रदीप जैन से नाराज थे।उन्हें सबक सिखाना चाहते थे।
मैं लखनऊ पहुॅचा तो ऑफिस के साथी शैलेंद्र का फोन आया। अतुल जी (अमर उजाला के मालिक अतुल माहेश्वरी जी) का आदेश है कि तुंरत बिजनौर आओ। कई दिन का अवकाश बकाया था। परिवार का लखनऊ घूमने का मन था। मैंने भी ढंग से कभी लखनऊ नहीं देखा था।मैंने अतुल जी से बात की। उन्होंने कहा कि हमारे रिपोर्टर के सम्मान का मामला है। नगीने का इंस्पैक्टर हटना चाहिए। मैंने पुलिस अधीक्षक ‌निरंजन लाल से फोन पर बात की। मेरी उनसे अच्छी उठ -बैठ थी। उन्होंने कहा कि इंस्पैक्टर से ज्यादा वहां का सीओ बदमाश है। पहले वह हटेगा। फिर इंस्पैक्टर। कल तक सीओ हट जाएगा। इसके बाद इंस्पैक्टर भी हट जाएगा। मैंने एसपी से हुई बात अतुल जी को बता दी। बच्चों की नाराजगी के बावजूद मैं बिजनौर लौट आया।मेरे बिजनौर आने से पहले ही सीओ हट चुका था। उससे अगले दिन इंसपेक्टर नगीना हटे।
प्रदीप जैन को प्रताड़नाएं देने के बाद उनका हत्या के प्रयास (307) का झूठा मुकदमा दर्ज कर बिजनौर जेल तो भेज दिया।अगले दिन यह खबर समाचार पत्रों में छपने के बाद बिजनौर समेत आसपास के कई जिलों(जिनमें वर्तमान के उत्तराखंड के क्षेत्र भी)के पत्रकार एकजुट होकर बिजनौर में एकत्र हुए। जिला मुख्यालय पर विशाल विरोध प्रदर्शन हुआ।
पत्रकारों की एकता व दबाव को देखकर तत्कालीन मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद जिले के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने अपर पुलिस अधीक्षक को नगीना भेजकर जांच कराई । पुलिस द्वारा दर्ज किए गए मुकदमे को वापस लिया।पत्रकारों की एकता के कारण ही प्रदीप जैन दो दिन बाद ही जेल से छूटकर आ गए। सीओ ओर इन्स्पेक्टर के हटने से सारे में संदेश गया कि अमर उजाला के रिपोर्टर के साथ ज्यादती की थी, इसलिए हटे। बिजनौर आकर मैं निरंजन लाल जी से मिला। उन्हें धन्यवाद दिया।

Sunday, July 26, 2020

जब बढ़ापुर के पत्रकार शराफत हुसैन का कत्ल होते बचा -

पत्रकारिता की भूली बिसरी कथाएं --
जब बढ़ापुर के पत्रकार शराफत हुसैन का कत्ल होते बचा -

बिजनौर में पुलिस अधीक्षक दिलीप त्रिवेदी का समय था।वह एक ईमानदार अधिकारी का कार्यकाल था। उनके कुछ किस्सेे आज भी याददाश्त से नहीं निकलते। जबकि अब वह सीआरपीएफ के डीजी पद से सेवानिवृत हो चुके हैं।‌त्रिवेदी जी का  आदेश था कि डांस कंपनी नहीं चलेंगी। बढ़ापुर  से उस समय 'अमर उजाला' के लिए शराफत हुसैन कार्य  कर रहे थे।  वहां डांस कंपनी चल रही थी।शराफत हुसैन द्वारा भेजी गयी रिपोर्ट  हमने फोटो के साथ छापी। दिलीप त्रिवेदी साहब ने छापा लगवाया। चलती कंपनी पकड़ ली गयी। मजबूरन  थानाध्यक्ष महोदय को उसे बंद कराना पड़ा। उनका बहुत आ‌र्थिक नुकसान हुआ।  एक ईमानदार अधिकारी की नजर में इमेज भी खराब हुई।शराफत कम्युनिष्ट पार्टी से जुड़े थे। वे पुलिस की ज्यादती समय- समय पर उठाते रहते थे।ईद से पहली रात को  मैं  आराम से सोया था। तीन बजे दरवाजा खड़कने पर आंख खुली । बढ़ापुर के दो कम्युनिष्ट साथी थे। मैँ उन्हें रात को तीन बजे देख कर चौंका ।उन्हें  बैठाया। ठंड थी। वे दोनों कंबल लपेटे थे।उन्होंने बताया कि आज  ईद की नमाज पढ़ने जाते समय शराफत का कत्ल हो जाएगा। थानाध्यक्ष ने जिन तीन बदमाशों को इसके लिए तैयार किया है।  इनमें से एक की माँ ने यह बात शराफत की मां को बता दी है।मैँ नींद में था। मेरी समझ में नही आ  रहा था कि क्या हो रहा है?मेरी पत्नी निर्मल चाय  बना लायीं। चाय पीते समय मेरी समझ में आया कि  मामला कुछ गंभीर  है। उनके जाने पर निर्मल बोलीं---बढ़ापुर से ये एक बजे चले होंगे। ।तब तीन बजे आए। इतनी ठंड में ।मामला बहुत गंभीर है। 
उस समय लैंड लाइन फोन थे।पांच बजे  के आसपास मैने दिलीप त्रिवेदी साहब को फोन किया।  वे बोले --सब ठीक तो है? इतनी जल्दी? मैंने उनको पूरी बात बतायी। उन्होंने कहा - चिंता मत करो। पता लगा कि उन्होंने सीओ नगीना को वायरलैस पर फौरन बताया कि आज ईद की नमाज पढ़ने  जाते समय बढ़ापुर के पत्रकार शराफत  हुसैन का कत्ल होना है। बढ़ापुर के एस. ओ.  ने बदमाशों के साथ ये प्लॉन किया है। आप तुरंत  बढ़ापुर जाएं और शराफत की सुरक्षा करें।अगर  उसे कुछ होता है  तो वहां के थानाध्यक्ष को गिरफ्तार कर जेल भेज दें।
बढ़ापुर एसओ ईदगाह जाने के लिए तैयार हो रहे थे। हैड मोहर्रिर ने ये मैसेज सुना। भागकर एसओ को बताया। एसओ नहाना - धोना  सब भूल गए। जल्दी तैयार होकर अपने दफ्तर पहुंचे। इतनी देर में सीओ नगीना पहुॅच गए।सीओ नगीना के रूख को देखकर थानाध्यक्ष महोदय घबरा गए। पहले वह शराफत को मरवाना चाहते थे। अब उसकी सुरक्षा में  लग गए। ईद ठीक बीत गई। शराफत साहब का  बाल भी बांका नहीं  हुआ। दिलीप त्रिवेदी साहब के पास मेरा शाम को जाकर बैठना होता था। शाम को गया तो उन्होंने   सारी कहानी बतायी।
इसके बाद शराफत साहब उस स्थान से बाहर चले गए। उन्होंने चीनी मिल नजीबाबाद में लंबे समय तक कार्य किया । अब वे सेवानिवृत हो भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी की राजनीति कर रहे हैं। आज संचार तंत्र बहुत विकसित हो गया है पर  फिर भी यदि आज का युग होता तो आप फोन करते रहते, कोई  अधिकारी अटैंड भी नहीं करता। बदमाश अपना काम कर चुके होते ।

अशोक  मधुप

Monday, June 1, 2020

1jun 2020 Amar Ujala Bijnor
आज के शहर में कभी बहती थी गंगा की धारा, अब भी मिलते हैं प्राचीन मंदिर
गंगा के तट वाले इलाके में आज भी हैं ढ़लान वाले तट
फोटो
अशोक मधुप
बिजनौर। आज गंगा दशहरा है। बिजनौर और आसपास के लोग गंगा स्नान के लिए गंगा बैराज जाते हैं। यहीं शव का अंतिम संस्कार करते हैं। आज से 25-30 साल पहले गंगा औेर विदुर कुटी गंगा स्नान के लिए जाते ‌थे। आज से लगभग 200 साल पहले बिजनौर शहर में गंगा बहती थी और बिजनौर वासी यहीं स्नान करते थे। अब गंगा की धारा दस किलोमीटर से ज्यादा पीछे जा चुकी है।
बिजनौर के पुराने शहर में काजीपाड़ा, जाटान आदि बहुत गहराई पर बसे मोहल्ले हैं।जब‌कि शास्त्री चौक से घंटाघर पुरानी तहसील होने सदुपुरा जाने वाले रास्ते रास्त से पूरब की साइड में बसे मुहल्लों का तल सामान्य है। अचारजान में बाल कृष्ण खन्ना की कोठी से दो साइड को रास्ता गया है। इन रास्तों का ढाल 40 से 45 फिट तक है। पुराने लोग बताते रहे हैं कि कभी यहां गंगा बहती थी। ये ढाल गंगा के खोले(ढाल वाला तट) है। बताते हैं कि कभी गंगा की धार भरत विहार, नुमाईश ग्राउंड, काजीपाड़ा होते हुए बहती थी। ये ढाल गंगा के पुराने मार्ग को दर्शाता है। भगत सिंंह चौक से काजीपाड़ा, बालकृष्ण खन्ना की कोठी के दोनों साइड के ढाल, सरस्वती विद्या मंदिर से आगे का ढाल, रम्मू के चौराहे के पास से दाई ओर नीचे जाने वाला ढाल बताता है कि कभी गंगा यहां तक वही है। ये गंगा के खोले हैं। बिजनौर में गंगा सन् 1800 के पास पास तक बहती थी। इसके बाद उसकी घार दूर होती चली गई। आज यह बिजनौर से 12 किलो मीटर दूर बहती है। इस एरिया के ऊपर कई पुराने छोटे छोटे मंदिर हैं। वैसे ही मंदिर जैसे गंगा के किनारे होते हैं। रूड़की में 1825 के आसपास गंग नहर बनी। इसी दौरान बालावाली में रेलवे पुल बना। इससे गंगा की धार बंध गई। गंज के केवलानंद आश्रम के स्वर्गीय स्वामी सुखानंद जी अपने शिष्यों को बताते थे कि उन्होंने गंगा में चलते बड़े बड़े जहाज देख्रे हैं।
काजीपाड़ा के रहने वाले खाल‌िद असरार बतातें हैं कि उनके पूर्वजों ने मकान की जमीन 1872 में खरीदी। उससे पहले गंगा काजीपाड़ा से पीछे जा चुकी थी। वे कहते हैं कि काजीपाड़ा की जामा मस्जिद भी ढाल से ऊपर इसलिए बनी है क्योंकि नीचे गंगा का पानी आ जाता था।
अचारजान के निवासी संजय खन्ना एडवोकेट बताते हैं कि उनके दादा जी बताते थे कि उनकी कोठी के पीछे गंगा के खोलें हैं। वे वहते हैं कि उनकी (बाल कृष्ण खन्ना की ) कोठी के सामने की धर्मशाला बहुत ऊंची उठाकर इसलिए बनाई गई थी कि यहांतक गंगा का पानी आ जाता था।
जाटान के रहने वाले न्यूज पेेपर एजेंट दिनेश शर्मा कहते हैं कि उनके घर से मुख्य शहर में जाने के लिए सभी साउड से 40 -45 फिट की ऊचांई चढ़नी पड़ती है। वे कहते हैं कि छुटपन में घर के सामने जब वे खेलते थे तो मिट्ठी के नीचे गंगा का रेत निकलता था।
बिजनौर के इतिहास के बड़े जानकार शकील बिजनौरी कहते हैं कि कि आज से लगभग 200 साल पूर्व गंगा बिजनौर के पुराने शहर से होकर बही है। पुुरानी तहसील चौराहे से प‌श्चिम का ढाल बताता है कि ये गंगा के खोले हैं। इस ढाल के ऊपर के पुराने छोटे छोटे मंदिर गंगा किनारे बने मंदिर हैं।पुरानी तहसील से आगे एक रास्ता सदुपुरा को गया है। एक जाटान को । जाटान के ढाल से गंगा आगे बढ़ गई। इससे सदुपुरा और जलालपुर घाट वाले मार्ग को प्रभावित नही किया।
जाटान के रहने वाले बिजली विभाग से सेवानिवृत बिजेन्द्र पाल ‌सिंह बताते हैं कि मुहल्ले के वृद्ध कढेरा सिंह बताते थे कि वे इस ढाली के कुछ आगे गंगा में खूब नहाए हैं। पहले यहां गंगा बहती थी।
मोहल्ला जाटान निवासी 85 वीरेंद्र अग्रवाल सर्राफ बताते हैं कि वे चार पीढ़ियों से जाटान में रह रहे हैं। उनके पिता बताते थे कि जहां उनका घर है वहां कभी गंगा बहती थी। उनका घर गंगा के तट जैसे टीले पर दस फीट की ऊंचाई पर है। उनके मकान से भी ऊपर तक ये टीले थे। उनके अनुसार जब वे छोटे थे तो गांव गोकलपुर वाली जगह में गंगा बहती थी। वह वहां खूब नहाते थे। जहां चामुंडा मंदिर है वहीं से गंगा की रेती शुरू हो जाती थी। शीतला माता मंदिर के पास गंगा का तट था। शीतला माता मंदिर में खड़ा पिलखन गंगा तट पर था। वहां रखी शिवलिंग व नंदी की मूर्ति भी गंगा तट से ही मिली थीं। अब तो गंगा की धारा वहां से कई किलोमीटर दूर खिसक चुकी है।
जाटान निवासी डा.दीपक विश्नोई बताते हैं कि जहां उनका घर है उसके सामने कभी श्मशान घाट था। यहां गंगा के किनारे शवों का अंतिम संस्कार होता था। शहर तो बहुत थोड़ा सा घंटाघर की ओर ही था। धीरे धीरे गंगा की धारा पीछे की ओर गई तो यहां शहर बस गया।
अशोक मधुप